दोस्तों, आज की इस पोस्ट में हम बच्चों के लिए Birds Stories in Hindi में लेकर आये है। दोस्तों यह stories बहुत Interesting है। आपको इन stories को पढ़ कर बहुत मजा आएगा । उम्मीद है कि आपको यह stories पसंद आयेगी। 

Birds Stories in Hindi

Birds Stories in Hindi List

एक समझदार उल्लू

माँ, बत्तख

अंधा गिद्ध और दुष्ट बिल्ली की कहानी

गौरैया और हाथी

कौवा और मोर

छोटी लाल मुर्गी

गौरैया और बंदर

कौवा, हिरण और लोमड़ी

तितली और कोकून

सोने का अंडा

मूर्ख बगुला और नेवला

टिटहरी का जोड़ा और समुद्र का अभिमान

कौवे और उल्लू के बैर

कबूतर का जोड़ा और शिकारी

पक्षियों का राजा

प्यासा कौआ

शेर, ऊँट, सियार और कौवा

चींटी और कबूतर

चालाक मुर्गे और गीदड़

सबसे खुश पक्षी

बाज़ और चूज़ों

बगुला भगत

कौवा और सांप

किसान और सारस

किसान और चिड़िया

बुद्धिमान तोता

ख़रगोश, तीतर और धूर्त बिल्ली

चमगादड़, पशु और पक्षी की कहानी

भेड़िये और सारस

मोर और नीलकंठ

दो चिड़ियों की कहानी

एक समझदार उल्लू

एक बार की बात है, एक बड़ा पेड़ में एक उल्लू रहता। वह रोज अपने आसपास घटने वाली घटनाओं को पेड़ पे बैठकर देखता था।

कॉल उन्होंने एक लड़के को देखा जो एक बूढ़े आदमी का help कर रहा था। और आज उसने देखा एक लड़की को जो कि अपनी मां से चिल्लाते हुए बात कर रही थी। उल्लू बिल्कुल चुप रहता था।

और बहुत कुछ पेड़ पे बैठकर देखता था। जैसे जैसे दिन बिताते गया उल्लू कम बोलते गया लेकिन अधिक सुना। बूढ़े उल्लू ने लोगों को बातें करते और कहानी सुनाते हुए सुना।

उल्लू सुना एक लड़की ने बोला एक हाथी एक बाड़ पर कूद गया। वह फिर सुना एक युवा लड़के ने कहा वह कभी भी गलती नहीं किए।

बूढ़े उल्लू अभी तक पेड़ में बैठकर लोगों के बीच घटती हुई घटनाओं को देखता और सुनता रहा। कुछ लोग ऐसे थे जो बेहतर हो गया और कुछ लोग ऐसे थे जो खराब हो गया।

लेकिन बूढ़ा उल्लू रोज पेड़ मैं बैठकर,चुप रहकर और भी समझदार बनते जा रहा था।

शिक्षा: कम बात करें और अधिक सुने, यह हमें बुद्धिमान बना देगा।

माँ, बत्तख

एक दिन, एक मां बत्तख और उसकी छोटी छोटी बत्तियाँ झील पर जा रही थी। बत्तखें अपनी मां के साथ रास्ते से चलते हुए बहुत खुश थे।

अचानक मां ने देखा कि, एक लोमड़ी दूर से बच्चों को देख रहा है। वह भयभीत थी और चिल्ला रही थी। “बच्चे जल्दी जेल में जाओ, एक लोमड़ी आ रहा है।”

बत्तखें झील की और भागी। मां ने सोचा कि अभी क्या करना है? फिर वह एक पंख को जमीन पर घसीटते हुए, आगे पीछे चलने लगी।

जब लोमड़ी ने उसे देखा, तो वह बहुत खुश हो गई। उन्होंने सोचा, “ऐसा लगता है कि वह आहत है, और उड़ नहीं सकते हैं।

मैं आसानी से उसे पकड़ सकता हूं, और खा सकता हूं।” फिर लोमड़ी उसकी ओर भागा। माँ, बत्तख भाग गई और लोमड़ी को झील की ओर ले गई।

लोमड़ी ने उसका पीछा किया। मां ने सोचा, अब वह अपनी बत्तख को नुकसान नहीं पहुंचा पाएगा। माँ बत्तख ने अपनी बच्चों की और देखा।

और देखा कि, वह झील पर पहुंच गए हैं। वह निश्चिंत थी, इसलिए वह रुक गई और एक गहरी सांस ली। लोमड़ी ने सोचा कि वह थक गई है।

और वह करीब आ गई, लेकिन मां ने जल्दी से अपनी पंख फैलाए और हवा में उड़ गई। वह झील के बीच में उतरा और उसकी बत्तखें के उसकी पास तैर गई।

लोमड़ी ने मां को और उसकी बत्तखें को देख रहा था। लोमड़ी उन तक नहीं पहुंच सका, क्योंकि वह झील के बीच में थे।

अंधा गिद्ध और दुष्ट बिल्ली की कहानी

गोदावरी नदी के तट पर सेमल का एक विशाल वृक्ष था। उस वृक्ष पर कई पक्षी निवास करते थे। दिन में वे भोजन की तलाश में खेत-खलिहानों में जाया करते और संध्याकाल को पेड़ पर स्थित अपने-अपने घोंसलों में लौट आते। यही उनकी दिनचर्या थी।

एक दिन जरद्गव नामक एक अंधा गिद्ध (Blind vulture) वहाँ आया। वह वृद्ध हो चला था। पक्षियों ने दयावश उसे वृक्ष के कोटर में आश्रय दे दिया। पक्षी जब भोजन की तलाश में जाते, तो गिद्ध के लिए भी भोजन ले आते थे। बदले में वह उनके बच्चों की देखभाल कर दिया करता था। इस तरह गिद्ध को बिना श्रम आहार प्राप्त हो जाता था और पक्षी भी अपने बच्चों की तरफ से निश्चिंत होकर भोजन की तलाश में दूर-दूर तक जा पाते थे। सुख-चैन से पक्षियों और गिद्ध के दिन व्यतीत हो रहे थे।

एक दिन कहीं से एक बिल्ली उस वन में आ पहुँची। इधर-उधर भटकते हुए जब वह उस पेड़ के पास से गुज़री, तो उसकी दृष्टि पक्षियों के अंडों और बच्चों पर पड़ी। उसके मुँह में पानी आ गया। वह उन्हें खाने के लिए वृक्ष पर चढ़ी, तो पक्षियों के बच्चे अपने बचाव के लिए शोर मचाने लगे। शोर सुनकर गिद्ध कोटर से बाहर निकला और चिल्लाकर बोला, “कौन है?”

बिल्ली डर गई और वृक्ष से नीचे उतर आई और गिद्ध को प्रमाण कर बोले, “महाशय, मैं बिल्ली हूँ। यही नदी किनारे रहती हूँ। पक्षियों से मैंने आपकी बहुत प्रशंषा सुनी है। इसलिए दर्शन हेतु चली आई। कृपया मेरा प्रणाम स्वीकार करें।”

गिद्ध ने उसे वहाँ से चले जाने को कहा। वह जानता था कि बिल्ली पक्षियों के बच्चों के लिए ख़तरा है। बिल्ली समझ गई कि भले ही गिद्ध अंधा और बूढ़ा क्यों न हो? उसके रहते पक्षियों के अंडों और बच्चों पर हाथ साफ़ करना असंभव है।

वह किसी तरह पानी चिकनी-चुपड़ी बातों से उसे विश्वास में लेने का प्रयास करने लगी। वह बोली, “महाशय, मैं जानती हूँ कि आपको मुझ पर संदेह है। आपको लगता है कि मैं पक्षियों के बच्चों को अपना आहार बना लूंगी। किंतु विश्वास करें, ऐसा नहीं है। एक दिन एक महात्मा से मिलने के बाद मैंने मांस खाना छोड़ दिया है। मैं पूर्णतः शाकाहारी बन गई हूँ और अपना समय धर्म-कर्म की बातों और कार्यों में ही लगाती हूँ। आपकी प्रशंसा सुनकर आपके सानिध्य में कुछ व्यतीत करने का विचार कर आपके पास आई हूँ। कृपया मुझे अपने सानिध्य में रख लें।”

गिद्ध उसके चिन्नी-चुपड़ी बातों में आ गया और उस पर विश्वास कर बैठा। उसने उसे अपने साथ वृक्ष के कोटर रहने की अनुमति दे दी। बिल्ली तो यही चाहती थी। वह गिद्ध के साथ उसी कोटर में रहने लगी और अवसर पाकर एक-एक कर पक्षियों के अंडे और बच्चे खाने लगी।

एक-एक कर अपने बच्चों और अंडों के गायब होने से सभी पक्षी चिंतित और दु:खी थे। एक दिन सबने इसकी पड़ताल करने की ठानी। जैसे ही बिल्ली को इस बात का अंदेशा हुआ, वो कोटर छोड़कर भाग गई। इधर पड़ताल करते हुए पक्षियों ने जब वृक्ष के कोटर में झांका, तो उन्हें वहाँ ढेर सारे पंख पड़े हुए दिखाई पड़े। उन्हें लगा कि गिद्ध ने ही उनके बच्चों को खा लिया है। वे सभी आक्रोश में आ गए और चोंच मार-मार का बूढ़े गिद्ध का काम तमाम कर दिया। बिल्ली पर विश्वास कर बेचारा गिद्ध व्यर्थ में ही अपने प्राणों से हाथ धो बैठा।

शिक्षा: जिसके कुल, गोत्र या स्वभाव की जानकारी न हो, उसे आश्रय नहीं देना चाहिए।

गौरैया और हाथी

एक वन में बरगद के पेड़ की ऊँची डाल पर एक घोंसला था, जिसमें गौरैया (Sparrow) का जोड़ा रहता था। दोनों दिन भर भोजन की तलाश में बाहर रहते और शाम ढले घोंसले में आकर आराम करते थे। दोनों ख़ुशी-ख़ुशी अपना जीवन-यापन कर रहे थे।

मौसम आने पर गौरैया ने अंडे दिये। अब उसका पति भोजन की तलाश में जाता और वह घोंसले में रहकर अंडों को सेती और उनकी देखभाल करती थी। वे दोनों बेसब्री से अंडों में से अपने बच्चों के बाहर निकलने की प्रतीक्षा कर रहे थे।

एक दिन रोज़ की तरह गौरैया का पति भोजन की तलाश में गया हुआ था और गौरैया घोंसले में अंडों को से रही थी। तभी एक मदमस्त हाथी (Elephant) उस वन में आ गया और उत्पात मचाने लगा। वह अपने विशालकाय शरीर से टकराकर और सूंड से हिला-हिलाकर पेड़-पौधों को उखाड़ने लगा।

कुछ ही देर में सारा वन तहस-नहस हो गया। आगे बढ़ते-बढ़ते वह उस बरगद के पेड़ के पास पहुँचा, जहाँ गौरैया का घोंसला था। वह जोर-जोर से पेड़ को हिलाने लगा। लेकिन बरगद का पेड़ (Banyan Tree) मजबूत था। हाथी उसे गिरा नहीं पाया। लेकिन इन सबमें गौरैया का घोंसला टूटकर नीचे गिर पड़ा और उसके सारे अंडे फूट गए।

अपने बच्चों की मृत्यु पर गौरैया विलाप करने लगी। जब उसका पति वापस लौटा, तो गौरैया ने रोते-रोते उसे हाथी की करतूत के बारे में बताया। वह भी बहुत दु:खी हुआ।

दोनों प्रतिशोध की आग में जल रहे थे और हाथी को सबक सिखाना चाहते थे। लेकिन हाथी जैसे विशालकाय जीव के सामने उन जैसे निरीह प्राणियों का क्या बस चलता? उन्हें अपने मित्र कठफोड़वा (Woodpaker) की याद आई और वे उसकी सहायता लेने का पहुँच गए। कठफोड़वा के दो मित्र थे – मधुमक्खी (Bee) और मेंढक (Frog)। वे दोनों भी गौरैया के जोड़े की सहायता को तैयार हो गए।

सबने मिलकर योजना बनाई और हाथी को सबक सिखाने निकल पड़े। पूरे वन को तहस-नहस करने के बाद हाथी एक स्थान पर आराम कर रहा था। उसे देख योजना अनुसार मधुमक्खी ने उसके कानों में अपनी स्वलहरी छेड़ दी।

हाथी स्वरलहरी में डूबने लगा ही था कि कठफोड़वा ने उसकी दोनों आखें फोड़ दी। हाथी दर्द से चीख उठा। इधर हाथी के अंधे होते ही कुछ दूरी पर मेंढक टर्र-टर्र करने लगा। मेंढक के टर्राने की आवाज़ सुनकर हाथी ने सोचा कि अवश्य ही कुछ दूरी पर तालाब है। वह मेंढक की आवाज़ की दिशा में बढ़ने लगा।

योजना अनुसार मेंढक एक दलदल के किनारे बैठा टर्रा रहा था। हाथी तालाब समझकर दलदल में जा घुसा और फंस गया। दलदल से निकलने का भरसक प्रयास करने के बाद भी वह सफ़ल न हो सका और उसमें धंसता चला गया। कुछ ही देर में वह दलदल में समा गया और मर गया।

इस तरह जैसे गौरैया ने अपने मित्रों की सहायता से हाथी से अपने बच्चों की मौत का प्रतिशोध ले लिया।

शिक्षा: एकजुटता में बड़ी शक्ति होती है। एकजुट होकर कार्य करने पर कमज़ोर से कमज़ोर व्यक्ति भी बड़े से बड़ा कार्य संपन्न कर सकता है।

कौवा और मोर

जंगल में रहने वाला काला कौवा न अपने रूप रंग से संतुष्ट था, न ही अपनी बिरादरी से। वह मोर जैसा सुंदर बनना चाहता था।

जब वह दूसरे कौवे से मिलता, तो कौवों के रूप रंग की बुराई कर अपनी किस्मत को कोसता कि उसने कौवा बनकर इस धरती पर क्यों जन्म लिया। साथी कौवे उसे समझाते कि जैसा रूप रंग मिला है, उसके साथ संतुष्ट रहो। पर वह किसी की बात नहीं मानता और उनसे लड़ता।

एक दिन कौवे को एक स्थान पर बिखरे हुए ढेर सारे मोर पंख दिखाई पड़े। उसने सारे मोर पंख उठाकर अपनी पूंछ में बांध लिये और सोचने लगा कि अब वह भी मोर बन गया है और उसे कौवों की बिरादरी छोड़कर मोरों की बिरादरी में शामिल हो जाना चाहिए।

वह तुरंत वह अपने समूह के सरदार के पास गया और अकड़ कर बोला, “सरदार! जैसा कि आप देख ही रहे हैं, मैं अब मोर बन गया हूँ। इसलिए आपको बताने आया हूँ कि मैं कौवों की बिरादरी छोड़कर मोरों की बिरादरी में जा रहा हूँ।”

कौवों का सरदार उसकी इस गुस्ताखी पर चकित रह गया। वह कुछ नहीं बोला, बस उस कौवे को जाता हुआ देखता रहा।

कौवा मोरों के पास पहुँचा। यह साबित करने के लिए कि वह भी मोर बन गया है, वह उनके सामने अपनी पूंछ दिखा-दिखा कर घूमने लगा। उसकी सोच थी कि वह मोरों से भी सुंदर दिखाई दे रहा है। इसलिए उसे देख मोर उसे अपनी बिरादरी में शामिल होने जरूर बुलायेंगे।

मोरों ने जब उसे मोर पंख अपनी पूंछ में बांधकर घूमते हुए देखा, तो उस पर खूब हँसे। फिर उन्होंने सोचा कि आज इस कौवे का मोर बनने का भूत उतारते हैं। उसके बाद उन्होंने मिलकर कौवे की बहुत धुनाई की। कौवा जान बचाकर भागा और अपने समूह के सरदार के पास पहुँचा।

वह उनसे बोला, “सरदार! मोरों ने मुझे बहुत मारा। अब मैं उनके बीच कभी नहीं जाऊंगा। मैं यहीं अपनी बिरादरी में रहूंगा।”

कौवे के सरदार को उसकी अकड़ याद थी। वह सोचने लगा – ‘बहुत अकड़ रहा था तू। अभी तेरी अकड़ भी उतरता हूँ और सबक भी सिखाता हूँ।‘

