दोस्तों, आज की इस पोस्ट में हम बच्चों के लिए Nursery Rhymes Stories in Hindi में लेकर आये है। दोस्तों यह stories बहुत Interesting है। आपको इन stories को पढ़ कर बहुत मजा आएगा । उम्मीद है कि आपको यह stories पसंद आयेगी। 

Nursery Rhymes Stories in Hindi

Nursery Rhymes Stories in Hindi List

महात्मा बना विषधर

मेहनत का फल

शिकारी और लक्कड़हारा

मां की ममता

रानी की शक्ति

नीली चिड़िया

मूर्ख राजा और चालाक दर्जी

दो मछलियों और एक मेंढक की कथा

चुनमुन के बच्चे

कालिया को मिली सजा

मुकेश की पेंटिंग स्वच्छता के लिए

करुणा का प्रहार

हाथी और चतुर खरगोश

मुर्गा की अकल ठिकाने

शेर का आसन

रेलगाड़ी

राजू की समझदारी

सच्ची मित्रता

सांपों की कथा

शरारती चूहा

स्वयं का नुकसान

अपने गलती का पछतावा

दद्दू की चोट पर हुई किसकी पिटाई

कुम्हार का वात्सल्य रूप

मछुआरा और मछलियों का नाच

चालाक नाग

बिच्छू और संत

चिंटू पिंटू की शरारत

दोस्त का महत्व

मोती का मित्र

बंदर ने सबक सीखा

अनपढ़ सेठ

दुष्ट भेड़िया

पिता की परेशानी

बिल्ली बच गई

रितेश के तीन खरगोश राजा

बलवान कछुए की मूर्खता

साहस का परिचय

और बन गई क्रिकेट टीम

महात्मा बना विषधर

गांव के बाहर पीपल बड़ा वृक्ष था। यह वृक्ष 200 साल से अधिक पुराना था। गांव के लोग उस वृक्ष के नीचे नहीं जाते थे। वहां एक भयंकर विषधर सांप रहा करता था। कई बार उसने चारा खा रही बकरियों को काट लिया था।

गांव के लोगों में उसका डर था। गांव में रामकृष्ण परमहंस आए हुए थे।

लोगों ने उस विषधर का इलाज करने को कहा।

रामकृष्ण परमहंस उस वृक्ष के नीचे गए और विषधर को बुलाया। विषधर क्रोध में परमहंस जी के सामने आंख खड़ा हुआ। विषधर को जीवन का ज्ञान देकर परमहंस वहां से चले गए।

विषधर अब शांत स्वभाव का हो गया। वह किसी को काटना नहीं था।

गांव के लोग भी बिना डरे उस वृक्ष के नीचे जाने लगे।

एक दिन जब रामकृष्ण परमहंस गांव लौट कर आए।

उन्होंने देखा बच्चे पीपल के पेड़ के नीचे खेल रहे हैं। वह विषधर को परेशान कर रहे थे। विषधर कुछ नहीं कर रहा है।

ऐसा करता देख उन्होंने बच्चों को डांट कर भगाया, और विषधर को अपने साथ ले गए।

शिक्षा: संत की संगति में दुर्जन भी सज्जन बन जाते हैं।

मेहनत का फल

एक बार एक गाँव में एक किसान और उसके चार बेटे रहते थे। किसान बहुत बूढ़ा हो चुका था और बीमार रहने लगा था।

एक दिन उसने अपने सभी बेटों को बुला कर कहा-“मेरे बेटो, डॉक्टर ने कहा है कि मैं अब एक सप्ताह से ज्यादा जीवित नहीं रहूँगा।

इसलिए मैं तुम सभी से एक राज़ की बात कहना चाहता हूँ। मैंने मेरे अँगूर के बाग में एक खज़ाना छुपा रखा है। मेरे मरने के बाद वह खज़ाना आपस में बांट लेना।”

कुछ दिन बाद किसान मर गया। तब उसके बेटे कुदाल लेकर अंगूर के बाग में गए। उन्होंने सारा वाग खोद डाला परंतु उन्हें कुछ भी नहीं मिला।

वे बहुत निराश हुए। परन्तु पूरे बाग की खुदाई हो जाने के कारण उस बार अंगूर की फसल बहुत अच्छी हुई। सभी भाई बहुत खुश हुए। वे सभी समझ चुके थे कि मेहनत ही असली खज़ाना है।

शिकारी और लक्कड़हारा

एक बार जंगल के पास एक लकड़हारा रहता था। एक दिन जब वह जंगल के पास से गुज़र रहा था तो उसे अपनी ओर एक शिकारी आता दिखाई दिया।

शिकारी के कंधे पर बंदूक लटक रही थी। वह बहुत प्रभावशाली लग रहा था। शिकारी लक्कड़हारे के पास आया और कठोर आवाज़ में बोला-“क्या तुमने यहाँ कोई भालू देखा है?

मेरा मतलब है, उसके पैरों के निशान देखो हैं?” लक्कड़हारा बहुत बहादुर था। वह बोला-“हाँ, मैंने देखा है। आओ, मैं तुम्हें उसकी माँद में ले चलूं।”

ऐसा कह कर उसने अपनी कुल्हाड़ी नीचे रखी। शिकारी को इस बात की उम्मीद नहीं थी। डर के मारे उसका चेहरा पीला पड़ गया।

वह कांपती हुई आवाज में बोला-“वह नहीं, दरअसल मैं भालू को नहीं सिर्फ उसके पैरों के निशान को ढूंढ रहा था।” ऐसा कह कर वह जल्दी से वहाँ से चला गया।

मां की ममता

आम के पेड़ पर एक सुरीली नाम की चिड़िया रहती थी। उसने खूब सुंदर घोंसला बनाया हुआ था। जिसमें उसके छोटे-छोटे बच्चे साथ में रहते थे। वह बच्चे अभी उड़ना नहीं जानते थे, इसीलिए सुरीली उन सभी को खाना ला कर खिलाती थी।

एक दिन जब बरसात तेज हो रही थी। तभी सुरीली के बच्चों को जोर से भूख लगने लगी। बच्चे खूब जोर से रोने लगे, इतना जोर की देखते-देखते सभी बच्चे रो रहे थे। सुरीली से अपने बच्चों के रोना अच्छा नहीं लग रहा था। वह उन्हें चुप करा रही थी, किंतु बच्चे भूख से तड़प रहे थे इसलिए वह चुप नहीं हो रहे थे।

सुरीली सोच में पड़ गई, इतनी तेज बारिश में खाना कहां से लाऊंगी। मगर खाना नहीं लाया तो बच्चों का भूख कैसे शांत होगा। काफी देर सोचने के बाद सुरीली ने एक लंबी उड़ान भरी और पंडित जी के घर पहुंच गई।

पंडित जी ने प्रसाद में मिले चावल दाल और फलों को आंगन में रखा हुआ था। चिड़िया ने देखा और बच्चों के लिए अपने मुंह में ढेर सारा चावल रख लिया। और झटपट वहां से उड़ गई।

घोसले में पहुंचकर चिड़िया ने सभी बच्चों को चावल का दाना खिलाया। बच्चों का पेट भर गया, वह सब चुप हो गए और आपस में खेलने लगे।

शिक्षा: संसार में मां की ममता का कोई जोड़ नहीं है अपनी जान विपत्ति में डालकर भी अपने बच्चों के हित में कार्य करती है।

रानी की शक्ति

रानी एक चींटी का नाम है जो अपने दल से भटक चुकी है। घर का रास्ता नहीं मिलने के कारण, वह काफी देर से परेशान हो रही थी। रानी के घर वाले एक सीध में जा रहे थे। तभी जोर की हवा चली, सभी बिखर गए। रानी भी अपने परिवार से दूर हो गई। वह अपने घर का रास्ता ढूंढने में परेशान थी।

काफी देर भटकने के बाद उसे जोर से भूख और प्यास लगी।

रानी जोर से रोती हुई जा रही थी।

रास्ते में उसे गोलू के जेब से गिरी हुई टॉफी मिल गई। रानी के भाग्य खुल गए। उसे भूख लग रही थी और खाने को टॉफी मिल गया था। रानी ने जी भर के टोपी खाया अब उसका पेट भर गया।

रानी ने सोचा क्यों ना इसे घर ले चलूँ, घर वाले भी खाएंगे।

टॉफी बड़ा थी, रानी उठाने की कोशिश करती और गिर जाती। रानी ने हिम्मत नहीं हारी। वह दोनों हाथ और मुंह से टॉफी को मजबूती से पकड़ लेती है ।

घसीटते -घसीटते वह अपने घर पहुंच गई। उसके मम्मी – पापा और भाई-बहनों ने देखा तो वह भी दौड़कर आ गए। टॉफी उठाकर अपने घर के अंदर ले गए।

फिर क्या था ?

