दोस्तों, आज की इस पोस्ट में हम आपके लिए पंचतंत्र की बहुत मज़ेदार कहानियाँ लेकर आये है। आज की इस पोस्ट पोस्ट में आपको बहुत सारी पंचतंत्र की कहानियाँ मिल जाएगी। आपको इन कहानियों को पढ़ने में बहुत मजा आएगा। 

Panchatantra Stories in Hindi

Panchatantra Stories in Hindi List

ब्राह्मण, चोर और दानव की कथा

दो सांपों की कथा

लालची नागदेव और मेढकों का राजा 

मस्तक पर चक्र

हाथी और चतुर खरगोश

वानरराज का बदला

संगीतमय गधा

कुत्ता जो विदेश चला गया

हमेशा सोच समझ कर काम करो

चार मूर्ख पंडितों की कहानी

कौवे और उल्लू का युद्ध

चतुर खरगोश और शेर की कहानी

सांप की सवारी करने वाले मेढकों की कथा

चुहिया का स्वयंवर

अविवेक का मूल्य

जब शेर जी उठा

कुम्हार की कहानी

स्त्री का विश्वास

बकरा, ब्राह्मण और तीन ठग

शेर और मूर्ख गधा

शेर, ऊंट, सियार और कौवा

सिंह और सियार की कहानी

अभागा बुनकर

मूर्ख साधू और ठग

गजराज और मूषकराज की कहानी

गीदड़ गीदड़ ही रहता है

वाचाल गधा और धोबी

व्यापारी का पतन और उदय

ब्राह्मणी और तिल के बीज

बंदर का कलेजा और मगरमच्छ

जैसे को तैसा

मूर्ख बगुला और नेवला

गौरैया और बन्दर

साधु और चूहा

दो मछलियों और एक मेंढक की कहानी

तीन मछलियों की कहानी

सियार और ढोल की कहानी

धूर्त बिल्ली का न्याय

व्यापारी के पुत्र की कहानी

हाथी और चिड़िया का झगड़ा कहानी

शेर का तीसरा पुत्र कहानी

बगुला भगत और केकड़ा

टिटिहरी का जोड़ा और समुद्र का अभिमान

रंग-बेरंगी सियार कहानी

ब्राह्मण का सपना

दो सिर वाला जुलाहा (The Weaver with Two Heads Story In Hindi)

एकता में बल है कहानी

मूर्ख कछुआ और हंस की कहानी

हाथी और गौरैया

बन्दर और लकड़ी का खूंटा

हाथी और उसके दोस्त कहानी

नीले सियार की कहानी

कबूतर का जोड़ा और शिकारी

साप और चिड़िया की कहानी

मौसम की तैयारी कहानी

मित्र-द्रोह का फैलाया

ब्राह्मण, चोर और दानव की कथा (The Brahmin, Thief and Demon Story In Hindi)

प्राचीन समय में एक गांव में द्रोण नाम का एक ब्राह्मण रहता था। वह भीक्षा मांग कर अपनी आजीविका चलाता था। उसके पास वातावरण के अनुरूप पहनने के लिए कपड़े भी नहीं थे। एक बार एक यजमान ने उस ब्राह्मण पर दया करके उसे एक बैलों की जोड़ी दे दी।

वह ब्राह्मण बैलों का पेट भरने के लिए अत्यधिक यत्न करता था। आसपास के गांव से घी, तेल, अनाज आदि मांग कर उन बैलों की भूख को शांत करता था।

बैल ब्राह्मण द्वारा दिए गए भोजन को ग्रहण करके काफी मोटे ताजे हो गए। जब एक चोर ने उन बैलों को देखा तो उसके मन में ख्याल आया कि क्यों ना इन बैलों की जोड़ी को मैं इस ब्राह्मण से चुराकर भगा लूँ। वह इसी निश्चय के साथ अपने घर से ब्राह्मण के घर की ओर चला। बीच रास्ते में उसे एक घने लंबे बाल, लाल आखें, लंबे लंबे दांत और लंबे चौड़े शरीर का एक अजीब व्यक्ति मिला।

चोर ने डरते हुए उससे पूछा “तुम कौन हो?”

उस अजीब शरीर वाले व्यक्ति ने कहा “मैं ब्रह्मराक्षस हूं। मैंने पिछले पांच-छह दिन से कुछ नहीं खाया है, इसलिए मैं आज ब्राह्मण को मारकर खाने वाला हूं।”

यह कहकर उसने चोर से पूछा “तुम कहां जा रहे हो?”

चोर ने कहा “मैं भी उसी ब्राह्मण के घर जा रहा हूं, जिसके घर तुम जा रहे हो। मैं वहां से उसके बैलों को चुराने के लिए जा रहा हूं।”

राक्षस ने कहा “हम दोनों की राह एक ही है, चलो हम साथ में चलते हैं।”

शाम के समय मौका मिलते ही दोनों ब्राह्मण के घर में चुपके से घुस गए और कही छिप गए।

जब ब्राह्मण सो गया तो राक्षस उसे खाने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा तो चोर ने कहा “मित्र पहले में इस ब्राह्मण के बैलों को चुरा लेता हूं, फिर तुम ब्राह्मण को खा लेना।”

राक्षस ने कहा “तुम जब बैल चुरावोगे तो कोई आवाज से ब्राह्मण जाग गया तो अनर्थ हो जाएगा। इसलिए पहले मैं ब्राह्मण को खा लेता हूं, फिर तुम बैलों को चुरा लेना।”

चोर ने कहा “जब तुम ब्राह्मण पर हमला करोगे, तब वह बच गया तो वह बैलों की रखवाली करने लगेगा जिससे मैं बैल चुरा नहीं पाऊंगा। इसलिए पहले मुझे अपना काम करने दो।

दोनों की इस कहासुनी के कारण ब्राह्मण जाग गया। ब्राह्मण को जगा हुआ देखकर चोर बोला “यह राक्षस तुम्हें खाने आया था, मैंने इससे तुम्हारी रक्षा की है।”

राक्षस बोला “यह आदमी तुम्हारे बैलों की जोड़ी को चुराने आया था। मैंने तेरे बैलों को इस जोर से बचाया है।”

जब तक दोनों अपनी बात ब्राह्मण के आगे पूरी करते तब तक ब्राह्मण सचेत होकर लाठी उठाकर अपनी रक्षा करने के लिए तैयार हो गया।

ब्राह्मण को इस प्रकार देखकर दोनों भाग गए।

दो सांपों की कथा (The Tale of Two Snakes Story In Hindi)

एक नगर के राजा का नाम देव शक्ति था। एक बार किसी कारण वंश राजा के पुत्र के पेट में एक सांप घुस गया। राज्य के विद्वान से विद्वान वैद्यो द्वारा उसका उपचार होने लगा, किंतु उसके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं आया। राजकुमार का शरीर धीरे-धीरे क्षय होने लगा। अतः वह निराश होकर गृह राज्य छोड़कर अन्य राज्य में एक साधारण भिखारी की तरह एक मंदिर में रहने लगा।

वह राज्य राजा बली का था। उसकी दो नौजवान सुंदर कन्याएं थी। वे दोनों प्रतिदिन अपने पिता को प्रणाम करने जाती। उनमें से एक राजा को नमस्कार करते हुए कहती “महाराज की जय हो, आपकी कृपा से संसार में सब कुशल मंगल है। दूसरी बोलती “महाराज! भगवान आपको अपने कर्मों का फल दे। राजा बलि दूसरी कन्या की बात सुनकर क्रोधित हो जाते।

एक दिन इसी क्रोध के कारण उसने अपने मंत्रियों को बुलवाया और कहा इस कन्या का विवाह किसी परदेसी भिखारी से कर दो। जिससे इसे अपने कर्मों का फल मिल जाएगा।

मंत्रियों ने राजाज्ञा का पालन करते हुए उस कन्या का विवाह उस परदेसी राजकुमार भिखारी से कर दिया। राजकुमारी उसे अपना पति मान कर उसकी सेवा करती और दोनों ने उस राज्य को छोड़कर अन्यत्र एक तालाब के पास अपनी कुटिया बनाई।

एक दिन उसकी पत्नी पास ही के गांव से भोजन की सामग्री लेने गई हुई थी। जब वह सामग्री लेकर पुनः अपने आश्रय स्थल पर पहुंची तो उसने देखा कि उसका पति एक बिल के पास सोया हुआ था। उसके पति के मुख से एक फनियल सांप बाहर निकल कर हवा खा रहा था और उस बिल में से एक सांप बाहर आया और दोनों सांपों में बातचीत होने लगी।

बिल वाला सांप पेट वाले सांप से कहने लगा “दुष्ठ! इस राजकुमार के जीवन को क्यों नष्ट कर रहा है।”

पेट वाला सांप बोला “तुम भी तो इस बिल में पड़े स्वर्ण कलश को दूषित कर रहा है।”

बिल वाला सांप “क्या तु समझता है कि तुझे पेट से निकालने की दवा किसी को मालूम नहीं है। यदि कोई व्यक्ति राजकुमार को उकाली हुई कांजी की राई पिला दे तो तू पेट में ही मर जाएगा।”

इस प्रकार दोनों ने एक दूसरे के भेद खोल दिए। इन दोनों की बात राजकुमारी ध्यान से सुन रही थी। इनकी बताई विधियों से ही दोनों का नाश हो गया जिससे कारण राजकुमार भी निरोगी हो गया और उन दोनों की दरिद्रता भी स्वर्ण कलश से दूर हो गई। राजकुमार और राजकुमारी अपने राज्य को पुन: लौट गए।

लालची नागदेव और मेढकों का राजा (The Greedy Cobra and Frog King Story In Hindi)

एक कुएं में बहुत सारे मेंढक रहते थे। उन मेंढकों के राजा का नाम गंगदत्त था। गंगदत्त बहुत ही चिड़चिडे और झगड़ालू स्वभाव का था। उस कुँए के आसपास दो-तीन और कुए थे। उन कुओं में भी बहुत सारे मेंढक रहते थे। हर कुँए का एक अलग राजा था।

गंगदत्त किसी ना किसी कारण सभी राजाओं से झगड़ा करता ही रहता। जब वह अपनी मूर्खता के कारण कोई ना कोई गलती करता तो बुद्धिमान एवं समझदार मेंढक जब उसे रोकने का प्रयास करते तो गगदत्त द्वारा पाले गए कुछ गुंडे मेंढकों द्वारा उनकी जमकर धुलाई की जाती।

सभी मेंढको में गंगदत्त के प्रति गुस्सा बढ़ता ही गया। वह अपनी गलती का दोष हमेशा किसी ना किसी और पर लगाता रहता।

एक बार गंगदत्त का झगड़ा पड़ोसी कुए के राजा से हो गया। उन दोनों में खूब तू-तू मैं-मैं हुई। झगड़ा इतना ज्यादा बढ़ गया कि गंगादत्त ने उस राजा से बदला लेने का निश्चय किया। वह अपने कुएं में आया और सभी मेंढकों को बुलाकर कहा “पड़ोसी राजा ने आप के राजा का बहुत अपमान किया है तो तुम सब जाकर पड़ोसी कुए पर हमला बोल दो।”

कुछ बुद्धिमान मेंढक आपस में सलाह करने के बाद बोले “महाराज! पड़ोसी कुँए में मेंढक हमारी संख्या से दुगुने है और वह हमसे ज्यादा हष्ट पुष्ट भी हैं तो हम उनसे युद्ध नहीं कर सकते।”

गंगदत उन सबकी बात सुनकर बहुत ही क्रोधित हो गया। उसने अपने पुत्रों को बुलाया और कहा “तुम्हारे पिता को पड़ोसी राज्य ने बहुत ज्यादा अपमानित किया है, तुम सब जाओ और पड़ोसी राज्य के राजा के पुत्रों की खूब पिटाई करो।”

सभी पुत्र पिता की बात सुनकर एक दूसरे का मुंह देखने लगे। बड़े पुत्र ने कहा “पिता जी आपने हमें कभी टर्राने की इजाजत ही नहीं दी। टर्राने से मेंढकों में जोश आता है और हम बिना जोश के अन्य मेंढकों से कैसे लड़ेगे।”

अब गंगदत्त सभी से चिढ़ गया। वह अपने कुए से बाहर आया और इधर उधर घूमने लगा। घूमते-घूमते उसकी नजर एक काले नाग पर पड़ी जो अपने बिल में घुस रहा था। जब अपने ही दुश्मन बन जाए तो दुश्मन को अपना लेना चाहिए यह सोच कर गंगदत्त जल्दी से जल्दी उसके पास गया और बोला “हे नागदेव! मेरा प्रणाम स्वीकार करो।”

नाग फुकारता हुआ बोला “अरे मेंढक, मैं तेरा शत्रु हूं। मैं तुम्हें खा सकता हूं। फिर भी तुम मेरे बिल के सामने आकर मुझे आवाज दे रहे हो।”

गंगा दत्त बोला “कभी-कभी शत्रुओं से ज्यादा अपने दुख देने लगते हैं। मेरी अपनी जाति वालों और परिवार वालों ने मेरा घोर अपमान किया है। इसके कारण ही मैं उनको सबक सिखाने के लिए अपने शत्रु के पास मदद की पुकार लेकर आया हूं। तुम मेरी मित्रता स्वीकार कर लो तुम्हारे मजे ही मजे हैं।”

नाग बिल से बाहर आया और बोला “मजे कैसे मजे?”

गंगादत्त ने कहा “मैं तुम्हें बहुत सारे मेंढको को खाने के लिए दूंगा। उन्हें खाकर तुम अजगर के समान हो जाओगे।”

नाग ने कहा “मैं पानी में नहीं जा सकता तो मेढको को कैसे पकडूगा।”

गंगादत्त ने कहा “मैंने दूसरे राज्यों के मेंढकों पर नजर रखने के लिए कई सुरंगे बना रखी है। उन सुरंगो के पास एक कक्ष बना हुआ है, तुम उस कक्ष में छिपे रहना और मैं कहूं उस मेंढक को खा लेना।”

नाग गंगदत्त की दोस्ती के लिए तैयार हो गया क्योंकि उसमें उसका ही लाभ था। एक मूर्ख बदले की भावना से अपनों को शत्रु के पेट के हवाले करने के लिए तैयार हो तो दुश्मन इसका लाभ अवश्य ही उठाएंगे।

नाग सुरंग के कक्ष में जाकर बैठ गया। जैसे-जैसे गंगदत्त बताता गया वैसे-वैसे नाग ने पड़ोसी राज्यों के सभी मेंढकों को खा लिया। जब सभी समाप्त हो गए तो नाग गंगदत्त से बोला “अब बता मैं किसे खाऊं? अब पूरे दिन मेरा पेट भरे रहने की आदत पड चुकी है।”

अब गंगदत्त ने अपने कुए के सभी बुद्धिमान मेंढकों को नाग का भोजन बना दिया। उनको खाने के बाद नाग ने और भोजन मांगा तो गंगादत्त ने सोचा कि मेरी प्रजा मेरे से हर समय शिकायतें करती रहती है, उनकी ऐसी की तैसी। नाग को अपनी सारी प्रजा को खाने के लिए दे दिया। प्रजा को खाने के पश्चात नाग ने और भोजन मांगा तो गंगादत्त बोला “अब केवल मेरे पुत्र और मित्र ही बचे हैं।”

नाग बोला “मुझे कुछ नहीं पता, बस तुम मेरे भोजन का इंतजाम कर दो।” गंगादत्त ने अपने मित्रों को नाग के हवाले कर दिया। उनको खाने के पश्चात नाग ने और भोजन मांगा तो गंगदत्त ने अपने पुत्रों को भी यह सोच कर नाग के हवाले कर दिया कि अगर मैं और मेंढकी जिंदा रहे तो संताने तो और उत्पन्न कर लेंगे।

उनको खाने के पश्चात नाग फुकार भरकर बोला “और भोजन कहां है?” गंगदत्त ने डरते हुए मेंढकी की ओर इशारा किया। मेंढकी को खाने के पश्चात नाग ने और भोजन मांगा तो गंगदत्त हाथ जोड़कर बोला “मित्र अब मेरे अलावा कोई नहीं बचा है। अब तुम अपने बिल में लौट जाओ।”

नाग ने कहा “तुम कौन से मेरे मामा लगते हो।”

यह कहकर नाग ने गंगदत्त को भी खा लिया।

शिक्षा:- अपनों से बदला लेने के लिए जो शत्रु से जा मिलता है उसका अंत निश्चित होता है।

मस्तक पर चक्र (The Four Treasure-Seekers Story In Hindi)

प्राचीन समय में एक नगर में चार ब्राह्मण पुत्र रहते थे। उन चारों में गहरी मित्रता थी। वह चारों ही बहुत ही गरीब थे। चारों ही अपनी गरीबी के कारण बहुत ही चिंतित रहते थे।उन्होंने अपनी जिंदगी में यह अनुभव कर लिया था कि इस समाज में धनहीन जीवन यापन करने से तो अच्छा हम जंगली जानवरों के साथ जंगल में अपना जीवन व्यतीत करें।

क्योंकि हमारे समाज में गरीब व्यक्ति को अनादर की दृष्टि से देखते हैं। सभी भाई बंधु उनसे मुंह मोड़ लेते हैं। अपने परिवार के लोग ही उनसे कोई रिश्ता नहीं रखते हैं। इस संसार में धन के बिना ना यश संभव है ना सुख। धन से तो कायर भी वीर हो जाता है, कुरूप सुरूप कहलाता है और मूर्ख भी पंडित बन जाता है।

यह सोचकर चारों मित्र धन कमाने के लिए अपनी जन्मभूमि से विदा लेकर, अपने भाई बंधुओं को छोड़कर विदेश यात्रा पर चल पड़े।

कई दिनों के बाद चलते चलते वे चारों शिप्रा नदी के तट पर पहुंचे। शिप्रा के शीतल जल में स्नान आदि करने के पश्चात उन्होंने महाकाल को प्रणाम किया। थोड़ी दूर आगे चलने के बाद उनका मिलन एक धर्मात्मा से हुआ। इन धर्मात्मा का नाम भैरवानंद था ।

धर्मात्मा इन चारों को अपने आश्रम में ले गए और यहां आने का कारण पूछा। चारों ने कहा की हम धन अर्जित करने के लिए यात्री बने हैं। धन कमाना ही हमारा लक्ष्य है। अब हम धन कमाने के बाद ही अपने देश को लौटेगे नहीं तो यही अपने प्राण त्याग देंगे। इस निर्धन जीवन से मृत्यु अच्छी है।

धर्मात्मा ने इन चारों के निश्चय की परीक्षा के लिए कहा कि धनवान बनना तो भाग्य के हाथ में है, तब उन्होंने उत्तर दिया कि हां धनवान बनना तो भाग्य के हाथ में है पर हम अवसर मिलने पर हम अपने भाग्य को बदल भी सकते हैं।

कभी-कभी पुरुष का साहस देव से भी अधिक बलवान हो जाता है। इसलिए आप हमें भाग्य का नाम लेकर हमारा मनोबल कम ना करें। आप महात्मा हो,आपके पास अनेक सिद्धियां है अगर आप चाहें तो हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। योगी होने के कारण आपके पास अनेक शक्तियां हैं। हमारा उद्देश्य भी महान है और महान ही महान की सहायता कर सकता है।

भैरवानंद मैं जब उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति देखी तो बहुत ही प्रसन्नता हुई। प्रसन्न होकर धन कमाने का रास्ता बताते हुए कहा “तुम हाथों में दीपक लेकर हिमालय की और जाओ। वहां जाते-जाते जब तुम्हारे हाथ से दीपक नीचे गिर पड़े तो ठहर जाओ। उस स्थान को खोदो वही तुम्हें धन मिलेगा और धन लेकर वापस चले आना।”

चारों युवक हाथ में दीपक लेकर हिमालय की ओर चल पड़े। कुछ दूर जाने के पश्चात एक युवक के हाथ से दीपक नीचे गिर पड़ा। उस भूमि को खोदने पर उन्हें ताम्रमयी भूमि मिली। वह तांबे की खान थी। उसने कहा “जितना चाहो उतना तांबा यहां से ले लो।” अन्य युवक बोले “मूर्ख! तांबे से दरिद्रता दूर नहीं होती। हम आगे बढ़ेंगे आगे इससे भी मूल्यवान वस्तु है मिलेंगे।”

उसने कहा “तुम आगे जाओ, मैं यहीं रहूंगा।” यह कहकर उसने जितना चाहिए उतना तांबा लिया और घर लौट गया।

शेष तीनों मित्र आगे बढ़ गए। कुछ दूर जाने के पश्चात उनमें से एक के हाथ से दीपक नीचे गिरा। उसने खोदा तो वहां चांदी की खान मिली। प्रसन्न होकर वह बोला “जितनी चाहो यहां से चांदी ले लो आगे मत जाओ।”

शेष दोनों बोले “पीछे तांबे की खान मिली थी, यहां चांदी की खान मिली है तो निश्चय ही आगे सोने की खान मिलेगी।” यह कहकर दोनों आगे चल दिए।

उन दोनों में से एक के हाथ से फिर दीपक नीचे गिरा। वहां जमीन खोदने पर उसे सोने की खदान मिली। उसने कहा की “चाहे जितना सोना ले लो और घर लौट चलो आगे मत जाओ” इससे हमारी दरिद्रता का अंत हो जाएगा।

उसके मित्र ने उत्तर दिया “मूर्ख! पहले तांबे की खान मिली उसके बाद चांदी की खान मिली और अब सोने की खान मिली है तो निश्चय ही आगे मूल्यवान रत्नों की खान मिलेगी।”

सोने की खान छोड़ दे और आगे चल। किंतु वह नहीं माना। उसने कहा “मैं तो सोना लेकर घर जाऊंगा” तुम्हें आगे जाना है तो चले जाओ।

चौथा युवा अकेले ही आगे चल दिया। आगे रास्ता बहुत ही कठिन था। उसके पैर लहूलुहान हो गए कई बर्फीले रास्तों पर चलने के पश्चात उसे एक व्यक्ति मिला जिसके मस्तक पर एक चक्र घूम रहा था।

उस व्यक्ति के पास जाकर चौथा युवक बोला “तुम कौन हो और तुम्हारे मस्तक पर यह चक्र क्यों घूम रहा है?

“यहां कहीं जलाशय है तो बताओ, मुझे प्यास लगी है।”

यह कहते ही उसके मस्तक से चक्र उतरकर ब्राह्मण युवक के मस्तक पर लग गया। युवक अचंभित रह गया। दर्द से कर्राहते हुए उसने पूछा कि “यह क्या हो गया। यह चक्र आपके मस्तिष्क से उतरकर मेरे मस्तिष्क पर कैसे आ गया?”

अजनबी व्यक्ति ने उत्तर दिया “मेरे मस्तिष्क पर भी यह अचानक लग गया था। अब यह चक्र तुम्हारे मस्तक से तभी उतरेगा जब कोई व्यक्ति धन के लोभ में घूमता हुआ यहां पहुंचेगा और तुमसे बात करेगा।”

युवक ने पूछा “यह कब होगा?”

अजनबी “अब कौन राजा राज कर रहा है?”

युवक “वीणा वत्सराज”

अजनबी “मैं रामराज्य का दरिद्र हुआ था, और सिद्धि का दीपक लेकर यहां आया था। मैंने भी एक मनुष्य से यही प्रश्न किए थे, जो तुमने मुझसे किए हैं।”

युवक “किंतु इतने समय से तुम्हें भोजन और जल कैसे मिलता रहा?”

अजनबी “यह चक्र धन के अति लोभी पुरुषों के लिए बना है। इस चक्र के मस्तक पर लगने पर मनुष्य को भूख, प्यास, नींद, जरा, मरण आदि नहीं सताते केवल चक्र घूमने का कष्ट ही सताता है। वह व्यक्ति अंत काल तक कष्ट भोगता है।”

यह कहकर वह अजनबी चला गया और अति लोभी ब्राह्मण युवक वही कष्ट भोगने के लिए रह गया।

शिक्षा: मनुष्य को कभी लोभी पुरुष नहीं बनना चाहिए।

हाथी और चतुर खरगोश (Elephants and Hares Story In Hindi)

एक वन में चतुर्दंत नाम का हाथी रहता था, वह अपने हाथियों के समूह का सरदार था। वन में एक वर्ष बहुत ही बढ़िया अकाल पड़ा, जिसकी वजह से तालाब, झील तथा नदियां सूखने लगी। जिसकी वजह से बहुत से हाथी के बच्चे प्यासे मरने लगे और पानी ना होने की वजह से वन सूखने लगा।

तो सारा हाथियों का दल मिलकर चतुरदंत जो कि हाथियों के दल का सरदार था, उसके पास गए और कहा सरदार आप ही कुछ उपाय बताइए। अगर इस तरह ही सूखा पड़ा तो हमारा वंश खत्म हो जाएगा।

हाथियों के दल का मुखिया थोड़ा चलाक और चारों दिशाओं में भ्रमण के हुआ था, जिसकी वजह से उसको चारों दिशाओं का ज्ञान था। उसके दिमाग में एक जगह का वर्णन आया तो उसने अपने सारे दल को लेकर उस जगह चला गया।

उस जगह जाकर उन्होंने देखा कि वहां पर बहुत सारा पानी है और बहुत सारी हरी-भरी जगह है। वह खुश हो गए और उन्होंने झूम कर झील में नहाया सुबह से शाम तक उन्होंने नहाया और बाद में वापस जाने लगे, जिनके पास ही बहुत सारे खरगोश के बिल थे तो हाथी और खरगोश के बिल पर पैर रखकर चले जा रहे थे, जिसकी वजह से आधे से ज्यादा खरगोश पद मरे हो गए और कुछ खरगोश मारे गए।

यह देखकर खरगोश का मुखिया घबरा गया और कहा “अगर यह हाथियों का दल ऐसे ही आता रहा तो हमारी प्रजाति नष्ट हो जाएगी। उन्होंने मिलकर जो खरगोश मारे गए, उनके लिए मौन व्रत रखा और एक सभा बुलाई। सभी से पूछा कि अब हमें क्या करना चाहिए तो उसमें से एक खरगोश ने कहा कि हमें यह स्थान छोड़कर किसी और स्थान पर चले जाना चाहिए, जिससे हमारी जान बच सकती है। हमें इस स्थान का परित्याग ही करना पड़ेगा। कुछ ने कहा यही सर्वश्रेष्ठ नीति है।

वह बोला एक व्यक्ति का बलिदान पूरे परिवार के लिए कर देना चाहिए। एक परिवार का बलिदान पूरे गांव के लिए कर देना चाहिए और एक गांव का बलिदान एक राज्य के लिए कर देना चाहिए, एक राज्य का बलिदान एक देश के लिए कह देना चाहिए और अपनी जान बचाने के लिए इस धरती का बलिदान कर देना चाहिए, इसी में ही सर्वश्रेष्ठ नीति है।

इतने में एक खरगोश बोला यह हमारी पूर्वजों की धरती है, हमारे पूर्वजों ने यहां पर जन्म लिया और यहीं पर अपने प्राण न्योछावर किए और अपनी धरती अपने आने वाली पीढ़ी को सौंपी थी तो हमारा दायित्व होता है कि हम इस धरती को नष्ट होने से बचाएं। यह कहकर उसने कहा मैं इस जगह से नहीं जाऊंगा।

तो खरगोश के दल का मुखिया बोला कि हमें हाथियों के सरदार से बात करनी चाहिए। क्या पता वह हमारी बात समझ जाए। यह कहकर उन्होंने कहा हमारे दल का सर्वश्रेष्ठ और चतुर दिमाग का खरगोश लंबकर्ण उनके मुख्या से बात करने के लिए जाएगा।

खरगोशों की तरफ से लंबकर्ण खरगोश हाथियों के दल के पास आया और कहा मुझे आपके सरदार से मिलना है। एक हाथियों के दल में से एक हाथी ने उसको सरदार का मार्ग बताया। खरगोश सरदार के पास पहुंचा तो गजराज ने कहा “कौन हो तुम और क्यों आए हो यहां?”

लंबकर्ण बोला यह तालाब चंद्रमा का है और मैं चंद्रमा में रहने वाला खरगोश हूं। आप मेरे तालाब को गंदा कर रहे हैं, आप यहां से चले जाइए।

तो हाथियों का सरदार गजराज बोला “मैं कैसे मान लूं कि तुम चंद्रमा के खरगोश हो और अभी चंद्रमा कहां पर है। क्या आप मुझे बता सकते हैं।” यह सुनकर खरगोश बोला आप मेरे साथ आइए मैं आपको बताता हूं और वहां हाथियों के सरदार गजराज को झील के पास लेकर गया और कहां झील में देखो तुम्हें चंद्रमा दिख जाएगा।

झील में चंद्रमा की परछाई दिख रही थी, जिसको देखकर हाथियों के सरदार को लगा कि यह तो सच में चंद्रमा का ही तलाब है और हम इस को गंदा कर रहे हैं। यह देख कर हाथियों का सरदार गजराज डर गया और उसे लगा कि अब यहां से जाना उचित है, वरना क्या पता चंद्रमा हमारे वंश को खत्म कर देगा। वह अपने झुंड को लेकर वहां से चला जाता हैं।

सीख:- हमें हमेशा धैर्य और चतुराई से काम करना चाहिए।

वानरराज का बदला (The Unforgiving Monkey King Story In Hindi)

एक नगर के राजा का नाम चंद्र था। उसके एक पुत्र को बंदरों से खेलने का शौक था। इसलिए राज महल में बंदरों के एक झुंड को रखा जाता था। बंदरों का सरदार बहुत ही चतुर था। वह सभी बंदरों को नीतिशास्त्र पढ़ाया करता था एवं सभी बंदर उसकी आज्ञा का पालन करते थे। राजपूत्र भी बंदरों के सरदार को बहुत मानता था।

राजा के छोटे पुत्र के लिए राजमहल में कई मेढो को पाल रखा था। उनमें से एक मेढा बहुत ही लालची था। जब उसका मन करता हुआ रसोई में घुसकर कुछ ना कुछ खा लिया करता था। जब रसोईया उसे देखते तो लकड़ी मार कर बाहर निकाल देते।

जब सरदार ने यह देखा तो वह चिंतित हो गया। उसने सोचा कि ‘यह कलह एक दिन सारे बंदर समाज का विनाश कर देगी, जब कोई रसोईया मैढे को जलती हुई लकड़ी से मारेगा तो मेढा गुडसाल में घुस जाएगा और गुडसाल में आग लग जाएगी जिससे कई घोड़े जल जाएंगे और जलन के घाव भरने के लिए बंदरों की चमड़ी की मांग बढ़ेगी। तब हम सभी बंदर मारे जाएंगे।’

इतनी आगे की बात सोचने के बाद सरदार ने सभी बंदरों से कहा कि अभी से ही राजमहल का त्याग कर देना चाहिए। किंतु उस समय एक भी बंदर ने सरदार की बात नहीं मानी क्योंकि राज महल में बहुत ही मधुर मधुर फलों के विशाल बगीचे थे। उन्हें छोड़कर वह कैसे जाते! उन्होंने सरदार से कहा की बुढ़ापे के कारण आपकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है। हम राजपूत्र के प्रेम व्यवहार एवं मधुर पलों को छोड़कर जंगल में नहीं जाएंगे।

सरदार ने जब यह सुना तो उनकी आंखों में आंसू आ गए एवं बोले “मूर्ख! तुम इसका परिणाम नहीं जानते। यह तुम सबको बहुत ही महंगा पड़ेगा।” यह कहकर सरदार ने राज महल का त्याग कर दिया एवं जंगल में चला गया।

सरदार के जाने के बाद एक दिन वही बात हो गई जिसके लिए सरदार ने सभी वानरों को सावधान किया। एक लोभी मेढा कुछ खाने के लिए रसोई में घुस गया।एक रसोइए ने उसको भगाने के लिए जलती हुई लकड़ी से उसको मारा। मेढा सीधा अश्वसाला में घुस गया और अश्वसाल में आग लग गई। उस आग से कई घोड़े जलकर मर गए और कई घोड़ा ने भागकर अपनी जान बचाई।

जब राजा ने वैद्य को बुलवाया एवं आग से जले अश्वो का चिकित्सा करने को कहा। वैद्य ने सलाह दी के यदि बंदरों की चमड़ी का मरहम अश्वो को लगाया जाए तो वह जल्दी ही स्वस्थ हो जाएंगे। राजा ने तभी सभी बंदरों को मारने का आदेश दिया। सिपाहियों ने पत्थरों और लाठियों से राजमहल में उपस्थित सभी बंदरों को मार डाला।

जब बंदरों के सरदार को यह समाचार मिला तो वह बहुत ही दुखी हो गया। उसके मन में राजा से बदला लेने की आग भड़क उठी। वह दिन-रात बस इसी सोच में डूबा रहता था कि राजा से कैसे बदला लिया जाए?

एक दिन सरदार एक तालाब के पास पहुंचा। आसपास देखने से उसे कुछ पद चिन्ह दिखाई दिए जो मनुष्य एवं जानवरों के थे। वे पदचिन्ह केवल तालाब की ओर आते हुए ही थे, वापस जाते हुए नहीं थे। तभी सरदार समझ गया कि अवश्य ही इस तालाब में कोई नरभक्षी मगरमच्छ रहता है। उसका पता लगाने के लिए सरदार ने एक कमल नली और उसका एक सिरा तालाब में डाला और दूसरे सिरे से जलपान किया।

कुछ समय पश्चात उस तालाब में से एक कंठहार धारण किए हुए एक मगरमच्छ बाहर आया। उसने कहा “आज तक कोई भी इस तालाब से पानी पीने के बाद जिंदा वापस नहीं गया, तूने कमलनाल द्वारा पानी पीकर अपनी बुद्धि का परिचय दिया है। मैं तुमसे बहुत ही प्रसन्न हूं। तुम जो वर मांगेगा मैं वह वर दे दूंगा।

तभी सरदार ने पूछा कि तुम्हारी भक्षण-शक्ति कितनी है?

मगरमच्छ ने कहा की “जल में तो मैं सैकड़ों पशुओं एवं मनुष्य को खा सकता हूं किंतु जल से बाहर एक गीदड़ को भी नहीं खा सकता।”

सरदार ने कहा “एक राजा से मेरा वैर है। यदि तुम मुझे यह कंठ हार दे दो तो मैं राजा के पूरे परिवार को इस तालाब में लाकर तुम्हारा भोजन बना सकता हूं।”

मगरमच्छ ने कंठ हार दे दिया। उस कंठ हार को लेकर सरदार राज महल में गया। उस कंठहार के कारण पूरा राज महल जगमगा उठा। जब राजा ने यह कंठ हार देखा तो सरदार से पूछा की यह कंठ हार तुम्हें कैसे मिला?