उसने अपने साथियों को बुलाया और सबने मिलकर उस कौवे को मार-मार कर अधमरा कर दिया।

कौवे का सरदार बोला, “तुझ जैसे कौवे की हमारे समूह को आवश्कता नहीं। भाग जा यहाँ से और कभी लौटकर मत आना।”

बेचारा कौवा न मोर की बिरादरी में शामिल हो पाया, न अपनी बिरादरी का रहा। मरम्मत हुई, सो अलग।

शिक्षा: हमने जैसे रूप रंग के साथ जन्म लिया है, जिस परिवार और परिवेश में जन्म लिया है, उसका सम्मान करना चाहिए।

छोटी लाल मुर्गी

एक खेत में छोटी लाल मुर्गी रहा करती थी। वह बहुत मेहनती थी। उसके घर के पास ही एक कुत्ता, एक बिल्ली और एक बत्तख रहते थे। ये तीनों आलसी थी। इसके बाद भी चारों में अच्छी दोस्ती थी। कई बार कुत्ता, बिल्ली और बत्तख छोटी लाल मुर्गी का फ़ायदा उठाते थे। वह मेहनत करके अपना भोजन तैयार करती और ये तीनों खाने पहुँच जाते। मुर्गी भी दोस्ती के कारण इन्हें कुछ नहीं कहती थी।

एक दिन की बात है। छोटी लाल मुर्गी खेत में घूम रही थी कि उसे मिट्टी में पड़े गेहूं के कुछ बीज दिखाई पड़े, जिसे देखकर वह सोचने लगी – ‘क्यों न मैं इन बीजों को खेत में बो दूं। जब फसल होगी, तो मैं गेहूं पिसवा लूंगी और उसकी रोटी बनाकर मज़े से खाऊंगी।‘

उसे आशा थी कि उसके दोस्त इस काम में उसकी सहायता अवश्य करेंगे। उसने गेंहू के दाने उठा लिये और सबसे पहले कुत्ते के पास पहुँची। उसने कुत्ते से कहा, “दोस्त! देखो मुझे खेत में गेहूं के ये बीज मिले हैं। मैं इसे बोना चाहती हूँ। क्या तुम मेरी सहायता करोगे।”

कुत्ता उस समय आराम कर रहा था। उसने जवाब दिया, “नहीं! ये मेरे सोने का समय है और मुझे ज़ोरों की नींद आ रही हैं। मैं अभी ये काम नहीं कर सकता।”

छोटी लाल मुर्गी बत्तख के पास पहुँची और उससे पूछने लगी, “दोस्त! क्या तुम इन गेंहुओं को बोने में मेरी सहायता करोगी।”

बत्तख बोली, “नहीं! देखो, कितनी धूप है। मैं तो झुलस जाऊंगी। माफ़ करना मैं तुम्हारी सहयता नहीं कर सकती।”

तब छोटी लाल मुर्गी बिल्ली के पास गई और उसे भी गेंहू के बीज दिखाकर पूछा, “दोस्त! कुत्ता और बत्तख तो मेरी सहायता नहीं कर रहे। क्या तुम मेरी सहायता करोगी।”

बिल्ली बोली, “देखो, इस समय तो मैं पड़ोस के घर में दूध पीने जा रही हूँ। इसलिए अभी तो मैं तुम्हारी सहायता कर ही नहीं सकती। दूध नहीं मिला, तो मैं भूखी रह जाऊंगी।”

दु:खी होकर छोटी लाल मुर्गी बोली, “कोई बात नहीं! मैं खुद ही जाकर खेत में इन बीजों को बो देती हूँ।”

वह खेत में गई और कड़ी धूप में दिन भर मेहनत कर शाम तक उसने सारे बीज बो दिये।

समय बीता और खेत में गेंहू की फसल लहलहाने लगी, जिसे देख छोटी लाल मुर्गी बहुत खुश हुई और दौड़कर सबसे पहले कुत्ते के पास पहुँची। उसने कुत्ते से पूछा, “दोस्त! खेत में फसल लहलहा रही है। क्या तुम फसल काटने में मेरी मदद करोगे?”

“नहीं! मैं यह काम नहीं कर पाऊंगा। मेरी तबियत ज़रा ठीक नहीं।” कुत्ते ने कन्नी काट ली।

छोटी लाल मुर्गी बत्तख के पास पहुँची और उससे सहायता करने के लिए कहा, तो वह बोली, “देख तो रही हो, मैं कितनी छोटी सी हूँ, मैं कैसे खेत में फसल काटूंगी? माफ़ करना, मुझसे न हो पायेगा।“

छोटी लाल मुर्गी बिल्ली के पास पहुँची, जो नहाकर आई थी और धूप में बैठी थी। छोटी लाल मुर्गी ने उससे फसल काटने में सहायता मांगी, तो वह बिदक कर बोली, “नहीं, मैं ये काम नहीं करूंगी। मैं अभी-अभी नहाकर आई हूँ। मैं वहाँ धूल-मिट्टी में गंदी हो जाऊंगी।”

छोटी लाल मुर्गी दु:खी होकर वहाँ से चली गई और सीधे खेत में पहुँची। वहाँ उसने अकेले ही फसल की कटाई की।

अगले दिन उसने सोचा कि क्यों न इन गेंहुओं को मैं पिसवा लूं। आटा रोटी बनाने के काम आ जायेगा।

वह फिर कुत्ते के पास पहुँची और कहने लगी, “दोस्त! चलो ना मेरे साथ आटा चक्की तक। मुझे इन गेंहुओं को पिसवाना है।“

“ऐसे काम के लिए मुझसे ना कहा करो। मैं इन सब कामों के लिए नहीं हूँ।“ कुत्ते ने दो टूक जवाब दिया।

छोटी लाल मुर्गी ने जब बत्तख से पूछा, तो उसने फिर वही बहाना बनाया कि वह तो बहुत छोटी सी है, वह इतनी दूर आटा चक्की तक नहीं जा पायेगी।“

बिल्ली के पास जाकर जब छोटी लाल मुर्गी ने सहायता मांगी, तो बिल्ली बोली, “आटा चक्की से उड़ने वाले आटे से मेरे बाल खराब हो जायेंगे, मैं तो वहाँ नहीं जा सकती।”

दुखी छोटी लाल मुर्गी अकेले ही आटा चक्की गई और गेहूं को पिसवा कर वापस आई।

अगले दिन उसने रोटी बनाने की सोची और अपने तीनों दोस्तों के पास पहुँची। तीनों खेत में खेल रहे थे। उसने पूछा, “दोस्तों! क्या तुम रोटी बनाने में मेरी मदद करोगे?“

“नहीं!” तीनों एक स्वर में बोले, “हमें तो रोटी बनाना आता ही नहीं।“

छोटी लाल मुर्गी ने अकेले ही जाकर रोटी बनाई। जब गर्मागर्म रोटियाँ तैयार हो गई, तो वह कुत्ता, बत्तख और बिल्ली के पहुँची और उन्हें रोटियाँ दिखाते हुए बोली, “अब बताओ कि रोटियाँ कौन कौन खायेगा?”

“हम!” तीनों एक साथ बोले।

“नहीं!” मुर्गी बोली, “इन रोटियों के लिए सारी मेहनत मैंने की है, इसलिए मैं ही सारी रोटियाँ खाऊंगी।“ और मज़े से रोटियाँ खाने लगी। कुत्ता, बत्तख और बिल्ली ने कोई मेहनत नहीं की थी, इसलिए वे बस छोटी लाल मुर्गी का मुँह देखते रह गये।

शिक्षा: मेहनत से कभी जी नहीं चुराना चाहिए।

गौरैया और बंदर

वन में घने वृक्ष की शाखा में घोंसला बनाकर गौरैया (Sparrow) का जोड़ा रहा करता था। वर्षों से वे वहाँ सुख का जीवन व्यतीत कर रहे थे।

ठंड का मौसम था। गौरैया का जोड़ा अपने घोंसलें में बैठा आराम कर रहा था। तभी अचानक ठंडी हवा के साथ बारिश प्रारंभ हो गई।

ऐसे में कहीं से एक बंदर (Monkey) आया और उस डाल पर बैठ गया, जहाँ गौरैया के जोड़ों का घोंसला (Nest) था। बंदर ठंड से ठिठुर रहा था। ठिठुरन के कारण उसके दांत किटकिटा रहे थे।

बंदर के दांतों की किटकिटाहट सुन गौरैया ने अपने घोंसलें से बाहर झांककर देखा। बंदर को बारिश में भीगता देख वह स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पाई और पूछ बैठी, “कौन हो तुम? इतनी बारिश में यहाँ इस डाल पर क्या कर रहे हो? क्या तुम्हारा कोई घर नहीं?”

गौरैया की बात सुन बंदर (Monkey) चिढ़ गया। किंतु उस समय वह किसी बात का उत्तर नहीं देना चाहता था। वह चुप रहा।

बंदर को चुप देख गौरैया (Sparrow) का हौसला बढ़ गया और लगी वह अपनी सलाह देने, “लगता है तुम्हारा कोई घर नहीं। तभी इस बरसात में भीग रहे हो। तुम्हारा चेहरा तो मानव जैसा है। शरीर से भी हृष्ट-पुष्ट लगते हो। ऐसे में अपना घर बनाकर क्यों नहीं रहते? अपना घर न बनाना मूर्खता है। उसका फल देखो, तुम बारिश में बैठे ठिठुर रहे हो और हमें देखो, हम सुख से अपने घोंसले में बैठे है।”

ये सुनना था कि बंदर क्रोध में लाल-पीला हो गया। उसने गौरैया के घोंसले को तोड़ दिया। मूर्ख को परामर्श देने का फल गौरैया को मिल गया था।

शिक्षा: परामर्श उसे दो, जिसे वास्तव में उसकी आवश्यकता हो। वह उसका मूल्य समझेगा। मूर्ख को परामर्श देने पर हो सकता है, उसके दुष्परिणाम भोगने पड़े।

कौवा, हिरण और लोमड़ी

एक जंगल में एक कौवा और हिरण रहते थे। दोनों में गाढ़ी मित्रता थी। अक्सर दोनों साथ रहते और मुसीबत के समय एक-दूसरे का साथ देते।

हिरण हट्टा-कट्ठा और मांसल था। जंगल के कई जानवरों उसके मांस का भक्षण करने लालायित रहा करते थे। किंतु जब भी वे हिरण के निकट आने का प्रयास करते, कौवा हिरण को चौकन्ना कर देता और हिरण कुंचाले भरता हुआ भाग खड़ा होता।

जंगल में रहने वाली एक लोमड़ी भी हिरण के मांस का स्वाद लेना चाहती थी। लेकिन कौवे के रहते ये संभव न था। एक दिन उसने सोचा, “क्यों ना हिरण से मित्रता कर उसका विश्वास प्राप्त कर लूं? फिर किसी दिन अवसर पाकर उसे दूर कहीं ले जाऊंगी और उसका काम-तमाम कर दूंगी। तब जी-भरकर उसके मांस का भक्षण करूंगी।”

उस दिन के बाद से वह ऐसा अवसर तलाशने लगी, जब हिरण अकेला हो और कौवा उसके आस-पास न हो। एक दिन उस वह अवसर प्राप्त हो ही गया। जंगल में उसे हिरण अकेला घूमता हुआ दिखाई पड़ा, तो धीरे से उसके पास पहुँची और स्वर में मिठास घोलकर बोली, “मित्र! मैं दूसरे जंगल से आई हूँ। यहाँ मेरा कोई मित्र नहीं है। तुम मुझे भले लगे। क्या तुम मुझसे मित्रता करोगे? मैं तुम्हें जंगल के उस पार के हरे-भरे खेतों में ले चलूंगी। वहाँ तुम पेट भरकर हरी घास चरना।”

हिरण लोमड़ी की मीठी बातों में आ गया और उससे मित्रवत व्यवहार करने लगा। उस दिन के बाद से लोमड़ी रोज़ हिरण के पास आती और उससे ढेर सारी बातें करती।

एक दिन कौवे ने हिरण को लोमड़ी से बातें करते हुए देख लिया। उसे लोमड़ी की मंशा समझते देर न लगी। लोमड़ी के जाते ही वह हिरण के पास गया और उसे चेताते हुए बोला, “मित्र! ये लोमड़ी दुष्ट है। इसकी मंशा तुम्हें मारकर खा जाने की है। प्राण बचाने हैं, तो इससे दूरी बनाकर रखो।”

हिरण बोला, “मित्र! हर किसी को शंका की दृष्टि से देखना उचित नहीं है। लोमड़ी सदा मुझसे मित्रवत रही है। विश्वास करो वह शत्रु नहीं, मित्र है। उसके द्वारा मुझे हानि पहुँचाने का प्रश्न ही नहीं उठता। तुम निश्चिंत रहो।”

हिरण का उत्तर सुनकर कौवा चला गया। किंतु उसे लोमड़ी पर तनिक भी विश्वास नहीं था। वह दूर से हिरण पर नज़र रखने लगा।

एक दिन लोमड़ी ने देखा कि मक्के के एक खेत में उसके मालिक ने मक्का चोर को पकड़ने के लिए जाल बिछा कर रखा है। हिरण को फंसाने का यह एक सुअवसर था। लोमड़ी तुरंत हिरण के पास गई और बोली, “मित्र! आज मैं तुम्हें मक्के के खेत में ले चलता हूँ।”

हिरण सहर्ष तैयार हो गया। दोनों जंगल के पास स्थित मक्के के खेत में पहुँचे। किंतु खेत में प्रवेश करते ही हिरण खेत के मालिक द्वारा बिछाए जाल में फंस गया। उसने निकलने का बहुत प्रयास किया, किंतु सफ़ल नहीं हो सका।

उसने लोमड़ी से सहायता की गुहार लगाई। लेकिन लोमड़ी तो इस फ़िराक में थी कि कब खेत का मालिक हिरण को मारे और वह भी अवसर देखकर उसका मांस चख सके। उसने हिरण को उत्तर दिया, “इतने मजबूत जाल को काटना मेरे बस की बात कहाँ? तुम यहीं ठहरो, मैं सहायता लेकर आती हूँ।”

यह कहकर लोमड़ी खेत के पास ही झाड़ियों के पीछे छुपकर खेत के मालिक के आने की प्रतीक्षा करने लगी।

इधर जंगल में अपने मित्र हिरण को न पाकर कौवा खोज-बीन करता हुआ मक्के के खेत में आ पहुँचा। वहाँ हिरण को जाल में फंसा देख वह उसके पास गया और बोला, “मित्र! चिंता मत करो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारे प्राणों की रक्षा करूंगा। अब तुम ठीक वैसा करो, जैसा मैं कहता हूँ। सांस रोककर बिना हिले-डुले जमीन पर ऐसे पड़ जाओ, मानो तुममें जान ही नहीं है। खेत का मालिक तुम्हें मरा समझकर ज्यों ही जाल हटायेगा, मैं आवाज़ देकर तुम्हें इशारा करूं दूंगा। बिना एक क्षण गंवाए तुम भाग खड़े होना।”

हिरण ने वैसा ही किया। खेत के मालिक ने उसे मरा जानकार जैसे ही जाल हटाया, कौवे ने इशारा कर दिया और इशारा मिलते ही हिरण भाग खड़ा हुआ। हिरण को भागता देख खेत के मालिक ने हाथ में पकड़ी कुल्हाड़ी पूरे बल से उसकी ओर फेंकी। किंतु हिरण बहुत दूर निकल चुका था। वह कुल्हाड़ी झाड़ी के पीछे छुपी लोमड़ी के सिर पर जाकर लगी और वो वहीं ढेर हो गई। लोमड़ी को अपनी दुष्टता का फल मिल चुका था।

शिक्षा: मित्र का चुनाव करते समय हमेशा सावधानी रखो। कभी भी किसी अजनबी पर आँख मूंदकर विश्वास न करो।

एकता में बल

एक समय की बात है, कबूतरों का एक दल आसमान में भोजन की तलाश में उड़ता हुआ जा रहा था। बहुत समय उड़ने के बाद, एक युवा कबूतर को नीचे हरियाली नजर आई।

युवा कबूतर ने बाकी सभी कबूतरों को कहा, “सुनो भाइयों, नीचे एक खेत में बहुत सारा दाना बिखरा पड़ा है। हम सब का पेट भर जाएगा। चलो हम सभी एक एक दाना चुनकर खाते हैं।”

