दोस्तों, आज की इस पोस्ट में हम आपके लिए Bedtime Stories in Hindi में लेकर आये है। आज की इस पोस्ट पोस्ट में आपको बहुत सारी Bedtime Stories in Hindi में मिल जाएगी। आपको इन कहानियों को पढ़ने में बहुत मजा आएगा।

Bedtime Story in Hindi

Bedtime Stories in Hindi List

कछुआ और खरगोश की कहानी

सबसे बड़ी दौलत

चंपक की बैलगाड़ी

चंचल मन

जीवन की सिख दर्जी से

कॉलेज की दोस्ती

गधे का हिरा

शातिर चोर

नमक का दाम

मज़बूरी

स्कूल पिकनिक

लालची गधा

शक्ति या ज्ञान

असली चोर कौन

लालची भिखारी

सच्चाई की ताकत

चरवाहा बालक और भेड़िया की कहानी

लोभी राजा मिदास की कहानी

लकड़हारे का सबक

जीवन का स्वाद

ईमानदारी का इनाम

चाय की दुकान

सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की कहानी

टोपीवाला और बंदर की कहानी

लोमड़ी और अंगूर की कहानी

डर के आगे जित है

सफाई की परीक्षा

कछुए का कवच

बुद्धिमान अंशु

मूर्ख भालू की कहानी

दो बिल्लियों और बंदर की कहानी

जादुई पत्थर की सिख

दादी की होशियारी

बुरी संगत का नतीजा

दिल की सुने या दिमाग की

अशिक्षित राजा

मनहूस पेड़

चूहों का शहर

जीवन की बचत

ज्ञान की नौका

प्यासा कौआ की कहानी

बिल्ली के गले में घंटी कहानी

कछुआ और खरगोश की कहानी

एक जंगल में एक मनमौजी खरगोश रहता था। वह दिन भर जंगल में कूदता-फांदता, खेलता और दौड़ता रहता था। वह इतना तेज दौड़ता था कि जंगल का कोई भी जानवर उसकी बराबरी नहीं कर पाता था। इस बात पर उसे बड़ा घमंड था।

वह अक्सर जंगल के जानवरों को अपने साथ दौड़ लगाने की चुनौती देता और उन्हें हराकर बहुत खुश होता था। धीरे-धीरे उसका घमंड उसके सिर चढ़कर बोलने लगा। वह जिस भी जानवर को दौड़ में हराता, उस पर ख़ूब हँसता और उसका खूब मज़ाक उड़ाता था। जंगल के जानवरों को खरगोश का ये व्यवहार बहुत बुरा लगता था, वे उससे कुछ कहते, तो वह बोलता, “पहले मुझे दौड़ में हराकर दिखाओ, फिर कुछ कहना।”

एक दिन खरगोश ने एक कछुए को देखा, जो अपनी धीमी चाल में कहीं जा रहा था। उसे देख वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।

उसे हँसता देख कछुए ने पूछा, “खरगोश भाई, क्यों हँस रहे हो?”

खरगोश बोला, “तुम्हें देखकर हँस रहा हूँ। तुम कितने सुस्त हो और तुम्हारी चाल तुमसे भी सुस्त। मुझे देखो, मुझ जैसा तेज दौड़ने वाला कोई जानवर इस जंगल में नहीं।”

“तुम्हें खुद पर इतना घमंड नहीं करना चाहिए। हर किसी का घमंड कभी ना कभी टूट जाता है। तुम्हारा भी टूट जाएगा।” कछुआ उसे समझाते हुए बोला।

“इस जंगल में मैं सबसे तेज दौड़ने वाला जानवर हूँ, तो मुझे इस बात का घमंड क्यों ना हो? और कौन मेरा घमंड तोड़ेगा, तुम?” खरगोश बोला।

“हाँ मैं, मैं तुम्हारा घमंड तोडूंगा।” कछुए के कह दिया।

“ऐसी बात है, तो इस कल मेरे साथ दौड़ लगाओ। देखें कौन जीतता है?” खरगोश कछुए को चुनौती देता हुआ बोला।

कछुए ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली। अगले दिन सुबह दोनों के बीच दौड़ की प्रतियोगिता रखी गई। जंगल के सारे जानवर दौड़ देखने आये। सबको पता था कि खरगोश ही दौड़ जीतेगा, लेकिन फिर भी सबमें उत्सुकता बनी हुई थी।

कछुए और खरगोश को जंगल की नदी तक दौड़ लगाना था। दोनों दौड़ के लिए तैयार हो गए। रेफ़री बंदर ने सीटी बजाई और दोनों दौड़ने लगे। कछुए ने एक कदम बढ़ाया, वहीं खरगोश इतनी तेज दौड़ा कि सबके नज़रों से ओझल हो गया।

खरगोश तेजी से दौड़ता जा रहा था, वहीं कछुआ धीमी चाल से आगे बढ़ता जा रहा था। नदी के काफ़ी पास पहुँच जाने पर खरगोश ने यह जानने के लिए पलटकर देखा कि कछुआ कहाँ तक पहुँचा है। उसे कछुआ दूर-दूर तक नज़र नहीं आया।

हँसते हुए वह सोचने लगा कि इस कछुए को नदी तक पहुँचने में तो शाम हो जायेगी। ऐसा करता हूँ, कुछ देर सुस्ता लेता हूँ।

वह एक पेड़ के नीचे सुस्ताने करने लगा। कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला और वह गहरी नींद में सो गया।

उधर कछुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया। कई जानवरों ने उसे समझाया कि खरगोश तो बहुत आगे पहुँच चुका है, अब दौड़ने का कोई फायदा नहीं। लेकिन कछुआ नहीं माना। वह बोला, “जब चुनौती ली है, तो मैं पूरी कोशिश करूंगा।”

कछुआ आगे बढ़ता-बढ़ता उसी पेड़ के पास से गुज़रा, जहाँ खरगोश खर्राटे मारकर सो रहा था। उसे देख कछुआ मुस्कुराया और आगे बढ़ गया। वह बिना रुके लगातार आगे बढ़ता रहा और नदी तक पहुँच गया। कछुआ दौड़ जीत चुका था और खरगोश अब तक सो रहा था। सब जानवर कछुए की जीत पर खुश थे, वे उसे बधाई देने लगे, उसके लिए ज़ोर-ज़ोर ताली बजाने लगे। ताली की आवाज़ जब खरगोश के कानों में पड़ी, तब उसकी नींद टूटी। वह भागता हुआ नदी के पास पहुँचा। देखा, कछुए वहाँ पहले ही पहुँच चुका है। वह पछताने लगा। उसका घमंड टूट गया था। उसने प्रण किया कि वह कभी घमंड नहीं करेगा, कभी किसी का मज़ाक नहीं उड़ाएगा और कोई काम शुरू करने के बाद उसे पूरा किये बगैर नहीं रुकेगा।

कभी घमंड मत करो, घमंड कभी न कभी ज़रूर टूटता है।

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। बिना रुके मेहनत से अपना कार्य करते रहो, सफ़लता अवश्य मिलेगी।

सबसे बड़ी दौलत

एक बड़े से शहर में एक अमीर आदमी रहता था। उसके पास बहुत पैसा था और उसने हाल ही में शहर में एक बड़ा घर भी खरीदा था। वह पैसो से तो बहुत धनी था लेकिन शरीर और सेहत से बहुत ही गरीब था।

वह दिन रात पैसे कमाने के लिए बहुत मेहनत करता, लेकिन अपने शरीर के लिए उसके पास बिलकुल भी वक्त नहीं था। बहुत अमीर और पैसे कमाने के बाद भी उसे कई नई-नई बीमारियों ने घेर लिया था।

वह आदमी स्वार्थी नहीं था, पर सिर्फ इतना था कि उस आदमी के पास पैसा खर्च करने का समय नहीं था। उसे पैसे कमाने की आदत ही लग लगी थी। डॉक्टर के पास जाने के लिए ही उसको वक्त नहीं मिलता था। ध्यान न देने के कारन उसका शरीर धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा था।

एक दिन वह बहुत थक कर घर आया। आज उसका बहुत बुरा सिरदर्द हो रहा था, इसलिए वह सीधा जाकर अपने बिस्तर पे लेट गया। जब उसके नौकर ने खाना लाया तब बहुत थकने के कारन उसने खाना खाने से मना कर दिया और भूखा ही सो गया।

आधी रात को उसका सरदर्द और भी बढ़ गया। वह कुछ समाज ही नहीं पा रहा था की क्या हो रहा है। तभी अचानक ही उसके सामने एक अजीब सी आकृति आकर कड़ी हो गयी और वह बोली, “मैं तुम्हारी आत्मा हूँ और आज मैं ये तुम्हारा शरीर को हमेशा के लिए छोड़ कर चली जा रही हूँ।

तब वह आदमी घबराया सा बोला, ” तुम मेरे शरीर को क्यों छोड़ रहे हो? मेरे पास बहुत पैसा है और मैंने इसके लिए पूरी जिंदगी मेहनत की है। मैं इतना विशाल घर में रहता हूं, की उस घर को कई लोग सिर्फ अपने सपने में सोच सकते है।”

आत्मा बोली, ” सुन मेरी बात ये बड़ा घर तुम्हारा घर है, मेरा नहीं। मेरा घर तो तुम्हारा शरीर है, जो दिन पे दिन दुबला होता जा रहा है, और कई बीमारियों के चपेट में भी आया है।“

“बस कई वर्षों से टूटी हुई झोपड़ी में रहने की कल्पना करो। उसी प्रकार तुमने अपने शरीर यानि मेरे घर की हालत की है, और मैं इसमें नहीं रह सकता।“ यही बोलके आत्मा उस आदमी का शरीर छोड़के चली गयी।

हमारा स्वास्थ्य हमारी सबसे बड़ी दौलत है, इसका अहसास हमे तब होता है जब हम इसको खो देते हैं।

चंपक की बैलगाड़ी

चंपक अपनी बैलगाड़ी में फलों और सब्जियों के बड़े-बड़े बक्से लेकर शहर में बेचने जा रहा था। शहर जाने में उसे करीब एक दिन लगता था। वह सुबह गांव से निकला था और अब दोपहर हो गयी थी, तभी अचानक उसकी बैलगाड़ी एक खड्डे में गिरकर पलट गयी।

वह अपनी बैलगाड़ी सीधी करने की बहुत कोशिश करने लगा। वहा नजदीक एक ढाबे पे बैठा एक आदमी ये सब देख रहा था। उसने चंपक को दूर से ही बोला, “अरे भाई, परेशान मत हो, आ जाओ मेरे साथ पहले खाना खा लो फिर मैं तुम्हारी बैलगाड़ी सीधी करवा दूंगा।”

उसकी बात सुनकर चंपक बोला, “मैं अभी नहीं आ सकता। मेरा दोस्त नाराज हो जायेगा।” ढाबे पर बैठा आदमी ने कहा, “अरे भाई तुज़से अकेले नहीं उठेगी यह बैलगाड़ी। तू आजा खाना खा ले फिर हम दोनों उठाएंगे।”

“नहीं मेरा दोस्त बहुत गुस्सा हो जाएगा” चंपक बोला।

उस आदमी ने फिर से कहा, “अरे मान भी जाओ। आ जाओ इधर बैठो।”

चंपक ने कहा, “ठीक है आप कहते है तो आ जाता हूँ। “

चंपक ने जमकर खाना खाया और फिर बोला, “अब मैं गाड़ी के पास चलता हूँ और आप भी मेरे साथ चलिए। मेरा दोस्त गुस्सा हो रहा होगा।”

ढाबे पर बैठे आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा, “चलो चलते है, पर तुम इतना डर क्यों रहे हो? वैसे कहा है तुम्हारा दोस्त?”

चंपक ने कहा, “बैलगाड़ी के निचे दबा हुआ है।”

चंचल मन

पटना में एक सुखी परिवार रहता था। उस घर में नरेश नाम का लड़का अपने परिवार के साथ रहता था। नरेश एक होशियार बच्चा था लेकिन उसका मन बड़ा चंचल था, वह पढ़ने बैठता तो उसका मन पढ़ाई में कम और बाहर सड़क पर हो रही हलचल पर ज्यादा लगता था।

बाहर कोई गाड़ी का आवाज आये या कोई जोर-जोर से बातें कर रहा हो तो, नरेश कारण जानने के लिए सब छोड कर बाहर भागता था। स्कूल में भी उसका मन पढ़ाई में कम और खिड़की से बाहर देखने में ज्यादा लगता था। इसलिए नरेश हमेशा परीक्षा में कम नंबर लाता था।

एक बार गर्मियों की छुट्टियों में नरेश अपने परिवार के साथ गांव चला गया। शहर से गांव की बस से उतर कर नरेश और उसका परिवार खेतों के बीच से पैदल चल कर आगे बढ़ने लगे। तभी नरेश ने देखा एक कुएं के पास एक घोड़े वाला अपने घोड़े को पानी पिलाने ले जा रहा था। नरेश को भी प्यास लगी, उसने पापा से कुएँ के पास चलने को कहा तो दोनों कुएं के पास पहुंचे।

कुएं पर एक किसान बैलों से रहट चला कर खेतों में पानी लगा रहा था। घोड़े वाला भी घोड़े को रहट से पानी पिलाने लगा पर जैसे ही घोड़ा झुक कर पानी पीने की कोशिश करता तो रहट से निकलने वाली की आवाज से डरकर बार बार पीछे हट जाता। जितनी बार वह पानी पीने के लिए झुकता, रहट की आवाज से डर कर रुक जाता था।

घोड़े वाले ने किसान से थोड़ी देर के लिए बैलों को रोक देने को कहा ताकि घोड़ा बिना डरे पानी पी सके लेकिन किसान ने बताया कि अगर उसने बैलों को रोक दिया तो पानी निकलना ही बंद हो जाएगा, इसलिए घोड़े को तो इसी आवाज के साथ ही पानी पीना पड़ेगा।

यह सुनकर नरेश के पापा ने नरेश की ओर देखते हुए. कहा, “नरेश अब तुम समझ गए ना कि परीक्षा में तुम्हारे नंबर कम क्यों आते है? घोड़े की तरह तुम्हारा भी ध्यान भटक जाता है, इस वजह से तुम पढ़ाई में मन नहीं लगा पाते हो।” नरेश पापा की सीख को समझ गया और उसने आगे से मन और अपने ध्यान को कंट्रोल में रखना सीख लिया।

जीवन की सिख दर्जी से

एक दिन स्कूल में छुट्टी की घोषणा होने के कारण, एक दर्जी का बेटा सोहम अपने पापा की दुकान पर चला गया। वहाँ जाकर वह बड़े ध्यान से अपने पापा को काम करते हुए देखने लगा।

उसने देखा कि उसके पापा कैंची से कपड़े को काटते हैं, और कैंची को पैर के पास टांग से दबा कर रख देते हैं। फिर सुई से उसको सीते हैं और सीने के बाद सुई को अपनी टोपी पर लगा लेते हैं।

जब उसने इसी क्रिया को दो-तीन बार देखा तो उससे रहा नहीं गया, तो उसने अपने पापा से पूछा, “पापा मैं बड़ी देर से आपको देख रहा हूं, आप जब भी कपड़ा काटते हैं, उसके बाद कैंची को पैर के नीचे दबा देते हैं, और सुई से कपड़ा सीने के बाद, उसे टोपी पर लगा लेते हैं, ऐसा क्यों?

