दोस्तों, आज की इस पोस्ट में हम बच्चों के लिए Animals Stories in Hindi में लेकर आये है। दोस्तों यह stories बहुत Interesting है। आपको इन stories को पढ़ कर बहुत मजा आएगा । उम्मीद है कि आपको यह stories पसंद आयेगी। 

Animal Stories in Hindi

Animals Stories in Hindi List

हाथी और दोस्त

क्रेन और सांप

चूहा और शेर

दो चूहे दोस्त

बुद्धिमान नाई

एक अच्छा नेता

बंदर और दो बिल्लियाँ

एक कृतघ्न बाघ

शेर और चूहा

अनोखा तरीका

भेड़िया और बांसुरी

मुर्ख भेड़िया

चार दोस्त

पिंजरे में कैद बाघ

लोमड़ी और बकरा

ढोल की पोल

भेड़िया और मेमना

वफादार कुत्ता

खरगोश और शेर

बड़बोला शिकारी

आलसी रिक्कू

अपनी-अपनी विशेषता

खरगोश की बारी

शेर का हिस्सा

बंदर और टोपीवाला

पालतू कुत्ता और बाघ

लालची कुत्ता और मांस

बंदर का न्याय

बुद्धिमान लोमड़ी और शेर

हिरण और उसके सींग

गुलाम और शेर

चतुर केकड़ा

लालची शेर

गधे की ईर्ष्या

गधे का दिमाग

शेर की खाल में गधा

लालची कुत्ता

शिकारी कुत्ते और नन्हा कबूतर

हाथी और दोस्त

एक दिन, एक हाथी दोस्तों की तलाश में दूसरे जंगल पर आया। उसने एक पेड़ पर एक बंदर को देखा। हाथी ने बंदर से पूछा, "आप मुझसे दोस्ती करोगी?"

बंदर ने कहा, "तुम बहुत बड़े हो और तुम मेरे जैसे पेड़ों से नहीं झूल सकते।" इसके बाद, हाथी एक खरगोश से मिला। उसने उसे अपने दोस्त बनने के लिए कहा।

लेकिन, खरगोश ने कहा, "तुम मेरी तुलना में बहुत बड़े हो।" फिर हाथी एक मेंढक से मिला। उसने पूछा, "क्या तुम मेरे दोस्त बनोगे?"

मेंढक ने जवाब दिया, "मैं कैसे आपका दोस्त बन सकता हूं? मैं तो पानी में रहता हूं।" हाथी परेशान था। फिर, उसकी मुलाकात एक लोमड़ी से हुई।

उसने लोमड़ी से पूछा, "क्या आप मुझसे दोस्ती करोगी?" लोमड़ी ने कहा, "क्षमा करें, मैं आपसे दोस्ती नहीं कर सकता। क्योंकि आप मुझसे बहुत बड़े हो।"

अगले दिन, हाथी ने जंगल के सभी जानवरों को अपने जीवन बचाने के लिए दौड़ते देखा। (Animal story in Hindi) हाथी ने उनसे पूछा, कि मामला क्या है।

एक भालू ने जवाब दिया, "जंगल में एक बाघ है। वह हम सभी को, मारकर खाने की कोशिश कर रहा है। इसीलिए, सभी जानवर उससे बचने के लिए भाग रहा है।

हाथी ने सोचा, कि वह जंगल के सभी जानवरों को बचाने के लिए क्या कर सकता है। फिर हाथी बाघ के पास गया और बोला, "कृपया इन बेकसूर जानवरों को मत खाओ।"

बाघ ने कहा, "आप अपने काम से काम रखो।" फिर बाघ आगे बढ़ गया। हाथी के पास, बाघ को भारी किक देने के अलावा कोई चारा नहीं था। भयभीत बाघ, जीवन बचाने के लिए भागा।

फिर, हाथी ने सभी को खुशखबरी सुनाई। सभी जानवरों ने हाथी को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा, "हमारे दोस्त बनने के लिए आपका आकार बिल्कुल सही है।

क्रेन और सांप

एक बार, नदी के किनारे एक जंगल में अपनी पत्नी के साथ एक क्रेन रहते थे। दोनों बहुत दुखी थे। क्योंकि, हर बार जब पत्नी क्रेन अपने घोंसले में अंडे देती है।

तो एक बड़ा काला कोबरा जो पेड़ के गैप में रहता था, उन्हें खा जाता था। क्रेन का एक दोस्त था। एक दिन, वह अपने दोस्त केकड़े के पास गया और अपनी दुख केकड़ा से साझा की।

केकड़ा ने कहा, "चिंता मत करो। जब आपका मेरे जैसा दोस्त है, तो आपको निराश नहीं होना चाहिए। मेरे पास एक अद्भुत जोजोना है, केकड़े ने क्रेन की कान में कुछ फुसफुसया।

फिर क्रेन ने अपने घोसले में वापस उड़ान भरी। और केकड़े की योजना के बारे में, अपनी पत्नी को बताया। दोनों क्रेन योजना को आजमाने के लिए उत्सुक था।

फिर क्रेन नदी के किनारे गया और मछलियां पकड़ने लगी। उसने काई छोटी मछलियों को पकड़ा और उस छेद के पास ले गया। जिन में एक नेवला जीव रहता था।

उसने, छेद के मुहाने पर एक मछली गिरा दी। फिर उसने एक और मछली ली, उसे पहले वाले से थोड़ी दूर गिरा दिया। (Short ) उसने मछलियों का एक रास्ता बनाया।

जो उस पेड़ की ओर जाता था। जहां उसका घोंसला था। फिर नेवला, मछलियों को खाने के लिए छेद से बाहर आ गया। और जल्दी से एक मछली खा लिया।

उसके बाद उन्होंने मछलियों का पीछा किया। जैसे ही वह उस पेड़ के पास पहुंचा। जहां क्रेन और सांप रहते थे, वहां रास्ता खत्म हो गया। और मछलियां ना मिलने पर उसने इधर उधर देखा।

अचानक बह मछलियां ढूंढते ढूंढते, काले कोबरा के पास आ गया। नेवला को देखकर, कोबरा ने अपने जीवन की लड़ाई लड़ी। दोनों लंबे समय तक लड़े, अंत में नेवला ने सांप को मार दिया।

वे क्रेन जो अपने घोसले से लड़ाई देख रहे थे, वह दोनों राहत की सांस ली। फिर, अगले दिन नेवला ने भजन मिलने की उम्मीद में उसी रास्ते से चलना शुरू कर दिया।

जब वह उस पेड़ के पास आया, जहां रास्ता समाप्त हो गया। तो उसने, भजन की तलाश में पेड़ पर चढ़ने का फैसला किया। नदी के किनारे पर जो क्रेन थी, बह पेड़ पर चढ़े हुए नेवला को खोजने के लिए वापस लौटी।

अपने घोसले में देखते पर उन्हें पता चला, कि इस बार भी उनके सभी अंडे खा गए थे। क्रेन ने अपनी पत्नी से कहा, "हम एक दुश्मन से छुटकारा पाने के लिए दूसरे को आमंत्रित किया।"

चूहा और शेर

एक बार, एक जंगल में एक शेर रहता था। एक दिन, भारी भोजन के बाद वह एक पेड़ के नीचे सो रहा था।

थोड़ी देर बाद, एक चूहा आया और उसने शेर की शरीर के ऊपर खेलना शुरू कर दिया। अचानक, शेर गुस्से से उठा और उसे ढूंढने लगा।

जिन्होंने उसकी अच्छी नींद खराब करें। फिर उन्होंने देखा, कि एक छोटा चूहा डर कर कांप रहा है। शेर उस पर कूद पड़ा और उसे अपने हाथ में लिया।

फिर चूहा ने शेर से उसे माफ करने का अनुरोध किया। शेर को दया आ गई और उसने चूहा को छोड़ दिया। चूहा वहां से जान बचाकर भाग गया।

एक दिन, शेर को एक शिकारी ने जाल में पकड़ लिया। चूहा वहां शेर को बचाने के लिए आया और जाल कटकर शेर को मुक्त किया।

इस प्रकार चूहा ने शेर को बचा लिया। इसके बाद चूहा और शेर दोनों अच्छे दोस्त बन गए। बाद में, वे दोनों खुशी से जंगल में रहते थे।

दो चूहे दोस्त

एक शहर के चूहे और एक गांव के चूहे, दोनों अच्छे दोस्त थे। एक दिन, गांव का चूहा ने अपने दोस्तों को खेतों में अपने घर पर आने के लिए आमंत्रित किया।

शहर का चूहा आया और वे भजन करने के लिए बैठ गए। दोनों मिलकर, कुछ अच्छी मकई का स्वाद लिया। लेकिन, स्वाद मेहमान के लिए बहुत ज्यादा नहीं था।

शहर का चूहा ने कहा, "आप यहां रहते हैं, चीटियों से बेहतर नहीं है। आपको यह देखना चाहिए, कि मैं कैसे रहता हूं। तुम मेरे साथ चलो मैं वादा करता हूं तुम खुश रहोगे।"

इसीलिए, जब वह शहर लौटा। तो वह अपने साथ गांव का दोस्त को ले आया। () फिर उसे एक आटा युक्त एक लार्डर, अंजीर, शहद और खजूर दिखाया।

गांव के चूहे ने कभी भी ऐसा कुछ नहीं देखा था। वह अपने दोस्त तारा प्रदान किए गए विलासिता का आनंद लेने के लिए, बैठ गया था। लेकिन, इससे पहले कि वे अच्छी तरह से शुरू करें।

लार्डर का दरवाजा खुल गया और कुछ लोग अंदर आए। दोनों चूहे डर के मारे अलग हो गया है। और दोनों अलग अलग जगह पर छुप गया। वर्तमान में जब सभी शांत थे।

उन्होंने फिर से बाहर निकले। लेकिन, कुछ लोग और आ गए और वह फिर से अलग हो गए। गांव का चूहा के लिए यह बहुत अधिक था। वह अपना घर गांव में जाने का फैसला किया।

उन्होंने कहा, "अच्छा, अलविदा दोस्त। मैं देख सकता हूं, कि आप विलासिता की गोद में रहते हैं। लेकिन, आप खतरों से गिरे हुए हैं। जबकि, घर पर मैं अपनी मकाई का आनंद ले सकता हूं और शांति से रह सकता हूं।"

बुद्धिमान नाई

एक बार एक नाई जंगल से होकर गुजर रहा था। जंगल में जंगली जानवरों का बड़ा भय था। उसे बहुत डर लग रहा था। जब एक हिंसक शेर उसके सामने आकर खड़ा हो गया तब उसका डर सच साबित हो गया लेकिन नाई ने साहस नहीं छोड़ा।

वह हिम्मत बटोरकर शेर के पास गया और बोला, "ओहो! तो तुम यहाँ पर हो। मैं तुम्हें बहुत समय से ढूँढ रहा हूँ।" शेर उसकी बात सुनकर आश्चर्यचकित रह गया।

उसने नाई से पूछा, "लेकिन तुम मुझे क्यों ढूँढ रहे हो?" नाई ने जवाब दिया, "राजा ने मुझे दो शेर पकड़ने को कहा था। एक शेर को तो मैं पहले ही पकड़ चुका हूँ और दूसरे तुम हो।"

यह कहकर नाई ने अपने थैले से दर्पण निकालकर शेर को दिखाया। शेर ने जैसे ही दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखा तो उसे देखकर उसे यही लगा कि इस व्यक्ति ने दर्पण में एक शेर को कैद कर रखा है।

यह देखकर शेर अपनी जान बचाने के लिए वहाँ से भाग खड़ा हुआ। बुद्धिमान नाई अपने रास्ते चल दिया। उसकी बुद्धिमानी, युक्ति और धैर्य के कारण उसकी जान बच गई थी।

एक अच्छा नेता

चुनाव जंगल में चुनाव था, जिसके लिए सभी जानवर एकत्र हुए मतगणना आरम्भ हो गई। सभी चुनाव का परिणाम जानने को उत्सुक थे। मतगणना का कार्य पूरा हुआ। सियार को जंगल का नया राजा घोषित किया गया।

उसकी प्रतिद्वंद्वी लोमड़ी चुनाव हार गई थी। अब लोमड़ी ने उससे बदला लेने की तरकीब सोची। योजना के मुताबिक उसने एक जगह जाल बिछाया और उसमें कुछ माँस भी रख दिया।