राजन! जंगल में कुछ दूर एक तालाब है उस तालाब में जो सुबह के समय गोता लगाता है तो उसे यह कंठ हार मिलता है।

राजा ने एक दिन निश्चित करके समस्त परिवार एवं दरबारियों के साथ उस तालाब के किनारे पर पहुंचने का निश्चय किया।

निश्चित दिन राजा समेत सभी व्यक्ति उस तालाब के किनारे पहुंच गए। यह किसी ने नहीं सोचा कि ऐसा संभव ही नहीं हो सकता क्योंकि लालच सब को अंधा बना देता है। सैकड़ों वाला हजारों चाहता है, हजार वाला लाखों चाहता है और लाखों वाला करोड़ों चाहता है। हमारा शरीर तो धीरे-धीरे वृद्ध होता जाता है लेकिन इच्छा सदैव जवान रहती है। राजा का लालच उसके काल को उसके पास ले आया।

धीरे-धीरे सभी ने तालाब में प्रवेश करना शुरू किया। सरदार ने राजा से कहा “आप रुक जाइए पहले सभी को कंठहार लेने दीजिए। आप मेरे साथ तालाब में प्रवेश कीजिएगा हम दोनों वहां से तालाब में प्रवेश करेंगे जहां सबसे ज्यादा कंठहार मिलेंगे।”

जितने लोग जलाशय में उतरे उनमें से कोई भी जलाशय से बाहर नहीं आया तो राजा को चिंता हुई। राजा ने जब सरदार की और देखा तो सरदार जल्दी से पेड़ की ऊंची शाखा पर जा बैठा और बोला “तुमने मेरे वंश का नाश किया और मैंने तुम्हारे वंश का नाश किया, जाओ अब तुम अपने राज महल में चले जाओ। मेरा बदला पूरा हुआ।”

राजा को बहुत ही क्रोध आ रहा था एवं वह क्रोध के मारे पागल हुए जा रहा था किंतु उसके पास कोई उपाय नहीं था सरदार ने सामान्य नीति का प्रयोग किया एवं हिंसा का प्रत्युत्तर प्रति हिंसा से दिया।

शिक्षा: हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए।

जो जैसा व्यवहार हमारे साथ करता है वैसा ही व्यवहार उसके साथ करना उचित है।

संगीतमय गधा (The Musical Donkey Story In Hindi)

एक धोबी अपने गधे के साथ रहता था। वह गधे से पूरे दिन कपड़ों की पोटलिया ढोने का काम करवाता था। किंतु वह गधे के लिए चारे का प्रबंध नहीं करता था। धोबी निर्दई और कंजूस था।

धोबी पूरे दिन गधे से काम करवाता और रात को उसे चरने के लिए छोड़ देता। पास में कोई चारावाह नहीं होने के कारण गधे को पूर्ण रूप से भोजन नहीं मिलता। पूर्ण रूप से भोजन ना मिलने के कारण गधे की हालत बहुत खराब हो गई।

एक रात को गधे की मुलाकात एक गीदड़ से हुई।

गीदड़ ने गधे से कहा कि “महाशय! आप की यह हालत कैसे हुई?”

गधा ने जवाब दिया “मुझे खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं मिलता है, जिस कारण मेरी यह हालत है।”

इस पर गीदड़ ने कहा कि अब से तुम्हारे भुखमरी के दिन गए। मुझे पास ही एक सब्जियों के बागान का पता है जिसमें कई तरह तरह की सब्जियां उगाई जाती है। उस बागान के एक छोर की बाड को मैंने तोड़ कर उसमें घुसने की एक जगह बनाई है। तुम भी मेरे साथ चलना और वहां भरपेट सब्जियां खाना, तो गधे ने लार टपका ते हुए हामी भर दी।

गधा गीदड़ के पीछे चलता चलता उस सब्जियों के बागान में जा पहुंचा। वहां गधे ने भरपेट सब्जियां खाई। गधे को इतना पर्याप्त भोजन कई महीनों बाद मिला था और वे दोनों भोर होने से पहले उस बागान से निकलकर जंगल की ओर चले गए।

यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा जिसके कारण गधे के चेहरे पर चमक आ गई और उसका शरीर भी हष्ट पुष्ट हो गया। वह अब भुखमरी के दिनों को भूल गया।

एक रात गधा भरपेट खाने के बाद मस्ती में झूम कर गीदड़ से बोला आज मेरा मन गाना गाने का है और मैं सोच रहा हूं कि मैं ढेंचू राग गाउ।

गीदड़ ने कहा “गधे भाई, यह गाने वाने का चक्कर छोड़ो, ये मत भूलो कि हम दोनों खाने की चोरी कर रहे हैं। क्यों मुसीबत को न्योता दे रहे हो।”

गधे ने गीदड़ की और टेडी नजर से देखा और कहा तुम जंगली के जंगली ही रहोगे। गाने के बारे में तुम क्या जानो।

गीदड़ ने कहा “मैं गाने के बारे में नहीं जानता, मैं सिर्फ अपनी जान बचाना जानता हूं। तुम अपना बेसुरा राग अलापने की जिद्द छोड़ो उसी में हम दोनों की भलाई है।”

गधे ने गीदड़ की बात का बुरा मानकर हवा में दुलत्ती चलाई और शिकायत करने लगा “तुम मेरे राग को बेसुरा कहकर मेरी बेइज्जती की है। हम गधे शुद्ध शास्त्रीय लय में रेंकते हैं। वह मूर्खों की समझ में नहीं आ सकता।”

गीदड़ बोला मैं मूर्ख ही सही पर एक मित्र के नाते मेरी बात मान लो। यदि तुम ने गाना गाया तो चौकीदार जाग जाएंगे।

गधा अरे मूर्ख गीदड़! चौकीदार तो मेरा गाना सुनकर मेरे लिए फूलों की माला लेकर आएंगे।

गीदड़ ने चालाकी से काम लिया और हाथ जोड़कर बोला “गधे भाई, मैं अपनी गलती स्वीकार करता हूं। तुम बहुत ही सुरीली राग में गाते हो, मेरे जाने के कुछ समय बाद तुम अपना गाना शुरू करना ताकि तुम्हारा गाना खत्म होने से पहले मैं तुम्हारे लिए फूलों की माला ला सकूं।”

गधे ने सहमति में सिर हिलाया। गीदड़ जंगल की ओर भाग गया। गीदड़ के जाने के कुछ देर बाद गधा ने अलापना शुरू किया। गधे की आवाज से चौकीदार जाग गए और लट्ठ लेकर उसकी ओर भागे।

यही वह दुष्ट गधा है जो इतने दिन से हमारे बागान की सब्जियों को खा रहा है, यह कहकर सभी चौकीदार उस गधे पर टूट पड़े। चौकीदारों ने गधे को लट्ठ से मार मार कर अधमरा कर दिया।

शिक्षा: हमें अपने शुभचिंतकों और हितेशियों की बात माननी चाहिए।

कुत्ता जो विदेश चला गया (The Dog who went Abroad Story In Hindi)

प्राचीन समय में एक गांव में चित्रांग नाम का एक कुत्ता रहता था। एक बार उस गांव में अकाल पड़ गया। अकाल पड़ने के कारण अन्न की बहुत ज्यादा कमी हो गई, जिसके कारण कई कुत्तों के वंश का नाश हो गया। चित्रांग भी इस समस्या के कारण बहुत ही चिंतित रहता था।

इस समस्या से बचने के लिए उसने एक उपाय सोचा। चित्रांग ने इस गांव को छोड़कर दूसरे गांव में पलायन करने का सोचा। चित्रांग गांव छोड़कर दूसरे गांव चला गया। दूसरे गांव में जाकर चित्रांग ने चोरी छुपे एक घर में घुसकर भरपेट खाना खा लिया।

जिसके घर में घुसकर चित्रांग ने खाना खाया उसने तो कुछ नहीं कहा, किंतु घर से बाहर निकलते ही उस गांव के कुत्तों ने चित्रांग पर हमला कर दिया।

चित्रांग और कुत्तों के बीच भयंकर लड़ाई हुई। उस लड़ाई में चित्रांग बुरी तरह से घायल हुआ और उसके शरीर पर बहुत घाव लग गए। चित्रांग ने सोचा कि “इस गांव से तो हमारा गांव ही अच्छा, वहां केवल अकाल है जान के दुश्मन कुत्ते नहीं।”

यह सोचकर चित्रांग अपने गांव पुनः वापस आ गया। जब चित्रांग अपने गांव पहुंचा तो सब कुत्ता ने मिलकर पूछा चित्रांग! तुम पुनः इस गांव में क्यों लौट आए, उस गांव के लोग कैसे हैं? वहां खाने पीने की कौन-कौन सी चीजें हैं?

चित्रांग ने उत्तर दिया “मित्रों, उस गांव में खाने पीने की चीजें तो बहुत अच्छी है और उस गांव के लोग भी नरम स्वभाव के हैं। किंतु उस गांव में एक समस्या है, वहां अपने ही जाति के कुत्ते बड़े खूंखार हैं।”

हमेशा सोच समझ कर काम करो (Considered Actions First Story In Hindi)

दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध नगर पाटलिपुत्र में मणिभद्र नाम का एक धनिक महाजन रहता था। लोक सेवा और धार्मिक कार्यों में निहित रहने के कारण मणिभद्र के पास धन संचय में कमी हो गई। इस बात को लेकर मणिभद्र काफी चिंतित रहता था। उसकी यह चिंता निरर्थक नहीं थी। धन विहीन मनुष्य के गुण भी दरिद्रता के तले दब जाते हैं। निर्धन मनुष्यों के गुणों का समाज भी आदर नहीं करता।

बुद्धि ज्ञान और प्रतिभा सब निर्धनता के कारण अदृश्य हो जाते हैं। जैसे पतझड़ के मौसम में मौलसरी के फूल झड़ जाते हैं, वैसे ही घर परिवार के पोषण की चिंता में बुद्धि भी विलीन हो जाती हैं। घर के घी तेल नमक चावल दाल की निरंतर चिंता प्रतिभाशील व्यक्ति की भी प्रतिभा को खा जाती है। निर्धन व्यक्ति का घर शमशान का रूप ले लेता है। उस समय प्रियदर्शनी पत्नी का भी स्वरूप रुखा सुखा और निर्जीव सा प्रतीत होता है। पानी में उठते बुलबुलों की तरह उसकी मान मर्यादा समाज में समाप्त हो जाती है।

निर्धनता की इस भयानक कल्पनाओं को सोच कर उसका दिल दहल उठा। इन कल्पनाओं का विचार करते हुए उसे नींद आ गई। नींद में उसे एक सपना आया।

स्वप्न में उसे पद्मानिधि ने एक भिक्षुक के रूप में दर्शन दिए और बोले “तुम्हारे पूर्वजों ने मेरी खूब सेवा की है, इसलिए मैं तुम्हारे पास आया हूं। कल सुबह मैं इसी वेशभूषा में तुम्हारे घर आऊंगा। तुम मुझे लाठी से मार देना। मैं मरते ही स्वर्णमय हो जाऊंगा। उस स्वर्ण से तुम्हारी दरिद्रता दूर हो जाएगी।”

जब सुबह मणिभद्र उठा तो उसके मन में स्वप्न के बारे में विचार आने लगे, साथ में अनेक प्रकार के प्रसन्न भी उसके मन उठने लगे। ना जाने यह सपना सत्य है या असत्य। क्या ऐसा कुछ संभव है या नहीं। इसी प्रकार के विचारों से उसका मन डावाडोल हो रहा था।

तभी अचानक उसके द्वार पर एक भिक्षुक आ गया। मणिभद्र को पुनः अपना स्वप्न याद आया और उसने पास पड़ी लाठी उठाकर भिक्षुक के सर पर दे मारी। लाठी के लगते ही भिक्षुक के प्राण पखेरू हो गए और उसका शव स्वर्ण मय हो गया। उसने जल्दी से उस शव को अपने घर में छुपा लिया। किंतु इस सब कार्य को करते हुए एक नाई ने देख लिया।

मणिभद्र ने नाई को काफी सारा धन देखकर इस बात को किसी को भी नहीं कहने के लिए कहा। नाई ने वह बात तो किसी को भी नहीं बताई किंतु वह भी मणिभद्र की तरह जल्दी से सर्व संपन्न हो जाना चाहता था। उसने सोचा कि इस सरल विधि से मैं खूब सारा धन एकत्रित कर लूंगा और सर्व संपन्न हो जाऊंगा। यह सब सोचते सोचते उसे रात्रि में एक पल भी नींद नहीं आई।

अगले दिन सुबह उठकर नाई भिक्षुको की खोज करने लगा। गांव के पास ही एक मंदिर में भिक्षुको की एक टोली रुकी हुई थी। नाई मंदिर में अंदर गया, भगवान की पूजा अर्चना करके मंदिर के प्रधान भिक्षुक के पास गया और उनके चरण स्पर्श किए और बोला “महाराज आज की भिक्षा के लिए आप समस्त भिक्षुकों के साथ मेरे द्वार पर पधारेंगे।”

प्रधान भिक्षुक ने नाई से कहा “तुम हमारे भिक्षा के नियमों को नहीं जानते। हम उस ब्राह्मणों के कुल से नहीं हैं जो निमंत्रण पाते ही गृहस्थियों के घर चला जाए। हम भिक्षुक हैं, घूमते घूमते किसी के भी घर पर भिक्षा के लिए चले जाते हैं और वहां से भी उतना ही भोजन लेते हैं जितना कि प्राण धारण करने के लिए आवश्यक हो। हम सब किसी दिन घूमते हुए तुम्हारे घर अवश्य आ जाएंगे।”

प्रधान भिक्षुक का उत्तर सुनकर नाई को निराशा हुई, उसने एक नई युक्ति सोची और बोला “मैं आपके नियमों से अच्छी तरीके से परिचित हूं, किंतु मैं आपको भिक्षा के लिए नहीं बुला रहा हूं। मेरा उद्देश्य तो आपको पुस्तकें एवं लेखन सामग्री देने का है। इस महान कार्य की सिद्धि आपके आए बिना पूरी नहीं होगी।” प्रधान भिक्षुक ने नाई की बात मान ली। नाई जल्दी से अपने घर गया और सब तैयारियां कर ली।

नाई अब भिक्षुको के पास गया और उन सब को अपने घर की तरफ ले गया। भिक्षुक वर्ग भी धन वस्त्रों के लालच मैं उस नाई के पीछे पीछे चल दिया। संसार में सब कुछ छोड़ देने के बाद भी तृष्णा संपूर्ण रूप से नष्ट नहीं होती। शरीर के सभी अंग बेकार हो जाते है, बाल श्वेत हो जाते है, चमड़ी रूखी सी हो जाती है फिर भी हमारे मन की तृष्णा जवान रहती है।

उनकी तृष्णा ने उन्हें ठग लिया। नई सभी भिक्षुको को अपने घर के अंदर बुला कर उन सब पर लाठियां बरसाना शुरू कर दी। कई तो लाठियां खाते ही धराशाई हो गए, कईयों के सर फट गए। इन सब का शोर सुनकर गांव वाले एकत्रित हो गए और एक नगरपाल भी वहा आ गया। उन्होंने वहां आकर देखा कि कई भिक्षुको के मृत शरीर पड़े हैं और कुछ लोग अपनी जान बचाने के लिए इधर उधर भाग रहे हैं।

नाई से जब इस रक्तपात का कारण पूछा तो उसने मणिभद्र के घर पर आहुत भिक्षुक के स्वर्णमय होने की बात बताई वह भी मणिभद्र की तरह जल्दी से सर्व संपन्न होना चाहता था, इसलिए उसने ऐसा किया।

राज अधिकारियों ने मणिभद्र को बुलाया और पूछा “क्या तुमने भिक्षु की हत्या की है?”

मणिभद्र ने अपने स्वप्न की कहानी आरंभ से अंत तक सुनाई। राज्य के धर्माधिकारियों ने उस नाई को मृत्युदंड दिया और कहा “ऐसे कुपरीक्षितकारी बिना सोचे काम करने वालों के लिए मृत्युदंड ही उपयुक्त है। कोई भी कार्य करने से पहले उसे अच्छी तरह जाने, देखे, परखे, उसकी परीक्षा ले उसके बाद उस कार्य को करना चाहिए वरना परिणाम नाई की तरह होता है।

चार मूर्ख पंडितों की कहानी (The Four Learned Fools Story In Hindi)

एक समय की बात है। एक स्थान पर चार पंडित रहते थे, वह चारों विद्या अध्ययन के लिए कान्यकुब्ज गए। निरंतर 12 वर्षों तक विद्या अध्ययन करने के बाद वह चारों पंडित शास्त्रों में महान हो गए। विद्या अध्ययन करने के बाद उन चारों ने निर्णय लिया कि हम स्वदेश लौट जाएंगे।

उसके बाद वह चारों एक मार्ग पर सीधा चलने लगे। कुछ देर चलने के बाद वह मार्ग दों मार्ग में बंट गया। मार्ग को दो हिस्सों में फंटता देख वह कोई निश्चय नहीं ले पाए और वह वहीं रुक गए।

इसी समय वहां से एक मृत वैश्य बालक की अर्थी गुजर रही थी, उस अर्थी के साथ बहुत से महाजन भी आ रहे थे। उन महाजनों को देखकर एक पंडित ने यह कहा कि यह तो हमने विद्या में सीखा है और वह अपनी पुस्तक में से उस महाजनों के बारे में खोजने लगा। जब उसको पुस्तक के पन्नों में महाजनों के बारे में लिखा हुआ मिला तो उस पंडित ने कहा- “महाजनो येन गतः स पन्थाः”

इसका अर्थ यह है कि जिस मार्ग से महाजन गुजरते हैं, वह मार्ग सही है। अतः हमें मार्ग से ही जाना चाहिए। पुस्तक में लिखी है बात उन पंडितों ने ब्रह्म-वाक्य मानकर आगे चलने लगे और वह उनके साथ उनके पीछे-पीछे शमशान की तरफ निकल पड़े।

जब वे चारों पंडित श्मशान में पहुंचे तो शमशान में एक गधा खड़ा हुआ था। गधे को खड़ा देख उनमें से एक पंडित ने कहा यह वाक्य तो हमारी पुस्तक में लिखा हुआ है और वह पुस्तक के पन्ने पीछे करके देखने लगा तो उसने देखा कि पुस्तक में लिखा हुआ था।

“राजद्वारे श्मेशाने च यस्तिष्ठ्ति स बान्धवः”

इसका अर्थ यह होता है कि श्मशान और राजा के द्वार में जो खड़ा होता है, वह अपना भ्राता होता है।

यह पढ़कर वे चारों पंडित उस गधे के पास गए और उसको गले लगाने लगे और उस गधे के पैर दबाने लगे। क्योंकि वह उनको अपना भाई लग रहा था जो कि उन्होंने पुस्तक में पढ़ा था और पुस्तक में पढ़े हुए वाक्य उनको ब्रह्मा जी के वाक्य लग रहे थे।

इतनी देर में वहां से एक ऊंट गुजरा। ऊंट को देखकर वह चारों पंडित दंग रह गए क्योंकि वह चारों पंडित ने 12 वर्ष सिर्फ पुस्तक पढ़ी और विद्यालय के चारों तरफ ऊंची दीवार होने के कारण उन्होंने विद्यालय के बाहर कुछ नहीं देखा। ऊंट उन चारों को देख कर वहां से भागने लगा। ऊंट को भागते देख उन चारों पंडित में से एक पंडित ने बोला यह तो हमारे पुस्तक में लिखा हुआ है और उसे यह व्याख्यान याद आ गया।

“धर्मस्य त्वरिता गतिः”

इसका अर्थ यह होता है कि धर्म की गति में बड़ा वेग होता है और उन्हें निश्चय हो गया कि वेग से जाने वाली यह वस्तु अवश्य ही धर्म है। उसी समय एक पंडित को याद आया “इष्टं धर्मेण योजयेत्” अर्थात धर्म का सायोंग इष्ट से करा देना चाहिए।

उन चारों को इष्ट शमशान में मिला। मित्र को लगा जिसको वह भाई मान गए थे और धर्म उन्हें ऊंट लगा तो उन चारों ने निर्णय लिया कि इस गधे को ऊंट से बांध देना चाहिए और वह इस गधे को लेकर ऊंट के साथ बांध दिया। वह गधा एक धोबी का था और धोबी ने उन्हें देख लिया। वह उनकी तरफ तेजी से भाग कर आ रहा था। धोबी को अपनी तरफ आते देख चारों पंडित डर गए और वहां से भाग गए।

भागते भागते चारों पंडित एक नदी के पास पहुंच गए। नदी में एक बड़ा पलाश का पता तैरते हुए उनकी तरफ आ रहा था। उसको देख एक पंडित को लगा कि यह वर्णन हमारी पुस्तक में लिखा हुआ है और वह पुस्तक पढ़ने लगा “आगमिष्यति यत्पत्रं तदस्मांस्तारयिष्यति” अर्थात नदी से जो भी तैरता हुआ हमारी तरफ आए, वही हमारा उद्धार करेगा।

मूर्ख पंडित अपना उद्धार समझ कर उस तलाश के पत्ते पर कूद पड़ा। पत्ता उसकी वजह से पानी में डूब गया और वह पंडित डूबने लगा, इसको देख एक पंडित पुस्तक में लिखा शलोक लोग याद आ गया।

“सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पंडितः”

अर्थात संपूर्ण का नाश होने से अच्छा यह है कि हमें आधे को बचा लेना चाहिए बाकी आधे का परित्याग कर देना चाहिए। वह उस डूबते हुए पंडित की शिखा को पकड़कर उसकी गर्दन धड़ से अलग कर देता है। उसका देह पानी मैं बहता हुआ चला जाता है और उसके हाथ में उसका धड़ रहता हैं और वह चारों में से एक की मृत्यु हो जाती है। वह तीन ही पीछे बचते हैं। वह तीनों आगे बढ़ते हैं और एक गांव में पहुंच जाते हैं। गांव में पहुंचते ही उनको एक झोपड़ी में निवास के लिए ठहराया गया।

जब उन तीनों को संध्या के वक्त भोजन परोसा गया तो उनमें से एक ने कहा “दीर्घसूत्री विनश्यति” अर्थात दीर्घ तन्तु वाली वस्तु नष्ट हो जाती है और वहां भोजन का ग्रहण नहीं करता है।

दूसरे को सबसे पहले रोटियां परोशी गई तो उसने कहा: “अतिविस्तारविस्तीर्णं तद्भवेन्न चिरायुषम्” अर्थात बड़ी और फैला हुआ खाना खाने से आयु कम होती है और वह भी खाना खाने से इंकार कर देता है।

तीसरा पंडित को छिद्र वाली रोटिका दी गई तो उसने कहा ’छिद्रेष्वनर्था बहुली भवन्ति’ अर्थात छिद्र वाली वस्तुओं में खाने से अपशगुन होता है, इससे अनर्थ होता है। यह कहकर वह भी खाना नहीं खाता है और वह तीनों कोई ना कोई अनर्थ कहकर खाना नहीं खाते हैं। इससे उन तीनों पंडित की जगत में हसाई हुई और वह भूखे ही रह गए।

शिक्षा:- व्यवहार बुद्धि के बिना पंडित भी मूर्ख होता है। सिर्फ पुस्तकें पढ़ने से बुद्धि का विकास नहीं होता है। जब तक पुस्तकों में लिखी विद्या का हम अपने जीवन में उपयोग करना नहीं सीख सकते हैं, तब तक वह विद्या व्यर्थ है।

कौवे और उल्लू का युद्ध (The War of Crows and Owls Story In Hindi)

दक्षिण देश में महिलारोप्य नाम का एक नगर था। नगर के पास एक बड़ा पीपल का वृक्ष था। उसकी घने पत्तों से ढकी शाखाओं पर पक्षियों के घोंसले बने हुए थे। उन्हीं में से कुछ घोंसलों में कौवों के बहुत से परिवार रहते थे। कौवों का राजा वायसराज मेघवर्ण भी वहीं रहता था। वहाँ उसने अपने दल के लिये एक व्यूह सा बना लिया था। उससे कुछ दूर पर्वत की गुफा में उल्लओं का दल रहता था। इनका राजा अरिमर्दन था।

दोनों में स्वाभाविक वैर था। अरिमर्दन हर रात पीपल के वृक्ष के चारों ओर चक्कर लगाता था। वहाँ कोई इकला-दुकला कौवा मिल जाता तो उसे मार देता था। इसी तरह एक-एक करके उसने सैंकड़ों कौवे मार दिये। तब, मेघवर्ण ने अपने मंत्रियों को बुलाकर उनसे उलूकराज के प्रहारों से बचने का उपाय पूछा।

उसने कहा, “कठिनाई यह है कि हम रात को देख नहीं सकते और दिन को उल्लू न जाने कहाँ जा छिपते हैं। हमें उनके स्थान के सम्बन्ध में कुछ भी पता नहीं। समझ नहीं आता कि इस समय सन्धि, युद्ध, यान, आसन, संश्रय, द्वैधीभाव आदि उपायों में से किसका प्रयोग किया जाय?”

पहले मेघवर्ण ने ’उज्जीवी’ नाम के प्रथम सचिव से प्रश्न किया। उसने उत्तर दिया “महाराज! बलवान्‌ शत्रु से युद्ध नहीं करना चाहिये। उससे तो सन्धि करना ही ठीक है। युद्ध से हानि ही हानि है। समान बल वाले शत्रु से भी पहले सन्धि करके, कछुए की तरह सिमटकर, शक्ति-संग्रह करने के बाद ही युद्ध करना उचित है।”

उसके बाद ’संजीवी’ नाम के द्वितीय सचिव से प्रश्न किया गया। उसने कहा “महाराज ! शत्रु के साथ सन्धि नहीं करनी चाहिये। शत्रु सन्धि के बाद भी नाश ही करता है। पानी अग्नि द्वारा गरम होने के बाद भी अग्नि को बुझा ही देता है। विशेषतः क्रूर, अत्यन्त लोभी और धर्म रहित शत्रु से तो कभी भी सन्धि न करे। शत्रु के प्रति शान्ति-भाव दिखलाने से उसकी शत्रुता की आग और भी भड़क जाती है। वह और भी क्रूर हो जाता है।

जिस शत्रु से हम आमने-सामने की लड़ाई न लड़ सकें उसे छलबल द्वारा हराना चाहिये, किन्तु सन्धि नहीं करनी चाहिये । सच तो यह है कि जिस राजा की भूमि शत्रुओं के खून से और उनकी विधवा स्त्रियों के आँसुओं से नहीं सींची गई, वह राजा होने योग्य ही नहीं।”

तब मेघवर्ण ने तृतीय सचिव अनुजीवी से प्रश्न किया। उसने कहा “महाराज! हमारा शत्रु दुष्ट है, बल में भी अधिक है। इसलिये उसके साथ सन्धि और युद्ध दोनों के करने में हानि है। उसके लिये तो शास्त्रों में यान नीति का ही विधान है। हमें यहाँ से किसी दूसरे देश में चला जाना चाहिये। इस तरह पीछे हटने में कायरता-दोष नहीं होता। शेर भी तो हमला करने से पहले पीछे हटता है। वीरता का अभिमान करके जो हठपूर्वक युद्ध करता है वह शत्रु की ही इच्छा पूरी करता है और अपने व अपने वंश का नाश कर लेता है।”

इसके बाद मेघवर्ण ने चतुर्थ सचिव ’प्रजीवी’ से प्रश्न किया। उसने कहा “महाराज! मेरी सम्मति में तो सन्धि, विग्रह और यान, तीनों में दोष है। हमारे लिये आसन-नीति का आश्रय लेना ही ठीक है। अपने स्थान पर दृढ़ता से बैठना सब से अच्छा उपाय है।

मगरमच्छ अपने स्थान पर बैठकर शेर को भी हरा देता है, हाथी को भी पानी में खींच लेता है। वही यदि अपना स्थान छोड़ दे तो चूहे से भी हार जाय। अपने दुर्ग में बैठकर हम बड़े से बड़े शत्रु का सामना कर सकते हैं। अपने दुर्ग में बैठकर हमारा एक सिपाही शत-शत शत्रुओं का नाश कर सकता है। हमें अपने दुर्ग को दृढ़ बनाना चाहिये। अपने स्थान पर दृढता से खडे़ छोटे-छोटे वृक्षों को आँधी-तूफान के प्रबल झोंके भी उखाड़ नहीं सकते।”

तब मेघवर्ण ने चिरंजीवी नाम के पंचम सचिव से प्रश्न किया। उसने कहा “महाराज! मुझे तो इस समय संश्रय नीति ही उचित प्रतीत होती है। किसी बलशाली सहायक मित्र को अपने पक्ष में करके ही हम शत्रु को हरा सकते हैं। अतः हमें यहीं ठहर कर किसी समर्थ मित्र की सहायता ढूंढ़नी चाहिये। यदि एक समर्थ मित्र न मिले तो अनेक छोटे 2 मित्रों की सहायता भी हमारे पक्ष को सबल बना सकती है। छोटे 2 तिनकों से गुथी हुई रस्सी भी इतनी मजबूत बन जाती है कि हाथी को जकड़कर बाँध लेती है।

पांचों मन्त्रियों से सलाह लेने के बाद वायसराज मेघवर्ण अपने वंशागत सचिव स्थिरजीवी के पास गया, उसे प्रणाम करके वह बोला “श्रीमान्! मेरे सभी मन्त्री मुझे जुदा-जुदा राय दे रहे हैं। आप उनकी सलाहें सुनकर अपना निश्चय दीजिये।”

स्थिरजीवी ने उत्तर दिया “वत्स ! सभी मन्त्रियों ने अपनी बुद्धि के अनुसार ठीक ही मन्त्रणा दी है, अपने-अपने समय सभी नीतियाँ अच्छी होती हैं। किन्तु, मेरी सम्मति में तो तुम्हें द्वैधीभाव, या भेदनीति का ही आश्रय लेना चाहिये। उचित यह है कि पहले हम सन्धि द्वारा शत्रु में अपने लिये विश्वास पैदा कर लें, किन्तु शत्रु पर विश्वास न करें। सन्धि करके युद्ध की तैयारी करते रहें; तैयारी पूरी होने पर युद्ध कर दें। सन्धिकाल में हमें शत्रु के निर्बल स्थलों का पता लगाते रहना चाहिये। उनसे परिचित होने के बाद वहीं आक्रमण कर देना उचित है।”

मेघवर्ण ने कहा “आपका कहना निस्संदेह सत्य है, किन्तु शत्रु का निर्बल स्थल किस तरह देखा जाए ?”

स्थिरजीवी “गुप्तचरों द्वारा ही हम शत्रु के निर्बल स्थल की खोज कर सकते हैं। गुप्तचर ही राजा की आँख का काम देता है। और हमें छल द्वारा शत्रु पर विजय पानी चाहिये।

मेघवर्ण “आप जैसा आदेश करेंगे, वैसा ही मैं करुँगा।”

स्थिरजीवी “अच्छी बात है। मैं स्वयं गुप्तचर का काम करुंगा। तुम मुझ से लड़कर, मुझे लहू-लुहान करने के बाद इसी वृक्ष के नीचे फेंककर स्वयं सपरिवार ऋष्यमूक पर्वत पर चले जाओ। मैं तुम्हारे शत्रु उल्लुओं का विश्‍वासपात्र बनकर उन्हें इस वृक्ष पर बने अपने दुर्ग में बसा लूंगा और अवसर पाकर उन सब का नाश कर दूंगा। तब तुम फिर यहाँ आ जाना।”

मेघवर्ण ने ऐसा ही किया। थोड़ी देर में दोनों की लड़ाई शुरु हो गई। दूसरे कौवे जब उसकी सहायता को आए तो उसने उन्हें दूर करके कहा “इसका दण्ड मैं स्वयं दे लूंगा।” अपनी चोंचों के प्रहार से घायल करके वह स्थिरजीवी को वहीं फैंकने के बाद अपने आप परिवारसहित ऋष्यमूक पर्वत पर चला गया।

तब उल्लू की मित्र कृकालिका ने मेघवर्ण के भागने और अमात्य स्थिरजीवी से लडा़ई होने की बात उलूकराज से कह दी। उलूकराज ने भी रात आने पर दलबल समेत पीपल के वृक्ष पर आक्रमण कर दिया। उसने सोचा भागते हुए शत्रु को नष्ट करना अधिक सहज होता है। पीपल के वृक्ष को घेरकर उसने शेष रह गए सभी कौवों को मार दिया

अभी उलूकराज की सेना भागे हुए कौवों का पीछा करने की सोच रही थी कि आहत स्थिरजीवी ने कराहना शुरु कर दिया। उसे सुनकर सब का ध्यान उसकी ओर गया। सब उल्लू उसे मारने को झपटे। तब स्थिरजीवी ने कहा:

“इससे पूर्व कि तुम मुझे जान से मार डालो, मेरी एक बात सुन लो। मैं मेघवर्ण का मन्त्री हूँ। मेघवर्ण ने ही मुझे घायल करके इस तरह फैंक दिया था। मैं तुम्हारे राजा से बहुत सी बातें कहना चाहता हूँ। उससे मेरी भेंट करवादो।”

सब उल्लुओं ने उलूकराज से यह बात कही। उलूकराज स्वयं वहाँ आया। स्थिरजीवी को देखकर वह आश्‍चर्य से बोला “तेरी यह दशा किसने कर दी?”