सभी की पार्टी शुरू हो गई।

शिक्षा: लक्ष्य कितना भी बड़ा हो निरंतर संघर्ष करने से अवश्य प्राप्त होता है।

नीली चिड़िया

बहुत समय पहले, एक चिड़िया थी जिसके पंख रंग-बिरंगे थे। वह भगवान से नीले पंख पाने के लिए प्रार्थना करती थी। वह एक तालाब के पास रहती थी,

जिसमें वह रोज नहाती थी। वह सोचती थी कि ऐसा करने से उसके पंख पानी की तरह नीले हो जाएंगे। एक दिन उसके सारे पंख झड़ गए और पानी में गिर गए।

तब भी, उसने उम्मीद नहीं छोड़ी। वह उसी प्रकार नहाती रही और भगवान से प्रार्थना करती रही। एक दिन उसके सुंदर नीले रंग के पंख उग आए, जो आज तक मौजूद हैं।

एक दिन, एक लोमड़ी ने उस नीली चिड़िया के सुंदर नीले पंख देखे। उसने, उससे इसका कारण पूछा। नीली चिड़िया ने उसे अपनी पूरी कहानी बताई।

लोमड़ी ने भी वैसा ही करने का फैसला किया। वह रोज़ पानी में गोता लगाती परंतु सब व्यर्थ जाता।

एक दिन, गुस्से में उसने अपनी पूँछ की नोक बुरी तरह से पटकी तो वह सफेद हो गई, जो आज तक वैसी ही है।

मूर्ख राजा और चालाक दर्जी

एक समय, एक राज्य में एक चालाक दर्जी रहता था। वह हमेशा ऐसी पोशाक बनाने का दावा करता था, जिसे केवल बुद्धिमान लोग ही देख सकते थे।

राजा ने दर्जी के बारे में सुना, तब उसने वैसी ही पोशाक बनाने का उसे आदेश दिया। दर्जी को पोशाक बनाने के लिए आवश्यक चीजों के लिए पैसा दिया गया।

लेकिन वास्तव में, सिलाई मशीन पर कुछ भी नहीं था। दर्जी राजा को धोखा दे रहा था। राजदरबारी भी उसके पास पोशाक देखने जाते परंतु जो पोशाक थी ही नहीं वे उसे देखने का नाटक करते थे.

क्योंकि वे मर्ख नहीं कहलाना चाहते थे। यहाँ तक कि दर्जी का दौरा करते समय राजा ने भी ऐसा ही नाटक किया। अंत में राजा ने एक परेड में वह पोशाक (जो थी ही नहीं) पहनने का फैसला किया।

जैसे ही वह परेड में पहुँचा, एक बच्चा जोर से चिल्लाया-“देखो! राजा ने कपड़े नहीं पहने!” यह सुनते ही सभी जोर से हसने लगे। यह सुनकर राजा भी झेंप गया।

अब राजा को भी अपनी गलती का एहसास हो रहा था कि किस प्रकार दर्जी उसे मूर्ख बना रहा था। इस तरह राजा ने खुद को बेवकूफ बनाया।

दो मछलियों और एक मेंढक की कथा

बहुत समय पहले, एक बार एक गांव में सूखा पड़ गया। गांव के लोग बहुत परेशान थे। उनका मुख्य व्यवसाय मछली पालन सूखे की वजह से अस्त-व्यस्त हो गया।

गांव के सभी लोग पलायन करने लगे। कोई कहीं गया कोई कहीं। गाँव में रहने वाले मछुआरों ने किसी जलाशय वाली जगह को ढूंढना शुरू कर दिया।

औऱ उनकी तलाश खतम हुई। उन्हें एक बड़ी सी नदी दिखाई दी।

उन सभी ने अपना वहीं नदी के किनारे डेरा डाल दिया।

नदी में बहुत सारी मछलियां रहती थी। मछलियों के कई सारे समुदाय थे। उनमें से दो मछलियों की आपस में बहुत गहरी मित्रता थी।

1 मछली का नाम था, सहस्रबुद्धि और दूसरी का नाम था शतबुद्धि।

सहस्रबुद्धि के पास एक हजार बुद्धियाँ थी, और शतबुद्धि के पास सौ।

दोनो अपने कुल की इकलौती ऐसी मछलियां थी, जो कि इतनी अधिक बुद्धिशाली थी। उन दोनों का एक उभयनिष्ठ मित्र था, मेंढक।

उसके पास केवल एक ही बुद्धि थी, लेकिन वह फिर भी उन दोनों का मित्र था।

एक दिन नदी के बाहर मेंढक, शतबुद्धि और सहस्रबुद्धि आपस में बातचीत कर रहे थे।

सहस्रबुद्धि बोली, “मेरे पास तो 1000 बुद्धियाँ हैं। मैं संसार मे सबसे ज्यादा बुद्धिशील और बलशाली हूँ।”

इतने में शतबुद्धि ने कहा, “ठीक ही कह रही हो, मेरे पास भी 100 बुद्धियाँ हैं, मैं भी बुद्धिशाली और बलवान हूँ। ” मेंढक इन दोनों की बातें सुन रहा था, वह चुप रहा।

तब सहस्रबुद्धि ने मेंढक से पूछा! तुम क्यों चुप हो, कुछ कहो!

मेंढक बोला!, “मेरे पास तो एक ही बुद्धि है, पता नहीं तुम दोंनो मुझे अपना मित्र मानती हो या नहीं। आखिर इतनी बुद्धि वाली मछलियां मुझसे क्यो दोस्ती करेंगे भला??”

तब शतबुद्धि बोली, “मित्रता बुद्धि से नही, सच्चे हृदय से की जाती है। और तुम्हारे पास सच्चा हृदय है। तुम्हें तो खुद होना चाहिए कि तुम्हारे मित्र हैं, वरना किसी के तो मित्र ही नहीं होते।”

इतने में सहस्रबुद्धि भावुक हो गयी। वह नम स्वर में बोली, “चलो हम तीनों आपस में वादा करते हैं कि हम सब अपनी मित्रता पूरी ईमानदारी से निभाएंगे।”

दोनों ने हामी भरी।

अब तीनो ख़ुशी मनाने लगे। शाम हो चली। अब तीनों ने फैसला किया कि उन्हें अब अपने अपने घर चलना चाहिए।

तीनो अपने अपने घर चले गए।

अब वे तीनों रोज मिलते और खूब सारी मस्ती करते।

एक दिन वे तीनों नदी की सैर करने निकले। जब वे वहां वापस आए तो उन्होंने देखा कि, कुछ मछुआरे वहां अपने जाल को लेकर खड़े हैं।

ये वही मछुआरे थे जो पलायन करके नदी के पास के गांव में रहने लगे थे।

अब तीनों मित्र डरने लगे। सहस्रबुद्धि बोली, “यह हमें और हमारे साथियों को पकड़ने आए हैं। चलो हम किनारे चलते हैं।”

तीनो दोस्त किनारे आ गए। मछुआरों ने अपना जाल फेंका। बहुत सी मछलियां उसमें फंस गई और अपना दम तोड़ दिया।

एक मछुआरा बोला, “भाई यहां यो बहुत सी मछलियां हैं, हमारे तो भाग्य खुल गए। हमने अपने रहने के लिये बिल्कुल सही जगह चुनी है।

यहां से ये नदी कितनी पास है, हमें मछलियों को पकड़ने में कम मेहनत लग रही है।”

तभी दूसरा मछुआरा बोला, “हां भई! ठीक कह रहे हो। इतनी मछलियां दो दिन तक चल जाएंगी। हम परसों को फिर यहां आएंगे।”

फिर मछुआरे मछलियों से भरे जाल को अपने कंधों में उठा कर वहां से चले गए।

सहस्रबुद्धि, शतबुद्धि और मेंढक यह बात सुन रहे थे। उन्होंने यह बात जल्द से सभी मछलियों को बता दी। सब बहुत चिंतित थे। उन सबने मिलकर एक सभा का आयोजन किया, 

इस मुसीबत से बचने के लिए सबने अपनी अपनी राय देने के लिए, सभा शुरू हुई।

लेकिन किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा था। तब सहस्रबुद्धि ने कहा, 

“आप सब चिंता न करें। मैं अपनी बुद्धि के प्रयोग से आप सब को बचा लुंगी। ” शतबुद्धि ने भी उसका साथ देते हुए कहा, “हां यह ठीक कह रही है।

हम दोनो अपनी बुद्धि के बल पर आप सब को बचा लेंगे।”

सभी मछलियों को उन पर विश्वास हो गया। अब निश्चिंत होकर सब अपने अपने घर चले गये।

सबको तो विश्वास हो गया था लेकिन, मेंढक को उन पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं हुआ। लेकिन उसने यह बात अपनी दोस्तों को नहीं बताई।

ताकि उनको बुरा न लगे। उसे लगा कि, इन दोनों में घमण्ड आ गया है, इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

वह दिन आ ही गया। मछुआरे फिर अपना जाल लेकर वहां, नदी के किनारे आ पहुंचे।

मेंढक ने पहले ही अपने लिए एक दूसरे जलाशय को खोज चुका था। वह अपनी मेंढकी को लेकर उस जलाशय में चला गया।

मछुआरों ने अपना जाल, नदी में फेंक दिया। इस बार छोटी छोटी मछलियों के साथ दो बड़ी मछलियां भी जाल में फंस गई। वह दो बड़ी मछलियां सहस्रबुद्धि और शतबुद्धि ही थे।

उन्होंने अपनी बुद्धि के बल पर कई पैंतरे अपनाए, लेकिन वे काम नहीं आए। सब मछलियों ने एक एक करके अपना दम तोड़ दिया।

मछुआरे उन्हें लेकर वहां से चले गए। मेंढक को जब यह पता चला कि उसकी दोनों दोस्त अब नहीं रहीं उसको बहुत बुरा लगा।