फिर वह सियार के पास जाकर बोली, "महाराज, एक पेड़ के नीचे अनछुआ मांस पड़ा हुआ है। आप वहाँ जाएँ और उसे अपना भोजन बनाएँ।" सियार वहाँ गया।

मांस खाना शुरू करते ही वह जाल में फँस गया। तब लोमड़ी ने यह बात सभी जानवरों को बताई और उन्हें बुला लाई। उसने सियार को दिखाते हुए कहा,

"एक अच्छे नेता का अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण होना चाहिए और उसे कभी भी बिना सोच-विचार के दूसरों की बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। परंतु सियार में ये दोनों ही गुण नहीं हैं, इसलिए यह कभी भी एक अच्छा नेता नहीं बन सकता।"

बंदर और दो बिल्लियाँ

एक बार की बात है, एक गांव में दो बिल्लियाँ रहता था। एक दिन एक घर से वह दोनों मिलकर एक केक चुराया था। लेकिन, वह दोनों इसे साझा नहीं करना चाहता था।

दोनो बिल्लियोंने ढाबा किया, कि यह उसकी कमाई है। वह एक दूसरे को हिस्सा देना नहीं चाहता था। इस केक को लेकर दोनों के बीच झगड़ा हुई। जब उन दोनों के बीच झगड़ा चल रहा था,

तब एक बंदर घटनास्थल पर आया, बंदर ने विवाद सुलझाने के लिए खुद को पेश किया। उन्होंने पूरी कहानी सुनकर कहा, जैसे तुम दोनों अच्छी दोस्त हो तो तुम्हें केक को बराबर बांटना चाहिए।

और उन्होंने खुद को उनके लिए केक को दो बराबर भागों में विभाजित करने के लिए पेश की। किसी तरह बिल्लियों ने उसकी सुझाव पर सहमत हुई। फिर बंदर ने केक को लिया और दो भागों में बांट दिया।

उन्होंने प्रत्येक भाग को अलग अलग किया देखा कि एक हिस्सा दूसरे हिस्सा से भारी है। उन्होंने दोनों हिस्सा को बराबर करने के लिए भारी टुकड़े से थोड़ा खा लिया और दोनों हिस्सा को फिर से देखा।

अब बंदर को दूसरा भाग भारी लगने लगा। फिर उन्होंने भारी टुकड़ा से थोड़ा खा लिया और दोनों हिस्सा अपने हाथ पर रखा। लेकिन, दोनों टुकड़े में से कोई भी पूरी तरह से बराबर दिखाई नहीं दिया।

अब केक को इसी तरह से चालाक बंदर ने खा लिया। बिल्लियों ने बंदर से केक वापस मंगा। लेकिन बंदर ने कहा वह केक को वापस नहीं ले सकते है।

क्योंकि, वह उन्हें उनकी सेवा के लिए परिश्रमिक के रूप में दावा करता है। यह कहते हुए बंदर ने बच्चे हुए टुकड़े को अपनी मुंह में लेकर पेड़ के ऊपर चढ़ गया। बिल्लियों ने पेड़ के नीचे से बंदर को देखता ही रह गया।

नैतिक शिक्षा : दूसरों से सहायता मांगने से पहले अपनी समस्याओं का समाधान खुद करना चाहिए।

एक कृतघ्न बाघ

एक बार, एक जंगल में एक बाघ रहता था। एक दिन वह किसी जानवर का शिकार करके खा रहा था। एक हड्डी उसके दांतों में फस गया।

हड्डी दातों में फंसने के कारण बाघ कुछ भी खाने का समर्थन नहीं रहा। उसकी दातों में और गले में बहुत तेज दर्द महसूस हो रहा था। वह दर्द में पूरा दिन रोता रहा।

जंगल की सभी जानवर उससे डरते थे। किसी ने भी उसके पास जाने का हिम्मत नहीं की। एक बहादुर सरस रोते हुए बाघ को देखा उसे बाघ पर दया आई।

सरस उसके पास गया और पूछा, "आपके साथ क्या गलत हो गया दोस्त?" "एक हड्डी मेरी दांतों में फस गई है," बाघ ने कहा। सरस ने कहा, "यदि आप आज्ञा दे तो मैं इसे आपकी दांतो से बाहर निकल सकता हूं।"

बाघ ने कहा, यदि तुम ऐसा करते हो तो मैं तुम्हारा आभारी रहूंगा। सरस ने कहा मुझसे वादा करो के तुम मुझे नहीं खाओगे। बाघ सरस से वादा किया हड्डी निकालने के बाद वह उसे नहीं खाएगा।

सरस बहुत दयालु था परंतु चतुर भी था। जैसे ही वह अपनी मुंह खोला सरस एक छोटा स्टिक उसके मुंह में रख दी। फिर उसने हड्डी को बाहर खींच लिया अपने लंबी चोच की मदद से.

हड्डी निकाल देने से बाघ की मुंह में दर्द बिल्कुल चला गया था। भूखा बाघ अब सरस को पकड़कर खाना चाहता था। लेकिन उसके मुंह में स्टिक होने के कारण वह ऐसा नहीं कर पाया।

सरस दूर उड़ गया यह कहते हुए तुम एक कृतघ्न बाघ हो। मैं तुम्हारा मदद किया और तुम मुझे ही खाना चाहते हो।

नैतिक शिक्षा : कभी-कभी अकल से काम लेने से बड़ी से बड़ी मुश्किल को हराया जा सकता है।

शेर और चूहा

एक बार की बात है। गर्मी के दिन थे। शेर अपने शिकार के लिए गूफ़ा से बाहर निकला हुआ था। वह धूप में जंगल मे घूमते घूमते बहुत परेशान हो गया था।

उसने थक कर फैसला किया कि वह अब थोड़ा आराम करेगा। शेर एक पेड़ के नीचे बैठ गया और आराम करने लगा।

उस पेड़ के नीचे एक चूहा अपने बिल में सो रहा था। तब उसकी नींद खुल गयी। चूहे को शैतानियां करना बहुत अच्छा लगता था। वह उस जगह अकेला रहता था,

तो वह स्वयं को ही वहां का मालिक समझा करता था और बहुत सी उटपटांग हरकते भी करता था। वह बिल से बाहर निकला और अपनी शैतानियां उसने चालू कर दी।

गलती से अब वह फुदकते हुए शेर के पास चले गया। शेर तो सोया हुआ था तो शेर को कुछ फर्क नहीं पड़ा। और चूहे को भी पता नहीं चला कि वहाँ पर शेर उपस्थित है ।

अब चूहा नादानी में शेर के ऊपर चढ़ गया। शेर को गुदगुदी सी हुई तो शेर जग गया। शेर के जगने के बाद चूहे को एहसास हुआ कि जिसके ऊपर वह चढ़ा था वह दरसल एक शेर है।

अब डर के मारे उसकी कपकपी छूटने लगी। चूहे को समझ नहीं आ रहा था कि अब वह करे तो क्या करे।

तभी शेर की नजर उस पर पड़ी शेर बोला, " नन्हें प्राणी क्या तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता जो कि तुम मेरे ऊपर चढ़कर अपनी मनमानी कर रहे हो?

तभी चूहे ने डर के मारे शेर की पूँछ के नीचे ही अपने आपको छिपा लिया। चूहे की इस हरकत पर शेर को बहुत हंसी आई और उसने चूहे से सामने आने के लिए कहा, चूहा शेर के सामने आकर चुपचाप खड़ा हो गया।

शेर ने कहा, " जाओ मैं ने तुम्हें माफ किया। और ऐसे मदहोश रहकर कोई भी काम मत किया करो।"

चूहा बहुत खुश हुआ और बोला, " आपने आज मेरे प्राण बचाकर मुझे जीवनदान दिया है। मैं कभी भी आपके किसी काम आ सकूं तो मुझे बड़ी खुशी होगी।

तब शेर ने सोचा एक छोटा सा जानवर मेरे किस काम का! शेर उसको अनदेखा कर के वहां से चला गया। चूहा भी अपने बिल में चला गया।

कुछ दिन बीत गए। शेर फिर से जंगल मे शिकार के लिए घूम रहा था। जिस क्षेत्र में उस दिन वह गया वहां इंसानों ने एक जाल बिछा रखा था जिसमे कोई जानवर फंसे और वे उसको अपने साथ ले जाकर बेच सकें।

शेर उस ओर आया और जाल में फंस गया। शाम का समय था। शेर बहुत जोर जोर से दहाड़ने लगा। उसकी दहाड़ में कुछ दर्द था। उसकी आवाज पूरे जंगल मे गूंजने लगी ।

चूहा वहां से कुछ ही दूरी पर रहता था। उसने भी शेर की आवाज सुनी। वह फौरन शेर के पास पहुंच गया और शेर से कहा, " आप ऐसे इसमें कैसे फंस गए। रुकिए मैं आपकी सहायता करता हूं।"

तब शेर ने बोला, " तुम क्या करोगे जाओ कोई और मदद लेकर आओ।"चूहा मुस्कुराया और जाल के साथ कुछ करने लगा। शेर को आश्चर्य हो रहा था। असल मे चूहे के पास नुकीले दांत थे,

जिनकी सहायता से वह जाल को कुतर कुछ ही क्षणों में चूहे ने पूरी जाल को जगह जगह से कुतर डाला और शेर को उस जाल से आजाद करा। शेर को अचंभा हुआ कि इतना छोटा जानवर भी कुछ कर सकता है।

शेर ने चूहे को धन्यवाद दिया और चूहे को अपनी पीठ पर बैठा लिया फिर दोनो खुशी खुशी एक साथ वहां से चल दिये।

सीख - " कभी कभी जितना हम सोचते भी नहीं लोग हमारे उतने काम आ जाते हैं। इसलिए किसी को भी कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए।"

अनोखा तरीका

एक बार की बात है, एक जंगल में एक बार एक लोमड़ी और एक बिल्ली आपस मे बातचीत कर रहे थे। फिर बातों ही बातों में कुत्तों का विषय आता।

बिल्ली और लोमड़ी दोनों ही जंगली कुत्तों के आतंक से परेशान थीं। दोनो अपनी अपनी आप बीती एक-दूसरे को सुना रही थी।

लोमड़ी बोली, " बिल्ली बहन मैं तो इन कुत्तों से बहुत परेशान हूँ। जहां देखो वहां पहुंच जाते हैं। इन्होंने तो मेरा जीना ही बेहाल कर के रखा है। मैं कभी भी किसी शिकार को पकड़ाती हूँ

तो पता नहीं इन कुत्तों को कौन खबर दे देता है। पहले से पहले मेरे खाने पर अपना हक जमाने के लिए पहुंच जाते हैं। और तो और मेरे पीछे तो ऐसे पड़ जाते हैं जैसे कि कितने दिनों से भोजन न किया हो।"

बिल्ली बोली, " सही कह रही हो बहिन तुम। मैं भी तो इन कुत्तों से ही परेशान हूँ। एक तो ये इतनी ज्यादी संख्या में जंगल मे घूमते रहते हैं। आखिर जाओ तो जाओ कहाँ !

मैं तो पेड़ पर चढ़ जाती हूँ। यही तरीका मेरी जान बचाता है। अच्छा तुम ये बताओ कि इनसे बचने के लिए तुम करती क्या हो। क्या पता मुझसे बेहतर तरीका हो जो मैं भी अपना सकूं!"

