आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ Moral Stories in Hindi for Class 10 शेयर करने जा रहे है। इन stories आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।आप इन Moral Stories in Hindi for Class 10 को पूरा पढ़े। आपको यह Stories बहुत पसंद आएगी।

Stories in Hindi for Class 10

Stories in Hindi for Class 10 List

सेवा ही सच्चा धर्म है

संत की विनम्रता

चतुर अर्जुन

भेड़िए की योजना

आत्मविश्वास खोने का डर

रिपोर्टर का सवाल

पिल्लों बिक्री

विवेकानंद की परीक्षा

गरीब की दया

अनूठी हिंदी-निष्ठा

दिव्य प्रकाश

बड़ी शिक्षा

यमराज और मौत

चेरोकी इंडियन

चालाक चिड़िया

जिंदगी का आनंद

चॉकलेट का पेड़

प्रेरणादायक कहानी

पक्षियों का राजा

बुज़ुर्ग लोगों की सलाह

मेहनत की कमाई

दिवास्वप्न

सबक

भिखारिन बनी गायिक

भिखारी बना अमीर

ईमानदारी का इनाम

अहंकार-त्याग ही मोक्ष है

मुझे महंत नहीं बनना

धर्मयुद्ध का आह्वान

माँ की निर्भीकता

अहंकार त्यागो

अनूठा वशीकरण मंत्र

बेवकूफ भेड़िया

जादुई बर्तन

चौकीदार कुत्ता

आलसी बेटा

सेवा ही सच्चा धर्म है

पूर्वी बंगाल में जनमे स्वामी प्रणवानंदजी ने 1913 में गोरखपुर पहुँचकर 17 वर्ष की आयु में गोरखनाथ संप्रदाय के आचार्य योगी गंभीरनाथजी से दीक्षा ली। गुरु ने उन्हें उपदेश देते हुए कहा, ‘अपना जीवन धर्म-साधना के साथ साथ पीडितों एवं अभावग्रस्तों की सेवा में लगाना।’

स्वामीजी एक बार अपने स्वर्गीय पिता का पिंडदान करने तीर्थ गए। पंडों के वेश में कुछ अपराधी किस्म के लोगों को उन्होंने श्रद्धालुओं का उत्पीड़न करते देखा। उन्होंने उसी समय संकल्प लिया कि वे तीर्थस्थलों की पवित्रता बनाए रखने के लिए अभियान चलाएंगे।

आगे चलकर ‘भारत सेवा आश्रम संघ’ का गठन करके उन्होंने तीर्थस्थलों की पवित्रता बनाए रखने का अभियान चलाया और पाखंडियों का बहिष्कार कराया।

वर्ष 1921 में तत्कालीन बंगाल के खुलना में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। स्वामी प्रणवानंद अन्य तमाम कार्य बीच में छोड़ अपने शिष्यों के साथ पीड़ितों की सेवा में जुट गए।

उन्होंने सार्वजनिक आह्वान किया, ‘आज पीड़ितों की सेवा से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। इसी तरह, उड़ीसा और पूर्वी बंगाल में बाढ़ आने का समाचार मिलते ही वे वहाँ पहुँचे और पीड़ितों की सेवा की।

आगे चलकर उन्हें ‘युगाचार्य’ के रूप में मान्यता मिली। उन्होंने सेवा संघ के सम्मेलन में घोषणा की, ‘शिक्षा का प्रचार-प्रसार करो, किंतु संस्कारों पर विशेष ध्यान दो पूजा उपासना तभी सफल होगी, जब मानव का आचरण शुद्ध होगा। जिसकी कथनी-करनी एक नहीं है, वह किसी को क्या प्रेरणा देगा?’

संत की विनम्रता

ब्रह्मनिष्ठ संत स्वामी दयानंद गिरि शास्त्रों के प्रकांड ज्ञाता थे। वे अकसर कहा करते थे कि धर्मशास्त्रों का सार यही है कि मनुष्य हर प्रकार के अभिमान से दूर रहकर सदैव विनम्रता का व्यवहार करे।

एक बार स्वामीजी नाथद्वारा (राजस्थान) पहुँचे। श्रीनाथजी के दर्शन के बाद वे भिक्षा (भोजन) प्राप्त करने मंदिर के भंडारे में पहुँचे। वहाँ भोजनालय का प्रबंधक किसी से कह रहा था, ‘आज बरतन साफ करनेवाला कर्मचारी नहीं आ पाया है। ऐसी स्थिति में क्या होगा?’

स्वामीजी ने जैसे ही यह सुना, वे जूठे बरतन साफ करने में जुट गए। भंडारे का व्यवस्थापक और अन्य संतगण उनकी सेवा भावना से बहुत प्रभावित हुए।

उसी शाम मंदिर के सभागार में विद्वानों के बीच संस्कृत में शास्त्र चर्चा का आयोजन था। इसमें अनेक संत और विद्वान् भाग ले रहे थे। स्वामी दयानंद गिरि एक कोने में जा बैठे।

उन्होंने चर्चा के बीच में खड़े होकर विनयपूर्वक कहा, ‘आप लोग प्रश्न का उच्चारण ठीक ढंग से नहीं कर रहे। ‘ उन्होंने शुद्ध उच्चारण भी बता दिया।

मंदिर समिति के अध्यक्ष ने देखा कि यह तो वही संत है, जो थोड़ी देर पहले जूठे बरतन साफ कर रहा था, तो वह हतप्रभ रह गया। जब उसे पता चला कि वह स्वामी दयानंद गिरिजी महाराज हैं, तो वह उनके चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा।

स्वामीजी ने कहा, ‘मैंने श्रीनाथजी के भक्तों के जूठे बरतन धोकर अपने पूर्व जन्म के संचित पापों को ही धोया है। साधु के लिए कोई भी काम बड़ा-छोटा नहीं होता। उसे तो सेवा करने को तत्पर रहना चाहिए। ‘

चतुर अर्जुन

एक दिन अर्जुन और उसका छोटा भाई करण दोनों घर में अकेले थे। उनके पिताजी एक पुलिस अधिकारी थे। वे एक लाल रंग की फाइल घर लाए थे। उसमें सभी कुख्यात आतंकवादियों के बारे में जानकारी थी।

अर्जुन जानता था कि पापा ने वह फाइल एक अलमारी में सुरक्षित रखी हुई है। अर्जुन और करण खेल रहे थे कि तभी दो आतंकवादी उनके घर में घुस आए और बोले, “लाल फाइल कहाँ है?” अर्जुन बड़ा चालाक था।

वह बोला, “शयनकक्ष की अलमारी में ऊपर रखी गई है। मैं वहाँ तक नहीं पहुँच सकता।” दोनों आतंकवादी लाल फाइल को हासिल करने के लिए उस कमरे में गए। जब वे अलमारी में फाइल ढूँढ रहे थे,

तब अर्जुन ने धीरे-से उस कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया और पिताजी को भी फोन कर दिया जल्दी ही उसके पिताजी पुलिस लेकर वहाँ पहुँच गए।

दोनों आतंकवादियों को गिरफ्तार कर लिया गया। इस प्रकार अर्जुन ने अपनी चतुराई से दोनों आतंकवादियों को पकड़वा दिया। सभी ने उनकी खूब सराहना की।

भेड़िए की योजना

एक बार पूरे देश में सूखा पड़ गया। बारिश के अभाव में सभी नदी-नाले सख गए। कहीं पर भी अन्न का एक दाना नहीं उपजा। बहुत से जानवर भूख और प्यास से मर गए। पास ही के जंगल में एक भेड़िया रहता था।

उस दिन वह अत्यधिक भूखा था। भोजन न मिलने की वजह से वह बहुत दुबला हो गया था। एक दिन उसने जंगल के पास स्थित चरागाह में भेड़ों का झुंड देखा। चरवाहा उस समय वहाँ पर नहीं था।

वह अपनी भेड़ों के लिए पीने के पानी की बाल्टियाँ भी छोड़कर गया था। भेड़ों को देखकर भेड़िया खुश हो गया और सोचने लगा, ‘मैं इन सब भेड़ों को मारकर खा जाऊँगा और सारा पानी भी पी जाऊँगा।

फिर वह उनसे बोला, “दोस्तो, मैं अत्यधिक बीमार हूँ और चलने-फिरने में असमर्थ हूँ। क्या तुम में से कोई मुझे पीने के लिए थोड़ा पानी दे सकता है।” उसे देखकर भेड़ें सतर्क हो गई। तब उनमें से एक भेड़ बोली,

“क्या तुम हमें बेवकूफ समझते हो? हम तुम्हारे पास तुम्हारा भोजन बनने के लिए हरगिज नहीं आएँगे।” इतना कहकर भेड़ें वहाँ से भाग गई।

इस प्रकार भेड़ों की सतर्कता के कारण भेड़िए की योजना असफल हो गई और बेचारा भेड़िया बस हाथ मलता ही रह गया।

आत्मविश्वास खोने का डर

जब थॉमस अल्वा एडिसन ने बल्ब का आविष्कार किया, तो उनके सभी सहायक खुश थे। जैसे कि बल्ब आविष्कार करने के प्रयास मैं सफलता पाने से पहले लगभग 1000 बार कोशिश किया था।

एक बार एडिसन ने ऑफिस के लड़के को बुलाया, और उसे बल्ब का परीक्षण करने के लिए कहा। जब वह बल्ब को पकड़ाया था, बहुत घबराया हुआ था।

क्योंकि उसे एडिसन ने यह परीक्षण करने के लिए कहा था। वह इतना घबराया हुआ था कि घबराहट के कारण उसने गलती से बल्ब को गिरा दिया।

लड़का डर गया, कि वह इस तरह के महत्वपूर्ण अविष्कार को तोड़ने के लिए उसे नौकरी से निकाल दिया जाएगा। 2 दिन बाद एडिसन फिर से उस लड़के को अपने केबिन में बुलाया।

सभी सहायक वहां मौजूद थे। एडिसन ने एक और बल्ब का आविष्कार किया, और उस लड़के से बाल का परीक्षण करने के लिए कहा। सभी सहायक आश्चर्य हुआ और उन्होंने कहा,

“अपने उसे फिर से क्यों बुलाया? वह उसे फिर से गिराने की संभावना है। और आपका सारा प्रयास बेकार जा सकता है।” फिर एडिशन ने जवाब दिया।

“मुझे उस बल्ब को फिर से बनाने में लगभग एक दिन लग गया। अगर वह इसे फिर से गिराता है, तो मैं एक दिन में फिर से बल्ब का निर्माण कर सकता हूं।

लेकिन अगर मैं उसे वही काम फिर से नहीं देता, तो वह अपना आत्मविश्वास खो देता। जो कि वापस पाना बहुत मुश्किल है।