और अब वह बची हुई सारी मछलियों को अपने साथ नए जलाशय में ले गया।

शिक्षा: “कठिन समय मे एक बुद्धि का उचित प्रयोग ही पर्याप्त होता है। स्वयं के होशियार होने पर, या खुद को होशियार समझने पर कभी घमण्ड नही करना चाहिए। यह घमण्ड एक दिन बहुत हानि पहुंचाता है।”

चुनमुन के बच्चे

बच्चों की प्यारी गोरैया चिड़िया। यह सबके घर में प्यार से रहती है। जो दाना-पानी देता है, उसके घर तो मस्ती से रहती है। कूलर के पीछे चुनमुन का घोंसला है। उसके तीन बच्चे है, यह अभी उड़ना नहीं जानते।

चुनमुन के बच्चों ने उड़ना सिखाने के लिए तंग कर दिया।

चुनमुन कहती अभी थोड़ी और बड़ी हो जाओ तब सिखाएंगे। बच्चे दिनभर ची ची ची ची करके चुनमुन को परेशान करते।

एक दिन चुनमुन ने बच्चों को उड़ना सिखाने के लिए कहा।

अपने दोनों हाथों में उठाकर आसमान में ले गई। उन्हें छोड़ दिया, वह धीरे-धीरे उड़ रही थी।

जब बच्चे गिरने लगते चुनमुन उन्हें अपने पीठ पर बैठा लेती। फिर उड़ने के लिए कहती।

ऐसा करते करते चुनमुन के बच्चे आसमान में उड़ने लगे थे।

चुनमुन ने सभी को घर चलने के लिए कहा।

सब मां के पीछे-पीछे घर लौट आए।

शिक्षा: अभ्यास किसी भी कार्य की सफलता की पहली सीढ़ी होती है।

कालिया को मिली सजा

कालिया से पूरा गली परेशान था। गली से निकलने वाले लोगों को कभी भों भों करके डराता। कभी काटने दौड़ता था। डर से बच्चों ने उस गली में अकेले जाना छोड़ दिया था।

कोई बच्चा गलती से उस गली में निकल जाता तो, उसके हाथों से खाने की चीज छीन कर भाग जाता ।

कालिया ने अपने दोस्तों को भी परेशान किया हुआ था।

सब को डरा कर वाह अपने को गली का सेट समझने लगा था। उसके झुंड में एक छोटा सा शेरू नाम का डॉगी भी था।

वह किसी को परेशान नहीं करता, छोटे बच्चे भी उसे खूब प्यार करते थे।

एक दिन शेरू को राहुल ने एक रोटी ला कर दिया।

शेरू बहुत खुश हुआ उस रोटी को लेकर गाड़ी के नीचे भाग गया। वहीं बैठ कर खाने लगा।

कालिया ने शेरू को रोटी खाता हुआ देख जोर से झटका और रोटी लेकर भाग गया।

शेरू जोर-जोर से रोने लगा।

राहुल ने अपने पापा से बताया। उसके पापा कालिया की हरकत को जानते थे। वह पहले भी देख चुके थे।

उन्हें काफी गुस्सा आया।

एक लाठी निकाली और कालिया की मरम्मत कर दी।

कालिया को अब अपनी नानी याद आ गई थी।

वह इतना सुधर गया था, गली में निकलने वालों को परेशान भी नहीं करता।

छोटे बच्चे को देखते ही छुप जाता था।

शिक्षा: बुरे काम का बुरा ही नतीजा होता है बुरे कामों से बचना चाहिए।

मुकेश की पेंटिंग स्वच्छता के लिए

मुकेश कोई छः – सात साल का होगा। उसे पेंटिंग करना और क्रिकेट खेलना बेहद पसंद है। खाली समय में वह क्रिकेट खेलता और पेंटिंग बनाया करता था।

पेंटिंग की कोई भी प्रतियोगिता स्कूल में होती, तो उसमें वह प्रथम स्थान प्राप्त करता। मुकेश की पेंटिंग की सराहना स्कूल में भी की जाती थी।

मुकेश जब भी स्कूल जाता उसे रास्ते में कूड़ेदान से होकर गुजरना पड़ता था।

लोग पटरियों पर कूड़ा फेंक देते और दीवार के सामने पेशाब भी करते थे, जिसके कारण वहां काफी बदबू आती थी। मुकेश को यह सब अच्छा नहीं लगता था।

एक दिन की बात है प्रधानमंत्री स्वच्छता कार्यक्रम के लिए सभी विद्यार्थियों को सहयोग करने के लिए कह रहे थे। मुकेश को आइडिया आया उसने कूड़ेदान के पास जाकर खूब सारी पेंटिंग दीवार पर बना दी। वह पेंटिंग इतनी खूबसूरत थी कि कोई भी व्यक्ति वहां से गुजरते हुए। उस पेंटिंग की सराहना करते जाता था।

धीरे-धीरे वहां से लोगों ने कूड़ा फेंकना बंद कर दिया, और इतनी खूबसूरत पेंटिंग दीवार पर थी कि कोई अब वहां खड़े होकर पेशाब भी नहीं करता था। देखते ही देखते वह रास्ता साफ हो गया था।

मुकेश को अब स्कूल और घर के बीच किसी प्रकार की गंदगी दिखाई नहीं देती थी। इसे देखकर वह काफी खुश होता था।

शिक्षा: कुछ बड़ा कर गुजरने की कोई आयु नहीं होती। अपनी प्रतिभा से समाज को भी बदला जा सकता है।

करुणा का प्रहार

अब्दुल के पास एक बकरी थी, उस बकरी का एक छोटा सा बच्चा था। अब्दुल दोनों को प्यार करता उनके लिए खेत से नरम और मुलायम घास लाता।

दोनों बकरियां घास को खाकर खुश रहती थी।

अब्दुल को दूर से देखकर झटपट दौड़ उसके पास पहुंच जाया करती थी।

अब्दुल चौथी कक्षा में पढ़ता था।

एक दिन जब वह स्कूल गया हुआ था।

उसके अम्मी – अब्बू ने बकरी के बच्चे का सौदा सलीम से कर दिया।

सलीम जब उस बच्चे को लेकर जाने लगा बकरी समझ गई। उसके बच्चे को यह लोग ले जा रहे हैं।

बकरी जोर – जोर से चिल्लाने लगी

उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी। काफी प्रयत्न कर रही थी, किंतु वह रस्सी से बंधी हुई थी।

सलीम बच्चे को लेकर काफी दूर निकल गया।

बच्चा भी जोर जोर से चिल्ला रहा था। वह अपनी मां को पुकार रहा था। मां की करुणा आंसुओं में बह रही थी, किंतु बेबस थी।

बकरी ने अंतिम समय सोचा, अगर अभी प्रयत्न नहीं किया तो वह अपने बच्चे से कभी नहीं मिल पाएगी। ऐसा सोचते हुए एक बार जोरदार प्रयास किया। रस्सी का फंदा बकरी के गले से टूट गया। वह बकरी जान – प्राण लेकर सलीम की ओर भागी।

अपने बच्चे को देखकर बकरी ने सलीम पर जोरदार प्रहार किया। काफी समय सलीम को मशक्कत करते हो गई, किंतु बकरी के प्रहार को रोक नहीं पाया। एकाएक अनेकों प्रहार बकरी करती रही।

अंत में सलीम हार मान गया और बकरी के बच्चे को वहीं छोड़कर। अब्दुल के अम्मी – अब्बू से अपने पैसे लेकर वापस लौट आया।

अब्दुल जब वापस लौट कर आया उसे पड़ोसियों ने पूरी घटना बता दी। जिसके बाद वह अपने मां-बाप से गुस्सा हो गया। मां बाप ने काफी समझाया किंतु उसने किसी की एक न सुनी। क्योंकि वह बकरी उसके लिए अमूल्य थे जिसे वह बेचना चाह रहे थे।शिक्षा:

मां की करुणा के प्रहार से बड़ी से बड़ी शक्तियां पराजित हो जाती है। मां अपने बच्चे के लिए अपना जीवन भी दांव पर लगा देती है। बकरी ने अपना जीवन दाव पर लगाकर सलीम पर प्रहार किया था।

हाथी और चतुर खरगोश

एक बार जंगल में एक हाथी रहता था। उसके साथ अन्य भिन्न जातियों के जीव भी रहते थे। प्रारंभ से ही सब एक साथ मिलकर, प्रेम से अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे।

एक बार जंगल में बहुत महीनों से बारिश नहीं हुई। वहां के पेड़ पौधे सब पानी और सिंचाई के बिना सूखने लगे। जंगल के आस पास के सभी जलाशय सूखने लगे।

सभी जानवर पानी की तलाश में जंगल छोड़कर इधर उधर भटकने लगे।

हाथी भी जंगल से बाहर आ गया। करीब एक हफ्ते के कठिन रस्ते में चलने के बाद उसे दुर किसी दूसरे जंगल के किनारे एक बहुत ही बड़ा पानी का जलाशय दिखा।

वह वहां गया। उस जलाशय का पानी बहुत ही मधुर था। मानो अमृत का दरिया उसी जलाशय में था। हाथी को बहुत समय से पानी की तलाश थी, वह अपने सामने पानी को देख बहुत खुश हुआ।