तब लोमड़ी बोली, " मैं तो कई तरीके आजमाती हूँ। उनसे कभी बच गयी तो ठीक, वरना मेरा तो कटा टिकट ऊपर का।"

तब बिल्ली बोली , " बहुत से तरीको को आजमाकर तुम अपनी ही जान को खतरे में डाल देती हो?तुम्हें एक ही तरीका आजमाना चाहिए, जो कि सफल हो सके।"

इतने में ही पीछे से कुत्ते आ पहुंचे। बिल्ली तो अपना हमेशा का तरीका अपनाकर पहुंच गई पेड़ की ऊंचाई पर और अपनी जान बचा ली। लोमड़ी भगती रही, कभी झाड़ियों में छिपी और कभी कहीं।

लेकिन फिर उसका साथ उसके किसी भी तारिके ने नहीं दिया और वह कुत्तों के चंगुल में आ गयी।

सीख - "जिस पर पूर्ण विश्वास हो वही तरीके आजमाने चाहिए। इस प्रकार हम अपने प्राणों की रक्षा स्वंय कर सकते हैं।"

भेड़िया और बांसुरी

एक बार बहुत सी भेड़ और बकरियां जंगल मे चरने के लिए गयी। एक बकरी थी जो अपने बच्चे को पहली बार अपने साथ चराने के लिए जंगल पर ले गयी थी।

वह अपने बच्चे से बहुत प्यार करती थी। और अपने बच्चे को उसने सभी नैतिक मूल्यों से अवगत कराया हुआ था। सही-गलत सभी की जानकारी वह बचपन से ही अपने बच्चे को देती आ रही थी।

उसने बकरियों के ऊपर आने वाले खतरों से भी उसकव अवगत कराया था। मेमना भी बहुत होशियार था। उसने सभी बातें अच्छी तरह से समझ ली थी।

सभी भेड़-बकरियां एक साथ जंगल मे चर रहीं थी। एक भेड़िया था जो कई दिनों से भूखा था। वह अपने लिए शिकार ढूंढते-ढूंढते उस ही जगह पहुंच गया जिस जगह भेड़ बकरियां घाँस चर रही थी।

तभी उसकी नजर उस छोटे से मेमने पर पड़ी। मेमने को देखते ही उसके मुँह में पानी आने लगा। मौका मिलते ही वह उसकी ओर झपट पड़ा।

उसने उस समय उसको नहीं मारा बल्कि वह मेमने को सुरक्षित अपने दांतों में दबकर अपनी गुफा में ले गया। मेमने की मां का रो रोकर बुरा हाल हो गया।

मेमना बिलकुल भी भयभीत नहीं हुआ। बल्कि वह ये सोच रहा था कि इस भेड़िये से बचा कैसे जाए। तब वह उस भेड़िये से कोमल स्वर में बोला, " भेड़िए चाचा। मुझे पता है कि आज मैं मर जाऊँगा।

लेकिन मेरी एक आखरी इच्छा है। आप अपने मुँह से बांसुरी बहुत अच्छी बजाते हो। मुझे वह धुन बहुत पसंद है। क्या आप मेरे लिए भी वही बांसुरी बजा सकते हो?"

भेड़िये को अपनी तारीफ बहुत पसंद थी तो उसने मेमने को हां कर दिया और जोर- जोर से अपनी बेज़ुरी आवाज में गाने लगा। उसकी आवाज पूरे जंगल मे गूंज रही थी।

जो कि मेमने की मां और सभी भेड़ और बकरियों ने भी सुन ली। सभी मिलकर अब आवाज की दिशा में आ गए। कुछ ही देर में वे सब भेड़िये तक पहुंच गए। भेड़िया अपने गाने में ही बेसुध था।

तभी सारी भेड़ और बकरियों ने उस पर एक साथ हल्ला बोल दिया। भेड़िये को उन्होंने मार मारकर अधमरा बना दिया और मेमने को लेकर वहां से चले गए। मेमने को देखकर उसकी मां बहुत खुश हुई।

और छोटा सा मेमना भी अपनी मां को देखकर बहुत खुश हुआ।

सीख - "कद मायने नहीं रखता हौंसले में दम और स्वयं पर आत्मविश्वास होना बहुत ही आवश्यक है।"

मुर्ख भेड़िया

एक बार, जंगल में एक भेड़िया रहता था। उसे दो दिनों से कुछ खाना नहीं मिला था, वह बहुत भूखा था। उसने इधर उधर भजन की तलाश की।

लेकिन, उसे खाने के लिए कुछ भी नहीं मिला। अंत में उसे, एक पेड़ के छेद में रोटी और कुछ मांस का टुकड़ा मिला।

भूखे भेड़िये, संघर्ष करके छेद में घुस गया। फिर उसने सारा खाना खा लिया। यह एक लकड़हारे का दोपहर का भजन था।

जब लकड़हारा, भजन करने के लिए उस पेड़ के पास आया। तो उसने देखा कि, छेद में कोई भजन नहीं था। इसके बजाय, एक भेड़िया वहां बैठा था।

लकड़हारे को देखते ही, भेड़िया छेद में से बाहर निकालने की कोशिश करने लगा। लेकिन, किसी भी तरह वह ऐसा नहीं कर पाया।

क्योंकि, भेड़िया ने भारी भजन किया था। इसीलिए, उसका पेट सूजा हुआ था। फिर, लकड़हारा ने भेड़िया को पकड़ लिया और उसे अच्छी तरह से पीटा।

चार दोस्त

एक बार, एक छोटे से गांव में सत्यानंद, विद्यानंद, धर्मानंद और शिवानंद नाम के चार ब्राम्हण रहते थे। वे एक साथ बड़े हुए थे, इसीलिए चारों अच्छे दोस्त थे।

सत्यानंद, विद्यानंद और धर्मानंद बहुत ज्ञानी थे। लेकिन शिवानंद, अपनी ज्यादातर समय खाने में और सोने में बताता था। हर कोई उन्हें मूर्ख कहता था।

एक बार गाँव में अकाल पड़ा। सभी फसलें नष्ट हो गई, नदी और झील सुख गई। गांव के लोग, अपनी जान बचाने के लिए शहर में चले जाने लगे।

सत्यानंद ने कहा, "हमें भी जल्दी गांव छोड़कर शहर में जाने की जरूरत है।" वे सभी उससे सहमत थे।

लेकिन धर्मानंद ने कहा, "हम शिवानंद का अपने साथ नहीं ले जा सकते। उसके पास कोई कौशल या सीख नहीं है। वह हम पर बोझ होगा।"

विद्यानंद ने कहा, "हम उसे कैसे छोड़ सकते हैं। हम एक साथ बड़े हुए हैं।" (Story of animal in Hindi) फिर वे सभी शिवानंद को, साथ मैं ले जाने के लिए तैयार हो गया।

उन्होंने सभी आवश्यक चीजों को एक साथ पैक करके, शहर जाने के लिए निकल पड़े। रास्ते में, उन्हें एक जंगल पार करना पड़ा। जब वे जंगल से गुजर रहा था,

तो उन्होंने देखा पास में एक जानवर का हड्डियां पड़ा है। वे हड्डियों को करीब से देखने के लिए रुक गए। विद्यानंद ने कहा, "यह एक शेर का हड्डियां है। सभी लोग सहमत थे।

सत्यानंद ने कहा, "यह हमारे शिक्षा का परीक्षण करने का शानदार समय है। मैं हड्डियों को जोर सकता हूं।" इतना कहते हुए, वह हड्डियों को एक साथ लाकर एक शेर का कंकाल बनाया।

विद्यानंद ने कहा, "मैं इस कंकाल पर, मांस और त्वचा लगा सकता हूं।" जल्द ही एक बेजान शेर उनके बगल में लेट गया। धर्मानंद ने कहा, "मैं इस शेर के शरीर पर जीवन दे सकता हूं।"

लेकिन इससे पहले कि वह आगे बढ़े, शिवानंद ने उसे रोक लिया। उसने कहा, "नहीं, आप ऐसा नहीं कर सकते। यदि आप उस शेर में जान डालते हैं, तो यह हम सब को खा जाएगा।"

नाराज धर्मानंद चिल्लाया, "तुम कायर हो। तुम मुझे मेरे शिक्षा का परीक्षण करने से रोक नहीं सकते। तुम यहां हमारे साथ है, क्योंकि हम तुम्हें लेकर आए हैं।"

भयभीत शिवानंद ने कहा, "तो कृपया पहले मुझे उस पेड़ पर चढ़ने दे।" जैसे ही शिवानंद ने, पेड़ की सबसे ऊंची शाखा पर चढ़ा।

तो धर्मानंद ने, शेर की बेजान शरीर पर जान डाल दी। एक गर्जन के साथ उठते हुए शेर, तीनों ब्राम्हण पर हमला किया और उन्हें मार डाला। वह मूर्ख दोस्त अकेला बच गया।

पिंजरे में कैद बाघ

एक छोटी सी गांव के पास एक बहुत बड़ा जंगल था।उस जंगल में रहता था एक शक्तिशाली शेर। शेर रोज गांव मैं बकरी, गायों को पकड़कर अपना खुराक बनाता था।

वह कभी कभी गांव में लोगों के ऊपर भी आक्रमण करता था। एक दिन, गांव वालों ने बाघ को पकड़कर एक पिंजरे में बंद करके रखा। दो दिन से बाघ को पीने के लिए पानी भी नहीं दिया था।

बाघ रास्ते से जाते हुए सभी को निवेदन करता था। उसे पिंजरे से बाहर निकालने के लिए। लेकिन, बाघ को किसी ने भी पिंजरे से से बाहर नहीं निकाला।

एक दिन एक दयालु पादरी उसी रास्ते से जा रहा था। बाघ पादरी से निवेदन किया, उसे पिंजरे में से बाहर निकालने की। पादरी बाघ को पिंजरे से बाहर निकालने के लिए मान गई।

बाघ पादरी से वादा किया उसे ना मरने की। जैसे ही पादरी बाघ को मुक्त किया, बाघ पिंजरे से बाहर आकर पादरी को मारकर आना चाहता था। पादरी अपनी वादा को याद करते हुए बाघ से अपनी जान भीख मांगा।

लेकिन बाघ पादरी की प्रार्थना नहीं सुनना चाहता था. उसने कहा, "मैं कुछ दिन से भूखा हूं और आप मेरे शिकार हो, मैं कैसे आपको खाए बिना छोड़ दूं।" फिर वहां एक लोमड़ी आया।

लोमड़ी ने बाघ और पादरी की सारी बात सुनकर कहां, "मुझे विश्वास नहीं हो रहा है, इतना बड़ा बाघ इस छोटी सी पिंजरे में कैसे रह सकता है।" बाघ कहा, "मुझे देखो मैं कैसे पिंजरे में बंद था।"

यह कहकर बाघ लोमड़ी को दिखाने के लिए, पिंजरे में घुसा और तुरंत चालाक लोमड़ी बाहर से पिंजरे का दरवाजा बंद कर दिया। पादरी लोमड़ी को अपनी जान बचाने के लिए धन्यवाद दिया और दोनों वहां से चला गया।

नैतिक शिक्षा : हमें अपनी किए हुए वादा को कभी नहीं भूलना चाहिए।

लोमड़ी और बकरा

एक बार, एक जंगल में एक बाघ लोमड़ी का पीछा किया था। लोमड़ी अपनी जान बचाने के लिए उतनी ही जोर से भागा। लेकिन, अचानक वह एक कुएं में गिर गया, जो झाड़ियों से ढका हुआ था।

जिसने उसकी दृष्टि को बाधित किया। वह कुएं से बाहर नहीं आ सका, लोमड़ी दुखी होकर मौत का इंतजार कर रहा था। फिर लोमड़ी ने एक बकरी को कुएं की पास से जाते हुए सुना।

वह बकरी को बुलाने के लिए कुएं की अंदर से जोर से चिल्लाया। बकरा कुएं के पास आया और लोमड़ी से पूछा, "दोस्त तुम वहां कुएं में क्या कर रही हो?"