शिक्षा: अगर एक बार किसी काम में गलती हो जाते हैं, तो इसे दोबारा ना करने के कारण अपना आत्मविश्वास खो सकता है।

रिपोर्टर का सवाल

एक बार थॉमस अल्वा एडिसन ने बिजली के बल्ब को प्रदर्शन करने के समय, एक रिपोर्टर ने उनसे पूछा।

“आपको 1000 बार असफल होने के बाद सफल होना कैसा लगता है?” एडिसन ने उस रिपोर्टर को जवाब दिया,

“मैं हजार बार असफल नहीं हुआ, बल्कि मैं 1000 तरीका से कोशिश किया उन तरीकों से मैंने बहुत कुछ सीखा है।

आज मेरी सफलता के कारण उन 1000 गलतियां हैं। अगर मैं इतनी बार कोशिश नहीं किया होता, तो शायद में सफलता नहीं पाता।

और मुझे बल्ब बनाने के 1000 तरीका पता है, जिनमें से एक भी काम नहीं करेगी। और एक तरीका है जो 100% काम करेगा।

शिक्षा: जीत उसी को मिलता है जो हार नहीं मानता है।

पिल्लों बिक्री

एक बार एक व्यक्ति खाली सड़क पर पिल्लों को बेचने के लिए, विज्ञापन लगा रहा था बोर्ड को ठीक करने के लिए जब वह आखिरी कील मार रहा था। तो उसे कुछ आवाज महसूस ।

जब उसने पीछे देखा, तो एक छोटा बच्चा वहां खड़ा था। उन्होंने पूछा, “आप क्या चाहते हैं” बच्चे ने उत्तर दिया, “में एक पिल्ला खरीदना चाहता हूं” फिर विक्रेता ने उत्तर दिया,

अच्छा बच्चा, लेकिन यह कुत्ते काफी महंगे हैं, क्योंकि वे बहुत अच्छी नस्ल के कुत्ते से आए हैं। छोटे लड़के ने अपना सिर हिलाया। लेकिन एक पल बाद, अपनी पैंट की जेब में से कुछ सिक्के निकाले।

विक्रेता के पास रखे कहा, “सर मेरे पास केवल ₹50 है क्या इस पैसों से होगा एक पिल्ला?” विक्रेता मुस्कुराया और कहा, “हां!” फिर उसने अपने सभी कुत्ते को बुलाया।

सभी पिल्लों पिंजरे से बाहर आ रहा था, उन्हें देखकर लड़का बहुत खुश हुआ। लड़के ने देखा कि चार पिल्लों के पीछे एक बच्चा पिल्लों था, जो धीरे धीरे जो धीरे धीरे पिल्लों हाउस से बाहर आ रहा था।

और अजीब तरीके से, उस छोटे पिल्ले ने दूसरे के साथ बात करने की कोशिश कर रहा था। लड़के ने उस छोटा पिल्ला की ओर इशारा किया, और कहा, “मुझे वह चाहिए।”

फिर विक्रेता ने जवाब दिया, “बच्चा आप ऐसा नहीं चाहते हैं, क्योंकि वह अन्य पिल्लों की तरह आपके साथ खेल या दौड़ नहीं पाएगा।”

यह सुनकर बच्चे ने यह कदम पीछे गया, और अपने पतलून के अंदर से एक पैर निकाला। जो विशेष रूप से बनाया गए जूते के साथ जुड़ा हुआ था, जिसे बच्चे ने पहना था।

फिर उस बच्चे ने कहा, “सर, मैं खुद भी अच्छी तरह से नहीं चल सकता हूं। और उस पिल्ला को भी किसी ऐसी व्यक्ति की आवश्यकता होगी जो उसकी हालत समझ सकता है।”

शिक्षा: हर किसी की अपनी कमजोरी है, अगर हम विरोध करने की वजह इसे स्वीकार करते हैं। तो हम खुद की कमजोरी से फायदा उठा सकते हैं।

विवेकानंद की परीक्षा

स्वामी विवेकानंद को पूर्व और पश्चिमी संस्कृति दोनों का व्यापक ज्ञान था। उनके पास शानदार बातचीत करने की कौशल, और गहरी आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि थी।

जिसके कारण 1893 में, उन्हें विश्व धर्म संसद में हिंदू धर्म को प्रस्तुत करने के लिए चुना गया था। जो शिकागो में ठीक किया था। शिकागो जाने से एक दिन पहले,

उनकी मां उन्हें रात को खाने के लिए बुलाया। विवेकानंद ने अपनी मां का प्यार के साथ स्वादिष्ट भजन का आनंद लिया। रात को खाने के बाद उसकी मां ने उसे एक कटोरी फल,

और उसे काटने के लिए चाकू दिया। विवेकानंद फल खाने के बाद उसकी मां ने कहा, “बेटा, क्या तुम मुझे चाकू दे सकते हो?” विवेकानंद ने तुरंत अपनी मां को चाकू दे दिया।

चाकू मिलने के बाद, उसकी माँ ने जवाब दिया, “बेटा, तुमने मेरी परीक्षा पास कर ली है। आपकी यात्रा के लिए मेरा आशीर्वाद है।” विवेकानंद मां की प्रतिक्रिया से आश्चर्यचकित थे।

और उन्होंने सवाल किया, “लेकिन मां आपने मेरा परीक्षा कब और कैसे लिया?” उसकी मां ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, जब मैं तुमसे चाकू देने के लिए कहा था, तो तब तुम्हारा परीक्षा था।

तुमने मुझे उसकी धार पकड़ते हुए चाकू दिया। और चाकू का कड़ा मेरी और रख दिया ताकि मुझे चोट ना लगे। इसका मतलब है, आप खुद के बजाय दूसरे के बारे में सोचते हैं।

और ऐसा व्यक्ति, जो दूसरे के भलाई के बारे में सोचता है। उसके पास दुनिया को प्रचार का अधिकार है।

शिक्षा: यह प्रकृति का नियम है। कि आप जितनी अधिक निस्वार्थ होंगे, उतना ही अधिक प्राप्त करोगे।

गरीब की दया

एक बार स्वामी जी राजस्थान में थे। जब लोगों को उसके बारे में पता चला, तो लोग उसके पास जाने लगे। स्वामी जी हर एक व्यक्ति के सवालों का उत्तर दे रहे थे। जो उनके पास आ रहा था।

इस तरह दो दिन और रात बीत गई। स्वामी विवेकानंदजी आध्यात्मिक मामलों के बारे में लोगों से बात करने मैं इतने मशगूल थे, की उन्होंने पानी पीने का भी ब्रेक नहीं लिया।

सभी लोग जाने के बाद, एक गरीब आदमी उसके पास आया और कहा, “स्वामी जी मैंने देखा आप पिछले दो दिनों से सभी लोगों को जवाब दे रहे हैं। और एक बूंद भी पानी नहीं ली है।

इससे मुझे बहुत दर्द हुई है।’ स्वामी जी ने महसूस किया कि गरीब आदमी के रूप में, भगवान उनके सामने प्रकट हुए थे और उन्होंने कहा, “क्या आप मुझे खाने के लिए कुछ दोगी?”

गरीब आदमी पेशे में मोची था। उसने कहा, “मैं आपके लिए रोटी लाना चाहता हूं, लेकिन मैं निचली जाति का हूं।” स्वामी जी ने उत्तर दिया, “कोई बात नहीं,

आप जो भी लाएंगे मुझे खाने में खुशी होगी।” लेकिन उस आदमी को डर था, कि उच्च जाति के लोग उसे सन्नासी को भजन देने के लिए दंडित कर सकते हैं।

लेकिन वह स्वामी जी को सेवा करना चाहते थे। और जल्दी से घर चले गए, और कुछ रोटी लेकर वापस आ गए। स्वामी जी ने उस रोटी को खाया, और गरीब आदमी को धन्यवाद दिया।

इसी बीच कुछ उच्च जाति के लोग ने देखा। वे स्वामी जी के पास गए और कहा, “उस भजन को शिकार करना आपके लिए गलत था।” स्वामी जी ने धीरज से उनकी बात सुनी।

और कहां, “आप लोगों ने पिछले दो दिनों से बिना किसी राहत के मुझसे बात की थी। लेकिन आप लोगों ने गुजरे नहीं किया, कि मैंने कोई भजन और आराम किया है या नहीं।

आप दावा कर रहे हैं कि आप सज्जन व्यक्ति हैं, और आप उच्च जाति के गर्व है। इससे ज्यादा शर्मनाक यह है कि आप इस व्यक्ति की नीच जाति होने की निंदा करते हैं।”

सज्जन उनके व्यवहार से लज्जित थे।

शिक्षा: हमें किसी भी नीच जाति को निंदा नहीं करना चाहिए, क्योंकि हम सब भगवान की संतान हैं।

अनूठी हिंदी-निष्ठा

पंडित मदनमोहन मालवीय स्वदेशी, स्वभाषा और अपने देश की वेश-भूषा के प्रति अनन्य निष्ठा रखते थे। विदेशी भाषा अंग्रेजी की जगह हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित किए जाने के लिए उन्होंने जीवन के अंतिम क्षणों तक प्रयास किया।

वे हिंदी और संस्कृत के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा के भी अच्छे जानकार थे। इसके बावजूद वे हमेशा हिंदी का ही उपयोग किया करते थे। एक बार महामना को एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया।

उन्होंने पहले ही बता दिया था कि वे अंग्रेजी की पद्धति से गाउन पहनकर अंग्रेजी में भाषण नहीं देंगे, बल्कि अपनी प्राचीन वेशभूषा में ही आएँगे, जबकि उन दिनों दीक्षांत भाषण अंग्रेजी में देने की परिपाटी थी।

मालवीयजी ने जैसे ही हिंदी में बोलना शुरू किया कि एक विद्यार्थी खड़ा होकर बोला, ‘श्रीमान्, मैं आपकी भाषा नहीं समझ पा रहा हूँ। यूनिवर्सिटी में तो अंग्रेजी में ही भाषण दिया जाना चाहिए।’

मालवीयजी उसकी बात सुनकर मुसकराए और अंग्रेजी में कहा, ‘मैं अंग्रेजी में भी अपनी बात रख सकता हूँ, किंतु मैंने अपने देश की जनभाषा हिंदी के प्रचार का संकल्प लिया है, उसका पालन करना मेरा धर्म है।

यहाँ मौजूद छात्रों में से अधिकांश हिंदी समझते हैं। अतः मैं हिंदी में ही बोलूँगा।’ उनकी बात सुनते ही प्रायः सभी छात्रों ने कहा, ‘महाराज, हिंदी में ही बोलिए, हम सब उसे ज्यादा सरलता से समझते हैं।’

