Short Stories in Hindi for Class 6 - आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ Short Stories in Hindi for Class 6 शेयर करने जा रहे है। इन stories आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।आप इन Short Stories in Hindi for Class 6 को पूरा पढ़े। आपको यह Stories बहुत पसंद आएगी।

Short Stories in Hindi for Class 6th

Stories in Hindi for Class 6th List

भेड़ के कपड़ों में भेड़िया

तितली का संघर्ष

त्यागभूमि नहीं कर्मभूमि

सत्संग का प्रभाव

होशियार गधा

जादुई डॉक्टर

आँखें नम हो गईं

अनूठी सादगी

वैज्ञानिक की ईश्वरनिष्ठा

अनूठी सहृदयता

हठ का परिणाम

तीन दोस्त

सिक्के का मूल्य

सोने का अंडा

भगवान बड़ा दयालु है

पैसा ही सब कुछ नहीं है

गुब्बारे से सिख

ईमानदारी और सच्चाई

अंतिम इच्छा

जैसी करनी वैसी भरनी

लकड़हारा और लोमड़ी

असली धन

प्यासा कौआ

पैसा और परिवार

संन्यासी का स्वदेश प्रेम

दसवाँ व्यक्ति

अनूठी सेवा भावना

मुनिश्री का अनूठा प्रभाव

सेवा ही धर्म है

काजी का न्याय

सोच-समझकर बोलो

मोनू की याददाश्त

पाँच मूर्ख मित्र

बंदर और डॉल्फिन

भेड़ के कपड़ों में भेड़िया

एक बार भेड़ का झुंड को चरवाहे और उसके कुत्तों की सतर्कता की बाजार से एक भेड़िया भेड़ को पकड़ने में बड़ी कठिनाई हुई,

एक दिन भेड़िया भजन की खोज में जंगल से जा रहा था, उसे एक भेड़ का खाल मिली, फिर वह अपनी शरीर भेड़ की खाल से ढक दिया।

और उस चरवाहे की घर में जाकर भेड़ का झुंड में घुस गया, फिर वह उन भेड़ का झुंड में उनके जैसा रहने लगा, किसी भी भेड़ ने उसे पहचान नहीं पाया था।

एक दिन चरवाहे की कुछ दोस्त उनके घर पर आए, उन्होंने भेड़ का मांस खाने का फैसला किया, फिर चरवाहे अपनी भेड़ की झुंड के पास गया।

और उसने एक मोटा और ताकतवर भेड़ को पकड़ कर लेकर आया, वह भेड़ की खाल में भेड़िया था। चरवाहे उसे मार कर अपने दोस्तों के साथ खुशी से भजन की।

शिक्षा: कभी-कभी हमारे चुने हुए आसान रास्ता महंगा पड़ जाता है।

तितली का संघर्ष

एक दिन, एक आदमी ने एक कोकून देखा, वह तितलियों से प्यार करता था, उस आदमी ने रोज तितलियों के आसपास बहुत समय बिताता था।

वह जानता था, कैसे एक तितली एक बदसूरत कैटरपिलर से एक सुंदर में बदलने के लिए कैसे संघर्ष करती है। उन्होंने एक छोटे से उद्घाटन के साथ कोकून देखा।

इसका मतलब तितली दुनिया को देखने के लिए अपनी रास्ता बनाने की कोशिश कर रही थी, उसने यह देखने का फैसला किया कि कोकून से तितली कैसे निकलेगी।

वह कई घंटों तक खोल को तोड़ने के लिए तितली को संघर्ष करते हुए देख रहा था, बाहर आने के लिए तितली घंटों से बहुत संघर्ष कर रही थी।

दुर्भाग्य से, कई घंटों तक लगातार कोशिशों के बाद भी कोई प्रगति नहीं हुई। ऐसा लगता था कि तितली ने पूरी कोशिश की थी और कोई कोशिश नहीं कर सकती थी।

उस व्यक्ति ने तितली को मदद करने के लिए फैसला किया, उसके पास एक कैंची थी वह कैंची से कोकून को हटा दिया, तितली किसी संघर्ष किए बिना बाहर आ गई।

दुर्भाग्य से, तितली अब सुंदर नहीं दिखती थी, वह आदमी खुश था उसने बिना किसी संघर्ष के तितली को कोकून से बाहर निकाला, वह तितली को देखता रहा।

उसने सोचा कि किसी भी समय, तितली अपनी पंखों को विस्तार कर सकती है, दुर्भाग्य से, ना तो पंखों का विस्तार हुआ और नहीं सजे हुए कि शरीर में कमी आई।

वह कभी उड़ने में सक्षम नहीं था, वह नहीं जानता था कि केवल संघर्षों से गुजरने से मजबूत पंखों के साथ तितली सुंदर बन सकती है।

तितली के अपने कोकून से बाहर आने के निरंतर प्रयास से शरीर में जमा द्रव पंखों में परिवर्तित हो जाता है। और पंख सुंदर और बड़े हो जाएंगे।

शिक्षा: परिश्रम और संघर्ष के बिना हम उतनी मजबूत नहीं बन सकती जितनी हमारी क्षमता है।

त्यागभूमि नहीं कर्मभूमि

विख्यात स्वतंत्रता सेनानी और साहित्यकार पंडित हरिभाऊ उपाध्याय के आमंत्रणपर लाला लाजपतरायजी 1927 में अजमेर पधारे। वहाँ राष्ट्रीय आंदोलन के संबंध में लालाजी का बड़ा प्रभावी भाषण हुआ।

हरिभाऊजी को उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय भावनाओं के प्रचार के लिए प्रकाशित पत्रिका का नाम त्यागभूमि की जगह कर्मभूमि होना चाहिए था। उन्होंने कहा कि त्याग और वैराग्य के उपदेश की जगह भगवान् श्रीकृष्ण के गीता के संदेश को अपनाने और निरंतर कर्म करते रहने की प्रेरणा देने की आवश्यकता है।

कुछ क्षण रुककर पंजाब केसरी लालाजी ने कहा, ‘हमने अपने देश का त्याग कर उसे विदेशियों को सौंप दिया । अपनी धन-दौलत उन्हें दे दी। त्याग के चक्कर में हमने अपने स्वर्ग समान राष्ट्र की बहुत हानि की है।

हमने श्रीकृष्ण के कर्म और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के संदेश को भुला दिया है। इसी का दुष्परिणाम है कि हम त्याग के नाम पर सबकुछ लुटाकर स्वयं बेबस बने विदेशी शासन का अत्याचार सहन कर रहे हैं।’ लालाजी के ओजपूर्ण शब्द सुनकर पंडित हरिभाऊजी नतमस्तक हो उठे।

लालाजी लाहौर में साइमन कमीशन के बहिष्कार जुलूस का नेतृत्व करते हुए पुलिस की लाठियों से घायल हुए। उन्होंने कहा था, ‘मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत की आखिरी कील साबित होगी।’ 17 नवंबर, 1928 को उन्होंने शरीर त्याग दिया और अमर हो गए।

सत्संग का प्रभाव

धर्मसंघ के संस्थापक स्वामी करपात्रीजी भारत विभाजन की योजना के विरोध में सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार किए गए। उन्हें कुछ दिनों के लिए लाहौर की जेल में रखा गया। स्वामीजी कैदियों को प्रतिदिन प्रार्थना कराया करते थे, ‘भगवान्, हमें पाप कर्मों से बचाकर अच्छा व्यक्ति बनाओ।’

एक कैदी स्वामीजी के संपर्क में आया और उनके त्यागमय जीवन और प्रवचन से काफी प्रभावित हुआ । उसने एक दिन स्वामीजी से कहा, ‘महाराज, सजा पूरी होने के बाद मैं जेल से छूट जाऊँगा। कोई ऐसा उपाय बताइए कि मुझसे कोई बुरा कर्म न होने पाए। ‘

स्वामीजी ने कहा, ‘किसी दुर्व्यसनी का संग न करने और परिश्रम से कमाई करने का संकल्प ले लो । प्रतिदिन सवेरे भगवान् का स्मरण कर उनसे प्रार्थना किया करो कि कोई पाप न होने पाए । संतों का सत्संग करना । धर्मशास्त्रों का अध्ययन करना। तुम्हारा जीवन सुखमय हो जाएगा।’