वह जलाशय के करीब गया और वहां से कई सारा पानी पी लिया, जब तक उसकी तृप्ति नहीं हुई वह पानी पीता ही गया। उसने मन में सोचा कि, 

मेरे जंगल के साथी भी तो काफी समय से प्यासे हैं, मैं उन्हें भी इस जगह में ले आता हूँ। फिर हम सब यही पास के जंगल में अपना बसेरा कर लेंगे।

वह फिर से जंगल मे गया और अपने सभी साथियों को इस विषय के बारे में विस्तार से बताया। उसके सभी साथी जानवर बहुत खुश हुए। हाथी सभी जानवरों को उस जलाशय तक ले आया।

उस जलाशय के रास्ते में आस-पास बहुत से खरगोश अपना बिल बनाकर रहा करते थे। उन्होंने सारी जमीन में अपने बिल के सुराख कर रखा था।

पहले जब केवल हाथी आया था, तब तो उतना नुकसान नहीं हुआ। लेकिन जब सभी जानवर एक साथ उस जलाशय में आए तो रास्ते में जिस जमीन से वो होकर आए, 

उस हिस्से के सारे खरगोशों के बिल टूट गए। उनमे रहने वाले सभी खरगोशों को बहुत हानि उठानी पड़ी।

हाथी और उसके साथियों के भारी भरकम पैरों की वजह से, किसी खरगोश का सिर फूट गया, किसी की टांग टूटी और जिस खरगोश को ज्यादा लगी वे तो मर भी गए।

जलाशय में आकर सभी जानवरों ने अपनी प्यास बुझाई और फैसला किया कि, अब वे सभी पास के जंगल में ही रहेंगे।

सभी जानवर पास के जंगल में चले गए। सभी ने वही अपना डेरा डाल दिया। अब वे सभी जानवर रोज उस जलाशय में पानी पीने आते, और कई सारे खरगोश निर्मम ही मारे जाते।

खरगोशों की प्रतिदिन होने वाली इतनी मृत्युओं को देख कर खरगोशों का राजा बहुत ही परेशान हो गया।

उसने अपने सभी खरगोशों को एकत्रित किया। उसने उन लोगो से कोई समाधान निकालने की विनती की, उसने कहा, “यदि शीघ्र ही कोई समाधान नहीं निकला तो हम सबकी मृत्यु निश्चित ही है।”

सभी खरगोश भी बहुत परेशान थे। उन्हें डर था कि, क्या पता किस दिन हमारी बारी आती है, जानवरों द्वारा शहीद होने की।

झुंड में से एक खरगोश ने सुझाव दिया, कि हमें यह स्थान छोडकर किसी अन्य स्थान को अपने रहने के लिए खोजना चाहिए। ताकि हम यहाँ से जाकर वहां सुकून से रह सकें।

उसकी बातें सुनकर एक दूसरा खरगोश बोला, “मैं तो अपनी पूर्वजों की जगह छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। यहां से हमारी कितनी यादें जुड़ी हुई हैं। हम यहां से कहीं भी नहीं जाएंगे। “

कुछ खरगोश उसकी बात से सहमत हुए।

तभी एक बुद्धिमान खरगोश ने उठकर अपने राजा खरगोश से कहा, “महाराज! यहां पर हाथ में हाथ धरे बैठकर अपनी मृत्यु को देखने, 

और हमारी इस पुश्तैनी जगह को छोड़कर कही और जाने से बेहतर है, की हम इस समस्या का समाधान करें। “

उसने कहा, कि हममें से किसी एक को ख़रगोशों का प्रतिनिधि बनकर हाथी और उसके साथी जानवरो से बात करनी होगी। क्या पता वे हमारी बात को समझें।

समस्या से भागना तो कोई समाधान नहीं होता।

सभी ख़रगोशों ने फैसला किया कि, उस बुद्धिमान खरगोश को ही जंगल में हाथी और उसके दल में वार्ता के लिए भेजा जाएगा।

शाम का समय हो गया। वह बुद्धिमान खरगोश जंगल चले गया। वहां हाथी और उसके साथी जानवर आपस में बैठकर कुछ बातें कर रहे थे।

तभी खरगोश उनके ध्यान को आकर्षित करने के लिए उनकी सभा में उन के बीच में चला गया।

हाथी बोला, कौन है तू? औऱ यहाँ क्या कर रहा है! खरगोश ने उत्तर दिया, ’ मैं एक खरगोश हूँ। चन्द्रमा पर रहता हूं। मुझे तुम्हारे पास चन्द्रदेव ने भेजा है। “

हाथी ने सोचा, यह तो सच में चन्दमा की तरह सफेद और चमदार है। शायद यह सच कह रहा है।

हाथी ने उस खरगोश को प्रणाम किया और पुछा, “क्या आप यहाँ चन्द्रदेव कहने पर ही आए हैं?”

खरगोश ने कहा, “हाँ! मेरी बात ध्यान से सुनो! तुम लोग जहाँ पानी पीने जाते हो यह जलाशय चन्द्रदेव का है। उन्हें तुम्हारे पानी पीने से कोई दिक्कत नहीं है।

परन्तु अब यह जलाशय वे सूर्यदेव को भेंट करने वाले हैं। उन्होंने सन्देश दिया है कि, अब तुम लोग उसका पानी पीने वहां नहीं आओगे। आज वह इस जलाशय को लेने स्वयं यहा आए हैं।

और साथ ही उन्होंने तुम लोगों के लिए पास के जंगल में पानी की व्यवस्था कर दी है। तुम सबको वहां जाने का आदेश भी दिया है।”

हाथी को चन्द्रमा के धरती पर आने की बात से बहुत खुशी हुई। उसने खरगोश से कहा कि, क्या मैं एक बार उनके दर्शन कर सकता हूँ?

खरगोश ने कहा, ‘क्यो नहीं’ चलो मेरे साथ।

वह हाथी को लेकर जलाशय पहुँचा। जलाशय में चंद्रमा की परछाई दिख रही थी। हाथी ने उसी परछाई को चन्द्रमा समझ कर उस परछाई को प्रणाम किया। और चुप चाप वहां से चला गया।

वह अपने साथ सभी जानवरों को लेकर दूसरे जंगल चले गया।

खरगोश ने अपनी बुद्धिमानी से अपने सभी साथी ख़रगोशों की जान बचाई।

शिक्षा: “कठिनाई की स्थिति से भागना समझदारी नहीं है। उससे लड़कर उसका सामना करना ही उस स्थिति से बाहर निकाल सकता है।”

मुर्गा की अकल ठिकाने

एक समय की बात है, एक गांव में ढेर सारे मुर्गे रहते थे। गांव के बच्चे ने किसी एक मुर्गे को तंग कर दिया था। मुर्गा परेशान हो गया, उसने सोचा अगले दिन सुबह मैं आवाज नहीं करूंगा। सब सोते रहेंगे तब मेरी अहमियत सबको समझ में आएगी, और मुझे तंग नहीं करेंगे। मुर्गा अगली सुबह कुछ नहीं बोला। सभी लोग समय पर उठ कर अपने-अपने काम में लग गए इस पर मुर्गे को समझ में आ गया कि किसी के बिना कोई काम नहीं रुकता। सबका काम चलता रहता है।

शिक्षा: घमंड नहीं करना चाहिए आपकी अहमियत लोगो को बिना बताये पता चलता है।

शेर का आसन

शेर जंगल का राजा होता है। वह अपने जंगल में सब को डरा कर रहता है। शेर भयंकर और बलशाली होता है। एक दिन शहर का राजा जंगल में घूमने गया। शेर ने देखा राजा हाथी पर आसन लगा कर बैठा है। शेर के मन में भी हाथी पर आसन लगाकर बैठने का उपाय सुझा। शेर ने जंगल के सभी जानवरों को बताया और आदेश दिया कि हाथी पर एक आसन लगाया जाए। बस क्या था झट से आसन लग गया। शेर उछलकर हाथी पर लगे आसन मैं जा बैठा। हाथी जैसे ही आगे की ओर चलता है, आसन हिल जाता है और शेर नीचे धड़ाम से गिर जाता है। शेर की टांग टूट गई शेर खड़ा होकर कहने लगा – “पैदल चलना ही ठीक रहता है।”

शिक्षा: जिसका काम उसी को साजे, शेर ने आदमी की नक़ल करनी चाही और परिणाम गलत साबित हुआ।

रेलगाड़ी

पिंकी बहुत प्यारी लड़की है। पिंकी कक्षा दूसरी में पढ़ती है। एक दिन उसने अपनी किताब में रेलगाड़ी देखी। उसे अपनी रेल – यात्रा याद आ गई, जो कुछ दिन पहले पापा-मम्मी के साथ की थी। पिंकी ने चौक उठाई और फिर क्या था, दीवार पर रेलगाड़ी का इंजन बना दिया। उसमें पहला डब्बा जुड़ गया, दूसरा डब्बा जुड़ गया, जुड़ते – जुड़ते कई सारे डिब्बे जुड़ गए। जब चौक खत्म हो गया पिंकी उठी उसने देखा कक्षा के आधी दीवार पर रेलगाड़ी बन चुकी थी। फिर क्या हुआ – रेलगाड़ी दिल्ली गई, मुंबई गई, अमेरिका गई, नानी के घर गई, और दादाजी के घर भी गई।