स्थिरजीवी “देव! बात यह हुई कि दुष्ट मेघवर्ण आपके ऊपर सेना सहित आक्रमण करना चाहता था। मैंने उसे रोकते हुए कहा कि वे बहुत बलशाली हैं, उनसे युद्ध मत करो, उनसे सुलह कर लो। बलशाली शत्रु से सन्धि करना ही उचित है; उसे सब कुछ देकर भी वह अपने प्राणों की रक्षा तो कर ही लेता है। मेरी बात सुनकर उस दुष्ट मेघवर्ण ने समझा कि मैं आपका हितचिन्तक हूँ। इसीलिए वह मुझ पर झपट पड़ा।

अब आप ही मेरे स्वामी हैं। मैं आपकी शरण आया हूँ। जब मेरे घाव भर जायंगे तो मैं स्वयं आपके साथ जाकर मेघवर्ण को खोज निकालूंगा और उसके सर्वनाश में आपका सहायक बनूंगा।”

स्थिरजीवी की बात सुनकर उलूकराज ने अपने सभी पुराने मंत्रियों से सलाह ली। उसके पास भी पांच मन्त्री थे “रक्ताक्ष, क्रूराक्ष, दीप्ताक्ष, वक्रनास, प्राकारकर्ण।

पहले उसने रक्ताक्ष से पूछा “इस शरणागत शत्रु मन्त्री के साथ कौनसा व्यवहार किया जाय?” रक्ताक्ष ने कहा कि इसे अविलम्ब मार दिया जाय। शत्रु को निर्बल अवस्था में ही मर देना चाहिए, अन्यथा बली होने के बाद वही दुर्जय हो जाता है। इसके अतिरिक्त एक और बात है; एक बार टूट कर जुड़ी हुई प्रीति स्नेह के अतिशय प्रदर्शन से भी बढ़ नहीं सकती।”

रक्ताक्ष से सलाह लेने के बाद उलूकराज ने दूसरे मन्त्री क्रूराक्ष से सलाह ली कि स्थिरजीवी का क्या किया जाय? क्रूराक्ष ने कहा-“महाराज! मेरी राय में तो शरणागत की हत्या पाप है।

क्रूराक्ष के बाद अरिमर्दन ने दीप्ताक्ष से प्रश्‍न किया।

दीप्ताक्ष ने भी यही सम्मति दी।

इसके बाद अरिमर्दन ने वक्रनास से प्रश्न किया। वक्रनास ने भी कहा “देव ! हमें इस शरणागत शत्रु की हत्या नहीं करनी चाहिये। कई बार शत्रु भी हित का कार्य कर देते हैं। आपस में ही जब उनका विवाद हो जाए तो एक शत्रु दूसरे शत्रु को स्वयं नष्ट कर देता है।

उसकी बात सुनने के बाद अरिमर्दन ने फिर दुसरे मन्त्री ’प्राकारकर्ण’ से पूछा “सचिव! तुम्हारी क्या सम्मति है?”

प्राकारकर्ण ने कहा “देव ! यह शरणागत व्यक्ति अवध्य ही है। हमें अपने परस्पर के मर्मों की रक्षा करनी चाहिये।

अरिमर्दन ने भी प्राकारकर्ण की बात का समर्थन करते हुए यही निश्चय किया कि स्थिरजीवी की हत्या न की जाय। रक्ताक्ष का उलूकराज के इस निश्चय से गहरा मतभेद था। वह स्थिरजीवी की मृत्यु में ही उल्लुओं का हित देखताथा।

अतः उसने अपनी सम्मति प्रकट करते हुए अन्य मन्त्रियों से कहा कि तुम अपनी मूर्खता से उलूकवंश का नाश कर दोगे। किन्तु रक्ताक्ष की बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

उलूकराज के सैनिकों ने स्थिरजीवी कौवे को शैया पर लिटाकर अपने पर्वतीय दुर्ग की ओर कूच कर दिया। दुर्ग के पास पहुँच कर स्थिरजीवी ने उलूकराज से निवेदन किया “महाराज! मुझ पर इतनी कृपा क्यों करते हो ? मैं इस योग्य नहीं हूँ।

अच्छा हो, आप मुझे जलती हुई आग मेम डाल दें।”

उलूकराज ने कहा “ऐसा क्यों कहते हो?”

स्थिरजीवी “स्वामी ! आग में जलकर मेरे पापों का प्रायश्चित्त हो जायगा। मैं चाहता हूँ कि मेरा वायसत्व आग में नष्ट हो जाय और मुझ में उलूकत्व आ जाय, तभी मैं उस पापी मेघवर्ण से बदला ले सकूंगा।”

रक्ताक्ष स्थिरजीवी की इस पाखंडभरी चालों को खूब समझ रहा था। उसने कहा “स्थिरजीवी! तू बड़ा चतुर और कुटिल है। मैं जानता हूँ कि उल्लू बनकर भी तू कौवों का ही हित सोचेगा।

उलूकराज के अज्ञानुसार सैनिक स्थिरजीवी को अपने दुर्ग में ले गये। दुर्ग के द्वार पर पहुँच कर उलूकराज अरिमर्दन ने अपने साथियों से कहा कि स्थिरजीवी को वही स्थान दिया जाय जहाँ वह रहनाचाहे।

स्थिरजीवी ने सोचा कि उसे दुर्ग के द्वार पर ही रहना चाहिये, जिससे दुर्ग से बाहर जाने का अवसर मिलता रहे।

यही सोच उसने उलूकराज से कहा “देव! आपने मुझे यह आदर देकर बहुत लज्जित किया है। मैं तो आप का सेवक ही हूँ, और सेवक के स्थान पर ही रहना चाहता हूँ। मेरा स्थान दुर्ग के द्वार पर ही रखिये। द्वार की जो धूलि आप के पद-कमलों से पवित्र होगी उसे अपने मस्तक पर रखकर ही मैं अपने को सौभाग्यवान मानूंगा।”

उलूकराज इन मीठे वचनों को सुनकर फूले न समाये। उन्होंने अपने साथियों को कहा कि स्थिरजीवी को यथेष्ट भोजन दिया जाय।

प्रतिदिन स्वादु और पुष्ट भोजन खाते-खाते स्थिरजीवी थोड़े ही दिनों में पहले जैसा मोटा और बलवान हो गया।

रक्ताक्ष ने जब स्थिरजीवी को हृष्टपुष्ट होते देखा तो वह मन्त्रियों से बोला “यहाँ सभी मूर्ख हैं। लेकिन मन्त्रियों ने अपने मूर्खताभरे व्यवहार में परिवर्तन नहीं किया। पहले की तरह ही वे स्थिरजीवी को अन्न-मांस खिला-पिला कर मोटा करते रहे।

रक्ताक्ष ने यह देख कर अपने पक्ष के साथियों से कहा कि अब यहाँ हमें नहीं ठहरना चाहिये। हम किसी दूसरे पर्वत की कन्दरा में अपना दुर्ग बना लेंगे।

फिर रक्ताक्ष ने अपने साथियों से कहा कि ऐसे मूर्ख समुदाय में रहना विपत्ति को पास बुलाना है। उसी दिन परिवारसमेत रक्ताक्ष वहाँ से दूर किसी पर्वत-कन्दरा में चला गया।

रक्ताक्ष के विदा होने पर स्थिरजीवी बहुत प्रसन्न होकर सोचने लगा “यह अच्छा ही हुआ कि रक्ताक्ष चला गया। इन मूर्ख मन्त्रियों में अकेला वही चतुर और दूरदर्शी था।”

रक्ताक्ष के जाने के बाद स्थिरजीवी ने उल्लुओं के नाश की तैयारी पूरे जोर से शुरु करदी। छोटी-छोटी लकड़ियाँ चुनकर वह पर्वत की गुफा के चारों ओर रखने लगा।

जब पर्याप्त लकड़ियाँ एकत्र हो गई तो वह एक दिन सूर्य के प्रकाश में उल्लुओं के अन्धे होने के बाद अपने पहले मित्र राजा मेघवर्ण के पास गया, और बोला “मित्र! मैंने शत्रु को जलाकर भस्म कर देने की पूरी योजन तैयार करली है।

तुम भी अपनी चोंचों में एक-एक जलती लकड़ी लेकर उलूकराज के दुर्ग के चारों ओर फैला दो। दुर्ग जलकर राख हो जायगा। शत्रुदल अपने ही घर में जलकर नष्ट हो जायगा।”

यह बात सुनकर मेघवर्ण बहुत प्रसन्न हुआ। उसने स्थिरजीवी से कहा “महाराज, कुशल-क्षेम से तो रहे, बहुत दिनों के बाद आपके दर्शन हुए हैं।”

स्थिरजीवी ने कहा “वत्स! यह समय बातें करने का नहीं, यदि किसी शत्रु ने वहाँ जाकर मेरे यहाँ आने की सूचना दे दी तो बना-बनाया खेल बिगड़ जाएगा। शत्रु कहीं दूसरी जगह भाग जाएगा। जो काम शीघ्रता से करने योग्य हो, उसमें विलम्ब नहीं करना चाहिए। शत्रुकुल का नाश करके फिर शांति से बैठ कर बातें करेंगे।

मेघवर्ण ने भी यह बात मान ली। कौवे सब अपनी चोंचों में एक-एक जलती हुई लकड़ी लेकर शत्रु-दुर्ग की ओर चल पड़े और वहाँ जाकर लकड़ियाँ दुर्ग के चारों ओर फैला दीं। उल्लुओं के घर जलकर राख हो गए और सारे उल्लू अन्दर ही अन्दर तड़प कर मर गए।

इस प्रकार उल्लुओं का वंशनाश करके मेघवर्ण वायसराज फिर अपने पुराने पीपल के वृक्ष पर आ गया। विजय के उपलक्ष में सभा बुलाई गई। स्थिरजीवी को बहुत सा पुरस्कार देकर मेघवर्ण ने उस से पूछा “महाराज! आपने इतने दिन शत्रु के दुर्ग में किस प्रकार व्यतीत किये? शत्रु के बीच रहना तो बड़ा संकटापन्न है। हर समय प्राण गले में अटके रहते हैं।”

स्थिरजीवी ने उत्तर दिया “तुम्हारी बात ठीक है, किन्तु मैं तो आपका सेवक हूँ। सेवक को अपनी तपश्चर्या के अंतिम फल का इतना विश्वास होता है कि वह क्षणिक कष्टों की चिन्ता नहीं करता। इसके अतिरिक्त, मैंने यह देखा कि तुम्हारे प्रतिपक्षी उलूकराज के मन्त्री महामूर्ख हैं।

एक रक्ताक्ष ही बुद्धिमान था, वह भी उन्हें छोड़ गया। मैंने सोचा, यही समय बदला लेने का है। शत्रु के बीच विचरने वाले गुप्तचर को मान-अपमान की चिन्ता छोड़नी ही पड़ती है। वह केवल अपने राजा का स्वार्थ सोचता है। मान-मर्यादा की चिन्ता का त्याग करके वह स्वार्थ-साधन के लिये चिन्ताशील रहता है।

वायसराज मेघवर्ण ने स्थिरजीवी को धन्यवाद देते हुए कहा “मित्र, आप बड़े पुरुषार्थी और दूरदर्शी हैं। एक कार्य को प्रारंभ करके उसे अन्त तक निभाने की आपकी क्षमता अनुपम है। संसारे में कई तरह के लोग हैं। नीचतम प्रवृत्ति के वे हैं जो विघ्न-भय से किसी भी कार्य का आरंभ नहीं करते, मध्यम वे हैं जो विघ्न-भय से हर काम को बीच में छोड़ देते हैं, किन्तु उत्कृष्ट वही हैं जो सैंकड़ों विघ्नों के होते हुए भी आरंभ किये गये काम को बीच में नहीं छोड़ते। आपने मेरे शत्रुओं का समूल नाश करके उत्तम कार्य किया है।”

स्थिरजीवी ने उत्तर दिया “महाराज! मैंने अपना धर्म पालन किया। दैव ने आपका साथ दिया। पुरुषार्थ बहुत बड़ी वस्तु है, किन्तु दैव अनुकूल न हो तो पुरुषार्थ भी फलित नहीं होता। आपको अपना राज्य मिल गया। किन्तु स्मरण रखिये, राज्य क्षणस्थायी होते हैं। बड़े-बड़े विशाल राज्य क्षणों में बनते और मिटते रहते हैं। शाम के रंगीन बादलों की तरह उनकी आभा भी क्षणजीवी होती है। इसलिये राज्य के मद में आकर अन्याय नहीं करना, और न्याय से प्रजा का पालन करना। राजा प्रजा का स्वामी नहीं, सेवक होता है।”

इसके बाद स्थिरजीवी की सहायता से मेघवर्ण बहुत वर्षों तक सुखपूर्वक राज्य करता रहा।

चतुर खरगोश और शेर की कहानी (The Cunning Hare And The Lion Story in Hindi)

एक जंगल में एक बहुत बड़ा शेर रहता था। जब वह शिकार पर निकलता तो जंगल के बहुत सारे जानवरों को मार देता था। इस कारण जंगल के सभी जानवर दुखी थे। जंगल के सभी जानवरों ने इसका उपाय सोचने के लिए सभी को एकत्रित किया। सभी जानवरों ने मिलकर इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए एक उपाय सोचा कि उनका दल महाराज के पास जाएगा और उन से विनती करेगा।

दूसरे दिन जानवरों का एक दल महाराज के पास गया। शेर ने अपनी और जानवरों का एक दल आते देखकर जोर-जोर से दहाड़े लगाई और बोला “क्या बात है? तुम सब यहां क्यों आ रहे हो?”

दल के मुखिया ने कहा “महाराज, हम सब आपकी प्रजा हैं, आप हमारे राजा हैं। जब आप शिकार पर निकलते हैं तो आप बहुत सारे जानवरों को मार डालते हैं, जिसके कारण हमारी संख्या बहुत कम होती जा रही है। इस प्रकार हम कुछ दिनों में खत्म हो जाएंगे। उसके पश्चात इस जंगल में केवल आप ही रह जाएंगे। बिना प्रजा के राजा किस काम का, हम सदैव आपको राजा के रूप में देखना चाहते हैं। अतः हम सबकी विनती है कि आप अपनी गुफा में ही रहा कीजिए। हम आपके भोजन के लिए सदैव एक एक जीव को आपके पास भेजते रहेंगे।”

शेर ने कुछ देर सोचा और बोला “मुझे तुम सब की बात मान लेनी चाहिए, पर मेरी एक शर्त है यदि किसी दिन तुम सब ने मिलकर मेरे भोजन के लिए पर्याप्त जीव को मेरे पास नहीं भेजा तो मैं अपनी मनमर्जी से जितने चाहूंगा, उतने जीवो को मार डालूंगा।”

जानवरों के पास शेर की शर्त मानने के अलावा कोई मार्ग ना था। इसलिए उन्होंने महाराज की शर्त को मान लिया।

उस दिन के पश्चात जंगल के सभी जानवरो में से एक-एक जानवर को प्रत्येक दिन शेर के पास भोजन के लिए भेजा जाता रहा। एक दिन एक नन्हे खरगोश की बारी आई। वह खरगोश शरीर से तो बहुत छोटा था किंतु उसके पास बुद्धि बहुत थी। उसने सोचा वैसे भी आज मरना ही है क्यों ना अपनी जान बचाने के लिए कोई ना कोई उपाय किया जाए।

कुछ देर सोचने के पश्चात उसके मन में एक उपाय आया।

वह खरगोश धीरे-धीरे शेर की गुफा की ओर चलता गया। जब वह गुफा तक पहुंचा तब तक बहुत देर हो चुकी थी। शेर का भूख के मारे बुरा हाल हो रहा था।

शेर ने बहुत जोर-जोर से दहाड़े मारी और बोला “आज तुम्हें आने में इतनी देर क्यों लग गई और इतने से भोजन से मेरा क्या होगा। जिसने भी तुम्हें भेजा है, मैं उन सब को एक-एक करके देख लूंगा। एक तो समय पर भोजन नहीं भेजा और इतना छोटा-सा जीव मेरे लिए भेजा।

खरगोश ने नम्रता पूर्वक महाराज के आगे झुका और बोला “महाराज जंगल के सभी जानवरों ने मिलकर आपके लिए पांच खरगोश भेजे थे और हम सब आपके पास समय पर आने वाले थे किंतु मार्ग में हमें एक अन्य शेर ने रोक लिया और मेरे चार साथियों को मारकर खा लिया। वह मेरे को भी खाने वाला था किंतु मैंने उसके सामने आपका जिक्र किया कि हमारे महाराज तुम्हें नहीं छोड़ेंगे तुमने उनका भोजन खाया है।

उस शेर ने हंसकर उत्तर दिया “इस जंगल का राजा तो मैं हूं। कोई दूसरा शेर राजा नहीं है।” उसने मुझे आपको उसके सामने ले जाने के लिए भेजा है।

महाराज ने जोर-जोर से दहाड़े लगाई। उन दलों के कारण पूरा जंगल दहल उठा और बोला “दूसरा शेर? वह कौन है? इस जंगल का राजा तो मैं हूं। कहां है, वह दूसरा शेर? मुझे तुम उससे के पास ले चलो, मैं उसके टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा।”

खरगोश महाराज को लेकर एक कुएं के पास आ गया और बोला “जब हम आपके पास आ रहे थे, तभी वह शेर यही था लगता है, आपको देखकर वह शेर इस गुफा में छुप गया है। महाराज सावधान रहिए कुँए में छुपा हुआ शत्रु खतरनाक होता है।”

जब शेर ने कुए के अंदर झांका तो पानी में उसकी परछाई दिखाई दी। शेर ने सोचा यह अवश्य ही दूसरा शेर है। जब शेर ने दहाड़ लगाई तो कुए में दहाड़ गूंजी। शेर ने सोचा दूसरा शेर मुझे लड़ाई के लिए ललकार रहा है।

शेर ने आव देखा ना ताव और कुएं में कूद गया। शेर कुँए की दीवार से टकराकर पानी में जा गिरा। कुछ देर छट पटाने के पश्चात उस शेर की मृत्यु हो गई।

सारे जंगल में शेर की मृत्यु की बात आग की तरह फैल गई। सभी जानवर मिलकर खरगोश की जय जयकार करने लगे।

शिक्षा: हमें किसी भी परिस्थिति में चतुराई से काम लेना चाहिए।

सांप की सवारी करने वाले मेढकों की कथा (Frogs That Rode A Snake Story In Hindi)

किसी पर्वतीय प्रदेश में मंदविष नाम का एक वृद्ध सर्प रहता था। वृद्ध होने के कारण शिकार करने में असमर्थ था और उसका शरीर भूख के मारे कमजोर होता जा रहा था। एक दिन वह विचार करने लगा कि बिना कोई परिश्रम किए उसको शिकार मिल जाए। तभी उसके मन में एक विचार आया।

वह समीप के तालाब के पास चला गया। उस तालाब के किनारे मेढ़को का एक झुंड रहता था। सर्प वहां पहुंचकर इधर उधर घूमने लगा। एक मेंढक ने सर्प को इस प्रकार घूमते हुए देखकर आश्चर्य से पूछा “मामा! शाम हो गई है और अभी तक आपने भोजन पानी की व्यवस्था नहीं की?

सर्प करुण स्वर में बोला “बेटा! अब मुझे भोजन करने की इच्छा ही नहीं रह गई है। आज सवेरे जब मैं भोजन की तलाश में निकला था। तो मैंने एक सरोवर के तट पर एक मेंढक देखा। जब मैं शिकार के लिए उसकी तरफ बढ़ा तो उसने मुझे देख लिया और पास ही में ध्यान में लीन साधुओं के मध्य छिप गया।”

मैंने उसके भ्रम में ब्राह्मण के पुत्र के अंगूठे को डस लिया और उसकी मृत्यु हो गई। उसके पिता को इस बात का बहुत दुख हुआ। उसने मुझे श्राप देते हुए कहा “तुमने मेरे पुत्र को बिना किसी कारण के डशा है तुम्हारे इस अपराध के लिए तुम्हें मेंढको के लिए वाहन बनना होगा।”

इस कारण मैं तुम सब का वाहन बनने के लिए यहां आया हूं। मेंढक ने यह बात अपने परिजनों को बताई और धीरे-धीरे यह बात सब मेंढको में आग की तरह फैल गई। जब उनके के राजा जलपाद को इस बात का समाचार मिला तो उसे आश्चर्य हुआ।

सबसे पहले जलपाद उस सर्प के फन पर जा बैठा। बाकी मेंढको ने जब यह देखा तो धीरे-धीरे करके सभी सर्प की पीठ पर बैठ गए। सर्प अपने किसी को भी उस समय तंग नहीं किया। उसने सभी मेंढकों को तरह-तरह के करतब दिखाए। इसी प्रकार एक दिन पूरा निकल गया। सर्प की कोमल त्वचा का स्पर्श पाकर जलपाद बहुत ही प्रसन्न हुआ।

अगले दिन जब जलपाद सर्प पर चढ़ा तो सर्प से चला नहीं गया।

उसे देख जल पाद ने पूछा “क्या बात है, आज आप चल नहीं पा रहे हैं?”

हां, आज मैं भूखा हूं इसलिए मैं चल नहीं पा रहा हूं।

जलपाद बोला “आप साधारण कोटि के छोटे-मोटे मेंढकों को खा सकते हो।”

इस प्रकार सर्प को बिना किसी परिश्रम के नित्य प्रतिदिन भोजन मिलने लगा। किंतु जलपाद यह समझ नहीं पाया की वह अपने सुख के लिए अपने ही वंश का धीरे-धीरे नाश कर रहा है। धीरे-धीरे सभी मेंढकों को खाने के पश्चात एक दिन सर्प ने जलपाद को ही खा लिया। इस प्रकार मेंढकों के पूरे वंश का नाश हो गया।

इसलिए कहा गया है कि हितैषियों की हमें रक्षा करनी चाहिए। क्योंकि इनकी रक्षा करने से ही हमारी भी रक्षा होगा।

चुहिया का स्वयंवर (The Wedding Of The Mice Story In Hindi)

प्राचीन समय में गंगा नदी के किनारे याज्ञवल्क्य नाम के एक ऋषि का आश्रम था। एक दिन जब वह प्रातः काल में अपनी साधना में लीन थे तो उनकी हथेली में एक चुहिया आन पड़ी जिसे बाज अपने भोजन के लिए ले जा रहा था। चुहिया में अभी भी प्राण बाकी थे।

मुनि ने उस पर गंगाजल डाला और अपने तपोबल से उसे एक कन्या का रूप दिया। मुनि ने उस कन्या को अपने साथ अपने आश्रम ले गए और अपनी पत्नी को देखकर बोले इस कन्या का अपनी बच्चे की तरह पालन-पोषण करो। मुनि की कोई संतान नहीं होने के कारण उसकी पत्नी ने उस कन्या का लालन पालन अत्यधिक प्रेम के साथ किया।

देखते ही देखते बारह वर्ष बीत गए। वह कन्या विवाह योग्य हो गई। एक दिन पत्नी ने मुनि से कहा “हे नाथ! यह कन्या अब विवाह योग्य हो गई है। कोई अच्छा सा वर ढूंढ कर इसका विवाह करवा दीजिए।” मुनि ने कहा मैं अभी सूर्य को बुलाकर उसे इस कन्या को सुपुर्द कर देता हूं। यदि इसे वह पसंद होगा तो उससे ही इसका विवाह कर देंगे अन्यथा नहीं।

पुत्री ने उत्तर दिया “पिताश्री यह तो आग से भी ज्यादा गर्म है। मुझे यह स्वीकार नहीं है, आप कोई इससे अच्छा वर बुलाइए।”

मुनि ने सूर्य से पूछा कि तुमसे अच्छा वर कौन है?

सूर्य ने कहा “मेरे से अच्छा तो यह मेघ है जो मेरे को भी ढक देते हैं।”

मुनि ने मेघ को बुलाकर पूछा “क्या तुम्हें यह स्वीकार है?”

पुत्री ने कहा “यह तो बहुत काला है कोई इससे अच्छा वर बुलाइए।”

मुनि ने मेंघ से पूछा तुमसे अच्छा वर कौन है?

मेघ ने कहा “मेरे से अच्छा तो वायु है जो मुझे किसी भी दिशा में उड़ा कर ले जाती है।”

मुनि ने वायु को बुलाकर पूछा “क्या तुम्हें यह पसंद है?”

पुत्री ने कहा “यह तो बहुत चंचल है इससे भी अच्छे वर को बुलाइए।”

मुनि ने वायु से पूछा “तुमसे अच्छा वर कौन है?”

वायु ने कहा “मेरे से तो अच्छे पर्वत हैं जो मुझे भी रोक लेते हैं।”

मुनि ने पर्वत को बुलाकर पूछा “क्या तुम्हें यह पसंद है?”

पुत्री ने कहा “यह तो अत्यधिक विशाल और सख्त है, कोई इससे अच्छा वर बुलाइए।”

मुनि ने पर्वत से पूछा “तुमसे अच्छा वर कौन है?”

पर्वत ने कहा “मेरे से तो अच्छा चूहा है जो मुझे भी तोड़ कर मेरे अंदर बिल बना लेते हैं।”

मुनि ने मूषकराज को बुलाकर पूछा “क्या तुम्हें यह पसंद है?”

पुत्री मुषकराज को देखा तो उसे अपनत्व महसूस होने लगा। कन्या को मूषकराज भा गए और बोली “पिताश्री आप मुझे अपने तपोबल से चुहिया बनाकर मुशकराज को सौंप दीजिए।

मुनि ने अपने तपोबल से उस कन्या को पुनः चुहिया बनाकर मूषकराज को सौंप दिया।

अविवेक का मूल्य (The Price of Indiscretion Story In Hindi)

एक गांव में उज्वलक नाम का एक बढ़ाई रहता था। वह बहुत ही गरीब था। उसके परिवार के लिए पर्याप्त खाने-पीने की भी व्यवस्था नहीं हो पाती थी। उसके बढाई का काम सही से नहीं चल रहा था। उसने धनोपार्जन के उद्देश्य से विदेश जाने का निश्चय किया। दूसरे दिन वह यात्रा पर निकल गया। बीच रास्ते में एक जंगल पड़ता था।

जब वह जंगल से गुजर रहा था तो उसने देखा की एक ऊंटनी प्रसव पीड़ा के कारण तड़प रही हैं। उस ऊंटनी ने एक सुंदर ऊंट को जन्म दिया। बढ़ाई उन दोनों को लेकर अपने घर आ गया और घर के बाहर उन्हें बांध दिया। उनको खाने के लिए हरी-हरी घास देने लगा।

कुछ दिनों के बाद ऊंट और ऊंटनी अच्छे भोजन के कारण हष्ट पुष्ट हो गए। ऊंट भी बड़ा हो गया था तो बढ़ाई ने उसके गले में एक घंटा बांध दिया ताकि वह कहीं खोए ना। उस घंटे की आवाज सुनकर बढ़ई उसे ढूंढ के ले आता।

ऊंटनी के दूध से बढ़ई के बाल बच्चों का पालन पोषण होने लगा। अब उठ भी बड़ा हो गया था तो वह भार ढोने के होने के काम आता था। बढ़ई का यह व्यापार अच्छा खासा चलने लगा। बढ़ई ने एक महाजन से कुछ पैसे उधार लेकर दूसरे देश से एक ऊंटनी और लेकर आया। कुछ समय के पश्चात बढ़ई के पास अनेक ऊंट ऊंटनी हो गई। उसके यहां दूध की नदियां बहने लगी। उसका व्यापार चमक उठा।

सभी ऊंट ऊंटनिओं में वह ऊंट अपने आप को सबसे अलग मानता था जिसके गले में घंटा बंधा हुआ था। सभी ने कहा कि यह घंटा उतार दो किंतु वह ऊंट नहीं माना। जब सभी ऊंट ऊंटनिया जंगल में चरने के लिए जाते तो वह घंटे वाला ऊंट अकेले ही जंगल में घूमने चले जाता।

एक दिन इस बात का पता उस जंगल में रह रहे एक शेर को लग गया। सभी ऊंट ऊंटनिया तालाब पर पानी पी रहे थे तो वह ऊंट जंगल की सैर करने के लिए निकल गया। वह सैर करता हुआ शेर की गुफा के पास पहुंच गया। शेर ने जब उस घंटे की आवाज सुनाई दी तो उस आवाज का पीछा किया और उस ऊंट को अपना शिकार बना लिया।

शिक्षा:- हमें अपने हितेश की बात माननी चाहिए।

जब शेर जी उठा (The Lion that Sprang to Life Story In Hindi)

प्राचीन समय की बात है। एक नगर में चार मित्र रहते थे। उन चारों में से तीन कुशल वैज्ञानिक थे किंतु बुद्धि रहित थे। चौथा मित्र वैज्ञानिक तो नहीं था किंतु वह बुद्धिमान था। उन सब ने सोचा की हमारे विज्ञानिक होने का क्या मतलब जब हम इससे कुछ कर ही नहीं सकते। हमें विदेश जाकर अपनी विद्या से धनोपार्जन करना चाहिए। यह विचार करके चारों यात्रा पर निकल गए।

यात्रा के समय पहले मित्र ने कहा “धनोपार्जन करने के लिए विद्या की आवश्यकता होती है ना कि बुद्धि की। हम अपने विद्या का प्रयोग करके धनिको को प्रसन्न कर देंगे, जिससे वह हमें धन देंगे। तो हमें उस धन में से इस विद्या हीन को कुछ भी हिस्सा नहीं देना चाहिए। वह चाहे तो यही सही पुनः लौट सकता है।”

दूसरे मित्र ने उसकी बात का समर्थन किया। किंतु तीसरे मित्र ने कहा “हम चारों बचपन से एक साथ रह रहे हैं। हमने अपने दुख-सुख एक साथ बिताए हैं। जितना भी धन हमें मिलेगा उसमे इसका भी हिस्सा होगा। अपने पराए की गणना छोटे दिल वाले लोग करते हैं। उदार चरित्र वाले व्यक्ति सबको अपने परिवार की तरह मानते हैं। हमें भी उदारता दिखानी चाहिए।” सभी उसकी बात मान कर आगे चल दिए।

यात्रा करते समय वे एक जंगल से गुजर रहे थे। बीच राह मैं उन्हें एक मृत शेर का शरीर दिखाई दिया। उसके सभी अंग भंग किए हुए थे। उन्होंने अपनी विद्या की परीक्षा लेने की सोची। क्यों ना हम अपनी विद्या का प्रयोग करके इस मृत शरीर में प्राण डाल दें। पहले वैज्ञानिक ने अस्थि पंजर इकट्ठा किया, दूसरे ने उसका मास और रुधिर को संजोया, तीसरे ने उस मृत शरीर में प्राण डालने की प्रक्रिया शुरू की।

तभी चौथा मित्र जो वैज्ञानिक तो नहीं था बोला “मित्रों आप अपनी विद्या का प्रयोग करके इसे जीवित तो कर देंगे किंतु यह जीवित होते ही हम सब पर हमला करके मार डालेगा। तो कृपया करके इसे जीवित ना करें।”

चौथे मित्र की बात किसी ने नहीं मानी तो वह पुनः बोल पड़ा “यदि आपको इसे जीवित ही करना है तो पहले मैं पेड़ पर चढ़ जाऊं फिर आप इसे जीवित कर देना।”

यह कहकर वह पेड़ पर चढ़ गया। बाकी तीन मित्रों ने प्राण डालने की प्रक्रिया पुनः शुरू की। जब शेर में जान आ गई तो शेर उठा और उन तीनों पर हमला करके उनको मौत के घाट उतार दिया।

कुम्हार की कहानी (The Story of the Potter Story In Hindi)

एक गांव में युधिष्ठिर नाम का भार रहता था। उसको शराब पीने की बुरी आदत थी। एक दिन रात्रि के समय जब शराब पीकर अपने घर लौटा तो पैर लड़खड़ा जाने के कारण वह गिर गया। नीचे जमीन पर कुछ टूटे हुए घड़े के कुछ टुकड़े पड़े हुए थे। उनमें से एक टुकड़ा कुमार के सिर में लग गया, जिसके कारण बहुत गहरा घाव हो गया था।

घाव इतना कह रहा था कि दवा लेने के कारण भी ठीक ना हुआ। कुछ महीनों पश्चात जब वह घाव तो ठीक हो गया किंतु उसी स्थान पर बहुत बड़ा निशान बन गया।

कुछ समय पश्चात उस गांव में सूखा पड़ गया। कुम्हार अपना गांव छोड़कर अन्य राज्य में चला गया। उस राज्य में राजा सेवकों की भर्ती कर रहा था, तब कुम्हार भी उन सेवकों में शामिल हो गया।

जब राजा ने कुम्हार के सिर पर गांव का इतना बड़ा निशान देखा तो सोचा अवश्य ही यह बहुत बड़ा शूरवीर होगा, जिसने कई जंग मैदान फतेह किए होंगे। किसी ना किसी जंग में यह घाव उसके सिर पर लगा है। यह सोचकर उस कुमार को राजा ने सेना में उच्च पद दे दिया।

राजपूत्र और कुछ सेनापति कुम्हार का इतना सामान देखकर उसे जलते थे लेकिन राज भय के कारण उसको कुछ कह नहीं सकते थे।

कुछ समय पश्चात राजा को युद्ध भूमि में जाना पड़ा। राजा ने संयोग वस युधिष्ठिर कुमार को पूछ लिया कि किस युद्ध में उसे यह घाव लगा है। कुमार ने सोचा कि राजा और उसकी काफी मित्रता हो चुकी है तो उन्हें सच्चाई बता देनी चाहिए। यह सोच कर कुमार बोला “महाराज मैं कोई योद्धा नहीं मैं एक साधारण कुम्हार हूं और यह घाव मुझे अपने घर में एक टूटे हुए घड़े से लगा है।”

महाराज ने जब यह सुना तो वह अचंभित रह गए। गुस्से से लाल पीके होकर बोला “तूने मुझे ठगकर राज्य में बहुत ऊंचा पद ले लिया है। तुम इसी वक्त मेरे राज्य से निकल जाओ।”

कुम्हार महाराज के सामने विनम्रता पूर्वक निवेदन करने लगा कि “महाराज, मैं आपके लिए युद्ध के मैदान में प्राणों की बाजी लगा दूंगा। आप एक बार मेरा युद्ध कौशल तो देख लीजिए।”

किंतु महाराज ने एक ना सुनी और उसे राज्य से तुरंत निकलने के लिए कहा। महाराज ने कहा तुम भले ही बहुत ही शूरवीर हो, सब गुणों में संपन्न हो किंतु जिस कुल में तुम्हारा जन्म हुआ है वह कुल शुरवीरों का कुल नहीं है।

तुम्हारी हालत उस गीदड़ की तरह हो चुकी है जो शेर के बच्चों के साथ पलने के बाद भी हाथी का शिकार नहीं कर पाया। तुम्हारी सच्चाई का पता सेनापति और राजपूतों को पता चले, उससे पहले तुम राज्य छोड़कर निकल जाओ वरना वह तुम्हें मार डालेंगे।

अंत में कुम्हार राज्य छोड़कर चला गया।

स्त्री का विश्वास (Faith Of Women Story In Hindi)