स्वामी करपात्रीजी लाहौर जेल से रिहा किए गए, तो वे पुनः धर्म प्रचार में लग गए। कुछ वर्ष बाद उन्होंने एक सम्मेलन में हिस्सा लिया। सम्मेलन के एक सत्र का संचालन करने वाले व्यक्ति ने स्वामीजी का स्वागत करते हुए कहा,

‘पूज्य स्वामीजी उस पारस के समान दिव्य हैं, जिसके स्पर्श मात्र से लोहा सोना बन जाता है। मैं लाहौर जेल में स्वामीजी के संपर्क में आया। इनके सत्संग के कारण मैं आज अपराध करने के बजाय शिक्षक बनकर धर्म के प्रचार में जुटा हूँ।’

सम्मेलन के बाद वह स्वामीजी के पास पहुँचा। स्वामीजी ने उसे गले से लगा लिया।

होशियार गधा

नीलेश अपनी पत्नी के साथ एक छोटे से गाँव में रहता था। नीलेश अपने गाँव में खेती करके अपना गुजरा करता था। नीलेश के पास कई जानवर थे जो उसे अधिक पैसा कमाने में मदद कर रहे थे।

एक दिन एक नीलेश का गधा कुएँ में गिर गया। गधा घंटों तक जोर-जोर से रोता रहा और निलेश पूरी तरह से उलझन में था। वह सोच रहा था कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

अंत में उन्होंने फैसला किया कि वह गधा काफी बूढ़ा हो गया है और उसे बेचकर उसे ज्यादा पैसे नहीं मिलेंगे। इसलिए उसने सोचा की उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिए।

नीलेश ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया। सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। गधे ने जोर से रोना शुरू कर दिया क्योंकि घुटन के कारण वह सांस नहीं ले पा रहा था। गधा बाहर आने के लिए संघर्ष कर रहा था, लेकिन लोग उस पर मिट्टी फेंक रहे थे और वह बाहर नहीं आ सका।

बहुत समय तक संघर्ष करने के बाद गधे ने अपना दिमाग चलाया। वह उस मिट्टी पर संतुलन बनाने लगा जो उस पर फेंकी गई थी। गधे ने उस मिट्टी पर संतुलन बनाने के लिए बहुत संघर्ष किया। नई मिट्टी के कारण कुआं भरने लगा। लोगो को लगा की अब यह गधा मिट्टी में ही मर जाएगा, इसलिए वे उस पर और मिट्टी फेंकने लगे।

लेकिन गधा धीरे-धीरे मिट्टी पर संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा था। जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह गधा कुएँ के किनारे पर पहुँच गया और फिर कूदकर बहार भाग गया।

शिक्षा: मेहनत, हिम्मत और लगन से कल्पना साकार होती है।

जादुई डॉक्टर

बाजपुर गाँव में केशव नाम का एक प्रसिद्ध डॉक्टर रहता था। वह डॉक्टर का नाम कई गाँवों में प्रसिद्ध था।

एक दिन एक दूसरे गांव का युवक बाजपुर केशव को मिलने आया। वह कहने लगा “डॉक्टर इस सिर दर्द ने मेरी जिंदगी खराब कर दी है। मैं अपने गाँव में कई डॉक्टरों से मिल चूका हूँ। लेकिन कोई भी मेरा इलाज नहीं कर सका। कृपया कर के मुझे इस सिर दर्द से बचा लो।”

उनकी समस्याओं को सुनकर डॉक्टर ने उनके पूरे शरीर की जाँच की। मरीज के शरीर की रिपोर्ट के माध्यम से डॉक्टर केशव को पता चला कि वह अवसाद यानि डिप्रेशन से पीड़ित था।

उसने मरीज से पूछा “तुम्हे घर, रोजगार या परिवार की ऐसी कोनसी बात परेशान कर रही है, जिसके बारे में तुम अक्सर सोचते रहते हो?”

मरीज बोला “आपको कैसे पता की मैं किसी बात की फिक्र कर रहा हूँ? वास्तव में पिछले हफ्ते मेरे एक रिश्तेदार की कैंसर से मृत्यु हो गई। तब से मैं सोचता रहता हूँ की यह बीमारी मुझे न हो जाय।”

जिसकी बात पर डॉक्टर केशव बोले “ऐसे रोग जिनका आपके साथ निकट संबंध नहीं है, तुम उसे सोचकर तनावग्रस्त होते रहोगे तो आपको वह रोह होने की संभावना है। जीवन में कई लोग इस तरह से तनावग्रस्त होते हैं, जिनका उनसे कोई वास्ता नहीं होता है। ज़्यादा सोच के कारण लोग अधिक से अधिक मर जाते हैं। सुख-दुःख, बीमारी आती जाती है, हमें उनसे सामना करना सीखना होगा।”

“तुम्हे अगर सोचना ही है तो अच्छी-अच्छी बाटे सोचो जैसे सोचें कि आप व्यवसाय में कैसे सफल हो सकते हैं, आप कैसे कुछ हासिल कर सकते हैं। सकारात्मक सोच से आप कई बीमारियों को दूर रख सकते हैं” यह सुनकर और बिना कोई दवा लिए वह व्यक्ति खुशी से घर चला गया।

शिक्षा: जब एक दरवाजा बंद होता है, दूसरा खुल जाता है। लेकिन अक्सर हम उस बंद दरवाजे को इतने अफ़सोस के साथ देखते हैं कि, जो दरवाजा खुला है उसे देख नहीं पाते।

आँखें नम हो गईं

गांधीजी के अनन्य सहयोगी काका कालेलकर ने अनेक बार स्वाधीनता आंदोलन के सिलसिले में जेल यातनाएँ सहन की थीं। वे विदेशी शासन की कारगुजारियों के विरुद्ध खुलकर लेख लिखते थे।

वे गांधीजी के आश्रम में रहकर स्वदेशी और स्वदेश का महत्त्व प्रकट करनेवाला साहित्य सृजन करते थे। एक बार काका साहब को गिरफ्तार कर साबरमती की जेल में रखा गया।

उसी दौरान काका साहब के दोनों पुत्रों सतीश और बाल ने गांधीजी की दांडी यात्रा में शामिल होकर गिरफ्तारियाँ दीं। उन दोनों को भी उसी जेल में भेजा गया। काका साहब को इसकी जानकारी नहीं थी । पुत्र भी इस बात से अनजान थे कि उनके पिता इसी जेल में हैं।

एक दिन सतीश और बाल जेल के पुस्तकालय में स्वदेशी पुस्तकों की तलाश में पहुँचे। उन्होंने एक व्यक्ति को अध्ययन में लीन देखा । तीनों की जैसे ही आँखें मिलीं कि वे सब हतप्रभ रह गए।

काका साहब ने पुत्रों को गले लगाते हुए कहा, ‘मैं तुम दोनों को अपने पथ का अनुकरण करते देखना चाहता था। तुम्हें कैदियों के वस्त्र पहने देख प्रभु ने मेरी अभिलाषा पूरी कर दी ।

मुझे संतोष है कि तुम दोनों ने मातृभूमि की स्वाधीनता के यज्ञ में शामिल होकर हमारे कुल को पवित्र कर दिया।’ कहते-कहते काका साहब की आँखें नम हो गईं।

काका कालेलकर ने राष्ट्रभाषा हिंदी, स्वदेशी और दलितों-पीड़ितों की सेवा में अपना जीवन खपाया। उन्होंने अनेक देशों की यात्रा कर भारतीय संस्कृति का प्रचार किया।

अनूठी सादगी

देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की धर्म व भारतीय संस्कृति में अनूठी निष्ठा थी । वे अपने भाषणों में प्रायः कहा करते थे कि भारतीय संस्कृति मानवता, करुणा,

सत्य और अहिंसा रूपी सद्गुणों को अपनाने की प्रेरणा देती है। गांधीजी के सान्निध्य में रहकर उन्होंने सत्य पर अडिग रहने का संकल्प लिया था।