दिव्य प्रकाश

गुरु नानकदेवजी महाराज के पास एक जिज्ञासु पहुँचा। उसने विनम्रतापूर्वक कहा, ‘बाबा, भगवान् से साक्षात्कार के लिए कोई भक्ति करने को कहता है, तो कोई ज्ञान को साधन बताता है।

आपकी दृष्टि में असली साधन क्या है?’ गुरुजी ने कहा, ‘अहंकार, पाखंड और आडंबर से दूर रहकर किसी भी साधन से ईश्वर की आराधना करके उसे पाया जा सकता है।

निश्छल मन और पवित्र हृदय से की गई भक्ति स्वतः सफल होती है। ईश्वर के प्रति दृढ़ आस्था रखते हुए, सत्य पर अचल रहने और उनके नाम का स्मरण करके उसे सहज ही पाया जा सकता है।’ उन्होंने फिर कहा, ‘साहिब मेरा एको है, एको है भाई। ‘ यानी मेरा ईश्वर एक है। उन्होंने पग-पग पर एक ओंकार की उपासना पर बल दिया।

गुरुजी अपने उपदेश में अकसर कहा करते थे कि अहंकार चाहे जाति का हो या धन का, पद का हो या ज्ञान का – वह मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। अहंकारी व्यक्ति का एक न एक दिन पतन अवश्य होता है। इसलिए आदमी को अपनी विनम्रता का परिचय देना चाहिए। उनका कहना था, ‘ईश्वर ही सत्य है। वह भयरहित और जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त है।’

गुरु नानकदेव ने देश के अनेक राज्यों में जाकर सदाचार और नाम भक्ति का प्रचार किया। तीर्थों में जाकर वे श्रद्धालुओं को अंधविश्वास और गलत मान्यताओं को त्यागने की प्रेरणा देते थे। आज पूरा संसार उनके उपदेशों से प्रेरणा ले रहा है।

बड़ी शिक्षा

बहुत पुरानी बात है 2 दोस्त रहते थे जिनका नाम मोहन और रामू था। दोनों एक गुरुजी के पास शिक्षा ग्रहण करने गए जब वह शिक्षा ग्रहण करके घर आने लगे तब गुरु जी ने उन्हें बुलाया। और कहां तुम्हें घर जाने के लिए एक परीक्षा देना होगा जो भी इस परीक्षा में पास होगा। वह घर जाएगा जो परीक्षा में पास नहीं होगा वह घर नहीं जाएगा।

गुरुजी ने दोनों को एक एक कबूतर दिए और कहा इसे ऐसी जगह ले जाकर मारो जहां तुम्हें कोई ना देख रहा हो। मोहन और रामू दोनों कबूतर लेकर चल दिए रामू कबूतर लेकर एक गुफा मैं जाता है। और आसपास देखता है कोई नहीं होता तो वह कबूतर की गर्दन मरोड़ के मार देता है।

और गुरुजी के पास ले आता है और कहता है गुरु जी मैंने इसे ऐसी जगह मारा है जहां पर कोई नहीं था। अब तो मैं इस परीक्षा में पास हो गया तो मैं घर जा सकता हूं। गुरुजी बोले जब तक मोहन नहीं आ जाता तब तक मैं कोई फैसला नहीं सुनाऊंगा।

पूरा दिन बीत जाता है शाम होने लगती है तभी मोहन आता दिखाई देता है। मोहन आ के गुरु जी को सारी बात बताता है वह कहता है।गुरुजी मुझे ऐसी कोई जगह नहीं मिली जहां मुझे कोई नहीं देख सकता था। इसलिए मैं इस परीक्षा में फेल हो गया अब मैं घर नहीं जा पाऊंगा।

तभी गुरु जी कहते हैं मैं तुम्हें यही तो समझाना चाहता था और तुम काफी अच्छी तरीके से समझ चुके हो। गुरुजी राजू से कहते हैं तुम्हें अभी शिक्षा की जरूरत है राजू को भी लगने लगता है कि उसे भी शिक्षा की जरूरत है।

वाह गुरु जी की सारी बात समझ जाता है और शिक्षा ग्रहण करने के लिए रुक जाता है। गुरुजी मोहन को समझाते हैं की जब भी तुम कोई गलत काम करने जाओ तो एक बात हमेशा याद रखना कि तुम्हें कोई ना कोई देख रहा है।

इस बात का तुम्हें हमेशा डर रहना चाहिए तभी तुम कोई गलत काम करने से पहले 10 बार सोचोगे। मोहन शिक्षा ग्रहण करके अपने घर वापस चला जाता है।

शिक्षा: कोई भी गलत काम करने से पहले 10 बार सोच लेना चाहिए। तुम्हारे हर गलत काम को कोई ना कोई देखता है।

यमराज और मौत

एक गांव में एक हरिया नाम का आदमी था उसे मौत से डर लगता था। वह सोचता था कि मौत पर विजय कैसे प्राप्त करूं। एक दिन उसके घर पर महात्मा आए। हरिया महात्मा जी की बहुत सेवा की जब महात्मा जी जाने लगे।

तो महात्मा जी ने हरिया से कहा मैं तुमसे बहुत खुश हूं मैं तुम्हें एक वरदान देना चाहता हूं। मांगो क्या वरदान मांगते हो हरिया बोला बाबा मुझे अमर होने का वरदान दे दो। महात्मा बोले मैं तुम्हें ऐसा वरदान नहीं दे सकता काफी सोचने के बाद हरिया बोला तो मुझे वरदान दीजिए।

मेरी खटिया पर जो भी बैठे हैं वह मेरी मर्जी के बगैर उठ ना सके।महात्मा जी उसे वरदान देकर चले गए। बहुत समय बीत गया एक दिन यमराज उसे लेने आए और हरिया से कहा। तुम्हारा समय पूरा हो गया है मैं तुम्हें लेने आया हूं। तभी हरिया को महात्मा का वरदान याद आया।

हरिया बोला आप पहली बार हमारे घर आए तो आइए पहले बैठकर आराम कीजिए उसके बाद चलते हैं। यमराज जैसे ही उसकी खटिया पर बैठे हरिया उठकर हंसने लगा। और बोला अब आप मेरी मर्जी के बगैर इस खटिया पर से नहीं उठ सकते।

यमराज बहुत उठने की कोशिश की पर नहीं उठ पाए हरिया उन्हें उस घर में बंद करके चला गया। जाकर अपने खेत पर रहने लगा एक दिन एक लोमड़ी आकर उसकी गाय को काटने लगी। जब वह हम उसे मरने लगा तो हरिया का मारते मारते डंडा टूट गया।

पर लोमड़ी को कुछ नहीं हुआ और भी जंगली जानवर गांव में घुस आए यह देख कर हरिया वहां से भागा और अपने पुराने घर में पहुंचा। जहां यमराज बंद थे वहां हरिया ने यमराज को सब कुछ बताया तब यमराज ने उसे समझाया। कि यह प्राकृतिक नियम है। अगर कोई नहीं मरेगा तो धरती पर बहुत सारे जीव जंतु हो जाएंगे।

धरती का बैलेंस बिगड़ जाएगा। इसलिए जो धरती पर आया है उसे जाना ही पड़ेगा। हरिया को यह बात समझ में आ गई और वह यमराज के साथ चलने को तैयार हो गया।

शिक्षा: मृत्यु सत्य है। मृत्यु प्राकृतिक का नियम।

चेरोकी इंडियन

चेरोकी इंडियन की मर्दानगी में लड़के की दीक्षा के लिए, एक नियम था। इस नियमों के अनुसार, पिता अपने बेटे की आंखों में पट्टी बांधकर जंगल में ले जाता है। और उसे वहीं छोड़ देता है।

वहां लड़के को पूरी रात एक स्टंप में बैठना होते हैं, जब तक सूरज की किरण उसकी चेहरे पर ना पड़ती। आंखों से पट्टी हटाई बिना लड़के को वहां बैठना पड़ता है।

एक बार जब लड़का इस नियमों को पूरा कर लेता है। उस रात बच जाता है, तो वह एक आदमी बन जाता है। एक युवा लड़के को इस नियमों से गुजारना पड़ा।

उसके पिता ने उसे आंखों में पट्टी बांधकर जंगल में ले गए, और एक स्तर पर बिठा दिया। फिर लड़का स्तर पर बैठा था, हवा इतनी तेज थी कि इसमें उनके स्तर को हिला दिया।

वह रात के समय जानवरों की आवाज सुना, तेज हवा की कारण उसने पेड़ को जोर से हिलने का आवाज सुना। वह यह सोच कर बहुत डर गया था, कि कोई उस पर हमला करेगा।

या कोई जानवर उसे खा जाएगा। और आंखों पर पट्टी बांधने के कारण, वह किसी भी तरह के खतरे से खुद को नहीं बचा पाएगा। लड़का बहुत डर गया था, फिर भी वहां स्तर पर बैठा रहा।

क्योंकि वह जानता था, कि केबल एक ही रास्ता है, जिससे वह आदमी बन सकता है। रात में वह युवा लड़का बच गया, सूरज दिखाई दिया और लड़का सूरज की किरणों की गर्म महसूस कर सकता था।

उसने आंखों से पट्टी हटा दी, फिर वह आश्चर्य हो गया। उसने देखा अपने पिता को, उसके बगल में एक स्तर पर बैठे। जब उन्होंने अपने पिता से बात की, तो उन्हें पता चला की उनके पिता पूरी रात वहीं बैठे थे, पूरी रात उन्हें देखते रहे।

शिक्षा: हम कभी अकेले नहीं है, हमारा परिवार हमेशा हमारे लिए है। और हमेशा याद रखें भगवान हमेशा हमारे साथ हैं।

कभी उम्मीद मत छोड़ो

एक बार एक व्यक्ति अपने जीवन का समर्थन करने के लिए नौकरी की तलाश में था। अखबार में उन्होंने देखा कि एक ऑफिस बॉय की नौकरी उपलब्ध है। उन्हें नौकरी की आवश्यकता थी,

इसीलिए उन्होंने ऑफिस बॉय के पद के लिए आवेदन किया। अगले दिन उन्हें साक्षात्कार के लिए ऑफिस में बुलाया गया, मैनेजर ने उनका साक्षात्कार लिया और वह पास हो गए।

मैनेजर ने कहा, “आपको काम मिल गया। अब मुझे अपना ईमेल पता दें, ताकि मैं आपको एक पत्र भेज सकूं।” उस आदमी ने जवाब दिया, “सर, मेरे पास कंप्यूटर नहीं है और ना ही मेरे पास कोई ईमेल पता है।”

मैनेजर ने जवाब दिया, “क्या? आज के समय में यदि आपके पास कोई ईमेल पता नहीं है, इसका मतलब है आप मौजूद ही नहीं है। और आपको यह नौकरी नहीं मिल सकती है।