सोहम के पापा ने हस्ते हुए जवाब दिया, “बेटा, कैंची काटने का काम करती है, और सुई जोड़ने का काम करती है, और काटने वाले की जगह हमेशा नीची होती है परन्तु जोड़ने वाले की जगह हमेशा ऊपर होती है। यही कारण है कि मैं सुई को टोपी पर लगाता हूं और कैंची को पैर के नीचे रखता हूं।”

कॉलेज की दोस्ती

नंदन को कॉलेज से ही एक अच्छी नौकरी मिल गयी थी और वह अपने जिंदगी में बहुत खुश था। नंदन का सबसे करीबी दोस्त परेश जिसको कॉलेज से नौकरी नहीं मिली थी, वह काफी दिनों से बेरोजगार था।

अब नंदन अपने जीवन में बहुत व्यस्त था, वह अपने दोस्त परेश से भी काफी दिनों से नहीं मिला था। कॉलेज में तो उनको एक-दूसरे के बिना चैन नहीं पड़ता था।

एक दिन नंदन ऑफिस से घर लौटा, तो उसके माँ ने कहा की आज तुम्हारा कॉलेज का दोस्त परेश आया था। उसे बीस हजार रुपये की तुरंत जरूरत थी। मैंने तुम्हारी अलमारी से रूपये निकलकर उसे दे दिया है। तुम्हे कही लिखना हो, तो लिख लेना।

माँ की यह बात सुनकर नंदन का चेहरा हतप्रभ हो गया, आंखे गीली हो गयी, वह अनमना सा हो गया। उसकी माँ ने उसे देखा और बोली, “अरे! क्या हो गया। मैंने कुछ गलत कर दिया क्या? मैं जानती थी की तू और परेश कॉलेज में अच्छे दोस्त थे, इसलिए मैंने यह हिम्मत कर ली। परेश के सामने तुम्हे फोन करना उसे अच्छा नहीं लगता था। मुझसे कोई गलती हो गयी तो माफ़ कर देना।”

तब नंदन बोल पड़ा, “मुझे दुःख इस बात का नहीं है की आपने मेरे दोस्त को पैसे दे दिए है। आपने बिलकुल सही काम किया है, मुझे इसकी ख़ुशी भी है। मैं दुखी हूं क्योंकि मेरा दोस्त मुश्किल में है, और मैं इसे समझ नहीं पाया।“

“मैंने कभी नहीं सोचा था कि वह किसी परेशानी में होगी। मैं इतना स्वार्थी हूं कि मैं उनसे मिलने भी नहीं गया।” यह कहकर नंदन रो पड़ा और अगले ही दिन उसने ऑफिस से छुट्टी ली और परेश को जाकर मिला।

परेश को अपने पिता के इलाज के लिए पैसे चाहिए थे। परेश नंदन को देखकर बहुत खुश हुआ। नंदन फिर से रो पड़ा और परेश को सॉरी बोला।

गधे का हिरा

एक व्यापारी का गांव के बाजार में कपड़ो का व्यवसाय था। उस व्यापारी ने अपने पास एक गधा भी रख लिया था, जो उसे घर से बाजार कपडे ले जाने में मदत करता था। एक दिन जब व्यापारी कपड़ों का गद्दर ले कर वापस घर लौट रहा था तो रास्ते में उसे एक बड़ा सा चमकता पत्थर पड़ा हुआ दिखा।

उसने उसे उठा लिया। पत्थर की चमकीला और सुंदर था । व्यापारी ने उसे एक रस्सी से बांधकर गधे के गले में पहना दिया। गधा और ज्यादा सजीला दिखने लगा। तभी एक हीरा जौहरी की नजर गधे के गले में लटकते चमकीले पत्थर पर पड़ गई। उसे समझ में आ गया कि व्यापारी को हीरे की समझ नहीं है। उसने बड़े प्यार से व्यापारी को रोककर कहा, “भैया जी, यह पत्थर तो बड़ा सुंदर है, मुझे दे दोगे तो मैं तुझे सौ रुपये दूंगा।”

व्यापारी ने मना कर दिया। कुछ सोचकर जौहरी ने फिर कहा, “भाई, मुझे यह पत्थर दे दे। मेरे बच्चे खेलेंगे। मैं तुझे दो सौ रुपये दूंगा।” ये सुनकर भी व्यापारी नहीं माना। जौहरी ने कहा, “चलो अच्छा, तीन सौ, रुपए लेकर पर यह पत्थर दे दे। अब तो खुश हो जा।” व्यापारी फिर भी नहीं माना।

तब जौहरी ने कहा, “चल, पाँच सौ दे देता हूं, तू भी क्या याद रखेगा।” इस पर व्यापारी गुस्से में बोला, “अरे कहा ना मैंने नहीं दूंगा। अब आप अपने रस्ते जाइये।” जौहरी रुक गया और व्यापारी आगे चल पड़ा। अब जौहरी सोच में पड़ गया कि हीरा कम से कम पांच लाख का है। अगर उसने व्यापारी को दस हजार रूपये दे दिए, तो वह जरूर हीरा उसे दे देगा, जौहरी बहुत सोचने लगा और वह फिर से व्यापारी के पीछे दौड़ा जो काफी दूर निकल गया था। जैसे तैसे दौड़ते दौड़ते उसने व्यापारी को फिर से पकड़ लिया और बोला, “अच्छा चल मैं तुझे इस पत्थर का दस हजार देता हूं, अब तो मान जा।”

इतना सुनते ही व्यापारी ने हंसते हुए कहा, “अरे भाई, आपने देर कर दी। अभी-अभी एक आदमी मुझे दो लाख रुपए देकर वो पत्थर ले गया।’ यह सुनते ही जौहरी अफसोस से चिल्ला पड़ा, “अरे मूर्ख, वह पांच लाख का हीरा तूने सिर्फ दो लाख में दे दिया? तुझसे बड़ा मूर्ख कोई हो ही नहीं सकता।” इस पर धोबी ने मुस्कुराते हुए कहा, “मेरे लिए तो यह दो लाख भी बहुत है। मैं जौहरी नहीं हूं इसलिए मुझे हीरे की परख नहीं थी। पर आपको तो परख थी। आप सिर्फ मूर्ख ही नहीं बल्कि धोखेबाज और लालची भी हैं इसलिए पांच लाख का हीरा गवां बैठे।”

शातिर चोर

एक बड़े शहर में एक शातिर चोर रहता था। सब लोग जानते हुए भी पुलिस के पास उस चोर के खिलाफ कोई सबूत नहीं था। उस चोर ने बड़े-बड़े राजनेताओं भी नहीं छोड़ा था।

वह चोर अक्सर एक शहर के बाहर रहने वाले साधु को मिलने आता था। उस चोर को भगवान से साक्षात्कार का उपाय जानना था। साधु उसे आये वक्त टाल देता था। लेकिन चोर पर इसका असर नहीं पड़ता था।

एक दिन उस चोर का आग्रह बहुत बाद गया। उसने साधु से कहा की समाधान के बिना वह नहीं जायेगा। कई अनुरोध के बाद साधु ने चोर को दूसरे दिन बुलाया।

दूसरे दिन चोर ठीक समय पर आ गया। साधु ने चोर के सिर पर कुछ पत्थर रखे और कहा की यह पत्थर लेके तुम्हे पूरा पहाड़ चढ़ना होना।

चोर सिर पर पत्थर लिए पहाड़ पर चढ़ने लगा और उसके पीछे साधु भी चलने लगा। थोड़ी देर चलने के बाद चोर को पत्थर भारी लगने लगे। उसने साधु से अनुरोध किया की उसका बोज थोड़ा काम किया जाये। साधु ने उसकी बात मान ली और उसने टोकरी से कुछ पत्थर निकाले।

थोड़ा और चलने के बाद चोर के निवेदन से साधु ने और थोड़े पत्थर निकाले। चोर बार-बार अपनी थकान वक्त कर रहा था। अंत में सब पथरर फेंक दिए गए और चोर असानी से पर्वत पर चढ़ता हुआ ऊँचे शिखर पर जा पहूँचा।

साधु ने कहा, जब तुम्हारे सिर पर पत्थरों का बोझ रहा, तब तक तुम्हे पर्वत के ऊँचे शिखर पर चढ़ना कठिन रहा। पर जैसे ही तुमने पत्थर फेंके वैसे ही चढ़ाई सरल हो गई। ऐसी तरह पापों का बोझ सिर पर लेकर कोई मनुष्य भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता।

चोर समाज गया की वह अपने बुरे कर्मो के लिए भगवान को प्राप्त नहीं कर सकता है। उस दिन से उसने चोरी करना छोड़ दी और वह पूरी तरह से बदल गया।

नमक का दाम

दशरथ दादा अपनी ईमानदारी और नेक स्वाभाव के लिए पूरे गाँव में प्रसिद्द थे। एक बार उन्होंने अपने कुछ मित्रों को खाने पर आमंत्रित किया। वे अक्सर इस तरह इकठ्ठा हुआ करते और साथ मिलकर अपनी पसंद का भोजन बनाते। आज भी सभी मित्र बड़े उत्साह से एक दुसरे से मिले और बातों का दौर चलने लगा।

जब बात खाने को लेकर शुरू हुई तभी दादा को एहसास हुआ कि नमक तो सुबह ही ख़त्म हो गया था। दादा नमक लाने के लिए उठे फिर कुछ सोच कर अपने बेटे को बुलाया और हाथ में कुछ पैसे रखते हुए बोले, “बेटा, जा जरा बाज़ार से एक पुड़िया नमक लेता आ और ये ध्यान रखना कि नमक सही दाम पे खरीदना, ना अधिक पैसे देना और ना कम।”

बेटे को आश्चर्य हुआ, उसने पूछा, “पिताजी, अधिक दाम में ना लाना तो समझ में आता है, लेकिन अगर कुह मोल भाव करके मैं कम पैसे में नामक लाता हूँ और चार पैसे बचाता हूँ तो इसमें हर्ज़ ही क्या है?” “नहीं बेटा ऐसा करना हमारे गाँव को बर्वाद कर सकता है! जा उचित दाम पे नामक लेकर आ।” दादा बोले।

दादा अपने उलझन में पड़े मित्र से बोले, “सोचो कोई नमक कम दाम पे क्यों बेचेगा, तभी न जब उसे पैसों की सख्त ज़रूरत हो। और जो कोई भी उसकी इस स्थिति का फायदा उठाता है वो उस मजदूर का अपमान करता है। जिसने पसीना बहा कर, कड़ी मेहनत से नमक बनाया होगा”

“लेकिन इतनी सी बात से अपना गाँव कैसे बर्वाद हो जाएगा?” मित्रों ने हँसते हुए कहा। “देखो मित्रों, शुरू में समाज के अन्दर कोई बेईमानी नहीं थी, लेकिन धीरे-धीरे हम लोग इसमें एक-एक चुटकी बेईमानी डालते गए और सोचा कि इतने से क्या होगा, पर खुद ही देख लो हम कहाँ पहुँच गए हैं।“

मज़बूरी

स्वेता एक गरीब परिवार से थी। उसके घर में माँ-पिताजी और छोटी बहन थी। पिताजी मेहनत-मजदूरी से जो कमाकर लाते थे, उसी से उनका घर चलता था। एक दिन उसके पिताजी बीमार हो गये। स्वेता विद्यालय नहीं जा पाई। उसके पिताजी को बहुत तेज बुखार था। माँ ने स्वेता से कहा, “बिटिया! इतने पैसे तो हैं नहीं कि डॉक्टर को दिखाया जा सके। ये पैसे लो, और दवाई की दुकानने बुखार की दवाई ले आओ।”

“लेकिन माँ! हमारे अध्यापक कहते हैं कि चिकित्सक को दिखाये बिना दवा नहीं लेनी चाहिए।” स्वेता ने माँ से कहा। माँ बोलीं, “अरे बिटिया! हमारे पास इतने रुपये भी तो होने चाहिए, कि चिकित्सक का शुल्क दे सकें। तुम जाओ और दवाई ले आओ, वे ठीक हो जाएंगे।”

स्वेता ने रुपये लिए और औषधी भंडार से दवाई ले आई। दवाई लेने के बाद भी उसके पिता का स्वास्थ्य ठीक नहीं हुआ। संध्या तक उनकी हालत और खराब हो गई। उसकी माँ बोलीं, “बिटिया! अब तो इनका स्वास्थ्य और बिगड़ता जा रहा है, अब बिना चिकित्सक के कैसे ठीक होंगे? “माँ! अब तो सरकार सभी अस्पताल में निशुल्क दवाई देती है। क्या हम लोग वहाँ पिताजी का उपचार नहीं करा सकते?” स्वेता ने पूछा।

“अब संध्या हो गई है, वहाँ ले कौन जायेगा? हमारे पास तो कोई वाहन भी नहीं है।” माँ ने कहा। स्वेता बहुत विचार करती है और और बिना टाइम गवाए वह अस्पताल चली जाती है। कुछ ही देर में वह अस्पताल पास पहुँच जाती है और वहां के डॉक्टर से बोलती है, “मेरे पिताजी बहुत बीमार हैं, उन्हें बुखार है। मेरे पास रुपये तो नहीं हैं, लेकिन मेरा ये स्वर्ण पदक है। ये मुझे कक्षा पांच में प्रथम आने पर मिला था। आप कहेंगे, तो अपना दूसरा पदक भी दे दूँगी, जो मुझे खेलों में मिला था। बस आप मेरे पिताजी को ठीक कर दीजिए।”

स्वेता की बात सुनकर डॉक्टर्स सन्न रह जाते है। वो कहते है, “बिटिया! यह पदक तुम्हारी पूँजी है। तुम्हारी मजबूरी में इसे हम ले लें, यह बहुत अन्याय होगा। चलो हम तुम्हारे पिताजी को देखते हैं। तुम चिंता मत करो, तुम्हारे पिताजी भी ठीक होंगे और तुम्हारे पदक पर भी तुम्हारा ही अधिकार रहेगा” इतना सुना तो स्वेता प्रसन्न हो जाती है और डॉक्टर को साथ लेकर घर जाती है। डॉक्टर्स के उपचार से बस अगले ही दिन उसके पिताजी ठीक हो जाते है।

स्कूल पिकनिक

स्कूल पिकनिक के लिए क्लास टीचर ने बच्चों को नदी किनारे बगीचे में ले गए हैं। बच्चे उस जगह पर खूब एन्जॉय कर रहे थे। कोई क्रिकेट खेल रहा था, कोई नाच रहा था, दौड़ रहा था और सभी खुश थे। दोपहर में खाना खाने के बाद सभी एक जगह बैठे थे।