राजेंद्र बाबू समय-समय पर संतों के सत्संग के लिए भी जाया करते थे। देवरहा बाबा, माँ आनंदमयी जैसी विभूतियों के दर्शन कर वे बहुत संतुष्ट होते थे। राजेंद्र बाबू ने संकल्प लिया था कि वे चमड़े से बने जूते नहीं पहनेंगे।

एक बार उनके जूते पुराने पड़ गए, तो उनका सचिव बाजार जाकर नए जूते खरीद लाया । राजेंद्र बाबू ने देखा कि जूता मुलायम चमड़े कर बना है और कीमती है।

उन्होंने सचिव से कहा, ‘मैं कपड़े के जूते ही पहनता हूँ। चमड़े के जूते मैं नहीं पहनता । यदि संभव हो, तो इन्हें लौटा दो।’ कुछ क्षण रुककर उन्होंने कहा, ‘केवल जूते लौटाने के लिए इतनी दूर सरकारी गाड़ी से न जाना । जब किसी अन्य काम से बाजार जाओ, तब जूते लौटा आना।’

राजेंद्र बाबू चरखे पर स्वयं के काते गए सूत से बुने कपड़े ही पहनते थे। इस बारे में पूछे जाने पर वे कहा करते थे, ‘हमने स्वाधीनता से पूर्व स्वदेशी खादी का प्रचार किया था । इसलिए देश के स्वाधीन होने के बाद हमें स्वदेशी वस्तुओं का ही उपयोग करना चाहिए । ‘

वैज्ञानिक की ईश्वरनिष्ठा

संसार के अग्रणी वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन को वर्ष 1921 में भौतिकी के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह जीवन के अंतिम समय तक नई-नई खोजों में तो लगे ही रहे, ईश्वर के प्रति भी उनकी अटूट निष्ठा बनी रही।

एक बार आइंस्टीन बर्लिन हवाई अड्डे से विमान में सवार हुए। वायुयान जब ऊपर पहुँचा, तो उन्होंने अपनी जेब से एक माला निकाल ली। उनकी बगल की सीट पर बैठे एक युवक ने यह देखा, तो वह आश्चर्य में पड़ गया।

उसने धीरे से उनसे कहा, ‘आज हमारे युग में अनेक वैज्ञानिक शोध हो रहे हैं। आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिकों का युग है और आप जैसा युवक माला जपकर दकियानूसी होने का परिचय दे रहा है।’

उस युवक ने अपना कार्ड निकालकर उन्हें दिखाया और बोला, ‘मैं अंधविश्वास और ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध अभियान में लगा हूँ। आप भी इसमें सहयोग करें। ‘

आइंस्टीन उस युवक की बातें सुनकर मुसकराए और अपना कार्ड निकालकर उसे दिया । कार्ड पर जैसे ही उसने ‘अलबर्ट आइंस्टीन’ शब्द पढ़ा, तो हक्का-बक्का रह गया।

वह तुरंत श्रद्धापूर्वक उनके चरणों में झुक गया। वर्ष 1930 में जब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर आइंस्टीन से मुलाकात करने बर्लिन गए, तो उस भेंट में दोनों महापुरुषों ने ईश्वर और धर्म के संबंध में चर्चा की थी ।

आइंस्टीन ने कहा था, ‘मैं ईश्वर के अस्तित्व की अनुभू कर चुका हूँ। अतः गर्व से अपने को धार्मिक कहता हूँ।’

अनूठी सहृदयता

जवाहरलाल नेहरू अपने परिचितों के दुःख-दर्द के बारे में सुनकर द्रवित हो उठते थे। एक बार नेहरूजी कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लेने लखनऊ पहुँचे।

वहाँ पहुँचकर उन्हें पता लगा कि लालबहादुर शास्त्रीजी की बेटी चेचक से पीड़ित थी और आर्थिक वजहों से समुचित इलाज न हो पाने के कारण उसकी मृत्यु हो गई ।

शास्त्रीजी उन दिनों लखनऊ में ही थे। नेहरूजी तत्काल शास्त्रीजी के पास पहुँचे और उन पर क्रुद्ध होते हुए बोले, ‘यह बहुत दुःखद है कि धनाभाव के कारण तुम अपनी बेटी का उचित इलाज नहीं करा पाए और उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।

मुझ जैसे किसी सहयोगी से कहते, तो तुरंत धन की व्यवस्था की जा सकती थी।’ यह कहते-कहते उनकी आँखें नम हो गईं।

एक बार नेहरूजी किसी समारोह में भाग लेने जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक युवक किसी वाहन से टकराकर खून से लथपथ सड़क किनारे पड़ा है और कुछ लोग तमाशबीन बने उसे घेरे हुए हैं।

नेहरूजी ने अपनी कार रुकवाई, उन्हें पहचानते ही कुछ लोग उनकी जय-जयकार करने लगे। नेहरूजी ने नारा लगाने वालों को बुरी तरह फटकारते हुए कहा, ‘जय-जय क्या चिल्ला रहे हो । इस घायल को तड़पते देखकर भी तुममें से किसी का कलेजा नहीं पिघला, जो इसे अस्पताल पहुँचाते?’

नेहरूजी ने अपनी कार से घायल व्यक्ति को पहले अस्पताल पहुँचवाया, फिर वे समारोह में गए।

हठ का परिणाम

एक ब्राह्मण था। उसके पास सब कुछ था, बस कमी थी तो एक पुत्र की। इसलिए वह सभी सुख-सुविधाएँ होने के बावजूद भी दुखी रहता था। उसने पुत्र-प्राप्ति के लिए भगवान से कई बार प्रार्थना की।

यहाँ तक कि उसने घर छोड़ दिया और हिमालय पर जाकर कई वर्षों तक तपस्या की। भगवान उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए और बोले, “पुत्र माँगो, क्या माँगते हो?” ब्राह्मण बोला, “भगवान,

मैं एक पुत्र चाहता हूँ।” भगवान बोले, “पुत्र, मैं तुम्हारी यह इच्छा पूरी नहीं कर सकता। कुछ और माँग लो?” ब्राह्मण बोला, “नहीं, मुझे सिर्फ पुत्र ही चाहिए।” भगवान बोले, “मैं तुम्हें पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद देता हूँ।

लेकिन ये हमेशा याद रखना कि अधिक हठ दुख को जन्म देता है।” जल्दी ही ब्राह्मण को एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। बड़ा होते-होते वह बहुत ही उदंड हो गया।

वह झूठा और बेईमान भी था। दुष्ट बेटे की वजह से ब्राह्मण का नाम मिट्टी में मिल गया। तब ब्राह्मण सोचने लगा, ‘भगवान ने सत्य ही कहा था।

तीन दोस्त

एक बार तीन दोस्त कहीं जा रहे थे रास्ते में उन्होंने एक होटल देखा। उन्होंने उसे खरीदकर एक नया व्यवसाय शुरू करने का निर्णय लिया। वे होटल के बाहर उसे खरीदने को लेकर आपस में सलाह-मशवरा करने लगे।

तभी एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला, “मैं इस होटल का मालिक हूँ। मैंने सुना है कि तुम लोग मेरे होटल को खरीदने की इच्छा रखते हो। तुम लोगों के पास कितने पैसे हैं?” उनमें से एक बोला, “हमारे पास पाँच लाख रुपए हैं।”

वह बोला, “ठीक है, तुम पैसे मुझे दे दो और ये होटल के कागजात ले लो।” उसने उनसे पैसे लिए और उन्हें कागजात सौंप दिए। कागजात सौंपने के बाद वह बोला, “आज से तुम इस होटल के मालिक हो।”

तीनों दोस्त खुशी-खुशी होटल के अन्दर गए और भरपेट खाना खाया। वेटर बिल लेकर आया तो वे बोले, “हम इस होटल के नए मालिक हैं।”

वास्तविक होटल मालिक ने आकर उन कागजों का निरीक्षण किया और उन्हें बताया कि ये कागज फर्जी हैं। अब तीनों दोस्तों को होटल का बिल चुकाने के लिए वहाँ के सारे गंदे बर्तन धोने पड़े।

तब उन्हें अहसास हुआ कि जल्दबाजी हमेशा हानिकारक होती है। किसी भीकार्य को अच्छी तरह सोच-समझकर करना चाहिए।