सभी कबूतर नीचे उतरा और दाना चुनने लगा। वास्तव में वह दाना, पक्षियों को पकड़ने के लिए फैलाया गया था। और ऊपर पेड़ पर जाल लगाया गया था।

जैसे ही कबूतर का दल दाना चलने लगा, जाल उन पर आ गिरा। सारे कबूतर फस गए। फिर उनमें से एक कबूतर रोने लगा। “हम सब मर जाएंगे।” सभी कबूतर, हिम्मत हार बैठे थे।

पर युवा कबूतर सोच में डूबा था। उसने कहा, “जाल मजबूत ठीक है। अगर हम सभी एक साथ मिलकर उड़ने की कोशिश करें। तो हम जाल को साथ में लेकर आसानी से उड़ सकते हैं।”

सबने ऐसा ही किया। जाल साथ में लेकर सभी कबूतर एक साथ उड़ने लगा। तभी, जाल बिछाने वाला किसान कि नजर में आया। वह हाथ में डंडा लेकर कबूतरों को मारने के लिए दौड़ा।

सारे कबूतर एक साथ जोर लगाकर उड़े, तो पूरा जाल हवा मे ऊपर उठा। सारे कबूतर जाल को लेकर उड़ने लगे। कबूतरों को जाल के साथ उड़ते देखकर किसान अवाक रह गया।

युवा कबूतर जानता था, कि अधिक देर तक कबूतर दल के लिए जाल को साथ में लेकर उड़ना संभव नहीं होगा। पर युवा कबूतर के पास इसका उपाय था।

पास की पहाड़ी पर, उसका एक चूहा दोस्त रहता था। युवा ने, कबूतरों को पहाड़ी की ओर उड़ने का आदेश दिया। पहाड़ी पर पहुंचते ही, युवा कबूतर ने दोस्त चूहे को आवाज दी।

फिर, चूहा बिल में से बाहर आया। युवा कबूतर ने चूहे को सारी घटना बताई और जाल कटकर उन्हें आजाद करने के लिए कहा।

कुछ ही देर में चूहे ने वह जाल काट दिया और सभी कबूतरों को मुक्त किया। युवा कबूतर ने, अपना दोस्त चूहे को धन्यवाद दिया। फिर सभी कबूतर आकाश में आजादी की उड़ान भरने लगा।

तितली और कोकून

एक बार, एक आदमी को तितली का एक कोकून मिला। वह वहां बैठ गया और कई घंटों तक कोकून को देखता रहा। क्योंकि, वह उस छोटी सी छेद के माध्यम से,

अपने शरीर को, कोकून से बाहर निकालने के लिए संघर्ष कर रहा था। फिर ऐसा दिखाई दिया, जैसे की तितली थक गया था। और यह कोकून से बाहर नहीं निकल सकता था।

तब उस आदमी ने, तितली की मदद करने की फैसला किया। इसलिए, उसने एक कैंची ली और कोकून के बाकी हिस्सों को काट दिया था। तितली तब आसानी से बाहर बाहर आ गई।

लेकिन, इसका शरीर सूजा हुआ था और इसके पंख बहुत छोटे छोटे थे। वह आदमी तितली को देखता रहा। क्योंकि, वह उम्मीद करता था,

कि किसी भी समय, पंख का विस्तार होगा और शरीर को फैलाने में सक्षम हो जाएगा। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। वास्तव में, तितली अपना सारा जीवन एक सूजे हुए शरीर और टूटे पंखों के साथ बिताया।

यह तितली कभी उड़ान भरने में सक्षम नहीं था। आदमी को दयालुता और जल्दबाजी में समझ में नहीं आया, कि इस तितली को कोकून से बाहर निकलने के लिए संघर्ष की जरूरत थी।

तितली के शरीर से, उसके पंखों को दबाने का प्रकृति का तरीका था। ताकि, वह तैयार रहें उड़ान भरने के लिए। और कोकून से आजादी पाने के लिए।

सोने का अंडा

एक बार की बात है, गांव में एक किसान रहता था, वह बहुत ही गरीब था, उसकी आय बहुत कम थी उन्होंने बहुत कठिनाई से दिन गुजरता था।

एक दिन उसे एक मुर्गी मिली, किसान उसे मारकर खाना चाहता था लेकिन जब वह मुर्गी को मारने के लिए गया तो मुर्गी ने कहा, तुम मुझे मत मारो मैं तुम्हें रोज सोने का अंडा दूंगी।

फिर मुर्गी हर दिन एक सुनहरा अंडा दिया, किसान हर दिन अंडा बाजार में बेचा, जल्द ही वह एक अमीर आदमी बन गए। गांव में सभी लोग उनका सम्मान करने लगी,

किसान बहुत लालची हो गया, उसने सोचा कि मुर्गी के अंदर जरूर सुनहरे अंडे का भंडार होना चाहिए। उसे सारा अंडा एक दिन में चाहिए था, वह बहुत अमीर बनना चाहता था।

फिर उसने चाकु लिया और मुर्गी का पेट काट दिया, उसे एक भी अंडा नहीं मिला। उसने केवल सोने का अंडे ही नहीं बल्कि मुर्गी भी खो दिए। फिर वह अमीर से धीरे-धीरे पहले जैसा गरीब बन गए।

मूर्ख बगुला और नेवला

जंगल की बीच स्थित वट वृक्ष के खोल में कुछ बगुलों (Crane) का डेरा था। वे वहाँ वर्षों से रहते आ रहे थे। एक दिन उस वृक्ष की जड़ में बिल बनाकर एक सांप (Snake) रहने लगा। जब भी अवसर प्राप्त होता, वह बगुलों के बच्चों को मारकर खा जाता।

अपने बच्चों के मारे जाने से बगुले बड़े दु:खी थे। वे किसी तरह उस सांप से छुटकारा पाना चाहते थे। एक दिन वे नदी किनारे उदास बैठे थे, तभी पानी से निकलकर एक केकड़ा उनके पास आया और बोला, “क्या हुआ मित्रों! तुम लोग इतने दु:खी क्यों लग रहे हो? क्या मैं तुम्हारी कोई सहायता कर सकता हूँ?”

दु:खी बगुलों ने अपनी समस्या केकड़े को बता दी। केकड़ा (Crab) दुष्ट था। उसने मन ही मन सोचा – ‘ये बगुले मेरे परम शत्रु हैं। क्यों ना इनको ऐसा उपाय बताऊँ कि सांप के साथ-साथ इनका भी काम-तमाम हो जाये।’

किंतु ऊपर से दुःख व्यक्त करने का दिखावा करता हुआ वह बोला, “मित्रों, तुम्हारी समस्या सुनकर बड़ा दुःख हुआ। किंतु अब तुम लोगों को चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें एक ऐसा उपाय बताऊंगा, जिससे तुम्हें सदा के लिए उस दुष्ट सांप से छुटकारा मिला जायेगा।”

केकड़े की बात सुनकर बगुले प्रसन्न हो गए और बोले, “तो फिर देर न करो मित्र और शीघ्र हमें वह उपाय बता दो।”

“तुम लोग कहीं से मांस के टुकड़ों की व्यवस्था करो। मांस के टुकड़ों में से कुछ टुकड़े नेवले (Mongoose) के बिल के सामने डाल दो। शेष टुकड़े नेवले के बिल से लेकर सांप के बिल तक बिखेर दो। नेवला उन मांस के टुकड़ों को खाता हुआ सांप के बिल तक पहुँच जायेगा। सांप और नेवले जन्म-जन्मांतर के बैरी है। नेवला सांप का काम-तमाम कर देगा और तुम लोगों को सांप से सदा के लिए छुटकारा मिल जायेगा।”

बगुले शीघ्र सांप से छुटकारा पाना चाहते थे। उन्होंने ज्यादा सोच-विचार किये बिना ही केकड़े की बात मान ली। उन्होंने वैसा ही किया, जैसा केकड़े ने कहा था।

जैसी योजना थी, वैसा ही हुआ। नेवला मांस के टुकड़ों को खाता हुआ सांप के बिल तक पहुँच गया और सांप को मारकर खा गया। लेकिन वृक्ष में खोल देखकर वह वहाँ भी पहुँच गया और बगुलों को भी मारकर खा गया।

बगुलों के जल्दबाज़ी में केकड़े की योजना के दुष्परिणाम के बारे में विचार नहीं किया और मूर्खता कर दी थी, जिसका फल उन्हें अपनी जान से हाथ धोकर चुकाना पड़ा।

शिक्षा: किसी भी कार्य को करने के पूर्व उसके हर पहलू के बारे में अच्छी तरह विचार कर लेना चाहिए।

टिटहरी का जोड़ा और समुद्र का अभिमान

टिटहरी का एक जोड़ा समुद्र के किनारे रहता था। एक बार जब अंडे देने का समय आया, तो टिटहरी टिटहरे बोली, “अब हमें किसी सुरक्षित स्थान की खोज करनी चाहिए। यह स्थान हमारी संतानों के लिए सुरक्षित नहीं है।”

टिटहरा वह स्थान छोड़ना नहीं चाहता था, वह बोला, “क्यों क्या समस्या है इस स्थान पर? मेरे विचार में यहाँ सभी स्थान सुरक्षित हैं। तुम्हें चिंता करना छोड़ देना चाहिए।”

इस पर टिटहरी बोली, “तुम्हें ये विशाल समुद्र दिखाई नहीं पड़ता। ज्वार के समय इसकी शक्तिशाली लहरें हाथी जैसे विशालकाय जीव को भी खींचकर ले जाती हैं। ऐसे में हम छोटे पंछियों की क्या बिसात? मेरी मानो तो यह स्थान छोड़कर कहीं और चलो।”

किंतु टिटहरा नहीं माना। वह बोला, “तू व्यर्थ में चिंतित है। समुद्र यह दुस्साहस कर ही नहीं सकता। वह मुझे भय खाता है। इसलिए तू देखना, वह कभी हमारी संतानों को बहाकर नहीं ले जायेगा।”

टिटहरे की यह बात समुद्र ने सुन ली। उसे टिटहरे के अभिमान पर बड़ा क्रोध आया। उसने सोचा – एक छोटे से पंछी को स्वयं पर इतना अभिमान! अपने अभिमान में चूर ये पंछी स्वयं को मुझसे भी बड़ा समझता है। इसका अभिमान चूर करना ही होगा।

समय आने पर टिटहरी ने अंडे दिए। एक दिन टिटहरी और टिटहरा दोनों भोजन की तलाश में गए हुए थे। तभी समुद्र में ज्वार आया और लहरों ने टिटहरी के अंडों को बहा दिया।

वापस आने पर अपने अंडों को न देख टिटहरी विलाप करने लगी। वह टिटहरे को कोसते हुए बोली, “मेरी बात न मानने का परिणाम देख लिया। ये समुद्र हमारे अंडों को बहाकर ले गया और तुम बातें बनाते रह गए। ऐसा ही अनर्थ होता है, जब कोई अभिमानी अपने प्रियजनों की बात नहीं मानता। मेरी बात मानकर यदि बुद्धि से काम लिया होता और संकट आने के पूर्व ही उसका समाधान खोज लिया होता, तो हमें ये दिन न देखने पड़ते।”

टिटहरी की इस बात पर टिटहरा बोला, “मैं बुद्धि में किसी से कम नहीं हूँ। तू देखती जा, मैं कैसे समुद्र का पानी अपनी चोंच से सुखाकर अंडों को बाहर निकालता हूँ।”

“अपनी शक्ति देखकर किसी से बैर करना चाहिए। विशाल समुद्र के समक्ष तुम एक तुच्छ प्राणी हो। यह बैर कहीं तुम्हें ही नष्ट न कर दे।” टिटहरी बोली।

टिटहरी की बात पर टिटहरे ने ध्यान नहीं दिया और अपनी डींगे हांकने में लगा रहा। टिटहरी उसे समझाती रह गई कि कई नदियों से निरंतर भरने वाले समुद्र को सुखा पाना उसके बस के बाहर है। किंतु टिटहरा हठ पर अड़ा रहा।

अंततः टिटहरी बोली, “ठीक है, जैसा तुम उचित समझो। किंतु मेरी एक बात मान लो। इस काम में तुम अन्य पंछियों के सहायता मांगो। एकता में बल होता है। हो सकता है, तुम सब छोटे-छोटे पंछियों की एकता समुद्र को सुखाने का कारनामा कर दिखाए।

टिटहरे ने टिटहरी की ये बात मान ली और अपने पक्षी मित्र बगुले, सारस, मोर आदि को अपनी व्यथा सुनाकर उनसे सहायता की मांग की। लेकिन सभी ने स्वयं को इस कार्य के लिए अशक्त बताया। उन्होंने टिटहरे को गरूड़ का नाम सुझाया।

सभी मिलकर गरूड़ के पास गए और सहायता की याचना करने लगे, “गरूड़ महाराज! समुद्र का अत्याचार बहुत बढ़ चुका है। उसने टिटहरे के अंडो को बहा दिया। भविष्य में वह अन्य पक्षियों के साथ भी ऐसा कर सकता है। उसे रोकना होगा। अन्यथा, हमारा पक्षिकुल नष्ट हो जायेगा।”

गरूड़ उनकी सहायता के लिए मान गया।

उसी समय भगवान विष्णु का दूत गरूड़ बुलाने आया और उसे सूचित करते हुए बोला, “भगवान विष्णु शीघ्र तुम्हें बुला रहे हैं।”

उस समय गरूड़ क्रोध में था। उसने दूत को उत्तर दिया, “इस समय आने में मैं असमर्थ हूँ। भगवान विष्णु से जाकर कहो कि वे दूसरी सवारी का प्रबंध कर लें।”

दूत के पूछने पर गरूड़ ने समुद्र के द्वारा पक्षियों पर किये जा रहे अत्याचार के बारे में वर्णन कर दिया। दूत ने यह वर्णन भगवान विष्णु को सुनाया। तब स्वयं भगवान विष्णु गरूड़ के पास पहुँचे।

गरूड़ ने उन्हें प्रणाम कर कहा, “भगवन! समुद्र अति-अभिमानी हो गया है। निरीह प्राणियों पर उसका अत्याचार बढ़ने लगा है। कुछ देर पहले उसने मेरे मित्र टिटहरे के अंडों का अपहरण कर न सिर्फ़ उसे दुःख दिया है, बल्कि समस्त पक्षीजाति को अपमानित किया है। अब हमें इसका प्रतिशोध चाहिए।”

भगवान विष्णु पूरी बात सुनकर बोले, “तुम्हारा क्रोध उचित है। समुद्र का कृत्य सर्वथा अनुचित है। आओ, समुद्र के पास चलें। मैं अभी टिटहरे के अंडे उसे वापस दिलवाता हूँ।”

सभी समुद्र तट पर पहुँचे। भगवान विष्णु ने अपने धनुष पर ‘आग्नेय बाण’ चढ़ाया और समुद्र से बोले, “दुष्ट समुद्र! यदि तूने टिटहरे के अंडे वापस नहीं किये, तो मैं तुझे क्षण भर में सुखा दूंगा।”

भगवान विष्णु का क्रोध देख समुद्र भयभीत हो गया और उसने तत्काल टिटहरी और टिटहरे के अंडे वापस कर दिए।

शिक्षा: यदि ठान लो, तो असंभव भी संभव है।

कौवे और उल्लू के बैर

एक जंगल में पक्षियों का समूह रहता था, जिसका राजा वैनतेय (गरुड़) था। वैनतेय अपना अधिकांश समय वासुदेव की भक्ति में व्यतीत करता था। अतः अपनी प्रजा की ओर ध्यान नहीं दे पाता था। उसकी प्रजा अपने प्रति उसका विरक्ति भाव देख अप्रसन्न थी।

एक दिन समस्त पक्षियों ने सभा की, जिसमें चातक, कोयल, बगुला, हंस, तोता, उल्लू, कबूतर आदि पक्षी एकत्रित हुए और इस विषय पर चर्चा करने लगे।

चातक,पक्षी बोला, “हमारा राजा वैनतेय वासुदेव की भक्ति में अपनी प्रजा को ही भूल गया है। उसे हमारी कोई चिंता ही नहीं है। ऐसे में उचित होगा कि हम किसी अन्य को अपना राजा चुन लें।”

सभी ने एकमत से उल्लू को अपना राजा चुन लिया और उसके अभिषेक की तैयारी में जुट गए। उसका राजमुकुट और राजसिंहासन तैयार किया जाने लगा। गंगा का पवित्र जल मंगाया गया और अनुष्ठान प्रारंभ हो गया।

तभी कहीं से एक कौवा उड़ता हुआ उस स्थान पर आया, जहाँ उलूकराज के अभिषेक की तैयारी चल रही थी। सारी व्यवस्था देख वह सोचने लगा कि यह सब किसलिए? किस समारोह के लिए ये सारी व्यवस्था की जा रही है?