फिर उस आदमी ने वहां से चला गया। उसे पता नहीं था कि क्या करना है, क्योंकि उसकी जेब में सिर्फ ₹200 बचे हैं। और उन्हें जल्दी कोई और नौकरी मिलने की उम्मीद नहीं थी।

उसे पता नहीं था कि क्या करना है, वह नौकरी के बिना घर नहीं जाना चाहता था। उन्होंने कुछ पल सोचा, फिर उन्होंने सुपर मार्केट गए और उन पैसों से कुछ सब्जियां खरीदें।

फिर उसे बेचने के लिए घर घर गया, शाम तक वह सभी सब्जियों को बेचने में सक्षम था, और अपना पैसे दोगुना कर दिया। इससे उसे एहसास हुआ कि वह इसे रोज बेच सकता है।

तब से वह रोजाना सुबह सुपर मार्केट जाना शुरू कर देता है, और ताजा सब्जी खरीदना है और सारा दिन उसे घर घर जाकर बेचता था। और शाम तक सारी सब्जियां बेच देता था।

उन्होंने हर दिन बहुत मेहनत की और अपने दृढ़ता के साथ, केवल पाँच वर्षों में वह एक स्थापित व्यवसायी बन गए। अब उनके पास डिलीवरी करने के लिए गाड़ियां था।

फिर एक दिन उन्होंने अपने परिवार और खुद के लिए जीवन बीमा करने का फैसला किया। उन्होंने एक बीमा सलाहकार को बुलाया, सभी चर्चा के बाद सलाहकार ने उनसे ईमेल पता पूछा।

उसने जवाब दिया “मेरे पास ईमेल पता नहीं है” सलाहकार आश्चर्यचकित हो गया और कहा, “आपके पास कोई भी ईमेल पता नहीं है, फिर भी आप एक साम्राज्य बनाने में सफल रहे हैं।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं, यदि आपके पास एक ईमेल पता होता तो आप क्या कर सकते थे।” उस आदमी ने एक पल सोचा और जवाब दिया, “तो मैं एक ऑफिस बॉय होता!”

शिक्षा: अगर हम किसी चीज की तलाश करते हैं, और उसे प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तो हमें उम्मीद नहीं खोना चाहिए।

चालाक चिड़िया

एक व्यक्ति ने अपने पालतु चिड़ियों के लिए एक बड़ा-सा पिंजड़़ा बनाया उस पिंजरे के अंदर चिड़िया आराम से रह सकती थीं। वह व्यक्ति प्रतिदिन उन चिड़ियों को ताजा पानी और दाना देता।

एक दिन उस व्यक्ति की अनुपस्थिति में एक चालाक बिल्ली डॉक्टर का वेश धारण कर वहाँ पहुँची और बोली, “मेरे प्यारे दोस्तो पिंजड़े का दरवाजा खोलो। मैं एक डॉक्टर हूँ और तुम सब के स्वास्थ्य परीक्षण के लिए यहाँ आई हूँ।”

समझदार चिड़ियाएँ बिल्ली की चाल को तुरंत समझ गईं। वे उससे बोली, “तुम हमारी दुश्मन बिल्ली हो। हम तुम्हारे लिए दरवाजा हरगिज नहीं खोलेंगे। यहाँ से चली जाओ।” तब बिल्ली बोली,

“नहीं, नहीं। मैं तो एक डॉक्टर हूँ। तुम मुझे गलत समझ रहे हो। मैं तुम्हें कोई हानि नहीं पहुँचाऊँगी। कृपया दरवाजा खोल दो।”

लेकिन चिड़िया उसकी बातों में नहीं आई। उन्होंने उससे स्पष्ट रूप से मना कर दिया। आखिरकार मायूस होकर बिल्ली वहाँ से चली गई।

जिंदगी का आनंद

एक दिन रोहित मोहित से मिला। उसने मोहित से पूछा, “मोहित, जिंदगी कैसी चल रही है? तुम तो बड़े खुश नजर आ रहे हो।” मोहित बोला, “हाँ, अभी कुछ समय पहले मेरी शादी हो गई।”

रोहित बोला, “वाह! ये तो बड़ी अच्छी खबर है। मुबारक हो।” मोहित बोला, “धन्यवाद। वैसे मुझे मुबारकबाद की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मुझे एक काली एवं भद्दी पत्नी मिली जो कि मुझे पसंद नहीं आई।”

रोहित ने दुखी स्वर में कहा, “अरे यार, मुझे पता नहीं था।” “नहीं, नहीं, मुझे किसी बात का दुख नहीं है, क्योंकि मुझे दहेज में एक बड़ा बंगला भी तो मिला,” मोहित ने खुशी-खुशी कहा।

रोहित बोला,”मोहित तुम बड़े किस्मत वाले हो।” “नहीं यार, ऐसा भी नहीं है। दरअसल हुआ यह कि उस बंगले में आग लग गई और बंगला जलकर राख हो गया।” मोहित ने रोहित से कहा।

रोहित ने दुखी स्वर में कहा, “अरे! ये तो वास्तव में बड़ी बुरी खबर है।” मोहित बोला, “नहीं, मैं बंगले के जलने पर खुश हूँ, क्योंकि उसमें मेरी बीवी भी थी। वह भी आग में जलकर मर गई।”

रोहित ने दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया और सोचने लगा, ‘मोहित, तुम कभी भी जिंदगी का आनंद लेने से नहीं चूकोगे।’

चॉकलेट का पेड़

बहुत समय पहले किसी शहर में एक बहुत बड़ा घर था। उस घर में चिंकी और उसके मम्मी पापा रहते थे। उनके घर में एक शांति बाई नाम की नौकरानी काम करती थी। एक दिन शाम को चिंकी के पापा घर आए और चिंकी से बोले अगले हफ्ते तुम्हारा बर्थडे है बताओ तुम्हें क्या गिफ्ट चाहिए।

क्योंकि बोली इस बार हमें एक अलग गिफ्ट चाहिए। उसके पापा बोले बताओ बेटा तुम्हें क्या अलग गिफ्ट चाहिए।कोचिंग की बोली मैं इस बर्थडे में अपने फ्रेंड को बहुत बड़ी पार्टी देना चाहती हूं। चिंकी के पापा ने कहा ठीक है मैं तुम्हारे लिए एक बड़ी पार्टी का इंतजाम कर दूंगा। चिंकी की मम्मी भी शांति बाई से कहती है कि हम अपनी चिंकी का बर्थडे मना रहे हैं तुम भी अपने बच्चों को जरूर लेकर आना।

शांति बाई जब शाम को घर गए तो वह अपने बेटे गट्टू से बोली कि कल चिंकी का बर्थडे है और मालकिन ने तुम्हें बर्थडे पार्टी में बुलाया है। अगले दिन शांति बाई और उनका बेटा गुड्डू पार्टी में पहुंचे। इतनी बड़ी पार्टी देखकर गट्टू बोला इतनी बड़ी पार्टी तो मैंने जिंदगी में नहीं देखी। चिंकी ने केक काटा और सब ने केक खाया और कोल्ड ड्रिंक पिया फिर चिंकी रिटर्न गिफ्ट में सबको चॉकलेट दिया।

गट्टू को जब चॉकलेट मिला तब वह सोचने लगा कि आज तो मैंने बहुत कुछ खाया है। इसे कल खाऊंगा और अपनी मां के साथ घर वापस आ गया। अगले दिन जब वह स्कूल से आया तब उसे चॉकलेट की याद आई वह चॉकलेट खाने के लिए जैसे ही मुंह में डाला वैसे ही चॉकलेट बहुत अच्छा लगा तो वह सोचने लगा।

अगर मैं पूरा आज ही खा जाऊंगा तो कल क्या खाऊंगा। यह सोचकर वह बोला कि मैं इसे थोड़ा थोड़ा रोज खाऊंगा। कुछ दिन बाद उसके पास थोड़े ही चॉकलेट बचे। तो वह काफी उदास हो गया। वो रास्ते में चलते एक जामुन के पेड़ को देखता है। और सोचता है कि मैं भी एक चॉकलेट का पेड़ लगा सकता हूं। बस मुझे चॉकलेट को जमीन में डालकर उस पर पानी ही तो देना है।

ऐसा सोचकर वह घर पर जाता है और चॉकलेट को लेकर एक कट्ठा खनके उसमें डाल कर पानी डाल देता है। और मन ही मन खुश हो कर हंसने लगता है। तभी एक बुजुर्ग आदमी वहां से जा रहा होता है और उसे ऐसे हंसते हुए देख कर पूछता है क्या बात है बेटा तो गट्टू कहता है कि यहां पर मैं चॉकलेट का पेड़ होगा ।

मैंने इस गड्ढे में चॉकलेट डाला है। उसके बात सुनकर बुड्ढा आदमी उसे समझाता है। बेटा तुमने लालच के चक्कर में जो चॉकलेट तुम्हारे पास था वह भी तुमने खो दिया।

शिक्षा: लालच बुरी बला है हमें लालच नहीं करना चाहिए।

प्रेरणादायक कहानी

एक बार की बात है, एक स्कूल में कक्षा पुराने तरीकों से गर्म किया जाता था। एक छोटा लड़का सबसे पहले गर्म कक्षा शुरू करने के लिए स्कूल आते थे।

लेकिन एक दिन सुबह जब बाकी सब स्कूल पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि स्कूल आग में जल रही थी। उन्हें एक बेहोश लड़का अंदर मिला, और उसे बाहर लेकर आया।

लड़के के शरीर आग में जल गई थी। और उसे अस्पताल ले जाया गया। जब लड़का अस्पताल में बिस्तर पर पड़ा था, तो उन्होंने डॉक्टर से अपनी मां को बात करते हुए सुना।

“कि लड़के का शरीर बुरी तरह से जल गया है, उसके बचने का उम्मीद नहीं है।” लेकिन बहादुर लड़का मरना नहीं चाहता था। और किसी तरह चिकित्सक को चकित करने के लिए वह जीवित था।

फिर कुछ दिन बाद, लड़के ने फिर से डॉक्टर और उसकी मां की बातचीत सुनी। मां को बताया गया था कि, “आग की वजह से उनके शरीर के निचले हिस्से का अधिकांश हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था।

और उसके निचले अंग अपंग हो गए थे।” बहादुर लड़के ने उम्मीद नहीं खोई, फिर से चलने के लिए निर्धारित किया। लेकिन दुर्भाग्य से उसके पैर पतला हो गया।

वह अस्पताल से रिहा हो गया, और अपनी मां के साथ वापस घर चला गया। प्रतिदिन मां उसकी पैरों की मालिश करती थी, लेकिन उन्होंने लंबे समय तक अपने पैरों में कोई सनसनी महसूस नहीं की।