सिक्के का मूल्य

भारत के पिता रूप में सम्मानित महात्मा गांधी एक बहुत ही खास व्यक्ति थे, एक बार गांधी एक संगठन के लिए विभिन्न शहरों से गरीबों की मदद के लिए धन इकट्ठा करने की अभियान पर थे।

वह कई स्थानों पर गया अंत में उड़ीसा पहुंचा। उन्होंने उड़ीसा में एक सभा का आयोजन किया, गांधी जनता को एक भाषण दिया, जिसमें उसने संगठन के लिए धन देने का अनुरोध किया।

भाषण की आंत में, पीछे की ओर एक बूढ़ी महिला खड़ी हो गई। उन्होंने स्वयंसेवकों से अनुरोध किया कि उन्हें गांधी तक पहुंचने की अनुमति दें, हालांकि स्वयंसेवकों ने उसे रोक दिया।

लेकिन उसने हार नहीं मानी, उनके साथ लड़ी और गांधी के पास पहुंची। वह गांधी के पैर छुए, फिर उसने एक सिक्का निकाला और गांधी के चरणों में रख दिया, गांधी ने बहुत सावधानी से सिक्का लिया।

फिर संगठन के कोषाध्यक्ष ने गांधी से सिक्का मंगा, लेकिन उन्होंने देने से इनकार कर दिया। कोषाध्यक्षने कहा ‘मैं हजारों रुपए की चेक रखता हूं, फिर भी आप मुझ पर भरोसा नहीं करोगे!’

गांधी ने कहा, ‘यह सिक्का उन हजारों की तुलना में बहुत अधिक है, उसके पास ठीक कपड़े भी नहीं थे, फिर भी उसने सब कुछ दिया जो उसके पास था, इसलिए गांधी ने सिक्के को बहुत कीमती माना।

शिक्षा: जब हमारे पास बहुत कम होता है,तब किसी की मदद करना बहुत मूल्यवान होता है।

सोने का अंडा

एक बार की बात है, एक आदमी और उसकी पत्नी के पास एक हंस था, जिसने हर दिन एक सुनहरा अंडे देती थी, हालांकि वह भाग्यशाली थे।

उन्होंने जल्द ही यह सोचना शुरू कर दिया, कि वह पर्याप्त तेजी से समृद्ध नहीं हो रहे हैं। उन्होंने कल्पना की यदि हंस प्रतिदिन सुनहरा अंडा देने में सक्षम है।

तो उसकी पेट में बहुत सारा सुनहरा अंडा होना चाहिए। उसने सोचा कि अगर वह एक ही बार में सभी सुनहरा अंडा ले सकती है, तो वह बहुत अमीर बन जाएगा।

इसलिए, उस आदमी और उसकी पत्नी ने हंस को मारने का फैसला किया। सोने का अंडा देने वाली हंस की पेट काटने की बाद यह देखकर हैरान रह गए, इसकी पेट भी अन्य हंस की तरह खाली थी।

शिक्षा: कुछ बड़ा फैसला लेने से पहले एक दो बार जरूर सोचना चाहिए।

भगवान बड़ा दयालु है

एक राजा का बहुत बड़ा फलों का बगीचा था। जिसमें विभिन्न प्रकार के फलों के पेड़ लगे हुए थे। माली रोज विभिन्न पेड़ों के सभी पके हए फलों को एकत्र कर राजा को भेंट करता था।

एक दिन माली ने कुछ चेरियाँ एकत्र की और उन्हें राजा के लिए ले गया। उस दिन राजा का मिजाज बहुत खराब था। उसने एक चेरी को चखा तो उसका स्वाद बहुत खट्टा पाया। अब तो राजा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया।

उसने गुस्से से वह चेरी माली पर दे मारी। माली को चोट लगी, लेकिन वह बोला,”भगवान बड़ा दयालु है।” माली के शब्द सुनकर राजा आश्चर्यचकित होकर बोला,

“मैंने तुम्हें मारा और और तुम कह रह रहे हो भगवान बड़ा दयालु है। क्यों?” माली बोला, “महाराज, मैं तरबूज लाने जा रहा था। लेकिन किस्मत से मैंने अपना इरादा बदल लिया।

मैं तो ये कल्पना कर रहा था कि यदि आप तरबूज फेंककर मुझे पर मारते तो मेरा क्या होता! इसलिए मैंने कहा कि भगवान बड़ा दयालु है। राजा उसकी बात सुनकर हँस पड़ा।

पैसा ही सब कुछ नहीं है

राम एक 10 साल का लड़का था, वह अपने माता पिता के इकलौते पुत्र थे, राम के पिता एक बहुत व्यस्त व्यापारी थे जो अपने बेटे के साथ समय नहीं विता सकते थे।

वह राम सोने के बाद घर आता था, और सुबह उठने से पहले ही ऑफिस चला जाता था। वह अपने दोस्तों के साथ बाहर जाता और अपने पिता के साथ खेलना चाहता था।

एक दिन शाम को राम अपने पिता को देखकर हैरान था, वह अपने पिता से पूछा, ‘आप एक साल में कितना कमाते हैं?’ राम के पिता हैरान थे उसने कहा, ‘राम तुम यह सवाल क्यों पूछ रहे हो’

लेकिन राम लगातार सवाल पूछता गया, ‘क्या आप बता सकते हैं आप एक घंटे में कितना कमाते हैं?’ राम के पिता ने जवाब दिया $25 प्रति घंटे होगा।

फिर राम अपने कमरे में गया और गुल्लक के साथ नीचे आया, जिसमें उनकी बचत थी। ‘पिताजी, मेरे गुल्लक में $50 है, क्या आप मेरे लिए दो घंटे का समय दे सकते हैं?’

‘मैं समुद्र तट पर कल शाम आपके साथ भजन करना चाहता हूं, क्या आप मेरे साथ जा सकते हैं?’ उसकी बात सुनकर राम के पिता अबाक भक्त थे।

शिक्षा: पिता माता अपने बच्चों को जो सबसे बड़ा उपहार दे सकते हैं वह है समय, पैसा से सब कुछ नहीं खरीद सकता है।

गुब्बारे से सिख

रत्नाकर नदी किनारे एक सुंदर से गांव में रहता था। उसका काम था गुब्बारे बेचना। गुब्बारे बेच कर वह अपना जीवन-यापन करता था। रत्नाकर रोज गाँव के आस-पास लगने वाली बाजारों में जाता और अपने गुब्बारे बेचता।

बाजार में बच्चों को लुभाने के लिए वह तरह-तरह के गुब्बारे रखता। लाल,पीला,सफेद,काला,गुलाबी और जब भी उसे लगता है कि ग्राहक उसकी दुकान पर कम आ रहे हैं, वह झट से एक गुब्बारा हवा में छोड़ देता। जिसे उड़ता देखकर बच्चे खुश हो जाते और गुब्बारे खरीदने के लिए पहुँच जाते।

इसी तरह, एक दिन रत्नाकर बाजार में गुब्बारे बेच रहा था और बिक्री बढाने के लिए बीच-बीच में गुब्बारे आसमान में उड़ा रहा था। पास ही खड़ी एक छोटी बच्ची ये सब बड़ी जिज्ञासा के साथ देख रही थी।

इस बार जैसे ही रत्नाकर ने एक काला गुब्बारा उड़ाया वह तुरंत उसके पास पहुंची और मासूमियत से बोली, “अगर आप ये सफेद वाला गुब्बारा छोड़ेंगे, तो क्या वो भी ऊपर जाएगा?”