उसने कोयल से पूछा, “मित्र! यहाँ किस उत्सव की तैयारी चल रही है?”

कोयल ने उसे उल्लू के अभिषेक के बारे में जानकारी दी। यह सुन कौवा हँसने लगा। उसे हँसता देख समस्त पक्षी उसके आस-पास एकत्रित हो गए। उन्होंने उसके हँसने का कारण पूछा।

कौवे के कहा, “राजा के लिए तुम्हारा चुनाव गलत है।”

सभी जानते थे कि कौवा एक चतुर और कूटराजनीतिज्ञ पक्षी है। इसलिए उन्होंने उससे मंत्रणा करना उचित समझा।

कौवा कहने लगा, “क्या तुम लोगों के पास राजा के चुनाव के लिए प्रत्याशियों की कमी है? तुम लोगों को क्या सूझी कि सौंदर्य के द्योतक मोर, हंस, सारस, चक्रवाक, शुक जैसे पक्षियों के रहते टेढ़ी नाक वाले उल्लू को राजा अपना राजा चुन लिया?”

वह कहता गया, “उल्लू रौद्र स्वाभाव का आलसी, कायर, व्यसनी और कटुभाषी पक्षी है। ऊपर से दिवान्ध है। वह तुम्हारा क्या हित करेगा? उससे तो तुम्हारा वर्तमान राजा वैनतेय भला है। उल्लू की अपेक्षा वह तुम्हारे लिए अधिक कल्याणकारी है। उसके रहते उल्लू को राजा बनाने का क्या तुक? राजा तो एक ही होता है। एक से अधिक राजा का होना प्रतिद्वन्द्वता को जन्म देता है, जो विनाश की ओर ले जाता है। उल्लू जैसेअ योग्य को राजा बनाकर तुम पक्षीजगत का सर्वनाश कर दोगे?”

सभी पक्षी कौवे की बात से प्रभावित हो गये। उल्लू के अभिषेक का विचार त्याग कर वे सब वहाँ से चले गए। जब उल्लू अपने अभिषेक के लिए पहुँचा, तो वहाँ मात्र उसका मित्र कृकालिका और कौवा थे। अन्य किसी पक्षी को न देख उल्लू अचरज में पड़ गया।

उसने अपने मित्र कृकालिका से पूछा, “क्या हुआ? सारी पक्षी कहाँ हैं?”

कृकालिका ने उल्लू को बताया, “मित्र! इस कौवे के कारण सबने तुम्हारे अभिषेक का विचार त्याग दिया है।”

उल्लू को कौवे पर बहुत क्रोध आया। वह उसे पूछने लगा, “तुमने ऐसा क्यों किया दुष्ट कौवे? मेरे राजा बन जाने से तेरा क्या चला जाता? तुमने अकारण मुझसे बैर मोल लिया है। अब से तू सदा मेरा और मेरे वंश का बैरी रहेगा।”

कौवा कुछ कह न पाया। चुपचाप बैठा रहा। उल्लू कुड़कुड़ाता हुआ वहाँ से चला गया। कौवा सोचने लगा कि व्यर्थ में ज्ञान देकर मुझे क्या हुआ? इन पक्षियों के मामले में हस्तक्षेप कर मैंने अकारण ही उल्लू से बैर ले लिया है। इस तरह मैंने अपनी स्वयं की हानि कर ली है।

यह सोचता हुआ कौवा वहाँ से चला गया। तब से कौवों और उल्लू में स्वाभाविक बैर चला आ रहा है।

शिक्षा: दूसरों के मामले में हस्तक्षेप अकारण ही आपको समस्या में डाल सकता है।

कबूतर का जोड़ा और शिकारी

एक निर्जन स्थान में एक व्याध रहता था उसके परिजनों और सगे-संबंधियों ने उसका त्याग कर दिया था। वे उसके जीव-हत्या के कार्य से अप्रसन्न थे। उन्होंने उससे कई बार जीव हत्या का त्याग करने की प्रार्थना की। किंतु, व्याध नहीं माना। अंततः वे सब उससे दूर हो गए।

व्याध को शिकार में बड़ा आनंद आता था। वह अपना अधिकांश समय पशु-पक्षियों के शिकार में व्यतीत किया करता था। दिन भर वह जाल और लाठी लेकर वन में भटकता रहता था। वह दिन पर दिन निर्दयी और क्रूर होता जा रहा था।

एक दिन उसने जाल बिछाकर एक कबूतरी को फांस लिया। उसे लेकर प्रसन्नतापूर्वक वह अपने घर की ओर प्रस्थान करने लगा कि बीच रास्ते में बादल घिर आये और वर्षा होने लगी। वर्षा के जल से व्याध पूर्णतः भीग गया। वह सर्दी से ठिठुरने लगा।

वह वर्षा से बचने के लिए आश्रय ढूंढने लगा कुछ ही दूर पर उसे पीपल का क वृक्ष दिखाई पड़ा। उसमें एक बड़ा सा खोल था, जिसमें एक मनुष्य घुसकर बैठ सकता था। व्याध ने सोचा कि कुछ देर के लिए यहाँ शरण लेना उचित होगा।

वह खोल में घुस गया और बोला, “इस खोल में रहने वाले जीव मैं यहाँ कुछ देर आश्रय ले रहा हूँ। आशा है तुम्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। इस सहायता के लिए मैं आजीवन तुम्हारा ऋणी रहूंगा।”

उस खोल उस कबूतरी का पति रहता था, जिसे व्याध ने पकड़ लिया था। वह अपने पत्नी के बिछड़ जाने के कारण दु:खी था और विलाप कर रहा था।

कबूतरी ने जब स्वयं के प्रति अपने पति का प्रेम देखा, तो भावुक हो गई। वह मन ही मन सोचने लगी कि मैं कितनी भाग्यशाली हूँ, जो मुझे इस जीवन में ऐसा प्रेम करने वाला पति मिला। इन्हें पाकर मेरा जीवन धन्य हो गया।

वह अपने पति से बोली, “स्वामी! विलाप मत करो। मैं यहीं हूँ। इस व्याध ने मुझे जाल में पकड़ लिया है। कदाचित ये मेरे कर्मों का फ़ल है। किंतु, आप मेरी चिंता में व्याकुल ना हो। अपना कर्तव्य निभाते हुए शरण में आये अतिथि की सेवा-सत्कार करो। अन्यथा, तुम पाप के भागी बनोगे।

कबूतरी की बात मानकर कबूतर व्याध से बोला, “वधिक, आपका स्वागत है। आप यहाँ निःसंकोच विश्राम करें। यदि आपको किसी प्रकार का कष्ट हो, तो मुझे बताएं। मैं उसके निवारण का हर संभव प्रयास करूंगा।”

व्याध बोला, “मैं वर्षा के जल में भीग गया हुआ। मुझे ठंड लग रही है। कुछ ताप की व्यवस्था कर दो।”

कबूतर ने लकड़ियाँ जमा की और उसे जला दिया। अतिथि आग सेंकने लगा और उसकी ठंड दूर हो गई।

फिर कबूतर ने सोचा कि अतिथि अवश्य भूखा होगा। मुझे इसके लिए भोजन की व्यवस्था करनी चाहिए। किंतु, उस समय उसके पास अन्न का एक दाना नहीं था। वह विचार करने लगा कि क्या करूं कि अतिथि की भूख शांत कर सकूं।

कुछ देर विचार करने के बाद उसने निर्णय लिया कि अब तो कबूतरी भी मेरे साथ नहीं है। मैं जीवित रहकर क्या करूंगा? मुझे अपने ही शरीर त्याग कर व्याध का भोजन बन जाना चाहिए। यह सोचकर वह आग में कूद गया।

उसका ये बलिदान देख, व्याध की आत्मा व्याकुल हो गई। वह आत्म-ग्लानि में डूब गया और मन ही मन स्वयं को धिक्कारने लगा। उसी क्षण उसने कबूतरी को मुक्त कर दिया।

कबूतरी ने जब अपने पति को आग में जलता हुआ देखा, तो विलाप करने लगी और कहने लगी कि ये मेरे कर्मों का फल है, जिसकी सजा आपको मिली। अब मैं अकेली इस संसार में जीकर क्या करूंगी?

कबूतरी ने भी आग में कूदकर अपने प्राणों का त्याग कर दिया। कबूरत और कबूतरी का ये बलिदान देख व्याध की आँखें खुल गई। उसने उसी समय जीव-हत्या त्याग देने का प्रण किया।

पक्षियों का राजा

एक बार जंगल में सभी पक्षी इकट्ठा हुए। और फैसला किया, कि उन पक्षियों के बीच एक राजा होना चाहिए। लेकिन पक्षियों का राजा कौन बनेगा? तब मैना को एक विचार आया।

उसने सुझाव दिया, “हम सभी पक्षियों के बीच एक प्रतियोगिता रखें। और जो सबसे ऊंची उड़ान भरता है, उसे सभी पक्षियों के राजा माना जाएगा।”

सभी पक्षियों को यह विचार पसंद आया। पक्षियों ने इसके लिए सहमति बनाई। एक ईगल जो वहां मौजूद था। अपने बड़े शरीर के बारे में दावा करना शुरू कर दिया और कहा,

“मैं सभी पक्षियों में सबसे ज्यादा मजबूत हूं। और आप सभी जानते हैं, कि केवल मैं ही हूं जो उच्चतम उड़ान भर सकता है। तो फिर प्रतियोगिता क्यों? मुझे अब राजा क्यों नहीं माना जाए।”

“लेकिन संभावना है कि आप शायद जीत नहीं सकते।” थोड़ी आवाज की। ईगल चारों ओर मुड़कर देखा कि यह किसने कहा। वह आश्चर्य था क्योंकि एक छोटा गौरैया यह कहा था।

मजाकिया स्वर में ईगल ने कहा, “अरे मुझे कौन हारा रहे हैं, आप?” गौरैया ने कुछ नहीं कहा, बाद में सभी पक्षी प्रतियोगिता के लिए तैयार हो गया।

जैसे ही एक उल्लू ने संकेत दिया, सभी पक्षी हवा में उड़ने लगे। लेकिन वे बहुत अधिक और लंबे समय तक नहीं उड़ सके। एक एक करके सभी पक्षी प्रतियोगिता से बाहर हो गए।

केवल ईगल ऊंचाई में उड़ रहा था, हमेशा की तरह। फिर ईगल ने नीचे देखा कि सभी पक्षियों ने हार मान ली है। उन्होंने कहा, “मैं तो पहले ही कहा था, केवल मैं ही हूं जो सबसे ऊंची उड़ान भर सकता है।

अब आप सभी सहमत हैं कि मैं पक्षियों का राजा हूं।” ईगल को पता नहीं था, कि नन्हा गौरैया उनकी पंखों के नीचे उड़ रहा है। जिस क्षण उसने रुका, नन्हा गौरैया बाहर निकल गया।

वह ईगल के सिर के ठीक ऊपर उड़ गया। और चिल्लाया, “नहीं नहीं मिस्टर ईगल भाई, मैं सभी पक्षियों का राजा हूं। देखो मैं तुमसे ज्यादा ऊंचाई पर हूं।”

सभी पक्षी गौरैया से सहमत थे। किसी भी मामले में गर्वित ईगल को प्रतियोगिता में हड़ता हुआ देखकर सभी खुश थे। फिर सभी पक्षियों ने ईगल को अपना राजा चुना।

शिक्षा: अगर कुछ कार्य आपकी क्षमता से अधिक मजबूत है। तो इसका मतलब यह नहीं है, आपको कोशिश करने से पहले छोड़ देना चाहिए। इसके बजाय आपको सोच समझकर कोशिश करनी चाहिए।

प्यासा कौआ

एक बार, एक जंगल में एक कौआ रहता था। तब गर्मी का मौसम चल रहा था। एक दिन, कौआ को बहुत ज्यादा प्यास लगा था। वह पानी की तलाश में यहां वहां भागता रहा, लेकिन उसे कहीं भी पानी नहीं मिला।

लेकिन कौआ हिम्मत नहीं हारी। वह जंगल के ऊपर से जा रहा था पानी की तलाश में। जाते जाते उसने एक मटकी दिखा, जो एक पेड़ के नीचे पड़ा था।

वह उड़कर मटकी के ऊपर बैठा और झांक कर देखा की बहुत ही कम पानी था, मटकी में। पानी इतना नीचे था कि उसके लिए अपनी चोंच की मदद से पीना संभव नहीं था।

कौआ निराश हो गई लेकिन वह हार नहीं मानी। क्योंकि, कौआ बहुत ज्यादा प्यासा था। उसने मटकी नहीं छोड़ी, फिर उसकी नजर अचानक कुछ कंकड़ के ढेर पर पड़ी जो पेट के नीचे पड़ी थी।

उसके दिमाग में एक अद्भुत विचार आया। कि कंकड़ को मटकी में गिराकर पानी के स्तर को ऊंचा किया जा सकता है। फिर उसने मटकी में एक एक करके कंकड़ डालना शुरू किया।

और अंत में पानी का स्तर कंकड़ डालने के कारण ऊंचा हो गया। फिर कौआ अपनी चोंच की मदद से कुछ ज्यादा ही पानी पिया और खुश होकर वहां से उड़ गया।

शिक्षा: मुश्किल समय में मेहनत और समझदारी से काम लेना चाहिए।

शेर, ऊँट, सियार और कौवा

एक वन में मदोत्कट नामक सिंह (Lion) निवास करता था। उसके बाघ, गीदड़, कौवे जैसे कई अनुचर थे। ये दिन-रात सिंह की सेवा करते और सिंह के मारे शिकार के अवशेष से अपना पेट भरते थे।

एक दिन एक ऊँट (Camel) कहीं से भटकता हुआ उस वन में आ गया। जब सिंह की दृष्टि ऊँट पर पड़ी, तो उसने अपने अनुचरों से पूछा, “ये कौन सा जीव है? हमने पहली बार ऐसा जीव अपने वन में देखा है। यह वन्य प्राणी है या ग्राम्य?”