तभी क्लास टीचर ने एक लड़की उदास बैठी हुई देखि। टीचर ने उसे अपने पास बुलाकर उसे पानी के गिलास में मुट्ठी भरकर नमक डालने के लिए कहा। उस लड़की ने ऐसाही किया और फिर टीचर ने उसे वह पानी पिने के लिए कहा।

फिर टीचर ने उस उदास लड़की से पूछा, “इसका स्वाद कैसा है?” लड़की ने कहा, “बहुत बुरा” टीचर ने युवा लड़की को नमक कौ मुट्ठी भरकर नदी में डालने का हुक्म दिया। दोनों नदी के किनारे सैर कर रहे थे और लड़की ने अपने हाथ से नदी में नमक डाला। टीचर ने कहा, “अब नदी का पानी पीयो।”

जैसे ही उस लड़की ने पानी पिया तो टीचर ने पूछा, “इसका स्वाद कैसा है? क्या उसमें नमक का स्वाद आया” लडकी ने कहा, “अच्छा है, ना नमक का स्वाद तो नहीं आया।”

फिर टीचर ने उसे समझाया, “हमारी जिंदगी के दुख नमक की तरह है। ना ज़्यादा, ना कम। हमारी जिंदगी में दुख हमेशा एक जैसे रहेंगे, कभी नहीं बदलेंगे लेकिन हम उस दुख का स्वाद किस तरह लेंगे यह उस पर निर्भर करता है कि हम अपने दुख को किस तरह देखते है। इसलिए अगर तुम दुख में हो तो एक चीज जो तुम कर सकते हो, वह यह कि अपनी चीजों को देखने की क्षमता को बढ़ा दो। गिलास मत बनो, नदी बनो।”

लालची गधा

एक कुत्ता और गधे की बहुत गहरी दोस्ती थी। दोनों को गाँव के एक किसान ने पाल रखा था। वह किसान शाम को खेती का काम होने के बाद कुत्ते और गधे को घूमने के छोड़ देता था। और जैसे ही रात होती थी दोनों फिरसे किसान से घर वापस चले आ जाते थे।

एक शाम को किसान ने खेती का काम होने के बाद कुत्ते और गधे को खुले मैदान में छोड़ दिया और वह अपने घर चला गया। थोड़ी देर मैदान में घूमने के बाद गधे ने कुत्ते से कहा, “चलो थोड़ी गांव की सैर कर आते हैं।” कुत्ते ने गधे की बातो में हां में हां मिलायी।

दोनों थोड़ी देर चलने के बाद एक बड़े से खेत के पास आ गए। खेत में फसल देखकर गधे की मुँह में पानी आ गया। गधे ने कुत्ते से कहा, “मुझे बहुत जोर की भूख लगी है। तुम ठहरो, मैं फसल की दो-चार मुँह मारकर आता हूँ।” कुत्ते ने गधे को ऐसा करने से मना किया, किन्तु गधे ने उसकी एक न सुनी।

गधा खेत में घुसकर उसकी फसल चरने लगा। उसको फसल बड़ी स्वादिष्ट लग रही थी। कुत्ते ने उसे चेताया, “तुमने दो-चार मुँह मारने की बात कही थी। लेकिन तुम तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हो। लालच करना ठीक नहीं।” “भाई कहते तो तुम सही हो। लेकिन क्या करूँ, फसल है ही इतनी स्वादिष्ट” यह कहकर गधा फिर से फसल चरने लगा।

गधा स्वाद के लालच में इतनी फसल चर गया कि अब उसका चलना भी मुश्किल हो रहा था। तभी कुत्ते की ध्यान खेत के किसान पर पड़ी। वह एक मोटा डण्डा लिए दौड़ा चला आ रहा था। कुत्ते ने कहा “भागो। किसान आ गया। वह भी मोटा डण्डा लेकर।” लेकिन गधे का पेट इतना भर गया था कि वह तेज भागने के लायक ही न रह गया था।

किसान ने उसकी डण्डे से खूब पिटाई की। गधे को समझ में आ गया था कि यह सब उसके लालच करने का परिणाम है। रात भर डण्डे की चोट से उसका सारा शरीर दुखता रहा। गधे ने शपथ ली कि आगे से वह न तो किसी किसान के खेत में घुसेगा और न ही लालच करेगा।

शक्ति या ज्ञान

एक बार एक ज्ञानी आदमी शहर से अपने गांव आ गया। वह कुछ दिनों के लिए गांव में रहने के लिए आया था इसलिए उसके साथ बहुत सारा सामान था। वह सामान लेकर गांव के रेलवे स्टेशन पर उतरा। वह स्टेशन से बाहर आया और अपने लिए टैक्सी तलाशने लगा।

सामने ही एक टैक्सी वाला खड़ा था। उस ज्ञानी ने टैक्सी वाले से कहा, “सिंह नगरी जाना है, कितना पैसा लोगे?” टैक्सी वाला बोला, “दो सौ रूपये लगेंगे साहब।” उस ज्ञानी ने बुद्धिमानी दिखाते हुए कहा, “इतने पास के दो सौ रूपये? यह क्या लूट मचा रखी है। मैं पैदल ही अपना सामान लेकर सिंह नगरी तक पहुंच जाऊंगा।”

ज्ञानी बहुत जिद्दी था और इसी कारण उसने अपना सामान उठाया और पैदल ही चलने लगा। आधा घंटे तक चलने के बाद उसे फिर से वही टैक्सी वाला दिखाई दिया। उसने टैक्सी वाले को रोका और कहा, “अब तो आधी दूरी तय हो गई है अब कितना पैसा लोगे?”

टैक्सी वाला बोला अब तीन सौ रूपये लगेंगे। ज्ञानी हैरान रह गया और उसने पूछा, “पहले दो सौ रूपये लग रहे थे और अब तीन सौ क्यों लगेंगे?” टैक्सी वाले ने जवाब दिया, “महाशय आप सिंह नगरी से ठीक उल्टी दिशा में लगभग तीन-चार किलोमीटर दूर आ गए हैं। सिंह नगरी स्टेशन के दूसरी ओर है।”

उस व्यक्ति ने इसके बाद कुछ नहीं कहा और चुपचाप गाड़ी में बैठ गया।

असली चोर कौन

बहुत समय पहले की बात है। एक दिन गांव में एक आमिर व्यापारी के यहाँ चोरी हो गयी। उन्होंने तुरंत पुलिस से शिकायत की और उन्होंने जांच शुरू कर दी। आमिर व्यापारी के यहाँ बहुत सरे नौकर काम करते थे तो चोर को पकड़ना बहुत ही मुश्किल था।

अगले दिन पुलिस ने व्यापारी के दोस्त और नौकरों को पुलिस स्टेशन बुलाया और सबके हाथ में एक छड़ी दी। पुलिस ने बताया की ये सब छड़ी तुम आज अपने पास रखो और कल इस छड़ी के साथ पुलिस स्टेशन आना।

यह सभी छाड़ियो की खासियत यह है की यह चोर के पास जाकर एक उंगली के बराबर अपने आप बढ़ जाएगी। उन्हें ये भी बताया की यह नई तकनीक है जिसे फिंगरप्रिंट कहा जाता है और इससे पुलिस ने कई चोरों को पकड़ा है।

पुलिस की बात सुनकर सभी लोक छड़ी लेके अपने-अपने घर चले गए। उन्ही में व्यापारी के घर चोरी करने वाला चोर भी था।

जब वह घर पहूँचा तो उसने सोचा, “अगर पुलिस के सामने मेरी छड़ी बड़ी हो गयी तो वे मुझे जेल में भेज देंगे। इसलिए क्यों न इस छड़ी को पहले से ही ऊँगली भर काट लिया जाए।“

चोर यह सोचकर बहुत खुश हुआ और फिर उसने बहुत अच्छी तरीके से छड़ी को काट लिया ताकि किसी को पता न चले।

अगले दिन आमिर व्यापारी के सभी दोस्त और नौकरों ने पुलिस को अपनी छड़ी दिखाई। चोर ने भी अपनी छड़ी पुलिस तो दिखाई पर उसकी छड़ी सबसे छोटी दिख रही थी। पुलिस ने तुरंत चोर को पकड़ा और चोर ने डर के मारे उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया।

लालची भिखारी

एक दिन एक अमीर व्यवसाई को रास्ते में एक भिखारी भीख मांगता हुआ दिखाई दिया। भिखारी की हालत देखकर व्यवसाई को उस पर दया आ गई। उसने भिखारी से पूछा कि उसकी ऐसी दशा क्यों हुई? भिखारी ने बताया कि उसके खेत बारिश से तबाह हो गए और अब उसके पास दोबारा खेती शुरू करने के लिए पैसे नहीं हैं। जिसके कारण भीख मांगना पड़ रहा है।

अमीर व्यवसाई ने कुछ सोचते हुए पूछा, “क्या तुम मेरे लिए कुछ दिन काम करोगे? कुछ महीनों में आपके नुकसान की भरपाई हो जाएगी।” भिखारी खुश होते हुए बोला, “मालिक, आप बताइए क्या काम करना है?” व्यवसायी ने कहा, “मेरे खेतों में गेहूं की फसल होती है, तुम उसे शहर के बाजार में जाकर बेच आना। मै तुम्हें बाजार जाने, वहां दुकान खोलने और रहने खाने का सब खर्चा दूंगा। गेहूं बेचकर तुम जो धन कमाओगे उसे हम दोनों बांट लेंगे।” ये सुनकर भिखारी बहुत खुश हो गया और उसने व्यवसाई से पूछा, मालिक आपका बहुत-बहुत धन्यवाद लेकिन बंटवारे का

हिसाब क्या होगा?” यह सुनकर व्यवसायी ने कहा, “तुम्हारा अस्सी प्रतिशत और मेरा बीस प्रतिशत। मैं तो अमीर हूं ही लेकिन तुम्हारा जीवन सुधर जाए और तुम्हे ईमानदारी और कृतज्ञता का ज्ञान मिले इसलिए तुम्हे अस्सी प्रतिशत दे रहा हूँ।”

भिखारी ने खुशी खुशी अगले दिन से काम शुरू कर दिया। गेहूं की फसल अच्छी थी, तो महीने भर में उसे अच्छी कमाई मिल गई लेकिन अब उसके दिमाग में लालच आ गया था।

उसने सोचा, “मेहनत तो मैंने की है, तो व्यवसायी को बीस प्रतिशत रुपए भी क्यों दूं? काम तो मैंने किया है तो सब माल भी मेरा ही होगा।”

महीने के अंत में व्यवसायी ने आकर मिखारी से अपना हिरसा मांगा तो भिखारी ने नाक चढ़ाते हुए कहा, ” माफ़ करना पर काम सारा मैंने किया है, तो तुम्हे बीस प्रतिशत किस बात की दूं?” ये सुनकर आमिर व्यवसायी ने मुस्कुराकर कहा, “ठीक है, तो मैंने जो मकान तुम्हें रहने के लिए दिया उसका खर्चा मुझे दे दो। बाजार में बैठने के लिए जो दुकान दिया उसका किराया दे दो, गाँव से शहर के बाजार तक जाने के लिए जो ट्रक भेजता रहा और महीनो भर मैंने तुम्हें जो खिलाया, पहनाया उसका हिसाब दे दो और पूरा कमाई तुम रख लो।”

भिखारी ने तुरंत हिसाब किया और ये देखकर दंग रह गया कि उसे जितना लाभ हुआ था उतना ही उसे व्यवसायी को लौटाना पड़ेगा। उसने तुरंत व्यवसायी से माफी मांगी लेकिन व्यवसायी ने उसे निकाल दिया। भिखारी फिर से भिखारी बन गया।

लालच बुरी बला है।

सच्चाई की ताकत

एक समय की बात है नाहरगढ़ के राजा विक्रम सिंह ने अपने राज्य में व्यापार को बढ़ावा देने के लिए जनता से दुकान लगाने वह किसी भी प्रकार का सामान बेचने की घोषणा की। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि किसी भी व्यक्ति का सामान शाम को बच जाएगा वह राजा के द्वारा खरीद लिया जाएगा। राजा विक्रम सिंह धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, और उनका समाज सेवा करना अपने राज्य का ही नहीं अपितु पड़ोसी राज्य का भी उत्थान करना लक्ष्य था।

उनके सत्य वचन से दूर देश के राजा भी प्रभावित थे और उनका सम्मान करते थे।

राजा विक्रम की घोषणा के बाद राज्य में लोगों ने अपनी-अपनी दुकानें खोली और सामान की खरीद बिक्री करने लगे। राजा के मान सम्मान और उनकी योजनाओं के चर्चे दूर देश में भी होने लगे। देवताओं के राजा इंद्र को यह बात सही नहीं लगी और उन्होंने राजा की परीक्षा लेने के लिए साधारण व्यक्ति का वेश बनाकर कूड़े की दुकान लगा कर बैठ गए।

सुबह से शाम हो गई किंतु उसका कूड़ा कोई भी व्यक्ति नहीं खरीदा।

जब राज महल के सिपाही बाजार का निरीक्षण कर रहे थे, तब उन्होंने पाया कि इस व्यक्ति का कूड़ा किसी भी व्यक्ति ने नहीं खरीदा। सिपाहियों ने तुरंत इसकी सूचना राजा विक्रम सिंह तक पहुंचाई। राजा अपने वचन के पक्के थे उन्होंने वचन के अनुसार उस व्यक्ति का सहारा कबाड़ा खरीद लिया और अपने महल में लाकर रखवा दिया। अगले दिन उन्होंने पाया कि उनके महल से एक सुंदर दिव्य रूप धारण किए शुभ्र वस्त्र में एक स्त्री महल से बाहर जा रही है।

राजा ने हाथ जोड़कर उस स्त्री से परिचय पूछा –

स्त्री ने जवाब में कहा !

मैं राज्य लक्ष्मी हूं, मैं गंदगी में बास नहीं कर सकती इसलिए मैं आपका महल छोड़कर जा रही हूं।

ऐसा कहते हुए राज्य लक्ष्मी राज महल से चली गई।

कुछ समय पश्चात एक दिव्य रूप धारण किए पुरुष महल से जाते दिखे, राजा ने हाथ जोड़कर उनका परिचय पूछा तो उन्होंने कहा मैं यज्ञ देव हूं जहां राज्य लक्ष्मी होती है, वही मेरा काम होता है। इसलिए मैं भी आपका महल छोड़कर राज्य लक्ष्मी के पास जा रहा हूं। ऐसा करते करते कई सारे देवी देवता राजा विक्रम सिंह की महल को छोड़कर चले गए, जिनमें – यश – कीर्ति आदि देव भी शामिल थे।

अंत मैं राजा ने एक और आखिरी देव को जाते देखा, उन्होंने हाथ जोड़कर उनका भी परिचय पूछा देव ने कहा मैं सत्य हूं मैं भी तुम्हारे महल को छोड़कर जा रहा हूं। राजा विक्रम सिंह ने तुरंत ही सत्य के चरणों में गिर कर उन्हें महल से जाने के लिए मना कर दिया। राजा ने कहा मैं सत्य के लिए अपनी सारी विपत्तियों को झेल रहा हूं और आप ही मुझे छोड़ कर चले जाएंगे तो मेरा क्या अस्तित्व रहेगा ?