एक नगर में ब्राह्मण एवं उसकी पत्नी बहुत ही प्रेम के साथ रहते थे। ब्राह्मण की पत्नी का स्वभाव ब्राह्मण के परिवार वालों से अच्छा नहीं था। परिवार में प्रतिदिन झगड़ा होता रहता। झगड़ा से परेशान होकर ब्राह्मण ने अपनी पत्नी के साथ कहीं दूर जाकर रहने का निश्चय किया। अपने कुटुंब को छोड़कर पत्नी के साथ यात्रा पर निकल गया।

यात्रा बहुत लंबी थी। बीच रास्ते में ब्राह्मणी को प्यास लगी है, ब्राह्मण जल लेने गया जलाशय दूर होने के कारण उसे वापस आने में देर लग गई। जब ब्राह्मण उसी स्थान पर पहुंचा तो अपनी पत्नी को मरा हुआ पाया। उसके पास बैठकर विलाप करने लगा, तभी आकाशवाणी हुई “यदि तुम अपने जीवन की आधी प्राण अपनी पत्नी को दे दे तो वह जीवित हो सकती हैं।”

ब्राह्मण को यह स्वीकार था और उसकी पत्नी जीवित हो गई। दोनों ने पुनः यात्रा शुरू कर दी।

यात्रा करते हुए वे दोनों एक नगर के द्वार पर पहुंचे। ब्राह्मण ने ब्राह्मणी से कहा “तुम यहां ठहरो मैं भोजन सामग्री लेकर आता हूं।”

यह कहते हुए ब्राह्मण वहां से चला गया। कुछ समय पश्चात उसी स्थान पर एक लंगड़ा व्यक्ति आया। वह व्यक्ति शरीर से हष्ट पुष्ट और दिखने में अत्यधिक सुंदर था। लंगड़ा ब्राह्मणी से हंसकर बोला और ब्राह्मणी भी हंसकर बोली। दोनों में काफी बातचीत हुई एवं दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे। दोनों ने आगे का जीवन एक साथ व्यतीत करने का निश्चय किया।

कुछ समय पश्चात ब्राह्मण भोजन लेकर वहां पहुंचा तो ब्राह्मणी ने कहा “यह लंगड़ा भी भूखा है, अपने हिस्से में से कुछ भाग इसे भी भोजन का दे दो। ब्राह्मण ने ब्राह्मणी की बात मानकर लंगड़े को भोजन दे दिया। भोजन के पश्चात जब पुन: यात्रा प्रारंभ करने लगे तो ब्राह्मणी ने ब्राह्मण से अनुरोध किया “इस लंगड़े को भी अपने साथ ले लेते हैं। तुम जब भी कहीं चले जाते हो तो मैं अकेली रह जाती हूं। ये साथ रहेगा तो मेरा अकेलापन भी दूर हो जाएगा और रास्ता भी आसानी से कट जाएगा।

ब्राह्मण ने कहा “हमें अपना सामान उठाने में परेशानी हो रही है तो इस लंगड़े का भार कैसे वहन करेंगे।”

ब्राह्मणी – हम इसे अपनी पिटारी में रख लेंगे।

ब्राह्मण को ब्राह्मणी की बात माननी पड़ी। ब्राह्मणी और लंगड़े को मौका मिलते ही ब्राह्मण को एक कुएं में धकेल दिया। उन दोनों ने समझा कि ब्राह्मण मर गया है। वे दोनों आगे नगर की ओर चल दिए।

नगर के बाहर द्वार पर कर वसूलने के लिए एक चौकी बनी हुई थी। जब कर वसूल करने वालों ने ब्राह्मणी की पिटारी को खोल कर देखा तो उसमें से एक लंगड़ा निकला। यह बात राज दरबार में पहुंच गई। राजा के पूछने पर ब्राह्मणी ने बताया “यह लंगड़ा मेरा पति है। हम अपने कुटुंब के झगड़ों से परेशान होकर यहां रहने आए हैं।” राजा ने उन दोनों को अपने राज्य में रहने की आज्ञा दे दी।

कुछ दिन बाद एक साधु द्वारा उस ब्राह्मण को कुए से निकाल लिया गया। ब्राह्मण कुए से निकलने के बाद उसी राज्य में गया, जहां ब्राह्मणी और लंगड़ा रहता था। जब ब्राह्मणी ने ब्राह्मण को देखा तो राजा से बोली “यह मेरे पति का पुराना वेरी है। इसका वध करवा दीजिए। राजा ने ब्राह्मण की हत्या करने का आदेश दे दिया।

ब्राह्मण राजा की आज्ञा सुनकर बोला – “राजन! इस औरत ने मेरा कुछ लिया हुआ है। वह मुझे पुनः दिला दीजिए।”

राजा ने ब्राह्मणी से पूछा “देवी! तूने जो भी इससे लिया है इसे पुनः दे दे।”

ब्राह्मणी – “महाराज, यह झूठ बोल रहा है। मैंने इसका कुछ नहीं लिया है।”

ब्राह्मण ने याद दिलाया कि “तूमने मेरे प्राणों का आधा हिस्सा लिया हुआ है। सभी देवता इस बात के साक्षी हैं।” ब्राह्मणी देवताओं के डर से प्राणों का वह भाग पुनः देने का वचन दिया। किंतु वचन देने के साथ ही उसकी मृत्यु हो गई। ब्राह्मण ने सारा वृतांत महाराज को सुनाया।

बकरा, ब्राह्मण और तीन ठग (Brahmin and Three Crooks Story In Hindi)

प्राचीन समय में एक गांव में शंभूदयाल नाम का एक ब्राह्मण रहता था। एक बार उसे दूसरे गांव के एक घर से भोजन का न्योता आया। ब्राह्मण देव ने उस न्योते को स्वीकार कर लिया। तय दिन पर ब्राह्मण देव दूसरे गांव में भोजन के लिए पहुंच गए। भोजन करवाने के पश्चात यजमान ने ब्राह्मण देव को दक्षिणा के रूप में एक बकरा दिया।

बकरे को लेकर ब्राह्मण देव अपने गांव की ओर चल दिए। दोनों गांव के बीच का रास्ता सुनसान था और बीच में जंगल भी पड़ता था। उस जंगल में तीन ठग रहते थे। जब उन ठगो ने ब्राह्मण देव के साथ बकरे को देखा तो तीनों ने बकरे को हथियाने की योजना बनाई।

पहले ठग ने ब्राह्मण देव को रोककर कहा “पंडित जी यह आप अनर्थ क्यों कर रहे हो। आप अपने कंधों पर कुत्ते को क्यों ले जा रहे हो?”

ब्राह्मण देव ने उसे फटकारते हुए बोला “मूर्ख! अंधा है क्या तू? ये कुत्ता नहीं बकरा है।”

पहला ठग पुनः बोला “वैसे मेरा काम तो आपको बताना है। यदि आपको कुत्ते को ही कंधों पर ले जाना है तो मुझे क्या करना। आप जानो आपका काम जाने।

ब्राह्मण देव अपने गांव की ओर चल दिए।

थोड़ी देर पश्चात दूसरा ठग आया और ब्राह्मण देव से बोला “महाशय उच्च कुल के व्यक्ति अपने कंधों पर कुत्ते को नहीं लादते।”

पंडित जी उसे अनदेखा करके गांव की ओर चल दिए।

कुछ समय पश्चात तीसरा ठग आया और पंडित जी से कंधो पर कुत्ते को ले जाने का कारण पूछा।

ब्राह्मण देव को जब बार-बार व्यक्तियों ने अपने कंधे पर कुत्ते को ले जाने के बारे में पूछा तो उन्हें भी लगने लगा कि मैं अपने कंधों पर बकरा नहीं कुत्ते को ले जा रहा हूं। थोड़ी दूर चल कर ब्राह्मण देव ने उस बकरे को कुत्ता समझकर नीचे उतार दिया और गांव की ओर चले गए। तीनो ठगो ने उस बकरे को मारकर खूब दावत उड़ाई।

शिक्षा:- हमें खुद पर विश्वास रखना चाहिए। दूसरों की कही हुई झूठी बातों में नहीं आना चाहिए।

शेर और मूर्ख गधा (The Lion and the Foolish Donkey Story In Hindi)

एक घने जंगल में एक करालकेशर नाम का शेर रहता था। उसके साथ एक धूशरक नाम का गीदड़ रहता था। एक दिन में शेर एक हाथी के शिकार में उससे झगड़ पड़ा, उसी समय वह कई तरह से घायल हो गया और यही नहीं उसका एक पैर भी टूट गया।

वह किसी तरह अपनी गुफा पहुंचा। कई दिनों तक भूखा रहा, वह घायल होने के कारण किसी जानवर का शिकार नहीं कर पा रहा था। तब उसने उसके साथी गीदड़ को कहा कि तुम किसी जानवर को यहां लेकर आओ और मैं उसको यहां मार दूंगा और हम अपना पेट भर लेंगे।

उसकी बात सुनकर गीदड़ पास के गांव में घूमने लगा और उसे एक नदी किनारे लंबकर्ण नाम का गधा जो पास ही हरी-भरी घास खा रहा था। तब वहां गीदड़ उसके पास गया और उसे कहने लगा मामा आप यह रूखी सूखी घास क्यों खा रहे हो और आप दिखने में भी बहुत कमजोर दिख रहे हो।

तब उस गधे ने कहा “भांजे” क्या कहूं तुम्हें यह धोबी मेरे पर कई अत्याचार करता है, मैं जब भारी माल उठाते कहीं रुक जाता हूं तो वहां मुझे पीछे से बहुत लाठियां मारता है और किसी भी तरह का अच्छा भोजन नहीं करवाता, यहां तक कि वह मुझे घास भी लाकर नहीं देता, मुझे स्वयं नदी के पास आकर चुन-चुन कर खास खानी पड़ती है।

तभी गीदड़ बोला कि आप जंगल में चलिए वहां कोमल घास से भरा हुआ मैदान है, जहां आप जितना चाहे उतना घास खा सकते हो और इतनी हरी-भरी है कि आप कुछ ही दिनों में हष्ट पुष्ट हो जाओगे।

तभी गधा बोला कि मेरे जैसे शिकार होने वाले जानवर वहां कैसे जा सकते हैं जैसे ही मैं जाऊंगा तो वहां पर कोई जंगली जानवर मेरा शिकार कर लेगा।

तभी वो गीदड़ बोला कि वह इलाका मेरा है, वहां मैंने कई अत्याचार सहने वाले गधों को लाकर रखा है। वाह कई गर्दभ कन्याएं है। जो पूरी तरह से वयस्क हो गई है, उन्होंने मुझे आते समय कहा कि पास के गांव से कोई सुंदर गर्दभ पति लेकर आना जो हमारे लायक हो। यह कहकर गीदड़ बोला मुझे इसी गांव में तुम ही मिले जो इतने समझदार और सुंदर हो।

यह सुनकर गधा उसके पीछे जंगल की ओर प्रस्थान कर दिया। गीदड़ उसे शेर की गुफा तक ले आया, जब गधे ने शेर को खड़े होकर उसके पीछे भागते देखा तो वहां उसी समय वहां से भाग खड़ा हुआ। फिर गीदड़ शेर को कहने लगा तुम यही हिम्मत से हाथी से लड़ने गए थे जो गधे को भी अपने पंजे में न पकड़ पाया।

तभी शेर ने अपनी दबी आवाज में कहा कि मैं अभी तक तैयार नहीं हुआ था, इसीलिए वहां गधा मेरे पंजे की वार से बच गया नहीं तो इस बार से कोई हाथी भी ना बच पाए।

तभी शेर ने कहा कि तुम अब किसी और जानवर को लेकर आओ जिससे हम अपनी भूख मिटा पाए।

तभी गीदड़ ने उसे कहा कि मैं उसी गधे को वापस लेकर आता हूं तुम अब इस बात मत चूकना। इसी बात पर शेर ने उसे कहा कि तुम उसी गधे को वापस कैसे ले आ पाओगे क्योंकि उसने मुझे देख लिया है। गीदड़ ने कहा तुम अपना काम करना, मैं अपना काम कैसे करना है जानता हूं।

यह बात कह कर गीदड़ वहां से उसी गधे के पास चला गया।

जब गीदड़ और उस गधे के पास पहुंचा तो कहने लगा कि तुम वहां से क्यों भाग आए, यह बात सुनकर गधा कहने लगा तुम तो मुझे आज स्वर्ग पहुंचा देते, तुम मुझे आज मौत के घाट ही पहुंचा देते।

इसी बात पर गीदड़ कहने लगा “तुम यह क्या कह रहे हो वह तो गर्दभ कन्याएं थी जो तुम्हारे पीछे भाग रही थी और वहां अपना सब कुछ छोड़कर अब तुम्हारा इंतजार कर रही है, वह कह रही है कि वह तुम्हारे बिना ना कुछ खाएगी ना कुछ पिएगी।”

मूर्ख गधा यह बात सुनकर उसके पीछे वापस जाने को तैयार हो गया और उसके पीछे शेर की गुफा तक वापस चला गया। इस बार शेर अपने वार में सफल रहा और उसे मार डाला। इसके पश्चात शेर ने गीदड़ को कहा कि तुम इस की रखवाली करो और मैं पास के तालाब में जाकर शुद्ध होकर आता हूं।

भूख से व्याकुल गीदड़ से रहा ना जा सका और उसने गधे के कान और दिल खा लिया। शेर जब तालाब से अपनी पूजा-पाठ अर्थात शुद्ध होकर आ ही रहा था कि उसने देखा कि गधे का कान और दिल गायब है, तब उसने गीदड़ को कहा कि पापी गीदड़ तूने इस के दिल और कान खा लिए, इसे अपवित्र कर दिया।

तब गीदड़ ने उसको जवाब दिया कि इसके कान हो और दिल है ही नहीं, इसीलिए तो यह एक बार शेर को देख कर भी वापस मरने के लिए यहां आ धमका और भोजन बन गया।

यह बात सुनकर शेर मान गया और दोनों साथ में भोजन करके अपना पेट भर दिया।

शिक्षा: किसी व्यक्ति से धोखा खाने के पश्चात भी उस व्यक्ति पर पूरी तरह से विश्वास नहीं करना चाहिए।

शेर, ऊंट, सियार और कौवा (The Lion, Camel, Jackal And Crow Story In Hindi)

किसी वन में मदोत्कट नाम का शेर रहता था। सियार, कौवा और बाग तीनों उसके नौकर थे। एक दिन शेर ने एक ऊंट को देखा जो अपने गिरोह से भटक गया। शेर ने सबको बुलाकर पूछा कि यह विचित्र जीव कौन है? तुम सब जाकर पता लगाओ कि यह प्राणी वन्य प्राणी है या ग्राम्य प्राणी और यह यहां क्या कर रहा है।

सिंह की बात सुनकर कौवा बोला “महाराज, यह विचित्र जीव ऊंट है। जो अपने समूह से अलग हो गया है और यह अभी आपका भोजन है। आप इसका शिकार कर लीजिए।

यह जीव हमारा अतिथि है और घर आए अतिथि को मैं नहीं मारता। बड़े बुजुर्गों ने कहा है कि “विश्वस्त और निर्भय होकर घर आए शत्रु को भी कभी नहीं मारना चाहिए।” अतः तुम सब जाकर ऊंट को सह सम्मान मेरे पास लाओ ताकि मैं उसे यहां आने का कारण पूछू।

शेर का आदेश सुनकर उसके सभी नौकर ऊंट के पास गए और ऊंट को सम्मान सहित महाराज के पास ले गए। शेर ने ऊंट से वन विचरने का कारण पूछा। ऊंट ने महाराज को प्रणाम किया और बोला “मैं अपने साथियों से बिछड़कर भटक गया हूं।” उस दिन के बाद सिंह के कहने पर वह कथानक नाम का ऊंट उनके साथ रहने लगा।

कुछ दिन बाद शेर का घमासान युद्ध एक वयस्क जंगली हाथी से हुआ। उस हाथी के दांत वज्र के समान मजबूत थे। उस युद्ध में शेर अधमरा हो गया। किसी तरीके से उसने अपनी प्राण रक्षा की। युद्ध के पश्चात वह चलने फिरने में असमर्थ हो गया जिसके कारण उसके नौकर भी भूखे रहने लगे।

जब शेर शिकार करता तो अपने शिकार में से कुछ भाग नौकरों को भी खाने के लिए दे देता था। शेर चलने फिरने में असमर्थ होने के कारण अब वह शिकार नहीं कर पा रहा था तो सभी भूख के मारे तड़प रहे थे।

एक दिन सिंह ने सभी को बुलाकर कहां “इस जंगल में ऐसे जीव की खोज करो जिसका शिकार मैं इस परिस्थिति में भी कर सकूं।” शेर की आज्ञा अनुसार सभी वन विचरण करने लगे। किंतु किसी को भी ऐसा जीव नहीं मिला जिसका शिकार किया जा सके।

तभी सियार ने कौवे से कहा कि “हम शिकार की खोज पूरे जंगल में क्यों कर रहे हैं जबकि शिकार हमारे सामने ही है। क्यों न इस ऊंट को ही शिकार बना लिया जाए।

सियार शेर के पास पहुंचा और बोला “महाराज, हम सब ने सारा वन छान मारा किंतु हमें कोई ऐसा जीव नहीं मिला जिसको हम आपके पास भोजन के लिए ला सकें। हम सब भी भूख के कारण इतने कमजोर हो गए हैं कि हमसे एक पग भी नहीं चला जाएगा।

आप चलने में असमर्थ हैं। क्योंना आज आप इस कथानक को ही अपना भोजन बना ले।”

शेर ने यह कहते हुए मना कर दिया कि ऊंट को हमारे यहां मैंने पनाह दी है। इसलिए मैं इसे नहीं मार सकता।

सियार ने अपनी बातों से किसी ना किसी तरह शेर को मना लिया। सियार ने सभी साथियों को बुलाया और पूछा “तुम सबको कुछ मिला क्या?”

कौवा, बाघ और ऊंट ने कहा कि हमे भी कुछ नहीं मिला जिसे महाराज अपना भोजन बना ले।

सभी ने निश्चित किया कि हम सब बारी-बारी से महाराज के सामने जाएंगे और उनसे विनती करेंगे कि हमें खाकर अपनी भूख को शांत करें। जब सब बारी-बारी से जाने लगे तो सियार ने सब में कुछ ना कुछ कमी बता देता। सबसे अंत में कथनक की बारी आई। कथानक ने जब देखा कि सभी सेवक अपनी जान देने की विनती कर रहे हैं तो मैं भी क्यों पीछे रहूं।

उसने महाराज को प्रणाम किया और बोला आपके लिए यह सभी प्राणी अभक्ष्य हैं। किसी का आकार छोटा है तो किसी के तेज नाखून है या किसी के शरीर पर घने बाल हैं। आज आप मेरे शरीर से ही अपनी भूख को शांत कर लो।

इतना कहते ही बाघ और सियार दोनों ऊंट पर झपट पड़े। देखते ही देखते दोनों ने ऊंट का पेट चीर दिया जिसके कारण ऊंट की मृत्यु हो गई। भूख के कारण शेर और बाघ ने तुरंत उसे खा लिया।

सिंह और सियार की कहानी (The Lion and the Jackal Story In Hindi)

प्राचीन समय में हिमालय की किसी पहाड़ी पर एक बहुत ही ताकतवर शेर रहता था। एक दिन शिकार एवं भक्षण के बाद पुनः अपनी गुफा की ओर लौट रहा था तो बीच रहा मैं उसे एक मरियल सियार दिखाई दिया जिसने दंडवत प्रणाम किया।

शेर ने सियार से ऐसा करने का कारण पूछा तो उसने कहा “राजन मैं आपका सेवक बनकर आप की सेवा करना चाहता हूं। आप मुझे अपनी शरण में ले लीजिए और आपके द्वारा छोड़े गए शिकार से मैं अपना गुजर-बसर कर लूंगा। शेर ने सियार की बात मानकर उसको मित्रवत अपनी शरण में ले लिया।

कुछ ही दिनों में शेर द्वारा छोड़े गए शिकार को खा खाकर सियार हष्ट पुष्ट हो गया।

प्रतिदिन शेर का पराक्रम देखकर सियार स्वयं को शेर समझने लगा। उसने एक दिन शेर से कहा आज मैं भी एक हाथी का शिकार करूंगा और उसका भक्षण करने के बाद बचा कुचा शिकार तुम्हें दे दूंगा।

सिह ने उसकी बातों का बुरा नहीं मानना क्योंकि सिह सियार को मित्र के रूप में देखता था, उसे ऐसा करने के लिए मना भी किया।

अहंकारी सियार ने शेर की बात नहीं मानी और पहाड़ की चोटी पर जाकर चारों तरफ हाथियों के झुंड की खोज करने लगा। पहाड़ी के नीचे एक हाथियों का छोटा समूह था। उस हाथियों के समूह को देखकर शेर की गर्जना के समान तीन बार सियार की आवाज निकाली और एक हाथी पर कूद गया।

सियार हाथी के सर की बजाए पैरों में जा गिरा। हाथी ने अपनी मस्तानी चाल में अपना कदम उठाया और सियार के सर पर रखकर आगे निकल गया। सियार का सिर क्षण भर में चकनाचूर हो गया और उसके प्राण पखेरू हो गए।

पहाड़ पर बैठा शेर उस सियार की पूरी हरकते देख रहा था उसने सियार को देखते देखते यह बात कही ‘होते है जो मूर्ख और घमण्डी, होती है उनकी ऐसी ही गति।’

शिक्षा: हमें हमारी जिन्दगी में कभी किसी पर घमंड नहीं करना चाहिए। क्योंकि घमंड और मुर्खता दोनों का साथ बहुत ही अच्छा और गहरा होता है। हमें इतिहास में भी इसके कई उदाहरण देखने को मिले है, जिसमें सिकंदर या रावण दोनों को घमंड उनके विनाश का कारण बना है।

अभागा बुनकर (The Unlucky Weaver Story In Hindi)

एक नगर में सोमिलक नाम का एक बुनकर रहता था। वह बहुत ही उत्कृष्ट एवं सुंदर वस्त्र बनने के बाद भी उसे कभी उपभोग से अधिक धन प्राप्त नहीं हुआ। अन्य बुनकर मोटा तथा सादा कपड़ा बनने के बाद भी उन्हें बहुत अधिक धन मिलता था, जिसके कारण उन्होंने काफी धन एकत्रित कर लिया था।

एक दिन सोमिलक अपनी पत्नी से बोला “प्रिय! अन्य बुनकर सादा और मोटा कपड़ा भी बुनकर भी उन्होंने काफी अधिक धन एकत्रित कर लिया है और मैं सुंदर एवं उत्कृष्ट वस्त्र बुनने के बाद भी धन एकत्रित नहीं कर पा रहा हूं। मुझे लगता है कि यह स्थान मेरे लिए अभाग्यशाली हैं, अतः मैं विदेश जाकर धनोपार्जन करूंगा।”

पत्नी ने कहा “प्रियतम! विदेश जाकर धन उपार्जन करना एक मिथ्या स्वप्न के अलावा कुछ नहीं है। यदि धन की प्राप्ति होनी हो तो वह स्वदेश में ही हो जाती है। भाग्य में ना लिखा हुआ धन तो हाथ में आया हुआ भी वापस चला जाता है। अतः आप यहीं रह कर व्यवसाय कीजिए, यदि भाग्य में लिखा हुआ होगा तो हम भी धनवान बन जाएंगे।

सोमिलक “भाग्य की बात तो कायर लोग करते है। लक्ष्मी तो उद्योगी और पुरुषार्थी नर को ही प्राप्त होती है। शेर को भी अपना शिकार करने के लिए उद्यम करना पड़ता है। मैं भी विदेश जाकर उद्यम करूंगा और धन संचय करूगा।”

यह कहकर सोमिलक वर्धमानपुर चला गया। उसने वहां जाकर तीन वर्ष तक खूब मेहनत करके 300 स्वर्ण मुद्राएं एकत्र कर ली। सारा धन लेकर वह अपने गांव की तरफ चल दिया। रास्ता काफी लंबा होने के कारण बीच में ही सध्या काल हो गई। सोमिलक ने एक बड़े पेड़ की डाल पर रात्रि काल में विश्राम किया। मध्य रात्रि में उसे स्वप्न में दो भयंकर आकृति के पुरुष आपस में बातचीत कर रहे थे।

एक ने कहा “हे पौरूष! तुझे मालूम नहीं कि सोमिलक के पास वस्त्र, भोजन से अधिक धन नहीं रह सकता और तूने उसे 300 स्वर्ण मुद्राएं दे दी।”

दूसरा बोला “हे भाग्य! मैं तो प्रत्येक उद्यमी व्यक्ति को उसका फल एक बार अवश्य देता हूं। उस फल को उसके पास रहने देना या नहीं रहने देना वह तो तुम्हारे अधीन है।”

स्वप्न के बाद जब सोमिलक की नींद खुली तो उसने पाया कि उसकी स्वर्ण मुद्राओं की पोटली खाली थी। “इतने कष्टों के बाद उसने इतना धन संचित किया था। अब मैं अपनी पत्नी को क्या मुंह दिखाऊंगा, मेरे मित्र मुझे क्या कहेंगे?” यह सोच कर वह पुनः वर्धमानपुर चला गया और 1 वर्ष तक दिन रात मेहनत करके उसने 500 स्वर्ण मुद्राएं एकत्रित कर ली। उन सभी स्वर्ण मुद्राओं को एक पोटली में रखकर वहां गांव की तरफ निकल पड़ा। बीच रास्ते में ही साईं काल हो गया किंतु वह इस बार रुका नहीं चलता गया। फिर उसने उन दो पुरुषों की बातचीत सुनी।

भाग्य ने फिर से वही बात कही “हे पौरूष! तुम्हें मालूम नहीं कि सोमिलक के पास वस्त्र भोजन से अधिक तो धन नहीं रह सकता और तूने उसे 500 स्वर्ण मुद्राएं दे दी।”

पौरूष ने भाग्य से कहा “हे भाग्य! मैं प्रत्येक उद्यमी व्यक्ति को उसका फल एक बार अवश्य ही देता हूं। अब वह फल उसके पास रहने देना या नहीं रहने देना वह तुम्हारे अधीन है।”

इस बातचीत के बाद जब सोमिलक ने अपनी गठरी देखी तो उसे खाली पाया। इस बार वह दुखी होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया और सोचने लगा “मैंने इतनी मेहनत के बाद काफी सारा धन एकत्रित किया किंतु हाथ में आया हुआ धन वापस चला जाता है। इस धन के बिना जीवन के तो मृत्यु ही अच्छी। अब मैं इसी पेड़ के टहनी के फंदा बांधकर अपनी जान दे दूंगा।”

जब वह टहनी के फंदा बांधकर अपने प्राण देने वाला था तभी आकाशवाणी हुई “सोमिलक! ऐसा दु:साहस मत कर। तेरा धन मैंने ही चुराया है। तुम्हारे भाग्य में भोजन वस्त्र मात्र से अधिक धन का उपभोग नहीं लिखा हुआ है। व्यर्थ में तुम अपनी शक्ति क्यों नष्ट कर रहा है। अपने घर जा सुख से अपने जीवन को व्यतीत कर। मैं तुम्हारे साहस से प्रसन्न हुआ मुझसे तुम कोई एक वरदान मांग ले।”

सोमिलक ने कहा “मुझे प्रचुर मात्रा में धन दे दीजिए।”

देवता ने कहा “धन का क्या उपयोग? तेरे भाग्य में धन का उपयोग ही नहीं लिखा है। भोग रहित धन लेकर क्या करेगा?

सोमिलक तो धन का भूखा था, बोला “भले ही धन का उपयोग हो या ना हो। मुझे तो धन ही चाहिए। समाज में जिसके पास धन होता है, उसी का ही आदर होता है। धन के कारण अकुलीन नैन कृपाण भी आधार पाते हैं।”

सोमिलक की बात सुनकर देव बोले “यदि यही बात है, तुम्हारी धन की इच्छा प्रबल है। तुम वर्द्धमान पूरे चले जाओ वहां पर दो बनिए पुत्र हैं, एक का नाम गुप्त धन है और दूसरे का नाम उपभुक्त धन है। धनु के दोनों प्रकार जाने के बाद तुम मुझसे एक वरदान मांग लेना, मैं तुम्हारी इच्छा पूरी कर दूंगा।”

सोमिलक देव की बात सुनकर पुनः वर्धमानपुर चला गया। वह दोनों बनिए पुत्रों का पता पूछते पूछते गुप्तधन के घर जा पहुंचा। उस घर में उसका कोई आदर सत्कार नहीं हुआ। इसके विपरीत उसे बुरा भला कहा गया। गुप्तधन और उसकी पत्नी ने सोमिलक को किसी ना किसी तरीके से घर से बाहर निकालने का प्रयास किया किंतु सोमीलक भी अपने संकल्पना का पक्का होने के कारण उस घर में घुस गया।

भोजन के समय सोमिलक को रूखी सूखी रोटी दें दी और उसे सोने के लिए भी किसी भी प्रकार की सया नही दी। रात्रि में सपना के अंदर फिर से वही दो पुरुष बातचीत करते हुए दिखे। एक कह रहा था कि “हे पौरूष! तूने गुप्त धन को भोग से अधिक धन क्यों दे दिया कि उसने सोमिलक को रोटी दे दी।”

पौरूष ने उतर दिया “इसमें मेरा क्या दोष। मेरा कार्य पुरुष के हाथों धर्म पालन करवाना है जो मैंने करवा दिया। अब इसका फल देना तुम्हारे हाथ में है।”

दूसरे दिन गुप्तधन किसी बीमारी के कारण उसे भूखा रहना पड़ा। इस प्रकार उसकी क्षतिपूर्ति हो गई।

अब सोमिलक उपभुक्त धन के घर गया। वहां उसका आदर सत्कार किया गया। उसे अच्छे से अच्छा भोजन करवाया गया और संध्या के समय सोने के लिए अच्छी सैया दी गई। रात्रि में फिर उसने उन दो पुरुषों की बात सुनी। एक कह रहा था कि “है पौरूष! उपभुक्त धन ने सोमिलक सेवा में बहुत अधिक धन खर्च कर दिया है, अब इसकी पूर्ति किस प्रकार होगी।”

पौरूष ने उतर दिया “है भाग्य! मेरा कार्य धर्म पालन करवाना था जो मैंने कर दिया अब इसका फल देना तुम्हारे हाथ में है।”

अगले दिन सुबह जब सोमिलक उठा तो उसने देखा कि राजदरबार से कुछ सैनिक राज प्रसाद के रूप में स्वर्ण मुद्राएं उपभुक्त धन को दे रहे थे।

यह देखकर सोमिलक के मन में विचार आया कि “यह संचय रहित उपभुक्ता धन ही गुप्तधन से श्रेष्ठ हैं। जिस धन का उपयोग दान एवं धर्म के कार्यों में ना किया जा सके ऐसे धन का क्या काम। ऐसे धन की अपेक्षा तो निर्धन होना ही अच्छा है।”

मूर्ख साधू और ठग (The Foolish Sage & Swindler Story In Hindi)

एक गांव के मंदिर में देव शर्मा नाम का एक प्रतिष्ठित साधु रहता था। गांव वाले साधु का बहुत ही सम्मान करते और उनको मानते थे। उसे अपने भक्तों से दान में तरह-तरह के वस्त्र भोजन एवं धनराशि मिलती थी। साधु उन वस्तुओं को बेचकर काफी धनराशि एकत्रित कर ली।

साधु धनराशि की सुरक्षा को लेकर हमेशा चिंतित रहता था। वह धनराशि को एक पोटली में रखकर उस पोटली को हमेशा अपने साथ रखता था।

उसी गांव में एक ठग रहता था। ठग की नजर साधु के धन पर थी। कई दिनों से ठग साधु का पीछा किया करता था। लेकिन साधू कभी पोटली को अपने से अलग नहीं करता था।

ठग को एक उपाय सूझा। ठग ने छात्र का वेश धारण करके साधु के पास गया एवं विनती करने लगा “हे मुनि श्रेष्ठ आप मुझे अपना शिष्य बना लें एवं मुझे ज्ञान की प्राप्ति करवाएं।”

साधु उस छात्र की विनम्रता को देखकर प्रसन्न हो गया और उसे अपना शिष्य बना लिया। ठग दिन रात साधु की सेवा किया करता और उसी मंदिर में रहता। कुछ ही दिनों में वह साधु का विश्वास पात्र हो गया।

एक दिन साधु को पास ही के गांव से एक अनुष्ठान का निमंत्रण आया। साधु ने उस निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। निश्चित दिन साधु अपने शिष्य के साथ उस गांव के लिए रवाना हो गया। बीच रास्ते में ही एक नदी पड़ती थी।

साधु ने अपने शिष्य से उस नदी में स्नान करने की इच्छा जाहिर की। साधु ने अपने सभी वस्त्र एवं धन की पोटली को एक कंबल में रखकर उस शिष्य को दे दिया एवं स्वयं नदी में स्नान करने के लिए जल में उतर गए। ठग को मौके की तलाश थी। मौका मिलते ही ठग कंबल के साथ फरार हो गया।

शिक्षा: किसी के बारे में जाने बिना उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए।

गजराज और मूषकराज की कहानी (Elephants and King of Mice Story In Hindi)

प्राचीन काल में एक नदी के किनारे एक सुंदर नगर बसा था। वह नगर उस राज्य का व्यापार का केंद्र था। नगर बहुत बड़ा था, नगर में रोजाना हजारों लोगों का आना जाना लगा रहता था। एक वर्ष अत्यधिक बरसात हुई जिसके कारण नदी ने अपना रास्ता बदल लिया।

देखते ही देखते उस नगर की ऐसी हालत हो गई की पीने का पानी भी किसी को नसीब नहीं होता था। धीरे-धीरे महानगर खाली होने लगा। एक समय ऐसा आ गया कि उस नगर में एक भी मनुष्य नहीं था।

कुछ समय पश्चात वह नगर खंडर बन गया और खंडहर में बहुत सारे चूहे रहने लगे। खंडर के पास ही एक जल स्रोत फूट गया था। देखते ही देखते चूहों की संख्या बढ़ती गई, चारों और चूहे ही चूहे हो गए। उन चूहों का राजा एक मूषकराज नाम का चूहा था।

उस नगर के पास ही एक जंगल था, उस जंगल में हाथियों का काफी बड़ा झुंड रहता था। झुंड के सरदार का नाम गजराज था। एक बार जंगल में सूखा पड़ने के कारण सारे जल स्रोत सूख गए। हाथियों के बच्चे जल के अभाव के कारण तड़पकर मरने लगे। गजराज उनके दर्द को समझता था, वह भी प्यास के मारे तड़प रहा था। किंतु उसके पास भी इस समस्या का कोई उपाय नहीं था।

गजराज की मित्र एक चील थी। उस चील ने बताया कि खंडहर के दूसरी और एक जल स्रोत हैं, जिसमें खूब पानी है। गजराज को यह बात पता लगते ही उसने अपने सारे झुंड को खंडहर पार करके जल स्रोत तक पहुंचने की आज्ञा दे दी।

सभी हाथी आज्ञा पाकर जल स्रोत की ओर रवाना हो गए। जल स्रोत तक पहुंचने के लिए उन्हें खंडहर को पार कर रहे थे तो हाथियों के हजारों पैरों के नीचे आकर बहुत सारे चूहों की मृत्यु हो गई। देखते ही देखते खंडहर में चारों ओर चूहों के मांस और खून से लथपथ मार्ग थे। जब जल स्रोत से पानी पीकर हाथियों का झुंड वापस उसी रास्ते आया तो बहुत सारे चूहे और मारे गए।

मूषकराज को जब इस समस्या का पता लगा तो उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के साथ बैठकर इस समस्या का उपाय सोचा। सभी मंत्रियों ने यह सलाह दी कि आपको गजराज के पास जाकर उनसे बात करनी चाहिए। वह बहुत ही दयालु प्रवृत्ति के हैं, वे अवश्य ही आपकी बात मान लेंगे।

जब गजराज के पास पहुंचे तो वहां एक पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे। मूषकराज एक पेड़ के पास पड़े शीला पर जा पहुंचे और गजराज को आवाज लगाई। किंतु आवाज गजराज तक नहीं पहुंच पाई। गजराज ने जब मूषकराज को देखा तो वह उसके पास आए और शीला के पास अपना एक कान रख कर बोले “छोटे मैया, आपकी आवाज मेरे कानों तक पहुंच नहीं पाई है, क्या आप अपनी बात को दोबारा कह सकते हैं?”