कौवे (Crow) ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए सिंह को बताया, “वनराज! यह ऊँट है और यह ग्राम्य जीव है। भाग्य इसे आपका भोजन बनाकर ही यहाँ लाया है। आप इसे मारकर खा जाइये।”

“नहीं, मैं ऐसा नहीं करूंगा। यह तो हमारा अतिथि है। अतिथि को मैं कैसे मार सकता हूँ? यह तो पाप होगा। मैं उसे अभयदान देता हूँ। जाओ, उसे आदरपूर्वक मेरे पास लेकर आओ। मैं उससे मिलना चाहता हूँ।” सिंह ने कौवे को आदेश दिया।

कौवा (crow) कुछ अनुचरों के साथ ऊँट के पास गया और उसे सिंह का संदेश सुनाते हुए बोला, “मित्र, वनराज सिंह ने तुम्हें अभयदान प्रदान किया है। वन के राजा होने के नाते वे तुमसे मिलना चाहते हैं।” अभयदान की बात सुन ऊँट कौवे और अन्य अनुचरों के साथ सिंह के पास आ गया।

सिंह ने उससे परिचय और वन में आने का कारण पूछा, तो ऊँट दु:खी होकर बोला, “महाराज, मेरा नाम कथनक है। मैं अपने साथियों संग भ्रमण करते हुए वन में पहुँचा और उनसे बिछुड़ गया। अब मैं यहाँ अकेला रह गया हूँ।”

उसे दुःखी देख सिंह धीरज बंधाते हुए बोला, “कथनक! तुम हमारा आतिथ्य स्वीकार करो। इस वन में जहाँ चाहे विचरण करो और हरी-भरी घास का सेवन करो।”

कथनक सिंह की आज्ञा का पालन कर वहीं रहने लगा। हरी-भरी घास खाकर वह कुछ ही दिनों में हृष्ट-पुष्ट हो गया। बाघ, गीदड़, सियार आदि वन जीव जब भी उसे देखते, उनकी लार टपकने लगती। किंतु वे वन के राजा सिंह के आदेश के समक्ष विवश थे।

एक दिन कहीं से एक जंगली हाथी (Elephant) वन में आ गया। अपने अनुचरों की रक्षा के लिए सिंह को उससे युद्ध करना पड़ा। दोनों के मध्य घमासान युद्ध हुआ। युद्ध के दौरान हाथी ने सिंह को उठाकर जमीन पर पटक दिया और अपने नुकीले दांत उसके शरीर में गड़ा दिए। किसी तरह सिंह युद्ध में विजयी हो गया, किंतु वह बुरी तरह घायल था।

घायल अवस्था में उसके लिए शिकार पर जाना दुष्कर हो गया। जिससे वह स्वयं तो भूखा रहने लगा। साथ ही उसके अनुचर, जो उसके शिकार के अवशेष से अपना पेट भरते थे, वे भी भूखे रहने लगे। अपनी दुर्दशा देख और अपने अनुचरों की परेशानी देख सिंह दु:खी था।

एक दिन उसने अपने अनुचरों की सभा बुलाई। सभा में सबको संबोधित कर वह बोला, “अनुचरों! मेरी अवस्था से आप सभी अवगत हो। मैं चाहता हूँ कि आप कोई ऐसा जीव तलाश करो, जिसे मैं इस अवस्था में भी मार सकूं। इस तरह हम सभी की भोजन की समस्या का निराकरण हो जायेगा।”

सिंह की आज्ञा पाकर सभी अनुचर विभिन्न दिशाओं में शिकार की तलाश में गए, किंतु किसी के हाथ कुछ न लगा। सबके हताश वापस लौटने के बाद कौवा, गीदड़ (Jackal) और बाघ आपस में मंत्रणा करने लगे। उनकी दृष्टि कई दिनों से कथनक ऊँट पर थी।

“मित्रों! कथनक इस वन में रहकर कितना हृष्ट-पुष्ट हो गया है। जब भी उसको देखता हूँ, तो मुँह में पानी आ जाता है। तुम लोगों का क्या विचार है? क्यों न इसे ही मारकर अपनी भूख मिटाई जाये। इधर-उधर भटकने का क्या लाभ?” गीदड़ बोला।

“कह तो तुम ठीक रहे हो गीदड़ भाई। किंतु वनराज ने उसे अभयदान दिया है। वे उसे नहीं मारेंगे। अब तुम ही बताओ कि उन्हें कैसे मनायें?” कौवा बोला।

गीदड़ इसका उपाय पहले ही सोच चुका था। उसके अपनी योजना कौवे और बाघ को बता दी। दोनों ने उस योजना के लिए हामी भर दी। साथ ही अन्य अनुचरों को भी योजना के बारे में अच्छी तरह समझा दिया।

इसके बाद वे सिंह के पास पहुँचे। गीदड़ आगे आकार बोला, “वनराज! हम सबने आपके लिए शिकार की बहुत खोज की। किंतु हमें कोई न मिला। कथनक शारीरिक रूप से विशाल है और अब तो वह हृष्ट-पुष्ट भी हो गया है। यदि आप उसका शिकार करें, तो हमारे कई दिनों के भोजन की व्यवस्था हो जायेगी।”

“मैंने उसे अभयदान दिया है। मैं उसे नहीं मार सकता।” सिंह ने दो टूक उत्तर दिया।

“यदि कथनक स्वयं को आपकी भूख मिटाने प्रस्तुत करे तो? तब तो आपको कोई आपत्ति नहीं होगी।” गीदड़ बोला।

“नहीं, तब तो कोई आपत्ति नहीं है। किंतु क्या वह ऐसा करेगा?” सिंह अचरज में बोला।

“वनराज! कथनक क्या? आपके भूख मिटाने तो इस वन के समस्त प्राणी तत्पर है। आप आज्ञा करें।” इस तरह गीदड़ ने अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों से सिंह को मना लिया।

उसके बाद वह कथनक के पास पहुँचा और उसे बोला, “शाम को वनराज ने एक सभा रखी है। जिसमें तुम्हें भी बुलाया गया है।”

शाम को सिंह की सभा में वन के सभी जीव उपस्थित थे। कथनक भी उपस्थित हुआ। गीदड़ ने भरी सभा में कहा, “वनराज, हम सभी आपकी अवस्था देख बहुत दु:खी है। आज हम सभी यहाँ उपस्थित हुए हैं, ताकि आपके भोजन के लिए स्वयं को समर्पित कर सकें।”

इसके बाद एक-एक कर सभी जीव सामने आकर स्वयं को सिंह के भोजन के लिए प्रस्त्तुत करने लगे। किंतु गीदड़ उनमें कोई न कोई कमी निकाल देता और सिंह उन्हें खाने से मना कर देता। इस तरह किसी को छोटा, किसी के शरीर पर बाल, किसी के तेज नाखून होना आदि बहाने बनाकर गीदड़ उन्हें बचाता गया।

जब कथनक की बारी आई और उसने देखा कि सारे जीव स्वयं को सिंह के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं और सिंह किसी को भी नहीं मार रहा, तो सबकी देखा-देखी उसने भी स्वयं को सिंह के सामने प्रस्तुत कर दिया, “वनराज, आपके मुझ पर बहुत उपकार है। अब जब आपको आवश्यकता आ पड़ी है, तो मैं स्वयं को आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ। कृपया मुझे मारकर अपनी भूख मिटा लीजिये।”

कथनक को विश्वास था कि अन्य जीवों की तरह सिंह उसको भी नहीं मारेगा। किंतु जैसे ही कथनक की बात पूरी हुई, गीदड़ और बाघ (Tiger) उस पर टूट पड़े और उसे मार डाला।

शिक्षा: इस कहानी से सीख मिलती है कि लोगों की चिकनी-चुपड़ी बातों में कभी नहीं आना चाहिए। स्वामी जब बुद्धिहीन हो और उसके साथी धूर्त, तो चौकन्ना और सावधान रहना आवश्यक है।

चींटी और कबूतर

तपती दोपहरी में प्यास से बेहाल एक छोटी सी चींटी पानी की तलाश में भटक रही थी। बहुत देर भटकने के बाद उसे एक नदी दिखाई पड़ी और वो ख़ुश होकर नदी की ओर बढ़ने लगी। नदी के किनारे पहुँचकर जब उसने कल-कल बहता शीतल जल देखा, तो उसकी प्यास और बढ़ गई।

वह सीधे नदी में नहीं जा सकती थी। इसलिए किनारे पड़े एक पत्थर पर चढ़कर पानी पीने का प्रयास करने लगी। लेकिन इस प्रयास में वह अपना संतुलन खो बैठी और नदी में गिर पड़ी।

नदी के पानी में गिरते ही वह तेज धार में बहने लगी। उसे अपनी मृत्यु सामने दिखाई देने लगी। तभी कहीं से एक पत्ता उसके सामने आकर गिरा। किसी तरह वह उस पत्ते पर चढ़ गई। वह पत्ता नदी किनारे स्थित एक पेड़ पर बैठे कबूतर ने फेंका था, जिसने चींटी को पानी में गिरते हुए देख लिया था और उसके प्राण बचाना चाहता था।

पत्ते से साथ बहते हुए चींटी किनारे पर आ गई और कूदकर सूखी भूमि पर पहुँच गई। कबूतर के निःस्वार्थ भाव से की गई सहायता के कारण चींटी की जान बच पाई थी। वह मन ही मन उसका धन्यवाद करने लगी।

इस घटना को कुछ ही दिन बीते थे कि एक दिन कबूतर बहेलिये के द्वारा बिछाये जाल में फंस गया। उसने वहाँ से निकलने के लिए बहुत पंख फड़फड़ाये, बहुत ज़ोर लगाया, लेकिन जाल से निकलने में सफ़ल न हो सका। बहेलिये ने जाल उठाया और अपने घर की ओर जाने लगा। कबूतर निःसहाय सा जाल के भीतर कैद था।

जब चींटी की दृष्टि जाल में फंसे कबूतर पर पड़ी, तो उसे वह दिन स्मरण हो आया, जब कबूतर ने उसके प्राणों की रक्षा की थी। चींटी तुरंत बहेलिये के पास पहुँची और उसके पैर पर ज़ोर-ज़ोर से काटने लगी। बहेलिया दर्द से छटपटाने लगा। जाल पर से उसकी पकड़ ढीली पड़ गई और जाल जमीन पर जा गिरा।

कबूतर को जाल से निकलने का अवसर प्राप्त हो चुका था। वह झटपट जाल से निकला और उड़ गया। इस तरह चींटी ने कबूतर के द्वारा किये गये उपकार का फ़ल चुकाया।

शिक्षा: कर भला, हो भला। दूसरों पर किया गया उपकार कभी व्यर्थ नहीं जाता। उसका प्रतिफल कभी न कभी अवश्य प्राप्त होता है। इसलिए सदा निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करना चाहिए।

चालाक मुर्गे और गीदड़

एक गाँव में एक मुर्गा रहता था। वह रोज़ सुबह बांग देकर गाँव वालों को जगाया करता था। एक दिन एक गीदड़ कहीं से घूमता हुआ गाँव में आ गया। जब उसने मुर्गे को देखा, तो उसकी लार टपकने लगी। वह सोचने लगा – ‘वाह! क्या शानदार मुर्गा है। अगर इसका मांस खाने को मिल जाये तो मज़ा आ जाये।

वह तरकीब सोचने लगता है, ताकि किसी तरह मुर्गे को दबोच कर पेट पूजा कर सके। उसने मुर्गे को बहला-फुसला कर अपने काबू में करने का निश्चय किया और उसके पास पहुँचकर बोला, “मित्र! मैं तुम्हारी आवाज़ सुनकर तुम्हारे पास आया हूँ। तुम्हारी आवाज़ बहुत ही सुरीली है। कानों में मिश्री घुल जाती है। मन करता है, दिन-भर सुनता रहूं। क्या तुम एक बार मुझे अपनी सुरीली आवाज़ सुनाओगे।”

मुर्गे की कभी किसी ने इतनी प्रशंसा नहीं की थी। वह गीदड़ की बात सुनकर मुर्गा ख़ुशी से फूला नहीं समाया और उसे अपनी आवाज़ सुनाने के लिए ज़ोर-ज़ोर से “कूक-डू-कू” करने लगा।

गीदड़ इसी फ़िराक में था। उसके देखा कि मुर्गे का ध्यान उसकी ओर नहीं है। इसलिए अवसर पाकर उसने मुर्गे को अपने मुँह में दबा लिया और जंगल की ओर भागने लगा।

जब वह जंगल की ओर भाग रहा था, उस समय गाँव वालों की दृष्टि उस पर पड़ गई। वे लाठी लेकर उसे मारने के लिए दौड़े। गीदड़ डर के मारे और तेजी से भागने लगा। मुर्गा अब तक उसके मुँह में दबा था। तब तक उसने उसके चंगुल से बचकर निकलने का एक उपाय सोच लिया था।

वह भागते हुए गीदड़ से बोला, “देखो गीदड़ भाई! ये गाँव वाले मेरे कारण तुम्हारा पीछा कर रहे हैं। वे तब तुम्हारा पीछा करना छोड़ेंगे, जब तुम उनसे कहोगे कि मैं तुम्हारा हूँ, उनका नहीं। ऐसा करो, तुम उन्हें बोल दो।”

गीदड़ मुर्गे की बातों में आ गया और पलटकर बोलने के लिए अपना मुँह खोल लिया। लेकिन जैसे ही उसने मुँह खोला, मुर्गा उड़ गया और गाँव वालों के पास चला गया। इस तरह अपनी चतुराई से उसने अपनी जान बचाई।

शिक्षा: संकट के समय बुद्धिमानी से काम लेना चाहिए।

सबसे खुश पक्षी

एक कौवा एक वन में रहा करता था। उसे कोई कष्ट नहीं था और वह अपने जीवन से पूरी तरह संतुष्ट था। एक दिन उड़ते हुए वह एक सरोवर के किनारे पहुँचा। वहाँ उसने एक उजले सफ़ेद हंस को तैरते हुए देखा। उसे देखकर वह सोचने लगा – “यह हंस कितना सौभाग्यशाली है, जो इतना सफेद और सुंदर है। इधर मुझे देखो, मैं कितना काला और बदसूरत हूँ। ये हंस अवश्य इस दुनिया का सबसे खुश पक्षी होगा।”

वह हंस के पास गया और अपने मन की बात उसे बता दी। सुनकर हंस बोला, “नहीं मित्र! वास्तव में ऐसा नहीं है। पहले मैं भी सोचा करता था कि मैं इस दुनिया का सबसे सुंदर पक्षी हूँ। इसलिए बहुत सुखी और खुश था। लेकिन एक दिन मैंने तोते को देखा, जिसके पास दो रंगों की अनोखी छटा है। उसके बाद से मुझे यकीन है कि वही दुनिया का सबसे सुंदर और खुश पक्षी है।”

हंस की बात सुनने के बाद कौवा तोते के पास गया और उससे पूछा कि क्या वह दुनिया का सबसे खुश पक्षी है। तोते ने उत्तर दिया, “मैं बहुत ही खुशगवार जीवन व्यतीत कर रहा था, जब तक मैंने मोर को नहीं देखा था। किंतु अब मुझे लगता है कि मोर से सुंदर तो कोई हो ही नहीं सकता। इसलिये वही दुनिया का सबसे सुखी और खुश पक्षी है।”

इसके बाद कौवा मोर की खोज में निकला। उड़ते-उड़ते वह एक चिड़ियाघर पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि मोर एक पिंजरे में बंद है और उसे देखने के लिए बहुत सारे लोग जमा हैं। सभी मोर की बहुत सराहना कर रहे थे। सबके जाने के बाद कौवा मोर के पास गया और उससे बोला, “तुम कितने सौभाग्यशाली हो, जो तुम्हारी सुंदरता के कारण हर रोज़ हजारों लोग तुम्हें देखने आते है। मुझे तो लोग अपने आस-पास भी फटकने नहीं देते और देखते ही भगा देते है। तुम इस दुनिया के सबसे खुश पक्षी हो ना?” कौवे की बात सुनकर मोर उदास हो गया।

वह बोला, “मित्र! मुझे भी अपनी सुंदरता पर बड़ा गुमान था। मैं सोचा करता था कि मैं इस दुनिया का क्या, बल्कि इस पूरे ब्रम्हाण्ड का सबसे सुंदर पक्षी हूँ। इसलिए खुश भी बहुत था। लेकिन मेरी यही सुंदरता मेरी शत्रु बन गई है और मैं इस चिड़ियाघर में बंद हूँ। यहाँ आने के बाद इस पूरे चिड़ियाघर का अच्छी तरह मुआयना करने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि कौवा ही एक ऐसा पक्षी है, जो यहाँ कैद नहीं है। इसलिए पिछले कुछ दिनों से मैं सोचने लगा हूँ कि काश मैं कौवा होता, तो कम से कम आज़ादी से बाहर घूम सकता और तब मैं इस दुनिया का सबसे सुखी और खुश पक्षी होता।”

शिक्षा: हम हमेशा दूसरों को देखकर व्यर्थ ही स्वयं की तुलना उनसे करने लगते है और दु:खी हो जाते है। भगवान ने सबको अलग बनाया है और अलग गुण दिए हैं। हम उसका महत्व नहीं समझते और दु:ख के चक्र में फंस जाते हैं। इसलिए दूसरों के पास जो है, उसे देखकर जलने की बजाय हमें हमारे पास जो है, उसके साथ खुश रहना सीखना चाहिए। खुशी बाहर ढूंढने से नहीं मिलती, वह तो हमारे अंदर ही छिपी हुई होती है।

बाज़ और चूज़ों

एक गाँव में एक किसान रहता था। एक बार उसे कहीं से बाज़ का एक अंडा मिला। उसने वह अंडा मुर्गी के अंडे के साथ रख दिया। मुर्गी उस अंडे को अन्य अंडों के साथ सेने लगी।

कुछ दिनों में मुर्गी के अंडे में से चूज़े निकल आये और बाज़ के अंडे में से बाज़ का बच्चा। बाज़ का बच्चा चूज़ों के साथ पलने लगा। वह चूज़ों के साथ खाता-पीता, खेलता, इधर-उधर फुदकता बड़ा होने लगा।

चूज़ों के साथ रहते हुए उसे कभी अहसास ही नहीं हुआ कि वह चूज़ा नहीं बल्कि बाज़ है। वह खुद को चूजा ही समझता था और हर काम उन्हीं की तरह करता था।

जब उड़ने की बारी आई, तो अन्य चूज़ों की देखा-देखी वह भी थोड़ी ही ऊँचाई तक उड़ा और फिर वापस जमीन पर आ गया। उसका भी ऊँचा उड़ने का मन करता, लेकिन जब वह सबको थोड़ी ही ऊँचाई तक उड़ता देखता, तो वह भी उतनी ही ऊँचाई तक उड़ता। ज्यादा ऊँचा उड़ने की वह कोशिश ही नहीं करता था।

एक दिन उसने ऊँचे आकाश में एक बाज़ को उड़ते हुए देखा। इतनी ऊँचाई पर उसने किसी पक्षी को पहली बार उड़ते हुए देखा था। उसे बड़ा अचरज हुआ। उसने चूजों से पूछा, “वो कौन है भाई, जो इतनी ऊँचाई पर उड़ रहा है?”