मेरा कौन सहारा रहेगा ?

सत्य देव ने कुछ समय सोच – विचार किया और राजा के वचनों को ध्यानपूर्वक समझा तो उन्हें मालूम हुआ कि उनकी सत्य के प्रति दृढ़ता के कारण ही यह सभी स्थितियां उत्पन्न हुई है। क्योंकि राजा सत्य का पालन करते हुए ही इंद्र के छल में फंसे हैं, इसलिए सत्य देव ने महल से जाने का विचार छोड़ दिया और महल में ही रुक गए। सत्य को महल में रुका हुआ देख राज्य लक्ष्मी, यज्ञ देव, यश – कीर्ति तथा सभी देवी देवता महल में पुनः वापस लौट आए।

क्योंकि जहां सत्य है वहां सभी देवी देवता वास करते हैं, बिना सत्य के सभी अधूरे हैं।

अर्थात व्यक्ति को दुख और संकट की स्थिति में भी निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि उनसे डटकर सामना करना चाहिए और सत्य पर अडिग रहकर वह किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं। राजा विक्रम सिंह सत्य पर अडिग रहे जिसके कारण उनकी सारी संपत्ति, यश,धन कीर्ति सभी समाप्त हो रही थी, किंतु सत्य पर अडिग रहते हुए उन्होंने सभी चीजों को पुनः प्राप्त कर लिया।

इसलिए किसी भी व्यक्ति को विपत्ति के समय सत्य का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

चरवाहा बालक और भेड़िया की कहानी

एक गाँव में एक चरवाहा बालक रहता था। वह रोज़ अपनी भेड़ों को लेकर जंगल के पास घास के मैदानों में जाता। वहाँ वह भेड़ों को चरने के छोड़ देता और ख़ुद एक पेड़ के नीचे बैठकर उन पर निगाह रखता। उसकी यही दिनचर्या थी।

दिन भर पेड़ के नीचे बैठे-बैठे उसका समय बड़ी मुश्किल से कटता था। उसे बोरियत महसूस होती थी। वह सोचता कि काश मेरे जीवन में भी कुछ मज़ा आ जाये।

एक दिन भेड़ों को चराते हुए उसे मज़ाक सूझा और वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा, “भेड़िया आया भेड़िया आया।”

वहाँ से कुछ दूरी पर खेतों में कुछ किसान काम कर रहे थे। चरवाहे बालक की आवाज़ सुनकर वे अपना काम छोड़ उसकी मदद के लिए दौड़े चले आये। लेकिन जैसे ही वे उसके पास पहुँचे, वह जोर-जोर से हँसने लगा।

किसान बहुत गुस्सा हुए। उसे डांटा और चेतावनी दी कि आज के बाद ऐसा मज़ाक मत करना। फिर वे अपने-अपने खेतों में लौट गए।

चरवाहे बालक को गाँव के किसानों को भागते हुए अपने पास आता देखने में बड़ा मज़ा आया। उसके उनकी चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया। अगले दिन उसे फिर से मसखरी सूझी और वह फिर से चिल्लाने लगा, “भेड़िया आया भेड़िया आया।”

खेत में काम कर रहे किसान फिर से दौड़े चले आये, जिन्हें देखकर चरवाहा बालक फिर से जोर-जोर से हंसने लगा। किसानों ने उसे फिर से डांटा और चेतावनी दी। लेकिन उस पर इसका कोई असर नहीं हुआ। उसके बाद जब-तब वह किसानों को इसी तरह ‘भेड़िया आया भेड़िया आया’ कहकर बुलाता रहा। बालक को कोई खतरा तो नहीं, ये सोचकर किसान भी आते रहे। लेकिन वे उसकी इस शरारत से बहुत परेशान होने लगे थे।

एक दिन चरवाहा बालक पेड़ की छाया में बैठकर बांसुरी बजा रहा था कि सच में एक भेड़िया वहाँ आ गया। वह मदद के लिए चिल्लाने लगा, “भेड़िया आया भेड़िया आया।”

लेकिन इस बार किसानों ने सोचा कि आज भी ये बालक उन्हें परेशान कर रहा है। इसलिए वे उसकी मदद करने नहीं गए। भेड़िया उसकी कुछ भेड़ों को मारकर खा गया।

चरवाहा बालक दौड़ते हुए खेत में काम कर रहे किसानों के पास पहुँचा और रोने लगा, “आज सचमुच भेड़िया आया था। वह मेरी कुछ भेड़ों को मारकर खा गया।”

किसान बोले, “तुम रोज़ हमारे साथ शरारत करते हो। हमें लगा कि आज भी तुम्हारा इरादा वही है। तुम हमारा भरोसा खो चुके थे। इसलिए हममें से कोई तुम्हारी मदद के लिए नहीं आया।”

चरवाहे बालक को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने प्रण लिया कि वह फिर कभी झूठ नहीं बोलेगा और दूसरों को परेशान नहीं करेगा।

“बार-बार झूठ बोलने वालों पर कोई विश्वास नहीं करता। किसी का विश्वास जीतना है, तो हमेशा सच बोलो।”

लोभी राजा मिदास की कहानी

एक राज्य में मिदास नामक एक लोभी राजा राज करता था। उसकी ‘मेरीगोल्ड’ नाम की बेटी थी, जिसे वो बहुत प्यार करता था।

मिदास के ख़जाने में ढेर सारा सोना था। इतना सोना दुनिया में किसी भी राजा के ख़जाने में नहीं था। फिर भी उसके खजाने में जितना सोना बढ़ता जाता, उसका लालच भी उतना ही बढ़ता जाता। वह पूरे दिन खजाने में रखे सोने को गिनता रहता था। इस कारण ना वह राज-पाट में ध्यान देता, न ही अपनी बेटी मेरीगोल्ड पर।

दिन पर दिन उसका सोने के लिए लालच बढ़ता जा रहा था। और अधिक सोना पाने के लिए एक बार वह उपवास रखकर भगवान की कठोर प्रार्थना करने लगा। प्रसन्न होकर भगवान ने उसे दर्शन दिये और मनचाहा वरदान मांगने को कहा।

मिदास बोला, ”हे प्रभु! मुझे वरदान दीजिये कि मैं जिस भी वस्तु हो छुऊं, वह सोने की बन जाये।”

भगवान ने मिदास के मन के अंदर का लोभ देख लिया था। इसलिए वरदान देने के पहले उन्होंने पूछा, “पुत्र! यह वरदान तुम अच्छी तरह सोच-समझ कर मांग रहे हो ना?”

“हे प्रभु! मैं दुनिया का सबसे धनी राजा बनना चाहता हूँ। मैंने अच्छी तरह सोच लिया है। मुझे यही वरदान चाहिए। कृपया मुझे वरदान प्रदान कीजिये।” मिदास ने उत्तर दिया।

“तथास्तु! मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि कल सूर्य की पहली किरण के साथ तुम जिस भी वस्तु को छुओगे, वह सोने की बन जायेगी।” आशीर्वाद देने के बाद भगवान अंतर्ध्यान हो गए।

राजा मिदास यह वरदान पाकर खुशी से फूला नहीं समाया। दूसरे दिन सोकर उठने के उपरांत अपनी शक्ति को परखने के लिए उसने अपने पलंग को छूकर देखा। पलंग सोने का बन गया। वह बहुत खुश हुआ। दिन भर वह महल में घूम-घूमकर हर चीज़ को सोने में बदलने में लगा रहा।

शाम तक वह थककर चूर हो चुका था। उसे जोरों की भूख लग आई थी। उसने अपने सेवकों को भोजन परोसने के लिये कहा। भोजन परोसा गया। किंतु जैसे ही उसने भोजन को हाथ लगाया, वह सोने में बदल गया। सोने को राजा कैसे खाता? भूख मिटाने के लिए उसने सेवक से फल लाने को कहा। सेवक ने सेब लाकर दिया। किंतु, जैसे ही मिदास ने सेब को छुआ, वह भी सोने का हो गया। यह देख उसे बहुत गुस्सा आया और वह उठकर महल के बगीचे में चला आया।

बगीचे में उसकी बेटी ‘मेरीगोल्ड’ खेल रही है। जब ‘मेरीगोल्ड’ ने अपने पिता को देखा, तो वह उसके पास दौड़ी चली आई और उसके गले लग गई। मिदास ने प्यार जताते हुए जैसे ही उसके सिर पर हाथ फेरा, वह सोने में बदल गई। अपनी बेटी को सोने का बना देख मिदास दु:खी हो गया और रोने लगा।

उसने फिर से भगवान से प्रार्थना की। प्रार्थना सुनकर भगवान प्रकट हुए और उससे पूछा, “राजन! क्या हुआ? अब तुम्हें क्या वरदान चाहिए?”

मिदास रो-रोकर कहने लगा, “भगवन! मुझे क्षमा करें। सोने के लोभ में मेरी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी और मैं यह वरदान मांग बैठा था। लेकिन मेरे इस लोभ के कारण मेरी बेटी सोने में बदल गई है। मुझे मेरी बेटी वापस चाहिए। भगवन, यह वरदान वापस ले लें और मुझे मेरी पुत्री लौटा दें। मेरी आँखें खुल गई है। अब मुझमें सोने का कोई लालच नहीं। मैं अपना खजाना गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए खोल दूंगा।”

भगवान ने जब उसे पछताते हुए देखा, तो अपना वरदान वापस ले लिया। दूसरे दिन सूर्य की पहली किरण के साथ सारी वस्तुएं अपने असली रूप में आने लगी। मेरीगोल्ड भी अपने असली रूप में वापस आ गई। राजा मिदास ने अपने अपना खजाना गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए खोल दिया। उसका लालच ख़त्म हो चुका था। वह अपनी बेटी के साथ ख़ुशी-ख़ुशी रहने लगा।

“लोभ का परिणाम बुरा होता है।”

लकड़हारे का सबक

किसी गांव में एक बूढ़ा लकड़हारा रहता था। सत्तर वर्ष के करीब की उम्र थी उसकी। परिवार में कोई न था। बिल्कुल अकेला रहता था।

उसे लकड़ियां तोड़ने रोज जंगल में जाना पड़ता था। यही नहीं दिनभर की तोड़ी लकड़ियां उसे शाम को बाजार में बेचने भी खुद ही जाना पड़ता था। और तब कहीं जाकर रात को उसे दो वक्त का खाना नसीब होता था।

पर उसकी असली शामत वर्षाऋतु में आ जाती थी। अक्सर तोड़ी हुई लकड़ियां भीग जाती और बेचने लायक न बचतीं। फलस्वरूप कई बार बारिश के कहर के चलते उसे दो-दो दिन तक भूखा रहना पड़ता था।

यह उम्र और ऐसा कष्ट, वह बुरी तरह थक गया था। वह अक्सर दुखी होकर प्रार्थना भी करता था, “हे मौत के देवता! तू मुझे उठाता क्यों नहीं है? मुझसे नाराज क्यों है मौत के देवता? तुमने मुझसे छोटे-छोटे को उठा लिए, फिर मुझसे क्या दुश्मनी है तेरी?”

लेकिन एक दिन वह ऐसी ही हताश मनोदशा में उस दिन वह पेड़ के नीचे बैठकर फिर मौत के देवता को पुकार-पुकारकर जीवन से मुक्त करने की प्रार्थनाएं कर रहा था। उसका एक ही रोना था कि मुझे कब उठाएगा तू? इधर अभी उसकी प्रार्थना जारी ही थी कि किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा। बूढ़ा चौंक गया।

उसने पलटकर देखा तो एक विशालकाय मनुष्य खड़ा था। बूढ़े ने डरते हुए उसका परिचय पूछा। उसने कहा “मैं मौत का देवता हूँ! यहां से गुजर रहा था कि तुम्हारी दर्द-भरी पुकार सुनी। वैसे तो तुम्हारा समय नहीं हुआ है, परंतु तुम्हारा दर्द देखकर मैं द्रवित हो उठा हूँ। चलो तुम्हें ले चलता हूँ।”

बूढ़ा तो यह सुनते ही होश में आ गया। वह पूरी तरह से भ्रमित था और बहुत डर भी गया था। बस उसने तुरंत रंग बदलते हुए मौत के सौदागर से कहा “वह तो मैं दो-तीन दिनों से भूखा था, सो बस यूं ही ऐसी बातें कह गया था। बाकी तो मैं बहुत खुश हूँ। और यह स्पष्ट समझ लो कि फिलहाल मेरा मरने का कोई इरादा नहीं। मैंने यह केवल इसलिए कहा क्योंकि मैं गुस्से में था। मेरा मरने का कोई इरादा नहीं है। वैसे तो मैं आपको फिर कभी पुकारूगा भी नहीं।

मौत के देवता ने कहा, “जैसी आपकी मर्जी। इतना कहकर वह चला गया। इधर उसके जाते ही बूढ़ा तरंग में आ गया। उसकी चाल ही बदल गई थी। आश्चर्य तो यह कि उसके बाद फिर कभी उसने कष्ट का अनुभव भी नहीं किया। उसके सोच और जीवन दोनों बदल चुके थे। बाहर की दुनिया में सब कुछ वैसा-का-वैसा था, लेकिन फिर भी उसके भीतर सबकुछ पूरा-का-पूरा बदल गया था। और जब जीवन है और एहसास जीवित है, फिर और क्या चाहिए?

मनुष्य के लिए उसके जीवन से बढ़कर और कुछ नहीं है।

जीवन का स्वाद

मोहित नाम का लड़का था, वह बहुत ही चुपचाप सा रहता था। किसी से ज्यादा बात नहीं करता था इसलिए उसका कोई दोस्त भी नहीं था। वह हमेशा कुछ परेशान सा रहता था। पर लोग उस पर ज्यादा ध्यान नहीं देते थे।

एक दिन वह अपने पिता के साथ उसके दोस्त के घर गया। मोहित को गुमसुम बैठे देखकर उसके पिता के दोस्त ने बोला, “बेटा क्या हुआ? तुम अक्सर बड़े गुमसुम और शांत बैठे रहते हो, ना किसी से बात करते हो और ना ही किसी चीज में रूचि दिखाते हो! इसका क्या कारण है?”