मूषकराज ने गजराज को प्रणाम किया और बोला “मैं चूहों का सरदार मूषकराज हूं। आप जिस जलाशय तक पहुंचने के लिए खंडहर को पार करते हैं उस खंडहर में हमारा झुंड रहता है। जब आप खंडार को पार करते हैं तो आपके पैरों तले हमारे झुंड के हजारों चूहे मारे जा चुके हैं। कृपया करके आप जल स्रोत तक पहुंचने के लिए किसी और मार्ग को अपना लीजिए।”

गजराज ने उत्तर दिया “महाशय हमें माफ कर दीजिए, हमें इस बात का ज्ञान नहीं था। हम आज से ही किसी और मार्ग को अपना लेंगे।”

मूषकराज ने गजराज से कहा यदि कभी भी आपको हमारी जरूरत पड़े तो हमें याद कर लेना, हम आपकी मदद करने के लिए तत्पर रहेंगे। गजराज ने मन ही मन में सोचा कि यह छोटा सा जीव हमारी क्या मदद करेगा। गजराज हल्के हल्के मुस्कुराने लगे।

कुछ दिनों के पश्चात पास ही के राज्य के राजा ने अपनी सेना को और सशक्त बनाने के लिए सेना में हाथियों को भर्ती करने के लिए कहा। उस राज्य के सैनिक उस जंगल में आए और हाथियों को पकड़ने के लिए जाल बिछा दिए। उन जालो के कारण बहुत से हाथी पकड़े गए।

गजराज भी इस समस्या के बारे में सोचते हुए धीरे-धीरे जंगल में टहल रहे थे। तभी उनका एक पैर एक जाल में फस गया। वह जाल से निकलने के लिए खूब प्रयास किए किंतु वह जाल से नहीं निकल पाए। तो उन्होंने मदद बुलाने के लिए चिंघाड़ना शुरू कर दिया। गजराज की चिंघाड़ सुनकर एक भैसा उनके पास आया। जिसकी मदद गजराज ने पहले की थी। भैसा बोला “गजराज मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूं?”

गजराज ने कहा “पुत्र तुम जल्दी से जल्दी तुम जलाशय के पास वाले खंडहर तक जाओ और मूषक राज को सारा हाल सुनाओ।”

भैसा दौड़ता हुआ खंडहर के पास आया और मूषकराज को सारा हाल सुनाया। मूषकराज अपने बीस-तीस साथियों के साथ भैसें पीठ पर चढ़ गए और तुरंत गजराज के पास पहुंच गए। सभी चूहों ने मिलकर जाल को कुतरना शुरू कर दिया। देखते ही देखते गजराज उस जाल से मुक्त हो गए।

शिक्षा:- हमें अपने साथियों के साथ प्रेम स्वभाव से रहना चाहिए ताकि वह हमारे दुख दर्द में काम आ सके।

गीदड़ गीदड़ ही रहता है (Lioness and the Young Jackal Story In Hindi)

एक जंगल में शेर शेरनी का एक युग में रहता था। वे दोनो बहुत ही आराम से अपना जीवन यापन कर रहे थे। उन दोनों के दो पुत्र थे। शेर शिकार करके हिरण लेकर आता था और दोनों मिलकर खाते थे।

एक दिन शेर जंगल में खूब घुमा किंतु उसे कोई शिकार हाथ नहीं आया। निराश होकर जब वह अपनी गुफा की ओर लौट रहा था तो बीच रास्ते में उसे एक गीदड़ का बच्चा मिला। उसे देखकर शेर को उस पर दया आ गई। शेर ने उसे सावधानी पूर्वक अपने मुंह में पकड़ कर अपनी गुफा पर ले आया।

शेर शेरनी से बोला “प्रिये, आज मैं खूब जंगल में घुमा किंतु मुझे कोई शिकार नहीं मिला है। यदि तुम्हें भूख लगे तो तुम इसको मार कर खा लेना, कल मैं दूसरा शिकार लेकर आऊंगा।”

शेरनी ने कहा “प्रिय, जिसे आपने बालक मानकर नहीं मारा है, उसे खाकर मैं अपना पेट कैसे भर लूंगी। मैं इसे अपने पुत्र के समान ही पालूंगी। यह मान लूंगी कि हमारे तीन पुत्र हैं।”

शेर शेरनी ने तीनों को समान प्रेम के साथ पाल-पोस कर बड़ा किया। गीदड़ भी शेरनी का दूध पीकर हष्ट पुष्ट और बड़ा हो गया।

एक बार शेर की गुफा के पास एक मदवाला हाथी आया। उसे देखते ही दोनों सिंह पुत्र उस पर गुरूर आने लगे और हमला करने के लिए तैयार हो गए। तभी गीदड़ ने उनसे कहा “यह हमारा कुल शत्रु है। शत्रुओं से दूर रहना ही उचित है। तुम दोनों इसके सामने मत जाओ।”

यह कहकर गीदड़ गुफा की तरफ भागा। दोनों सिंह पुत्र भी नीरूसाहित्य होकर गुफा में आ गए।

संध्या काल में जब दोनों पुत्रों ने शेर शेरनी को सारी बात सुनाई और गीदड़ के कायरता का उपहास उड़ाया।

गीदड़ उन दोनों की बात सुनकर लाल पीला हो गया। उसने गुस्से में उन दोनों को मारने की बात तक कह डाली। तब शेरनी ने उसे एकांत में बुलाया और कहा “यह दोनों तुम्हारे छोटे भाई हैं, इनकी बात का तुम्हें बुरा नहीं मानना चाहिए।”

शेरनी के समझाने पर गीदड़ और भी ज्यादा गुस्सा होकर बोला “मैं विद्या में, बुद्धि में, कौशल में किसी बात में उनसे कम हूं? जो वह मेरा उपहास उड़ा रहे हैं, मैं इस बात का उन्हें मजा चखाउगा। मैं उन्हें मार डालूंगा।”

शेरनी ने हंस कर जवाब दिया “तु बहादूर हैं, सुंदर है, सब विद्या में निपुण हैं, किंतु जिस कुल में तेरा जन्म हुआ है, उस कुल में हाथियों को नहीं मारा जाता। मैं तुम्हें एक सच्ची बात बताती हूं। तुम एक गीदड़ हो, मैंने तुम्हें अपना दूध पिलाकर पाला है। इस बात का पता तेरे भाइयों को लगे, उससे पहले तुम यहां से जाकर अपने गीदड़ भाइयों से मिल जाओ। वरना वह दोनों तुम्हें मार डालेंगे।”

यह सुनकर गीदड़ डर से कांपता हुआ, वहां से चला गया।

वाचाल गधा और धोबी (The Donkey and the Washerman Story In Hindi)

एक शहर में शुद्धपट नाम का एक धोबी रहता था। उसके पास एक गधा भी था। गधे को पर्याप्त भोजन ना मिलने के कारण वह बहुत ही दुबला पतला और कमजोर हो गया था जिसके चलते वह ढंग से काम भी नहीं कर पा रहा था।

धोबी को चिंता होने लगी, उसके मन में विचार आया कि कुछ दिन पहले जंगल में घूमते हुए उसे एक मरा हुआ शेर दिखाई दिया उसकी खाल धोबी के पास थी, अगर इस खाल को गधे को ओढाकर खेत में भेजूं तो खेत के रखवाले इसे शेर समझ कर इससे डरेंगे और मारकर भगाने की कोशिश भी नहीं करेंगे।

धोबी की चाल काम कर गई। धोबी अपनी चाल के अनुसार हर रात गधे को शेर की खाल ओढाकर खेत में भेज देता। गधा पूरी रात घास चरने के बाद सुबह जल्दी ही वापस धोबी के पास आ जाता। यह धोबी का यह तरीका कई दिनों तक चलता रहा।

लेकिन एक बार गधे की पूरी पोल सबके सामने आ गई। गधी की आवाज सुनकर गधे ने भी अडारना शुरू कर दिया। खेतों के रखवाले उस गधे पर टूट पड़े। उन रखवालों ने शेर की खाल ओढ़े गधे को इतना पीटा कि गधे की वहीं पर साँस रुक गई। धोबी की इस चालाकी ने उस गधे के प्राण ले लिये।

व्यापारी का पतन और उदय (The Fall and Rise of A Merchant Story In Hindi)

वर्धमान नामक शहर में एक कुशल व्यापारी रहता था, जिसके कुशलता के चर्चे राजा तक को भी ज्ञात थे। इसी कारण राजा ने एक दिन उसे एक शहर का प्रशासक बना दिया। उस व्यापारी के कुशलता के प्रभाव में उस शहर के आम आदमी भी बहुत प्रसन्न थे और अपने कुशलता के प्रभाव में उन्हे खुश रखा। दूसरी तरफ राजा भी उसकी कुशलता से बहुत प्रभावित थे।

कुछ दिनों बाद उस व्यापारी ने अपनी पुत्री का विवाह तय कर दिया, जिसमें उसने बहुत भव्य और बड़ी भोज का आयोजन किया। जिसमें उसने राजा लोगों को आमंत्रित किया। इस विवाह मैं व्यापारी ने लोगों का कई तरह से सम्मान किया जो लोगों को बहुत पसंद भी आया। इसके उपरांत उस व्यापारी ने लोगों को आभूषण और उपहार भी भेंट में दिए।

उसी राज दरबार का एक झाड़ू लगाने वाला सेवक उस राजभोज में आमंत्रित था जो भोजन करते करते गलती से राजशाही कुर्सी पर जा बैठा। जब यह उस व्यापारी ने देखा तब उस व्यापारी को बहुत गुस्सा आया और उसने उस सेवक का गर्दन पकड़ा और उसे धक्के देकर वहां से निकाल दिया।

सेवक को यह बहुत अपमानित लगा, उसने उस व्यापारी को सबक सिखाने का निर्णय लिया।

कुछ दिनों बाद वह सेवक जब महाराज के कक्ष में झाड़ू लगा रहा था तब उसने महाराज को आधी नींद में देखकर उसने जोर से चिल्लाकर बोला कि “व्यापारी तुम्हारी इतनी मजाल कि तुम महारानी के साथ दुर्व्यवहार कर रहे हो।”

यह बात सुनकर राजा आधी नींद से जाग कर बिस्तर पर कूद पड़ा और सेवक से पूछा कि जो तुमने बोला वह सच है या झूठ है। तब सेवक राजा के चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए कहा कि मैं कल पूरी रात जुए में लगा रहा, जिससे मेरी नींद पूरी नहीं हुई और मैं अभी नींद नहीं कुछ भी बड़बड़ा रहा हूं।

यह बात सुनकर राजा ने कुछ नहीं कहा, परंतु उसके मन में एक शक का बीज बुन गया था।

अगले दिन राजा ने उस व्यापारी के राज महल में बेतुके घूमने पर पाबंदी लगा दी और उसके कई अधिकारों को छीन लिया। अगले दिन जब वह व्यापारी राज महल में प्रवेश करने आ रहा था तब पहरेदारों ने उसे पहले ही रोक दिया। यह देख कर व्यापारी हक्का-बक्का हो गया।

तभी पास में खडा सेवक मजे लेते हुए पहरेदार को कहने लगा “अरे पहरेदार तुम्हें पता नहीं है यह कौन है, यह चाहे तो तुम्हें अभी गर्दन पकड़ के महल से बाहर फिकवा सकते हैं।”

यही बात सुनकर व्यापारी को सारा तामझाम समझ आ गया।

कुछ दिनों बाद व्यापारी ने उस सेवक को अपने घर पर भोजन में आमंत्रित किया, जिसमें उस व्यापारी ने उस सेवक की बहुत खातिरदारी की और उसे कई तरह के उपहार और आभूषण लिए और उसे कहा कि मेरी उस भोज की गलती को माफ कर दो, मैं उसके लिए आपसे माफी मांगता हूं।

यह बात सुनकर सेवक खुश हो गया और उसने कहा कि “मैं आपका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाऊंगा।”

अगले दिन जब वह राजा के कक्ष में झाड़ू लगा रहा था तब फिर राजा को अर्ध निंद्रा मैं सोते हुए देखकर जोर से चिल्ला कर कहा कि “हमारा राजा इतना मूर्ख है कि वहां गुसल खाने में खीर खाता है।”

यह बात सुनकर राजा क्रोध से बिस्तर पर खड़ा हो गया और उस सेवक को कहने लगा कि “तू मेरे कक्ष का सेवक नहीं होता तो मैं तुझे कभी का धक्के मार कर इस नौकरी से निकाल कर फेंक देता।”

फिर सेवक उसी तरह राजा के चरणों में गिरकर फिर कभी नींद में ना बड़बड़ आने की कसम खाई।

अगले दिन सेवक की वह मूर्खता देखकर राजा सोचने लगा कि यह कभी भी किसी की नींद में बुराइयां करता रहता है। इससे राजा को उस व्यापारी पर किए पाबंदियों का पता पड़ा फिर राजा ने उस व्यापारी के सारी पाबंदीया हटा दी।

अगले दिन व्यापारी को ऊसके सारे सम्मान के साथ महल बुलाया।

शिक्षा:- हमें किसी के भी साथ सम्मान से पेश आना चाहिए, भले ही वह कितना ही बड़ा या कितना ही छोटा ना क्यों ना हो।

ब्राह्मणी और तिल के बीज (Shandili and Sesame Seeds Story In Hindi)

एक समय एक निर्धन ब्राह्मण परिवार एक गांव में रहता था। एक दिन उनके यहां कुछ अतिथि आए थे। घर में सारा खाने पीने का सामान खत्म हो चुका था। इसी को लेकर दोनों दंपत्ति बात कर रहे थे।

ब्राह्मण “कल कर्क सक्रांति है, मैं भिक्षा के लिए दूसरे गांव जाऊंगा। वहां एक ब्राह्मण सूर्य देव की तृप्ति के लिए कुछ दान करना चाहता है।

ब्राह्मणी “तुम्हें तो भोजन युक्त अन्य कमाना भी नहीं आता। तुमसे तो विवाह करके मेरा तो भाग्य ही फूट गया। तुम से विवाह करने के पश्चात मैंने कभी भी मिष्ठान नहीं खाए, कभी सुख नहीं भोगा, वस्त्रों और आभूषण की बात तो बहुत दूर हैं।

ब्राह्मण “तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए। अपनी इच्छा के अनुरूप किसी को भी धन नहीं मिलता। पेट भरने योग्य अन्य तो मैं भी कमाल आता हूं। इससे अधिक तृष्णा नहीं रखनी चाहिए। अधिक तृष्णा रखने से मनुष्य के माथे पर शिखा आ जाती हैं।”

ब्राह्मणी ने पूछा “यह कैसे?”

ब्राह्मण ने तब सूअर शिकारी और गीदड़ की कथा सुनाई।

एक दिन एक शिकारी शिकार की खोज में जंगल की ओर गया। उसे जंगल में एक अंजन के समान काला बहुत बड़ा सूअर नजर आया। उसने अपने धनुष की प्रत्यंचा को अपने कानों तक खींचा और बाण चलाया। निशाना ठीक सूअर पर जा लगा। सूअर घायल होकर शिकारी की ओर दौड़ा। अपने दोनों तीखे दांतो से शिकारी के पेट को चीर दिया। इस प्रकार शिकारी और शिकार दोनों का ही अंत हो गया।

कुछ समय पश्चात एक भूखा सियार वहां आया। वहां सूअर और शिकारी दोनों को मरा हुआ देखकर उसने सोचा भाग्य वश आज उसे बहुत ही अच्छा भोजन मिल गया। कई बार हमें बिना किसी उद्यम किए अच्छा भोजन मिल जाता है। उसे हमें पूर्व जन्मों का फल मानना चाहिए।

यह सोच कर सियार छोटी-छोटी चीजें खाने लगा। उसे याद आया कि मनुष्य अपने धन का उपयोग धीरे-धीरे करता है।जिससे वह अल्प धन में ही अधिक समय तक अपना जीवन यापन कर लेता है। उसी प्रकार मैं भी इस भोजन का उपयोग करूंगा ताकि अधिक समय तक मेरी जीवन यात्रा चलती रहे।

यह सोचकर उसने सबसे पहले धनुष की डोरी खाने का निश्चय किया। जब उसने धनुष की डोरी को चबाना शुरू किया उस समय धनुष की प्रत्यंचा चढ़ी हुई थी। चबाते-चबाते जिस वक्त प्रत्यंचा टूटी तो धनुष का एक सिरा सियार के सिरको भेद कर ऊपर तक निकल आया, मानो उसके माथे पर शिखा आ गई हो। इस प्रकार घायल होकर सियार भी उसी स्थान पर मर गया।

ब्राह्मण ने कहा ” इसलिए मैं कहता हूं कि अतिशय लोभ से माथे पर शिखा हो जाती है।

ब्राह्मणी ने ब्राह्मण की कथा सुनने के बाद कहा “यदि यह बात है तो घर में कुछ तिल पड़े हैं। उनका शोधन करके कूट छांट कर अतिथि को खिला देते है।”

ब्राह्मण उसकी बात से संतुष्ट होकर दूसरे गांव में भिक्षा लेने चला गया। ब्राह्मणी वचना अनुसार तिलों का शोधन करके उन्हें सुखाने के लिए धूप में रख दिया। उसी समय एक कुत्ता आया और उन तिलो पर मूत्र विष्ठा कर दी। ब्राह्मणी बड़ी चिंता में पड़ गई।

घर में इनके अलावा कुछ भी अन्य नहीं था। इन्हीं को पकाकर वह अतिथि को भोजन के लिए देना था। कुछ समय तक सोचने के पश्चात उसके मन में ख्याल आया यदि मैं इन शोधित तिलो के बदले में अशोधित तिल मांगूंगी तो कोई भी दे देगा और किसी को भी इन तिलों का उच्छिष्ट होने का पता नहीं है। ब्राह्मणी उन तीनों को छाज में रखकर घर-घर घूमने लगी और आवाज देने लगी “कोई इन छठे हुए तिलों के स्थान पर बिना छठे हुए दिल देदे।”

एक ग्रहणी ने जब यह सुना तो वह इस सौदे के लिए तैयार हो गई। जब ग्रहणी यह सोदा कर रही थी तब उसके पुत्र ने जो अर्थशास्त्र पड़ा हुआ था, कहा “माता! कोई पागल ही होगा जो छठे हुए तिलों के स्थान पर बिना छठे हुए तिल लेगा। अवश्य ही इन तिलो में कोई ना कोई दोष है।”

पुत्र के कहने पर माता ने यह सौदा नहीं किया।

बंदर का कलेजा और मगरमच्छ (The Monkey And The Crocodile Story In Hindi)

एक बार की बात है, एक नदी के किनारे बहुत सारे जामुन के पेड़ थे और वहां पर एक बंदर रहता था। जामुन के पेड़ में बहुत रशीले और मीठे जामुन लगे हुए थे, जिसको बंदर बहुत चाव से खाता था। कोई मस्त जिंदगी बिता था। एक दिन बन्दर जामुन खाने में मस्त था तभी वहां अचानक वहां एक मगर आया। मगर बहुत ही दुर्बल था। मगर ने बंदर को देखा और पूछा भाई तुम क्या खा रहे हो।

बंदर ने बोला “भाई मत बोलो मैं तुम्हारा दोस्त हूं और मैं जामुन खा रहा हूं।”

मगर ने बोला “भाई तुम अकेले अकेले जामुन खा रहे हो मुझे नहीं खिलाओगे।”

यह सुनकर बंदर ने बोला “नहीं भाई मैं अकेले अकेले नहीं खाऊंगा, तुम्हें भी खिलाऊंगा क्योंकि तुम मेरे मेहमान हो।” यह कहकर कुछ जामुन उसने नीचे गिरा दिया।

मगर ने जामुन खाकर कहां यह तो बहुत ही स्वादिष्ट और मजेदार जामुन है। क्या तुम मुझे कल और खिलाओगे मगर ने बोला।

तो बन्दर ने कहां क्यों नहीं तुम मेरे मेहमान हो कल आ जाना मैं तुम्हें और खिला दूंगा, आखिर तुम मेरे दोस्त जो हो।

यह सुनकर मगर वहां से चला गया और अगले दिन वापस आया। जब मगर वापस आया तो बंदर ने उसे और भी स्वादिष्ट जामुन खिलाएं।

इसी तरह कुछ दिन बीत गए और उन दोनों में बहुत अच्छी दोस्ती हो गई।

एक दिन बंदर ने मगर से कहा कि “भाई मैं तो इस दुनिया में अकेला हूं, मेरा कोई दोस्त नहीं है और मगर से पूछा तुम्हारा कोई दोस्त है क्या?”

मगर ने कहा “मैं तो इस दुनिया में अकेला नहीं हूं, मेरी पत्नी मेरे साथ रहती है तो बन्दर ने कहा तुम्हारी पत्नी तुम्हारे साथ रहती है, तुमने कभी मुझे बताया नहीं। अब तो मैं भाभी से मिलने जरूर जाऊंगा।

यह बोल कर बन्दर ने बहुत सारे जामुन तोड़े और मगर को दे दिया। कहां कि भाभी के लिए लेकर जाओ, वह खुश हो जाएगी और मगर वहां से चला गया।

जब वह अपने घर पहुंचा और यह बात अपनी पत्नी से कहीं और जामुन अपनी पत्नी को खिलाया तो उसकी पत्नी बहुत खुश हो गई और कहा “कहां से लेकर आए इतने स्वादिष्ट जामुन”

मगर ने कहा “नदी के किनारे मेरा एक बहुत अच्छा मित्र है, जिसने मुझे यह जामुन दिया” तो मगर की पत्नी ने कहा वह मित्र कौन है तो मगर ने कहा वह एक बंदर है। ऐसा कुछ दिनों तक चलता रहा तो एक दिन उसकी पत्नी को एक एहसास हुआ कि अगर वह बंदर हमेशा इतने मीठे जामुन खाता है तो उसका मास कितना मीठा होगा और उसको खाने में अलग ही मजा आएगा।

इसी आशा में उसने एक दिन अपने पति से पूछा कि तुम इतना लेट क्यों आते हो तो पति ने कहा कि मैं अपने दोस्त से गप्पे लगाता हूं तो पत्नी ने कहा तुम मुझसे झूठ बोल रहे हो और मैं नाराज हूं। इतना ही अच्छा दोस्त है तो तुम उसे हमारे साथ खाने में बुलाओ।

मगर की पत्नी बंदर का मांस खाने के लिए इतनी लालची हो गई थी कि उसने अपनी पत्नी को कहा कि तुम मुझे उस बंदर का मांस खिलाओ वरना मैं तुम्हें अपने घर नहीं आने दूंगी। यह सुनकर मगर कहा कि वह मेरा मित्र है और मैं अपनी मित्र की हत्या कैसे कर दूं

तो उसकी पत्नी ने कहा “मैं कुछ सुनना नहीं चाहती, मुझे बस उसका मांस खाना है और तुम अभी जाओ और उसको यहां लेकर आओ, यह सुनकर मगर उदास हो गया और वहां से चला गया।

मगर अपनी दोस्त के पास आया और वह उदास था। वह उदास इसलिए था क्योंकि उसकी पत्नी उसके मित्र को खाना चाहती थी। लेकिन वह अपने मित्र को कुछ बताना नहीं चाहता था कि उसकी पत्नी उसको खाना चाहती है। मगर ने बंदर से कहा कि मेरी पत्नी बहुत ही खुश हुई और वह जामुन खाना चाहती है तो बंदर ने कहा इतनी सी बात के लिए उदास क्यों हो रहे हो।

यह कहकर मगर बिना जामुन लिए ही अपने घर चला गया और अपनी पत्नी से कहा “मैं अपने दोस्त को यहां नहीं लाऊंगा”

तो कुछ दिन बीत गए और उसकी पत्नी को एक विचार आया। मगर की पत्नी ने एक बहाना बनाया कि “वह बीमार है और कहां वैद्यराज ने कहा है तुम्हारी बीमारी का इलाज सिर्फ बंदर के कलेजे को खाकर ही हो सकता है।”

यह सुनकर मगर डर गया, उसकी पत्नी दर्द भरी आवाज में निकालने का ढोंग कर रही थी ताकि मगर को लगे कि वह सच में बीमार है। मगर अपनी पत्नी को देखकर डर गया और वह विचार बनाया कि वह बंदर को लेकर आएगा और वहां से चला गया।

जब वह बन्दर के पास पहुंचा तो बन्दर से बोला “आज मैं तुम्हें अपनी पत्नी से मिलाने के लिए लेकर जाऊंगा, यह सुनकर बंदर खुश हुआ और उसके साथ चलने के लिए राजी हो गया। वह मगर की पीठ पर बैठ गया और कहा अब मैं चलने के लिए तैयार हूं, मगर उसको लेकर पानी पर जाने लगा।

कुछ दूर जाने के बाद मगर पानी के अंदर की तरफ जाने लगा यह देखकर बंदर डर गया और कहां तुम पानी के अंदर क्यों जा रहे हो, अगर तुम पानी के अंदर जाओगे तो मैं मर जाऊंगा।

मगर ने जवाब दिया मैं तुम्हें मारने के लिए ही पानी के अंदर जा रहा हूं क्योंकि मेरी पत्नी बीमार है और उसकी बीमारी का इलाज तुम्हारा कलेजा खाकर ही हो सकता है। यह सुनकर बंदर और भी ज्यादा डर गया और उसको एक तरकीब सूजी।

बंदर ने कहा “अगर ऐसी बात है तो मुझे पहले बोलना चाहिए था। मैं अपना कलेजा साथ में लेकर आता और भाभी का इलाज के लिए खुशी-खुशी दे देता। लेकिन मैं अपना कलेजा तो पेड़ पर ही रख कर आ गया हूं। क्योंकि मेरा कलेजा बहुत ही ज्यादा मीठा है, इसलिए मैं अपने साथ नहीं रखता।

यह सुनकर मगर को लगा कि यह सच बोल रहा है और वह उसको वापस पेड़ की तरफ लेकर गया। जैसे ही मगर पेड़ के पास पहुंचा बंदर ने पेड़ पर छलांग लगा दी और कहां मूर्ख प्राणी किसी का कलेजा खाकर किसी भी बीमारी का इलाज थोड़ी होता है।

तुम्हारी पत्नी मुझे खाना चाहती है, इसलिए मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगा और मगर वहां से चला गया।

सीख:- सच्चे दोस्तों के साथ कभी भी धोखा नहीं करना चाहिए और मुसीबत के वक्त धैर्य से काम करना चाहिए इसका फल मीठा होता है।

जैसे को तैसा (The Rat that ate Iron Story In Hindi)

प्राचीन समय में एक नगर में जीर्णधन नाम का एक बनिया रहता था। वह अकेले ही अपना जीवन यापन करता था क्योंकि उसके आगे पीछे कोई नहीं था। बनिए ने धन अर्जित करने के लिए विदेश जाने का सोचा। वैसे तो उसके पास कोई विशेष संपत्ति नहीं थी, केवल एक मन (चालीस किलोग्राम) भारी लोहे की तराजू थी।

उस तराजू को महाजन के यहां धरोहर के रूप में रखकर बनिया विदेश चला गया। विदेश से वापस लौट कर जब बनिए ने महाजन से तराजू मांगी तो महाजन ने कहा “उस लोहे की तराजू को तो चूहे खा गए।”

बनिया समझ गया कि महाजन उसे तराजू नहीं देना चाहता। बनिया ने धैर्य और विनम्रता से कहा “उस तराजू को चूहों ने खाया है तो चूहों की गलती है, तुम्हारी गलती नहीं है। तुम व्यर्थ में ही चिंता मत करो।”

कुछ समय पश्चात बनिए ने कहा “मैं नदी किनारे स्नान करने के लिए जा रहा हूं। तुम अपने पुत्र धनदेव को मेरे साथ भेज दो वह भी नहा के आ जाएगा।”

महाजन बनिए की बातों से प्रभावित हो गया था, इसलिए उसने अपने पुत्र को बनिए के साथ स्नान करने के लिए भेज दिया।

बनिए ने महाजन के पुत्र को वहां से कुछ दूर ले जाकर एक गुफा में बंद कर दिया और गुफा के द्वार पर एक बड़ी सी शीला रख दी ताकि महाजन का पुत्र वहां से भाग ना सके। वहां से बनिया जब महाजन के घर आया तो महाजन ने पूछा कि “मेरा पुत्र कहां है, वह आपके साथ स्नान करने गया था ना?”

बनिया – “उसे तो चील उठाकर ले गई।”

महाजन – “यह कैसे हो सकता है? कभी चील इतने बड़े बच्चे को उठाकर ले जा सकती हैं?

बनिया – “मित्र! यदि चील इतने बड़े बच्चे को उठाकर नहीं ले जा सकती तो चूहे भी एक मन भारी तराजू को नहीं खा सकते। तुझे अपना पुत्र चाहिए तो मुझे अपना तराजू दे दो।”

इस तरह विवाद बढ़ गया। वे दोनों इस समस्या को लेकर राजमहल पहुंच गए। वहां न्याय अधिकारी के सामने महाजन ने अपने दुख भरी कथा सुनाई और बनिए पर आरोप लगाया इसने मेरे बच्चे को चुरा लिया है।

धर्म अधिकारी ने बनिए से कहां “इसका लड़का इसे दे दो।”

बनिया – राजन उसे तो चील उड़ा कर ले गई।

धर्माधिकारी – “क्या कभी कोई चील इतने बड़े इंसान को उड़ा कर ले जा सकती हैं?”

बनिया – “यदि मेरे एक मन भरी तराजू को चूहे खा सकते हैं तो इनके बच्चे को चील उड़ा कर ले जा सकती है। इसके पश्चात धर्माधिकारी के प्रश्न पर बनिए ने अपनी सारी कथा सुनाएं।

शिक्षा:- जैसी करनी वैसी भरनी।

मूर्ख बगुला और नेवला (Foolish Crane And The Mongoose Story In Hindi)

एक जंगल में तालाब के किनारे वट वृक्षों के तनो के खोल में कई बुगले रहते थे। उसी वृक्ष के नीचे के भाग में एक सांप रहता था। वह सांप उन बुगलों के बच्चो को खाकर अपना जीवन आसानी से चला लेता था।

एक बगुला सांप द्वारा बार-बार उसके बच्चे खाने के कारण परेशान होकर तालाब किनारे जाकर विलाप करने लगा।

उसका विलाप सुनकर तालाब से एक केकड़ा बाहर आया और बोला “मामा क्या बात हो गई आज आप रो क्यों रहे हो?”

बगुले ने कहा “मित्र वह सांप मेरे बच्चों को बार-बार खा लेता है, उसके कारण मैं दुखी हूं और उसको यहां से भगाने का मेरे पास कोई उपाय नहीं है। यदि तुम्हारे पास कोई उपाय है तो मुझे बताओ।”

केकड़े ने सोचा यह मेरा जन्मवैरी है, क्यों ना इसे ऐसा उपाय बताया जाए जिससे सांप भी मर जाए और इसका भी अंत हो जाए।

यह सोच कर केकड़ा बोला “मामा आप ऐसा कीजिए कि नेवले के बिल के बाहर कुछ टुकड़े मास के डाल दीजिए और वहां से लगाकर सांप के बिल तक मांस के टुकड़ों को रख दीजिए। ताकि नेवला मांस के टुकड़ों को खाते हुए सांप के बिल तक पहुंच जाएगा और सांप को मारकर खा जाएगा।”

बुगलें ने केकड़े के कहे अनुसार कार्य किया।

नेवले ने सांप को तो खा लिया किंतु सांप के बिल को अपना ही घर बना लिया और उसी में रहने लगा। धीरे-धीरे करके सभी बुगलों को खा लिया।

शिक्षा:- हमें कोई उपाय करने से पहले उससे होने वाले दुष्परिणामों का पता कर लेना चाहिए।

गौरैया और बन्दर (The Sparrow And The Monkey Story In Hindi)

जंगल में एक विशाल पेड़ पर एक चिड़ा चिड़ी अपना घोंसला बनाकर रहते थे। वे अपने दांपत्य जीवन में बहुत ही खुश थे। दोनों सुख एवं आनंद में अपना जीवन यापन कर रहे थे। वे नित्य खाने की तलाश में इधर-उधर घूमते अपना भोजन प्राप्त करते एवं साय काल होने से पहले अपने घोंसले तक लौट आते।

हेमंत ऋतु का समय था। ठंडी ठंडी हवाएं चल रही थी और थोड़ी बहुत बूंदाबांदी भी हो रही थी। एक बंदर ठंड से बचने के लिए आश्रय की खोज करते हुए उस विशाल वृक्ष के पास पहुंचा। बंदर सर्दी के कारण कांप रहा था। ठंडी हवाओं से बचने के लिए उसने पेड़ के तने का सहारा लिया।

सर्दी अधिक होने के कारण उसके दांत कंप कपा रहे थे। दांतों की कटकटाहट सुनकर चिड़िया की नजर उस बंदर पर पड़ी। चिड़िया अपने घोसले से बाहर आकर उस बंदर से बोली “अरे! तुम कौन हो? तुम्हारा चेहरा एवं शरीर तो मनुष्य जैसा है तुम्हारे हाथ पैर भी है। फिर तुम इतनी सर्दी में यहां क्या कर रहे हो? तुम घर बना कर क्यों नहीं रहते?”