फिर भी वह दृढ़ था कि एक दिन वह जरूर चल पाएगा। उसकी मां उन्हें व्हीलचेयर पर घर से बाहर निकल दिया करती थी, ताकि कुछ तेजी हवा उसे मिल सके।

एक दिन व्हीलचेयर में बैठने की वजह, उसने खुद को नीचे घास में फेंक दिया। और अपने सिर्फ दोनों हाथ की मदद से पूरे शरीर को खींचता गया।

खतरे में, वह खुद को बाड़ के साथ खींचने लगा, तय किया था कि वह चलेंगे। अंततः दैनिक मालिश और उनके दृढ़ संकल्प के माध्यम से उन्होंने खड़े होना।

और फिर से चलने की अपनी क्षमता विकसित की। फिर उन्होंने खुद से चलना शुरू किया, और फिर दौड़ने लगे। उन्होंने अपने स्कूल जाना शुरू किया।

और फिर बाद में कॉलेज की एक टीम में शामिल हुआ। बाद में मेडिसिन स्क्वायर गार्डन में अनुसूचित व्यक्ति, डॉक्टर ग्लेन कनिंघम ने दुनिया में सबसे तेज मील दौड़ाया।

ग्लेन कनिंघम जीवित रहने की उम्मीद भी नहीं थी, जो कभी भी दौड़ने की उम्मीद नहीं कर सकता था। और बह 1934 को विश्व रिकॉर्ड तोड़कर 4:06:08 मिनट में मील चला।

शिक्षा: आप अपने दिल की जो भी इच्छा प्राप्त कर सकते हैं। जब आप इसके लिए पर्याप्त प्रयास करते, और अपने आप को निर्देशित करने की अनुमति देते।

पक्षियों का राजा

एक बार जंगल में सभी पक्षी इकट्ठा हुए और फैसला किया कि, उन पक्षियों के बीच एक राजा होना चाहिए। लेकिन पक्षियों का राजा कौन बनेगा? तब मैना को एक विचार आया।

उसने सुझाव दिया, “हम सभी पक्षियों के बीच एक प्रतियोगिता रखें। और जो सबसे ऊंची उड़ान भरता है, उसे सभी पक्षियों के राजा माना जाएगा।”

सभी पक्षियों को यह विचार पसंद आया। पक्षियों ने इसके लिए सहमति बनाई, एक ईगल जो वहां मौजूद था। अपने बड़े शरीर के बारे में दावा करना शुरू कर दिया। और कहा,

“मैं सभी पक्षियों में सबसे ज्यादा मजबूत हूं। और आप सभी जानते हैं, कि केवल मैं ही हूं जो उच्चतम उड़ान भर सकता है। तो फिर प्रतियोगिता क्यों? मुझे अब राजा क्यों नहीं माना जाए।”

“लेकिन संभावना है कि आप शायद जीत नहीं सकते।” थोड़ी आवाज की। ईगल चारों ओर मुड़कर देखा कि यह किसने कहा। वह आश्चर्य था क्योंकि एक छोटा गौरैया यह कहा था।

मजाकिया स्वर में ईगल ने कहा, “अरे मुझे कौन हारा रहे हैं, आप?” गौरैया ने कुछ नहीं कहा, बाद में सभी पक्षी प्रतियोगिता के लिए तैयार हो गया।

जैसे ही एक उल्लू ने संकेत दिया, सभी पक्षी हवा में उड़ने लगे। लेकिन वे बहुत अधिक और लंबे समय तक नहीं उड़ सके, एक एक करके सभी पक्षी प्रतियोगिता से बाहर हो गए।

केवल ईगल ऊंचाई में उड़ रहा था, हमेशा की तरह। फिर ईगल ने नीचे देखा कि सभी पक्षियों ने हार मान ली है। उन्होंने कहा, “मैं तो पहले ही कहा था, केवल मैं ही हूं जो सबसे ऊंची उड़ान भर सकता है।

अब आप सभी सहमत हैं कि मैं पक्षियों का राजा हूं।” ईगल को पता नहीं था, कि नन्हा गौरैया उनकी पंखों के नीचे उड़ रहा है। जिस क्षण उसने रुका, नन्हा गौरैया बाहर निकल गया।

वह ईगल के सिर के ठीक ऊपर उड़ गया, और चिल्लाया, “नहीं नहीं मिस्टर ईगल भाई, मैं सभी पक्षियों का राजा हूं। देखो मैं तुमसे ज्यादा ऊंचाई पर हूं।

सभी पक्षी गौरैया से सहमत थे, किसी भी मामले में गर्वित ईगल को प्रतियोगिता में हड़ता हुआ देखकर सभी खुश थे। फिर सभी पक्षियों ने ईगल को अपना राजा चुना।

शिक्षा: अगर कुछ कार्य आपकी क्षमता से अधिक मजबूत है, तो इसका मतलब यह नहीं है, आपको कोशिश करने से पहले छोड़ देना चाहिए। इसके बजाय आपको सोच समझकर कोशिश करनी चाहिए।

बुज़ुर्ग लोगों की सलाह

प्राचीन काल की बात है, एक बार एक देश के युवा राजा यह सोचते थे, कि बूढ़े लोग अनावश्यक होते हैं। और कोई भी काम करने में असमर्थ होते हैं, वे देश का बोझ होते हैं।

उनके दरबारों में सभी युवा लोग शामिल थे, और वे उनसे सहमत थे। फिर जल्द ही राजा ने आदेश दिया कि, 60 से ऊपर के सभी लोगों को मार देना चाहिए क्योंकि वे अपना जीवन जी चुके हैं।

इसीलिए देश के सभी बूढ़े लोगों को मार दिया गया। एक युवक रहता था, जो अपने पिता को बहुत सम्मान और प्यार करता था। और वह नहीं चाहता था उसकी पिता को मार दिया जाए।

इसीलिए सैनिक आने से पहले, उसने अपने पिता को एक तहखाने में छुपा दिया। कुछ वर्षों के बाद, देश एक भयानक सुखा से निकल गया। और लोगों को बीमारी का सामना करना पड़ा।

अकाल इतना भीषण था, चावल के भंडार पूरी तरह से समाप्त हो गए थे। और बीज का एक भी दाना जमीन में बोने के लिए नहीं बचा था। वह युवक जो अपने पिता को छुपाया था।

जब परेशान होते थे, वह सलाह लेने के लिए पिता के पास जाता था। इसीलिए इस बार भी वह अपने पिता के पास गया, और उस स्थिति के बारे में बताया। पिता ने कुछ देर सोचा और कहा,

“चिंता मत करो, अपना हल निकालो और हमारे घर के सामने का रास्ता नैयार करो।” फिर युवक ने ऐसा ही किया. बारिश के बाद अंकुर बाहर आना शुरू हो गया।

जो वक्त यह देखकर हैरान रह गया, कि बिना बीज बोये थी अंकुर निकाला आया। राजा को इस बारे में पता चला, उसने युवक को अपने दरबार में बुलाया। युवक हिचकिचाना और फिर राजा से कहा,

उनके पिता ने उसे ऐसा करने की सलाह दी है। राजा यह जानकर स्तब्ध रह गया, कि देश में सभी बूढ़े लोगों को मार दिया गया। फिर राजा ने उसके पिता को दरबार में बुलाया।

क्योंकि वह इसके कारण पूछना चाहता था। बूढ़े आदमी ने आकर उससे कहा, महाराज वहां गेहूँ था, क्योंकि मैं जानता था लोग उस रास्ते से फसल ले जाते थे। और कुछ बीज गिर जाते थे।

मुझे यकीन था कि कुछ बीज नीचे पड़े हो सकते हैं। और जुताई करके हम कुछ फसलें प्राप्त कर सकते हैं। यह सुनकर राजा को अपनी गलती का एहसास हुआ।

इस घटना के बाद देश के सेनाओं ने बूढ़े लोगों को नहीं मारा। वे उन्हें प्यार करते थे और उनका सम्मान करते थे। उन्हें देश के लिए एक मूल्यवान खजाना मानता है।

शिक्षा: बूढ़े लोग ज्ञान के भंडार है, उनकी बुद्धि और अनुभव हमें कठिनाई से बचने में मदद करते हैं। हमें उनका सम्मान और प्यार करना चाहिए।

मेहनत की कमाई

सोनू एक आलसी लड़का था। वह अपना समय यूँ ही आवारागदी करने में व्यतीत करता था। इस कारण वह हमेशा कार्य करने से जी चुराता था। एक दिन उसे पैसों से भरा एक थैला मिला।

वह अपने भाग्य पर बहुत खुश हुआ। वह यह सोच-सोचकर खुश हो रहा था कि उसे बिना प्रयास के ही इतने सारे पैसे मिल गए। सोनू ने कुछ पैसों से मिठाई खरीदी, कुछ पैसों से कपड़े व अन्य सामान खरीदा।

इस प्रकार उसने पैसों को व्यर्थ खर्च करना प्रारंभ कर दिया। तब उसकी माँ बोली, “बेटा, पैसा यूँ बर्बाद न करो। इस पैसे का उपयोग किसी व्यवसाय को शुरू करने में करो।” सोनू बोला, “माँ मेरे पास बहुत पैसा है।

इसलिए मुझे कार्य करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।” धीरे-धीरे सोनू ने सारा पैसा खर्च कर दिया अब उसके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी।

इस तरह वह एक बार फिर अपनी उसी स्थिति में आ गया। सोनू को एहसास हुआ कि यदि उसने वह धन परिश्रम से कमाया हुआ होता तो उसने अवश्य उसकी कद्र और उपयोगिता समझी होती।

दिवास्वप्न

एक प्रसिद्ध ज्योतिषी था। वह हमेशा सूर्य-चन्द्रमा.ग्रह-नक्षत्रों की दशा देखकर लोगों का भविष्य बताने में व्यस्त रहता था। कभी-कभी तो वह चलते हुए भी आकाश को देखने में इतना व्यस्त रहता कि उसे होश ही नहीं रहता था कि उसके कदम कहाँ पड़ रहे हैं।

एक दिन वह अन्य दिनों की तरह आकाश को देखता हुआ चला जा रहा था। उसे रास्ते में पड़ा एक बड़ा पत्थर नहीं दिखा। उसे जोर की ठोकर लगी और वह कंटीली झाड़ियों में जा गिरा।

कुछ राहगीरों ने उठने में उसकी सहायता की। उन्होंने ज्योतिषी से पूछा, “तुम इन कंटीली झाड़ियों में कैसे गिर गए?” तब ज्योतिषी ने उन्हें पूरा घटनाक्रम सुना दिया। उनमें से एक राहगीर बोला,