मोहित ने अपने पिता की तरफ देखा और कुछ देर शांत रहने के बाद आखिरकार बोल पड़ा, “मेरा पास्ट बहुत ही खराब रहा है, मेरी लाइफ में कुछ बड़ी ही दुखदायी घटनाएं हुई हैं, मैं उन्ही के बारे में सोच कर परेशान रहता हूँ”

थोड़ी देर सोचने के बाद पिताजी के दोस्त ने उसे बोला, “मोहित क्या तुम शिकंजी पीना पसंद करोगे?” “जी, चलेगा।” मोहित ने कहा। पिताजी के दोस्त ने शिकंजी बनाते वक्त जानबूझ कर नमक अधिक डाल दिया और चीनी की मात्रा कम ही रखी। शिकंजी का एक घूँट पीते ही मोहित ने अजीब सा मुंह बना लिया।

मोहित के पिताजी के दोस्त ने पुछा, “क्या हुआ, तुम्हे ये पसंद नहीं आया क्या?” “जी, वो इसमे नमक थोड़ा अधिक पड़ गया है” मोहित अपनी बात कह ही रहा था की पिताजी के दोस्त ने उसे बीच में ही रोकते हुए कहा, “माफ़ करना, कोई बात नहीं मैं इसे फेंक देता हूँ, अब ये किसी काम की नहीं” ऐसा कह कर वह गिलास उठा ही रहे थे कि मोहित ने उन्हें रोकते हुए कहा, “नमक थोड़ा सा अधिक हो गया है तो क्या, हम इसमें थोड़ी और चीनी मिला दें तो ये बिलकुल ठीक हो जाएगा।”

“बिलकुल ठीक मोहित यही तो मैं तुमसे सुनना चाहता था। अब इस स्थिति को तुम अपनी लाइफ से कम्पेयर करो, शिकंजी में नमक का ज्यादा होना लाइफ में हमारे साथ हुए बुरा अनुभव की तरह है, और अब इस बात को समझो, शिकंजी का स्वाद ठीक करने के लिए हम उसमे में से नमक नहीं निकाल सकते, इसी तरह हम अपने साथ हो चुकी दुखद घटनाओं को अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते, पर जिस तरह हम चीनी डाल कर शिकंजी का स्वाद ठीक कर सकते हैं उसी तरह पुरानी कड़वाहट मिटाने के लिए लाइफ में भी अच्छे अनुभवों की मिठास घोलनी पड़ती है।”

मोहित को अब अपनी गलती का एहसास हो चुका था, उसने मन ही मन एक बार फिर अपने जीवन को सही दिशा देने का वादा किया।

ईमानदारी का इनाम

रात के समय रामु अपनी दुकान बंद ही कर रहा था कि एक कुत्ता दुकान में आया। उसके मूहं में एक थैली थी। जिसमें सामान की लिस्ट और पैसे थे। रामु ने पैसे लेकर सामान उस थैली में भर दिया। कुत्ते ने थैली मुँह मे उठा ली और चला गया।

रामु आश्चर्यचकित होके कुत्ते के पीछे पीछे गया ये देखने की इतने समझदार कुत्ते का मालिक कौन है। कुत्ता बस स्टॉप पर खडा रहा। थोडी देर बाद एक बस आई जिसमें चढ गया। कंडक्टर के पास आते ही अपनी गर्दन आगे कर दी। उस के गले के बेल्ट में पैसे और उसका पता भी था। कंडक्टर ने पैसे लेकर टिकट कुत्ते के गले के बेल्ट मे रख दिया। अपना स्टॉप आते ही कुत्ता आगे के दरवाजे पे चला गया और पुंछ हिलाकर कंडक्टर को इशारा कर दिया।

बस के रुकते ही उतरकर चल दिया। रामु भी पीछे पीछे चल रहा था। कुत्ते ने घर का दरवाजा अपने पैरो से २-३ बार खटखटाया। अंदर से उसका मालिक आया और लाठी से कुत्ते की पीटाई शुरू कर दी । रामू ने मालिक से इसका कारण पूछा । मालिक बोला, “साले ने मेरी नींद खराब कर दी। घर की चाबी साथ लेके नहीं जा सकता था साला गधा?” जीवन की भी यही सच्चाई है। लोगों की अपेक्षाओं का कोई अंत नहीं है।

चाय की दुकान

रामपुर गांव में सर्वेश और उसकी पत्नी वसुंदरा रहते थे। सर्वेश बाजार में चाय की एक छोटी सी दूकान लगाता था जिससे उनका जीवन यापन हो रहा था। सर्वेश सवभाव से बहुत मददगार और अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति था।

जब भी चाय की दूकान में उसके 2 -3 बेरोज़गार दोस्त और कोई भीख मांगने वाला व्यक्ति आ जाता था तो उनको सर्वेश बिना पैसे लिए ही चाय पिला देता था। जिससे कोई ख़ास बचत नहीं हो पाती थी, यह बात उसने अपनी पत्नी को बताई तो उसकी पत्नी वसुंदरा बोली, “कोई बात नहीं आप लोगों का भला ही तो कर रहे है।”

इसी तरह समय बीतता जा रहा था सर्वेश अपने दूकान में आने वाले व्यक्तियों से बात करता और उनका हाल चाल जानता जिससे उसको उनके बारे में भी पता चल जाता था। एक दिन वहाँ चाय पिने आने वाले व्यक्ति को एक हज़ार रूपए की जरुरत थी, तो उसने सर्वेश से रूपए मांगे की उसको अपनी बीवी को इलाज के लिए डॉक्टर के पास लेकर जाना है। इसलिए उसको पैसों की सख्त जरुरत है वह यह रूपए दो दिन में लौटा देगा।

सर्वेश दूसरों की परेशानियों को समझता था। उसने उस व्यक्ति को एक हज़ार रूपए दो दिन के लिए दे दिए। दो दिन के बाद उस व्यक्ति ने वह रूपए सर्वेश को लौटा दिए। उसके बाद एक दूसरे व्यक्ति जिसको रूपए की जरुरत थी उसको पता चला की सर्वेश चायवाले ने एक व्यक्ति को दो दिन के लिए रूपए देकर उसकी मदद की।

वह व्यक्ति सर्वेश से बोला मुझे रूपए की सख्त जरुरत है इसलिए मुझे दो हज़ार रूपए दे दो, जिसको मैं चार दिन के बाद लौटा देगा। जिस तरह आपने उस व्यक्ति की मदद की थी आप मेरी भी मदद कर दो। पहले तो सर्वेश ने मना किया इतने रूपए देने के लिए, लेकिन उस व्यक्ति के गुज़ारिश करने के बाद सर्वेश ने उस व्यक्ति को भी दो हज़ार रूपए दे दिए। चार दिन के बाद उस व्यक्ति ने सर्वेश को दो हज़ार दो सौ रूपए दिए।

सर्वेश बोला, “माफ़ करना पर आपने मुझे दो सौ रूपए ज्यादा दिए है।” उस व्यक्ति ने सर्वेश से बोला, “आपने मेरी जरुरत के समय मदद की थी जब मुझे कोई रूपए नहीं दे रहा था यह उसके लिए है। आप इसको रख लीजिये।” सर्वेश बहुत खुश हुआ और अपने घर पर अपनी बीवी के लिए मिठाई लेकर गया और उसने अपनी बीवी को सारी बात बताई।

इसके बाद बहुत से लोगों को पता चल गया की सर्वेश जरुरत के समय लोगो की पैसे देकर मदद करता है। सर्वेश अब पैसे से मदद करने के लिए कुछ रूपए चार्ज करने लगा। जिससे उसने कुछ समय में ही बहुत पैसे कमा लिए और वह अपने गांव में प्रसिद्ध हो गया। अब सर्वेश ने एक चाय की अच्छी दूकान खोल ली, लेकिन उसका मुख्य काम चाय बेचने की जगह पैसे उधार में देने का ज़्यादा हो गया। जिसके कारण वह अपने गांव के साथ साथ आस पास के गावों में भी प्रसिद्ध हो गया।

सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की कहानी

एक गाँव में एक किसान अपनी पत्नि के साथ रहता था। उनका एक छोटा सा खेत था, जहाँ वे दिन भर परिश्रम किया करते थे। किंतु कठोर परिश्रम के उपरांत भी कृषि से प्राप्त आमदनी उनके जीवन-यापन हेतु पर्याप्त नहीं थी और वे निर्धनता का जीवन व्यतीत करने हेतु विवश थे।

एक दिन किसान बाज़ार से कुछ मुर्गियाँ ख़रीद लाया। वह मुर्गियों के अंडे बेच कर पैसे कमाना चाहता था। अपनी पत्नि के साथ मिलकर उसने घर के आंगन में एक छोटा सा दड़बा बनाया और मुर्गियों को उसमें रख दिया।

सुबह होने पर जब उन्होंने दड़बे में झांककर देखा, तो आश्चर्यचकित रह गए। वहाँ एक सोने का अंडा पड़ा हुआ था। किसान सोने के अंडे को बेचकर अच्छे पैसे मिल गए।

अगले दिन फिर उन्हें सोने का अंडा मिला। किसान और उसकी पत्नि समझ गए कि उनकी मुर्गियों में से एक मुर्गी सोने का अंडा देती है। एक रात पहरेदारी कर वे सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को पहचान गए। उसके बाद से वे उसका ख़ास ख्याल रखने लगे। वह मुर्गी उन्हें रोज़ सोने का अंडा देती, जिसे बेचकर किसान कुछ ही महिनों में धनवान हो गया।

किसान अपने जीवन से संतुष्ट था। किंतु उसकी पत्नि लालची थी। एक दिन वह किसान से बोली, “आखिर कब तक हम रोज़ एक ही सोने का अंडा लेते रहेंगे। क्यों न हम मुर्गी के पेट से एक साथ सारे अंडे निकाल लें? फिर हम उन्हें बेचकर एक बार में इतने धनवान हो जायेंगे कि हमें काम करने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी।”

पत्नि की बात सुनकर किसान के मन में भी लालच आ गया। वह बाज़ार गया और वहाँ से एक बड़ा चाकू ख़रीद लाया।

रात में अपनी पत्नि के साथ वह मुर्गियों के दड़बे में गया और सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को पकड़कर उसका पेट चीर दिया। किंतु मुर्गी के पेट में सोने के अंडे नहीं थे। किसान और उसकी पत्नि अपनी गलती पर पछताने लगे। अधिक सोने के अंडों के लालच में पड़कर वे रोज़ मिलने वाले एक सोने के अंडे से भी हाथ धो बैठे थे।

“लालच बुरी बला है।”

टोपीवाला और बंदर की कहानी

एक गाँव में एक आदमी रहता था। टोपी बेचना उसका काम था। अपने गाँव के साथ ही वह आस-पास के दूसरे गाँवों में भी घूम-घूमकर टोपियाँ बेचा करता था। वह रोज़ सुबह एक बड़ी सी टोकरी में ढेर सारी रंग-बिरंगी टोपियाँ भरता और उसे सिर पर लादकर घर से निकल जाता। सांझ ढले सारी टोपियाँ बेचकर वह घर वापस आता था।

एक दिन अपने गाँव में टोपियाँ बेचने के बाद वह पास के एक दूसरे गाँव जा रहा था। दोपहर का समय था। वह थका हुआ था और उसका गला भी सूख रहा था। रास्ते में एक स्थान पर कुआँ देख वह रुक गया। कुएं के पास ही बरगद का एक पेड़ था, जिसके नीचे उसने टोपियों की टोकरी रख दी और कुएं से पानी निकालकर पीने लगा।

प्यास बुझ जाने के बाद उसने सोचा कि थोड़ी देर सुस्ताने के बाद ही आगे बढ़ना ठीक होगा। उसने टोकरी में से एक टोपी निकाली और पहन ली। फिर बरगद के पेड़ के नीचे गमछा बिछाकर बैठ गया। वह थका हुआ तो था ही, जल्दी ही उसे नींद आ गई।

वह खर्राटे मारते हुए सो रहा था कि शोर-शराबे से उसकी नींद उचट गई। आँख खुली, तो उसने देखा कि बरगद के पेड़ के ऊपर ढेर सारे बंदर उछल-कूद कर रहे हैं। वह यह देखकर चकित रहा गया कि उन सब बंदरों के सिर पर टोपियाँ थीं। उसने अपनी टोपियों की टोकरी की ओर दृष्टि डाली, तो सारी टोपियाँ नदारत पाई।

चिंता में वह अपना माथा पीटने लगा। सोचने लगा कि अगर बंदर सारी टोपियाँ ले गए, तो उसे बड़ा नुकसान हो जायेगा। उसे माथा पीटता देख बंदर भी अपना माथा पीटने लगे। बंदरों को नक़ल उतारने की आदत होती है। वे टोपीवाले की नक़ल उतार रहे थे।

बंदरों को अपनी नक़ल उतारता देख टोपीवाले को टोपियाँ वापस प्राप्त करने का एक उपाय सूझ गया। उपाय पर अमल करते हुए उसने अपने सिर से टोपी उतारकर फेंक दी। फिर क्या था? बंदरों ने भी अपनी-अपनी टोपियाँ उतारकर फ़ेंक दी। टोपीवाले ने झटपट सारी टोपियाँ टोकरी में इकठ्ठी की और आगे की राह पकड़ ली।

“सूझबूझ से हर समस्या का हल निकाला जा सकता है।”

लोमड़ी और अंगूर की कहानी

एक जंगल में एक लोमड़ी रहती थी। एक दिन वह भूखी-प्यासी भोजन की तलाश में जंगल में भटक रही थी। भटकते-भटकते सुबह से शाम हो गई, लेकिन उसे कोई शिकार न मिला।

शाम होते-होते वह जंगल के पास के एक गाँव में पहुँच गई। वहाँ उसे एक खेत दिखाई पड़ा। भूखी लोमड़ी खेत में घुस गई। वहाँ एक ऊँचे पेड़ पर अंगूर की बेल लिपटी हुई थी, जिसमें रसीले अंगूर के गुच्छे लगे हुए थे।

अंगूर देखते ही लोमड़ी के मुँह से लार टपकने लगी। वह उन रस भरे अंगूरों को खाकर अपनी भूख मिटाना चाहती थी। उसने अंगूर के एक गुच्छे को देखा और जोर से उछली। ऊँची डाली पर लिपटी अंगूर की बेल पर लटका अंगूर का गुच्छा उसकी पहुँच के बाहर था। वह उस तक पहुँच नहीं पाई।

उसने सोचा क्यों न एक बार और कोशिश की जाए। इस बार वह थोड़ा और ज़ोर लगाकर उछली। लेकिन इस बार भी अंगूर तक पहुँच नहीं पाई। कुछ देर तक वह उछल-उछल कर अंगूर तक पहुँचने की कोशिश करती रही। लेकिन दिन भर की जंगल में भटकी थकी हुई भूखी-प्यासी लोमड़ी आखिर कितनी कोशिश करती?

वह थककर पेड़ के नीचे बैठ गई और ललचाई नज़रों से अंगूर को देखने लगी। वह समझ कई कि अंगूर तक पहुँचना उसने बस के बाहर है। इसलिए कुछ देर अंगूरों को ताकने के बाद वह उठी और वहाँ से जाने लगी।

वह अंगूर खाने का विचार त्याग चुकी थी। पास ही एक पेड़ पर बैठा बंदर उसे बहुत देर से देख रहा था। उसे जाते हुए देख वह खुद को रोक नहीं पाया और पूछ बैठा, “क्या हुआ लोमड़ी बहन? वापस क्यों जा रही हो? अंगूर नहीं खाओगी?”