शिक्षा: बच्चों के मनोबल को बढ़ाइए कल के भविष्य का निर्माण आज से होने दे।

राजू की समझदारी

जतनपुर में लोग बीमार हो रहे थे। डॉक्टर ने बीमारी का कारण मक्खी को बताया। जतनपुर के पास एक कूड़ेदान है। उस पर ढेर सारी मक्खियां रहती है। वह उड़कर सभी घरों में जाती, वहां रखा खाना गंदा कर देती। उस खाने को खाकर लोग बीमार हो रहे थे।

राजू दूसरी क्लास में पढ़ता है। उसकी मैडम ने मक्खियों के कारण फैलने वाले बीमारी को बताया।

राजू ने मक्खियों को भगाने की ठान ली।

घर आकर मां को मक्खियों के बारे में बताया। वह हमारे खाने को गंदा कर देती है। घर में आकर गंदगी फैल आती है। इसे घर से बाहर भगाना चाहिए।

राजू बाजार से एक फिनाइल लेकर आया।

उसके पानी से घर में साफ सफाई हुई। रसोई घर में खाना को ढकवा दिया। जिसके कारण मक्खियों को खाना नहीं मिल पाया।

दो दिन में मक्खियां घर से बाहर भाग गई।

फिर घर के अंदर कभी नहीं आई।

शिक्षा: स्वयं की सतर्कता से बड़ी-बड़ी बीमारियों से बचा जा सकता है।

सच्ची मित्रता

अजनार के जंगल में दो बलशाली शेर सूरसिंह और सिंहराज रहते थे। सुरसिंह अब बूढ़ा हो चला था। अब वह अधिक शिकार नहीं कर पाता था।

सिंहराज उसके लिए शिकार करता और भोजन ला कर देता।

सिंहराज जब शिकार पर निकलता, सूरसिंह अकेला हो जाता।

डर के मारे कोई पशु उसके पास नहीं जाते थे ।

आज सुरसिंह को अकेला देख सियार का झुंड टूट पड़ा। आज सियार को बड़ा शिकार मिला था।

चारों तरफ से सियारों ने सुरसिंह को नोच-नोच कर जख्मी कर दिया था।

वह बेहोश की हालत में हो गया।

अचानक सिंहराज वहां दहाड़ता हुआ आ गया।

सिंहराज को वहां आता देख, सियारों के प्राण सूख गए।

सिंह राज ने देखते ही देखते सभी सियारों को खदेड़ दिया। जिसके कारण उसके मित्र सुरसिंह की जान बच सकी

शिक्षा: सच्ची मित्रता सदैव काम आती है,जीवन में सच्चे मित्र का होना आवश्यक है।

सांपों की कथा

बहुत समय पहले भारत देश के किसी प्रान्त में, एक तेजस्वी राजा का राज था। वह न्यायप्रिय होने के साथ साथ बहुत उदार और दयालु भी था। उसका एक पुत्र था।

एक बार राजकुमार बहुत बीमार हो गया। उसे उसके कक्ष में रखा गया। उसकी चिकित्सा उसके ही कमरे में हो रही थी। एक दिन जब कक्ष में कोई नहीं था, 

तब खिड़की के रास्ते से एक सांप आकर राजकुमार के पेट मे चले गया। राजकुमार की तबियत और खराब होने लगी।

कितने ही वैद बुलवाए, कितनी दवा चलाईं गयीं लेक़िन कुछ भी अंतर नही हो पा रहा था।

बहुत दिन बीत गए। अब सांप ने उसके पेट में अपना बिल बना लिया था। राजकुमार अब बड़ा हो गया। उसके पेट में सांप अभी तक था।

राजकुमार तंग आकर राज्य से बाहर दूसरे राज्य में चला गया। वह वहां जाकर एक मंदिर में भिखारी बनकर रहने लगा।

उस राज्य में एक राजा अपने महल में रहता था। उस राजा को, उसकी चापलूसी करने वाले लोग बहुत भाते थे, लेकिन जो उसकी चापलूसी नही करता था, 

उसकी हा में हां नही मिलाता था, उसे वह दण्डित कर देता था।

उस राजा की दो बेटियां थी। वह भी अब जवान हो चुकी थी।

रोज सुबह वे दोनों, अपने पिता को प्रणाम करने उनके कक्ष में जाया करती थीं। पहली राजकुमारी अपने पिता के अभिवादन में कहती थी, “महाराज! इस संसार में जो कुछ भी है, आपकी वजह से ही है।”

दूसरी अपने पिता से कहती, “ईश्वर सदा आपकी रक्षा करें।”

अपनी दूसरी पुत्री की बातें उसे बिल्कुल अच्छी नही लगती थीं। उसको अपनी पुत्री की बातें सुनकर बहुत ही क्रोध आ जाता था।

एक दिन तो उसके सब्र का बांध टूट ही गया। उसको अपनी दूसरी पुत्री पर बहुत ही गुस्सा आ गया। उसने अपने मंत्री को बुलवाकर, 

उसकी शादी मंदिर के किसी भिखारी से कर देने का आदेश दिया। उसकी पुत्री ने कुछ नहीं कहा, और चुप चाप अपने पिता का आदेश मान लिया।

उस लड़की की शादी, भिखारी बने राजकुमार से कर दी गयी। लड़की ने उसे अपना भाग्य समझकर स्वीकार कर लिया।

राजकुमारी अपने पति की खूब सेवा करती थी। अब दोनों उस मंदिर को छोड़ कर किसी अन्य स्थान जाने लगे।

रास्ते में वह एक तालाब के पास बैठकर आराम कर रहे थे, तो उसकी पत्नी कुछ सामान लेने चली गयी। उसका पति आराम करते हुए वहीं पेड़ के नीचे सो गया।

जब वह सो रहा था तो, उसके पेट का सांप उसके मुंह से निकलकर बाहर आ गया। पेड़ के नीचे एक बिल था उसमें भी एक सांप रहता था। दूसरे सांप की गन्ध सूंघ कर वह भी बाहर आ गया।

तभी उसकी पत्नी भी वापस आ गयी। वह अपने पति के पास पहुंचने ही वाली थी, कि उसने देखा कि, उसका पति दो सांपों के बीच बेहोश पड़ा है, वह थोड़ी देर छिप कर उनको देखने लगी।

दोनो सांप आपस में बात करने लगे।

बात करते करते, दोनों ने एक दूसरे की पोल खोल दी। पेट वाले साँप ने, बिल वाले साँप के सोने के मटके का रहस्य भी बता डाला। और बिल वाले साँप ने उसको मार डालने का रहस्य बता दिया।

यह सारी बातें उसकी पत्नी ने सुन लीं। उसने सांपों के बताए गए उपायो द्वारा उन दोनों सांपों को ही नष्ट कर दिया। अब उसका पति एकदम स्वस्थ हो गया।

उन दोनों को सांप के बिल से एक सोने का मटका भी मिल गया। जिससे वे अब धनी हो गए। तभी राजकुमार ने अपनी सच्चाई अपनी पत्नी को बताई।

दोनों लौट कर राजकुमार के महल चले गए। राजमहल में उनका खूब स्वागत हुआ। राजकुमार का पिता, उन दोंनो को देख कर बहुत खुश हुआ। अब सब प्रेम से महल में ही अपना जीवन व्यतीत करने लगे।

शिक्षा: “अंत भला तो सब भला। यदि अंत भला नही है तो समझिए कि वह अंत ही नहीं है।”

शरारती चूहा

गोलू के घर में एक शरारती चूहा आ गया। वह बहुत छोटा सा था मगर सारे घर में भागा चलता था। उसने गोलू की किताब भी कुतर डाली थी। कुछ कपड़े भी कुतर दिए थे। गोलू की मम्मी जो खाना बनाती और बिना ढके रख देती, वह चूहा उसे भी चट कर जाता था। चूहा खा – पीकर बड़ा हो गया था। एक दिन गोलू की मम्मी ने एक बोतल में शरबत बनाकर रखा। शरारती चूहे की नज़र बोतल पर पड़ गयी। चूहा कई तरकीब लगाकर थक गया था, उसने शरबत पीना था।

चूहा बोतल पर चढ़ा किसी तरह से ढक्कन को खोलने में सफल हो जाता है। अब उसमें चूहा मुंह घुसाने की कोशिश करता है। बोतल का मुंह छोटा था मुंह नहीं घुसता। फिर चूहे को आइडिया आया उसने अपनी पूंछ बोतल में डाली। पूंछ शरबत से गीली हो जाती है उसे चाट-चाट कर चूहे का पेट भर गया। अब वह गोलू के तकिए के नीचे बने अपने बिस्तर पर जा कर आराम से करने लगा।

शिक्षा: मेहनत करने से कोई कार्य असम्भव नहीं होता।

स्वयं का नुकसान

शहर में एक छोटी सी दुकान, जिसमें कुछ चिप्स, पापड़, टॉफी, बिस्किट आदि की बिक्री होती थी। यह दुकान अब्दुल मियां की थी। इनकी हालात सभी लोगों को मालूम थी, इसलिए ना चाहते हुए भी आस पड़ोस के लोग कुछ ऐसा सामान ले लिया करते थे। जिससे अब्दुल मियां की कुछ कमाई हो जाए।