चूज़े बोले, “वो पक्षियों का राजा बाज़ है। वह आकाश में सबसे ज्यादा ऊँचाई पर उड़ता है। कोई दूसरा पक्षी उसकी बराबरी नहीं कर सकता।”

“यदि मैं भी उसके जैसा उड़ना चाहूं तो?” बाज़ के पूछा।

“कैसी बात करते हो? मत भूलों तुम एक चूज़े हो। चाहे कितनी ही कोशिश कर लो, बाज़ जितना नहीं उड़ पाओगे। इसलिए व्यर्थ में ऊँचा उड़ने के बारे में मत सोचो। जितना उड़ सकते हो, उतने में ही ख़ुश रहो।” चूज़े बोले।

बाज़ ने यह बात मान ली और कभी ऊँचा उड़ने की कोशिश ही नहीं की। बाज़ होने बावजूद वह पूरी ज़िन्दगी मुर्गी के समान जीता रहा।

शिक्षा: सोच और दृष्टिकोण का हमारे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता हैं। हम सभी क्षमता और संभावनाओं से परिपूर्ण हैं। चाहे हम कैसी भी परिस्थिति में क्यों न हों, हमें आवश्यकता है अपनी क्षमता पहचानने की और अपनी सोच तथा दृष्टिकोण को व्यापक बनाने की। हम स्वयं को चूज़े समझेंगे तो चूज़े ही बनेंगे और बाज़ समझेंगे, तो बाज़ बनेंगे। ख़ुद को कम न समझें, अपनी क्षमता को सीमित न करें, बाज़ बनें और जीवन में ऊँची उड़ान भरें।

बगुला भगत

दूरस्थ वन में स्थित एक जलाशय में मछलियाँ, केकड़े, मेंढक और ना-ना प्रकार के जीव-जंतु रहा करते थे। तालाब के किनारे एक बूढ़ा बगुला भी रहा करता था।

बूढ़ा बगुला भोजन के लिए तालाब की मछलियों पर निर्भर था। वह दिन भर तालाब किनारे घात लगाये बैठा रहता। जैसे ही कोई मछली नज़र आती, उसे लपककर पकड़ लेता और अपने पेट की ज्वाला शांत कर लेता था।

लेकिन धीरे-धीरे उसकी आँखें कमज़ोर होने लगी और मछलियाँ पकड़ना उसके लिए दुष्कर हो गया। अब वह दिन-रात एक टांग पर खड़ा होकर सोचता रहता कि ऐसी हालत में कैसे भोजन की व्यवस्था की जाये।

एक दिन उसे एक युक्ति सूझी। युक्तिनुसार वह तालाब के किनारे गया और एक टांग पर खड़ा होकर जोर-जोर से विलाप करने लगा। उसे इस तरह विलाप करता देख तालाब में रहने वाला एक केकड़ा आश्चर्यचकित हो उसके पास आया और पूछने लगा, “बगुला मामा! क्या बात है? इस तरह आँसू क्यों बहा रहे हो? क्या आज कोई मछली हाथ नहीं लगी?”

बगुला बोला, “बेटा! कैसी बात कर रहे हो? अब मैंने वैराग्य का जीवन अपना लिया है और मछलियों तथा अन्य जीवों का शिकार छोड़ दिया है। वैसे भी इस जलाशय के समीप रहते मुझे वर्षों हो गए है। यहाँ रहने वाले जलचरों के प्रति मन में प्रेम और अपनत्व का भाव जाग चुका है। इसलिए मैं उनके प्राण नहीं हर सकता।”

“तो इस तरह विलाप करने का क्या कारण है मामा?” केकड़े ने उत्सुकतावश पूछा।

“मैं तो इस तालाब में रहने वाले अपने भाई-बंधुओं के लिए विलाप कर रहा हूँ। आज ही एक जाने-माने ज्योतिष को मैंने ये भविष्यवाणी करते सुना कि इस क्षेत्र में १२ वर्षों के लिए अकाल पड़ेगा। यहाँ स्थित समस्त जलाशय सूख जायेंगे और उनमें रहने वाले जीव-जंतु भूख-प्यास से मर जायेंगे। आसपास के सभी छोटे जलाशयों के जीव-जंतु बड़ी-बड़ी झीलों की ओर प्रस्थान कर रहे हैं। किंतु इस जलाशय के जीव-जंतु निश्चिंत बैठे हैं। इस जलाशय का जलस्तर अत्यंत कम है। सूखा पड़ने पर ये अतिशीघ्र सूख जायेगा। यहाँ के रहवासी सभी जलचर मारे जायेंगें। यही सोच-सोचकर मेरे आँसू नहीं थम रहे हैं।”

बगुले की बात सुनकर केकड़ा तुरंत तालाब में रहने वाली मछलियों और अन्य जलचरों के पास गया और उन्हें बगुले की अकाल संबंधी बात बता दी।

ये सुनना था कि सभी जलचर बगुले के पास जा पहुँचे और उससे इस समस्या से निकलने का उपाय पूछने लगे।

दुष्ट बगुला तो इसी अवसर की ताक में था। वह बोला, “बंधुओं, चिंता की कोई बात नहीं है। यहाँ से कुछ ही दूरी पर जल से लबालब एक बड़ी झील अवस्थित है। वहाँ का जल अगले ५० वर्षों तक नहीं सूखेगा मैं तुम्हें अपनी पीठ पर लादकर उस झील में छोड़ आऊंगा। इस तरह तुम सबकी जान बच जायेगी।”

बगुले की बात सुनकर सभी जलचरों में पहले जाने की होड़ लग गई और वे बगुले से अनुनय करने लग गए, “बगुला मामा, हमें वहाँ पहले पहुँचा दो।”

ये देख बगुले की बांछे खिल गई। उसने सबको शांत किया और बोला, “बंधुओं, मैं तुम सबको एक-एक कर अपनी पीठ पर लादकर उस झील तक ले जाऊंगा। फिर चाहे मेरा जो हाल हो। आखिर तुम सब मेरे अपने हो।”

उस दिन के बाद से बगुला प्रतिदिन एक मछली को अपनी पीठ पर लादकर ले जाता और कुछ दूरी तय करने के बाद एक बड़ी शिला पर पटककर मार डालता। फिर छककर अपना पेट भरने के बाद दूसरे दिन दूसरा शिकार अपनी पीठ पर लादकर चल पड़ता।

ऐसे ही कई दिन बीत गये। बगुले को बिना परिश्रम के रोज़ एक मछली का आहार मिलने लगा। एक दिन जब बगुला तालाब के किनारे गया, तो केकड़ा बोला, “बगुला मामा! आपने सूखा पड़ने की बात मुझे सबसे पहले बताई। किंतु अब तक आप मुझे बड़ी झील लेकर नहीं गए। आज मैं आपकी कुछ नहीं सुनूंगा। आज आपको मुझे ही लेकर जाना होगा।”

बगुला भी रोज़ मछली खाकर ऊब चुका था। उसने सोचा कि क्यों ना आज केकड़े को ही अपना आहार बनाया जाये? और वह केकड़े को अपनी गर्दन पर बैठाकर उड़ने लगा।

कुछ दूर जाने के बाद केकड़े ने देखा कि एक बड़ी शिला के पास मछलियों की हड्डियों का अंबार लगा हुआ है। उसे संदेह हुआ कि हो न हो ये सब बगुले का ही किया धरा है।

उसने बगुले से पूछा, “मामा, और कितनी दूर जाना है। तुम मुझे उठाये-उथाये थक गये होगे।”

शिला तक पहुँचने के बाद बगुले ने सोचा कि अब वास्तविकता बताने में कोई हर्ज़ नहीं। उसने केकड़े को सारी बात बता दी और बोला, “केकड़े, ईश्वर का स्मरण कर ले। तेरा अंत समय आ चुका है। अब मैं तुझे भी इन मछलियों की तरह इस शिला पर पटककर मार दूंगा और अपना आहार बनाऊंगा।”

ये सुनना था कि केकड़े ने अपने नुकीले दांत बगुले की गर्दन पर गड़ा दिए। बगुले की गर्दन कट गई और वह वहीं तड़पकर मर गया।

केकड़ा बगुले की कटी हुई गर्दन लेकर वापस तालाब में पहुँचा और दुष्ट बगुले की दुष्टता की कहानी सब जलचरों को बताई और बोला, “अब वह दुष्ट मर चुका है। तुम सब लोग यहाँ आनंद के साथ रहो।”

शिक्षा: किसी भी बात का बिना सोचे-समझे विश्वास नहीं करना चाहिए। मुसीबत में धैर्य से काम लेना चाहिये।

कौवा और सांप

नगर के पास बरगद के पेड़ (Banyan Tree) पर एक घोंसला था, जिसमें वर्षों से कौवा (Crow) और कौवी का एक जोड़ा रहा करता था। दोनों वहाँ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे। दिन भर भोजन की तलाश में वे बाहर रहते और शाम ढलने पर घोंसले में लौटकर आराम करते।

एक दिन एक काला सांप (snake) भटकते हुए उस बरगद के पेड़ के पास आ गया। पेड़ के तने में एक बड़ा खोल देख वह वहीं निवास करने लगा। कौवा-कौवी इस बात से अनजान थे। उनकी दिनचर्या यूं ही चलती रही।

मौसम आने पर कौवी ने अंडे दिए। कौवा और कौवी दोनों बड़े प्रसन्न थे और अपने नन्हे बच्चों के अंडों से निकलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। लेकिन एक दिन जब वे दोनों भोजन की तलाश में निकले, तो अवसर पाकर पेड़ की खोल में रहने वाले सांप (serpent) ने ऊपर जाकर उनके अंडों को खा लिया और चुपचाप अपनी खोल में आकर सो गया।

कौवा-कौवी ने लौटने पर जब अंडों को घोंसलों में नहीं पाया, तो बहुत दु:खी हुए। उसके बाद से जब भी कौवी अंडे देती, सांप उन्हें खाकर अपनी भूख मिटा लेता। कौवा-कौवी रोते रह जाते।

मौसम आने पर कौवी ने फिर से अंडे दिए। लेकिन इस बार वे सतर्क थे। वे जानना चाहते थे कि आखिर उनके अंडे कहाँ गायब हो जाते हैं।

योजनानुसार एक दिन वे रोज़ की तरह घोंसले से बाहर निकले और दूर जाकर पेड़ के पास छुपकर अपने घोंसले की निगरानी करने लगे। कौवा-कौवी को बाहर गया देख काला सांप पेड़ की खोल से निकला और घोंसले में जाकर अंडों को खा गया।

आँखों के सामने अपने बच्चों को मरते देख कौवा-कौवी तड़प कर रह गए। वे सांप का सामना नहीं कर सकते थे। वे उसकी तुलना में कमज़ोर थे। इसलिए उन्होंने अपने वर्षों पुराने निवास को छोड़कर अन्यत्र जाने का निर्णय किया।

जाने के पूर्व वे अपने मित्र गीदड़ से अंतिम बार भेंट करने पहुँचे। गीदड़ को पूरा वृतांत सुनाकर जब वे विदा लेने लगे, तो गीदड़ बोला, “मित्रों, इन तरह भयभीत होकर अपना वर्षों पुराना निवास छोड़ना उचित नहीं है। समस्या सामने है, तो उसका कोई न कोई हल अवश्य होगा।”

कौवा बोला, “मित्र, हम कर भी क्या सकते हैं। उस दुष्ट सांप की शक्ति के सामने हम निरीह हैं। हम उसका मुकाबला नहीं कर सकते। अब कहीं और जाने के अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं है। हम हर समय अपने बच्चों को मरते हुए नहीं देख सकते।”

गीदड़ कुछ सोचते हुए बोला, “मित्रों, जहाँ शक्ति काम न आये, वहाँ बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।” यह कहकर उसने सांप से छुटकारा पाने की एक योजना कौवा-कौवी को बताई।

अगले दिन योजनानुसार कौवा-कौवी नगर ने सरोवर में पहुँचे, जहाँ राज्य की राजकुमारी अपने सखियों के साथ रोज़ स्नान करने आया करती थी। उन दिन भी राजकुमारी अपने वस्त्र और आभूषण किनारे रख सरोवर में स्नान कर रही थी। पास ही सैनिक निगरानी कर रहे थे।

अवसर पाकर कौवे ने राजकुमारी का हीरों का हार अपनी चोंच में दबाया और काव-काव करता हुआ राजकुमारी और सैनिकों के दिखाते हुए ले उड़ा।

कौवे को अपना हार ले जाते देख राजकुमारी चिल्लाने लगी। सैनिक कौवे के पीछे भागे। वे कौवे के पीछे-पीछे बरगद के पेड़ के पास पहुँच गए। कौवा यही तो चाहता था।

राजकुमारी का हार पेड़ के खोल में गिराकर वह उड़ गया। सैनिकों ने यह देखा, तो हार निकालने पेड़ की खोल के पास पहुँचे।

हार निकालने उन्होंने खोल में एक डंडा डाला। उस समय सांप खोल में ही आराम कर रहा था। डंडे के स्पर्श पर वह फन फैलाये बाहर निकला। सांप को देख सैनिक हरक़त में आ गए और उसे तलवार और भले से मार डाला।

सांप के मरने के बाद कौवा-कौवी ख़ुशी-ख़ुशी अपने घोंसले में रहने लगे। उस वर्ष जब कौवी ने अंडे दिए, तो वे सुरक्षित रहे।

शिक्षा: जहाँ शारीरिक शक्ति काम न आये, वहाँ बुद्धि से काम लेना चाहिए। बुद्धि से बड़ा से बड़ा काम किया जा सकता है और किसी भी संकट का हल निकाला जा सकता है।

लोमड़ी और कौवा

एक लोमड़ी भोजन की तलाश में जंगल में भटक रही थी। एक पेड़ के पास से गुजरते हुए उसकी नज़र ऊँची डाल पर बैठे कौवे पर पड़ी। वह ठिठक गई। ऐसा नहीं था कि लोमड़ी ने पहले कौवा नहीं देखा था। लेकिन जिस चीज़ ने उसका ध्यान आकर्षित किया था, वह उस कौवे की चोंच में दबा हुआ रोटी का टुकड़ा था।

‘अब कहीं और जाने की ज़रुरत नहीं। ये रोटी अब मेरी है।’ – चालाक लोमड़ी ने मन ही मन सोचा और पेड़ के नीचे जाकर खड़ी हो गई। फिर ऊपर सिर उठाकर मीठी आवाज़ में कौवे से बोली, “शुभ-प्रभात मेरे सुंदर दोस्त।”

लोमड़ी की आवाज़ सुनकर कौवे ने अपना सिर नीचे झुकाया और लोमड़ी को देखा। लेकिन अपनी चोंच उसने कसकर बंद रखी और लोमड़ी के अभिवादन का कोई उत्तर नहीं दिया।

“तुम कितने सुंदर हो दोस्त…” लोमड़ी ने अपनी बोली में पूरी मिठास झोंक दी, “देखो तुम्हारे पंख कैसे चमक रहे हैं? तुम जैसा सुंदर पक्षी मैंने आज तक नहीं देखा। तुम विश्व के सबसे सुंदर पक्षी हो। मेरे ख्याल से तुम तो पक्षियों के राजा हो।”

कौवे ने अपनी इतनी प्रशंषा आज तक नहीं सुनी थी। वह बहुत खुश हुआ और गर्व से फूला नहीं समाया। लेकिन उसने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी।

इधर लोमड़ी प्रयास करती रही, “दोस्त! मैं सोच रही हूँ कि जो पक्षी इतना सुंदर है, इसकी आवाज़ कितनी मीठी होगी? क्या तुम मेरे लिए एक गीत गुनगुना सकते हो?”