लोमड़ी रुकी और बंदर को देखकर फीकी मुस्कान से साथ बोली, “नहीं बंदर भाई। मैं ऐसे अंगूर नहीं खाती। ये तो खट्टे हैं।”

जब हम किसी चीज़ को प्राप्त नहीं कर पाते, तो अपनी कमजोरियाँ को छुपाने उस चीज़ में ही कमियाँ निकालने लग जाते हैं। जबकि हमें अपनी कमजोरियों को पहचान कर उसे दूर करना चाहिए और सूझ-बूझ से काम लेकर तब तक कोशिश करनी चाहिए, जब तक हम सफल न हो जायें। दूसरों पर दोष मढ़ने से जीवन में कुछ हासिल नहीं होता। हासिल होता है : कड़े परिश्रम और प्रयासों से।

डर के आगे जित है

एक बड़े से शहर में एक बहुत अमीर व्यापारी रहता था। उसे एक अजीब शौक था, वो अपने घर के अन्दर बने एक बड़े से स्विमिंग पूल में बड़े-बड़े रेप्टाइल्स (Reptiles) पाले हुए था। जिसमे एक से बढ़कर एक सांप, मगरमच्छ, आदि शामिल थे।

अपने जन्मदिन पर, उन्होंने एक बड़ी पार्टी आयोजित करने का फैसला किया। उसने अपने सभी दोस्तों और परिवार को बुलाया। पार्टी में खाने-पीने के बाद वो सभी मेहमानों को स्विमिंग पूल के पास ले जाता है और कहता है, “दोस्तों, आप इस पूल को देख रहे हैं, इसमें एक से एक खतरनाक जीव हैं, अगर आपमें से कोई इसे तैर कर पार कर ले तो मैं उसे ५० लाख रुपये दूंगा।

सभी लोग पूल की तरफ देखते हैं, पर किसी की भी हिम्मत नहीं होती है कि उसे पार करे। लेकिन तभी छपाक से आवाज होती है, और एक लड़का उसमे कूद जाता है,और मगरमच्छों, साँपों, इत्यादि से बचता हुआ पूल पार कर जाता है।

सभी लोग उसकी इस बहादुरी को देख हैरत में पड़ जाते हैं। अमीर व्यापारी को भी यकीन नहीं होता है कि कोई ऐसा कर सकता है; इतने सालों में किसी ने पूल पार करना तो दूर उसका पानी छूने तक की हिम्मत नहीं की।

वो उस लड़के को बुलाता है, “लड़के, आज तुमने बहुत ही हिम्मत का काम किया है, तुम सच- मुच बहादुर हो बताओ तुम कौन सा इनाम चाहते हो।”

“अरे, इनाम-विनाम तो मैं लेता रहूँगा, पहले ये बताओ कि मुझे धक्का किसने दिया था!!!” लड़का बोला।

रिस्क और आत्मविश्वास हमारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण होती है।

सफाई की परीक्षा

अज्जू का परिवार एक भिड़वाली शहर में रहता था। शहर काफी बड़ा था और इसलिए बहुत सरे लोग उसमे रहते थे। एक दिन अज्जू के दादी ने शहर जाकर कुछ दिन रहने का सोचा। वास्तव में अज्जू की दादी शहर के पास वाले गांव में रहती थी। लेकिन वह शहर साल में सिर्फ एक-दो बार अति थी।

“दादी माँ! मैं बहुत बहादुर बच्चा बन गया हूँ मुझे किसी से भी डर नहीं लगता। न छिपकली, न कॉकरोच और ना ही चींटियों से” अज्जू ने गाँव से आई अपनी दादी के सामने कॉलर ऊँचा करते हुए कहा।

“अरे वाह! लगता है अब तो तुम बहुत ही बहादुर बच्चे बन गए हो।” दादी ने भी उसे शाबाशी दी। “इस घर में आकर तुमने बहुत बड़ी गलती कर दी मिस्टर कॉकरोच अब तुम नहीं बचोगे।” अज्जू ने कॉकरोच को देखकर कहा और अभी कॉकरोच कहीं छिप पाता इससे पहले ही पट्ट!! की आवाज के साथ अज्जू ने उस पर चप्पल से वार कर दिया। कॉकरोच का कचूमर निकल गया। अज्जू के चेहरे पर विजयी मुस्कान तैर गई।

पिछले कई दिनों से दादी देख रही थी कि कभी चींटियों पर लक्षम्ण रेखा लगाकर, तो कभी मच्छर- मक्खियों को इलेक्ट्रॉनिक रैकेट से मारकर तो कभी छिपकली-कॉकरोच पर चप्पल-झाड़ू से वार करके अज्जू अपने आप को बहुत बहादुर समझ रहा था। आज भी वही हुआ। रसोई में कॉकरोच देखते ही माँ जोर से चिल्लाई और अज्जू ने चप्पल उसे मारने चला गया।

“रुको अज्जू! तुम्हारा यह तरीका बहुत ही अमानवीय है। इसे बहादुरी नहीं कहते यह तो क्रूरता है।” दादी ने उसे चप्पल मारने से पहले ही रोक दिया। “कैसे दादी! ये कीड़े-मकौड़े तो हमारे स्वास्थ्य के दुश्मन हैं ना? इन्हें तो मारना ही चाहिए वर्ना यह हमें बीमार कर देंगे।” अज्जू को दादी की बात सुनकर आश्चर्य हुआ।

“इसमें कोई शक नहीं है की यह हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, किन्तु इन्हें इस प्रकार मारना इसका समाधान नहीं है। हमें तो इनसे बचाव के रास्ते अपनाने चाहिये।” दादी ने उसके हाथ से चप्पल ले ली। अब तक कॉकरोच भी न जाने कहाँ आकर छिप गया था।

“सुनो अज्जू! अपने घर और आसपास साफ सफाई रखने से कीड़े-मकौड़ों का आना बहुत कम हो जाता है। फिर भी यदि कोई भूलाभटका आ ही जाये तो उसे भगा देना चाहिए। छिपकली और मच्छर- मक्खियों को रोकने के लिए खिड़की-दरवाजों की चिटकनी बंद रखो। चींटियों को हल्दी या टेलकम पाउडर से भगाया जा सकता है। कॉकरोच लौंग की गंध से भाग जाते हैं। लेकिन हाँ! स्वच्छता पर ध्यान देने की सबसे अधिक आवश्कयता है समझे तुम?” दादी ने प्यार से उसके गाल खींचे।

“जी दादी! समझ गया।” कहते हुए अज्जू ने चप्पल को चप्पल स्टेण्ड में रख दिया। और साबुन से अपने हाथ धोने लगा। और सब ने मिलकर घर की अच्छी तरीके से सफाई की।

कछुए का कवच

कछुआ कवच वाला परिचित प्राणी है। उसका कवच उसकी पीठ पर है, यह पीठ कछुए की रीड की हड्डी तथा शरीर को सुरक्षित रखता है। कवच का अंदरूनी भाग हड्डियों का बना हुआ होता है, और ऊपरी भाग हमारे नाखूनों जैसे कैरोटीन से। खतरे का आभास होते ही कछुआ अपना सिर चारों पैर और पूछ कवच के अंदर कर लेता है।

जैसे – जैसे कछुआ बड़ा होता है, वैसे – वैसे उसका कवच बड़ा हो जाता है।

कवच नदी तथा समुद्र किनारे रहने वाले केकड़े का भी होता है, लेकिन वह अलग प्रकार का होता है। केकड़े के बड़े होने पर उसका कवच बड़ा नहीं होता। उसे कवच निकालना पड़ता है, केकड़े का अपना पैर, सिर और आंख पुराने कवच से छुड़ाने पढ़ते हैं इसलिए वह कवच में पानी भरकर उसे फूलाना पड़ता है और धीरे-धीरे खुद को छुड़ाता है।

इस तरह उसकी पीठ पर नया मुलायम कवच तैयार होता है।

कवच थोड़ा सख्त होने पर वह पानी में छिपा रहता है।

पानी में रहने वाला एक और जीव है सिर्फ पानी में रहकर भी मछली नहीं होता। अंडे से बाहर आकर यह नन्हा जीव चारों तरफ कवच तैयार करता है। उसी कवच में वह जिंदगी भर रहता है।

कवच के वजन की वजह से शिप यहां से वहां बहकर नहीं जाता।

अपने कवच के साथ जन्म लेने वाले जीव है, घोंघा।

अंडे से बाहर निकलते ही उसपर कवच होता है, लेकिन यह कवच बहुत ही मुलायम होता है। उसे सख्त बनाने के लिए घोंघा जिस अंडे से निकलता है उसी के छिलके को खा जाता है। घोंघे का कवच उसके साथ – साथ बड़ा होता है। जन्म के समय जो कवच होता है वह घोंघे की पीठ के बीच में रहता है।

बाकी कवच उसके चारों ओर बढ़ता है, प्रकृति ने उसे यह वरदान दिया है।

बुद्धिमान अंशु

अंशु बहुत ही बुद्धिमान बालक था किन्तु साथ ही वह बहुत ही आलसी भी था। उसे सुबह देर तक सोना पसंद था जिस के कारण वह अक्सर स्कूल के लिए लेट हो जाता था। अंशु के पिता जी को सुबह जल्दी उठने की आदत थी।

एक रविवार अंशु के पिताजी ने उसे सुबह जॉगिंग को जाने के लिए उसे उठाया, पर अंशु का बिस्तर से उठने का बिल्कुल भी मन नहीं था। अत उसके पापा अकेले ही घूमने चले गये। थोड़ी देर घूमने के बाद वे घर वापिस चल दिये। घर वापस आते वक्त उन्हें रास्ते में पैसो से भरा बैग मिला।

उन्होंने बैग के मालिक को आस-पास ढूंढने की कोशिश की। लेकिन जब बैग का असली मालिक नहीं मिला तो अंशु के पिताजी ने बैग उठा लिया और अपने घर चले गए। घर आकर अंशु के पिताजी ने उसे उठाया और उसे पैसो से भरे बैग के बारे में बताते हुए कहा, “देखों मुझे जल्दी उठने पर पैसो से भरा बैग मिला। मै सुबह जल्दी उठा था इसलिए मुझे वह बैग मिला। सुबह जल्दी उठने से हमेशा भला होता है।”

लेकिन शैतान अंशु का दिमाग कुछ और कह रहा था वह बोला, “पिताजी जिस व्यक्ति का बैग खोया होगा वह निश्चित ही आपसे पहले जागा होगा। वह तो इस समय बैग खोने की वजह से रो रहा होगा। अगर वह अभी सो रहा होता तो उसका बैग खो नहीं जाता और वह निश्चित ही ज्यादा अमीर होता।” और यह कह, इससे पहले की अंशु के पिताजी कुछ कहते अंशु फिर से बिस्तर में घुस गया।

मूर्ख भालू की कहानी

एक जंगल में एक लालची भालू रहता था। वह हर समय ज्यादा की तलाश में रहता था। थोड़े से वह कभी संतुष्ट नहीं होता है। एक दोपहर जब वह सोकर उठा, तो उसे ज़ोरों की भूख लग आई। वह भोजन की तलाश में निकल पड़ा।

उस दिन मौसम साफ़ था। सुनहरी धूप खिली हुई थी। भालू ने सोचा, “कितना अच्छा मौसम है। इस मौसम में तो मुझे मछली पकड़नी चाहिए। चलो, आज मछली की ही दावत की जाए।”

ये सोचकर उसने नदी की राह पकड़ ली। नदी किनारे पहुँचकर भालू ने सोचा कि एक बड़ी मछली हाथ लग जाये, तो मज़ा आ जाये। उसने पूरी उम्मीद से नदी में हाथ डाला और एक मछली उसके हाथ आ गई। वह बहुत ख़ुश हुआ। लेकिन, जब उसने हाथ नदी से बाहर निकला, तो देखा कि हाथ लगी मछली छोटी सी है।

वह बहुत निराश हुआ। अरे इससे मेरा क्या होगा? बड़ी मछली हाथ लगे, तो बात बने। उसने वह छोटी मछली वापस नदी में फ़ेंक दी और फिर से मछली पकड़ने तैयार हो गया।

कुछ देर बाद उसने फिर से नदी में हाथ डाला और उसके हाथ फिर से एक मछली लग गई। लेकिन, वह मछली भी छोटी थी। उसने वह मछली भी यह सोचकर नदी में फेंक दी कि इस छोटी सी मछली से मेरा पेट नहीं भर पायेगा।

वह बार-बार नदी में हाथ डालकर मछली पकड़ता और हर बार उसके हाथ छोटी मछली लगती। वह बड़ी की आशा में छोटी मछली वापस नदी में फेंक देता। ऐसा करते-करते शाम हो गई और उसके हाथ एक भी बड़ी मछली नहीं लगी।

भूख के मारे उसका बुरा हाल हो गया। वह सोचने लगा कि बड़ी मछली के लिए मैंने कितनी सारी छोटी मछलियाँ फेंक दी। उतनी छोटी मछलियाँ एक बड़ी मछली के बराबर हो सकती थी और मेरा पेट भर सकता था।

“आपके पास जो है, उसका महत्व समझें। भले ही वह छोटी सही, लेकिन कुछ न होने से बेहतर है।”

दो बिल्लियों और बंदर की कहानी

दो बिल्लियों की आपस में अच्छी दोस्ती थी। वे सारा दिन एक-दूसरे के साथ खेलती, ढेर सारी बातें करती और साथ ही भोजन की तलाश करती थी।

एक दिन दोनों भोजन की तलाश में निकली। बहुत देर इधर-उधर भटकने के बाद उनकी नज़र रास्ते पर पड़ी एक रोटी पर पड़ी। एक बिल्ली ने झट से रोटी उठा ली और मुँह में डालने लगी।

तब दूसरी बिल्ली उसे टोककर बोली, “अरे, तुम अकेले कैसे इस रोटी को खा रही हो? हम दोनों ने साथ में इस रोटी को देखा था। इसलिए हमें इसे बांटकर खाना चाहिए।”

पहली बिल्ली ने रोटी तोड़कर दूसरी बिल्ली को दिया, लेकिन वह टुकड़ा छोटा था। यह देख उसे बुरा लगा और वह बोली, “अरे, ये टुकड़ा तो छोटा है। तुम्हें रोटी के बराबर टुकड़े करने चाहिए थे। तुम मेरे साथ बेइमानी कर रही हो।“

इस बात पर दोनों में बहस होने लगी। बहस इतनी बढ़ी कि दोनों लड़ने लगी। उसी समय वहाँ से एक बंदर गुजरा। उन्हें लड़ते हुए देख उसने कारण पूछा। बिल्लियों ने उसे सब कुछ बता दिया।

सारी बात जानकर बंदर बोला, “अरे इतनी सी बात पर तुम दोनों झगड़ रही हो। मेरे पास एक तराजू है। यदि तुम दोनों चाहो, तो मैं ये रोटी तुम दोनों में बराबर-बराबर सकता हूँ।”