लोमड़ी ने कहा, "दोस्त क्या आपने नहीं सुना है देश में जल्दी ही सूखा आने वाला है। कहीं पर भी पानी नहीं होगा। इसीलिए, मैं इस पानी का आनंद लेने के लिए यहां आया हूं।

पानी बहुत ही मीठा और स्वादिष्ट है। तुम क्यों नहीं आ रहे हो दोस्त? बस तुम भी कुएं में कूद जाओ दोनों मिलकर पानी का आनंद लेते हैं।" मूर्ख बकरी ने लोमड़ी पर विश्वास किया।

उसके साथ जुड़ने के लिए तैयार हो गया। जैसे ही उसने छलांग लगाई चतुर लोमड़ी अपना एक पैर उसकी पीठ पर रखकर कुएं से बाहर निकली। अब मूर्ख बकरा कुएं के अंदर थी।

उसने रोते हुए कहा, "दोस्त तुम मुझे यहां अकेला छोड़कर क्यों जा रहे हो?" लोमड़ी ने कहा, "मित्र, आपको कुएं में छलांग लगाने से पहले यह सोचना चाहिए था,

कि आपके लिए इससे बाहर आना संभव है, आपने ऐसा नहीं किया। इसीलिए, आप कुएं में फस गए हो।" फिर लोमड़ी ने वह जगह छोड़ दी और बकरी कुएं में रहकर अपनी मौत का इंतजार कर रहा था।

नैतिक शिक्षा : कोई भी काम करने से पहले हमें सोच लेना चाहिए नहीं तो हम बुरे फंस सकते हैं।

ढोल की पोल

एक बार गोमायु नामक एक गीदड़ भूख और प्यास से व्याकुल होकर भोजन की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। घूमते-घामते वह एक ऐसी जगह जा पहुंचा जहां कुछ वर्ष पूर्व दो राज्यों की सेनाओं के बीच युद्ध हुआ था।

वहां सैनिकों द्वारा छोड़े हुए टूटे अस्त्र-शस्त्र पड़े थे। उन्हीं में एक ढोल भी था जो एक वृक्ष के नीचे रखा हुआ था। हवा से हिलती वृक्ष की शाखाएं जब उस ढोल से टकराती तो बड़ा भयंकर स्वर निकलता था।

गीदड़ ने जब वह भयंकर स्वर सुना तो वह डर गया। किंतु दूसरे ही क्षण उसे याद आया कि भय या आनंद के उद्वेग में हमें सहसा कोई काम नहीं करना चाहिए। यही सोचकर वह धीरे-धीरे उपर चल पड़ा, जिघर से आवाज आ रही थी।

आवाज के बहुत निकट पहुंचा तो उसकी निगाह ढोल पर पड़ी। सतर्कतापूर्वक उसने ढोल को उलटा-पलटा, और प्रसन्न हो गया कि आज तो कई दिन के लिए पर्याप्त भोजन मिल गया।

यही सोचकर उसने दर के ऊपर लगे चमड़े पर अपने दांत गड़ा दिए। चमड़ा बहुत कठोर या, गीदड़ के दो दांत भी टूट गए बड़ी कठिनाई से टोल में छेद हुआ।

उस छेद को चौड़ा करके गोमायु जब अंदर पहुंचा तो यह देखकर उसे बहुत निराशा हुई कि वह तो अंदर से बिल्कुल खाली है। उसमें रक्त, मांस-मज्जा ये ही नहीं।

यह कया सुनाकर दमनक ने पिंगलक से कहा-‘इसलिए मैं कहता हूं राजन, कि किसी के स्वर मात्र से ही भयभीत नहीं होना चाहिए।’ ‘परंतु मैं क्या करूं, मेरा सारा अनुयायीवर्ग भयभीत होकर यहां से भागना चाह रहा है।

मैं एकाकी यहां कैसे रह सकता हूं ?’ ‘इसमें आपके अनुयायियों का दोष नहीं है जब आप स्वयं स्वामी होकर डर गए हैं तो उनका डर तो स्वाभाविक ही है।

फिर भी कोई बात नहीं, मैं उस स्वर के विषय में पता लगाकर आता हूं।’ "ठीक है, जाओ। प्रभु तुम्हारी रक्षा करे।’ दमनक जब चला गया तो पिंगलक सोचने लगा कि उसने यह बुरा किया जो एक गीदड़ पर विश्वास करके उसे अपने मन की बात बता दी।

यदि दमनक ने मंत्री पद से हटाए जाने का बदला लेना चाहा, तो फिर क्या होगा? क्योंकि जो सेवक एक बार सम्मानित किए जाने के बाद फिर अपमानित किया जाता है, वह राजा के विनाश का ही प्रयल करता है।

अतः उचित यही है कि किसी अन्य स्थान पर छिपकर बैठा जाए और दमनक की गतिविधि पर नजर रखी जाए। यह सोचकर सिंह वहां से दूसरे स्थान पर बैठकर दमनक के लौटने की प्रतीक्षा करने लगा।

दमनक संजीवक के निकट पहुंचा, और जब देख लिया कि यह तो बैल है तो मन में प्रसन्न होता हुआ सोचने लगा-‘ईश्वर की कृपा से यह तो और अच्छा हुआ।

अब मैं इस बैल के साथ सिंह की मित्रता कराकर पुनः शत्रुता कराऊंगा और संधि विग्रह की इस नीति से पिंगलक को अपने वश में कर लूंगा।’ इस प्रकार सोचता हुआ वह पिंगलक की ओर चल पड़ा।

पिंगलक ने जब उसे अपनी ओर आते हुए देखा तो अपने मनोभावों को छिपाते हुए, पहले की तरह अपने सेवक व्याघ्र, भालू, भेड़िया आदि के बीच आकर अपने स्थान पर बैठ गया।

दमनक भी पिंगलक का अभिवादन कर उसके निकट आ बैठा। पिंगलक ने पूछा- क्या तुमने उस जीव को देखा ?’ हां महाराज। आपकी कृपा से देख लिया है।’

पिंगलक ने पुनः पूछ-क्या सचमुच उसे देख आए हो? दमनक ने कहा-‘क्या महाराज के समय कहा जा सकता है? कर गया है कि जो व्यक्ति राजाओं और देवताओं के समझ झूठ बोलता है, वह चाहे जितना भी महान क्यों न हो, तत्काल विन्ट हो जाता है।’

दमनक की बात सुनकर पिंगलक ने कहा-ठीक है, हमें विश्वास हो गया है कि तुम उसे देख आए हो। उसने तुम्हें इसलिए नहीं मारा होगा, क्योंकि समर्थजन, दुर्बलों पर क्रोध नहीं करते।

शक्तिमान व्यक्ति तो अपने समान शक्तिसम्पन्न व्यक्ति पर ही अपना क्रोध प्रकट करता है।’ दमनक ने कहा ठीक है राजन | वह शक्तिमान है और मैं दीन हूं। जो भी आप समझें।

फिर भी यदि आपकी इच्छा हो और आप आज्ञा दें तो मैं उसे आपकी सेवा में एक मृत्य (नौकर) के रूप में उपस्थित कर सकता हूं।’ कुछ संशय के साथ एक दीर्घ श्वास खींचते हुए पिंगलक ने पूछा-‘क्या तुम ऐसा कर सकते हो?’ अवश्य कर सकता हूं महाराज।

बुद्धि के बल पर प्रत्येक कार्य किया जा सकता है।’ तब पिंगलक ने कुछ नम्र स्वर में कहा-‘यदि तुम इस कार्य को कर सकते हो तो आज से मैं तुम्हें पुनः मंत्री पद सौंपता हूं।

आज से इस प्रकार के सारे कार्य तुम्हीं किया करोगे।’ पिंगलक से आश्वासन पाने के बाद दमनक संजीवक के पास पहुंचा और अकड़ता हुआ बोला-‘अरे, दुष्ट बैल! तू यहां नदी के किनारे व्यर्थ ही हुंकार क्यों भरता रहता है? चल, तुझे मेरा स्वामी पिंगलक बुला रहा है।’

यह पिंगलक कौन है भाई ?’ संजीवक ने पूछा। दमनक ने सगर्व कहा-‘अरे, तू पिंगलक को नहीं जानता। पिंगलक इस वन का राजा है। चलकर देखेगा तो तुझे उसकी शक्ति का पता चल जाएगा।

वह जंगल के जानवरों के मध्य घिरा वहां एक वृक्ष के नीचे बैठा है।’ यह सुनकर संजीवक के प्राण सूख गए। दमनक के सामने गिड़गिड़ाता हुआ वह बोला-‘मित्र ! तू सज्जन प्रतीत होता है।

यदि तू मुझे वहां ले जाना चाहता है तो पहले स्वामी से मेरे लिए अभय-वचन ले ले।’ दमनक बोला-‘ठीक है, तू अभी यहीं बैठ। मैं अभय-वचन लेकर अभी आता हूं।" तब, दमनक पिंगलक के पास जाकर बोला-‘स्वामी ।

वह कोई साधारण जीव नहीं है, वह तो भगवान शिव का वाहक बैल है। मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसे स्वयं भगवान शिव ने प्रसन्न होकर यहां यमुना तट पर भेजा है, हरी हरी घास चरने को।

वह तो कहता है कि भगवान ने उसे यह सारा वन खेलने और करने के लिए सौंप दिया है। पिंगलक ने दीर्घ श्वास खींचते हुए कहा-‘सच कहते हो दमनक। भगवान के आशीर्वाद के बिना कौन बैल है,

जो यहां इस वन में इतनी निर्भयता से घूम सके ! फिर, तुमने क्या उत्तर दिया ? ‘मैने उससे कहा कि इस वन में तो चंडिका वाहन रूपी शेर पिंगलक पहले से ही रहता है तुम भी उसके अतिथि बनकर रहो, उसके साय आनंद से विचरण करो, वह तुम्हारा स्वागत करेगा।’

फिर उसने क्या कहा?" "उसने यह बात मान ली स्वामी। वह बोला कि पहले अपने स्वामी के पास जाकर अभय-वचन ले आओ, तभी मैं वहां जाऊंगा।

अब आप जैसा आदेश दें, वैसा ही करूं।’ दमनक की बात सुनकर पिंगलक बहुत प्रसन्न हुआ और बोला-‘बहुत अच्छा कहा दमनक, तुमने बहुत अच्छा कहा।

मेरे मन की बात कह दी। अब उसे अभय वचन देकर शीघ्र मेरे पास ले आओ। संजीवक के पास जाते-जाते दमनक सोचने लगा स्वामी आज मुझ पर बहुत प्रसन्न है, बातों-ही-बातों में मैंने उन्हें प्रसन्न कर लिया है। आज मुझसे अधिक भाग्यवान कोई नहीं।’

दमनक ने संजीवक के पास पहुंचकर कहा-‘मित्र ! मेरे स्वामी ने तुम्हें अभय वचन दे दिया है। मेरे साथ चलो। किंतु याद रखना, उनके सामने अभिमान-भरी कोई बात न करना और न ही यह भूलना कि उनसे तुम्हें मैने ही मिलवाया है।

मेरे इस उपकार को याद रखते हुए मुझसे मित्रता निभाना। मैं भी तुम्हारे संकेतों पर राज चलाएंगे। हम दोनों मिलकर खूब आनंद की जिंदगी व्यतीत करेंगे।’

‘मैं ऐसा ही करूंगा मित्र।’ संजीवक ने सहमति जताई। इसी में तुम्हारा कल्याण भी है मित्र, दमनक ने कहा-‘क्योंकि जो व्यक्ति अधिकार के मद में पड़कर उत्तम,

मध्यम और अधम वर्ग के कर्मचारियों का ययोचित सम्मान नहीं करता, वह राजा का प्रिय होते हुए भी दन्तिल नाम के सेठ की भांति पतन के गर्त में गिर जाता है।’

भेड़िया और मेमना

एक बार एक जंगल में एक शरारती मेमना रहती थी, उसकी मां अपने बच्चों से इतना प्यार करती थी, कि वह हमेशा बच्चे की सुरक्षा को लेकर चिंतित रहती थी। उसकी मां हमेशा उन्हें चेतावनी देती थी, बच्चों आपको जंगल में नहीं जाना चाहिए।

जंगली जानवर वहां रहते हैं, वह तुम्हें मारकर खा सकता है लेकिन शरारती मेमना ने अपनी मां की बात कभी नहीं सुना। एक दिन, वह हमेशा की तरह जंगल में घूमने गई थी। वहां उसने एक झरना दिखा, उसे बहुत ज्यादा प्यास लगी थी इसलिए वह पानी पीने के लिए वहां गया।

जब मेमना झरना की पानी पी रहा था, तब एक भेड़िया एक पेड़ की पीछे से उसे देख रहा था। वह दोनों के अलावा वहां और कोई नहीं था, आप जानते नहीं हो यह जंगल सिर्फ मेरे जैसा जंगली जानवर के लिए है। तुम यहां की पानी नहीं खा सकते हो। भेड़िया ने कहा.

मेमना को पता था की भेड़िया खतरनाक जानवर है, उसकी मां ने भेड़िया की बारे में चेतावनी दी थी। उसे पता था भेड़िया उसे खाने वाला है , फिर वह भेड़िया को कहा तुम भी पानी को गंदा कर रहे हो। अब मैं इस दूषित पानी को कैसे पियूंगा?