छोटे बच्ची के सवाल से रत्नाकर थोड़ा हैरान हुआ और हस्ते हुए बोला ” हाँ बिलकुल जाएगा. बेटी! गुब्बारे का ऊपर जाना इस बात पर नहीं निर्भर करता है कि वो किस रंग का है। बल्कि इसपर निर्भर करता है कि उसके अन्दर क्या है।”

छोटी बच्ची ने सफेद गुब्बारा खरीदा और खुशी से घर चली गयी।

शिक्षा: कोई अपनी जिंदगी में क्या प्राप्त करेगा, ये उसके बाहरी रंग-रूप से निर्भर नहीं करता है। ये इस बात पर निर्भर करता है कि उसके अन्दर क्या है।

हर किसी का सम्मान करो, अपनों का सत्कार करो, छोटे-बड़े, काले-गोरे का भेद छोड़, प्यार करो।

ईमानदारी और सच्चाई

बहुत समय पहले की बात है। गदरपुर नगर में विश्वनाथ नाम एक विद्वान रहता था। वह अपनी ईमानदारी और सच्चाई के लिए पुरे नगर में मशहूर था।

एक दिन उसने अपने रिश्तेदारों के घर जाने का फैसला किया। उनके घर जाने के लिए उसे समुद्री जहाज से जाना पड़ता था और जाने के लिए कम से कम १० दिन लगते थे। उन्होंने सफर में खर्च के लिए एक हजार रुपये रख लिए।

यात्रा के दौरान विश्वनाथ की पहचान दूसरे यात्रियों से हुई। वह उन्हें ज्ञान की बातें बताते गए और यात्रियों को उसकी बाते अच्छी भी लगने लगी। एक यात्री से उनकी नजदीकियां कुछ ज्यादा बढ़ गईं।

एक दिन बातों-बातों में विश्वनाथ ने उसे पैसे की पोटली दिखा दी। उस यात्री को लालच आ गया। उससे अब रहा नहीं जा रहा था और उनकी पोटली हथियाने की योजना बनाई।

एक सुबह उसने जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, “हाय मैं मर गया। मेरे एक हजार रूपये चोरी हो गया, अब मैं क्या करू?” वह रोने लगा। जहाज के कर्मचारियों ने उससे कहा, “तुम घबराते क्यों हो। जिसने चोरी की होगी, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह पकड़ा जाएगा।”

जहाज में सब यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब विश्वनाथ की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा, “आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो शक करना ही गुनाह है। यह सुन कर विश्वनाथ बोला, “नहीं, जिसके रूपये की चोरी हुई है, उसके दिल में शक बना रहेगा। इसलिए मेरी भी तलाशी भी जाए।” विश्वनाथ की तलाशी ली गई। उनके पास से कुछ नहीं मिला।

तीन दिन बाद उसी यात्री ने उदास मन से विश्वनाथ से पूछा, “आपके पास तो एक हजार रूपये थे, वे कहां गए?” विश्वनाथ ने मुस्करा कर कहा, “उन्हें मैंने समुद्र में फेंक दिए है। तुम जानना चाहते हो क्यों?”

“क्योंकि मैंने जीवन में दो ही दौलत कमाई थीं। एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास। अगर मेरे पास से एक हजार रूपये बरामद होते और मैं लोगों से कहता कि ये मेरे हैं तो लोग यकीन भी कर लेते लेकिन फिर भी मेरी ईमानदारी और सच्चाई पर लोगों का शक बना रहता।”

“मैं दौलत तो गंवा सकता हूं लेकिन ईमानदारी और सच्चाई को खोना नहीं चाहता।” यह सुनकर वह लालची यात्री रोया और विश्वनाथ से माफ़ी मांगी।

शिक्षा: ईमानदारी वह चीज है जिस पर मनुष्य की प्रतिष्ठा निर्भर करती है।

अंतिम इच्छा

एक राजा थे। उनके दरबार में एक विदूषक था। वह बहुत चालाक था वह न सिर्फ अच्छे-अच्छे चुटकुले सुनाता था, बल्कि शासन के कार्यों में भी राजा की सहायता करता था।

वह विदूषक कई बार तो राजा के ऊपर ही किस्से बनाकर सुना देता था। एक दिन राजा को उसकी किसी बात से अपना अपमान महसूस हुआ। वे क्रोधित होते हुए बोले, “सैनिको इस उदंड आदमी को बंदी बना कर कैदखाने में डाल दो।

कल इसे फाँसी दी जाएगी।” अगले दिन विदूषक को दरबार में लाया गया। राजा उससे बोले,”तुम्हें जल्दी ही फाँसी दे दी जाएगी। यदि तुम्हारी कोई अंतिम इच्छा हो तो हमें बताओ?” उसे अवश्य ही पूरा किया जाएगा।

यह सुनकर उस चालाक विदूषक ने कहा, “महाराज, मेरी अंतिम इच्छा है कि मैं बुढ़ापे की मौत मरूँ।” उसकी बात सुनकर राजा को हँसी आ गई। उन्होंने उसे माफ कर दिया। इस प्रकार चतुर विदूषक ने चालाकी से अपनी जिंदगी बचा ली।

जैसी करनी वैसी भरनी

एक बूढ़ा सन्यासी था। अपने जीवन-यापन के लिए वह प्रतिदिन पास के गाँव में जाकर भिक्षा माँगता था। यद्यपि वह भिक्षा माँगकर पेट भरता था, परन्तु फिर भी अपना भोजन जरूरतमंदों के साथ अवश्य बाँटता था।

एक दिन वह एक वृद्धा के घर भिक्षा माँगने के लिए गया। उसने भिक्षा माँगी तो उस वृद्धा ने भोजन न होने का बहाना बनाकर उसे टाल दिया। अगले दिन एक बार फिर वह वृद्धा के घर भिक्षाटन के लिए गया।

यह देखकर वृद्धा बुरी तरह चिढ़ गई। उसने खाने में जहर मिलाकर सन्यासी को दे दिया। सन्यासी ने भोजन लिया और अपनी कुटिया में वापस आ गया। वह जैसे ही भोजन करने बैठा, तभी एक युवक उसके पास आया और बोला,

“मैं बहुत भूखा हूँ। कृपया मुझे खाने के लिए कुछ भोजन दे दो।” । सन्यासी ने पूरा भोजन उसे ही दे दिया। युवक ने जैसे ही भोजन खाया, उसे उल्टियाँ होने लगी और थोड़ी ही देर बाद वह मर गया। यह देखकर सन्यासी आश्चर्यचकित रह गया।

वास्तव में वह युवक और कोई नहीं उसी वृद्धा का इकलौता पुत्र था। इस प्रकार अपनी दुष्ट प्रवृत्ति के कारण उस वृद्धा ने अपने इकलौते पुत्र को खो दिया। किसी ने ठीक ही कहा है- जैसी करनी वैसी भरनी।

लकड़हारा और लोमड़ी

एक बार की बात है, एक भूखा लोमड़ी था जो खाने के लिए कुछ ढूंढ रहा था, वह बहुत भूखा था। वह खाना ढूंढने में बहुत कोशिश की लेकिन उसे भोजन नहीं मिला।

अंत में लोमड़ी जंगल पर गया और वहां भोजन की तलाश की, अचानक उसे एक छेद वाले बड़ा पेड़ नजर पड़ी, उस छेद में एक पैकेज था। भूखा लोमड़ी ने सोचा कि इसमें भजन हो सकता है।

लोमड़ी बहुत खुश होकर छेद में कूद गया, जब उन्होंने पैकेज खोला, तो उन्होंने उसमें रोटी मांस और फलों के टुकड़े देखें। लोमड़ी बहुत खुश होकर खाना खाने लगी।

जंगल में पेड़ों को कटने से पहले एक लकड़हारा ने भजन को उस छेद में रख दिया था, लकड़हारा इसे अपने दोपहर के भजन के लिए रखा था।

खाना खाने के बाद लोमड़ी को प्यास लगी, और उसने पास के झरने का पानी पीने का फैसला किया। हालांकि, उसने कितनी भी कोशिश की लेकिन वह छेद से बाहर नहीं निकल पाया।

लोमड़ी इतना खाना खा लिया था कि वह छेद में फिट होने के लिए बहुत बड़ी हो गई थी। लोमड़ी बहुत दुखी और परेशान थे,

उन्होंने खुद कहा, ‘काश मैंने छेद में कूदने से पहले थोड़ा सोचा होता।’

शिक्षा: यह पहले इसके बारे में सोचे बिना कुछ करने का परिणाम है।

असली धन

एक बार की बात है, एक शहर में एक बहुत अमीर आदमी रहता था। वह हमेशा अपने दोस्त और रिश्तेदारों में अपने धन को लेकर घमंड करता था।

उसकी बेटा एक दूर शहर में पढ़ रहा था, और वह छुट्टी पर घर आया था। वह अपने बेटे को दिखाना चाहता था कि वह कितना अमीर है, लेकिन उनके बेटे को अमीर बनने का शौक नहीं था।