बंदर बोला “मूर्ख चिड़िया, तुम अपना काम करो। मेरा उपहास मत करो।”

चिड़िया फिर भी कुछ कहती रही। बंदर उसकी कच कचाहट से क्रोधित हो गया। उसने क्रोध में आकर चिड़ा चिड़ी का घोंसला तोड़ दिया। जिसमें चिड़ा चिड़ी आनंद से रहते थे।

शिक्षा - बड़े बुजुर्गों ने कहा है की हर किसी को उपदेश नहीं देना चाहिए। बुद्धिमान को दी गई शिक्षा ही फल देती है, मूर्खों को दी गई शिक्षा का फल कई बार उल्टा निकल आता है।

साधु और चूहा (The Hermit and the Mouse Story In Hindi)

दक्षिण में महिलरोपियम नाम का एक शहर जहां एक शिव का मंदिर था। जहां एक पवित्र और निर्मल ऋषि रहते थे। वे हमेशा भिक्षा के लिए पास ही के शहर जाया करते थे और वहां से अपनी आवश्यकता से अधिक अन्न लाया करते थे।

वे सुबह जाया करते थे और शाम को भोजन बनाने हेतु वापस आते थे। आवश्यकता के अनुसार अपना भोजन बनाकर बचा हुआ अन्न बर्तन में भरकर रख देते और गरीबों को बांट देते थे, जिससे वह गरीब सुबह मंदिर की सफाई और सजावट कर देते थे।

उसी मंदिर में चूहे का बिल था, जिसमें एक चूहा रहता था जो हमेशा बर्तन में से भोजन चुरा चुरा कर खाता था।

ऋषि उस चूहे बहुत परेशान थे। इससे परेशान होकर ऋषि बर्तनों को रस्सी के सहारे ऊपर लटका कर रखते थे परंतु वह चूहा किसी न किसी तरह उस भोजन तक पहुंच जाता और उसे खा जाता है। इसके चलते ऋषि कई बार उसे मारने का प्रयत्न किया, परंतु उसमें भी ऋषि असफल रहे।

एक दिन उस मंदिर में एक भिक्षुक भिक्षा मांगने आए परंतु ऋषि उस चूहे को मारने मैं व्यस्त थे। इसी कारण वह उस भिक्षुक को मिल नहीं पाए, इसी कारण वह भिक्षुक ऋषि से क्रोधित हो उठा। वह इसको अपना अपमान मानने लगा और कहा “मैं आपके इस मंदिर और कभी नहीं आऊंगा, आपको मेरे अलावा कोई अन्य महत्वपूर्ण कार्य है, जिससे आपको इतना भी समय नहीं है कि मुझसे मिल पाए।”

यह सुनकर साधु विनम्रता से भिक्षुक को अपनी परेशानियों के बारे में बताने लगा। साधु ने बताया कि वह चूहा कितना तेज है कि कहीं-कहीं से वह खाना चुरा लेता। वह चूहा इतना फुर्तीला है कि उसे ना कोई बिल्ली पकड़ सके ना कोई बंदर। वह चूहा इतना शैतान है कि मेरे कटोरे तक का भोजन वह चट कर जाता है।”

भिक्षुक ने साधु की परेशानियों को समझा और सलाह दी “चूहे में इतनी शक्ति, आत्मविश्वास और चंचलता के पीछे अवश्य ही कुछ न कुछ कारण होगा।

इस बात पर भिक्षुक ऋषि को कहने लगा कि चूहे के पास बहुत सारा भोजन जमा होगा, जिसके कारण वह सोचता है कि उसे यदि आज का खाना चुरा भी ना पाए तो भी वह जमा खाने से अपना पेट भर सकता है। इसी कारण वह ऊंची से ऊंची छलांग लगाकर भी खाना चुरा लेता, उसके मन में एक आत्मविश्वास था कि वह खाना चुरा लेगा। उसके पास खोने योग्य कुछ नहीं था।

अगली सुबह वह साधु उस चूहे का पीछा करते-करते उसके दिल तक पहुंच गए और जब उन्होंने उस बिल की गहराई तक खुदाई की तो उन्होंने पाया कि वहां पर अनाज का एक विशाल भंडार बना रखा है। साधु वह सारा अनाज मंदिर में भिजवा देता है।

अब चूहे के पास खाने के लिए कुछ ना था इसलिए वह चूहा उसी रात ऊपर लटके कटोरे से खाना चुराने की कोशिश करने लगा और वह सोचने लगा कि मैं वापस भोजन इकट्ठा करके एक मंडार बना दूंगा। जब वह चूहा उस कटोरे तक पहुंचने के लिए छलांग लगाता है तो वह उस तक पहुंच नहीं पाता और धड़ाम से गिरता है। अब चूहे के पास ना तो आत्मविश्वास था और ना ही बल।

तभी साधु वहां पहुंच गया और उसने गिरे हुए चूहे को देखा तो अपनी छड़ी से उस पर हमला करने की कोशिश की। किसी तरह वह चूहा अपनी जान बचाकर मंदिर से भागा और फिर कभी उस मंदिर की ओर नहीं आया।

शिक्षा - यदि व्यक्ति के पास संसाधनों की कमी ना हो तो उस व्यक्ति का मनोबल और आत्मविश्वास और अधिक बढ़ जाता है।

दो मछलियों और एक मेंढक की कहानी (The Tale of Two Fishes & A Frog Story In Hindi)

प्राचीन समय में एक तालाब दो मछलियां रहती थी, जिनका नाम शतबुद्धि (सौ बुद्धि वाली) और सहस्त्रबुद्धि (हजारबुद्धि वाली) था। उसी तालाब में एक मेंढक रहता था, जिसका नाम एकबुद्धि था।

सहस्त्र बुद्धि और शतबुद्धि को अपनी बुद्धि पर बहुत ही अभिमान था, किंतु मेंढक के पास एक बुद्धि होने के कारण उसे अपनी बुद्धि का जरा भी अभिमान नहीं था।

एक शाम कुछ मछुआरे उस तालाब किनारे आए और अपने जाल नीचे रखकर बोले “इस तालाब में खूब मछलियां है हम कल सुबह इस तरह पर आएंगे और यहां से खूब मछलियां पकड़ेंगे।”

इन मछुआरों की बात तीनों ध्यान से सुन रहे थे। रात्रि में मछलियों ने एक बैठक बुलाई। सभी मछलियां चिंतित हो गई। तभी सहस्त्रबुद्धि बोली “यदि दुनिया में सब कुछ कहे अनुसार हो जाए तो यह दुनिया चलने ही मुश्किल हो जाएगी। दुष्टों का अभिप्राय कभी पूरा नहीं होता है, इसलिए तो यह संसार आज तक बना रहा है। प्रथम बार तो कल मछुआरे आएंगे ही नहीं, यदि वह आए तो भी मैं अपनी बुद्धि का प्रयोग करके सब की रक्षा कर लूंगी।”

सतबुद्धि ने सहस्त्रबुद्धि की बातों का सहयोग किया और कहां “बुद्धिमान के लिए संसार में सब कुछ संभव है, इसलिए ही तो कहा जाता है कि जहां सूर्य का प्रकाश भी नहीं पहुंच पाता, वहां तक बुद्धिमान की बुद्धि पहुंच जाती है। किसी के कहने मात्र से हम अपनी मातृभूमि को छोड़कर नहीं जा सकते हैं। मातृभूमि तो स्वर्ग से भी अच्छी होती है। भगवान ने हमें बुद्धि दी हैं तो उस बुद्धि का उपयोग खुद की रक्षा करने के लिए करना चाहिए। भय का युक्ति पूर्ण सामना करने के लिए बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।”

तालाब की सभी मछलियों ने सहस्त्रबुद्धि और सतबूद्धि की बातों पर विश्वास कर लिया और वहीं रुक गए। किंतु मेंढक ने कहा मैं तो अपनी प्रियतमा को लेकर यहा से कहीं दूर चला जाऊंगा।” यह कहकर मेढ़क अपनी प्रियतमा के साथ दूसरे तालाब पर निकल गया।

दूसरे ही दिन प्रातः काल मछुआरे आए और उन्होंने अपने जाल बिछा दिए। जाल में धीरे-धीरे करके सभी मछलियां फसने लगी।

उसमें सहस्त्र बुद्धि और सद्बुद्धि भी शामिल थी। इन दोनों ने मिलकर बचाव के लिए खूब प्रयास किए। किंतु मछुआरे भी पुराने खिलाड़ी थे, उन्होंने भी उनके एक-एक प्रयास को नाकाम कर दिया। वे सब मछलियो ने तड़प तड़प कर मरने लगी।

सहस्त्रबुद्धि और सतबुद्धि दोनों का आकार विशाल होने के कारण उन में से अपने कंधे पर रखा और दूसरे को हाथ में लेकर मछुआरे अपने घर की ओर रवाना हो गए।

उनकी यह हालत देखकर मेंढक ने मेंढकी से कहा “देखो प्रिये! में कितना दूरदर्शी हूं। जब सहस्त्रबुद्धि कंधों पर और सतबुद्धि हाथ में है, उस समय में इस छोटे से जलाशय में जल से खेलने का आनंद ले रहा हूं।

शिक्षा:- हमें किसी भी कार्य को अपनी बुद्धि द्वारा हल कर लेना चाहिए।

तीन मछलियों की कहानी (Three Fishes Story in Hindi)

एक नदी के किनारे एक जलाशय था। जलाशय के चारों ओर लंबी झाड़ियां होने के कारण उसका पता किसी को नहीं था, जिसके कारण नदी से अनेक मछलियां आकर उस जलाशय में रहती थी। वह जगह मछलियों के अंडे देने के लिए भी उपयुक्त थी। जलाशय काफी ज्यादा गहरा था जिसके कारण उसमें मछलियों के पसंदीदा पौधे और कीड़े पाए जाते थे जिन्हें मछलियां आसानी से अपना भोजन बना लेती थी और जलाशय की गहराई में वे आसानी से अंडे दे सकती थी।

उसी जलाशय में तीन मछलियों का एक झुंड रहता था। उन तीनों का स्वभाव भिन्न भिन्न था। अन्ना को संकट के आने से पहले ही उसका उपाय करने में विश्वास रखती। प्रत्यु का मानना था की जब संकट आए तब उसका उपाय करना चाहिए। यद्दी का मानना था संकट आने से पहले ही उसका उपाय करना या संकट के समय उपाय करना ये सब बेकार बातें हैं, जो किस्मत में लिखा है, वह तो होकर रहेगा।

एक शाम को जब मछुआरे मछलियां पकड़ कर अपने अपने घरों की तरफ लौट रहे थे तो उन सब के चेहरे पर उदासी छाई हुई थी क्योंकि उन्हें कई दिनों से उनके जालों में बहुत कम मछलियां फस रही थी। मछुआरों ने देखा नदी से कुछ दूर झाड़ियों के ऊपर बुगलों का एक झुंड जा रहा था। उन सब बुगलों के मुंह में मछलियां दबी हुई थी। मछुआरों ने अनुमान लगाया कि अवश्य ही उन झाड़ियों के पीछे नदी से जुड़ा हुआ कोई छोटा तालाब होगा। जब मछुआरे घनी झाड़ियों को पार करके जलाशय के तट पर पहुंचे तो उनकी आंखें चमक उठी।

पहला मछुआरा बोला “अहा! इस जलाशय में तो नदी से बहुत ज्यादा मछलियां हैं। आज तक हमें इस जलाशय का तो पता ही नहीं था, इसके कारण हमारा परिवार चलाना मुश्किल हो रहा था। आज से हम इन मछलियों को पकड़कर अच्छे से अपना जीवन यापन कर सकेंगे।”

दूसरा बोला “आज शाम हो गई है, हम इस जलाशय में से कल प्रातः काल से मछलियां पकड़ना शुरू करेंगे।” यह कहा कर मछुआरे वहां से लौट गए।

मछुआरों की बातें तीनों मछलियां ध्यान से सुन रही थी। अन्ना ने कहा “दोस्तों हमे खतरे के संकेत मिल चुके हैं तो हमें उसका उपाय करने के लिए इस जगह को छोड़कर नदी में चले जाना चाहिए। जिसे हम मछुआरों से बच सकेंगे।”

प्रत्यू ने कहा “अभी घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है। अभी तक खतरा आया नहीं है। क्या पता कल सुबह मछुआरों के यहां आने का कार्यक्रम रद्द हो जाए। हो सकता है कि आज रात को अत्यधिक वर्षा हो जिससे मछुआरों की बस्ती में बाढ़ आ जाए। या हो सकता है की रात को बस्ती में आग लग जाए और उनके घर नष्ट हो जाए। मछुआरों का कल आना निश्चित नहीं है। क्या पता मैं उनके जाल में ही ना फसु।”

यद्दी ने कहा कि “भागने से क्या होगा, यदि हमारी किस्मत में कल मरना लिखा हुआ ही है तो हमारी मृत्यु अवश्य होकर ही रहेगी।”

उस समय अन्ना तो नहर के रास्ते नदी में चली गई। अगले दिन सुबह मछुआरे आए, उन्होंने जलाशय में जाल फेंके और मछलियां पकड़ने लगे। प्रत्यु ने जब जाल को देखा तो उससे बचने का उपाय सोचने लगी। उस जलाशय में कई दिनों से एक मरी हुए लोमड़ी की लाश तैर रही थी। लाश सड़ चुकी थी। प्रत्यु जल्दी से उस लाश के पास पहुंची और उसके पेट में घुस गई कर पेट के सड़े हुए कुछ हिस्से को अपने शरीर पर लपेट लिया और वहां से बाहर निकल गई।

जब वहां मछुआरों के जाल में फंसी और मछुआरे ने जाल को खींचकर जलाशय के तट पर लाकर जाल को खाली किया। जब वह मछलियों को खाली कर रहे थे तो उन्हें एक मछली से दुर्गंध आ रही थी। बाकी सभी मछलियां तड़प रही थी, लेकिन प्रत्यु अपनी सांस रोक कर पड़ी रही।

मछुआरे ने प्रत्यु को उठा कर सुंगा तो उसमें से सड़ने की दुर्गन्ध आ रही थी। मछुआरा कुछ बड़बड़ आया और प्रत्युं को जलाशय में फेंक दिया।

इस प्रकार प्रत्यु ने अपनी बुद्धि का प्रयोग करके अपनी जान बचाई।

यद्दी किस्मत के भरोसे रही तो वह मछुआरों के जाल में फंस गई और तड़प तड़प कर अपनी जान गवाई।

शिक्षा:- हमें संकट की जानकारी मिलने पर उसको टालने का उपाय करना चाहिए ना कि उस संकट के आने का इंतजार करना चाहिए।

सियार और ढोल की कहानी (The Jackal and the Drum Story In Hindi)

एक समय की बात है, जब दो राजाओं के बीच एक जंगल के पास बड़ा युद्ध हुआ। इस युद्ध में एक राजा हारा और एक राजा जीता। इस युद्ध के बाद दोनों सेनाएं अपने नगर को लौट आई। सेना का एक ढ़ोल जिसे सेना के साथ गए चारण और भांड रात में वीरता की कहानियां सुनाते थे, वह पीछे ही रह गया।

युद्ध के कुछ दिनों बाद वह ढ़ोल हवा के झोके से लुढ़कता-लुढ़कता सूखे पेड़ के नीचे जाकर टिक गया। उस पेड़ की सुखी टहनियां ढ़ोल से जब तेज हवा आती तो बार-बार टकराती और ढ़ोल से ढमाढम की आवाज बार-बार सुनाई देती।

उस जगह पर एक सियार हमेशा घूमता था। सियार ने उस ढ़ोल की आवाज सुनी और डर गया। उसने सोचा कि ऐसा कौनसा जानवर है जो ऐसी जोरदार आवाज निकालता है, इसे तो पहले कभी नहीं देखा। वह किसी पेड़ के पीछे छिपकर उस ढ़ोल को देखकर सोचता है कि इस जानवर के चार पांव है या फिर ये जानवर उड़ता है।

जब एक बार सियार एक छोटी झाड़ी के पीछे बैठकर उस ढ़ोल को देख रहा था। तभी उस पेड़ से ढ़ोल पर एक गिलहरी कूदती है और धीमे से ढ़ोल की “ढम” आवाज निकलती है। वह गिलहरी उस ढ़ोल पर बैठकर दाना कुतर रही थी।

सियार ने धीमे से अपने आप को कहा “ओह! ये जानवर तो कोई भयानक नहीं है इस जानवर से मेरे को नहीं डरना चाहिए।”

सियार धीरे-धीरे उस ढ़ोल के पास गया और उसे सूंघने लगा। उसे ढ़ोल के न ही पैर दिखाई दिए और ना ही कोई सिर। तभी अचानक हवा का एक झोंका आया और पेड़ की टहनियां उस ढ़ोल से टकराई। ढम की आवाज होते ही सियार कूदकर पीछे जा पड़ा।

सियार “अब समझ आ गया” ऐसा बोलते हुए उठा और कहा “वो भयानक जीव तो इस खोल के अंदर है, यह तो सिर्फ बाहर का खोल है। ढम की आवाज से ही पता लग रहा है कि वह इसके भीतर ही रहता है। वह मोटा-तगड़ा और चर्बी से भरा हुआ होना चाहिए। तभी इतनी जोर से ढम ढम की आवाज निकाल रहा है।”

इसके बाद सियार अपनी मांद में गया और सियारी से बोला “ओ सियारी! आज एक मोटे-ताजे शिकार का पता करके आया हूँ। तू दावत खाने के लिए तैयार हो जा।”

इतना सुनने के बाद सियारी ने पूछा कि “तुम उसका शिकार करके क्यों नहीं लाए?”

सियार ने जोर उस सियार को जवाब दिया कि “मैं तुम्हारी तरह मुर्ख नहीं हूँ। वह जानवर एक खोल के अंदर छुपकर बैठा है। वह खोल ऐसा है कि उसके दोनों तरफ सुखी चमड़ी के दरवाजे बने हुए। यदि में एक तरफ से उसका शिकार करने की कोशिश करता तो वह दूसरी तरफ से भाग नहीं जाता?”

सियार और सियारी चाँद निकलने के बाद उस ढ़ोल की ओर चल दिए। ढ़ोल से थोड़ी ही दूरी पर थे कि अचानक एक तेज हवा का झोका आया और उड़ पेड़ की टहनियां ढ़ोल से टकराते ही ढम-ढम की आवाज गूंज उठी। सियार ने हल्के से सियार के कान में कहा “तुम्हे अभी उसकी आवाज सुनाई दी? थोड़ा-सा सोच कि यदि इसकी आवाज इतनी दमदार है तो वह खुद कितना मोटा और ताजा होगा।”

दोनों ढ़ोल के पास जाकर उसे सीधा करके ढ़ोल की एक तरफ सियार और दूसरी तरफ सियारी बैठ गये और फिर दोनों ने उस चमड़ी को अपने दांतों से फाड़ना शुरू किया। जैसे ही चमड़ी फटने लगी तो सियार बोला कि “सावधान रहना! हमें एक साथ ही दोनों तरफ हाथ डालकर शिकार को पकड़ना है।”

फिर दोनों ने एक साथ हाथ अंदर डाले और अंदर टटोलने लगे। ढ़ोल के भीतर कुछ नहीं था। दोनों को सिर्फ खुद के हाथ ही पकड़ में आए। दोनों ने एक साथ चिल्लाया और कहा “यहां तो कोई नहीं है।” फिर दोनों अपना सिर पिटते ही रह गये।

धूर्त बिल्ली का न्याय (The Cunning Mediator Story In Hindi)

प्राचीन समय में जंगल में एक पेड़ के खोखले तने में कपिंजल नाम का एक तीतर रहता था। एक बार वह तीतर अपने साथियों के साथ धान की नई फसलों को खाने के लिए अपने घर से बहुत दूर निकल गया।

उसी शाम को एक शीघ्रगो नाम का एक खरगोश आश्रय की खोज करता हुआ उस वृक्ष के पास पहुंचा जहां तीतर रहता था। वह स्थान खाली देखकर खरगोश उसमें रहने लगा।

कई दिन बीत जाने के बाद एक दिन अचानक तीतर अपने घर आया। धान की नई-नई फसलें खाने के कारण काफी मोटा ताजा हो गया था। उसने खरगोश से कहा “यह घर मेरा है, तुम यहां से चले जाओ।”

खरगोश तीखे स्वभाव का था, बोला “यह घर अब तेरा नहीं है। आश्रय का स्वामित्व केवल मनुष्यों के पास होता है। जंगल में जो जानवर जिस स्थान पर रहने लग जाता है, वह उसी का ही हो जाता है। इस हिसाब से यह घर अब मेरा है।”

दोनों में झगड़ा बढ़ता गया। अंत में दोनों की इच्छा से किसी तीसरे पंच द्वारा इस समस्या को हल करने के लिए तय हुआ।

इन दोनों का झगड़ा और सुलह की बात एक जंगली बिल्ली बड़े ध्यान से सुन रही थी। उसने सोचा अगर मैं पंच बन जाऊं तो मुझे इन दोनों को मारकर खाने का अवसर मिल जाएगा।

यह सोचकर बिल्ली हाथ में माला लेकर नदी के किनारे सूर्य के सामने मुख करके बैठ गई और ज्ञान का उपदेश देने लगी।

जब खरगोश को ज्ञानोपदेश सुनाई दिया तो वह बोला की नदी के किनारे कोई धर्मात्मा बैठा है। उसे ही पंच बना कर इस समस्या का हल कर लेते हैं।

जब तीतर ने बिल्ली को देखा तो वह डर गया और दूर से ही बोला धर्मात्मा आप हमारे झगड़े का निपटारा कीजिए और जिसकी बात धर्म विरुद्ध है, उसको आप मारकर खा लेना।

बिल्ली ने आंखें खोली और बोली “राम राम! ऐसी हिंसा युक्त बातें मेरे से ना करें। मैंने हिंसा का मार्ग छोड़कर ज्ञानार्जन का मार्ग अपना लिया है। अतः मैं धर्म विरुद्ध पक्ष पर भी हिंसा नहीं करती। मैं आपके इस झगड़े का निपटारा करने के लिए तैयार हूं। मैं वृद्ध हो चुकी हूं तो दूर से मुझे सुनाई नहीं देता है। कृपया करके मेरे पास आकर अपने-अपने पक्ष रखें।

तीतर और खरगोश ने बिल्ली की बात मानकर उसके पास पहुंच गए। उनके वहां पहुंचते ही बिल्ली के एक ही पंजे के वार से तीतर और खरगोश को दबोच लिया और अपना भोजन बना लिया।

शिक्षा:- किसी अनजान व्यक्ति पर आसानी से भरोसा नहीं करना चाहिए।

व्यापारी के पुत्र की कहानी (Story of the Merchant’s Son Story In Hindi)

प्राचीन समय में किसी नगर में सागर दत्त नाम का एक धनी व्यापारी रहता था। वह स्वभाव से थोड़ा कंजूस था। एक बार उसके पुत्र ने एक पुस्तक खरीदी जिसका मूल्य ₹100 था। उस पुस्तक में केवल एक ही श्लोक लिखा हुआ था- जो वस्तु जिसको मिलने वाली होती है, वह उसे अवश्य ही मिलती है। उसे विधाता भी नहीं रोक सकता। अतः मैं किसी वस्तु के नष्ट हो जाने पर उस पर शोक व्यक्त नहीं करता और ना ही किसी वस्तु के अचानक मिल जाने पर उस पर आश्चर्य करता हूं। क्योंकि जो वस्तु मुझे मिलने वाली है वह कभी भी दूसरे व्यक्ति को नहीं मिल सकती और जो वस्तु दूसरे व्यक्ति को मिल जानी है, वह वस्तु कभी भी मेरे को नहीं मिल सकती।

उस पुस्तक को देखकर सागर दत्त ने अपने पुत्र से पूछा “यह पुस्तक कितने रुपए में खरीदी है?”

पुत्र ने उत्तर दिया ₹100 में।

अपने पुत्र से पुस्तक का मूल्य जानकर सागर दत्त अपने पुत्र से क्रोधित हो गया। उसने अपने पुत्र से कहा “तुम एक श्लोक को खरीदने के लिए ₹100 दोगे तो तुम अपनी बुद्धि से किस प्रकार धन कमाओगे? मैं तुम जैसे मूर्ख को अपने घर में नहीं रखूंगा।”

सागर दत्त का पुत्र अपमानित होकर घर से निकल गया। वह एक अन्य नगर में जा पहुंचा। जब लोग उससे उसका नाम पूछते तो वहां अपना नाम प्राप्तव्य-अर्थ बताता। कुछ समय के बाद वह उसी नाम से पहचानने लगा। उस नगर में एक उत्सव का आयोजन हुआ। इस आयोजन को देखने के लिए उस नगर की राजकुमारी चंद्रावती अपनी सहेलियों के साथ आई। उत्सव को देखते समय राजकुमारी की नजर एक राजकुमार पर पड़ी जो इस उत्सव को देखने के लिए बाहरी राज्य से आया था।

राजकुमारी राजकुमार को देखते ही पहली नजर में उस पर मोहित हो गई। राजकुमारी ने अपनी सहेली से कहा “तुम किसी भी प्रकार मेरा मिलन उस राजकुमार से करवा दो।”

राजकुमारी की सहेली तत्काल उस राजकुमार के पास पहुंची और बोली “मुझे राजकुमारी चंद्रावती ने आपके पास भेजा है। उन्होंने जबसे आपको देखा है, उनकी स्थिति दयनीय हो गई है। यदि आप उन्हें तुरंत नहीं मिले तो उनके पास मृत्यु के अलावा कोई मार्ग नहीं रह जाएगा।”

राजकुमार ने कहा “यदि ऐसी बात है तो बताओ मैं किस प्रकार और कब राजकुमारी के पास आऊ।”

राजकुमारी की सहेली ने कहा “मध्य रात्रि के समय राजकुमारी के शयनकक्ष की खिड़की में एक चमड़े की मजबूत रस्सी लटकी हुई रहेगी, उस रस्सी के सहारे आप कक्ष में आ जाइएगा।”

राजकुमार रात्रि होने की प्रतीक्षा करने लगा। मध्य रात्रि के समय राजकुमार कुछ सोच कर अचानक ही राजकुमारी के कक्ष में जाना स्थगित कर दिया। संयोगवश उसी समय व्यापारी पुत्र प्राप्तव्य अर्थ उधर से निकल रहा था। जब उसने कक्ष के बाहर लटकी हुई रस्सी देखी तो वह उस रस्सी के सहारे कक्ष तक पहुंच गया।

राजकुमारी ने व्यापारी पुत्र को राजकुमार समझकर उसका खूब स्वागत सत्कार किया। उसे स्वादिष्ट भोजन करवाया गया। भोजन के पश्चात उसे अपनी शैय्या पर लेटा कर स्वयं भी लेट गई।

व्यापारी पुत्र के स्पर्श से रोमांचित हो कर राजकुमारी ने उससे कहा “मैं आपके दर्शन मात्र से ही आप पर मंत्रमुग्ध होकर अपना हृदय दे बैठी हूं। अब मैं आपको छोड़कर किसी और को अपने पति के रूप में स्वीकार नहीं करूंगी।”

व्यापारी पुत्र शांत पड़ा रहा। इस पर राजकुमारी ने कहा आप शांत क्यों हो? क्या बात हो गई? आप मुझसे बोल क्यों नहीं रहे हो।” इस बात पर व्यापारी पुत्र ने अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहा “मनुष्य प्राप्तक वस्तुओं को प्राप्त कर लेता है।” यह सुनकर राजकुमारी को कुछ संदेह हुआ तो राजकुमारी ने व्यापारी पुत्र को अपने कक्ष से बाहर निकाल दिया।

व्यापारी पुत्र वहां से भटकता हुआ एक सुनसान मंदिर में जा पहुंचा, जहां नगर रक्षक अपनी प्रेमिका से मिलने वाला था। जब नगर रक्षक ने व्यापारी पुत्र को देखा तो कहा “यह स्थान तो निर्जन स्थान है। तुम मेरे स्थान पर जाकर सो जाओ। व्यापारी पुत्र ने यह बात स्वीकार कर ली। किंतु वह स्वयं अर्धनिंद्रा की अवस्था में होने के कारण उस स्थान पर ना जाकर किसी अन्य स्थान पर पहुंच गया।

जहां उस नगररक्षक की पुत्री विनयवती एक पुरुष से मिलने वाली थी जिससे वह प्रेम करती थी। उस स्थान पर विनयवती सोई हुई थी। जब विनयवती ने व्यापारी पुत्र को आते हुए देखा तो उसने समझ लिया कि वह उसका प्रेमी है। वह प्रसन्न होकर व्यापारी पुत्र का आदर सत्कार करने लगी और उसके साथ अपनी शैय्या पर सो गई।

थोड़ी देर तक व्यापारी पुत्र के चुप रहने पर विनयवति ने पूछा “क्या बात है, अब भी आप निश्चिंत होकर मेरे से बात क्यों नहीं कर रहे?”