लोमड़ी के मुँह से अपनी आवाज़ की प्रशंषा सुनकर कौवे से रहा न गया। वह गाना गाने के लिए मचल उठा। लेकिन जैसे ही उसने गाना गाने के लिए अपना मुँह खोला, उसकी चोंच में दबा रोटी का टुकड़ा नीचे गिर गया।

नीचे मुँह खोले खड़ी लोमड़ी इसी फिराक़ में थी। उसने रोटी झपट ली और चलती बनी।

शिक्षा: चापलूसों से बचकर रहो।

लोमड़ी और सारस

एक जंगल में एक चालाक लोमड़ी रहती थी। उसे दूसरे जानवरों को मूर्ख बनाने में बड़ा आनंद प्राप्त होता था। वह आये-दिन कोई न कोई युक्ति सोचती और किसी न किसी जानवर को उसमें फंसाकर मज़े लिया करती थी। जंगल के सारे जानवर उसका स्वभाव समझ चुके थे। इसलिए उससे कन्नी काटने लगे थे।

एक दिन एक सारस (Crane) जंगल में आया और नदी किनारे रहने लगा। लोमड़ी (Fox) के नज़र जब सारस पर पड़ी, तो वह सोचने लगी – जंगल के दूसरे जानवर तो मुझसे कन्नी काटने लगे हैं। ये सारस जंगल में नया आया प्रतीत होता है। क्यों न इसे मूर्ख बनाकर मज़े लूं?

वह सारस के पास गई और बोली, “मित्र! इस जंगल में नये आये मालूम पड़ते हो। तुम्हारा स्वागत है।”

“सही पहचाना मित्र। मुझे यहाँ आये अभी कुछ ही दिन हुए हैं। मैं यहाँ किसी से परिचित भी नहीं हूँ। तुमने मेरा स्वागत किया, इसलिए तुम्हारा धन्यवाद।” सारस ने उत्तर दिया।

लोमड़ी ने सारस के समक्ष मित्रता का प्रस्ताव रखा। सारस का उस जंगल में कोई मित्र नहीं था। उसने लोमड़ी की मित्रता स्वीकार कर ली। लोमड़ी ने उससे मीठी-मीठी बातें की और वापस जाते-जाते अपने घर भोज के लिए आमंत्रित कर गया।

नियत दिन को उपहार लेकर सारस लोमड़ी के घर पहुँचा। लोमड़ी उसका स्वागत करते हुए बोली, “आओ मित्र! आज मैंने तुम्हारे लिए स्वादिष्ट खीर तैयार की है।”

अंदर बुलाकर उसने दो तश्तरियां लगाई और उसमें खीर परोस दी। लंबी चोंच वाले सारस ने तश्तरी से खीर खाने का प्रयास किया, लेकिन खा नहीं पाया। उधर लोमड़ी झटपट तश्तरी में से खीर चाट गई।

अपनी तश्तरी में से खीर ख़त्म करने के बाद वह सारस से बोली, “खीर तो बहुत स्वादिष्ट है मित्र। लेकिन तुम खा क्यों नहीं रहे हो?”

सारस संकोचवश बस इतना ही कह पाया, “आज मेरे पेट में दर्द है मित्र। इसलिए मैं ये स्वादिष्ट खीर खा नहीं पाया। लेकिन भोज के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद।”

सारस अपमान का घूंट पीकर वहाँ से चला आया। उधर लोमड़ी सारस को मूर्ख बनाकर बहुत खुश हुई।

कुछ दिनों बाद सारस ने लोमड़ी को भोज पर आमंत्रित किया। नियत दिन को लोमड़ी बिना कोई उपहार लिए ही सारस के घर पहुँच गई। सारस के उसे अंदर बुलाया और बोला, “मित्र! मैंने भी भोज में खीर बनाया है। आशा है तुम्हें उसका स्वाद पसंद आएगा।”

खीर सुनकर लोमड़ी के मुँह में पानी आ गया और वह खीर परोसने की प्रतीक्षा करने लगी। कुछ देर में सारस ने सुराही में खीर भरकर परोस दी। सुराही में खीर देखकर लोमड़ी का मुँह उतर गया। उसके लिए सुराही से खीर खा पाना असंभव था। वह चुपचाप सारस का मुँह देखने लगी, जो अपनी लंबी चोंच से झटपट सुराही में रखा खीर पी गया।

खीर ख़त्म कर सारस बोला, “क्या बात है मित्र? तुम खा क्यों नहीं रहे हो? क्या तुम्हें खीर पसंद नहीं?”

लोमड़ी समझ गई कि सारस ने उससे अपने अपमान का बदला लिया है। वह खिसियाते हुए बोली, “नहीं मित्र! वो क्या है कि आज मेरे पेट में दर्द है।” और वहाँ से भाग खड़ी हुई।

शिक्षा: इस कहानी से सीख मिलती है कि जैसा करोगे, वैसा भरोगे। जैसे को तैसा।

किसान और सारस

एक बार, एक किसान को पता चला कि सारस उसके नया बोए गए मकई को नष्ट कर रहे थे। एक शाम, किसान ने हानिकारक पक्षियों को पकड़ने के लिए,

खेतों में जाल लगाया। जब वह अगली सुबह खेतों की जांच करने गए। तो उन्हें कुछ सारस पक्षी मिला, जो जाल में फंस गए थे।

किसान को देख कर उनमें से एक सारस रोने लगा। “मुझे छोड़ दो, क्योंकि मैंने तुम्हारा कोई भी मकाई नहीं खाया है। ना ही मैंने तुम्हें कोई नुकसान नुकसान पहुंचाया है।

मैं एक गरीब निर्दोष सारस हूं। जैसा कि आप देख सकते हैं, एक बहुत ही संदिग्ध पक्षी। मैं अपने माता-पिता का बहुत सम्मान करता हूं।”

लेकिन, किसान ने सारस को छोटा कर दिया। उसने कहा, “यह सब सही हो सकता है, मैं कहता हूं। क्योंकि मैंने तुम्हें उन पक्षियों के साथ पकड़ा है।

जो मेरी फसलों को नष्ट कर रहे थे। और उन पक्षियों के साथ तुम्हें भी नुकसान उठाना पड़ेगा, जिन पक्षियों के साथ तुम आए थे।

शिक्षा: लोगों को इस बात से आंका जाता है, कि उन्होंने संगठन में क्या रखा है।

किसान और चिड़िया

कुछ समय पहले की बात है, एक बहुत मेहनती किसान था। कड़ी धूप में उसने खेतों में काम किया और परिणाम स्वरूप बहुत अच्छी फसल हुई। फसल को देखकर किसान बहुत खुश थे।

क्योंकि, फसल काटने का समय आ गया था। इसी बीच खेतों में एक चिड़िया घर बना लिया था, उनके बच्चे अभी बहुत छोटे थे। एक दिन, किसान अपने बेटे के साथ खेत पर आया।

और कहां, “बेटा ऐसा करो, कि अपने सभी रिश्तेदारों को आमंत्रण करो। ताकि अगले शनिवार आकर फसल काटने में हमारी मदद करें।” यह सुनकर, चिड़िया के बच्चे बहुत घबरा गया।

और अपनी मां से कहने लगे, “अब हमारा क्या होगा? अभी तो हम पूरी तरह से उड़ने लायक नहीं हुए हैं।” मां चिड़िया ने कहा, “तुम सब चिंता मत करो। जो दूसरे के सहारे चलता है, उसकी कोई मदद नहीं करता।”

अगले शनिवार, जब बाप बेटे खेत पर पहुंचे। तो वहां कोई भी रिश्तेदार नहीं था। दोनों को बहुत निराशा हुई। फिर पिता ने बेटे से, सभी रिश्तेदारों को फिर से आमंत्रण करने के लिए कहा।

इस बार भी चिड़िया ने, अपने बच्चों के साथ बिना डर कर वहां खेतों में रहा। अगले हफ्ते जब दोनों बाप बेटे खेत पर पहुंचे। तो देखा कोई भी रिश्तेदार सहायता करने नहीं आया था।

तो किसान ने बेटे से कहा, “जो इंसान दूसरों का सहारा लेकर जीना चाहते हैं, उसका यही हाल होता है। उसे हमेशा निराशा ही मिलता है, अब चलो घर जाते हैं।

कल सुबह, हम फसल कटने का सामान लेकर आएंगे। और इस फसल को हम दोनों मिलकर काटेंगे।” चिड़िया ने जब यह सुना, तो उसने अपने बच्चों से कहने लगी।

“चलो, अब जाने का समय आ गया है। जब इंसान, खुद का काम खुद करने की प्रतिज्ञा कर लेता है। तो फिर उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं पड़ती है।

और ना उसे कोई रोक सकता है।” इससे पहले कि बाप बेटे फसल काटने आए। चिड़िया, अपने बच्चों को लेकर एक सुरक्षित स्थान पर चले गए। फिर बाप बेटे दोनों मिलकर खुशी से फसल काटी।

बुद्धिमान तोता

बहुत समय पहले की बात है। एक घने जंगल में एक तोता अपने दो बच्चों के साथ रहता है। उनका जीवन ख़ुशी-ख़ुशी बीत रहा था।

एक दिन जंगल से गुज़रते एक शिकारी की दृष्टि तोते के बच्चों की ख़ूबसूरत जोड़ी पर पड़ी। उसने सोचा कि राजा को देने के लिए ये तोते बहुत सुंदर उपहार है। वह उन तोतों को पकड़कर राजा के पास ले गया।

जब उसने वे तोते राजा को उपहार स्वरुप दिए, तो राजा बहुत ख़ुश हुआ और शिकारी को उसने सौ सोने के सिक्के ईनाम में दिए।

राजमहल में लाये जाने के बाद तोते सबके आकर्षण का केंद्र बन गए। उन्हें सोने के पिंजरे में रखवाया गया। हर समय सेवक उनके आगे-पीछे दौड़ते रहते। ना-ना प्रकार के ताज़े फ़ल उन्हें खिलाये जाते। राजा उनसे बहुत प्रेम करता था। राजकुमार भी सुबह-शाम उनके पास आकर खेला करता था। ऐसा जीवन पाकर दोनों तोते बहुत ख़ुश थे।

एक दिन छोटा तोता बड़े तोते से बोला, “भाई, हम कितने ख़ुशनसीब हैं, जो इस राजमहल में लाये गए और ऐसा आरामदायक जीवन पा सके। यहाँ हर कोई हमसे कितना प्यार करता है। हमारा कितना ख्याल रखता है।”

“हाँ भाई, यहाँ हमारी ज़रूरत की हर चीज़ बिना मेहनत के हमें मिल जाती है। हमारा जीवन पहले से अधिक आरामदायक हो गया है। सबसे अच्छी बात ये है कि यहाँ हमें हर किसी से प्रेम मिलता है।”

तोते को राजमहल का आनंदपूर्ण जीवन बहुत रास आ रहा था। लेकिन एक दिन सब बदल गया। वह शिकारी जिसने राजा को उपहार में तोते दिए थे, राजदरबार में फिर से आया। इस बार उसने एक काला बंदर राजा को उपहार में दिया।

अब काला बंदर राजमहल में सबके आकर्षण का केंद्र था। सारे सेवक उसकी देख-रेख में लग गए। उसके खाने-पीने का विशेष ख्याल रखा जाने लगा। तोतों के प्रति सबने ध्यान देना बंद कर दिया। यहाँ तक कि राजकुमार भी अब तोतों के स्थान पर बंदर के साथ खेलने लगा।

यह देखकर छोटा तोता बहुत दु;खी था। वह बड़े तोते से बोला, “भाई, इस काले बंदर ने हमारी सारी ख़ुशियाँ छीन ली है। इसके कारण अब हमारी ओर कोई ध्यान ही नहीं देता।”

बड़ा तोता बोला, “कुछ भी स्थायी नहीं रहता मेरे भाई। वक़्त बदलते देर नहीं लगती।”

कुछ दिन बीते। बंदर था तो शरारती। एक दिन उसने महल में बहुत उत्पात मचाया। सेवकों को बहुत तंग किया। राजकुमार भी उसकी हरक़त से डर गया।

राजा को जब बंदर की कारस्तानी पता चली, तो उसने उसे जंगल में छोड़ आने का आदेश दे दिया। आदेश का पालन कर बंदर को जंगल में छोड़ दिया गया।

उस दिन के बाद से तोते फिर से महल में सबके आकर्षण का केंद्र बन गए। अब छोटा तोता बहुत ख़ुश था। वह बड़े तोते से बोला, “हमारे दिन फिर से वापस आ गए भाई।”

बड़ा तोता बोला, “याद रखो मेरे भाई। समय कभी एक जैसा नहीं रहता। इसलिये जब समय साथ न दे, तो दु:खी नहीं होना चाहिए। बुरा समय है, तो अच्छा समय भी आयेगा।”

छोटे तोते को बड़े तोते की बात समझ में आ गई और उसने तय किया कि बुरे वक़्त में वह धैर्य बनाकर रखेगा।

शिक्षा: कोई भी चीज़ स्थायी नहीं रहती। समय के साथ हर चीज़ बदलती है। इसलिए मुश्किल समय में धैर्य बनाकर रखें।

ख़रगोश, तीतर और धूर्त बिल्ली

दूरस्थ वन में एक ऊँचे पेड़ की खोह में कपिंजल नामक तीतर का निवास था। कई वर्षों से वह वहाँ आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था।

एक दिन भोजन की ख़ोज में वह अपना खोह छोड़ निकला और एक हरे-भरे खेत में पहुँच गया। वहाँ हरी-भरी कोपलें देख उसका मन ललचा गया और उसने कुछ दिन उसी खेत में रहने का निर्णय किया। कोपलों से रोज़ अपना पेट भरने के पश्चात् वह वहीं सोने लगा।

कुछ ही दिनों में खेत की हरी-भरी कोपलें खाकर कपिंजल मोटा-ताज़ा हो गया। किंतु पराया स्थान पराया ही होता है। उसे अपने खोह की याद सताने लगी। वापसी का मन बना वह अपने खोह की ओर चल पड़ा।

खोह पहुँचकर उसने वहाँ एक ख़रगोश को वास करते हुए पाया। कपिंजल की अनुपस्थिति में एक दिन ‘शीघ्रको’ नामक ख़रगोश उस पेड़ पर आया और खाली खोह देख वहीं मज़े से रहने लगा।

अपने खोह में शीघ्रको का कब्ज़ा देख कपिंजल क्रोधित हो गया। उसे भगाते हुए वह बोला, “चोर, तुम मेरे खोह में क्या कर रहे हो? मैं कुछ दिन बाहर क्या गया, तुमने इसे अपना निवास बना लिया। अब मैं वापस आ गया हूँ। चलो भागो यहाँ से।”

किंतु शीघ्रको टस से मस नहीं हुआ और अकड़कर बोला, “तुम्हारा खोह? कौन सा? अब यहाँ मैं रहता हूँ। ये मेरा निवास है। इसे छोड़कर जाने के उपरांत तुम इस पर से अपना अधिकार खो चुके हो। इसलिये तुम यहाँ से भागो।”

कपिंजल ने कुछ देर विचार किया। उसे शीघ्रको से विवाद बढ़ाने में कोई औचित्य दिखाई नहीं पड़ा। वह बोला, “हमें इस विवाद के निराकरण के लिए किसी मध्यस्थ के पास चलना चाहिए। अन्यथा यह बिना परिणाम के बढ़ता ही चला जायेगा। मध्यस्थ हम दोनों का पक्ष सुनने के पश्चात जो भी निर्णय देगा, हम उसे स्वीकार कर लेंगे।”

शीघ्रको को भी कपिंजल की बात उचित प्रतीत हुई और दोनों मध्यस्थ की खोज में निकल पड़े।

जब कपिंजल और शीघ्रको में मध्य ये वार्तालाप चल रहा था, ठीक उसी समय एक जंगली बिल्ली वहाँ से गुजर रही थी। उसने दोनों की बातें सुन ली और सोचा क्यों ना स्थिति का लाभ उठाते हुए मैं इन दोनों की मध्यस्थ बन जाऊं। जैसे ही अवसर मिलेगा, मैं इन्हें मारकर खा जाऊंगी।

वह तुरंत पास बहती एक नदी के किनारे माला लेकर बैठ गई और सूर्य की ओर मुख कर ऑंखें बंद कर धर्मपाठ करने का दिखावा करने लगी।