उन्होंने गरीब लोगों के जीवन को दिखाने के लिए पूरी शहर में एक दिन की यात्रा की योजना बनाई, पिता और पुत्र ने एक रथ लिया और पूरे दिन नगर का भ्रमण किया, वह दो दिन बाद घर लौटे।

फिर अमीर आदमी ने अपने बेटे से पूछा, ‘यात्रा कैसी थी?’ बेटे ने जवाब दिया ‘यह आपके साथ एक शानदार यात्रा थी.’ ‘अंत में आपको एहसास हुआ कि गरीब कैसे वास्तव में रहते हैं’ पिता ने कहा।

बेटे ने उत्तर दिया, ‘नहीं पिताजी हमारे पास केवल दो कुत्ता है, उनके पास 10 कुत्ता है, हमारे पास विभिन्न देशों से आयातित शानदार रोशनी है, लेकिन वहां हजारों सितारे हैं उनकी रातों रोशनी।

हम उनसे खाना खरीदते हैं, लेकिन वह इतनी समृद्ध है कि वह अपने स्वयं के भोजन की खेती कर सकते हैं।’ अमीर पिता अपने बेटे की बात सुनकर गूंगा और अवाक रह गया।

अनंत में अंत में बेटे ने कहा ‘पिताजी, मुझे दिखाने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद कि कौन अमीर और कौन गरीब है, मुझे यह समझाने के लिए धन्यवाद कि हम वास्तव में कितने गरीब है।’

शिक्षा: सच्ची दौलत अच्छी दोस्त और दयालु रिश्तो में बनती है।

प्यासा कौआ

एक बार गर्मी का मौसम चल रहा था, एक प्यासा कौआ पानी की तलाश कर रहा था। काफी समय तक उसे पानी नहीं मिला था, वह बहुत कमजोर महसूस कर रही थी।

अचानक उसने एक पानी का जग देखा, वह नीचे आकर देखने लगा उसमें पानी है क्या नहीं, कौआ जग के अंदर कुछ पानी देख सकता था।

कौआ उसकी सिर जग की अंदर धकेलने की कोशिश की, अफसोस की बात उसने देखा की जग की गठन बहुत संकीर्ण थी। फिर उसने पानी को बाहर निकालने के लिए जग को नीचे धकेलने की कोशिश की।

लेकिन जग बहुत भारी था उसने नहीं कर पाया, कौआ ने थोड़ी देर सोचा। फिर वह चारों ओर देखने लगी, उसने कुछ कंकड़ दिखा। अचानक उसकी दिमाग में एक विचार आया।

वह एक-एक करके कंकड़ उस जग में गिराना शुरू किया, जैसे-जैसे अधिक से अधिक कंकड़ उसमें डाला, पानी का स्तर बढ़ता गया।

जल्द ही यह कौआ पीने के लिए पानी पर्याप्त था, उसकी जोजोना काम कर गई थी। फिर कौआ उसकी प्यास बुझाई और वहां से उड़ गई।

शिक्षा: यदि आप पर्याप्त प्रयास करते हैं, तो आपको जल्द ही अपनी समस्या का समाधान मिल सकता है।

पैसा और परिवार

एक बार एक गांव में राम अपनी परिवार के साथ रहते थे, राम बहुत मेहनत करते थे, वह परिवार में एक मात्र कमाने वाला थे। उसकी तीन बच्चे, दो बेटा और एक बेटी।

वह प्रतिदिन 16 घंटे से अधिक काम करता है, बच्चे उसे नहीं देख सकते, वह सुबह उठने से पहले काम पर निकल जाता, और आधी रात को बच्चे सो जाने के बाद घर पहुंचता।

ऐसे ही चलते चलते कुछ साल बीत गए, अब राम के पास बहुत सारा पैसा है, उन्होंने एक नया घर लिया, हालांकि हमेशा की तरह, राम ने अधिक से अधिक काम करना जारी रखा।

एक दिन उसकी पत्नी ने उससे पूछा, ‘तुम पैसे के लिए क्यों भाग रहे हो? हमारे पास अभी जो है, हम उससे खुश रह सकते हैं’

राम ने जवाब दिया, ‘हम आप सभी को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ उपलब्ध कराना चाहता हूं, कि आप हमेशा खुश रहे।’ दो साल बीत गए और राम बड़ी मुश्किल से परिवार के साथ समय बिताया।

अब राम का परिवार शहर के सबसे धनी परिवारों में से एक है, उनके पास सभी सुविधाएं है। फिर भी राम के बच्चों ने अपने पिता से मिलने के लिए बहुत कोशिश करती थी।

राम का परिवार छुट्टी बिताने के लिए उसके समुद्र तट के घर गया, उसकी बेटी ने पूछा, ‘पिताजी क्या आप एक दिन घर पर हमारे साथ यही रहोगे।’

राम ने उत्तर दिया, ‘हां प्रिय कल मैं दोपहर का भजन तुम्हारे साथ करूंगा, और अगले कुछ दिनों तक तुम्हारे साथ रहूंगा, मैं काम से थक गया हूं।’ पूरा परिवार बहुत खुश हो गया।

दुर्भाग्य से, अगले दिन राम के परिवार में कोई भी जीवित नहीं था, क्योंकि वह सुनामी में वह गए थे। जब उसने समुद्र तट पर पहुंचे, तो उसने हर जगह समुद्र और पानी देखा।

अपनी परिवार के लिए चिल्लाया, वह उन्हें फिर कभी नहीं पा सकता है, उन्हें देख भी नहीं सकता है। उसे अपनी पत्नी की बात याद आई, ‘तुम पैसे के लिए क्यों भाग रहे हो’ वह रोने लगा।

शिक्षा: पैसा सब कुछ नहीं खरीद सकता है।

संन्यासी का स्वदेश प्रेम

विरक्त संत स्वामी कृष्णबोधाश्रमजी ने बचपन में ही अपनी विशेष पोशाक पहनने और संस्कृत व हिंदी भाषा पर गर्व करने का संकल्प लिया था। साधु बनने के बाद स्वामीजी धर्म प्रचार के लिए जहाँ भी जाते, तो वहाँ श्रद्धालुओं को स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल के लिए प्रेरित करते थे।

एक बार मथुरा जिले के किसी नगर में उन्होंने प्रवचन करते हुए कहा, ‘ब्रजभूमि भगवान् श्रीकृष्ण की लीला भूमि है। यहाँ के लोगों को अपने बच्चों को विदेशी भाषा न पढ़ाकर देववाणी संस्कृत और हिंदी पढ़ानी चाहिए ।

विदेशी वस्त्रों की जगह खादी के वस्त्र पहनने चाहिए । ‘ उनके इस प्रवचन से प्रशासन के कान खड़े हो गए । गुप्तचर विभाग ने रिपोर्ट दी कि कृष्णबोधाश्रमजी लोगों को ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भड़का रहे हैं ।

स्वामीजी धर्मप्रचार करते हुए मेरठ पहुँचे। मथुरा प्रशासन मेरठ प्रशासन से उन पर निगाह रखने का अनुरोध पहले ही कर चुका था ।

एक दिन एक सरकारी अधिकारी स्वामीजी के प्रवचन में पहुँचा। वह चुपचाप प्रवचन सुनता रहा। बाद में उनके चरण स्पर्श करते हुए बोला, ‘महाराज, आपके प्रवचन से मैं बहुत प्रभावित हूँ।

यदि आप केवल धर्मोपदेश करें और स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग की बात कहना छोड़ दें, तो सरकारी कोप से बच सकते हैं। ‘

स्वामीजी ने कहा, ‘मैं धर्म के साथ-साथ राष्ट्रधर्म की भी प्रेरणा देता हूँ। आप अपनी नौकरी बचाने के लिए मुझे संन्यासी धर्म से विचलित करने का प्रयास न करें। साधु किसी से भय क्यों खाएगा?’ वह अधिकारी उनके चरणों में लोट गया।