इस तरह मेमना कुछ और मिंटू तक भेड़िया से बात करता रहा। फिर वहां से एक लकड़हारा जा रहा था, लकड़हारा मेमना को बचाने के लिए वहां आया। उसने मेमना और भेड़िया दोनों को देखा, लकड़हारा उसे बचाने के लिए भेड़िया को पकड़कर पीटा।

मेमना अब सुरक्षित थी, वह वापस अपनी मां के पास गया। उसने अपनी मां को बताया कि जंगल में भेड़िया और लकड़हारा के साथ क्या हुआ था। और फिर उन्होंने अपनी मां से वादा किया वह फिर कभी जंगल में अकेला नहीं जाएगा।

नैतिक शिक्षा : ताकत ही सब कुछ नहीं होता, कभी कभी कमजोर लोग होशियारी से ताकतवर लोगों पर काबू पा सकते हैं।

वफादार कुत्ता

एक बार एक गांव में एक महिला रहती थी, जिसके पास एक वफादार कुत्ता था। यह कुत्ता इतना वफादार था कि महिला अपने बच्चे को इसके पास छोड़कर अन्य काम के लिए जा सकती थी।

एक दिन कुछ दुखद हुआ, महिला हमेशा की तरह इस वफादार कुत्ते के पास बच्चों को छोड़कर कुछ सामान खरीदने के लिए निकल गई। जब वह वापस लौटी,तो उसने एक बुरा दृश्य देख लिया, कुछ गड़बड़ थी।

बच्चे की बिस्तर उखड़ गई, उसकी कपड़े फटा हुआ था और पूरे बिस्तर खून से भरे हुए थे। जहां उसने बच्चे और कुत्ता को छोड़ कर गई थी। चौककर, महिला ने बच्चे की तलाश शुरू कर दी।

वर्तमान में, वफादार कुत्ते को बिस्तर के नीचे से निकालने देखा। कुत्ता उसके मुंह को चाट रहा था, जैसे कि उसने अभी स्वादिष्ट भोजन किया हो। महिला डर गई, और यह मान लिया कि कुत्ते ने उसके बच्चे को खा लिया है।

महिला ने बिना ज्यादा सोचे समझे कुत्ते को मौत के घाट उतार दिया। लेकिन जब उसने अपने बच्चे की खोज जारी रखी, तो उसने एक और दृश्य को देखा।

बिस्तर के करीब उनका बच्चा था, जो नंगे तल पर पड़ा हुआ था, सुरक्षित था। और बिस्तर के नीचे एक सांप का कुछ टुकड़ा पड़ा हुआ था, सांप और उन कुत्ते के बीच युद्ध हुआ होगा,जो अब मर चुका था।

फिर हकीकत ने महिला को मारा, जो अब समझने लगी थी कि उनकी अनुपस्थिति में क्या हुआ। कुत्ते ने बच्चे को सांप से बचाने के लिए लड़ाई लड़ी, अब उसे ठीक करने में बहुत देर हो गई।

क्योंकि गुस्से में उसने वफादार कुत्ते को मार डाला था।

नैतिक शिक्षा : थोड़ा सा धैर्य गलती से गलतियों को बचा सकता है।

खरगोश और शेर

एक बार की बात है, एक जंगल में एक शेर रहता था, वह जानवरों का राजा था। उसने कई जानवरों को मार डाला, सभी जानवर भयभीत थे।

एक दिन शेर एक बैठक की, सभी जानवर शेर के साथ बैठक में शामिल थी। एक बूढ़ा खरगोश खड़ा हो गया, वह बुद्धिमान था, वह एक योजना के बारे में बताया।

जानवरों ने रोज एक एक करके जानवर भेजेंगे शेर के पास, भोजन करने के लिए। शेर को और शिकार करने का जरूरत ही नहीं होगा, शेर योजना मान गया।

एक दिन खरगोश की बारी थी, वह देर से शेर के पास पहुंचा। शेर गुस्से में था, उन्होंने खरगोश से पूछा कि उन्हें देर क्यों हुई? खरगोश ने कहा कि एक अन्य शेर ने उसे रास्ते में पकड़ लिया था।

फिर शेर ने उसे दूसरे शेर को दिखाने के लिए कहा, खरगोश ने उसे एक गहरे कुएं के पास लेकर गया। शेर कुएं में झांक कर देखा और पानी में अपनी ही छाया देखी।

शेर ने उसे दूसरे और एक शेर समझकर उसे मारने के लिए कुएं में कूद गया। कुए से बाहर आने का कोई रास्ता नहीं था धीरे धीरे शेर कुएं में मर गया, सभी जानवरों ने उसके बाद खुशी से रहते थे।

नैतिक शिक्षा : बुद्धि ताकत से अधिक मजबूत है।

बड़बोला शिकारी

एक शिकारी था। उसे शेखी बघारने की आदत थी। वह प्रायः सभी को अपनी बहादुरी के झूठे किस्से सुनाते हुए कहता कि किस तरह एक शेर उससे डरकर भाग गया था।

उसका कहना था कि जंगली जानवर उसके आस-पास भी नहीं फटकते बल्कि उसे देखकर भाग जाते हैं। एक दिन वह शिकारी एक जंगल से गुजर रहा था। वहाँ पर एक लकड़हारा लकड़ी काटने में व्यस्त था।

वह शेखी बघारने वाला शिकारी उसके पास गया और बोला, "दोस्त! तुमने यदि किसी शेर के पैरों के चिन्ह देखे हों तो मुझे बताओ। मुझे शिकार किए हुए कई महीने हो गए।"

लकड़हारा उस शिकारी की शेखी बघारने की आदत से भली-भाँति परिचित था। इसलिए वह बोला, "हाँ, यहाँ पास की ही एक गुफा में शेर है। क्या मैं तुम्हें वहाँ लेकर जाऊँ?"

उसकी बात सुनकर शिकारी डर गया और बोला, "नहीं, नहीं, मैं तो सिर्फ उसके पैरों के निशान देखना चाहता था।" यह कहकर वह वहाँ से भाग खड़ा हुआ। इसीलिए कहा गया है कि कभी-कभी बड़बोलापन भारी भी पड़ जाता है।

आलसी रिक्कू

रिक्कू एक आलसी खरगोश था। वह मेहनत नहीं करना चाहता था। वह धीरे-धीरे कुलाँचे भरते हुए चलता। अपने आलस और ढीलेपन के कारण वह हर जगह देर से पहुँचता।

रोज सुबह उसके माता-पिता उसे जगाते हुए कहते, "बेटा, जल्दी बिस्तर छोड़ो। आलस करना एक बुरी आदत है। इस वजह से तुम्हें हानि उठानी पड़ सकती है।" लेकिन रिक्कू उनकी सलाह पर कभी ध्यान नहीं देता था।

एक दिन रिक्कू एक छायादार वृक्ष के नीचे लेटा हुआ था। पास में ही कुछ खरगोश खेल रहे थे। पिंकी नाम का खरगोश दौड़ता हुआ उसके पास आया और बोला, "दोस्तो, यहाँ से भागो।

एक लोमड़ी इधर ही आ रही है। वह हम सबको खा जाएगी।" यह सुनकर सभी खरगोश वहाँ से भाग गए। लेकिन रिक्कू अपने आलस के कारण नहीं उठा। उसने सोचा, ‘अभी तो लोमड़ी यहाँ से बहुत दूर है।

मैं थोड़ी देर और सुस्ता लूँ। लोमड़ी के आने से पहले ही मैं भाग जाऊंगा।’ जल्दी ही लोमड़ी वहाँ पहुँच गई और रिक्कू भाग नहीं पाया। लोमड़ी ने उस पर झपट्टा मारकर उसे मार दिया। इस प्रकार अपने आलस के कारण रिक्कू को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

अपनी-अपनी विशेषता

एक बार जंगल के राजा शेर ने जानवरों को विभिन्न पदों पर नियुक्त किया। चीते को उसके तेज दौड़ने की क्षमता के कारण सेनानायक का पद दिया गया। बुद्धिमान हाथी को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया।

इस तरह से सभी जानवरों को उनके अनुकूल कोई न कोई पद अवश्य दिया गया। बस, खरगोश, कछुए और गधे को ही कोई पद नहीं दिया गया। यह देखकर घोड़ा बोला, "खरगोश तो आसानी से डर जाता है।"

जिराफ बोला, "कछुआ तो एक कदम चलने में ही घंटों लगा देता है।" ऊँट बोला,"गधा तो बेवकूफ होता है।" सभी एक स्वर में बोले, "ये तीनों किसी कार्य के लायक नहीं हैं, इसलिए इन्हें कोई पद नहीं मिला।"

इस पर शेर बोला, "नहीं ऐसा नहीं है। प्रत्येक की अपनी एक अलग विशेषता होती है। खरगोश तेज दौड़ने की क्षमता के कारण हमारा संदेशवाहक होगा। कछुआ आसानी से छुप जाने में सक्षम होने के कारण हमारा जासूस होगा।

गधा विपरीत परिस्थिति में अपनी ऊँची आवाज से आगाह करने का कार्य करेगा।" इस प्रकार सभी जानवरों को यह सबक मिला कि प्रत्येक की अपनी एक अलग विशेषता होती है। इसलिए किसी की खिल्ली नहीं उड़ानी चाहिए।

खरगोश की बारी

एक बार एक जंगल मे एक शेर का आतंक बहुत बढ़ गया। वह जंगल के बहुत से जानवरों का शिकार एक ही दिन में कर डालता था। सभी उसके अत्याचार से बहुत परेशान थे।

2-3 रोज के कर कर के बहुत से जानवर शेर ने मार डाले। अब जंगल मे जानवरों की संख्या भी कम होने लगी। सभी जानवरों को इसकी चिंता हुई।

सभी जानवर एक दिन मिले और इस विषय पर बात करने लगे। सभी का एक ही मुद्दा था कि, यदि इसी प्रकार शेर जंगल के जानवरों को मारता रहेगा तो जल्द ही जंगल से जानवर लुप्त हो जाएंगे।

भालू थोड़ा समझदार था उसने कहा, " हमे इस बारे में शेर से बात करनी चाहिए। मुझे उम्मीद है कि वह हमारी बात जरूर सुनेगा।" भालू सयाना था और बुध्दिमान भी।

सभी ने उसकी बात मानी तब सभी जानवर एक साथ चल दिये शेर की गुफा की ओर।

सभी ने एक साथ शेर की गुफा में प्रवेश किया और अपनी बात शेर के सामने रखी। शेर ने धैर्यपूर्वक सभी की बात सुनी और बोला, " मुझे कोई दिक्कत नहीम है।

मैं तो जंगल मे शिकार ही नहीं करूंगा यदि तुम सभी मेरे खाने का इंतजाम रोज का रोज कर दो तो।"

सभी जानवर अब सोचने लगे। तब भालू बोला, " हमे आपकी राय मंजूर है लेकिन आपको हमसे वादा करना होगा कि आप किसी भी जानवर को नहीं मरेंगे।" शेर मान गया।

अब रोज एक -एक करके किसी न किसी जानवर की बारी लगाई जाती औऱ उसे विवश होकर स्वंय ही शेर के भोजन के लिए गुफा में जाना पड़ता।

यही सिलसिला चलता गया। अब बारी आई खरगोश की। वह बहुत ही चालाक था। खरगोश ने अपने बचने की योजना पहले से ही बना रखी थी। वह आराम से खेलते कूदते हुए शेर की गुफा में गया।

उसने शेर को प्रणाम किया। शेर तो खाना न आने की वजह से गुस्से से लाल हुआ पड़ा था। उसने गुस्से से दहाड़ते हुए बोला, " समय देखा है अब आ रहे हो तुम ऊपर से आज भूख ज्यादी लगी है,

तो जानवरों ने इतने पिद्दी से खरगोश को भेजा है। लगता है वे अपनी बाते भूल रहे हैं। उनको भी अब सबक सिखाना होगा।"

तब खरगोश कोमल स्वर में बोला, " नहीं महाराज ऐसी कोई बात नहीं है। आपको पता है जंगल में एक दूसरा शेर आ गया है। "

"दूसरा शेर?" शेर ने चकित होकर बोला।

फिर खरगोश बोला, " महाराज ! हाँ दूसरा शेर! जानवरों ने आपके लिए मुझ जैसे ही 4 खरगोश और भेजे थे। हम कुल 5 थे। लेकिन हमारा सामना रास्ते में उस दुसरे शेर से हो गया।

उसने हमारी एक न सुनी और चारों ख़रगोशों को कहा गया। जब मैं ने उससे कहा कि हम तो आपका भोजन हैं तब वह हंसने लगा और बोला, इस जंगल का एक ही राजा है और वो हूँ मै।

जाओ बोल दो अपने राजा से। महाराज! मैं तो जैसे तैसे अपनी जान बचाकर भागा हूँ वहां से। आपको उसकी खबर देने के लिए।"

यह सब सुनकर शेर का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। शेर बोला,तुम झट से मुझे उसके पास ले चलो आज फैसला हो ही जएगा,

कि जंगल का असली शेर है कौन!