व्यापारी पुत्र ने पुनः वही जवाब दिया जो उसने राजकुमारी को दिया था। व्यापारी पुत्र ने कहा “मनुष्य अपने प्राप्तव्य अर्थ को ही प्राप्त करता है।” विनयवति समझ गई कि उसे बिना विचार किए हुए कार्य करने का फल मिल रहा है। उसने तुरंत ही व्यापारी पुत्र को घर से बाहर जाने का रास्ता दिखला दिया। एक बार फिर व्यापारी पुत्र सड़क पर आ गया।

कुछ देर सड़क पर चलने के बाद उसे एक बारात दिखाई दी। व्यापारी पुत्र बारातियों के साथ हो लिया। बारात में दूल्हे का नाम वरकीर्ति था। अपनी बारात को बड़े धूमधाम से ले जा रहा था। बारात अपने गंतव्य स्थान तक पहुंची, उनका वहां पर खूब आदर सत्कार हुआ।

विवाह का मुहूर्त होने पर सेठ के पुत्री सज धज कर मंडप में आई। तभी अचानक वहां एक मदमस्त हाथी अपने महावत को मारकर मंडप की ओर भागा। उसे देख कर सभी बाराती दूल्हे को लेकर वहां से भाग गए। सेठ के सभी घर वाले भी अपने घर में छुप गए। वहां मंडप में व्यापारी का पुत्र और सेठ की पुत्री जो दुल्हन थी, वे दोनों ही बचे थे।

व्यापारी पुत्र ने दुल्हन से कहा “आप घबराइए मत मैं आपकी रक्षा करूंगा।” व्यापारी पुत्र एक हाथ से दुल्हन को थामा और दूसरे हाथ में लाठी लेकर हाथी पर गिर पड़ा। व्यापारी के पुत्र को देखकर हाथी अचानक भाग गया। जब सभी बाराती बारात लेकर वापस आए तो उन्होंने देखा कि दुल्हन व्यापारी के पुत्र का हाथ थामे हुए उसके पीछे खड़ी थी।

जब तक बरात वापस आई तब तक मुहूर्त निकल चुका था। इस प्रकार दुल्हन को अन्य नौजवान के साथ देखकर वरकीर्ति क्रोधित हो उठा। वर कीर्ति ने अपने ससुर से ऊंचे स्वर में कहा “आपने यह उचित नहीं किया। अपनी कन्या का हाथ मेरे हाथ में देने के बजाय किसी और नौजवान के हाथ में दे दिया है।”

उसकी बात सुनकर सेठ बोला “मैं भी तुम सब लोगों के साथ हाथी के डर से भाग गया था, अभी ही वापस आया हूं। मुझे भी मालूम नहीं यह घटना कैसे घटित हुई।”

सेठ की पुत्री ने कहा “पिताश्री इन्होंने मुझे मृत्यु से बचाया है। अतः मैं इनको छोड़कर किसी अन्य के साथ विवाह नहीं करूंगी।”

इस प्रकार विवाद बढ़ता गया। रात्रि भी समाप्त हो गई। प्रातः काल वहां राजकुमारी भी पहुंच गई। विनयवति ने जब यह सब कुछ सुना तो वह भी भीड़ को देखने के लिए यहां पहुंच गई। नगर के राजा भी वहां पहुंच गए।

राजा ने व्यापारी पुत्र से कहा “तुम निडर होकर सारी बात मुझे बताओ।”

व्यापारी पुत्र ने उत्तर दिया “मनुष्य प्राप्तव्य अर्थ को प्राप्त करता है।”

यह सुनकर राजकुमारी ने कहा “उसे विधाता भी नहीं बदल सकता।”

तब विनयवती भीड़ से बाहर आई और बोली “तभी मैं बीती बातों पर पश्चाताप नहीं करती।”

यह सब सुनकर सेठ की पुत्री ने कहा “जो वस्तु मेरी है, वह किसी और की नहीं हो सकती।”

राजा के लिए तो यह सब एक पहेली बन गया। राजा ने सभी कन्याओं से अलग-अलग पूरी बात सुनी। सबकी अलग-अलग बातें सुनने के बाद राजा अस्वस्थ हो गया। उसने सब को अभय दान दिया। राजा ने अपनी पुत्री को सभी अलंकारों से युक्त करके हजार ग्रामों के साथ प्राप्तव्य अर्थ को सौंप दिया और उसी व्यापारी पुत्र को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लिया।

इस प्रकार व्यापारी पुत्र युवराज के पद पर प्रतिष्ठित हो गया। इसी प्रकार नगर रक्षक ने भी अपनी पुत्री को व्यापारी पुत्र को सौंप दिया। व्यापारी पुत्र भी उन तीनों कन्याओं से विवाह करके राज महल में आराम से रहने लगा। उसने अपने परिवार को भी राजमहल में बुला लिया।

शिक्षा:- दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम।

हाथी और चिड़िया का झगड़ा कहानी

साहनपुर जंगल में बहुत सारे हाथी रहने के लिए आये क्योंकि वहां बहुत सारा पानी उपलब्ध था। पहले सिर्फ दस हाथी रहते थे, लेकिन अब उनकी संख्या लगभग पचास पर पहुंच गयी थी। जंगल के नदी किनारे पेड पर एक चिडिया व चिडे का छोटा-सा सुखी परिवार रहता था। चिडिया अंडो पर बैठी नन्हें-नन्हें प्यारे बच्चों के निकलने के सुनहरे सपने देखती रहती थी।

एक दिन क्रूर हाथी गरजता, चिंघाडता पेडों को तोडता-मरोडता उसी ओर आया। देखते ही देखते उसने चिडिया के घोंसले वाला पेड भी तोड डाला। घोंसला नीचे आ गिरा। अंडे टूट गए और ऊपर से हाथी का पैर उस पर पडा।

चिडिया और चिडा चीखने चिल्लाने के सिवा और कुछ न कर सके। हाथी के जाने के बाद चिडिया छाती पीट-पीटकर रोने लगी। तभी वहां एक तोता आया। वह चिड़ियों का बहुत अच्छा दोस्त था। तोते ने उनके रोने का कारण पूछा तो चिडिया ने अपनी सारी कहानी कह डाली। तोता बोला “इस प्रकार गम में डूबे रहने से कुछ नहीं होगा। उस हाथी को सबक सिखाने के लिए हमे कुछ करना होगा।”

चिडिया ने निराशा दिखाई “हमें छोटे-मोटे जीव उस बलशाली हाथी से कैसे टक्कर ले सकते हैं?” तोते ने समझाया “एक और एक मिलकर ग्यारह बनते हैं। हम अपनी शक्तियां जोडेंगे।”

“कैसे?” चिडिया ने पूछा। “मेरा एक मित्र सोरु हैं। हमें उससे सलाह लेना चाहिए।” चिडिया और तोता सोरु से मिलने गए। सोरु बोला “यह तो बहुत बुरा हुआ। मेरा एक मेंढक मित्र हैं आओ, उससे सहायता मांगे।”

अब तीनों उस सरोवर के किनारे पहुंचे, जहां वह मेढक रहता था। सोरु ने सारी समस्या बताई। मेंढक बोला “आप लोग धैर्य से जरा यहीं मेरी प्रतीक्षा करें। मैं गहरे पाने में बैठकर सोचता हूं।”

ऐसा कहकर मेंढक जल में कूद गया। आधे घंटे बाद वह पानी से बाहर आया तो उसकी आंखे चमक रही थी। वह बोला “दोस्तो! उस हत्यारे हाथी को नष्ट करने की मेरे दिमाग में एक बडी अच्छी योजना आई हैं। उसमें सभी का योगदान होगा।”

मेंढक ने जैसे ही अपनी योजना बताई,सब खुशी से उछल पडे। योजना सचमुच ही अदभुत थी। मेंढक ने दोबारा बारी-बारी सबको अपना-अपना रोल समझाया।

कुछ ही दूर वह हाथी तोडफोड मचाकर व पेट भरकर खाकर मस्ती में खडा झूम रहा था। पहला काम सोरु का था। वह हाथी के कानों के पास जाकर मधुर राग गुंजाने लगा। राग सुनकर हाथी मस्त होकर आंखें बंद करके झूमने लगा।

तभी तोते ने अपना काम कर दिखाया। वह अपने कई दोस्तों के साथ आया और अपनी नुकीली चोंच से उसने तेजी से हाथी की दोनों आंखें बींध डाली। हाथी की आंखे फूट गईं। वह तडपता हुआ अंधा होकर इधर-उधर भागने लगा।

जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, हाथी का क्रोध बढता जा रहा था। आंखों से नजर न आने के कारण ठोकरों और टक्करों से शरीर जख्मी होता जा रहा था। जख्म उसे और चिल्लाने पर मजबूर कर रहे थे।

चिडिया कॄतज्ञ स्वर में मेढक से बोली “बहिया, मैं आजीवन तुम्हारी आभारी रहूंगी। तुमने मेरी इतनी सहायता कर दी।” मेढक ने कहा “आभार मानने की जरुरत नहीं। मित्र ही मित्रों के काम आते हैं।” एक तो आंखों में जलन और ऊपर से चिल्लाते-चिंघाडते हाथी का गला सूख गया। उसे तेज प्यास लगने लगी। अब उसे एक ही चीज की तलाश थी, पानी।

मेढक ने अपने बहुत से मित्रों को इकट्ठा किया और उन्हें ले जाकर दूर बहुत बडे गड्ढे के किनारे बैठकर टर्राने के लिए कहा। सारे मेढक टर्राने लगे। मेढक की टर्राहट सुनकर हाथी के कान खडे हो गए। वह यह जानता ता कि मेढक जल स्त्रोत के निकट ही वास करते हैं। वह उसी दिशा में चल पडा।

टर्राहट और तेज होती जा रही थी। प्यासा हाथी और तेज भागने लगा। जैसे ही हाथी गड्ढे के निकट पहुंचा, मेढकों ने पूरा जोर लगाकर टर्राना शुरु किया। हाथी आगे बढा और विशाल पत्थर की तरह गड्ढे में गिर पडा, जहां उसके प्राण पखेरु उडते देर न लगे इस प्रकार उस अहंकार में डूबे हाथी का अंत हुआ।

शेर का तीसरा पुत्र कहानी

एक जंगल में एक शेर अपनी शेरनी के साथ रहता था। दोनों में बहुत ही बड़ा प्रेम था। दोनों शिकार के लिए साथ-साथ जाते और शिकार मारकर साथ ही खाया करते थे।

कुछ दिनों बाद शेरनी ने दो बच्चों को जन्म दे दिया। शेर ने कहा, “अब तुम शिकार के लिए मत चला करो। घर पर ही रहकर बच्चों की देखभाल करो। में अकेला शिकार के लिए जाऊंगा और तुम्हारे लिए भी शिकार में आऊंगा।”

उस दिन से शेर अकेला ही शिकार के लिए जाने लगा। शेरनी घर पर रहकर दोनों बच्चों का पालन पोषण करने लगी।

एक दिन जब शेर शिकार के लिए गया, तो पुरे दिन घूमने के बाद भी उसे कुछ नहीं मिला। वापस लौटते समय उसने लोमड़ी के बच्चे को अकेले घूमते हुए देखा। आज शेरनी के लिए कुछ भोजन नहीं मिला है, क्यों न इस लोमड़ी को ले चलु। ऐसा सोचके शेर ने उस बच्चे को पकड़ लिया।

शेर लोमड़ी के बच्चे को लेकर घर पहुंच गया। “आज जंगल में इसके आलावा कुछ नहीं मिला। बच्चा समझकर मैं इसे मारकर खा नहीं सका। तुम इसे मारकर खा जाओ।” शेर ने कहा।

शेरनी बोली, ” जब तुम इसे बच्चा समझकर मार नहीं सके, फिर मुझसे क्यों कह रहे हो की मैं इसे मारकर खाऊं? मैं इसे मारकर नहीं खाऊंगी। जिस प्रकार मैं अपने दो बच्चों का पालन-पोषण करती हूँ, उसी प्रकार इसका भी पालन-पोषण करूंगी। आज से मेरे तीन बच्चे हो गए है। “

शेरनी उसी दिन से अपने पुत्रों के सामान ही लोमड़ी के बच्चे का भी पालन-पोषण करने लगी।

लोमड़ी का बच्चा भी शेर के दोनों बेटों के साथ पलने-बढ़ने लगा, जब तीनों कुछ बड़े हुए तो साथ-साथ खेलने-कूदने लगे। शेर के बच्चे यह नहीं समझते थे की वो दोनों शेर के बच्चे है और यह तीसरा लोमड़ी का बच्चा है। इसी प्रकार लोमड़ी का बच्चा भी अपने को शेर से बच्चों से अलग नहीं समझता था।

कुछ और बड़े होने पर तीनों बच्चे एक दिन खेलने के लिए जंगल में गए। वह उन्होंने एक हाथी को देखा। शेर के दो बच्चे तो हाथी के पीछे लग गए। पर लोमड़ी का बच्चा उसे देखकर भयभीत हो गया। उसने शेर के बच्चों को रोकते हुए कहा, “अरे, उसके पीछे मत जाओ। वह हाथी है, तुम दोनों को पैरों से कुचल देगा।”

परंतु शेर के बच्चों ने लोमड़ी के बच्चे की बात नहीं मानी। वे हाथी को मारने के लिए उसके पीछे लग गए। परंतु लोमड़ी का बच्चा डरकर अपने माँ के पास आ गया।

कुछ देर बाद शेर के दोनों बच्चे लौटकर अपनी माँ के पास आ गए। उन्होंने अपनी माँ को कहा की “हमें जंगल में हाथी मिला। हम दोनों तो उसके पीछे भाग गए लेकिन हमारा तीसरा भाई डरकर घर आ गया।”   

लोमड़ी के बच्चे को गुस्सा आ गया ” तुम दोनों अपने आप को वीर और कायर बता रहे हो, हिम्मत है तो आ जाओ। दोनों को जमीं पर गिरा दूंगा ” 

शेरनी ने लोमड़ी के बच्चे को समझाते हुए कहा ” तुम्हे अपने भाइयों के लिए ऐसी बात नहीं करनी चाहिए। वे मुझसे तुम्हारी शिकायत नहीं बल्कि सच बता रहे है। क्या तुम हाथी को देखकर डर नहीं गए थे?” 

शेरनी की बात लोमड़ी के बच्चे को बिलकुल अच्छी नहीं लगी, वह और गुस्से से बोला ” मैं हाथी को देखकर डर गया? आपका कहना है की मैं डरपोक और वे दोनों बहादुर है? मैं अकेला उन दोनों को ज़मीं पर गिरा सकता हु।

तब शेरनी बोली “देखो बेटा, अधिक बढ़-बढ़कर बाते करना अच्छी नहीं होता। यह तो सच ही है की तुम्हारे वंश के लोग हाथी को देखकर डर जाया करते है।”

शेरनी की बात सुनकर लोमड़ी के बच्चे ने बड़े आश्चर्य-भरे स्वर में कहा “क्या कह रही हो? आपकी बात से लगता है की मेरा वंश और उन दोनों का वंश अलग है। सच बताओ क्या बात है?”

शेरनी लोमड़ी के बच्चे को अलग ले गई और उसे समझाती हुए बोली “देखो, तुम्हारा जन्म लोमड़ी के वंश में हुआ था और उन दोनों का जन्म शेर के वंश में हुआ है। मैंने तुम पर दया करके अपने बच्चों के सामान ही तुम्हे पाला है। अब तुम बड़े हो गए हो। मैंने तुम्हारा पालन पोषण तो किया है, परंतु तुम्हारे सभी गुण लोमड़ी जैसे ही है। इसलिए तुम उस हाथी से डर गए।”

“मैंने इस भेद को अभी तक अपने बच्चों से छिपा रखा है। जब उन्हें यह बात मालुम हो जाएगी की तुम लोमड़ी के बच्चे हो, तो वे तुम्हे मारकर खा जायेंगे। इसलिए अच्छा है की भेद प्रकट होने से पहले ही तुम यहाँ से भाग जाओ”

शेरनी की बात सुनकर लोमड़ी का बच्चा डर गया, और वहा से चुपके से भाग गया।

बगुला भगत और केकड़ा (The Crane And The Crab Story In Hindi)

प्राचीन समय में एक वन प्रदेश में बहुत बड़ा तालाब था। वहां प्रत्येक प्रकार की सामग्री होने के कारण अत्यधिक जीव रहते थे, जिसमें मछलियां, केकरा बुगला पक्षी आदि रहते थे। उसी तालाब के किनारे एक आलसी बुगला रहता था।

उसकी आंखें कमजोर हो गई थी। उसे शिकार करने के लिए खूब मेहनत करनी पड़ती थी जो उससे होती नहीं थी। वह सदैव ऐसा उपाय सोचता कि मुझे बिना मेहनत के भोजन मिलता रहे। एक दिन उसे ऐसा उपाय सूझा और उसे वह आजमाने के लिए तालाब के किनारे खड़ा होकर आंसू बहाने लगा।

तालाब में से एक केकड़ा निकला और बोला “मामा आज आप शिकार करने के बजाए, यहां खड़े होकर आंसू क्यों बहा रहे हो? क्या बात हो गई।

बुगलेे ने उत्तर दिया “पुत्र मैंने पाप का मार्ग छोड़ दिया है। अब मुझे आत्मज्ञान हो चुका है। अतः मैंने शिकार करना छोड़ दिया है। मैं पास आई मछलियों को भी नहीं पकड़ रहा हूं।”

केकड़ा बोला मामा “इस प्रकार तो आप भूखे मर जाओगे।”

बगुला भरे हुए गले के साथ बोला “ऐसा जीवन जी के भी क्या करना है। वैसे भी हम सबको जल्दी ही मरना है। मैंने अपनी दूरदृष्टि लगाकर पता लगाया है कि यहां बारह वर्ष का लंबा सूखा पड़ने वाला है।”

केकड़े ने बुगुले की बात तालाब के सारे जीवो को बता दी। सारे जीव इस बात से चिंतित होकर बगुले के पास दौड़े चले आए और बोले ‘भगत मामा, अब हम सब को कोई बचा सकते हैं वह आप हैं। आप अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करके इस समस्या से हम सबको छुटकारा दिलाइए।’

बगुले ने कुछ देर सोचने के पश्चात सभी को बताया कि यहां से कोसों दूर एक तालाब है, जिसमें हर समय झरने का पानी गिरता रहता है, वह कभी नहीं सूखता। यदि सारे जीव उस तालाब मैं पहुंच जाए तो सभी का जीवन बच सकता है।

किंतु अब उन सबके सामने यह समस्या आ गई कि उस तालाब पर पहुंचा कैसे जाए? इस समस्या का निदान भी बगुले ने कर दिया। वह बोला मैंने जीवन में कई पाप किए हैं। अब मैं उनका प्रायश्चित करने के लिए जीवो की सेवा में लग गया हूं। अतः मैं एक-एक करके सभी जीवो को अपनी पीठ पर बिठाकर उस तालाब तक पहुंचाउगा।

बगुले की बात सुनकर सभी जीव बगुले की जय-जयकार करने लगे।

अब तो बगुले की मौज हो गई। बगुला रोज एक जीव को अपनी पीठ पर बैठा कर उड़ कर कुछ दूर ले जाता और एक चट्टान पर पटक कर मारकर खा लेता। कभी-कभी तो भगत जी दो-दो फेरे भी कर लेते। रोज बिना मेहनत किए हुए शिकार मिलने के कारण बगुले की आंखे तेज हो गई शरीर में चमक आ गई और पंख भारी हो गए। दूसरे जीव बगुले को देख कर बोले देखो दूसरों की सेवा करने का असर बगुले के शरीर पर हुआ है।

बगुला बहुत ही प्रसन्न रहने लगा और सोचता रहता। इस दुनिया में कितने मूर्ख भरे पड़े है। जो सब पर विश्वास कर लेते हैं। ऐसी दुनिया में अगर थोड़ी चालाकी से काम लिया जाए तो मजे ही मजे हैं। बिना किसी मेहनत के अपना कार्य निकाला जा सकता है और बैठे-बैठे पेट भरने का भोजन मिल जाए तो सोचने का बहुत अधिक समय मिल जाता है।

कई दिन यह क्रम चलता रहा। केकड़े ने कहा “मामा सभी की बारी आ चुकी है, लेकिन मेरी बारी अब तक नहीं आई है मेरी बारी कब आएगी।”

बगुला बोला “आज तेरा ही नंबर लगाते हैं, आ मेरी पीठ पर बैठ जा।”

केकड़ा खुश होकर बगुले की पीठ पर बैठ गया। जब वह चट्टान के पास से गुजर रहे थे तो केकड़ा बोला “यह हड्डियों का ढेर कैसा? वह झरना यहां से कितना दूर है।”

बगुला हंसकर बोला “वहां कोई जलाशय नहीं है। मैं सदैव एक जीव को रोज यहां लाता और मारकर खा जाता। आज तुम्हारी बारी है, मैं तुम्हें भी मार कर खा जाऊंगा।

केकड़े को जब सारी बात का ज्ञान हुआ तो उसका सर चकराने लगा। किंतु उसने हार नहीं मानी और हिम्मत से काम लिया। उसने अपने पंजों से बगुले की गर्दन तब तक पकड़ के रखी, जब तक उसके प्राण पखेरू नहीं हो गए।

वह बगुले का कटा हुआ सिर लेकर तालाब पर पहुंचा और सब जीवो को सारा वृत्तांत सुनाया।

शिक्षा: हमें हर किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए। हमें विपत्ति के समय हिम्मत से काम लेना चाहिए।

टिटिहरी का जोड़ा और समुद्र का अभिमान (Bird Pair and the Sea Story In Hindi)

प्राचीन समय में एक समुंद्र के किनारे टिटिहरी का एक जोड़ा रहता था। वे दिन भर अपने दाना पानी की व्यवस्था करते और शाम के समय वापस अपने घौसले पर आ जाते।

जब टिटिहारी के अंडे देने का समय आया उससे एक दिन पहले उसने अपने पति से कहा कि कहीं सुरक्षित स्थान की खोज कर ले वहां जाकर मैं अपने अंडे रखूंगी। टीटीहरे ने कहा “यह स्थान पर्याप्त सुरक्षित है, तुम चिंता मत करो।”

टिटिहरी – “जब समुद्र की लहरें उफान पर होती है तो वह एक व्यस्क हाथी को भी खींच कर ले जाती हैं तो इस समुंद्र के आगे हमारे अंडे कैसे टिक पाएंगे। इसलिए हमें समुंद्र से कहीं दूर जाकर अपने अंडे रखने चाहिए।

टीटीहरा – “समुंद्र इतना दु:साहसी नहीं है कि वह मेरे अंडों को नुकसान पहुंचाए। तुम बिना किसी डर के यहां पर अंडे दे दो।

समुंद्र भी इन दोनों की बातों को ध्यान से सुन रहा था। समुंदर ने सोचा “यह टिटिहरा बहुत अभिमानी है। जब भी सोता है अपने चारों पैर आकाश की और करके सोता है ताकि कभी आकाश गिर जाए तो यह अपनी टांगों पर आकाश को उठाकर अपनी रक्षा कर सकें। इसका अभिमान भंग होना चाहिए।” यह सोच कर समुंद्र ने लहरों के साथ उसके अंडे अपने अंदर ले लिए।

टीटीहरी जब साईं काल को अपने घोंसले पर पहुंची वहां पर अंडे ना पाकर वह बहुत दुखी हो गई और विलाप करते हुए टिटिहरे से बोली “मूर्ख मैंने पहले ही तुम्हें चेतावनी दी थी कि यह समुंद्र हमारे अंडे बहाकर ले जाएगा। किंतु तुमने अपने घमंड में मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया। अपने शुभचिंतकों की बातों पर जो व्यक्ति ध्यान नहीं देते उनकी ऐसी ही दुर्गति होती हैं। बुद्धिमान व्यक्ति वही होता है जो आपत्ति आने से पूर्व ही आपत्ति का उपाय सोच लेता है। ‘जो होगा, देखा जाएगा’ कहने वाले व्यक्ति शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।”

यह बात सुनकर टिटिहरे ने टिटिहरी से कहा “मैं मूर्ख और निष्कर्म नहीं हूं। तुम मेरी बुद्धि का चमत्कार देखो। मैं इस समुंदर को सुखा दूंगा।

टिटिहरी – “हमें अपनी शक्ति देखकर ही किसी से वैर लेना चाहिए। समुंद्र के साथ तेरा वैर तुझे शोभा नहीं देता। इस पर क्रोध करने से क्या लाभ?

टिटिहरा फिर भी अपनी चोंच से समुंद्र को खाली करने की डींगे मारता रहा। तब टिटिहरी ने फिर उसे समझाया की जिस समुंद्र में हर समय गंगा यमुना जैसी सैकड़ों नदियों का पानी गिरता है उस समुंद्र को तुम अपनी चोंच से कैसे खाली करोगे?

टिटिहरा फिर भी अपनी हट पर अड़ा रहा। तब, टिटिहरी ने कहा “यदि तुमने समुंद्र को सुखाने की हट कर ही ली है तो तुम दूसरे पक्षियों की सहायता लो। कई बार दो छोटे जीव मिलकर एक बड़े जीव को हरा देते हैं। जैसे चिड़िया कठफोड़े और मेंढक ने मिलकर हाथी को मार दिया था।

टिटिहरा – “अच्छी बात है। मैं दूसरे पक्षियों की सहायता से समुंद्र को सुखाने का प्रयत्न करूंगा।

यह कहकर उसने हंस गूगले सारस चिड़िया आदि अनेक पक्षियों को अपनी दुख भरी कथा सुनाई। तब सभी पक्षियों ने मिलकर कहा कि हम सब तो समुंद्र के आगे अशक्त है किंतु पक्षीराज गरुड़ आपकी अवश्य ही सहायता करेंगे। हम सबको मिलकर उनके पास जाना चाहिए।

यह कहकर सभी पक्षी पक्षीराज गरुड़ के पास गए और सारा वृत्तांत सुनाया। आपके रहते हुए हम सब पक्षियों पर समुंद्र ने यह अत्याचार कर दिया।

हम इसका बदला लेना चाहते हैं। आज इस टिटिहारी के अंडे बहाकर ले गया, कल किसी और पक्षी के अंडे वह आकर ले जाएगा। यदि इस अत्याचार की रोकथाम नहीं की गई तो सारा पक्षी कुल नष्ट हो जाएगा।

गरुड़ ने सभी पक्षियों की बात सुनकर उनकी सहायता करने का निश्चय किया। उसी समय भगवान विष्णु का दूत आया। भगवान विष्णु ने उस दूत के द्वारा गरुड़ को सवारी के लिए बुलवाया था। गरुड़ ने दूत से क्रोध पूर्वक कहा कि जाकर भगवान विष्णु को कह दे कि आप दूसरी सवारी का प्रबंध कर लें। दूत ने क्रोध का कारण पूछा तो गरुड़ ने सारी कथा सुनाई।

दूत के मुख से गरुड़ के क्रोध की कहानी सुनकर भगवान विष्णु स्वयं गरुड़ के घर आए। वहां पहुंचने के बाद गरुड़ ने हाथ जोड़कर विनम्र शब्दों से बोला “भगवन, इस समुंद्र ने मेरे साथी पक्षी के अंडे चुराकर मेरा अपमान किया है। मैं इस समुंद्र से अपने अपमान का बदला लेना चाहता हूं।”

भगवान विष्णु बोले “तुम्हारा क्रोध सही है। समुंद्र को ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए।

मैं समुंद्र से उन अंडों को टीटीहरी को वापस दिला दूंगा उसके पश्चात हमें अमरावती भी चलना है।

जब भगवान विष्णु ने अपने धनुष पर आग्नेय बाण चढ़ाकर समुंद्र से कहा “दुष्ट! अभी उन अंडों को वापस देदे। वरना मैं तुम्हें क्षण भर में सुखा दूंगा। भगवान विष्णु के डर से समुंद्र ने अंडों को वापस दे दिया।

शिक्षा:- हमें किसी को कमजोर नहीं समझना चाहिए।

रंग-बेरंगी सियार कहानी

शहर के बहार एक बड़ासा जंगल था, उस जंगल में एक सियार रहता था। सियार हमेशा चालाक और धूर्त होता है। वह दित-भर तो छिपा रहता था, पर जब रात होती तो शिकार के लिए बाहर निकलता और बड़ी ही चालाको से छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाता था।

एक बार रात में जब सियार शिकार के लिए बाहर निकला, तो उसे कोई शिकार नहीं मिला। उसने सोचा, वन में तो भोजन मिला नहीं, चलो, अब बस्ती की ओर चलें। कदाचित बस्ती में कुछ भोजन मिल जाए।

बस्ती की बात सोचते ही सियार को कुत्तों की याद आई। उसने सोचा, बस्ती में कु्ते रहते हैं, देखते ही भूंकते हुए पीछे लग जाएंगे। फिर भी सियार बस्ती की ओर चल पड़ा। वह जब बस्ती के भीतर घुसा, तभी कुछ कुत्तों की  उस पर पड़ गई। बस, फिर क्या था, कुत्ते भूंकते हुए दौड़ पड़े।

सियार प्राण बचाने के लिए इधर से उधर और उधर से इधर चक्कर काटने लगा। आखिर एक घर का दरवाजा खुला देखकर सियार उसके भीतर घुस गया। वह घर पेंटर (चित्रकार) का घर था। घर के भीतर आंगन में बहुत बड़ा टब रखा था, निसमें घुला हुआ पीला रंग भरा था।

सियार प्राण बचाने के लिए जल्दी में उसी टब में घुसकर बैठ गया। कुछ देर तक टब में बैठा रहा। जब बाहर कुत्तों का भूकना बंद हो गया, तो वह टब से बाहर निकला। बाहर निकलने के बाद यह देखकर हैरान हो उठा कि उसका पूरा शरीर पिले रंग में रंग गया है। जंगल के प्राणियों ने जब सियार को देखा, तो वे भयभीत हो उठे, कोई पहचान नहीं सका। जंगल के सब प्राणी उसे देखकर भागने लगे। क्योंकि उन्होंने आज तक ऐसे अद्भुत जानवर को कभी नहीं देखा था।

सियार ने जब जंगल के प्राणियों को भागते हुए देखा, तो वह समझ गया कि जंगल के प्राणी उसके शरीर के पिले रंग को देखकर भाग रहे हैं। वह धूर्त और चालाक तो था ही, उसने अपने शरीर के पीलेपन से लाभ उठाने का निश्चय किया।

उसने बड़ी कठिनाई से जंगल के प्राणियों को इकट्ठा किया और बोला की उसको भगवान ने जंगल को संभलने के लिए भेजा है। वह अब जंगल का राजा है और सबको उसकी सेवा करनी चाहिए।

सियार की बात सुनकर सब जानवर उसकी बातों में आ गए। वे सियार को भगवान का दूत समझकर उसके पास एकत्र होने लगे। हाथी, शेर, बाघ, भालू और बंदर आदि सभी जानवर सियार के पास इकट्ठे होने लगे। वे सब उसे भगवान का दूत समझकर उसको अच्छे-अच्छे खाना देने लगे। सियार को अब बड़ी आसानी से घर बैठे खाना मिलने लगा। उसे अब और क्या चाहिए था!

पर एक दिन सियार का रहस्य खुल गया। चांदनी रात थी। जंगल के जानवर सियार के पास एकत्र थे। तभी जंगल में कुछ सियार एक साथ बोल उठे, “हुआं-हुआं।” पीला सियार वो की अपने आप को भगवान का दूत बोल रहा था, उसे भी न रहा गया। वह भी उनके स्वर में स्वर मिलाने लगा, “हुआं, हुआं, हुआं!” बस फिर क्‍या था? जंगल के प्राणियों को उसका असली रूप पता चल गया। ओरे, यह हो सियार है!

अपने आप को भगवान का दूत बोलकर हम लोगों को फ़सा रहा है। जंगल के प्राणियों ने आगे पीछे न सोचते हुए पिले सियार पर गुस्से से हमला चढ़ा दिया, और पिले सियार को उस दिन अपना जीवन गमाना पड़ा।

ब्राह्मण का सपना (The Brahmin’s Dream Story In Hindi)

एक नगर में एक कंजूस ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिदिन भिक्षा मांग कर अपना गुजारा करता था। भिक्षा से प्राप्त आटे में से वह कुछ आटा खा लेता एवं शेष आटे को घड़े में डाल देता। ऐसा करते करते उसका घड़ा आटे से भर गया। ब्राह्मण ने घड़े को खूंटी में टांग दिया और उसके नीचे ही खटिया डालकर लेटे लेटे ख्वाबी घोड़े दौड़ाने लगा।

उसने सोचा जब देश में अकाल पड़ेगा तो इस घड़े की कीमत ₹100 हो जाएगी। मैं इसे बेच कर दो बकरियां लूंगा। कुछ माह पश्चात मेरे पास बहुत सी बकरियां हो जाएंगी। उन सब को बेचकर मैं एक गाय लूंगा। गायो के बाद भैंस और भैंसो के बाद घोड़े लूंगा।

सभी घोड़ों को महंगे दामों में बेचूगा तो मेरे पास बहुत अधिक सोना हो जाएगा। मैं उसे सोने से एक बड़ा सा घर बनाऊंगा। मेरे पास इतना सोना देखकर कोई भी ब्राह्मण अपनी सुंदर कन्या से मेरा विवाह करवा देगा। उससे जो पुत्र प्राप्त होगा मैं उसका नाम सोमशर्मा रखूंगा।

जब वह थोड़ा बड़ा हो जाएगा तो मैं पुस्तक लिए हुए उसकी बाल लीलाओं का आनंद लूंगा। जब सोम शर्मा मुझे देखेगा और मेरे पास आएगा तो मैं उसकी मां को क्रोध से कहूंगा “संभाल अपने बच्चे को।”

वह घर के कामों में व्यस्त रहेगी और मेरी बात नहीं सुनेगी तो मैं उठकर उसे पैर की ठोकर से मारूंगा। यह सोचते ही ब्राह्मण का पैर ठोकर मारने के लिए ऊपर उठा तो ठोकर घड़े को लगी और घड़ा चकनाचूर हो गया। घड़े के चकनाचूर होते ही ब्राह्मण का सपना भी चकनाचूर हो गया।

दो सिर वाला जुलाहा (The Weaver with Two Heads Story In Hindi)

एक समय एक मंथरक नाम का जुहाला अपने परिवार के साथ रहता था। एक बार उसके सभी उपकरण जिससे वह कपड़ा बुनता था, वह टूट गए। उपकरणों को पुनः बनाने के लिए उसे लकड़ी की जरूरत थी। जुहाला लकड़ी काटने के लिए समुंद्र तट के पास वाले वन में चला गया।

उसने समुद्र तट के पास एक पेड़ देखा जिसकी टहनियां काफी मजबूत थी। उसने सोचा इस पेड़ की टहनियों से मेरे सभी उपकरण गुनाह बन जाएंगे। यह सोचकर वह उस पेड़ को कुल्हाड़ी से काटने लगा। तभी उस पेड़ पर बैठे देव ने कहा “मैं इस पेड़ पर बैठा समुंद्र की हवाओं का आनंद ले रहा हूं। तुम्हें इस पेड़ को नहीं काटना चाहिए। जो लोग दूसरों का सुख छीनते हैं, वह कभी जीवन में सुखी नहीं रह सकते।”

जुहाला बोला “मैं भी इस कार्य को करने के लिए विवश हूं क्योंकि मेरे सारे उपकरण टूट चुके हैं। उन्हें बनाने के लिए मुझे लकड़ी की आवश्यकता है। यदि मैं कपड़ा ना बुन पाया तो मेरा परिवार भूखा मर जाएगा और कपड़ा बनाने के लिए उपकरण चाहिए। तो देव आप किसी दूसरे पेड़ पर आश्रय ले लो।”

जुहाले का उत्तर सुनकर देव प्रसन्न हो गए और बोले “मैं तुम्हारे उत्तर से प्रसन्न हुआ। तुम मेरे से एक वर मांग लो और इस पेड़ को मत काटो।”

जुहाले ने कुछ देर सोचा और कहा “आप मुझे वर मांगने के लिए कुछ समय दीजिए, मैं अपनी पत्नी और मित्र की सलाह लेकर वर मंगूगा।”

देव ने कहा “मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा।”

मंथरक गांव में आया और अपने मित्र नाई से मिला और मंथरक ने अपने मित्र से पूछा “मित्र! मुझे एक देव ने वरदान मागने को कहा है, मैं तुमें पूछने आया हू कि मुझे क्या वरदान मांगना चाहिए।”

नाई ने कहा कि ऐसी बात है तो तुम देव से एक राज्य मांग लो, मैं तुम्हारा मंत्री बन जाऊंगा और हम दोनो सुखी जीवन व्यतीत करेंगे।

मंथरक ने इस बात पर अपनी पत्नी की सलाह लेने की इच्छा जाहिर की तो उसके मित्र ने कहा कि स्त्रियों को तो केवल अपने सुख की इच्छा होती है। किसी भी बात पर स्त्रियों से मंत्रणा करना नीति विरुद्ध है। उन्हें केवल अपने सुख साधन के अलावा कोई बात नहीं सुझती। स्त्री अपने पुत्र को भी इसलिए प्रेम करती हैं ताकि वह भविष्य में उससे सुख देने की कामना करती है।

मंथरक ने नाई की बात नहीं मानी और अपनी पत्नी के पास जाकर इस बात की सलाह ली। मंथरक ने पत्नी से कहा की “मुझे आज एक देव ने एक वरदान मांगने के लिए कहा है। मैंने नाई से सलाह ली तो उसने मुझे एक राज्य मांगने की सलाह दी है। तुम बताओ मैं उस देव से क्या वरदान मांगू?”

पत्नी ने कहा “राज्य चलाना कोई आसान बात नहीं होती है। उसमें हर वक्त कष्ट ही रहता है। किसी दूसरे राज्य से संधि संधि विग्रह होना आदि बहुत से कार्य होते हैं, जिसके कारण राजा अपने परिवार को भी समय नहीं दे पाता। ऐसे राज्य का हम क्या करें जो हमें सुख भी ना दे सके।”

मंथरक ने कहा “प्रिये! तुम्हारी बात सत्य है। भगवान राम को भी राज्य मिलने के बाद सुख की प्राप्ति नहीं हुई थी। तो हमें कैसे सुख प्राप्त हो सकता है। किंतु अब मैं राज्य ना मांगू तो देव से क्या वरदान मांगू?”