दुकान में चूहों ने भी अपना डेरा जमा लिया था। दुकान में एक से बढ़कर एक शरारती चूहे आ गए थे।

इन चूहों ने टॉफी और बिस्किट को नुकसान पहुंचाना चालू कर दिया था।

अब्दुल काफी परेशान हो गया था, उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस शरारत से कैसे बचे।

एक दिन की बात है, अब्दुल बैठा हुआ था तीन – चार चूहे आपस में लड़ रहे थे।

अब्दुल को गुस्सा आया उसने एक डंडा उन चूहों की ओर जोर से चलाया।

चूहे उछल कर भाग गए, किंतु वह डंडा इतना तेज चलाया गया था कि टॉफी रखने वाली शीशे की जार टूट गई।

ऐसा करने से और भी बड़ा नुकसान हो गया।

शिक्षा: क्रोध में किसी प्रकार का कार्य नहीं करना चाहिए, यह स्वयं के लिए नुकसानदेह होता है।

अपने गलती का पछतावा

गोपाल के घर पांच भैंस और एक गाय थी। वह सभी भैंसों की दिनभर देखभाल किया करता था। उनके लिए दूर-दूर से हरी – हरी घास काटकर लाया करता और उनको खिलाता। गाय, भैंस गोपाल की सेवा से खुश थी।

सुबह – शाम इतना दूध हो जाता, गोपाल का परिवार उस दूध को बेचने पर विवश हो जाता।

पूरे गांव में गोपाल के घर से दूध बिकने लगा।

अब गोपाल को काम करने में और भी मजा आ रहा था, क्योंकि इससे उसकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही थी।

कुछ दिनों से गोपाल परेशान होने लगा, क्योंकि उसके रसोईघर में एक बड़ी सी बिल्ली ने आंखें जमा ली थी। गोपाल जब भी दूध को रसोई घर में रखकर निश्चिंत होता। बिल्ली दूध पी जाती और उन्हें जूठा भी कर जाती। गोपाल ने कई बार उस बिल्ली को भगाया और मारने के लिए दौड़ाया, किंतु बिल्ली झटपट दीवार चढ़ जाती और भाग जाती।

एक दिन गोपाल ने परेशान होकर बिल्ली को सबक सिखाने की सोंची ।

जूट की बोरी का जाल बिछाया गया, जिसमें बिल्ली आसानी से फंस गई।

अब क्या था गोपाल ने पहले डंडे से उसकी पिटाई करने की सोची।

बिल्ली इतना जोर – जोर से झपट रही थी गोपाल उसके नजदीक नहीं जा सका।

किंतु आज सबक सिखाना था, गोपाल ने एक माचिस की तीली जलाई और उस बोरे पर फेंक दिया।

देखते ही देखते बोरा धू-धू कर जलने लगा, बिल्ली अब पूरी शक्ति लगाकर भागने लगी।

बिल्ली जिधर जिधर भागती, वह आग लगा बोरा उसके पीछे पीछे होता।

देखते ही देखते बिल्ली पूरा गांव दौड़ गई।

पूरे गांव से आग लगी… आग लगी, बुझाओ… बुझाओ

इस प्रकार की आवाज उठने लगी। बिल्ली ने पूरा गांव जला दिया।

गोपाल का घर भी नहीं बच पाया था।

शिक्षा: आवेग और स्वयं की गलती का फल खुद को तो भोगना पड़ता ही है, साथ में दूसरे लोग भी उसकी सजा भुगतते हैं।

दद्दू की चोट पर हुई किसकी पिटाई

दद्दू और मोहित दोनों भाई थे। दोनों एक ही विद्यालय में पढ़ते थे, मोहित दद्दू से 2 साल बड़ा था। दोनों एक साथ स्कूल जाते, लौटते समय भी दोनों साथ ही आते थे।

एक दिन की बात है दद्दू अपने दोस्तों के साथ साथ, तेज कदमों से घर की ओर लौट रहा था। अचानक उसका पैर एक पत्थर पर पड़ा, कंधे पर किताब – कॉपी का बोझ लदा था, वह संभल नहीं पाया और गिर गया।

दद्दू को चोट लग गई, उसका घुटना छिल गया…

जिससे दद्दू जोर जोर से रोने लगा।

पीछे मोहित आ रहा था दौड़ कर झट से अपने भाई को उठा लिया।

मोहित समझदार था दद्दू को काफी समझाया किंतु वह चुप नहीं हो रहा था।

मोहित ने झटपट एक उपाय सोचा और सड़क पर 4-5 लात जोर से मारी और दद्दू को कहा लो इसने तुम्हें चोट लगाया था मैंने इसे चोट लगा दिया।

दद्दू अब सोच में पड़ गया, उसने भी 8 -10 लात मारी।

उसके और दोस्त थे, वह भी सड़क पर उछलने लगे जिससे सड़क को और चोट लगे।

बस क्या था, अब यह मनोरंजन का साधन बन गया। कुछ देर बाद सभी वहां से जा चुके थे।

घर पहुंच कर मोहित ने दद्दू के चोट को दिखाया और डिटॉल तथा साफ पानी से घाव को साफ किया गया।

शिक्षा: समय पर लिया गया निर्णय सर्वदा ठीक होता है।

कुम्हार का वात्सल्य रूप

आज लकड़ी काटने के लिए मदन घूमता रहा, किंतु उसे कोई सूखा पेड़ नहीं मिला। वह प्रकृति से इतना जुड़ा हुआ था कि वह हरे-भरे वृक्षों को अपने कुल्हाड़ी के चोट से नहीं काटता। पेड़-पौधों को वह बेटे के समान मानता था और बेटे की हत्या मानव कभी कर ही नहीं सकता।

मदन बेहद गरीब था, घर में बुजुर्ग मां-बाप, पत्नी और दो छोटे-छोटे बच्चे थे। उनका भरण-पोषण मदन के कार्य से ही चलता था। मदन दिनभर जंगलों में घूमता लकड़ियां जमा करता और शाम तक बाजार में बेचकर खाने-पीने का सामान घर ले आता। इसी से पूरा घर दो वक्त की रोटी खा पाता था।

न जाने आज कैसा दिन था कि आज उसे कोई सुखी लकड़ी या सुखा पेड़ मिल ही नहीं रहा था। वह थक हार कर एक जगह बैठ गया वह आज बेहद दुखी था कि आज उसे घर ले जाने के लिए अन्य पानी का प्रबंध नहीं हो सका। वह सोचते सोचते बेसुध हो गया और वहीं लेट गया।

प्रकृति सदैव मानव की रक्षा करती है, मानव के जीवन का एक अभिन्न अंग होती है और मनुष्य को प्रकृति पुत्र के समान पालन करती है।

मदन की ऐसी हालत देख प्रकृति में भी उदासी का भाव था। तभी अचानक एक अनोखी घटना घटती है, पेड़ों से शीतल हवा बहने लगती है।

मदन कि अचानक नींद खुलती है तो वह अपने नजदीक एक कपड़े की पोटली पाता है। यह पोटली पेड़ों से चलने वाली हवाओं के साथ मदन के पास आया था।

इस पोटली का रहस्य यह था – कुछ दिन पूर्व एक भले आदमी को लूट कर जंगली डाकू भाग रहे थे, तभी अचानक उनका पैर फिसला और वह पहाड़ों की दुर्गम खाई में जा गिरे जिससे उनकी मृत्यु हो गई। यह पोटली गिरते समय डाकुओं के हाथ से छिटक कर पेड़ पर टंग गई थी। आज आवश्यकता की घड़ी में मदन को उन पैसों से सहायता हो सकी।

शिक्षा: जब आप किसी की सहायता करते हैं निर्दोष लोगों को परेशान नहीं करते तो प्रकृति भी आपकी सहायता करती है। जब आप प्रकृति का नुकसान पहुंचाते हैं तो प्रकृति भी आप को नुकसान पहुंचाती है, यह नुकसान दीर्घकालिक होता है।

मछुआरा और मछलियों का नाच

एक गाँव में एक मछुआरा था, जो बहुत अच्छी बांसुरी बजाता था। एक दिन वह अपना जाल और अपनी बाँसुरी लेकर नदी के किनारे गया।

वहाँ बैठकर वह बांसुरी बजाने लगा। उसने सोचा बांसुरी की तान सुनकर मछलियाँ नाचते-नाचते उसके पास आ जाएँगी। वह घंटों बांसुरी बजाता रहा परंतु कोई मछली नहीं आई।

इस पर वह निराश नहीं हुआ और उसने बांसुरी बजाना छोड़कर नदी में अपना जाल बिछाया। जाल की मदद से, थोड़ी ही देर में उसने बहुत सारी मछलियाँ पकड़ लीं।

ढेर सारी मछलियाँ पकड़ कर वह बहुत खुश हुआ, लेकिन उसने जैसे ही मछलियों को ज़मीन पर रखा तो वे उछलने लगीं।

यह देखकर उसे बहुत गुस्सा आया और वह मछलियों से चिल्लाकर बोला “मूर्ख मछलियों! जब मैं बांसुरी बजा रहा था, तब तुम नहीं नहीं! अब मैं बांसुरी नहीं बता रहा, तो तुम नाचती जा रही हो!”