कपिंजल और शीघ्रको मध्यस्थ की खोज करते-करते नदी किनारे पहुँचे। धर्मपाठ करती बिल्ली को देख उन्होंने सोचा कि ये अवश्य कोई धर्मगुरु है। न्याय के लिए उन्हें उससे परामर्श लेना उचित प्रतीत हुआ।

वे कुछ दूरी पर खड़े हो गए और बिल्ली को अपनी समस्या बताकर अनुनय करने लगे, “गुरूवर, कृपया हमारे विवाद का निपटारा कर दीजिये। हमें विश्वास है कि आप जैसे धर्मगुरू का निर्णय धर्म के पक्ष में ही होगा। इसलिए आपका निर्णय हर स्थिति में हमें स्वीकार्य है। हममें से जिसका भी पक्ष धर्म विरूद्ध हुआ, वो आपका आहार बनने के लिए तैयार रहेगा।”

अनुनय सुन धर्मगुरू बनी पाखंडी बिल्ली ने आँखें खोल ली और बोली, “राम राम ! कैसी बातें करते हो? हिंसा का मार्ग त्याग कर मैंने धर्म का मार्ग अपना लिया है। इसलिए मैं हिंसा नहीं करूंगी। किंतु तुम्हारे विवाद का निराकरण कर तुम्हारी सहायता अवश्य करूंगी। मैं वृद्ध हो चुकी हूँ और मेरी श्रवण शक्ति क्षीण हो चुकी है। इसलिए मेरे निकट आकर मुझे अपना-अपना पक्ष बताओ।”

पाखंडी बिल्ली की चिकनी-चुपड़ी बातों पर कपिंजल और शीघ्रको विश्वास कर बैठे और अपना पक्ष बताने उसके निकट पहुँच गये। निकट पहुँचते ही पाखंडी बिल्ली ने शीघ्रको को पंजे में दबोच लिया और कपिंजल को अपने मुँह में दबा लिया। कुछ ही देर में दोनों को सफाचट कर पाखंडी बिल्ली वहाँ से चलती बनी।

शिक्षा: अपनी शत्रु पर कभी भी आँख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए। परिणाम घातक हो सकता है।

चमगादड़, पशु और पक्षी की कहानी

बहुत समय पहले की बात है। जंगल में शांति से रहने वाले पशुओं और पक्षियों के मध्य किसी बात को लेकर अनबन हो गई। ये अनबन इतनी बढ़ी कि दोनों पक्षों में युद्ध छिड़ गया।

पशुओं की लंबी-चौड़ी सेना थी, जिसमें राजा शेर के अतिरिक्त लोमड़ी, भेड़िया, भालू, जिराफ़, सियार, ख़रगोश जैसे कई छोटे-बड़े जानवर सम्मिलित थे। वहीं आकाश में विचरण करने वाले पक्षियों की सेना भी कुछ कम न थी, उसमें चील, गिद्ध, कौवा, कबूतर, मैना, तोता सहित कई पक्षी सम्मिलित थे।

चमगादड़ बहुत परेशान था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि किसकी सेना में सम्मिलित हो। उसे अकेला देख पक्षी उसके पास आये और उसे आमंत्रित करने लगे, “चमगादड़ भाई, आओ हमारा साथ दो।”

“मैं तुम्हारे साथ कैसे आ सकता हूँ? देखो मुझे, पंख हटा दिया जाएं, तो मैं तो हूबहू चूहे के समान दिखता हूँ। मैं तो पशु हूँ। मुझे क्षमा करो।” चमगादड़ ने उत्तर दिया।

चमगादड़ का उत्तर सुन पक्षी चले गए।

पक्षियों के जाने के बाद पशुओं की मंडली उसके पास आई और बोली, “अरे भाई चमगादड़, यहाँ अकेले क्यों बैठे हो? आओ हमारी सेना में आ जाओ।”

“तुम्हें मेरे पंख दिखाई नहीं पड़ते। मैं तो पक्षी हूँ। कैसे तुम्हारी सेना में सम्मिलित हो जाऊं।” चमगादड़ ने अपना पल्ला झाड़ा। पशु भी चले गए।

कुछ दिनों बाद पशुओं और पक्षियों की अनबन समाप्त हो गई। दोनों पक्षों में मित्रता हो गई। जंगल में मंगल हो गया। सभी आनंद मनाने लगे।

उन्हें आनंद मनाता देख चमगादड़ ने सोचा कि अब मुझे किसी एक दल में सम्मिलित हो जाना चाहिए। वह पक्षियों के दल के पास गया और उनसे निवेदन किया कि वे उसे अपन दल में ले लें। किंतु, पक्षियों ने यह कहकर मना कर दिया, “अरे तुम तो पशु हो। ऐसे में तुम हमारे दल में कैसे आ सकते हो?”

मुँह लटकाकर चमगादड़ पशुओं के पास पहुँचा और उनसे भी यही निवेदन किया। पशुओं ने भी उसे अपने दल में स्वीकार नहीं किया। वे बोले, “क्या तुम भूल गए हो कि तुम्हारे पंख है और तुम एक पक्षी हो।”

चमगादड़ क्या करता? वह समझ गया कि आवश्यकता पड़ने पर साथ न देने पर कोई भी मित्र नहीं रहता। तब से चमगादड़ अकेला ही रहता है।

शिक्षा: आवश्यकता पड़ने पर सदा दूसरों का साथ दें। मौकापरस्त का कोई मित्र नहीं होता।

भेड़िये और सारस

एक जंगल में एक दुष्ट और लालची भेड़िया रहता था। एक दिन उसने एक हिरण का शिकार किया। शिकार के बाद पर वह अपने लालच पर नियंत्रण नहीं रख पाया और जल्दी-जल्दी उसे खाने लगा। इस जल्दीबाज़ी में एक हड्डी उसके गले में अटक गई।

हड्डी अटक जाने पर वह बहुत परेशान हो गया। अब उससे न कुछ खाते बन रहा था, न ही पीते। उसने बहुत कोशिश की कि किसी तरह हड्डी उसके गले से निकल जाए। लेकिन सारी कोशिश बेकार गई।

अंत में उसने किसी से सहायता लेने का विचार किया। वह सोचने लगा कि ऐसा कौन हैं, जो उसके गले से हड्डी का टुकड़ा निकाल सकता है। कुछ देर सोचने पर उसे सारस का ध्यान आया। सारस की लंबी गर्दन और चोंच थी। वह उसके मुँह में अपनी चोंच घुसाकर आसानी से हड्डी निकाल सकता था।

बिना देर किये भेड़िया सारस के पास पहुँचा और बोला, “सारस भाई! मेरे गले में एक हड्डी अटक गई है। क्या तुम अपनी चोंच से वो हड्डी निकाल दोगे? मैं तुम्हारा बहुत अहसानमंद रहूंगा और तुम्हें उचित ईनाम भी दूंगा।”

सारस पहले तो भेड़िये के मुँह में अपनी चोंच डालने से डरा। लेकिन बाद वे उसे भेड़िये पर दया आ गया और वह तैयार हो गया।

भेड़िये मुँह खोलकर खड़ा हो गया और सारस ने उसमें अपनी चोंच डाल दी। लेकिन उसकी चोंच हड्डी तक नहीं पहुँच पाई। तब उसे अपनी आधी गर्दन भी भेड़िये के मुँह में घुसानी पड़ी। सारस की गर्दन मुँह में जाते ही लालची भेड़िये के मन में लालच जागने लगा। उस सोचने लगा कि यदि मैं इसकी लज़ीज़ गर्दन को चबा पाता, तो मज़ा आ जाता। लेकिन उस समय उसे अपने गले में फंसी हड्डी निकलवानी थी। इसलिए वह मन मारकर रह गया।

कुछ ही देर में सारस ने उसके गले से हड्डी निकाल दी। हड्डी निकलते ही भेड़िया जाने लगा। न उसने सारस को धन्यवाद दिया न ही ईनाम। सारस ने उसे रोककर कहा, “मेरा ईनाम कहाँ है? तुमने कहा था कि तुम इस काम के बदले मुझे ईनाम दोगे।”

भेड़िया बोला, “एक भेड़िये के मुँह में अपनी गर्दन डालकर भी तुम सही-सलामत हो, क्या यह तुम्हारा ईनाम नहीं हैं?”

इतना कहकर भेड़िया चला गया और सारस मुँह लटकाकर खड़ा रह गया।

शिक्षा: लालची और दुष्ट व्यक्ति से कभी कृतज्ञता या पुरूस्कार की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

दो सिर वाला पक्षी

एक वन में भारंड नामक पक्षी (Bird) रहता था। उसकी आकृति विचित्र थी। उसका शरीर तो एक था, किंतु सिर दो थे। उन दोनों सिरों की आपस में नहीं बनती थी। समय-समय पर उनमें टकराव होता रहता था।

एक दिन वन में भटकते हुए पक्षी के दांये मुख को एक रसीला फल प्राप्त हुआ। उसने लपककर फ़ल को पकड़ लिया और बड़े ही चाव से खाने लगा।

यह देख बाएं मुख की भी लार टपकने लगी। उसने दांये मुख से कहा, “तनिक मैं भी तो यह फ़ल चखकर देखूं।”

किंतु दांये मुख ने उसे झिड़क दिया, “इसकी क्या आवश्यकता है? मैं खाऊँ या तुम, जायेगा तो हमारे ही पेट में और पेट तो हमारा एक ही है। वह तो भर ही जायेगा।”

यह उत्तर सुन बायें मुख को क्रोध आ गया। वह दांये मुख से अपने अपमान और तिरस्कार का बदला लेने का अवसर खोजने लगा।

यह अवसर उसे प्राप्त हो गया, जब नदी किनारे पड़ा हुआ एक सुनहरा फ़ल उसे प्राप्त हुआ। वह यह फल दांये मुख को जलाते हुए अकेले ही खाना चाहता था। किंतु जैसे ही वह उसे खाने को हुआ, पास ही एक वृक्ष पर बैठा कौवा (Crow) बोल पड़ा, “बंधु उस फल को मत खाना। वह विषाक्त है। उसे खाते ही तुम मर जाओगे।”

यह बात सुन दांयें मुख ने बायें मुख को चेताया और रोकने का प्रयास किया। किंतु बायां मुख प्रतिशोध की ज्वाला में जल रहा था। उसने दांये मुख की एक ना सुनी और वह फल खा लिया। फल खाते ही पक्षी के प्राण पखेरू उड़ गए।

शिक्षा: जो आपस में मिल-जुलकर काम नहीं करते, वे नष्ट हो जाते हैं।

मोर और नीलकंठ

बरसात का मौसम था। मोर सुंदर पंख फैलाए नाच रहे थे। पेड़ पर बैठे एक नीलकंठ ने उन्हें नाचते हुए देखा, तो सोचने लगा कि काश, मेरे भी ऐसे सुंदर पंख होते, तब मैं इनसे भी ज्यादा सुंदर दिखाई पड़ता।

कुछ देर बाद वह मोरों के रहने के ठिकाने पर पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि मोरों के ढेर सारे पंख जमीन पर बिखरे हुए हैं। उसने सोचा कि यदि मैं इस पंखों को अपनी पूंछ में बांध लूं, तो मैं भी मोर जैसा सुंदर दिखने लगूंगा।

बिना देर किये उसके उन पंखों को उठाया और अपनी पूंछ में बांध लिया। वह बहुत प्रसन्न था। उसे लगने लगा कि वह भी मोर बन गया है। वह ठुमकता हुआ मोरों के बीच गया और घूम-घूमकर उन्हें दिखाने लगा कि अब उसके पास भी मोर जैसे सुंदर पंख है और वह उनमें से ही एक है।

मोरों ने जब उसे देखा, तो पहचान लिया कि वो तो एक नीलकंठ है। फिर क्या सब उस पर टूट पड़े। वे उस पर चोंच मारकर मोर-पंखों को नोच-नोचकर निकालने लगे। कुछ ही देर में उन्होंने नीलकंठ की पूंछ में से सारे मोर-पंख नोंच दिए।

नीलकंठ के साथीगण दूर से यह सारा नज़ारा देख रहे थे। सारे पंख मोरों द्वारा नोंचकर निकाल दिए जाने के बाद दुखी मन से नीलकंठ अपने साथियों के पास गया। लेकिन वे सब उससे नाराज़ थे। वे बोले, “सुंदर पक्षी बनने के लिए मात्र सुंदर पंख ही आवश्यक नहीं है। हर पक्षी की अपनी सुंदरता होती है।”

शिक्षा: दूसरों की नक़ल न करें। स्वाभाविक रहें।

दो चिड़ियों की कहानी

जंगल में बरगद के ऊँचे पेड़ पर एक चिड़िया घोंसला बनाकर अपने दो बच्चों के साथ रहती थी। एक दिन एक तूफ़ान आया और बरगद का वह पेड़ गिर गया। पेड़ से दबकर चिड़िया मर गई। लेकिन सौभाग्य से उसके दोनों बच्चे बच गए।

तेज हवा चिड़िया के एक बच्चे को उड़ाकर एक गुफ़ा के पास ले गई, जहाँ डाकू रहा करते थे। चिड़िया का दूसरा बच्चा ऋषि-मुनियों के आश्रम के पास जाकर गिरा। समय बीतने लगा और दोनों बच्चे बड़े होने लगे।

कई महिने बीत चुके थे। एक दिन एक राजा जंगल में शिकार करने आया और रास्ता भटक गया। वह बहुत थका हुआ था। एक स्थान पर उसने अपना घोड़ा रोका और पेड़ की छाया में आराम करने बैठ गया। जहाँ वह आराम कर रहा था, उसके पास ही एक गुफ़ा थी।

राजा ने आँख बंद ही की थी कि जिस पेड़ के नीचे वह आराम कर रहा था, उस पर बैठी चिड़िया बोल पड़ी, “जल्दी आओ…जल्दी आओ…इस आदमी के पास ढेर सारे आभूषण हैं। इसका गला काटकर इसे मार डालो और इसे लूट लो।”

यह सुनकर राजा हैरान रह गया। तभी उसे गुफ़ा के अंदर कुछ आहट महसूस हुई। खतरा भांपते ही वह अपने घोड़े को सरपट दौड़ाता हुआ वहाँ से दूर निकल गया।

वह घोड़ा दौड़ाता-दौड़ाता थक चुका था। आराम करने वह एक पेड़ के नीचे जा बैठा। पास ही एक आश्रम दिखाई पड़ रहा था। उसके नीचे बैठते ही पेड़ की एक डाली पर बैठी चिड़िया बोल पड़ी, “राजन, आपका स्वागत है। इस समय आश्रम में कोई नहीं है। ऋषि बाहर गए हैं। किंतु आप अंदर जाकर आराम करिए। कुछ देर में ऋषि आते होंगे।”

राजा ने सिर उठाकर चिड़िया को देखा, वह हूबहू पहले वाली चिड़िया की तरह ही दिख रही थी। चिड़िया की बात मानकर राजा आश्रम के अंदर चला गया। कुछ देर में ऋषि आश्रम लौट आये। राजा ने उन्हें प्रणाम किया।

ऋषि ने राजा के लिए भोजन-पानी का प्रबंध किया। भोजन के बाद कुछ देर आराम कर राजा जाने को हुआ, तो उसने मन में कौंध रहा प्रश्न ऋषि से पूछ लिया, “गुरूवर, आपके आश्रम के सामने स्थित पेड़ पर जैसी चिड़िया है। हूबहू वैसी ही चिड़िया मैंने कुछ दूरी पर स्थित एक गुफ़ा के पास के पेड़ पर देखी। लेकिन दोनों की बोली में बहुत अंतर था। मैं हैरान हूँ कि एक जैसी चिड़िया होने के बाद भी दोनों में इतना अंतर?”

“राजन! वे दोनों एक ही चिड़िया से जन्मे थे और तूफ़ान में बिछड़ गए थे। एक डाकुओं की गुफ़ा के पास उनके संगत में बड़ी हुई और उनकी बोली सीख ली। एक हम ऋषियों के संगत मे बड़ी हुई और हमारी बोली सीखी। सब संगत खेल है।”

शिक्षा: हमारी संगत का हमारे आचरण, व्यवहार और जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। इसलिए सोच-समझकर संगत का चुनाव करना चाहिए, क्योंकि जैसी संगत वैसी रंगत।

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