“तुम भविष्यवाणी करते हो, किंतु तुम्हारी आँखों के सामने क्या है, ये तुम्हें दिखाई नहीं देता, ये बड़े आश्चर्य की बात है। तुम्हें सपनों की दुनिया से बाहर निकलकर वास्तविक दुनिया में जीना चाहिए।”

यह सुनकर ज्योतिषी को बड़ी शर्म महसूस हुई और उसने ये सबक पूरी जिदगी याद रखा।

सबक

एक समय की बात है। एक आश्रम में रवि नाम का एक शिष्य रहता था। वद बहुत अधिक नटखट था। वह प्रत्येक रात आश्रम की दीवार फॉँदकर यहाँ-व और बाहर जाने की बात कोई नहीं जानता।

सुबह होने से पहले लौट आया। वह सोचता था कि उसके आश्रम से घूमता लेकिन उसके गुरुजी यह बात जानते थे। वे रवि को रंगे हाथ पकड़ना चाहते थे। एक रात हमेशा की तरह रवि सीढ़ी पर चढ़ा और दीवार फॉदकर बाहर कूद गया।

उसके जाते ही गुरुजी जाग गए। तब उन्हें दीवार पर सीढ़ी लगी दिखाई दी। कुछ घंटे बाद रवि लौट आया और अंधेरे में दीवार पर चढ़ने की कोशिश करने लगा। उस वक्त उसके गुरुजी सीढ़ी के पास ही खड़े थे।

उन्होंने रवि की नीचे उतरने में मदद की और बोले, “बेटा, रात में जब तुम बाहर जाते हो तो तुम्हें अपने साथ एक गर्म साल अवश्य रखनी चाहिए।

गुरुजी के प्रेमपूर्ण वचनों का रवि पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने अपनी गलती के लिए क्षमा माँगी। साथ ही उसने गुरु को ऐसी गलती दोबारा न करने का वचन भी दिया।

भिखारिन बनी गायिक

कृष्ण पुर गांव की बात है। एक मालिका नाम की औरत अपने पति और बेटे और बहू के साथ रहती थी। एक दिन पति का देहांत हो जाता है तब सारी जिम्मेदारी बेटे पर आ जाती है। बेटे के पास कोई नौकरी ना होने के कारण बेटा परेशान हो जाता है।

एक दिन उसकी पत्नी ने कहा चलो हम शहर चलते हैं वहां तुम्हें कोई काम जरूर मिल जाएगा। बेटा और बहू अगली सुबह शहर जाने लगते हैं बेटा अपनी मां मालिका से बोलता है। मा काम की तलाश में शहर जा रहा हूं। और दोनों वहां से मालिका को छोड़कर शहर चले जाते हैं।

बहुत दिन बीत जाते हैं पर उनका कोई पता नहीं चलता और मालिका के पास भी कुछ खाने को नहीं रहता। इसलिए मालिका लोगों से भीख मांगना शुरू कर देती है। पर उसे ढंग से खाने तक को नहीं मिल पाता था वह गाने की शौकीन थी। और अच्छा गाती थी।

तो मालिका लोगों को गाना सुना कर भीख मांगने लगी तो उसे खाने-पीने को मिल जाता था। और लोगों को उसका गाना बहुत पसंद आता था लोग उसका गाना सुनने आते थे। एक दिन जब वह रेलवे स्टेशन पर गा रही थी तब एक डायरेक्टर ने उसका गाना सोना।

और उसके पास गया और बोला माताजी आप बहुत अच्छा गाती हैं क्या आप मेरी फिल्म में गाएंगे। डायरेक्टर मालिकों को लेकर मुंबई गया और अपने फिल्म में गाने दिए। जब गाना रिलीज हुआ तब बहुत लोगों ने गाना की सराहना की और गाना सुपरहिट हो गया।

अब मालिका हार टीवी चैनल न्यूज़ चैनल पर छा गई। क्या देख कर उसकी बहू के मन में लालच आ गया। उसके बेटे से बोली आखिर मां जी का इस दुनिया में हमारे सिवा कौन है। चलो माजी के पास चलते हैं दोनों जब मालिका के घर आए तब उन्हें बॉडीगार्ड ने उनसे मिलने से मना कर दिया।

पर मालिका अपने बेटे की आवाज सुनकर दौड़ती हुई बाहर आई और गले से लगा लिया। बहू और बेटे को अपनी गलती का एहसास हो गया । मा फिर भी उन्हें अपना ली क्योंकि मां तो मां होती है।

शिक्षा: माता पिता को छोड़कर नहीं जाना चाहिए। मां का प्यार अनमोल है।

भिखारी बना अमीर

एक शहर में एक छोटा बिजनेसमैन रहता था उसका काम अच्छा चल रहा था। वह रोज अपने शहर से दूसरे शहर बिजनेस के बस से जाता था। एक दिन वह बस स्टैंड पर बस का इंतजार कर रहा था तब वहां पर एक भिखारी आया।

और बोला कई दिनों से भूखा हूं मुझे कुछ खाने के लिए पैसे दे दो भगवान आपका भला करेगा। छोटा बिजनेस मैन बोला तुम्हें भीख मांगने के सिवा कोई काम नहीं है क्या। अगर मैं तुम्हें पैसे दूंगा तो तुम बदले में क्या दोगे।

भिखारी बोला मेरे पास तो देने को कुछ नहीं है पर मैं इसके बदले आपको दुआ दे सकता हूं। बिजनेस मैन बोला नहीं चाहिए तुम्हारी दुआ मेरा बिजनेस अच्छा चल रहा है। यह बोल कर वहां से चला गया तब भिखारी सोचने लगा।

बात तो सही है मेरे पास देने को कुछ भी नहीं है तभी उसे सामने कुछ फूल के पेड़ दिखाई दिए। वह उन फूलों को तोड़ कर चल दीया अब उसे जो लोग पैसे देते उन्हें वह फूल देता। जब लोगों को भूल लेने लगा तो उसे पैसा देने में नहीं हिचकीचाते थे।

अब वह उन पैसों से कुछ अच्छे फूल खरीदता और उसे भेजता। ऐसा करते करते वह अब फूल का अच्छा खासा बिजनेस खोल देता है। एक दिन वह छोटा बिजनेस मैन वही से गुजर रहा था और बड़ा परेशान था। भिखारि जो फूल का बिजनेस कर रहा है। उसे देख कर उसके पास जाता है।

और कहता है आपने मुझे पहचाना नहीं छोटा बिजनेस मैन बोला नहीं भाई आप कौन हो। फूल वाला बोला कोई बात नहीं बड़े परेशान लग रहे हो। छोटा बिजनेस मैन बोला हां भाई बिजनेस में लॉस हो गया है। भगवान के मंदिर जा रहा हूं उनसे दुआ करने शायद कोई चमत्कार हो जाए।

फूल वाला बोला है फूल लेते जाओ भगवान को समर्पित करना।

छोटा बिजनेस मैन बोला भाई मेरे पास सिर्फ ₹10 हैं पर मैं तुम्हें वह भी दे दूंगा। तो मैं इंटरव्यू के लिए नहीं जा पाऊंगा। तुम्हारे फूल के बदले देने की लिए मेरे पास कुछ नहीं है।

फूल वाला बोला मुझे इसके बदले पैसे नहीं चाहिए बस दुआ दे देना। उसकी बात सुनकर छोटे बिजनेसमैन को सारी बातें याद आ गई। उसे बहुत पछतावा हुआ और माफी मांगी। फिर पूछा तुम तो भिखारी थे फिर तुम फूल की इतने बड़े कारोबार कैसे करते हो।

फूलों वाला बोला आप नहीं तो बताया था के कोई अगर तुम्हें कुछ देता है तो उसके बदले उनसे भी कुछ देना चाहिए। तो मैं सबको भूल देना शुरु कर दिया और आज मैं फूलों का बिजनेस करता हूं। अगर आप भी ऐसे किसी व्यक्ति को भीख मांगते देखते हैं।

जो कुछ करने में समर्थ हो तो आप उसकी सहायता करें और बताएं। कि तुम कुछ काम धंधा करके पैसे कमाओ भीख क्यों मांगते हो। और उसे ऐसा करने में सहायता करें।

शिक्षा: हर इंसान की सहायता करें। काम करने मैं समर्थ व्यक्ति को भीख मांगने रोके

ईमानदारी का इनाम

एक गांव में एक बाबूलाल नाम का पेंटर रहता था वह बहुत गरीब था। लेकिन वह अपने काम को बहुत लगन से करता था। वह अपनी छोटे-छोटे कामों में भी बहुत इमानदार था। वह दिन भर काम करके भी सिर्फ दो वक्त की रोटी ही कमा पाता था। एक दिन उसे गांव के जमींदार ने बुलाया और कहां तुम्हारे लिए एक काम है।

बाबूलाल बोला बताइए जमींदार जी क्या काम है। जमींदार बोला हमारी एक नाव पेंट करनी है। बताओ कितना रुपए लोगे। बाबूलाल बोला एक नाव के 1500 रुपए लगते हैं। बाकी आप जो समझे। जमींदार बोला ठीक है नाव अच्छी पेंट करना। बाबूलाल जब नाव पेंट कर रहा था तब उसे नाव में एक छेद दिखाई दिया।

छेद को देकर बाबूलाल सोचने लगा कि अगर यह नाव पानी में गई तो डूब जाएगी। हमें पहले इस छेद को बंद कर देना चाहिए। और वह छेद को किसी तरह बंद किया। और फिर पेंट करके जमींदार को देखने के लिए बुलाया। जमींदार नाव को देखकर बहुत खुश हुआ। और बोला नाव तुमने बहुत अच्छा पेंट किया है।कल सुबह आकर पैसे ले जाना।

बाबूलाल और जमींदार अपने-अपने घर चले जाते हैं । अगली सुबह जमींदार का परिवार नाव लेकर घूमने चला जाता है। तभी जमींदार का नौकर वहां पर आता है और परिवार को ना देख कर जमींदार जी से परिवार के बारे में पूछता है। तब जमींदार जी बताते हैं कि वह लोग नाव से घूमने गए।

इस पर नौकर बोलता है नाव मैं तो छेद था। नाव डूब जाएगी। तभी उनका परिवार घूम का घर आ जाता है परिवार को देखकर जमींदार जी चैन की सांस लेते हैं। जमींदार समझ जाते हैं कि बाबूलाल ने हीं उस छेद को बंद किया है। बाबूलाल जब पैसे लेने आता है तब जमींदार उसे काम से अधिक पैसे देता है।