दसवाँ व्यक्ति

सोहन एक बेरोजगार युवक था। वह कुछ कार्य करना चाहता था। इसलिए उसने महल के द्वार पर खड़े होकर राजा से नौकरी माँगने का निर्णय लिया। अगले दिन वह महल के द्वार पर खड़े होकर राजा का इंतजार करने लगा।

समय व्यतीत करने के लिए वह महल के अंदर आने जाने वाले व्यक्तियों की गिनती करने लगा। पूरे दिन उसने अन्दर जाने वाले दस अजनबी व्यक्तियों की गिनती की। लेकिन शाम तक उनमें से सिर्फ नौ ही व्यक्ति बाहर आए थे।

शाम को जब राजा महल से बाहर आए तो सोहन ने उनसे नौकरी की। बात की लेकिन दुर्भाग्यवश राजा ने उसे मना कर दिया। तब सोहन ने राजा से कहा, “महाराज,

महल के अंदर जाने वाले दस अजनबियों में से सिर्फ नौ ही अजनबी बाहर आए हैं। एक व्यक्ति अब भी अंदर ही है।” यह सुनकर राजा ने उसी वक्त अपने सैनिकों को उस दसवें व्यक्ति को ढूँढने का आदेश दिया।

वह व्यक्ति राजा के ही कमरे में छुपा हुआ था। सैनिकों ने उसे पकड़ लिया। वह व्यक्ति दुश्मन देश का जासूस था, जो राजा को मारने आया था। यह देखकर राजा सोहन से बहुत खुश हुआ और उसने उसे अपना अंगरक्षक बना लिया।

अनूठी सेवा भावना

गीता मर्मज्ञ सद्गृहस्थ संत जयदयाल गोयंदका ने आजीवन गीता का प्रचार करने का संकल्प लिया था। इसी उद्देश्य से गीता प्रेस गोरखपुर ) की स्थापना की गई थी।

उन्होंने स्वयं भी अनेक धार्मिक ग्रंथों की रचना की । वे प्रायः कहा करते थे, ‘पीड़ितों की सेवा सबसे बड़ा धर्म है। जिसका हृदय दूसरे के दुःख को देखकर द्रवित नहीं होता, वह धार्मिक हो ही नहीं सकता।’

एक बार वह अपनी जन्मस्थली चुरु ( राजस्थान) में ठहरे हुए थे। उन्हें पता लगा कि गरीब दलितों की बस्ती में आग लग गई है। उनका सबकुछ राख हो गया है। यह सुनते ही गोयंदकाजी का हृदय द्रवित हो उठा।

वे अपने साथियों को लेकर घटनास्थल पर पहुँचे। पीड़ितों की अन्न व वस्त्रादि से सहायता की । धर्मशाला में उन्हें ठहरने की व्यवस्था की और अपने धन से उन लोगों के लिए पुनः झोंपड़ियाँ बनवाईं।

कुछ दिनों बाद उस बस्ती में फिर आग लग गई। इस बार भी गोयंदकाजी ने उन लोगों की झोंपड़ियाँ बनवा दीं। किसी व्यक्ति ने उनसे कहा, ‘बार-बार झोंपड़ियाँ बनवाने की जिम्मेदारी क्या आपने ही ली है?’

उन्होंने कहा, ‘यदि कोई बार-बार बीमार होता है, तो क्या उसका इलाज नहीं कराया जाता? इसी प्रकार हमें यह मानना चाहिए कि हम आपदाग्रस्त लोगों की सेवा कर भगवान् की ही पूजा-उपासना कर रहे हैं । ‘ गोयंदकाजी ने आजीवन दरिद्रों की सेवा अपने आराध्य भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा की तरह की ।

मुनिश्री का अनूठा प्रभाव

विख्यात जैन मुनि आचार्य सुदर्शनजी महाराज गाँवों और नगरों में पदयात्रा कर लोगों को दुर्व्यसनों को त्यागने और सदाचार का पालन करने की प्रेरणा दिया करते थे ।

उन्होंने विभिन्न धर्मों का गहन अध्ययन किया था। वे प्रायः कहा करते थे कि जब तक मांस-मदिरा तथा अन्य नशी पदार्थों का त्याग करके सात्त्विक और शुद्ध जीवन नहीं अपनाओगे, तब तक आत्मिक उन्नति असंभव है। प्रत्येक धर्म का यही सार है कि जीवन को पवित्र और शुद्ध बनाओ।

एक बार मुनिश्री शिष्य मंडली के साथ पंजाब के एक गाँव में शाम के समय पहुँचे। उन्हें पता चला कि यहाँ के सभी ग्रामीण सिख हैं। रात बिताने की व्यवस्था गुरुद्वारे में की गई।

गुरुद्वारे में एक सिख ग्रंथी ने सभी मुनियों से भोजन करने के लिए आग्रह किया, तो उन्होंने कहा, ‘हम सूर्यास्त से पूर्व मात्र एक बार भिक्षा माँगते हैं। रात में ज भी ग्रहण नहीं करते । ‘

सवेरा होते ही ग्रंथी ने मुनिश्री से प्रार्थना की, ‘महाराज, गुरुद्वारे में गुरु ग्रंथ साहब के समक्ष सिर ढककर खड़े रहने का नियम है। ‘

मुनिश्री ने सहर्ष सभी को ऐसा करने का आदेश दिया। सभी मुनिगण ग्रंथ साहब के समक्ष नतमस्तक हुए। मुनिश्री ने गुरु ग्रंथ साहब का अध्ययन किया हुआ था।

उन्होंने गुरुवाणी पर प्रभावी प्रवचन किया और दुर्व्यसनों-नशा सेवन के दुष्परिणाम बताए। सभी उनके प्रवचन सुनकर अभिभूत हो उठे। मुनिगण नियमानुसार सिख घरों से भिक्षा प्राप्त करने गए सभी ने उन्हें श्रद्धा से भोजन दिया। अगले दिन उन्हें आदर सहित विदा किया गया ।

सेवा ही धर्म है

आयरलैंड में एक पादरी के परिवार में जन्मी मारग्रेट एलिजाबेथ नोबल स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित होकर भारत आईं। 25 मार्च, 1898 को मार ने स्वामीजी से दीक्षा ग्रहण की ।

स्वामीजी ने उनका नामकरण किया ‘भगिनी निवेदिता । स्वामीजी ने भगिनी निवेदिता को गीता, महाभारत, रामचरितमानस आदि का अध्ययन कराया और भारत के इतिहास, धर्म व संस्कृति से अवगत कराया।

भगिनी निवेदिता ने अपना संपूर्ण जीवन भारत में रहकर भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में लगा दिया।

भगिनी निवेदिता जब पहली बार गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर के निवास पर पहुँचीं, तो परिचय प्राप्त करने के बाद रवींद्र बाबू ने अपनी पुत्री को बुलाया और निवेदिता से कहा, ‘तुम मेरी बेटी को अंग्रेजी भाषा, साहित्य और संस्कृति का अध्ययन कराओ।’

निवेदिता ने विनम्रता से कहा, ‘गुरुदेव, मैं स्वयं अंग्रेजीयत का त्याग कर भारतीय बन गई हूँ। ऐसी स्थिति में आप मुझसे यह अपेक्षा न रखें कि मैं भारत जैसे महान् देश में किसी विदेशी भाषा या संस्कृति का शिक्षण दूँगी । ‘

रवींद्र बाबू अंग्रेज युवती की भारत भक्ति देखकर हतप्रभ रह गए। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि वे भारत तथा भारतीयता की सेवा के अपने संकल्प को पूरा करें। बंगाल में एक बार भीषण बाढ़ आई ।

भगिनी निवेदिता को बाढ़ पीड़ितों की सेवा करते देख रवींद्र बाबू ने कहा, ‘बेटी, तुमने वास्तव में अपने गुरु के सूत्र, सेवा ही धर्म है, को साकार रूप देकर अपना जीवन सफल बना लिया है। ‘

काजी का न्याय

एक दिन तीन भाई न्याय पाने के लिए काजी के पास गए। उनका मामला बड़ा अनोखा था। वे काजी से बोले, “हमारे पिता की मृत्यु हो चुकी है। मरने से पहले हमारे पिता ने कहा था कि आधी जायदाद बड़े बेटे की होगी.