पत्नी ने कहा “तुम दो हाथों से जितना कपड़ा बुनते हो। उससे जो धनराशि हमें प्राप्त होती है, वह तो हमारे घर के कार्यों में ही लग जाती हैं। यदि तुम्हारे दो हाथ की जगह चार हाथ हो और एक सिर की बजाय दो सिर हो तो तुम दुगुना कपड़ा बुन पाओगे। जिससे हमारे पास बहुत अधिक धन हो जायेगा। जिसके पास धन होता है, समाज में उसकी कदर होती है।”

मंथरक को उसकी पत्नी की सलाह पसंद आ गई। वह देव के पास गया और बोला “हे देव! आप मेरे को वरदान दो कि मेरे दो सिर और चार हाथ हो जाए।”

देव ने मंथरक को यह वरदान दे दिया। जब वह इस हालत में गांव में आया तो लोगों ने उसे राक्षस समझ लिया और सब उस पर टूट पड़े।

एकता में बल है कहानी

एक समय की बात हैं कि कबूतरों का एक दल आसमान में भोजन की तलाश में उडता हुआ जा रहा था। नीचे हरियाली नजर आने लगी तो भोजन मिलने की उम्मीद बनी। एक कबूतर ने संकेत किया “नीचे एक खेत में बहुत सारा दाना बिखरा पडा हैं। हम सबका पेट भर जाएगा।’

कबूतरों ने सूचना पाते ही उतरकर खेत में बिखरा डेन के पास जाने लगे। सारा दल नीचे उतरा और दाना चुनने लगा। वास्तव में वह दाना पक्षी पकडने वाले एक बहलिए ने बिखेर रखा था। ऊपर पेड पर तना था उसका जाल। जैसे ही कबूतर दल दाना चुगने लगा, जाल उन पर आ गिरा। सारे कबूतर फंस गए।

उन में से एक कबूतर बोला “ओह! यह तो हमें फंसाने के लिए फैलाया गया जाल था। भूख ने हमारी अक्ल पर पर्दा डाल दिया है। हमे सोचना चाहिए था कि इतना अन्न बिखरा होने का कोई मतलब हैं।”

दूसरा कबूतर रोने लगा “हम सब मारे जाएंगे।”

बाकी कबूतर तो हिम्मत हार बैठे थे। एक बुद्धिमान कबूतर ने कहा “सुनो, जाल मजबूत हैं यह ठीक हैं, पर इसमें इतनी भी शक्ति नहीं कि एकता की शक्ति को हरा सके। हम अपनी सारी शक्ति को जोडे तो मौत के मुंह में जाने से बच सकते हैं।”

युवा कबूतर फडफडाया “साफ-साफ बताओ तुम क्या कहना चाहते हो। जाल ने हमें तोड रखा हैं, शक्ति कैसे जोडे?”

बुद्धिमान कबूतर बोला “तुम सब चोंच से जाल को पकडो, फिर जब मैं फुर्र कहूं तो एक साथ जोर लगाकर उडना।”

सबने ऐसा ही किया। तभी जाल बिछाने वाला शिकारी आता नजर आया। जाल में कबूतर को फंसा देख उसकी आंखें चमकी। हाथ में पकडा डंडा उसने मजबूती से पकडा व जाल की ओर दौडा।

शिकारी जाल से कुछ ही दूर था कि वह बुद्धिमान कबूतर बोला “फुर्रर्रर्र!”

सारे कबूतर एक साथ जोर लगाकर उडे तो पूरा जाल हवा में ऊपर उठा और सारे कबूतर जाल को लेकर ही उडने लगे। कबूतरों को जाल सहित उडते देखकर शिकारी अवाक रह गया।

मूर्ख कछुआ और हंस की कहानी (Turtle that fell off the Stick Story In Hindi)

प्राचीन समय में कम्बुग्रीव नाम का एक कछुआ एक तालाब में रहता था। उस तालाब में दो हंस तैरने के लिए आते थे। दोनों हंसों का स्वभाव बहुत ही मिलनसार और हंसमुख था। वे कछुए की मंद चाल और भोलापन देखकर बहुत ही प्रसन्न होते थे। कछुए और हंसो में मित्रता हो गई।

दोनों हंस बहुत ही बुद्धिमान थे। वे कोसों दूर तक उड़ान भरते एवं तरह-तरह के व्यक्तियों को देखते। वे नित्य साईं काल होते ही उस तालाब के पास आ जाते और जो पूरे दिन में दृश्य देखे उसके बारे में कछुए को बताते। कछुआ भी उनकी बातों को बड़े ही गौर से सुनता क्योंकि उसकी मंद चाल होने के कारण वहां तालाब के आसपास ही जा सकता था। हंस कछुए को ऋषि मुनियों की कथा सुनाते। कछुए को बीच में टोका टोकी की बुरी आदत थी।

अपने शांत एवं हंसमुख स्वभाव के कारण हंस कभी भी कछुए की इस आदत का बुरा नहीं मानते। समय बीतता गया और उन तीनों की मित्रता भी घनिष्ठ हो गई।

एक समय वहां पर बड़े जोर का सूखा पड़ा गया। वर्षा काल में एक बूंद भी वर्षा नहीं हुई। तालाब का पानी धीरे-धीरे सूखने लगा। उसमें उपस्थित सभी जीव धीरे-धीरे तड़प तड़प कर मरने लगे। एक समय ऐसा आया कि तालाब का सारा पानी सूख गया। कछुआ इस समस्या के कारण संकट में आ गया। उसने सोचा अगर मैं इस तालाब को छोड़कर अन्यत्र नहीं जाऊंगा तो मेरे जीवन का अंत हो जाएगा।

हंसों को भी इस संकट के कारण अपने मित्र की चिंता होने लगी। उन्होंने कछुए को ढांढस बंधाया और इस समस्या से निपटने का उपाय सोचने लगे। वह बहुत दूर तक उड़ान भरते और इस समस्या का हल ढूंढने लगे।

एक दिन हंस कछुए के पास आए और बोले “मित्र! इस तालाब से पचास कोस की दूरी पर एक बड़ी झील है। वहां बहुत अधिक पानी है वहां तुम आराम से इतना जीवन व्यतीत कर सकते हो।”

कछुआ करुण स्वर में बोला “पचास कोस दूर? मुझे वहां तक जाने के लिए महीनों लग जाएंगे। वहां पहुंचने से पहले ही बीच राह में मेरी मृत्यु हो जाएगी।”

कछुए की बात हंसों को उचित लगी। हंसों ने अपनी बुद्धि का उपयोग करके इस समस्या का भी निदान कर दिया।

वे एक लकड़ी लेकर आये और बोले मित्र लकड़ी के दोनों सिरों को हम दोनों अपने पंजों में पकड़ लेंगे, तुम इस लकड़ी को बीच में से अपने मुंह से पकड़ लेना। इस तरह हम तीनों उड़कर झील तक पहुंच जाएंगे। लेकिन हंसों ने चेतावनी दी की कुछ भी हो जाए पर अपना मुंह नहीं खोलना। मुंह खोल दिया तो वहीं पर गिर जाओगे।

कछुए ने हंसों की बात का समर्थन किया। कछुए ने लकड़ी को बीच से अपने मुंह से पकड़ लिया और हंस उस लकड़ी को लेकर उड़ गए। वह एक कस्बे के ऊपर से गुजर रहे थे। जब कस्बे के लोगों ने आकाश में यह दृश्य देखा तो वे लोग अचंभित रह गए।

आकाश में हो रहे इस अद्भुत दृश्य को लोग एक दूसरे को दिखाने लगे। औरतें बच्चे बूढ़े सभी अपने अपने घरों से बाहर आए और यह दृश्य देखने लगे। कुतूहल के कारण कछुए की नजर कस्बे के लोगों पर पड़ी। वह अपने मित्रों की दी गई चेतावनी को तो भूल गया और चिल्ला पड़ा “देखो हमें कितने लोग देख रहे हैं।”

जैसे ही कछुए ने मुंह खोला उसका संपर्क लकड़ी से टूट गया और वह नीचे गिर गया। नीचे गिरते ही उसकी हड्डी पसली टूट गई।

हाथी और गौरैया (Elephant and Sparrow Story in Hindi)

एक गौरैया अपने साथी के साथ एक पेड़ पर घोंसला बनाकर रहती थी। उस घोसले में उस गौरैया के अंडे थे। गोरैया प्रतिदिन उन अंडो पर बैठकर उनको गर्मी देती थी ताकि वह जल्दी से जल्दी पक जाए और अंडे में से चूजे बाहर आ जाए।

एक दिन की बात है जब गौरैया का साथी भोजन की तलाश में घोंसले से कुछ दूर गया हुआ था और गौरैया अपने अंडों पर बैठी थी तभी अचानक एक मदमस्त हाथी वहां आ पहुंचा।

वह हाथी वहां पर उपस्थित सभी पेड़ों को जड़ों समेत उखाड़ रहा था। हाथी जब गौरैया के पेड़ के पास पहुंचा और उसे भी उखाड़ने की कोशिश की किंतु वह पेड़ विशाल होने के कारण जड़ से तो नहीं उखाड़ पाया किंतु उस पर जो गौरैया का घोंसला था वो टूट कर नीचे गिर गया और उसके सारे अंडे फूट गया।

गौरैया अपने फूटे हुए अंडों को देखकर जोर-जोर से विलाप करने लगी। थोड़ी देर में उसका साथी आ गया। उसने हाथी से बदला लेने और सबक सिखाने की सोची।

वह अपने मित्र कठफोड़वा के पास गया और सारा हाल सुनाया।

गौरैया के पति, कठफोड़वा और उसके दो मित्रों (मधुमक्खी और मेढक) ने हाथी से बदला लेने की योजना बनाई।

सबसे पहले मधुमक्खी ने हाथी के कान में जाकर गाना गुनगुनाना शुरू किया तो हाथी मदमस्त होकर झूमने लगा। तभी कठफोड़वा ने हाथी की दोनों आंखें फोड़ डाली।

उसके बाद मेंढक और उनकी पलटन ने थोड़ी दूर बने दलदल के पास टर-टर करना शुरू किया। हाथी टर-टर की आवाज सुनकर सोचने लगा कि तालाब पास ही में है तो वह टर-टर की आवाज की ओर भागा।

हाथी जैसे ही आगे बढ़ा तो वह दलदल में फंस गया और और मर गया।

बन्दर और लकड़ी का खूंटा (The Monkey and The Wedge Story In Hindi) पंचतंत्र की कहानी

एक बार की बात है किसी शहर के पास एक बड़े मंदिर के निर्माण का कार्य बहुत ही जोरो पर हो रहा था। उस निर्माण कार्य में बहुत संख्या में मजदूर कार्य में लगे हुए थे। वहां पर लड़कियों का काम अधिक होने के कारण वहां पर लकड़ी चीरने के लिए अधिक मजदूर थे।

वहां पर चारों तरफ लकड़ियों के लठ्ठे बिखरे पड़े थे। लठ्ठे और शहतीर चीरने का काम वहां पर हो रहा था। सभी मजदूरों को दोपहर के समय का भोजन करने के लिए हमेशा शहर में जाना होता था, जब सभी मजदूर भोजन करने शहर जाते थे तब वहां पर कोई नहीं होता था।

एक बार जब खाने का समय हुआ तो सभी मजदूर काम को छोड़कर खाना खाने के लिए चले गये। वहां पर एक लकड़ी का लठ्ठा आधा चीरा हुआ रह गया था। उस आधे चीरे हुए लकड़ी के लठ्ठे में मजदूर ने एक कीला फंसा दिया था। मजदूर ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वापस जब काम शुरू हो तो उसमें आरी को आसानी से घुसाया जा सके।

उस समय वहां एक बंदरों का झुण्ड उछल-कूद करता हुआ आया। उस झुण्ड में एक शरारती बंदर भी था जो बिना कारण ही सभी चीजों को छेड़ता रहता था। हर तरह की शरारत करना उसकी एक आदत बन गई थी। उस बंदरों के झुण्ड के राजा ने सभी को यह आदेश दिया कि वहां पर पड़ी चीजों को कोई भी नहीं छेड़ेगा।

राजा के आदेश के अनुसार सभी बंदर पेड़ों की तरफ मुड गये। लेकिन वह शरारती बन्दर सभी की नजरों से अपनेआप को बचाकर वहां पड़े लकड़ियों के लठ्ठे के पास ही रह गया और वहां पर पड़ी लकड़ियों को छेड़ने लगा।

अचानक से उस बंदर की नजर वहां पर पड़े अधचिरे लकड़ी के लठ्ठे पर पड़ी। वह उस लठ्ठे पर जा बैठा और लठ्ठे के बीच में दिए गये कीले को देखने लगा। कीले को देखते-देखते उसकी नजर वहां पर रखी आरी पर पड़ी। उसने आरी को उठाया और वहां पर पड़ी लकड़ियों पर रगड़ने लगा।

जब आरी को लकड़ी से रगड़ा तो उससे किर्रर्र-किर्रर्र की आवाज निकलने लगी। जब उसने यह आवाज सुनी तो उसे गुस्सा आ गया और आरी को वहीं पर ही पटक दिया। किर्रर्र-किर्रर्र की आवाज का बंदरों की भाषा में ‘निखट्टू’ अर्थ होता है। फिर वापस उसी लठ्ठे के बीच फंसे कीले को देखने लगा।

देखते-देखते उसके मन में कौतुहल हुआ कि यदि इस कीले को इस लकड़ी के लठ्ठे के बीच में से निकाला जाये तो क्या होगा? उस शरारती बंदर ने कीले को बाहर निकालने के लिए अपना जोर लगाने लगा। लठ्टे के बीच फंसाया गया कीला तो दो पाटों के बीच बहुत मज़बूती से जकडा गया होता हैं, क्योंकि लठ्टे के दो पाट बहुत मज़बूत स्प्रिंग वाले क्लिप की तरह उसे दबाए रहते हैं।

वह शैतान बंदर अपना पूरा जोर लगाकर उसे हिलाने में लग गया। जोर लगाने पर वह कीला हिलने लगा तो वह बंदर अपनी इतनी शक्ति देखकर खुश हुआ और वह जोर से उस कीले को हिलाकर सरकाने लगा। इस धींगामुश्ती के दौरान बंदर की पूंछ लकड़ी के लठ्ठे के दो पाटों के बीच में आ गई थी, इसका उस बन्दर को पता ही नहीं लगा।

ऐसा करते करते वह उत्साहित हुआ और जोर से एक झटका लगाया। झटका लगाते ही वह कीला बाहर आ गया और दो चीरे हुए भाग एक क्लिप की तरह जुड़ गये और इन दो पाटों के बीच में बंदर की पूंछ आ गई। बंदर जोर से चिल्लाया।

तभी मजदूरों के लौटने का समय हो गया। उसने मजदूरों को आता हुआ देखा और भागने के लिए जोर लगाया। जोर अधिक लगाने के कारण उसकी पूंछ टूट गई। वह चीखता हुआ, अपनी टूटी हुई पूंछ को ले भागा।

हाथी और उसके दोस्त कहानी

सीमापुर गांव के पास एक बड़ा सा जंगल था। उस गांव में बहुत सारे जंगली जानवर रहते थे। उस जंगल में एक अकेला हाथी रहता था, जिसके साथ कोई भी दोस्ती नहीं करना चाहता था। वह अकेला हाथी दोस्तों की तलाश में जंगल में भटकता रहता था।

एक बार हाथी को कुछ खरगोश मिले। “भाई क्या में तुम्हारा दोस्त बन सकता हु?” हाथी ने उनसे अनुरोध किया।

“आप मेरे घर  के अंदर फिट होने के लिए बहुत बड़े हैं। तुम मेरे मित्र नहीं हो सकते”, खरगोश ने उत्तर दिया।

कुछ देर बाद हाथी को कुछ बंदर दिख गए। जब हाथी ने उनसे दोस्ती करने को पूछा तब उन बंदोरोने जवाब दिया “आप बहुत बड़े हैं और पेड़ों पर झूल नहीं सकते हैं जैसा कि मैं करता हूं। इसलिए हम आपके दोस्त नहीं हो सकते।”

फिर हाथी को एक मेंढक मिला और पूछा कि क्या वह उसका दोस्त हो सकता है? “आप बहुत बड़े और भारी हैं। तुम मेरी तरह नहीं कूद सकते। मुझे क्षमा करें, लेकिन आप मेरे मित्र नहीं हो सकते।” मेंढक ने उत्तर दिया।

हाथी निराश होके आगे चला गया। वहाँ उसकी  कुछ लोमड़ियों से मुलाकात हो गयी। और उसे वहां भी एक ही जवाब मिला, कि वह बहुत बड़ा है।

अगले दिन, हाथी ने देखा की जंगल के सभी जानवर डर के मारे  भाग रहे थे। हाथी ने एक हिरण को रोका और पूछा कि क्या हो रहा है और उसने  बताया गया कि एक बाघ सभी जानवरों पर हमला कर रहा है।  हाथी अन्य कमजोर जानवरों को बाघ से  बचाना चाहता था, वह जल्दी से बाघ के पास गया और बोला “प्लीज सर, मेरे दोस्तों को अकेला छोड़ दो। इन्हें न खाएं हम इस जंगल में मिल जुलकर रहते है।” बाघ ने उसकी बात नहीं सुनी और हाथी को अपने रस्ते में जाने को कहा।

बाघ सुनने को राज़ी नहीं था और हाथी को कोई अन्य तरीका भी नहीं दिख रहा था, हाथी ने बाघ को जोरसे लात मार दी और बाघ डर के मारे वहां से भाग गया।

हाथी ने कैसे अपने बहादुरी से बाघ को भगाया ये देखकर सभी जानवर एकजुट हो गए।

नीले सियार की कहानी (The Blue Jackal Story in Hindi)

एक समय की बात है, एक बार एक सियार एक पुराने पेड़ के नीचे खड़ा था कि उसी समय एक जोरदार हवा के झोंके ने उस पुराने पेड़ को नीचे गिरा दिया। इसी कारण वह सियार उस पेड़ के नीचे आ गया और बुरी तरह घायल हो गया।

किसी तरह वहां अपनी जान बचाकर वहां से घिसटता-घिसटता अपनी माद तक पहुंचा। कई दिनों से कुछ ना खाने के कारण उसे बहुत अत्यंत ज्यादा भूख लग रही थी। उसने तभी एक खरगोश देखा, वह उसका शिकार तो करना चाहता था किंतु कमजोर शरीर के कारण शिकार नहीं कर पाया।

आसान शिकार की तलाश में वह पास के गांव पहुंचा और वहां से मुर्गों या मुर्गों के बच्चों की फिराक में इधर-उधर घूम रहा था। तभी गली के कुत्तों ने उसे देख लिया और उसके पीछे भागने लगे। वह अपनी जान बचाकर वहां से भागा पर कुछ देर बाद वह हाफ गया और किसी गली में जाकर छुप गया। पर कुत्ते गली का हर कोना जानते थे, इसीलिए वह उसे खोज लेते हैं और उसके पीछे भागने लगे।

कुत्ते जैसे-जैसे उसके पीछे भाग रहे थे, उनकी संख्या बढ़ती जा रही थी। तभी सियार पास के रंगरेजो की बस्ती में आ गया। कुत्तों की ज्यादा संख्या देखकर वह पास ही पड़े एक रंग के ड्रम में घुस गया। रंगरेज ने उसमें रंग खोल कर रखा था। उसी में वह पूरी तरह घुस गया। सिर्फ सांस लेने के लिए अपनी नाक थोड़ी सी बाहर रखी।

जब उसने देखा कि पास में कोई भी कुत्ता नहीं है, वहां से चले गए हैं, तभी वह उस ड्रम से बाहर आया तब उसने देखा कि वह पूरा नीले रंग में रंग चुका है। फिर वह वहां से जंगल की तरफ चला गया। चलते-चलते उसका रंग पूरी तरह सूख गया। वह जब जंगल में पहुंचा तब उसने देखा कि सभी जानवर उसे देख कर इधर-उधर भाग रहे और उससे डर रहे हैं।

तभी उसके चतुर दिमाग में एक योजना बनी। उसने सोचा कि मैं इस भय का फायदा उठा सकता हूं। फिर उसने सभी जानवरों को रुकने को कहा और वहां एक बड़े चट्टान पर जाकर बोलने लगा कि उसे स्वयं प्रजापति ब्रह्मा जी ने अपने हाथों से यह आलौकिक रंग कर भेजा है और वह जंगल के सभी जानवरों का कल्याण करने आया है। जंगल के सभी जानवर यहां तक की शेर, चीता, भालू, हाथी और कई जानवर उसकी बातें सुन रहे थे।

फिर वह बोलने लगा कि वह सबका भला करेगा, वह ईश्वर का स्वरूप है। उसने कहा कि वह ईश्वर का दूध ककूदूम है। तभी एक शेर बोला कि तुम भगवान के स्वरूप हो हम आपको अपना राजा प्रसंता से स्वीकार करते हैं। हमें आपकी खिदमत करने का मौका मिल रहा है। तभी रंगा हुआ सियार अपना पंजा उठाकर एक राजा की तरह बोलने लगा कि आपकी इस खिदमत से मुझे बहुत प्रसंता होगी।

तभी सियार अपना राज भोजन मंगवाने लगा। कई दिनों तक वह शाही तरीके से भोजन करता और कई आनंद का सुख उठाता। उसके पास दोनों मीडिया उसको खाना खिलाते और एक पास में खड़ा भालू उसे पंखा देता और जब वहां से बाहर जाता तो दो हाथी अपनी सूंड उठाकर बिगुल की तरह जोर से चिगगढ़ता और दो शेर उसके साथ हमेशा अंगरक्षक की तरह चलते उसके दाएं और बाएं तरफ।

उसे जब किसी भी शिकार का मांस खाना होता तब वह बस एक हुक्म कर देता और उसके सामने वह हाजिर हो जाता। कई दिनों तक वह राजा की तरह शासन करता रहा।

उसे एक खतरा था कि उसकी ही जाति के लोग उसे पहचान लेंगे तो उसने उन्हें राजा बनते ही पहले दिन ही जंगल से निकलवा दिया। एक दिन रात को वह अपनी मांद में सो रहा था। तभी उसकी आंख खुली और उसने बाहर झांका तो एक चमकीली रोशनी उसे दिखी, तब वह माद से बाहर आया। तभी उसी के जाति के सियार की टोली पास ही जंगल में अपनी जोर की आवाज से “हूं”हूं”हूं” करने लगे।

तभी वह अपने आप को रोक ना सका और अपनी ही जाति के लोगों के साथ स्वर में स्वर लगाने लगा और वह जोर से “हूं” हूं”हूं” करने लगा। तभी पास ही में शेर और चीता ने उसे देख लिया तभी उन्हें बहुत गुस्सा आया और उस पर झपट पड़े, उसे वही मार डाला।

शिक्षा - परिस्थिति को देखकर झूठ नहीं बोलना चाहिए।

कबूतर का जोड़ा और शिकारी (Dove and the Hunter Story In Hindi)

एक जगह एक क्रूर और निर्दई शिकारी रहता था। रोजाना पक्षियों को पकड़ता और उनको मारकर खा जाता था। इस नित्यक्रम को देखकर उसके परिजनों व उसके चाहने वालों ने उसका त्याग कर दिया। उस दिन के बाद वह जाल एवं लकड़ी के साथ अकेले ही रहने लगा।

एक शाम उस शिकारी के जाल में एक कबूतरी फंसी। वह उस जाल में फंसी कबूतरी लेकर अपने आश्रय की ओर चल पड़ा, तभी आकाश में घनघोर बादल छा गए और जोरदार वर्षा होनी शुरू हो गई। शिकारी आश्रय की तलाश करने में जुट गया, थोड़ी देर इधर-उधर देखने के बाद उसे एक पीपल का वृक्ष दिखाई दिया।

पीपल के वृक्ष के खोल में घुसते हुए उसने कहा “यह जिस किसी का भी आसरा है, मैं उसकी शरण में हूं। जो मेरी इस समय सहायता करेगा, मैं उसका जीवन पर्यंत ऋणी रहूंगा।”

यह आसरा उस कबूतर का था जिसकी कबूतरी शिकारी के जाल में फंसी थी। उस समय कबूतर पत्नी के वियोग से दुखी होकर बिलख रहा था। कबूतर को देखकर कबूतरी का मन हर्षोल्लास से भर गया। वह मन ही मन सोचने लगी “धन्य भाग मेरे जो ऐसे प्रेमातुर पति मिले, मेरा जीवन तो धन्य हो गया। पति की प्रसन्नता से ही हर स्त्री का जीवन सफल हो जाता है।”

यह विचार कर कबूतरी अपने पति से बोली, “हे प्रियवर! मैं आपके सामने ही हूं, इस शिकारी ने मुझे अपने जाल में फंसा लिया है, यह मेरे उदंड कर्मों का फल है। आप मेरे बंधन की चिंता छोड़कर अपने शरण में आए अतिथि की सेवा कीजिए। जो जीव अतिथि की सेवा नहीं करता तो उसके सभी पुण्य कर्म छूटकर अतिथि के साथ चले जाते हैं और सब पाप वही छूट जाते हैं। यह शिकारी हमारे शरणागत है, इसका आथित्य सत्कार करना चाहिए।”

पत्नी की बात सुनकर कबूतर ने शिकारी से कहा “इस घर को अपना ही समझो और बताओ मैं तुम्हारी क्या सेवा कर सकता हूं?”

शिकारी बोला “मुझे सर्दी लग रही है, सर्दी दूर करने का कोई उपाय कर दो।”

कबूतर ने पास में बिखरी हुई लकड़ियां इकट्ठी की और उन्हें जलाने के बाद शिकारी से कहा “तुम आग सेक लो, तुम्हारी सर्दी दूर हो जाएगी।”

अब कबूतर को अतिथि के भोजन की चिंता हुई अपने घोंसले में देखने पर उसे पता चला घोसले में खाने के लिए एक भी दाना नहीं था।

बहुत सोचने के बाद कबूतर ने अपने शरीर से शिकारी की भूख शांत करने विचार किया। यह सोच कर वह आथित्य सेवी कबूतर जलती हुई आग में कूद गया। उसने अपने प्राण देकर अतिथि की भूख को शांत करने का प्रण पूरा किया।

शिकारी ने जब कबूतर के इस बलिदान को देखा तो उसे आत्मग्लानि होने लगी, उसने उस समय से ही शिकार करना छोड़ दिया और जाल में से कबूतरी को भी आजाद कर दिया। पक्षियों को पकड़ने के सभी यंत्रों को तोड़ कर फेंक दिए।

कबूतरी अपने जलते हुए पति को देखकर विलाप करने लगी। उसने सोचा कि “मेरे पति के बिना मेरे जीवन का क्या महत्व, मेरा संसार तो उजड़ गया।”

उसी क्षण पतिव्रता कबूतरी ने भी उसी आग में छलांग लगा ली। इन दोनों का बलिदान देखकर आकाश से पुष्प वर्षा होने लगी। शिकारी ने उसी दिन से प्राणी हिंसा छोड़ दी।

साप और चिड़िया की कहानी

जंगल के एक बड़े से पेड़ की खोल में बहुत सी छोटी-छोटी चिड़िया रहती थी। उसी पेड़ की जड़ में एक साँप भी रहता था। वह चिड़ियों के छोटे-छोटे बच्चों को खा जाता था।

एक बार चिड़िया साँप द्वार बार-बार बच्चों के खाये जाने पर बहुत दुःखी और विरक्त सी होकर नदी के किनारे आ बैठी। उसकी आँखों में आँसू भरे हुए थे | उसे इस प्रकार दुखी देखकर नदी किनारे रहते मेंढक ने पूछा, “क्‍या बात है, आज रो क्‍यों रही हो?”

चिड़िया ने और जोर से रट हुए कहा, “बात यह है कि मेरे बच्चों को साँप बार-बार खा जाता है। कुछ उपाय नहीं सूझता, किस प्रकार साँप का नाश किया जाय। यदि आपके पास कोई उपाय है तो कृपया मुझे बताएं।”

मेंढक ने चिड़िया का एक अच्छे दोस्त ने नाते उसे एक अच्छी योजना दी और कहा, “एक काम करो, मांस के कुछ टुकड़े लेकर नेवले के बिल के सामने डाल दो। इसके बाद बहुत से टुकड़े उस बिल से शुरु करके साँप के बिल तक बखेर दो। नेवला उन टुकड़ों को खाता-खाता साँप के बिल तक आ जायगा और वहाँ साँप को भी देखकर उसे मार डालेगा।”

चिड़िया ने ऐसा ही किया। नेवले ने साँप को तो खा लिया, किन्तु साँप के बाद उस वृक्ष पर रहने वाले चिड़ियों को भी खा डाला। चिड़िया ने उपाय तो सोचा, किन्तु उसके अन्य दुष्परिणाम नहीं सोचे। अपनी मूर्खता का फल उसे मिल गया।

मौसम की तैयारी कहानी

तिलारी वन में ठण्ड दस्तक दे रही थी, सभी जानवर आने वाले कठिन मौसम के लिए तैयारी करने में लगे हुए थे। एक पेड़ पर रहने वाली चिड़िया भी उनमे से एक थी। हर साल की तरह उसने अपने लिए एक शानदार घोंसला तैयार किया था और अचानक होने वाली बारिश और ठण्ड से बचने के लिए उसे चारो तरफ से घांस -फूंस से ढक दिया था।

सब कुछ ठीक चल रहा था कि एक दिन अचानक ही बिजली कड़कने लगी और देखते – देखते घनघोर वर्षा होने लगी। बारिश से ठण्ड भी बढ़ गयी और सभी जानवर अपने -अपने घरों की तरफ भागने लगे। वह चिड़िया भी तेजी दिखाते हुए अपने घोंसले में वापस आ गई, और आराम करने लगी।

उसे आये अभी कुछ ही वक़्त बीता था कि एक बन्दर खुद को बचाने के लिए पेड़ के नीचे आ पहुंचा। चिड़िया ने बन्दर को देखते ही कहा, “तुम इतने होशियार बने फिरते हो तो भला ऐसे मौसम से बचने के लिए घर क्यों नहीं बनाया?”  यह सुनकर बन्दर को गुस्सा आया लेकिन वह चुप ही रहा और पेड़ की आड़ में खुद को बचाने का प्रयास करने लगा।

थोड़ी देर शांत रहने के बाद चिड़िया फिर बोली, “पूरी गर्मी इधर-उधर आलस में बिता दी। अच्छा होता अपने लिए एक घर बना लेते।” यह सुन बन्दर ने गुस्से में कहा, “तुम अपने से मतलब रखो, मेरी चिंता छोड़ दो।”

थोड़ी ही देर में हवाएं भी तेज चलने लगी और अब बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बेचारा बन्दर ठण्ड से काँप रहा था, और खुद को ढंकने की भरसक कोशिश कर रहा था। पर चिड़िया ने तो मानो उसे छेड़ने की कसम खा रखी थी, वह फिर बोली, “काश कि तुमने थोड़ी अकल दिखाई होती तो आज यह हालत नहीं होती। कम से कम अब घर बनाना सीख लेना”

इतना सुनते ही बन्दर गुस्से से तुरंत ही पेड़ पर चढ़ने लगा, और बोला “भले मैं घर बनाना नहीं जानता लेकिन मुझे तोडना अच्छे से आता है” और ये कहते हुए उसने चिड़िया का घोंसला तहस नहस कर दिया. अब चिड़िया भी बन्दर की तरह बेघर हो चुकी थी और ठण्ड से काँप रही थी।

हमेशा अपने काम से काम रखो, यदि आप मदद नहीं कर सकते हैं तो उसे बेकार के उपदेश न दें।

मित्र-द्रोह का फल (Right-Mind and Wrong-Mind Story In Hindi)

प्राचीन समय में हिम्मतनगर नाम के एक गांव में दो मित्र रहते थे, जिनका नाम धर्मबुद्धि और पापबुद्धि था। धर्मबुद्धि सीधा-साधा इंसान था और पापबुद्धि लोमड़ी के समान चालाक व्यक्ति था। एक बार पापबुद्धि के मन में ख्याल आया कि मैं धर्मबुद्धि के साथ राजधानी जाकर धनोपार्जन करू और किसी ना किसी तरीके से वह सारा धन धर्मबुद्धि से हड़प लूँ ताकि मेरे आगे की जीवन यात्रा सुखचैन से कट जाए।

उसने किसी ना किसी तरीके से धर्मबुद्धि को अपने साथ राजधानी चलने के लिए तैयार कर लिया। निश्चित दिन वे दोनों अपने गांव से राजधानी की ओर निकल गए। जाते समय वे अपने साथ खूब सामग्री लेकर गए और राजधानी में मुंह मांगे कीमत पर उसे बेचकर खूब स्वर्ण मुद्राएं इकट्ठी कर ली। दोनों अत्यंत प्रसन्न होकर अपने गांव की ओर लौट गए।

गांव से कुछ दूर पहले पाप बुद्धि ने धर्म बुद्धि से कहा “यदि हम इतना सारा धन एक साथ गांव में ले जाएंगे तो हो सकता है कि गांव वाले हमसे कुछ धनराशि कर्ज के रूप में ले ले या हो सकता है कि कोई चोर इस धनराशि को हमसे चुरा ले।

इसलिए हमें इस धन को किसी सुरक्षित स्थान पर छुपाना चाहिए। इतना सारा धन एक साथ देखने पर तो किसी साधु सन्यासी का मन भी विचलित हो जाता है।

धर्मबुद्धि ने पापबुद्धि की बात पर पुनः सहमति जताई। उन दोनों ने मिलकर जंगल में एक पेड़ के नीचे धन को गड्ढा खोदकर उसमें छिपा दिया और दोनों गांव चले गए। पापबुद्धि ने मौका पाकर जंगल में जाकर सारा धन निकाल लिया।

कई दिन बीत जाने के बाद धर्मबुद्धि पापबुद्धि के पास आया और बोला “भाई मुझे धन की आवश्यकता आन पड़ी है। तो हम दोनों चलते हैं और गाढ़े हुए धन को निकाल लाते हैं।”

पापबुद्धि दोनों उसी स्थान पर पहुंचे जहां पर धन छिपाया हुआ था। जब दोनों ने मिट्टी हटाई तो वहां पर कुछ नहीं था। पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि पर धन चुराने का आरोप लगाया। दोनों में झगड़ा बढ़ता गया। दोनों सुलह कराने के लिए गांव के मुखिया के पास पहुंचे।

दोनों ने मुखिया के सामने अपना अपने पक्ष रखें। मुखिया ने सच्चाई का पता लगाने के लिए दिव्य परीक्षा ली। दोनों को कहा कि आप जलती हुई आग में हाथ डालें। पाप बुद्धि ने इसका विरोध किया और कहा सच्चाई की गवाही तो वन देवता देंगे।

पापबुद्धि ने पहले ही एक खोखले वृक्ष के तने में अपने पिता को बैठा दिया था। जब उस पेड़ के पास पहुंच कर मुखिया ने वन देवता को पूछा कि दोनों में से चोर कौन है तो आवाज आई कि चोर धर्मबुद्धि है।

जब धर्मबुद्धि ने यह सुना तो उसने उस पेड़ के नीचे आग लगा दी। थोड़ी देर पश्चात आग से झुलसने के कारण पापबुद्धि का पिता चिल्लाने लगा और उस पेड़ से बाहर आया। उसने मुखिया के सामने सारा वृत्तांत सुनाया।

मुखिया ने पापबुद्धि को मृत्यु की सजा सुनाई।

शिक्षा: हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए।

हमें अपनों के साथ कभी भी विश्वासघात नहीं करना चाहिए।

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