जब बाबूलाल पैसे गिनता है तो जमींदार जी से कहता है। शायद आपने गलती से हमें ज्यादा पैसे दे दिए हैं जमींदार जी कहते हैं नहीं तुम्हारे मेहनत के पैसे हैं। बाबूलाल बोलता है हमारी बात तो 1500 रुपए में हुई थी। यह तो 6000 है। तब जमींदार जी बोलते हैं। नाव के छेद को तुम ने बंद किया।

जिसके बारे में मुझे नहीं पता था। आज सुबह जब मेरा परिवार नाव ले के गया। तो वह डूब सकता था। पर तुम्हारे छेड़ बंद करने की वजह से हमारे परिवार की जान बची है। इसलिए तुम सारे पैसे ले लो। यह तुम्हारी मेहनत की कमाई है। बाबूलाल जमींदार जी को धन्यवाद दिया और खुशी से अपने घर चला गया।

शिक्षा: हमें अपना काम इमानदारी से करना चाहिए। इमानदारी का फल जरुर मिलता है।

अहंकार-त्याग ही मोक्ष है

महान् भागवताचार्य स्वामी अखंडानंद सरस्वतीजी महाराज कर्णवास (उत्तर प्रदेश) में गंगातट पर आश्रम में ठहरे हुए थे। सिद्ध संत उड़ियाबाबा भी वहीं साधना कर रहे थे।

एक जिज्ञासु उनके पास पहुँचा। उसने विनम्रता से प्रश्न किया, ‘महाराज, मोक्ष का साधन बताने की कृपा करें। ‘ स्वामीजी ने कहा, ‘इसके लिए पहले यह जानना जरूरी है कि किस बंधन से हम मोक्ष चाहते हैं। हर व्यक्ति अलग अलग तरह के बंधनों में जकड़ा हुआ है।’

स्वामीजी ने समझाते हुए कहा, ‘आदमी पग-पग पर राग, मोह, लिप्सा, नासमझी, अहंकार आदि न जाने कितने बंधनों में जकड़ा रहता है। उसे यह महसूस नहीं होता कि ये बंधन मुक्त करने के बजाय उसे और सख्ती से जकड़ रहे हैं।

हम सांसारिक सुख-सुविधाओं की आकांक्षा में ज्यादा-से ज्यादा धन अर्जित करने का प्रयास करते हैं। यह अपने को बंधन में जकड़ने का प्रयास ही तो है। अज्ञान और सुख सुविधा भी तो बंधन ही हैं।

अपने को औरों से बड़ा समझने और दूसरों को नीचा समझने का भ्रम – ये सब बंधन ही तो हैं। सबसे बड़ा बंधन तो अहंकार होता है। जिसने इसका त्याग कर दिया, समझो कि वह मुक्ति का रास्ता पा चुका है।’

स्वामीजी ने कुछ देर रुककर कहा, ‘शरीर की जगह मानव जिस दिन आत्मा का महत्त्व जान जाएगा, वह ब्रह्मज्ञानी हो जाएगा। ब्रह्मज्ञान प्राप्त होते ही उसके समस्त बंधन स्वतः कट जाएँगे। ‘

मुझे महंत नहीं बनना

स्वामी दयानंद सरस्वती ने युवावस्था में बद्रीनाथ केदारनाथ के पर्वतीय क्षेत्रों का भ्रमण किया था। इस यात्रा में एक दिन वे टिहरी पहुँचे। उनके तेजस्वी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर वहाँ के एक प्रतिष्ठित विद्वान् ने उन्हें अपने घर भोजन के लिए निमंत्रित किया।

वे उसके घर पहुँचे, तो देखा कि एक व्यक्ति बकरे का मांस काट रहा है। वे वापस लौटने लगे, तो गृहस्वामी ने रुकने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, ‘मैं मांसाहारी के घर भोजन नहीं कर सकता।’ यह कहकर वे वापस लौट आए।

गुप्तकाशी में वे ओखी मठ में ठहरे। मठ का महंत उनसे बातचीत कर समझ गया कि यह तेजस्वी युवक विद्वान् है। उसने एक दिन स्वामीजी से कहा, ‘तुम हमारे शिष्य बन जाओ। हमारे इस मठ के पास अपार भूमि और धन-संपदा है।

आगे चलकर तुम इसके स्वामी बन जाओगे।’ स्वामीजी ने कहा, ‘यदि मुझे किसी मठ या संपत्ति का मालिक बनने की लालसा होती, तो मैं अपने माता-पिता, बंधु-बांधव और घर आदि क्यों छोड़ता ?’

महंत ने पूछा, ‘तो फिर क्या पाने के लिए घर छोड़ा है ? ‘ उन्होंने उत्तर दिया, ‘सत्य, विद्या, योग, मुक्ति, आत्मा आदि का रहस्य जानने के लिए मैंने घर छोड़ा है। मैं हिमालय में सच्चे योगियों-साधुओं की तलाश में आया हूँ।’

इसके अगले दिन स्वामीजी सवेरे चुपचाप उठे और जोशीमठ जा पहुँचे। उन्होंने अपनी उस यात्रा में अनेक पाखंडी तांत्रिकों और निरीह पशु-पक्षियों की बलि देने वालों का डटकर विरोध किया।

धर्मयुद्ध का आह्वान

7 मार्च, 1930 की बात है। नमक सत्याग्रह के माध्यम से राष्ट्रीय जागरण का आह्वान किया जा रहा था। सरदार वल्लभभाई पटेल गुजरात के एक नगर में पहुँचे। उन्होंने अपने कुछ परिचितों से संपर्क किया।

उन लोगों ने उनसे कहा, ‘हम लोग धर्म-कर्म और अहिंसा में विश्वास रखते हैं। यदि इस आंदोलन में मार-धाड़ और हिंसा शुरू हो गई, तो व्यर्थ में हमारा व्यापार ठप्प पड़ जाएगा।’

सरदार पटेल ने उनसे कहा, ‘मैं कुछ समय बाद होने वाली सभा में आपकी शंका का समाधान करूँगा।’ सभा में पटेल ने कहा, ‘गुजरात में भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है।

उन्होंने हमेशा अन्याय और शोषण को अधर्म मानकर उसके विरुद्ध सतत संघर्ष करने की प्रेरणा दी थी। उन्होंने कहा था कि अन्याय व अत्याचार सहना भी घोर अधर्म है।

अंग्रेज हमारे साथ अन्याय कर रहे हैं। हमारी मातृभूमि को गुलाम बनाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में भगवान् श्रीकृष्ण के प्रत्येक भक्त का दायित्व है कि वह विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने में सक्रिय हो।’

उन्होंने आगे कहा, ‘मातृभूमि के लिए संघर्ष ही असली धर्मयुद्ध होगा। अंग्रेजों की आसुरी शक्ति से संघर्ष करना हमारी पूजा-उपासना का अंग है। दूसरे राज्यों की तरह गुजराती भी इस धर्मयुद्ध में आगे रहेंगे। ‘

सरदार के ओजस्वी भाषण ने जादू का काम किया। सैकड़ों गुजराती नमक कानून तोड़ने घरों से निकल पड़े। अंग्रेजों ने वल्लभभाई पटेल को गिरफ्तार कर तीन माह के लिए जेल भेज दिया।

माँ की निर्भीकता

माँ शारदा उन दिनों जयरामबटी स्थित अपने पीहर में रह रही थीं। उनकी इच्छा हुई कि गाँव से कोलकाता जाकर गंगा स्नान तथा पति स्वामी रामकृष्ण परमहंस के दर्शन किए जाएँ।

कुछ ग्रामीण गंगास्नान के लिए जा रहे थे, अतः माँ शारदा भी कुछ महिलाओं के साथ पैदल रवाना हो गईं। रास्ते में तेलो-मेलो नामक स्थान पड़ता था, जहाँ बागदी डाकू राह चलते यात्रियों को लूट लेते थे।

माँ शारदा विश्राम के लिए एक वृक्ष के नीचे बैठी ही थीं कि अचानक तीन-चार डाकुओं ने उन्हें घेर लिया। एक ने कड़कती आवाज में पूछा, ‘कहाँ की रहने वाली हो? तुम्हारे पास जो सामान हो, सामने रख दो। ‘

माँ शारदा देवी काली की परम भक्त थीं। भला वे क्यों भयभीत होतीं। उन्होंने हँसते हुए कहा, ‘पिताजी, मैं जयरामबाटी के रामचंद्रजी की बेटी हूँ। आपके जंवाई दक्षिणेश्वर के काली मंदिर के पुजारी हैं। उनके पास जा रही हूँ।’

सरदार को ‘पिताजी’ शब्द ने झकझोर डाला। वह उन्हें अपने घर ले गया और पत्नी से बोला, ‘हमारी कोई संतान नहीं है। भगवान् ने हमें यह सुंदर पुत्री दी है। ‘

कुछ देर आराम करने के बाद माँ शारदा ने कहा, ‘बाबा, यदि मैं कोलकाता नहीं पहुँची, तो आपके जंवाई चिंता में पड़ जाएँगे। मुझे जल्दी से जल्दी वहाँ पहुँचवा दीजिए। ‘

बागदी ने कहारों से पालकी मँगवाई। हरे मटर, चिवड़ा व बताशे विदाई में दिए और स्वयं पालकी के साथ मंदिर तक पहुँचाने गया। इस घटना से बागदी का हृदय परिवर्तन हो गया, उसने डाका डालना छोड़ खेती करना शुरू कर दिया।

अहंकार त्यागो

संतश्री डॉ. चतुर्भुज सहायजी प्रायः अपने प्रवचन में कहा करते थे कि साधु बनकर साधना करनेवाला आसानी से आत्मोद्धार नहीं कर सकता, जबकि गृहस्थ सहज ही कल्याण का रास्ता निकालकर भगवान् की कृपा प्राप्त कर सकता है।

एक दिन एक व्यक्ति उनके पास पहुँचा। उसने कहा, ‘महाराज, मैं उच्च शिक्षा प्राप्त हूँ। मैंने अनेक धर्मशास्त्रों का अध्ययन किया है। मेरी पत्नी और बच्चे हैं, किंतु मुझे लगता है कि गृहस्थी के प्रपंच में फँसे रहकर मैं अपने जीवन को सार्थक नहीं कर सकता।

कृपया मेरा मार्गदर्शन करें। ‘संतश्री ने कहा, ‘ज्ञान और साधना का रास्ता इतना आसान नहीं है, जितना तुम समझ रहे हो। ज्ञानी या संत होने का अहंकार दिनोदिन बढ़ता है।

आदमी गृहस्थी में रहकर यदि सत्कर्म और संयम का पालन करता हुआ ईश्वर भक्ति में लगा रहे, तो उसका सहज ही कल्याण हो सकता है। गृहस्थ जीवन में आने वाली समस्याएँ मनुष्य को मिथ्या अहंकार से मुक्त रखती हैं। यह मिथ्या अहंकार ही जीव को