जायदाद का एक-चौथाई हिस्सा दूसरे बेटे और जायदाद का छठवाँ हिस्सा तीसरे बेटे का होगा। इसलिए हमने उनकी मृत्यु के बाद जमीन-जायदाद को उसी तरह बाँट लिया।

लेकिन हम ग्यारह ऊँटों को नहीं बाँट पा रहे हैं। हम उन्हें किस प्रकार बाँटे?” उनकी बात सुनकर कुछ देर तो काजी सोच में पड़ गया लेकिन फिर बोला,

“यदि तुम्हें एतराज न हो तो मैं तुम्हारे पशु समूह में अपने ऊँट को भी शामिल करना चाहता हूँ।” वे बोले, “नहीं, हमें कोई एतराज नहीं है।” अब उनके पास बारह ऊँट हो गए थे।

तब बड़े बेटे को बारह ऊँटों के आधे छह ऊँट मिले, वहीं दूसरे बेटे को एक-चौथाई के हिसाब से तीन ऊँट मिले और सबसे छोटे बेटे के हिस्से छठवें भाग के हिसाब से दो ऊँट आए।

बटवारा करने के बाद काजी ने अपना ऊँट वापस ले लिया। तीनों भाई काजी के चतुराईपूर्ण न्याय से बहुत खुश थे।

सोच-समझकर बोलो

एक गाँव में एक गरीब किसान और उसकी पत्नी रहते थे। एक बार देवी को उनकी गरीबी पर दया आ गई। वह उनके पास आई और बोली, “तुम लोग वर्षों से गरीबी में रह रहे हो। इसलिए मैं तुम्हारी सहायता करना चाहता हूँ।

तुम लोग आज जो भी तीन इच्छाएँ करोगे, वे तुरंत ही पूरी हो जाएँगी।” वे बोले,”इस दया के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद” उस रात वे रसोई में बैठकर सोच रहे थे कि क्या इच्छा की जाए। तभी किसान की पत्नी बोली,

“मेरी चिकन खाने की बड़ी इच्छा है।” उसके ऐसा कहते ही प्लेट में चिकन प्रकट हो गया। किसान ने उसे डाँटते हुए कहा, “बेवकूफ औरत! तुमने एक वरदान बर्बाद कर दिया। यह चिकन तुम्हारी नाक पर चिपक जाए।”

उसने जैसे ही यह बोला, चिकन उसकी पत्नी की नाक पर चिपक गया। यह देखकर वे दोनों डर गए। पत्नी बोली, “मेरी इच्छा है कि यह चिकन मेरी नाक से छूट जाए।” ऐसा कहते ही चिकन उसकी नाक से हट गया।

इस तरह उनके तीनों वरदान व्यर्थ हो चुके थे। इस प्रकार उन दोनों ने अपनी बेवकूफी के कारण बोलने से पहले सोचा नहीं और अमीर बनने का सुनहरा मौका गंवा दिया।

मोनू की याददाश्त

एक दिन मोनू बीमार पड़ गया। डॉक्टर ने उसे खिचड़ी खाने की सलाह दी। मोनू की याददाश्त बहुत कमजोर थी, इसलिए वह घर जाते हुए रास्ते में ‘खिचड़ी-खिचड़ी’ बोलता हुआ जा रहा था।

शीघ्र ही वह खिचड़ी शब्द भूल गया और ‘खा चिड़ी, खा चिड़ी’ बोलने लगा। जब वह एक खेत से होकर गुजर रहा था, तो खेत के मालिक ने उसे ‘खा चिड़ी, खा चिड़ी’ कहते सुन लिया।

उसने मोनू को पकड़कर पीटना शुरू कर दिया और बोला, “तुम चिड़ियों को मेरी फसल खाने को कह रहे हो। ‘खा चिड़ी’ के बदले ‘उड़ चिड़ी’ बोलो।” . अब मोनू ने ‘उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी’ बोलना शुरू कर दिया।

रास्ते में एक बहेलिए ने चिड़िया पकड़ने के लिए जाल बिछाया हुआ था। उसने मोनू के शब्द सुने तो उसे बड़ा गुस्सा आया। उसने मोनू को जोरदार तमाचा मारते हुए कहा, “अरे, ‘उड़ चिड़ी, उड़ चिड़ी’ मत बोलो।

इससे तो चिड़िया उड़ जाएंगी। तुम ‘फँस चिड़ी, फँस चिड़ी’ बोलो।” अब मोनू ‘फँस चिड़ी, फँस चिड़ी’ बोलते हुए चलने लगा। आगे रास्ते में उसे लुटेरों के एक गिरोह ने पकड़ लिया और पीटना शुरू कर दिया।

वे बोले, “तुम हमें फँसवाकर पकड़वाना चाहते हो।” इस प्रकार बेचारे मोनू को अपनी कमजोर याददाश्त के कारण बार-बार पिटाई खानी पड़ी।

पाँच मूर्ख मित्र

एक बार पाँच मूर्ख मित्र एक गाँव जा रहे थे। रास्ते में पड़ने वाली नदी को उन सभी ने तैरकर पार किया। जब वे नदी के दूसरे किनारे पहुंचे तो उनमें से एक मित्र बोला, “दोस्तो, हमें गिनकर देख लेना चाहिए कि हम सभी पूरे तो हैं।

कहीं ऐसा न हो कि हम में से कोई नदी में डूब गया हो।” सभी दोस्त उसकी बात से सहमत थे। इसलिए उनमें से चार पंक्तिबद्ध होकर खड़े हो गए और पाँचवे दोस्त ने गिनती शुरू की, “एक, दो, तीन, चार। अरे! हमारा पाचवाँ मित्र कहाँ है?

वह गायब है।” एक अन्य मित्र ने भी उसी तरह गिनती की और एक मित्र को कम पाया। वह चिल्लाकर बोला, “हमारा पाँचवा मित्र नदी में डूब गया!” बस, फिर क्या था, वे सभी जोर-जोर से रोने लगे। एक राहगीर वहाँ से गुजर रहा था।

जब उसने उनसे उनके दुख का कारण पूछा तो उन्होंने उसे कारण बता दिया। तब राहगीर ने उन सबको एक पंक्ति में खड़ा कर पाँचों को गिना और बोला, “देखो, तुम पूरे पाँच हो।” ये सुनकर वे सभी बड़े खुश हुए।

राहगीर, “तुम सभी गिनती करते हुए अपने को छोड़कर बाकी चारों को गिन रहे थे। इसलिए एक कम हो रहा था।” राहगीर की बात सुनकर उन्हें अपनी मूर्खता का एहसास हुआ।

बंदर और डॉल्फिन

बहुत पहले की बात है, कुछ नाबिक अपने नौकायन जहाज में समुद्र की ओर निकल पड़े। उनमें से एक लंबी जाता के लिए अपने पालतू बंदर को साथ लाया।

जब उन्होंने समुद्र में बहुत दूर थे, अचानक एक तूफान ने उसकी जहाज को पलट दिया। हर कोई समुद्र में गिर गया, और बंदर को यकीन था कि वह डूब जाएगा।

फिर अचानक एक डॉल्फिन दिखाई दे और वह उस बंदर को पीठ में उठाया, वह जल्द ही द्वीप पर पहुंच गए, और बंदर डॉल्फिन के पीठ से नीचे उतरे।

डॉल्फिन ने बंदर से पूछा, ‘क्या आप इस जगह को जानते हैं?’ फिर बंदर ने जवाब दिया, ‘हां मैं जानता हूं, वास्तव में इस द्वीप का राजा मेरा सबसे अच्छा दोस्त है।’

डॉल्फिन जानता था, इस द्वीप पर कोई भी नहीं रहता है। फिर डॉल्फिन ने कहा ‘ठीक है, ठीक है, आप इस द्वीपका राजा हो सकते हैं!’ बंदर ने पूछा, ‘मैं राजा कैसे हो सकता हूं?’

जैसे ही डॉल्फिन समुद्र में तैरने लगा उसने उत्तर दिया, ‘यह आसान है, जैसे कि आप इस द्वीप पर एकमात्र प्राणी है, तो आप स्वभाविक रूप में राजा ही है।’

शिक्षा: झूठ बोलने और घमंड करने वाले कभी भी मुसीबत में पड़ सकते हैं।

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