बिल्लियाँ तैयार हो गई। बंदर एक तराजू लेकर आ गया। उसने बिल्लियों से रोटी ली और उसे तोड़कर तराजू ने दोनों पलड़े पर रखकर तौलने लगा। भूखी बिल्लियाँ उसे आस भरी नज़रों से देखने लगी।

तराजू के पलड़े पर रखी रोटी के टुकड़े में से एक टुकड़ा बड़ा और एक टुकड़ा छोटा था, जिससे पलड़ा एक तरफ़ झुक गया। तब बंदर बोला, “अरे ये क्या एक टुकड़ा दूसरे से बड़ा है। चलो मैं इसे बराबर कर देता हूँ।” उसने रोटी के बड़े टुकड़े को थोड़ा सा तोड़ा और अपने मुँह में डाल लिया।

अब दूसरा टुकड़ा पहले से बड़ा हो गया। बंदर ने अब उसे थोड़ा सा तोड़ा और अपने मुँह में डाल लिया। फिर तो यही सिलसिला चल पड़ा। रोटी को जो टुकड़ा बड़ा होता, वो बराबर करने बंदर उसे तोड़कर खा जाता।

ऐसा करते-करते रोटी के बहुत छोटे-छोटे टुकड़े रह गये। अब बिल्लियाँ घबरा गई। उन्हें लगने लगा कि ऐसे में तो उनके हिस्से कुछ भी नहीं आयेगा। वे बोली, “बंदर भाई, तुम भी क्या परेशान होते हो। लाओ अब हम इसे ख़ुद ही आपस में बांट लेंगी।”

बंदर बोला, “ठीक है। लेकिन अब तक जो मैंने मेहनत की है, उसका मेहताना तो लगेगा ना। इसलिए रोटी के ये टुकड़े मेरे।” और उसने रोटी के शेष टुकड़े अपने मुँह में डाल लिए और चलता बना।

बिल्लियाँ उसे देखती रह गई। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो चुका था। वे समझ गई कि उनकी आपसी फूट का लाभ उठाकर बंदर उन्हें मूर्ख बना गया। उसी समय उन्होंने निर्णय लिया कि अब कभी झगड़ा नहीं करेंगी और प्रेम से रहेंगी।

“मिलजुलकर रहे। अन्यथा, आपसी फूट का फ़ायदा कोई तीसरा उठा लेगा।”

जादुई पत्थर की सिख

उदयपुर में एक जयवंत नाम का किसान था, उसके पास एक बड़ा सा खेत था। उस खेत के बीचो-बिच पत्थर का एक हिस्सा ज़मीन से ऊपर निकला हुआ था। उस पत्थर से ठोकर खाकर वह कई बार गिरकर चोट भी लगी थी और ना जाने कितनी ही बार उससे टकराकर खेती के औजार भी टूट चुके थे।

हर दिन की तरह आज भी वह सुबह-सुबह खेती करने पहूंचा। कुछ देर खेती करने के बाद जयवंत का हल उस पत्थर से टकराकर टूट गया और उसे सँभालते-सँभालते जयवंत भी गिर गया।

जयवंत को बहुत गुस्सा आया। उसने मन ही मन सोचा की आज जो भी हो जाए वह इस चट्टान को ज़मीन से निकाल कर उसकी खेत से बाहर फेंक देगा।

वह गुस्से में तुरंत अपने गांव गया और ५-६ गांव वालो को चट्टान का पत्थर हटाने के लिए बुलाया और सभी को लेकर वह अपने खेत में आ गया।

जयवंत बोला, “दोस्तों, इस चट्टान ने मुझे वर्षों से भारी नुकसान पहुँचाया है। और आज मैं इसे तुम सब की मदद से हमेशा के लिए इस चट्टान के पत्थर को मेरे खेत से बाहर निकलना चाहता हूँ।”

ऐसा कहते ही जब गांववालों ने फावड़े से पत्थर के किनार पर वार करने लगे। पर उन लोगों ने फावड़ा एक-दो ही बार मारा था की वह पत्थर पूरा का पूरा ज़मीन से बाहर आ गया। वे सब हस्ते हुए कहने लगे, “तुमने तो कहा था की खेत के बिच एक बड़ा सा पत्थर दबा हुआ है, पर ये तो एक मामूली सा पत्थर निकला।

यहां तक ​​कि जयवंत भी पत्थर को देखकर चौंक गया। इतने सालों तक उसने वह पत्थर बड़ा होगा सोचकर नहीं निकला था।

उसे पछतावा हुआ की यदि उसने उस पत्थर को पहले हटाने की कोशिश की होती तो उसका नुकसान कभी नहीं होता। हम हमेशा सोचते हैं कि हमारी समस्याएं बड़ी हैं, लेकिन याद रखें कोशिश करने से सबका हल निकाल जाता है।

दादी की होशियारी

मनु अपने दादा-दादी और अपने परिवार के साथ शहर में रहता था। मनु अपने दादा-दादी से बहुत प्यार करता था। मनु का बर्थडे आनेवाला था और दादी जी उसे साइकिल गिफ्ट देना चाहती थी। दादी ने अपने बटुए में रुपए गिनकर देखे तो तीन हजार रुपये कम पड रहे थे।

उसके पास ए टी एम कार्ड तो था नहीं कि झटपट जाकर पैसे निकाल लेती और अगर वह घर के किसी दूसरे सदस्य को भेजती है तो बर्थडे गिफ्ट का सरप्राइस फिर सरप्राइस नहीं रह जाता, यह सोचकर दादी जी अपना अपने आप खुद धीरे-धीरे बैक पहुंच गई।

बैंक में बहुत भीड़ थी और लंबी लंबी लाइन लगी थी। दादी जी लाइन में जाकर खड़ी हो गई। काफी देर के बाद जब उनका नंबर आया तो काउंटर पर बैठी लडकी को उसने तीन हजार रुपए निकालने के लिए चेक जमा किया।

बैंक में काम कर रही लड़की ने चेक को देखा और झल्लाकर वापस दादी के हाथों में थमाते हुए बोली, “अरे आप लोग छोटी छोटी रकम निकालने के लिए हमें क्यों परेशान करती हैं, देखती नहीं, कितनी लंबी लाइन है। जाइये, एटीएम से पैसे निकाल लीजिए।”

इसपर दादी ने कहा, “बेटी मेरे पास एटीएम कार्ड नहीं है और मुझे सिर्फ तीन हजार रुपयों की ही जरूरत है।” लेकिन लड़की बूढ़ी दादी की कोई बात सुनने को राजी नहीं हुई और बड़ी कठोरता से जवाब देते हुए बोली, “इतनी छोटी रकम देने के लिए मैं खाली नहीं बैठी हूँ। आप हटिया यहां से, दूसरे को काउंटर पर आने दीजिये।”

बूढ़ी दादी ने तब दो पल सोचा और फिर तुरंत चेक बुक निकालते हुए कहा, “ठीक है बेटी, मुझे मेरे अकाउंट में जमा चालीस हज़ार रुपये पूरे के पूरे अभी निकाल कर दो।” लड़की ने चुपचाप चालीस हजार दादी को पकड़ा दिए।

दादी ने उसमें से तीन हजार रुपए अपने बेग में रखें और बाकी सैंतीस हजार उस लडकी को वापस देते हुए बोली, “जब छोटी रकम मांगा तो तुमने नहीं दिया, जब कि मुझे पता है कि कोई भी बैंक किसी भी सीनियर सिटीजन को इन बातों के लिए मना नहीं कर सकती है। अब कम से कम यह सैंतीस हजार रुपए वापस जमा करने के लिए मना तो नहीं करोगी ना?”

काउंटर पर बैठी लड़की ने शर्म से सर झुकाते हुए “सॉरी मैम” कहा और दादी के बचे हुए सैंतीस हज़ार बैंक में जमा कर दिए।

बुरी संगत का नतीजा

रतनलाल सेठ का एक बड़ासा फलों का बगीचा था और उसके दो बेटे थे। एक बेटा अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए विदेश गया था और दूसरा छोटा बेटा आदित्य गांव में ही पढ़ाई करता था।

घर में आदित्य को माँ-बाप से बहुत प्यार मिला था। वह ज्यादातर अपना समय फलों के बाग के में बीतता था। वहाँ उसके दो-चार मित्र बन गए थे। उनकी संगति में आदित्य बिगड़ने लगा था। उसे चोरी करने और जुआ खेलने की आदत पड़ गई थी।

एक दिन सेठ रतनलाल ने आदित्य को जुआ खेलते हुए देख लिया। वहाँ तो उन्होंने आदित्य से कुछ नहीं कहा, पर घर आकर दे चिंता में डूब गए। आदित्य के लौटने पर उन्होंने कहा, “बेटा! जुआ खेलना अच्छी आदत नहीं है। यह तुम्हें बरबाद कर देगा।’” आदित्य पर पिता की बातों का कोई असर नहीं हुआ। अंत में सेठ रतनलाल को एक युक्ति सूझी।

एक दिन वे आदित्य को लेकर आम के बगीचे में पहुँचे। उन्होंने माली से आम तोड़ने के लिए कहा। माली ने आम को तोड़कर एक टोकरी में रख

दिया। सेठ ने आदित्य से कहा, “आदित्य! आम की टोकरी को घर ले जाओ। तीन दिन बात तुम्हारी मौसी आयेगी तब आम का आनंद लेंगे।”

रतनलाल ने एक खराब आम उठा लाए। उसे आदित्य को देते हुए उन्होंने कहा, “इसे भी उन्हीं आम के साथ रख दो।” आदित्य ने वैसे ही किया। उसने आम की टोकरी को घर लाकर रख दिया।

तीन दिन मौसी आ गई। रतनलाल सेठ ने भोजन करने के बाद आदित्य से आम लाने को कहा। आदित्य ने टोकरी उठाई तो देखा कि सब आम सड़ चुके थे। वह बहुत हैरान हुआ। रतनलाल सेठ भी उसके पीछे-पीछे वहाँ आ गए थे। आदित्य ने पूछा कि, “यह कैसे हो गया पिताजी?”

रतनलाल ने कहा, “बेटा! एक खराब आम ने इन बाकि के अच्छे आम को अपने जैसा ही बना दिया है। इसी तरह जो लड़का बुरे लड़कों की संगति करता है। वह भी बुरा बन जाता है।’” पिता की बात आदित्य के दिमाग में बैठ गई।

उसे महसूस हुआ कि उसके पिता उसे क्या सिखाना चाहते थे। उसने बुरे लड़कों की संगति हमेशा के लिए छोड़ दी।

दिल की सुने या दिमाग की

एक बार शुभम ने संध्या सात बजे अपने पापा से कहा, “कल सुबह पांच बजे मुझे उठा दीजिएगा, मैं मॉर्निंग वॉक पर जाऊंगा।”

लेकिन इतना कहते ही उसके दूसरे मन ने दस्तक दी, “क्यों कह दिया पांच बजे उठाने को? मालूम नहीं कल कॉलेज में प्रैक्टिकल है?

इतनी जल्दी उठोगे तो प्रैक्टिकल में सो नहीं जाओगे?”

तभी तीसरा मन आ गया, “क्या बात करते हो, उठना ही चाहिए। सुबह सबकुछ एकबार रिवाइझ कर लोगे तो प्रैक्टिकल और अच्छा जाएगा।”

पर जब रात नौ बजे उसने खाना खा लिया तो उसे सुस्ती चढ़ गई। सुस्ती चढ़ते ही चौथे मन ने द्वार खटखटाया, “नहीं उठना अपने को सुबह-सुबह।”

शुभम ने पापा को उठाने से मना कर दिया। रात को टी.वी. वगैरह देखकर जब ग्यारह बजे वह सोने गया तब तक उसके खाने की सुस्ती काफी हृद तक कम हो चुकी थी। बस पांचवें मन ने पुकारा, “सुबह उठना ही है। सुबह-सुबह परीक्षा की तैयारी नहीं करी तो कहीं रिजल्ट न गड़बड़ा जाए।” बस तुरंत उसने पापा से फिर उठाने की अनुरोध कर दिया।

पर सुबह में जैसे ही पापा ने पांच बजे उठाया कि उसका छठा मन गुस्सा कर बैठा, “यह कोई वक्त है उठाने का? क्या अभी उठकर प्रैक्टिकल में दिनभर सोता रहूं?”

पापा भी परेशान हो गए। खुद ही उठाने को कहता है और उठाने पर गुस्सा भी करता है। शुभम फिर सो गया। लेकिन फिर मजा तो यह कि सुबह उठकर तथा नहा-धोकर जब वह नाश्ता करने बैठा तो उसे अपने न उठने पर बड़ा पछतावा हुआ। उसने अपने पापा से कहा, “नींद।

में भले ही मैं लाख मना करूं, पर आपको तो मुझे झकझोर कर उठा ही देना चाहिए था। आपको तो पता है मेरा प्रैक्टिकल एक्झाम है।”

अब पापा क्या कहें? उन्होंने अपना माथा ठोक लिया।

अशिक्षित राजा

धनकपुर में एक राजा था। उसे पढने-लिखने का बहुत शौक था, पर प्रजा की सेवा करते-करते उसे कभी पड़ने का समय नहीं मिला।

एक दिन उसने थान लिया की कुछ भी हो जाए वह इस बार जरूर पढ़ेगा। उसने मंत्री-परिषद् के माध्यम से अपने लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की। शिक्षक राजा को पढ़ाने के लिए आने लगा।

राजा को शिक्षा ग्रहण करते हुए कई महीने बीत गए थे, मगर राजा को इसका कोई लाभ नहीं हो रहा था। राजा का गुरु तो रोज खूब मेहनत करता थे, परन्तु राजा को उस शिक्षा का कोई फ़ायदा नहीं हो रहा था।

राजा बड़ा परेशान होने लगा उसके कुछ समाज में नहीं आ रहा था, गुरु की प्रतिभा और योग्यता पर सवाल उठाना भी गलत था क्योंकि वो एक बहुत ही प्रसिद्द और पढ़ाने-लिखाने में योग्य गुरु थे। राजा को बहुत दिन से परेशान देखकर आखिर में एक दिन रानी ने राजा को सलाह दी कि राजन आप इस सवाल का जवाब गुरु जी से ही पूछ कर देखिये।

एक दिन राजा ने बड़ी हिम्मत करके गुरूजी से पूछा, “गुरूजी, क्षमा कीजियेगा, पर मैं कई महीनो से आपसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूँ। बहुत से लोग आपके शिक्षण का ज्ञान आसानी से पाते है, पर मुझे इसका कोई लाभ नहीं हो रहा है। ऐसा क्यों है?”