खरगोश खुश हुआ। यह सब खरगोश की ही युक्ति थी उसने अपनी युक्ति में शेर को फंसा लिया था। अब वह शेर को ले कर चल दिया।

खरगोश शेर को एक कुँए के पास लेकर चला गया। खरगोश बोला , " महाराज! यहीं रहता है वह इस कुँए के अंदर।"

शेर ने कुँए के अंदर देखा तो उसे अपनी ही परछाई दिखाई दी। जब वह दहाड़ा तो परछाई ने भी वैसा ही किया। उसे लगा कि पानी का शेर दहाड़ रहा है।

अब शेर दुसरे शेर को मारने के उद्देश्य से पानी में कूद गया। वहीं कुँए में डूबकर ही उसकी मृत्यु हो गई।

वापस लौटकर खरगोश ने यह घटना पूरे जंगल वासियों को सुना दी। सभी बहुत खुश हुए और खरगोश को शाबाशी भी दी। खरगोश ने पूरे जंगल को शेर के आतंक से मुक्त कर दिया।

सीख - "कठिन स्थितियों में बुध्दि का प्रयोग करना चाहिए।"

शेर का हिस्सा

बहुत समय पहले, जंगल मे एक दिन शेर की सहसम्मति से भेड़िया, लोमड़ी और शेर जंगल मे शिकार ढूंढने के लिए निकले। शेर की अगुवाई में ही भेड़िया और लोमड़ी कार्य कर रहे थे।

भेड़िया और लोमड़ी दोनो ही कई दिनों के भूखे थे, जब वे दोनों एकसाथ शेर के पास मदद मांगने के लिए गए तो शेर को पहके तो गुस्सा आया।

लेकिन लोमड़ी चालाक थी तो उसने शेर को बहला फुसला कर उसे उनकी मदद करने के लिए राजी कर लिया। तब सभी लोग एक साथ जंगल मे निकल पड़े।

जानवरों की कहानियाँ हिंदी में- सभी दबेपाँव आगे को बढ़ रहे थे। शेर जैसा जैसा बोल रहा था भेड़िया और लोमड़ी वैसा ही कर रहे थे । उन्हें अधिक इंतजार नहीं करना पड़ा। शीघ्र ही उन्हें एक मोटा तगड़ा भैंसा मिल गया।

भेड़िये और लोमड़ी को उसे मारने की हिम्मत नहीं हुई क्योंकि वह भैंस बहुत शक्तिशाली दिख रहा था। तो शेर ने फैसला किया कि इसका शिकार तो अब मुझे ही करना पड़ेगा।

शेर ने झाड़ी के पीछे से जोर से छलांग लगाई और वह शेर , भैंसे के ऊपर टूट पड़ा। कुछ ही क्षणों मे शेर ने भैंसे को मार डाला।

अब भेड़िया और लोमड़ी भी आगे शिकार की जगह आ गए। लोमड़ी के मुंह मे तो पानी आ रहा था। उसने फटाफट शिकार के तीन हिस्से कर दिए। शेर को गुस्सा आ गया। शेर ज़ोर से दहाड़ कर बोला,

" दूर हट जाओ सब मेरे शिकार से!" दोनो की हालत अब खराब हो गयी। लोमड़ी ने घबराकर धीमी आवाज मे कहा, " क्या हुआ मालिक हमसे कोई गलती हो गयी?"

तब शेर बोला, "यह शिकार मेरा है। इसे छूने की हिम्मत भी न करना। मैं ने स्वयं ही इस शिकार को पाया है।

अब यह मेरा ही हुआ। और जो तुमने इसके तीन हिस्से किए हैं वो भी मेरे ही है।

पहला तो जो मैं ने शिकार किया उसका हिस्सा। और दूसरा, मेरे बच्चों का । अब रही तीसरे हिस्से की बात तो तुम दोनों साथ मे आओ मुझे कोई दिक्कत नहीं है,

मुझसे मुकाबला करो और ले जाओ इस हिस्से को।"

लोमड़ी और भेड़िया तो पहले से ही डरे हुए थे। उन्होंने शेर को पलटकर कोई जवाब नहीं दिया और चुपचाप निराश होकर वहां से चले गए। बेचारे मदद लेकर आये थे,

और मंजिल के इतने करीब से भी वे भूखे और खाली हाथ ही लौट गए।

सीख - जो बुद्धिमान और ताकतवर होता है, वही अपनी बात दूसरों से मनवा सकता है। कहा भी गया है जिसकी लाठी उसकी भैंस।

बंदर और टोपीवाला

एक बार की बात है, एक गांव में एक मेहनती टोपी वाला रहता था। जो टोपी का व्यापार करता था। एक दिन दोपहर को वह गांव में अपनी टोपी बेचने जा रहा था।

वह एक जंगल से गुजर रहा था, वह अपनी सर पर टोपी की ढोकरी लिया हुआ था। दोपहर को बहुत ज्यादा धूप होने के कारण वह थक गया। वह विश्राम करने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गया।

उसने अपनी टोपी से भरी ढोकरी जमीन पर रख दी और वहां पेट के नीचे लेट कर आराम करने लगा। थोड़ी ही देर में व्यापारी को नींद आ गया। उस पेड़ पर कुछ शरारती बंदर बैठे थे।

व्यापारी को सोया हुआ देखकर उन्होंने सारी टोपिया चुरा कर पेड़ में चढ़ गई। टोपियां चुराकर बंदरों ने सोच में पड़ गई। तभी उन्होंने देखा व्यापारी ने टोपी अपने सर पर पहनी हुई थी।

व्यापारी को नकल करते हुए उन्होंने भी टोपी पहन ली। जब व्यापारी की नींद खुली तब उन्होंने देखा ढोकरी में से साड़ी टोपिया गायब है। फिर वह टोपी ढूंढ रहा था।

तब अचानक उसने पेड़ में बंदरों टोपी पहनते हुए देखा, व्यापारी को बहुत गुस्सा आया। उसने पत्थर उठाकर बंदरों को मारना शुरू कर दिया। उसकी नकल करते हुए बंदरों ने भी पेड़ से फल तोड़कर उसे मारने लगा।

व्यापारी अभी समझ गया था कि बंदरों ने उसकी नकल कर रहा है। फिर उसके मन में एक विचार आई। उसने तुरंत अपने सर से टोपी निकाली और जमीन पर फेंक दी।

फिर बंदरों ने भी उसकी नकल करते हुए अपनी टोपी निकल कर जमीन में फेंक दी। व्यापारी ने साड़ी टोपिया इकट्ठे करके टोकरी में डाल दी और हंसते हंसते वह अपने गांव की ओर चला गया।

नैतिक शिक्षा : बुद्धि काम करती है जहां ताकत विफल होती है।

पालतू कुत्ता और बाघ

कुछ साल पहले की बात है, एक बार शाम को एक पालतू कुत्ता गांव के पास जंगल किनारे रास्ते में टहल रहा था। तभी उनके साथ एक बाघ का मुलाकात हुआ।

दो दिन से खाना ना खाने की वजह से बाघ बहुत कमजोर था। उसे चलने में तकलीफ हो रहा था। पालतू कुत्ता की तंदुरुस्त शरीर को देखकर बाघ उससे पूछा,

"तुम तो बहुत तंदुरुस्त हो। तुम्हें खाना कहां से मिलता है? तुमको देख कर ऐसा लगता है तुम्हें खाना ढूंढने के लिए कष्ट नहीं होता, मुझे देखो मैं दो दिन से कुछ भी नहीं खाया बूढ़ा हो गया हूं।

पहले की तरह रोज रोज शिकार नहीं कर सकता, इसीलिए रोज खाना भी नहीं मिलता।" बाघ की हालत देखकर कुत्ता की मन में दया आया।

उसने कहा, "हां, मुझे खाना नहीं ढूंढना पड़ता है। मेरे मालिक मुझे रोज दो वक्त का खाना देता है और वह भी बहुत स्वादिष्ट। मैं जो काम करता हूं,

अगर तुम भी मेरे साथ काम करोगी तो तुम्हें भी रोज दो वक्त का स्वादिष्ट खाना मिलेगा। फिर तुमको रोज रोज शिकार नहीं करना पड़ेगा। बाघ कुत्ता की बात सुनकर उसके साथ काम करने के लिए राजी हो गए।

फिर बाघ कुत्ता के साथ उसके मालिक के घर जा रहा था। थोड़ी दूर जाने के बाद बाघ आश्चर्य होकर कुत्ता से पूछा, "भाई, तुम्हारे गले में यह क्या है?"

कुत्ता जवाब दिया, "कुछ नहीं, यह तो एक पट्टा है अरे दिन में तो मैं जंजीरों में बांधे रहता हूं।" कुत्ता की बात सुनकर बाघ हैरान हो गया।

उसने कहा, "मुझे ऐसा सुख नहीं चाहिए। मैं भोजन के लिए अपनी आजादी का सौदा नहीं कर सकता। मैं किसी का गुलाम होने से अच्छा भूखा रहूंगा।" यह कहकर बाघ जंगल में लौट गए।

नैतिक शिक्षा : जंजीरों की तुलना में बेहतर भूख हो।

लालची कुत्ता और मांस

एक बार की बात है, गांव में एक मांस की दुकान के पास एक कुत्ता इंतजार कर रहा था, एक टुकड़ा मास के लिए। जल्द ही कुत्ता को एक अवसर मिला।

दुकानदार के पास एक समय में उनके दुकान पर अच्छी संख्या ग्राहक थी। दुकानदार उनके साथ बातचीत करने में व्यस्त हो गया।

इस बीच, कुत्ता दुकान से एक मांस की टुकड़ा अपनी मुंह में लेकर जितनी जल्दी हो सके वहां से भाग गया। भागते भागते वह एक नदी मैं पुल के पास आया कुत्ता नदी को पार करने के लिए उस पुल पर चढ़ गया।

जैसे ही कुत्ता पुल के बीच आया, उसने देखा कि उसकी खुद की छाया जो नदी के बिस्तर पड़ी है। उसे लगा एक कुत्ता मुंह में मांस लेकर वहां नदी में खड़ा है। कुत्ता नदी में और एक मांस की टुकड़ा देखकर बहुत लालची हो गया।

वह उसे भी खाना चाहता था, इसीलिए वह मांस को पकड़ने के लिए नदी में कूद गया। नदी में बहुत तेज प्रबाह उसे दूर ले जा रहा था। वह बचने के लिए मुंह से मांस की टुकड़ा को छोड़ दिया। इस कुत्ता को अपनी लालच का परिणाम प्राप्त हुआ।

नैतिक शिक्षा : लालच बुरी बला है लालच नहीं करनी चाहिए, दूसरों की चीजें छीनने का फल बुरा ही होता है।

बंदर का न्याय

एक दिन दो बिल्लियों को रोटी का एक टुकड़ा मिला। एक ने उसे पकड़ने के लिए छलाँग लगाई और दूसरी ने रोटी पर झपट्टा मारा। पहली बिल्ली बोली, "यह रोटी का टुकड़ा मेरा है, क्योंकि मैंने इसे पहले पकड़ा था।"

दूसरी बिल्ली बोली, "लेकिन मैंने रोटी के टुकड़े को पहले देखा था, इसलिए यह रोटी मेरी है।" जब वे दोनों बहस कर रही थीं, उस समय एक बंदर वहाँ से गुजर रहा था।

बिल्लियों को झगड़ते देखकर उसने उनसे कहा, "यदि कहो तो मैं जज बनकर तुम्हारे झगड़े को सुलझा दूँ। मैंने इस तरह के कई झगड़े सुलझाए हैं।" बिल्लियों ने उसकी बात मान ली और रोटी का टुकड़ा उसे दे दिया।