प्रभु से दूर रखता है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘दुर्व्यसनों का पूर्ण त्याग किए बिना ईश्वर के दरबार तक पहुँचना अत्यंत कठिन है। जो भी व्यक्ति अपने दुर्गुणों और अहंकार का त्याग कर शरणागत होता है, उसे प्रभु स्वयं ही पवित्र बना देते हैं।

इसलिए गृहस्थी में रहते हुए भी साधना ध्यान करते रहो। मंगलमय परिवार को छोड़कर जंगल में भागने से कुछ नहीं मिलेगा।’ जिज्ञासु की समस्या का समाधान हो गया।

अनूठा वशीकरण मंत्र

आध्यात्मिक विभूति पंडित मिहीलालजी की वाणी इतनी मधुर व प्रभावी थी कि जो कोई उनके सत्संग में आता, वह उनकी प्रेरणा से समाज सेवा करने लगता। वे अकसर कहते थे कि जो कड़वा सुनकर भी मीठा बोलता है, वही सच्चा संत है। जो निंदा और आलोचना सुनकर क्रोधित नहीं होता, वही सफल गृहस्थ है।

एक बार मिहीलालजी टूंडला (उत्तर प्रदेश) प्रवास पर थे। एक व्यक्ति उनके सत्संग के लिए आया। उसने सुन रखा था कि पंडितजी वशीकरण मंत्र जानते हैं। उस व्यक्ति का पड़ोसियों से विवाद था।

उसने सोचा कि यदि पंडितजी वशीकरण मंत्र दीक्षा में दे देंगे, तो वह सभी को जीत लेगा। उस श्रद्धालु ने पंडितजी का चरण स्पर्श किया और कहा, ‘महाराज, क्या आप वशीकरण मंत्र जानते हैं और उसकी जाप-विधि मुझे बता सकते हैं?’ पंडितजी ने हामी भरी, तो वह हर्षित हो उठा।

पंडितजी ने कहा, ‘भैया, मैं सबसे मीठा बोलता हूँ। किसी की बात व्यर्थ में नहीं काटता। धैर्य से सबकी सुनता हूँ। हृदय से सबका भला चाहता हूँ। यही वशीकरण मंत्र है।

तुम इसका पालन करो। यह तुरंत प्रभावी चमत्कार दिखाएगा।’ पंडितजी ने आगे कहा, ‘जिसमें सहनशक्ति होती है, जो किसी की निंदा या आलोचना नहीं करता, असहायोें की सेवा के लिए तत्पर रहता है, बड़ों का आदर करता है, तो लोग स्वतः उसके हितैषी बन जाते हैं। भगवान् भी उसके वश में हो जाते हैं।’ जिज्ञासु का समाधान हो गया।

बेवकूफ भेड़िया

एक दिन एक छोटा मेमना जंगल के किनारे स्थित चरागाह में चर रहा था। अचानक एक भेड़िए की निगाह उस पर पड़ी। वह उसे देखकर सोचने लगा, ‘वाह! आज तो ठीक भोजन के समय ही मुझे मेरा शिकार मिल गया।

में इसे किसी भी तरह खाकर अपनी भूख मिटाऊँगा।’ यह सोचकर भेड़िया तेजी से दौड़ा और उसने मेमने को पकड़ लिया। वह उसे खाने ही वाला था कि तभी मेमना बोला, “मुझे खाने से पहले मेरी अंतिम इच्छा पूरी करने की कृपा करो।”

भेड़िया उसकी बात मान गया और बोला, “तुम्हारी अंतिम इच्छा क्या है?” वह बोला, “मैं चाहता हूँ कि तुम बाँसुरी बजाओ और मैं उसकी धुन पर नृत्य करूँ। नृत्य करते-करते जब मैं थक जाऊँगा, तब तुम मुझे खा लेना।”

भेड़िया मान गया और उसने बाँसुरी बजाना शुरू की। तब मेमने ने उसकी धुन पर नृत्य करना प्रारंभ किया। बांसुरी की आवाज सुनकर कुछ भेड़ें वहाँ पर आ गई।

भेड़िए के समीप छोटे से मेमने को देखते ही उन्होंने भेड़िए के ऊपर धावा बोल दिया। भेड़िया किसी तरह अपनी जान बचाकर भागा।

उसने सोचा, ‘मैं भी कितना बेवकूफ हूँ। क्यों मैंने अपने आप को संगीतज्ञ समझ लिया? यह मेरे लिए ही परेशानी का कारण बना।’

जादुई बर्तन

एक दिन एक किसान एवं उसकी पत्नी खेत जोतकर उसमें बीज बो रहे थे जब वे खेत में हल चला रहे थे. तभी हल से कुछ टकराया। उन्होंने देखा तो वह ताँबे का एक बड़ा-सा खाली बर्तन था।

वे उस बर्तन को घर ले आए। रास्ते में उन्होंने बर्तन में हल रख दिया। जब वे घर पहुँचे तो उन्होंने बर्तन को देखा। बर्तन के अन्दर दो हल देखकर वह दोनों आश्चर्यचकित रह गए। उसकी पत्नी बोली,

“मुझे लगता है. यह एक जादुई बर्तन है हम इस बर्तन में जो कुछ भी रखेंगे, वह दोगुना हो जाएगा।” अब किसान ने बर्तन के अन्दर पैसे रख दिए और वे दोगुने हो गए फिर उसने और पैसे रखे, वे भी दोगुने हो गए।

अब तो वे दोनों पैसे पर पैसा बनाने लगे। अगले दिन बदकिस्मती से किसान की पत्नी पैर फिसलने के कारण उस बर्तन में जा गिरी। किसान ने उसे बाहर निकाला, परन्तु अब उस बर्तन में एक पत्नी और थी।

उसने दूसरी पत्नी को भी बाहर निकाला। जादुई बर्तन के कारण वह व्यक्ति बड़ी मुसीबत में फँस गया था। किसी ने ठीक ही कहा है कोई चीज लाभदायक होने के साथ हानिकारक भी हो सकती है।

चौकीदार कुत्ता

एक किसान के पास भेड़ों का एक झुंड था। किसान अपनी भेड़ों को एक भेड़िए से बचाने का बड़ा प्रयास करता, लेकिन असफल रहता। भेड़िया सिर्फ एक भेड़ को छोड़कर अब तक उसकी सारी भेड़ों को खा चुका था।

एक दिन किसान अपनी पत्नी से बोला, “मैं इस आखिरी भेड़ को बेच दूंगा।” भेड़ किसान की यह बात सुनकर सोचने लगी, इस कसाई के हाथों मारे जाने से बेहतर है कि मैं आजाद रहूँ।’

इसलिए भेड़ चौकीदार कुत्ते को साथ लेकर रात को वहाँ से चली गई। तभी भेड़िए की निगाह उन पर पड़ी। वह भेड़ को अपना भोजन बनाना चाहता था, परन्तु कुत्ते की उपस्थिति में यह संभव नहीं था।

इसलिए वह भेड़ से बोला, “हे भेड़! यहाँ आओ मैं तुम्हारा दोस्त बनना चाहता हूँ।” कुत्ता भेड़िए की मंशा भाँप गया। कुत्ते ने पास के ही पेड़ के नीचे एक शिकंजा लगा देखा।

अत: वह बोला, “यदि तुम उस पवित्र पेड़ को छू लोगे तो हम तुम पर विश्वास कर लेंगे।” भेड़िया जैसे ही पेड़ को छूने गया, वह शिकंजे में फँस गया। अब किसान की भी समस्या हल हो गई। वह खुशी-खुशी भेड़ और कुत्ते को वापस ले आया।

आलसी बेटा

किसी किसी गांव में एक अमीर साहूकार अपनी पत्नी और बेटे के साथ रहता था। उसके बेटे का नाम सुमित था उसका बेटा सुमित बहुत आलसी था। पर साहूकार बहुत मेहनती था वह रोज सुबह होने से पहले शिवजी के मंदिर जाता। उसके बाद वह अपने सारे कारोबार को देखने जाता पर उसका बेटा अलसी होने के कारण सुबह नहीं उठता था।

एक दिन साहूकार अपने बेटे को खेत पर ले जाने के लिए जगाने लगा। पर उसका बेटा नहीं उठा और बोला मुझे सोने दीजिए पिताजी। साहूकार उसकी आलस पन को देखकर बहुत दुखी होता था। धीरे धीरे अब साहूकार का तबीयत भी खराब होने लगा।

और एक दिन साहूकार का देहांत हो गया। साहूकार के देहांत हो जाने के बाद उसका बिज़नेस घाटे में चलने लगा। क्योंकि साहूकार का बेटा सुमित अपने आलस के कारण कारोबार की देखरेख नहीं कर पाता था। एक दिन सुमित अपने मां से कहता है। मां हमारे कारोबार में बहुत घाटा हो रहा है। और हमें इस कारोबार का कुछ भी पता नहीं है। मां बोली तुम अपने नाना के पास जाओ। तुम्हारे नाना को इस कारोबार के बारे में बहुत जानकारी हैं।

सुमित अगली सुबह अपने नाना के पास जाता है। और नाना जी को सारी बात बताता है। तब उसके नाना उसे कहते हैं की तुम्हें एक काम करना होगा। तुम्हें रोज सुबह सूर्य उगने से पहले उठ कर शिव मंदिर जाना होगा। और उसके बाद अपने सभी कारोबार को देखने जाना होगा।

यह तुम्हें रोज करना होगा। सुमित अपने नाना की बात मानकर अब रोज सुबह शिव मंदिर से अपने सभी कारोबार को देखने जाया करता था। यह देखकर कारोबार के मजदूर जो घोटाला कर रहे थे वह सोचने लगे की मालिक रोज यहां देखने के लिए आते हैं।

अब हमें घोटाला बंद कर देना चाहिए नहीं तो किसी दिन पकड़े जाएंगे। और सभी मजदूरों ने घोटाला करना बंद कर दिया और सुमित का कारोबार फिर से चल दिया। इससे सुमित बहुत खुश हुआ और अपने नाना जी को धन्यवाद देने गया। अब उसके नाना ने उसे कहा की तुम्हारे कारोबार में घाटा सिर्फ तुम्हारी आलस के कारण हो रहा था।

क्योंकि तुम्हारे मजदूर तुम्हारे कारोबार में घोटाला कर रहे थे।

अब तुम रोज अपना कारोबार देखने जाते हो इसकी डर से तुम्हारे मजदूरों ने घोटाला करना बंद कर दिया। यह सब जानकर सुमित ने कसम खाई के अब वह आलस कभी नहीं करेगा। अपना काम समय पर करेगा।

शिक्षा: हमें आलस नहीं करना चाहिए। अपना काम समय पर करना चाहिए

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