गुरु जी ने बड़े ही शांत स्वर में जवाब दिया, “राजन बात बहुत छोटी है परन्तु आप अपने ‘बड़े’ होने के अहंकार के कारण इसे समझ नहीं पा रहे हैं और परेशान और दुखी हैं। माना कि आप एक बहुत बड़े राजा हैं।

पर जब आप किसी से शिक्षा लेते है, तब आप उस समय आप एक शिष्य बन जाते हैं और सीखने वाला गुरु। गुरु का स्थान हमेशा उच्च होना चाहिए, परन्तु आप स्वंय ऊँचे सिंहासन पर बैठते हैं और मुझे अपने से नीचे के आसन पर बैठाते हैं।”

“आप मुझसे महान बन गए है और मैं अपने निचे, जिससे आपको न तो कोई शिक्षा प्राप्त हो रही है और न ही कोई ज्ञान मिल रहा है” राजा की समझ में सारी बात आ गई और उसने तुरंत अपनी गलती को स्वीकारा और गुरुवर से उच्च शिक्षा प्राप्त की।

हमेशा याद रखें कि गुरु का स्थान हमेशा ऊपर होता है।

मनहूस पेड़

बहुत वर्षों की मेहनत के बाद एक किसान ने एक सुन्दर बागीचा बनाया। बागीचे के बीचो-बीच एक बड़ा सा पेड़ था जिसकी छाँव में बैठकर सुकून का अनुभव होता था।

एक दिन किसान का पड़ोसी आया, बागीचा देखते ही उसने कहा, ” अरे क्या तुम नहीं जानते, इस प्रजाति के पेड़ मनहूस माने जाते हैं, ये जहाँ होते हैं, वहां अपने साथ दुर्भाग्य लाते हैं। इस पेड़ को जल्दी से जल्दी यहाँ से हटाओ।” पडोसी बोला।

यह बोलकर पडोसी तो चला गया पर किसान परेशान हो गया। उसे डर लगने लगा कि कहीं इस पेड़ की वजह से उसके साथ कुछ अशुभ न हो जाए। अगले ही दिन उसने वो पेड़ काट डाला। पेड़ बड़ा था, उसकी कटी लकड़ियाँ पूरे बागीचे में जहाँ -तहाँ इकठ्ठा हो गयीं।

अगले दिन फिर वही पड़ोसी आया और बोला, “इतने सुन्दर बागीचे में ये बेकार की लकड़ियाँ क्यों इकठ्ठा कर रखी हैं। ऐसा करो इन्हे मेरे अहाते में रखवा दो।” लकड़ियाँ रखवा दी गयीं। किसान ने पडोसी की बातों में आकर पेड़ तो कटवा दिया, पर अब उसे एहसास होने लगा कि पडोसी ने लकड़ियों की लालच में आकर उससे ऐसा करवा दिया।

दुखी मन से वह एक साधु के पास पहुंचा और पूरी बात बता दी। साधु महाराज मुस्कुराते हुए बोले, “तुम्हारे पड़ोसी ने सच ही तो कहा था, वो पेड़ वास्तव में मनहूस था, तभी तो वो तुम्हारे जैसे मूर्ख के बागीचे में लगा था।” यह सुन किसान का मन और भी भारी हो गया। “अच्छी बात ये है कि तुम अब पहले जैसे मूर्ख नहीं रहे। तुमने पेड़ तो गँवा दिया पर उसके बदले में एक कीमती सबक सीख लिया है। जब तक तुम्हारी अपनी समझ किसी बात को ना स्वीकारे तब तक दुसरे की सलाह पर कोई कदम मत उठाना।”

चूहों का शहर

एक शहर के बहुत बड़े होटल में सैकड़ों चूहे रहते थे। वे चारों ओर उछल-कूद करते हुए अपना पेट आराम से भर लेते थे और फिर जब उन्हें खतरा दिखाई देता तो बिल में जाकर छिप जाते थे।

एक दिन उस होटल में न जाने कहाँ से एक बिल्ली आ गई। बिल्ली की नज़र जैसे ही चूहों पर पड़ी तो उसके मुँह में पानी आ गया। बिल्ली ने उन चूहों को खाने के विचार से उसी होटल में अपना डेरा डाल दिया। बिल्ली को जब कभी भूख लगती तो वह अँधेरे स्थान में छिप जाती और जैसे ही चूहा बिल से बाहर आता तो उसे मारकर खा जाती।

अब तो बिल्ली रोज चूहों का भोजन करने लगी। इस प्रकार वह कुछ ही दिनों में मोटी-ताजी हो गई। बिल्ली के आ जाने से चूहे दुःखी हो गए। धीरे-धीरे चूहों की संख्या कम होती देख वे भयभीत हो गए। चूहों के मन में बिल्ली का डर बैठ गया। बिल्ली से बचने का कोई उपाय खोजने के लिए सभी चूहों ने मिलकर एक सभा का आयोजन किया।

सभा में सभी चूहों ने अपने-अपने विचार प्रस्तुत किए, लेकिन कोई भी प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास नहीं हो सका। सभी चूहों में निराशा फैल गई। तब एक बूढ़ा चूहा अपने स्थान पर खड़ा होकर बोला, “भाइयो सुनो, मेरे पास एक सुझाव है, जिस से हमारी समस्या का हल निकल सकता है।

यदि हमें कहीं से एक घंटी और धागा मिल जाए तो हम घंटी को बिल्ली के गले में बाँध देंगे। जब बिल्ली चलेगी तो उसके गले में बँधी हुई घंटी भी बजने लगेगी। हम घंटी की आवाज़ सुनते ही सावधान हो जाएँगे और अपने-अपने बिल में जाकर छिप जाएंगे।”

बूढ़े चूहे का यह सुझाव सुनकर सभी चूहे ख़ुशी से झूम उठे और अपनी ख़ुशी प्रकट करने के लिए वे नाचने-गाने लगे। चूहों का विचार था कि अब उन्हें बिल्ली से हमेशा के लिए मुक्ति मिल जाएगी और वे फिर से निडर होकर घूम सकेंगे।

तभी एक अनुभवी चूहे ने कहा, “चुप रहो, तुम सब मुर्ख हो। तुम इस तरह तरह खुशियाँ मना रहे हो, जैसे तुमने कोई युद्ध जीत लिया हो। क्या तुमने सोचा है कि बिल्ली के गले में जब तक घंटी नहीं बंधेगी तब तक हमें बिल्ली से मुक्ति नहीं मिल सकती। तो कौन बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा?” अनुभवी चूहे की बात सुनकर सारे चूहे मुँह लटकाकर बैठ गए। उनके पास अनुभवी चूहे के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं था।

तभी उन्हें बिल्ली के आने की आहट सुनाई दी और सारे चूहे डरकर अपने-अपने बिलों में घुस गए।

जीवन की बचत

सवनपुर गांव में एक किसान था। इस साल कम बारिश होने के कारण उसकी फसल कम होने की वजह से चिंतित था। घर में राशन ग्यारह महीने चल सके उतना ही था। बाकी एक महीने का राशन का कहां से इंतजाम होगा। यह चिंता उसे बार बार सता रही थी।

किसान की बेटी का ध्यान जब इस ओर गया तो उसने पूछा, “पिताजी आजकल आप किसी बात को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं, क्यों क्या हुआ?।” तब किसान ने अपनी चिंता का कारण अपनी बेटी को बताया। किसान की बात सुनकर उसकी बेटी ने उन्हें आश्वासन दिया कि वह किसी बात की चिंता न करें। उस एक महीने के लिए भी अनाज का इंतजाम हो जाएगा।

जब पूरा वर्ष उनका आराम से निकल गया तब किसान ने पूछा कि आखिर ऐसा कैसे हुआ। बेटी ने कहा, “पिताजी जबसे आपने मुझे राशन के बारे में बताया तभी से मैं जब भी रसोई के लिए अनाज निकालती उसी में से एक दो मुट्ठी हर रोज वापस कोठी में डाल देती। बस उसी वजह से बारहवें महीने का इंतजाम हो गया।”

जीवन में बचत की आदत डालनी चाहिए।

ज्ञान की नौका

नदी पार करने के लिए कई लोग एक नौका में बैठे थे। धीरे-धीरे नौका सवारियों के साथ सामने वाले किनारे की ओर बढ़ रही थी, राहुल जो पढ़ाई में बहुत अच्छा था और वह गाँव का सबसे अधिक शिक्षित व्यक्ति था, वो भी नौका में बैठा था। राहुल ने नाविक से पूछा, “आपने अपने जीवन में कितनी पढ़ाई की है?” भोला- भाला नाविक बोला, “ज्यादा नहीं जानता लेकिन मुझे लगता है कि मैंने 5वीं तक पढ़ाई की है।”

राहुल ने दिखावा करते हुए कहा, “मैंने 15वीं तक पढ़ाई की है। तुम्हारी आधी भर जिंदगी पानी में गई।” फिर राहुल ने दूसरा प्रश्न किया, “क्या आप हमारे देश का इतिहास जानते हैं? क्या आप विज्ञान जानते हैं? गणित?” नाविक ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की तो राहुल ने हस्ते हुए कहा, “ये भी नहीं जानते तुम्हारी तो पौनी जिंदगी पानी में गई।”

ऐसे करते-करते ररहुल ने नाविक से बहुत सरे सवाल पूछे जिसका वह एक भी जवाब नहीं दे पाया। तभी अचानक नदी में प्रवाह तीव्र होने लगा। नाविक ने सभी को तूफान की चेतावनी दी, और राहुल से पूछा “नौका तो तूफान में डूब सकती है, क्या आपको तैरना आता है?” राहुल ने गभराहट में बोला “मुझे तो तैरना-वैरना नहीं आता है”

नाविक ने स्थिति भांपते हुए कहा, “तब तो समझो आपकी पूरी जिंदगी पानी में गयी।” कुछ ही देर में नौका पलट गई। और राहुल बह गए।

प्यासा कौआ की कहानी

गर्मियों के दिन थे। एक कौआ प्यास से बेहाल था और पानी की तलाश में यहाँ-वहाँ भटक रहा था। किंतु कई जगहों पर भटकने के बाद भी उसे पानी नहीं मिला।

वह बहुत देर से उड़ रहा था। लगातार उड़ते रहने के कारण वह बहुत थक कर चूर हो चुका था। उधर तेज गर्मी में उसकी प्यास बढ़ती जा रही थी। धीरे-धीरे वह अपना धैर्य खोने लगा। उसे लगने लगा कि अब उसका अंत समय निकट है। आज वह अवश्य मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा।

थकान के कारण अब उससे उड़ा नहीं जा रहा था। कुछ देर आराम करने वह एक मकान की छत पर बैठ गया। वहाँ उसने देखा कि छत के एक कोने में घड़ा रखा हुआ है। घड़े में पानी होने की आस में वह उड़कर घड़े के पास गया और उसके अंदर झांक कर देखा।

कौवे ने देखा कि घड़े में पानी तो है, किंतु इतना नीचे है कि उसकी चोंच वहाँ तक नहीं पहुँच सकती थी। वह उदास हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे घड़े में रखे पानी तक पहुँचे। लेकिन फिर उसने सोचा कि उदास होने से काम नहीं चलेगा, कोई उपाय सोचना होगा।

घड़े के ऊपर बैठे-बैठे ही वह उपाय सोचने लगा। सोचते-सोचते उसकी दृष्टि पास ही पड़े कंकड़ो के ढेर पर पड़ी। फिर क्या था? कौवे के दिमाग की घंटी बज गई। उसे एक उपाय सूझ गया।

बिना देर किये वह उड़कर कंकडों के ढेर पर पहुँचा और एक उनमें से एक कंकड़ अपनी चोंच से उठाकर घड़े तक लाकर घड़े में डाल दिया। वह एक-एक कंकड़ अपनी चोंच से उठाकर घड़े में लाकर डालने लगा। कंकड़ डालने से घड़े का पानी ऊपर आने लाग। कुछ देर में ही घड़े का पानी इतना ऊपर आ गया कि कौआ उसमें चोंच डालकर पानी पी सकता था। कौवे की मेहनत रंग लाई थी और वह पानी पीकर तृप्त हो गया।

“चाहे समय कितना ही कठिन क्यों न हो, धैर्य से काम लेना चाहिए और उस कठिनाई से निकलने के लिए बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए। धैर्य और बुद्धि से हर समस्या का निवारण संभव है। “

बिल्ली के गले में घंटी कहानी

एक शहर में एक बहुत बड़ा मकान था। उस मकान में चूहों ने डेरा जमा रखा था। जब भी मौका मिलता वे अपने-अपने बिलों से निकलते और कभी खाने की चीज़ों पर अपना हाथ साफ़ करते, तो कभी घर की अन्य चीज़ें कुतर देते। उनका जीवन बड़े मज़े से बीत रहा था।

इधर मकान मालिक चूहों से तंग आ चुका था। इसलिए वह एक बड़ी सी बिल्ली ले आया। अब वह बिल्ली उसी घर में रहने लगी। बिल्ली के आने से चूहों का जीना हराम हो गया। जो भी चूहा बिल से निकलता, वह उसे चट कर जाती।

चूहों का बिलों से निकलना मुश्किल हो गया। वे डर के मारे बिल में ही घुसे रहते। बिल्ली उनके लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन गई थी। इसलिए एक दिन चूहों की सभा बुलाई गई।

सभा में सभी चूहे उपस्थित हुए। लीडर चूहे ने कहा, “साथियों, आप सब जानते ही हैं कि हम लोग बिल्ली हमारे लिए आफत बन गई है। वह रोज़ हमारे किसी न किसी साथी को मारकर खा जाती है। बिलों से निकलना मुश्किल हो गया है। लेकिन हम कब तक बिल में छुपकर रहेंगे। भोजन की खोज में हमें बिल से बाहर निकलना ही होगा। यह सभा इसलिए बुलाई ई है, ताकि इस समस्या को हल किया जा सके। आप एक-एक कर अपने सुझाव दे सकते हैं।”

एक-एक कर सभी चूहों से इस सुझाव दिए। अंत में एक चूहा उठा और चहकते हुए बोला, “मेरी दिमाग में अभी-अभी एक बहुत ही बढ़िया उपाय आया है। क्यों न हम बिल्ली के गले में एक घंटी बांध दें? बिल्ली जब भी आस-पास होगी, घंटी की आवाज़ से हमें पता चल जायेगा और हम वहाँ से भाग जायेंगे। कहो कैसा लगा उपाय?”

सारे चूहों को ये उपाय बहुत पसंद आया। वे ख़ुशी में नाचने और झूमने लगे।

तभी एक बूढ़ा और अनुभवी चूहा खड़ा हुआ और बोला, “मूर्खों, नाचना-गाना बंद करो और ज़रा ये तो बताओ कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा?”

ये सुनना था कि चूहों का नाचना-गाना बंद हो गया। बिल्ली के गले में घंटी बांधना अपनी जान से हाथ धोना था। कोई इसके लिए तैयार नहीं हुआ। सब चुप गए। तभी उन्हें बिल्ली के कदमों की आहट सुनाई पड़ी और फिर क्या था? सब सिर पर पैर रखकर अपने-अपने बिलों की ओर भाग खड़े हुए।

“योजना बनाने का कोई लाभ नहीं, यदि उसे लागू न किया जा सके।”

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