उसने रोटी के बराबर-बराबर दो टुकड़े किए। फिर अपने सिर को खुजलाते हुए वह बोला, "ये दोनों टुकड़े बराबर नहीं हैं। एक टुकड़ा दूसरे से बड़ा है।" यह कहकर उसने रोटी के बड़े टुकड़े को थोड़ा-सा खा लिया।

ऐसा करते-करते रोटी के बस दो छोटे टुकड़े रह गए। तब वह बोला, "मैं तुम्हें इतने छोटे-छोटे टुकड़े कैसे दे सकता हूँ? मैं इन्हें स्वयं ही खा लेता हूँ।"

यह कहकर उसने पूरी रोटी खा ली और वहाँ से चला गया। हमेशा दो लोगों के झगड़े में तीसरा व्यक्ति फायदा उठाता है।

बुद्धिमान लोमड़ी और शेर

एक जंगल में एक शेर रहता था। वह बूढ़ा और कमज़ोर हो गया था, इसलिए उसने शिकार के लिए एक उपाय सोचा। उसने बीमार होने का नाटक किया।

सब जानवरों ने उसकी बीमारी के बारे में सुना। अब जो भी उसे देखने आता, वह उसे खा लेता। ऐसा कई दिनों तक होता रहा। एक दिन एक लोमड़ी ने सोचा-"मुझे अपने राजा से मिलने जाना चाहिए।"

जैसे ही वह गुफा में जाने लगी, शेर ने उसे देख लिया और बोला-"आओ, प्यारी लोमड़ी अन्दर आओ।" लेकिन चालाक लोमड़ी ने कहा-"नहीं महाराज, मैं बाहर ही ठीक हूँ।

मैं यहाँ पर इन जानवरों के पैरों के निशानों को अंदर जाते तो देख रही हूँ, मगर बाहर आते नहीं।" ऐसा कह कर वह वहाँ से भाग गई। समझदारी से उसने अपने आपको बचा लिया। किसी ने सही कहा है-"सभी काम ठीक होते हैं, जब बुद्धि से सलाह ली जाती है।"

हिरण और उसके सींग

एक बार की बात है,एक जंगल में हिरण रहती थी. उसी जंगल के किनारे एक नदी थी। एक दिन हिरण नदी में पानी पी रहा था, उसने पानी में उसके सींग का प्रतिबिंब देखा, उसे गर्व महसूस हुआ।

जब उन्होंने पानी में अपने पैरों का प्रतिबिंब देखा, तो उन्हें शर्म महसूस हुई। तभी उसने एक शेर की आवाज सुनी, वह जितनी तेज भाग सकता था भाग गया।

हिरण की पतले पैरों ने उसे भागने में मदद की, उन्होंने महसूस किया कि उनके बदसूरत दिखने वाली पैर उनकी असली साधन है।

फिर जल्द ही उनके खूबसूरत सींग उनके लिए दुश्मन बन गई, वह एक झाड़ी में उजला गया। हिरण वहां से बाहर निकालने की पूरी कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हुआ। फिर कुछ मिनटों बाद शेर वहां पहुंच गया, वह हिरण को अपना भजन बनाया।

नैतिक शिक्षा : सभी चमकती चीज सोना नहीं होती।

चालाक लोमड़ी और कौआ

एक बार की बात है, जंगल में एक लोमड़ी रहती थी वह दो दिन से भूखा था, उसे खाने के लिए कुछ भी नहीं मिला। लोमड़ी भोजन की तलाश में जंगल से जा रहा था फिर उसने देखा एक कौआ एक पेड़ की शाखा पर बैठा है, उसकी मुंह में एक रोटी का एक टुकड़ा था।

रोटी का टुकड़ा देखकर लोमड़ी की मुंह में पानी आ गया। और उसने वह रोटी कौआ की मुंह से छीन ना चाहा। फिर लोमड़ी एक जोजोना की बारे में सोच कर पेड़ के पास गई और कौआ की आवाज की बहुत तारीफ की।

फिर लोमड़ी कौआ से एक गीत गाने की प्रार्थना की। कौआ अपनी झूठी तारीफ सुनकर इतना तल्लीन हो गया कि वह भूल ही गया उसकी मुंह में एक रोटी का टुकड़ा है, कौआ गर्व महसूस करने लगा।

से ही कौआ ने गीत गाने के लिए अपना मुंह खोला, रोटी का टुकड़ा नीचे गिर गया। लोमड़ी जल्दी से रोटी का टुकड़ा लिया और वहां से भाग गया थोड़ी दूर जाकर लोमड़ी खुशी से अपना भोजन किया। और कौआ दुखी होकर वहां रोने लगा।

नैतिक शिक्षा : कभी भी अगर कोई तुम्हारी जरूरत से ज्यादा तारीफ करेगा तो उनकी बातों पर भरोसा करने से पहले एक बार जरूर सोचना।

गुलाम और शेर

एक बार एक राज्यों में एक गुलाम था, उसका राजा बहुत क्रूर था। वह भागकर एक जंगल में चला गया, वहां रहने के लिए एक गुफा में गया। गुलाम गुफा में सोया हुआ था, शेर की दहाड़ सुनकर अचानक वह जाग गया, उसने वहां एक शेर को देखा।

शेर लंगड़ा कर चल रहा था,गुलाम शेर की पंजे में एक कांटा देखा। उसने शेर की पंजे से कांटा बाहर निकाला, शेर को राहत महसूस हुई, फिर दोनों दोस्त बन गए।

एक दिन गुलाम को उसकी राजा के लोग ने पकड़ लिया। और फिर राजा के सामने लेकर गया। राजा ने उसे एक भूखे शेर के सामने फेंकने का आदेश दिया। जब गुलाम को शेर के सामने फेंका गया, तो शेर ने उसे नहीं मारा।

क्योंकि यह वही शेर था, शेर ने उसकी पैर चाटी, इस अजीब नजरे को देखकर सभी हैरान थे। फिर गुलाम को आजाद कर दिया गया, शेर को पुरस्कार के रूप में दिया गया था।

नैतिक शिक्षा : हमेशा संकट में किसी का मदद करना चाहिए।

चतुर केकड़ा

एक बार, एक बड़ी झील के पास एक बगुला रहता था। वह उस झील से मछली पकड़ता था और उन्हें खाता था। लेकिन अब, वह बूढ़ा हो गया था और पहले की तरह मछली नहीं पकड़ सकता था।

बगुला, कुछ दिनों से एक भी मछली नहीं खाया था। एक दिन उसने सोचा, "मुझे एक योजना के बारे में सोचना है, नहीं तो मैं भूखा मर जाऊंगा।" जल्द ही, वह एक योजना के साथ आया।

फिर, बगुला उदास होकर पानी की धार पर बैठ गया। उसी झील में एक केकड़ा रहता था। जो मिलनसार और विचारशील था। जैसे ही वह पानी की धार पर गया, उसने बगुला को देखा।

उसने बगुला से पूछा, "तुम उदास क्यों हो दोस्त, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?" उदास स्वर में बगुला ने कहा, "कुछ भयानक होने वाला है।" केकड़ा ने पूछा, "बो क्या है?"

जब मैं आज सुबह रास्ते से जा रहा था। तो मैंने एक ज्योतिषी को यह कहते हुए सुना, कि अगले पांच साल तक इन भागों में बारिश नहीं होगी। झील सूख जाएगी और हम सभी मर जाएंगे।

यह बात सुनकर, केकड़ा झील के मछलियों के पास गया। और उन्हें बताया, कि बगुला ने उसे क्या कहा। यह सुनकर सभी मछलियां डर गए। बे रोने लगा, "अरे नहीं, हम सब मर जाएंगे।"

बगुला ने बताया, "यहां से कुछ दूर एक बहुत बड़ी झील है। मैं आप सभी को एक एक करके वहां ले जा सकता हूं।" सभी मछलियां खुश हुए, और बड़ी झील में जाने के लिए तैयार हो गए।

हर दिन, बगुला एक एक करके मछलियां उठाता था। और अपनी लंबी चोच के बीच पकड़ कर उड़ जाता था।लेकिन, उन्हें किसी भी बड़ी झील में ले जाने के बजाय।

वह कुछ दूर ले जाकर उन्हें खा जाता था। कुछ दिनों के बाद, केकड़ा बगुला के पास गया। उनसे पूछा, "आप मछलियों को दूसरी झील में ले जा रहे हैं, आप मुझे कब ले जाओगे?"

बगुला ने अपने आप सोचा, "मैं मछली खा खा कर थक गया हूं। केकड़ा का मांस, बहुत स्वादिष्ट होना चाहिए।" बगुला, केकड़ा को दूसरी झील पर ले जाने के लिए तैयार हो गया।

लेकिन, अपनी चोंच में ले जाने के लिए केकड़ा बहुत बड़ा था। इसीलिए, केकड़ा बगुला की पीठ पर चढ़ गया। और उन्होंने यात्रा शुरू कर दी। थोड़ी देर के बाद, केकड़ा अधीर हो गया।

उसने बगुला से पूछा, "झील कितनी दूर है?" बगुला ने कहा, "तुम मूर्ख हो, मैं तुम्हें किसी भी झील में नहीं ले जा रहा हूं। तुम्हें खाने के लिए थोड़ी दूर जा रहा हूं। जैसे उन मछलियों को खाया।

केकड़ा ने कहा, "मैं आपको मारने की अनुमति देने के लिए मूर्ख नहीं हूं।" फिर, उसने अपने शक्तिशाली नाखूनों की मदद से बगुला की गर्दन पकड़ ली। और दुष्ट बगुला की गला दबाकर हत्या कर दी।

लालची शेर

एक बार, जंगल में रहता था एक शक्तिशाली शेर। वह जंगल के राजा थे। शेर राजा रोज जानवरों का शिकार करते थे अपनी भजन के लिए, सभी जानवर शेर से बचने के लिए जंगल में छुपा रहते थे।

कारण शेर को शिकार करना बहुत मुश्किल हो गई थी, इसीलिए शेर एक लोमड़ी को काम पर रखा। लोमड़ी जंगल में जाकर जानवर की पता करती थी, और फिर शेर जाकर उसे भजन करते थे।

एक दिन शेर लोमड़ी को कहा, तुम जंगल में जाकर पता करो सभी जानवर मेरे बारे में क्या सोचते हैं। लोमड़ी तुरंत जंगल में जाकर सभी जानवर से पता किया, फिर शेर को आकर कहा।

"महाराज आप सभी जानवर को आसानी से पकड़ सकते है, इसलिए जंगल के सभी जानवर आप से डरते है, जंगल में आपसे ज्यादा तेज और कोई भी नहीं है।

महाराज आप इस जंगल के शक्तिशाली राजा हो, लेकिन मैं अगर चुपके से आपको जनवर का पता नहीं देता तो आप भूखा ही रहते। अगर मैं एक दिन का भी छुट्टी लूं तो आप उस दिन भूखा रह जाएंगे।"

अगले दिन लोमड़ी ने छुट्टी लिया, शेर सारा दिन लोमड़ी के इंतजार करते करते परेशान होकर खुद शिकार करने निकला, रास्ते में उसने एक खरगोश को देखा। शेर चुपके से खरगोश की ओर जा रही थी,

लेकिन खरगोश अपनी लंबी कानों से शेर के पैरों की आवाज सुन लेती है, और वह वहां से भागती है। लेकिन खरगोश ज्यादा दूर नहीं भाग पाया शेर ने उसे पकड़ लिए थे।

फिर उसे खाने वाले थे, उसी समय शेर ने एक हिरण को देखा, हिरण उधर घास खा रही थी। शेर ने सोचा, "यह खरगोश तो बहुत छोटा है, इससे मेरी पेट नहीं भरेगी मुझे तो उस हिरण को पकड़ना चाहिए।"

यह सोचकर शेर खरगोश को छोड़ दिया, और हिरण को पकड़ने के लिए उसके पीछे भागा, हिरण भागते भागते जंगल में झाड़ियों के पीछे छुप गया। शेर हिरण को इधर उधर बहुत ढूंढा लेकिन उसे हिरन नहीं मिली।

फिर शेर निराश होकर जहां खरगोश को पकड़ा था वहां लौट आया, उसने देखा वहां खरगोश नहीं थी खरगोश भी भाग गई। भूखा शेर ने सोचा अगर हमें हिरण के लालच नहीं होती,

तो कम से कम खरगोश मिलती भजन के लिए, शेर बहुत ही दुखी होकर वहां बैठी थी, एक पेड़ की पीछे से लोमड़ी ने यह सब कुछ देख कर मजा ले रही थी।

"हा हा हा शेर घमंडी ही नहीं लालची भी है, इसीलिए उसकी हाथों में कोई नहीं आया। जो थे वह भी भाग गई, हा हा हा।"

नैतिक शिक्षा : हाथों में एक पक्षी ज्यादा मूल्यवान छड़ियों में हजारों से।

गधे की ईर्ष्या

एक व्यापारी ने अपने घर पर कुत्ता और गधा दोनों पाल रखे थे। कुत्ता दिन भर घर की रखवाली करता और गधा व्यापारी का वजनदार समान इधर-उधर ले जाया करता था।

गधा कुत्ते से ईर्ष्या किया करता था। उसे लगता था, कि मालिक उससे अधिक प्रेम करते हैं। और उससे कम!