चालाक नाग

एक बार एक जंगल में एक नाग रहता था। वह पानी पीने के लिए पास के छोटे तालाब में जाता था। एक दिन, उस तालाब में रहने वाले पानी के सांप ने उसे कहा-“यह तालाब मेरा है।

तुम यहाँ पानी नहीं पी सकते।” तब मामला सुलझाने के लिए नाग ने उस सांप को लड़ाई के लिए चुनौती दी। एक मेंढक भी उसी तालाब में रहता था।

वह पानी के सांप का दुश्मन था, इसलिए वह नाग का समर्थन कर रहा था। प्रतियोगिता का दिन आया। लड़ाई से पहले मेंढक बहुत ज़ोर से टरटराया क्योंकि,

इसके अलावा उसे कुछ और करना भी नहीं आता था। अंत में नाग लड़ाई जीत गया। तब मेंढक नाग के पास आया और बोला-“तुम लड़ाई जीत गए।

अब मुझे मेरा हिस्सा दो।” यह सुनकर नाग सीटी बजाने लगा और मेंढक उलझन में पड़ गया। नाग ने कहा-” मैं वही कर रहा हूँ, जो तुमने किया था।” दूसरों के मामलों में तुम्हें अपनी टांग नहीं अड़ानी चाहिए।

बिच्छू और संत

बिच्छू स्वभाव का उग्र होता है। वह सदैव दूसरों को नुकसान पहुंचाता है। संत स्वभाव से शांत होता है। वह दूसरों का कल्याण करता है।

बरसात का दिन था। एक बिच्छू नाले में तेजी से बेहता जा रहा था।संत ने बिच्छू को नाली में बहता देख।

अपने हाथ से पकड़कर बाहर निकाला।

बिच्छू ने अपने स्वभाव के कारण संत को डंक मारकर नाले में गिर गया।

संत ने बिच्छू को फिर अपने हाथ से निकाला। बिच्छू ने संत को फिर डंक मारा।

ऐसा दो-तीन बार और हुआ।

पास ही वैद्यराज का घर था। वह संत को देख रहे थे। वैद्यराज दौड़ते हुए आए। उन्होंने बिच्छू को एक डंडे के सहारे दूर फेंक दिया।

संत से कहा – आप जानते हैं बिच्छू का स्वभाव नुकसान पहुंचाने का होता है।

फिर भी आपने उसको अपने हाथ से बचाया। आप ऐसा क्यों कर रहे थे ?

संत ने कहा वह अपना स्वभाव नहीं बदल सकता तो, मैं अपना स्वभाव कैसे बदल लूं !

शिक्षा: विषम परिस्थितियों में भी अपने स्वभाव को नहीं बदलना चाहिए।

चिंटू पिंटू की शरारत

चिंटू-पिंटू दोनों भाई थे, दोनों की उम्र लगभग 2 साल की होगी। दोनों खूब शरारत करते थे। चिंटू ज्यादा शरारती था। वह पिंटू के सूंढ़ को अपने सूंढ़ में लपेटकर खींचता और कभी धक्का देकर गिरा देता।

एक दिन की बात है, दोनों खेल में लड़ते-झगड़ते दौड़ रहे थे।

चिंटू का पैर फिसल जाता है, वह एक गड्ढे में गिर जाता है।

चिंटू काफी मशक्कत करता है फिर भी वह बाहर नहीं निकल पाता।

पिंटू उसे अपने सूंढ़ से ऊपर खींचने की कोशिश करता। मगर उसकी कोशिश नाकाम रहती।

पिंटू दौड़कर अपनी मां को बुला लाता है।

उसकी मां अपने लंबे से सूंढ़ में लपेट कर चिंटू को जमीन पर ले आती है।

चिंटू की शरारत उस पर आज भारी पड़ गई थी।

उसने रोते हुए कहा-आगे से शरारत नहीं करूंगा।

दोनों भाई खेलने लगे, इसको देकर उसकी मां बहुत खुश हुई।

शिक्षा: अधिक शरारत और दूसरों को तंग करने की आदत सदैव आफत बन जाती है।

दोस्त का महत्व

वेद गर्मी की छुट्टी में अपनी नानी के घर जाता है। वहां वेद को खूब मजा आता है, क्योंकि नानी के आम का बगीचा है। वहां वेद ढेर सारे आम खाता है और खेलता है। उसके पांच दोस्त भी हैं, पर उन्हें बेद आम नहीं खिलाता है।

एक दिन की बात है, वेद को खेलते खेलते चोट लग गई। वेद के दोस्तों ने वेद को उठाकर घर पहुंचाया और उसकी मम्मी से उसके चोट लगने की बात बताई, इस पर वेद को मालिश किया गया।

मम्मी ने उन दोस्तों को धन्यवाद किया और उन्हें ढेर सारे आम खिलाएं। वेद जब ठीक हुआ तो उसे दोस्त का महत्व समझ में आ गया था। अब वह उनके साथ खेलता और खूब आम खाता था।

शिक्षा: दोस्त सुख-दुःख के साथी होते है। उनसे प्यार करना चाहिए कोई बात छुपाना नहीं चाहिए।

मोती का मित्र

मोती तीसरी कक्षा में पढ़ता है। वह स्कूल जाते समय अपने साथ दो रोटी लेकर जाता था। रास्ते में मंदिर के बाहर एक छोटी सी गाय रहती थी। वह दोनों रोटी उस गाय को खिलाया करता था।

मोती कभी भी गाय को रोटी खिलाना नहीं भूलता। कभी-कभी स्कूल के लिए देर होती तब भी वह बिना रोटी खिलाए नहीं जाता ।

स्कूल में लेट होने के कारण मैडम डांट भी लगाती थी।

वह गाय इतनी प्यारी थी, मोती को देखकर बहुत खुश हो जाती ।

मोती भी उसको अपने हाथों से रोटी खिलाता।

दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे।

एक दिन की बात है मोती बाजार से सामान लेकर लौट रहा था।

मंदिर के बाहर कुछ लड़कों ने उसे पकड़ लिया।

मोती से सामान छीनने लगे। गाय ने मोती को संकट में देख उसको बचाने के लिए दौड़ी।

गाय को अपनी ओर आता देख सभी लड़के नौ-दो-ग्यारह हो गए।

मोती ने गाय को गले लगा लिया, बचाने के लिए धन्यवाद कहा।

शिक्षा: गहरी मित्रता सदैव सुखदाई होती है।

निस्वार्थ भाव से व्यक्ति को मित्रता करनी चाहिए। संकट में मित्र ही काम आता है।

बंदर ने सबक सीखा

एक जंगल में नदी के किनारे एक शरारती बंदर रहता था। वह हमेशा दूसरों की नकल किया करता था और उनका मजाक उड़ाया करता था। एक दिन उसने दो मछुआरों को जाल पकड़े हुए देखा।

फिर उसने उन्हें वह जाल नदी में फेंकते हुए देखा। वे दोनों मछुआरे घंटों वहाँ मछलियाँ पकड़ने के लिए बैठे रहे।

दोपहर के भोजन के समय वे अपना जाल वहीं छोड़कर चले गए। आदत से मज़बूर बंदर उस जगह पर गया, जहाँ वे मछुआरे बैठे थे।

वह उन मछुआरों की नकल करने लगा। मछुआरों की तरह उसने जाल को नदी में फेंका, परंतु वह एक भी मछली पकड़ने में कामयाब नहीं हुआ।

वह बार-बार कोशिश करता रहा और अंत में, उसने खुद को उस जाल में फंसा हुआ पाया।

वह पछताते हुए अपने-आप से बोला-“अब मैं समझ गया हूँ। जो काम मुझ नहीं आता है, वह काम मुझे नहीं करना चाहिए।”

अनपढ़ सेठ

एक शहर में, एक अमीर लेकिन अनपढ़ सेठ रहता था। सभ्य तौर-तरीके सीखने के लिए उसने एक टीचर नियुक्त किया।

एक दिन, सेठ को एक जन्मदिन की पार्टी का न्यौता आया। टीचर ने उसे समझाया-“वहाँ जाकर तुम कहना-यह दिन तुम्हारी जिंदगी में बार-बार आए।”

रास्ते में सेठ, एक शवयात्रा में जाते हुए लोगों से, अपने टीचर के सिखाए शब्द बोल पड़ा। मृत आदमी के रिश्तेदारों ने उसकी खूब पिटाई की। एक आदमी ने उसे समझाया कि ऐसे मौकों पर क्या कहना चाहिए।

सेठ आगे गया तो उसे एक शादी का मंडप दिखा। वहाँ उसने कहा-“बहुत बुरा हुआ, मुझे बेहद अफसोस है।” यह सुनते ही दूल्हा-दुल्हन के माता-पिता अपना आपा खो बैठे,

और उन्होने सेठ को डाँट कर वहाँ से भगा दिया। थोड़ा आगे चलने पर, एक किसान ने उसे एक नया वाक्य सिखाया-“तुम्हारी आँखों के नीचे का एक दाना भी एक बड़े अनार के पेड़ में बदल जाए।”

यह वाक्य उस सेठ ने एक ऐसी राजकुमारी को बोला, जिसका चेहरा दानों से भरा हुआ था। इसलिए, राजकुमारी से दुर्व्यवहार करने के आरोप में उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

दुष्ट भेड़िया

एक समय की बात है एक भेड़िया था, जो हमेशा भेड़ों के झुंड का पीछा करता था, परंतु उन पर हमला नहीं करता था।