वह अपने खाली समय में यही सोचता रहता था कि, कुत्ते के तो कितने ठाठ है। आराम से दिन भर घर के अंदर ही रहता है। इतना अच्छा अच्छा और महंगा महंगा खाना खाता है।

आखिर काम ही क्या है उसका बस यदि कोई घर पर अजनबी आए तो उस पर भौंक देना। इस के लिए ही मालिक ने उसे अपने सर पर चढ़ा रखा है।

उसकी पीठ पर तो मालिक कितने प्यार से हाथ फेरते हैं और मेरी पीठ पर तो डंडे बरसाए जाते हैं। मैं तो इस कुत्ते से तंग आ गया हूँ। अगर यह नहीं होता तो इसके हिस्से का प्यार भी मालिक मुझसे ही करते।

फिर उसने सोचा, कुत्ता भी तो मालिक को खुश रखता है। जब वो घर आते हैं तो उनके ऊपर प्यार से भौंकता है। पूँछ हिलाता है। और अपने आगे के पैरों की सहायता से उनके ऊपर चढ़ जाता है।

शायद तभी मालिक उससे प्रसन्न रहते हैं। आज मैं भी मालिक के आने पर ऐसा ही करूँगा फिर मालिक मुझसे भी खुश हो जाएंगे।

शिक्षा - शाम हुई व्यापारी घर पहुंचा। गधे ने तो पूरी तैयारी कर के रखी थी। उसने व्यापारी के आते ही कुत्ते से भी पहले व्यापारी को देख ढेंचू ढेंचू करना शुरू कर दिया,

और अपनी पूँछ भी हिलाने लगा।

फिर वह व्यापारी के और करीब आया और अपने आगे के पैरों को उठाकर व्यापारी के उपर चढ़ गया। व्यापारी यह सब देख कर अचंभित रह गया। उसने सोचा गधा आज पागल हो गया है।

तभी ऐसी हरकतें कर रहा है। इसका इलाज करना पड़ेगा।

तब व्यापारी ने दरवाजे के पीछे से अपना मोटा डंडा निकाला और गधे को उससे खूब पीटने लगा। बेचारा गधा, प्यार पाने चला था और डंडे खाकर आ गया।

सीख - "ईर्ष्या या द्वेष भाव किसी के प्रति भी नहीं रखना चाहिए। इससे हमारा ही नुकसान होता है।"

गधे का दिमाग

एक घने जंगल मे एक शेर रहता था। अब वह बूढ़ा हो चला था। उसकी गूफा में एक शियार मंत्री के पद पर कार्यरत था। शेर जो कुछ भी शिकार किया करता , उसका बचा हुआ भाग वह शियार को दे दिया करता था।

सियार का यह मंत्री पद का मेहनताना हुआ करता था।

एक दिन शेर को बहुत तेज भूख लगी थी। शेर ने शियार को अपने पास बुलाया और कहा, " मंत्री मेरीबात ध्यान से सुनो। मैं बहुत भूखा हूँ बहुत तेज भूख लगी है। और धीरे धीरे मैं बूढ़ा भी हो रहा हूँ,

आज मुझे बाहर जाकर शिकार करने की हिम्मत नहीं आ रही है, क्या तुम मेरे लिए आज गुफा में ही किसी प्राणी को लेकर आ सकते हो? जिसे मारकर मैं अपनी भूख मिटा सकूं! और तुम्हारा हिस्सा तो तुम्हें मिल ही जाएगा।

जाओ तुम एक शिकार मेरे लिए यहाँ ढूंढ कर ले आओ।"

मंत्री को अब अपने महाराज की आज्ञा तो माननी ही थी। सियार ने हाँ कर दी। अब वह बाहर जंगल की ओर निकल गया । मन ही मन वह सोच रहा था कि,

शेर को वचन तो दे दिया लेकिन ऐसा कौन सा जानवर होगा जो खुशी खुशी मरने के लिए तैयार हो जाएगा। शेर भी वैसे तो बड़ा राजा बना फिरता है, आज ऐसी मूर्खतापूर्ण बात कर रहा है।

अब सियार सोचने लगा। कुछ देर सोचने के बाद उसे एक युक्ति सूझी। और जल्द ही उसकी तलाश भी खत्म हो गयी। उसे पास में ही एक गधा दिखा। तो युक्ति के अनुसार वह पहले गधे से मिला और फिर उससे बोला,

" अरे गधे मित्र तुम यहां क्या कर रहे हो! तुम्हें पता नहीं है क्या शेर ने तो तुम्हें अपना मंत्री घोषित किया है। तुम्हें तो अभी शेर के पास होना चाहिए। शेर तो ऐसे नाराज हो जाएगा।

मैं ने शेर की गूफ़ा देखी है चलो मैं तुम्हें वहा छोड़कर आता हूँ।"

गधा तो मंत्री वाली बात सुनकर खुशी से फूला नहीं समा रहा था। उसे लग रहा था कि अब उसका जीवन सफल हो गया है, एक अच्छा कार्य उसे मिल गया है।

सियार बात करते करते उसे शेर की गुफा के अंदर ले गया।

जैसे ही शेर ने गधे को देखा वह उस पर टूट पड़ा और उसको मार डाला। शेर भोजन करने से पहले स्नान करना चाहता था। अतः उसने

जानवरों की कहानियाँ हिंदी में – सियार से कहा,

" तुम भोजन का ध्यान रखना मैं अभी आता हूं स्नान कर के।"सियार तो स्वामिभक्त था वह मान गया।

लेकिन सामने स्वादिष्ट भोजन देख कर उससे रहा नहीं गया। उसने कुछ सोचा फिर झट उसका दिमाग खा गया।

इतने में शेर भी वापस आ गया। जब दोनों भोजन कर रहे थे तो सियार से शेर ने पूछा, " इसका दिमाग कहाँ है?"

सियार बोला, " महाराज आप कैसी बातें कर रहे हैं। गधे का तो दिमाग होता ही नहीं। यदि होता तो वह स्वयं ही यहां शिकार बनने के लिए यहाँ आपकी गुफा में क्यों आता!"

शेर उसकी बात मान गया अब दोनो फिर से शिकार का आनन्द लेने लगे।

सीख - "धूर्त अपनी चालाकी से कभी नहीं चूकता।"

शेर की खाल में गधा

जंगल में एक बार गधे को शेर की खाल मिल गयी. गधे ने सोचा क्यों ना मैं ये शेर की खाल पहन लू, इससे मुझे कोई तंग नहीं करेगा और सब मुझसे डरेंगे.

गधे ने शेर की खाल पहन ली और जंगल में वह जहा भी जाता सब जानवर उससे डरते. ये देख कर गधे को बड़ा मज़ा आ रहा था. तभी गधे के पास से एक चालाक लोमड़ी गुज़र रही थी, उसे शक हो गया कि शेर की खाल में गधा है जो सभी जानवरो को डरा रहा है.

लोमड़ी ने उसके पास जाकर पुछा "शेर जी…क्या आप मीठे आम खाएंगे?"

गधे ने बोलने के समय जैसे ही मुंह खोला तो ढेंचू ढेंचू की आवाज़ आयी और सभी जानवरो को पता चल गया कि ये शेर की खाल में गधा है. फिर क्या था, सबने मिलकर गधे को अच्छा पाठ पढ़ाया और फिर गधे ने सभी जानवरो से माफ़ी मांगी.

शिक्षा - नक़ल करने के लिए भी अक्ल की ज़रूरत होती है.

लालची कुत्ता

एक बार कुत्ते को हड्डी का टुकड़ा मिला, वो काफी बड़ी हड्डी थी. कुत्ते ने सोचा कि आज तो दावत हो गए, कुत्ते ने हड्डी अपने घर जा कर खाने की सोची. कुत्ते ने हड्डी अपने मुंह में दबाई और घर की तरफ बढ़ने लगा.

जब कुत्ता अपने घर जा रहा था तो रास्ते में एक तालाब था. कुत्ते ने जैसे ही तालाब में देखा तो उसे अपनी परछाई दिखी। कुत्ते ने सोचा कि तालाब में एक और कुत्ता हड्डी लिए है. उसे लालच आ गयी और उसने सोचा क्यों ना इस कुत्ते की हड्डी भी छीन लू. जैसे ही कुत्ते ने नदी में छलांग लगायी उसकी अपनी हड्डी भी पानी में बह गयी और वह भूखा ही रह गया.

शिक्षा - लालच बुरी बला है. हमारे पास जो है, हमें उससे संतुष्टि करनी चाहिए।

शिकारी कुत्ते और नन्हा कबूतर

एक गांव में एक किसान रहता था। वह कड़ी मेहनत करके अपने खेत मे अनाज उगाता था। परंतु जब भी उसकी फसल तैयार होती थी,

तो उसे किसान के काटने से पहले ही, कबूतर और कौए आकर नष्ट कर जाते थे।

यह हर बार की बात हो गयी थी। अब किसान उन सभी पक्षियों से बहुत तंग आ चुका था। किसान ने अब ठान ही लिया था कि कैसे भी कर के मुझे इन पक्षियों को पकड़ना ही होगा।

एक बार जब उसकी फसल तैयार होने वाली थी तब किसान ने अपने खेत मे एक जाल बिछा दिया और ऊपर से दाने भी डाल दिये।

ऊपर से चिड़ियाओं ने देखा तब उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि इस बार फसल इतने जल्द पक गयी। सभी चिड़ियाएं आई और दाना चुगने लगीं। लेकिन वे सब उड़ नहीं पाई।

क्योंकि अब वे बुरी तरह से किसान के बिछाए हुए जाल में फंसचुकी थी। उनको समझ मे नहीं आ रहा था कि अब वे करें तो क्या करें।

तभी किसान पक्षियों का कोलाहल सुनकर वहां अपने खेत मे पहुँच गया। खेत मे जब उसने देखा तो जाल में फंसी हुई सारीचिड़ियाएं ,काले काले कौए थे।

अब किसान को कौओं पर बहुत गुस्सा आया वह मन ही मन सोच रहा था कि अच्छा तो मेरा नुकसान करने वाले कौए थे! लेकिन अब तो इनके कोलाहल का कोई फायदा ही नहीं है।

ये अब कुछ नही कर सकते । मैं इनको सबक सिखा कर रहूँगा। अब ये बुरी तरह से मेरे जाल में फंस चुके हैं।

तब जाल में से कौओं की कांव कांव के बीच से एक करुण आवाज आ रही थी। वह आवाज एक नन्हें कबूतर की थी। किसान की नजर उस पर पड़ी। किसान को उस पर दया आई।

वह बोला, " अरे तू यहां इन काले कौओं की संगति में कैसे पड़ गया।

लेकिन अब कुछ भी नहीं हो सकता जिस प्रकार गेंहू के साथ घुन भी पिस जाते हैं!

ठीक उसी प्रकार से अब कौओं के साथ साथ तू भी मेरा दुश्मन बन गया है। तुझे भी मैं नहीं छोड़ूंगा। इतना कहकर उसने अपने शिकारी कुत्तों को एक इशारा किया।

सभी किसान के इशारे पर खेत मे आ पहुंचे और सभी कौओं और उस नन्हे से कबूतर को मार डाला।

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