जब चरवाहे को उसकी यह आदत पता चली तो वह बहुत खुश हुआ। वह धीरे-धीरे भेड़िये को भेड़ों का रक्षक मानने लगा। चरवाहा, भेड़िये पर इतना विश्वास करने लगा कि उसका भेड़ो के पास होना उसे अच्छा लगने लगा।

एक बार उसे पास ही के एक गाँव में जाना था। उसने सोचा भेड़ों की जिम्मेदारी वह किसको देकर जाए।

अचानक, उसे एक विचार आया कि जब तक वह नहीं लौटता तब तक क्यों न भेड़ों ने भेड़िये के साथ छोड़ दिया जाए।

इसलिए वह अपनी भेड़ों को भेड़िये के साथ छोड़कर चला गया, लेकिन जब वह वापस आया तो उसने पाया कि भेड़िया उसकी सभी भेड़ें खा चुका था। दुष्ट पर विश्वास करने का उसे बहुत दुख हुआ, लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था।

पिता की परेशानी

एक गाँव में, एक किसान रहता था। उसकी दो बेटियाँ थीं। उनमें से एक का विवाह एक किसान के साथ और दूसरी का विवाह एक कुम्हार के साथ हुआ था।

एक दिन, उस किसान ने दोनों बेटियों से मिलने का निश्चय किया। वह पहली बेटी के घर गया और उससे पूछा-“तुम्हारे पति का काम कैसा चल रहा है?” बेटी ने जवाब दिया-“ठीक चल रहा है,

पिताजी। लेकिन हमें सिंचाई के लिए और पानी की आवश्यकता पड़ेगी। इसलिए हम भगवान से अपने खेतों के लिए ज्यादा बारिश की प्रार्थना करते हैं।”

पिता पहली बेटी से विदा लेकर अपनी दूसरी बेटी के पास गया। उसने वही सवाल दूसरी बेटी से भी पूछा। बेटी ने जवाब दिया-

“काम तो ठीक चल रहा है परंतु हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि रोज़ सूरज चमके जिससे हमारे मिट्टी के बर्तन जल्दी से देखें।”

अब पिता बहुत परेशान हुआ और बोला-“हे भगवान! मैं क्या मांगू? मेरी एक बेटी की इच्छा, दूसरी बेटी की इच्छा के एकदम उलट है।”

बिल्ली बच गई

ढोलू-मोलू दो भाई थे। दोनों खूब खेलते, पढ़ाई करते और कभी-कभी खूब लड़ाई भी करते थे। एक दिन दोनों अपने घर के पीछे खेल रहे थे। वहां एक कमरे में बिल्ली के दो छोटे-छोटे बच्चे थे। बिल्ली की मां कहीं गई हुई थी, दोनों बच्चे अकेले थे। उन्हें भूख लगी हुई थी इसलिए खूब रो रहे थे। ढोलू-मोलू ने दोनों बिल्ली के बच्चों की आवाज सुनी और अपने दादाजी को बुला कर लाए।

दादा जी ने देखा दोनों बिल्ली के बच्चे भूखे थे। दादा जी ने उन दोनों बिल्ली के बच्चों को खाना खिलाया और एक एक कटोरी दूध पिलाई। अब बिल्ली की भूख शांत हो गई। वह दोनों आपस में खेलने लगे। इसे देखकर ढोलू-मोलू बोले बिल्ली बच गई दादाजी ने ढोलू-मोलू को शाबाशी दी।

शिक्षा: दूसरों की भलाई करने से ख़ुशी मिलती है।

रितेश के तीन खरगोश राजा

रितेश का कक्षा तीसरी में पढ़ता था। उसके पास तीन छोटे प्यारे प्यारे खरगोश थे। रितेश अपने खरगोश को बहुत प्यार करता था। वह स्कूल जाने से पहले पाक से हरे-भरे कोमल घास लाकर अपने खरगोश को खिलाता था। और फिर स्कूल जाता था। स्कूल से आकर भी उसके लिए घास लाता था।

एक दिन की बात है रितेश को स्कूल के लिए देरी हो रही थी। वह घास नहीं ला सका, और स्कूल चला गया। जब स्कूल से आया तो खरगोश अपने घर में नहीं था। रितेश ने खूब ढूंढा परंतु कहीं नहीं मिला। सब लोगों से पूछा मगर खरगोश कहीं भी नहीं मिला।

रितेश उदास हो गया रो-रोकर आंखें लाल हो गई। रितेश अब पार्क में बैठ कर रोने लगा। कुछ देर बाद वह देखता है कि उसके तीनों खरगोश घास खा रहे थे, और खेल रहे थे। रितेश को खुशी हुई और वह समझ गया कि इन को भूख लगी थी इसलिए यह पार्क में आए हैं। मुझे भूख लगती है तो मैं मां से खाना मांग लेता हूं। पर इनकी तो मैं भी नहीं है। उसे दुख भी हुआ और खरगोश को मिलने की खुशी हुई।

शिक्षा: जो दूसरों के दर्द को समझता है उसे दुःख छू भी नहीं पता।

बलवान कछुए की मूर्खता

एक सरोवर में विशाल नाम का एक कछुआ रहा करता था। उसके पास एक मजबूत कवच था। यह कवच शत्रुओं से बचाता था। कितनी बार उसकी जान कवच के कारण बची थी।

एक बार भैंस तालाब पर पानी पीने आई थी। भैंस का पैर विशाल पर पड़ गया था। फिर भी विशाल को नहीं हुआ। उसकी जान कवच से बची थी। उसे काफी खुशी हुई क्योंकि बार-बार उसकी जान बच रही थी।

यह कवच विशाल को कुछ दिनों में भारी लगने लगा। उसने सोचा इस कवच से बाहर निकल कर जिंदगी को जीना चाहिए। अब मैं बलवान हो गया हूं, मुझे कवच की जरूरत नहीं है।

विशाल ने अगले ही दिन कवच को तालाब में छोड़कर आसपास घूमने लगा।

अचानक हिरण का झुंड तालाब में पानी पीने आया। ढेर सारी हिरनिया अपने बच्चों के साथ पानी पीने आई थी।

उन हिरणियों के पैरों से विशाल को चोट लगी, वह रोने लगा।

आज उसने अपना कवच नहीं पहना था। जिसके कारण काफी चोट जोर से लग रही थी।

विशाल रोता-रोता वापस तालाब में गया और कवच को पहन लिया। कम से कम कवच से जान तो बचती है।

शिक्षा: प्रकृति से मिली हुई चीज को सम्मान पूर्वक स्वीकार करना चाहिए वरना जान खतरे में पड़ सकती है।

साहस का परिचय

जंगल में सुंदर-सुंदर हिरण रहा करते थे। उसमें एक सुरीली नाम की हिरनी थी। उसकी बेटी मृगनैनी अभी पांच महीने की थी। मृगनैनी अपनी मां के साथ जंगल में घूमा करती थी।

एक दिन मृगनैनी अपने मां के साथ घूम रही थी, तभी दो गीदड़ आ गए।

वह मृगनैनी को मार कर खाना चाहते थे।

सुरीली दोनों गीदड़ को अपने सिंघ से मार-मार कर रोक रही थी।

मगर गीदड़ मानने को तैयार नहीं थे।

वहां अचानक ढेर सारे हिरनी का झुंड आ गया।

हिरनी गीदड़ के पीछे दौड़ने लगी। गीदड़ अपने प्राण लेकर वहां से रफूचक्कर हो गया।

सुरीली और मृगनैनी की जान आज उसके परिवार ने बचा लिया था।

शिक्षा: एक साथ मिलकर रहने से बड़ी से बड़ी चुनौती दूर हो जाती है।

और बन गई क्रिकेट टीम

राजू पार्क में उदास बैठा था, आज उसके दोस्त खेलने नहीं आए थे। राजू के पास एक गेंद थी, किंतु बैट और मित्र नहीं थे। वह अकेले ही गेंद के साथ मायूसी से खेल रहा था। पार्क में अन्य बालक भी क्रिकेट खेल रहे थे, किंतु राजू उन्हें जानता नहीं था। इसलिए वह अकेला ही कभी गेंद से खेलता और कभी बैठ कर उन बालकों को खेलता हुआ देखता रहता।

कुछ देर बाद सामने खेल रहे बालकों की गेंद पड़ोस के एक बंद घर में जा गिरी। वहां से गेंद के लौट का आना असंभव था, और कोई बालक उसे लेने के लिए भीतर भी नहीं जा सकता था। अब उन बालकों का भी खेलना बंद हो गया। वह सभी उदास हो गए, क्योंकि अब वह भी क्रिकेट नहीं खेल सकते थे।

उन बालकों की नजर राजू के ऊपर गई, जिसके पास गेंद थी। फिर क्या था, उन लोगों ने राजू को खेलने के लिए अपने पास बुला लिया। राजू खेलने में अच्छा था। इसलिए काफी बेहतरीन शॉर्ट लगा सकता था। गेंद को पकड़ने के लिए और बालकों की आवश्यकता हुई। जिस पर पार्क में खेल रहे और बालक भी उनसे जुड़ गए। और फिर देखते देखते दो दल बन गया।

इस प्रकार राजू की एक नई क्रिकेट टीम तैयार हो गई।

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