Short Stories in Hindi for Class 7 - आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ Short Stories in Hindi for Class 7 शेयर करने जा रहे है। इन stories आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।आप इन Short Stories in Hindi for Class 7 को पूरा पढ़े। आपको यह Stories बहुत पसंद आएगी।

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Moral Stories in Hindi for Class 7 List

अंगूर खट्टे है

पूंछ और गुल्ली

फूटा हुआ, अनमोल घड़ा

मालिक का स्वागत

घमण्डी नाग

संगीतमयी गधा

दांत और गोरंभ

मित्र सम्प्राप्ति

एक बुद्धिमान हंस

पानी और प्यासा कौआ

सुगन्ध और खनखनाहट

चमगादड़ों की कथा

मां की जीत

किसान और उसके चार बेटे

दुष्टों का स्वभाव

मां का प्यार

डरपोक व्यक्ति

एक चालाक लोमड़ी

मालिक और नौकर

बच्चे की धमकी

लालची कुत्ता

चूहा और साधु

नन्हीं चिड़िया

बिल्ली के गले में घंटी कौन बंधेगा

बच्चे की दाढ़ी

जन्मदिन की दावत

मूर्ति की माया

खूबसूरत सींग, मुसीबत की जड़

डरपोक गिलहरी

सफेद खाल का भेड़िया

गधे का भाग्य

कुएँ के मेंढक

बच्चा

भगवान हर्मिज तथा एक इंसान

धोबी का गधा

दो बिल्लियाँ और बन्दर

चार मित्र और शिकारी

अंगूर खट्टे है

एक बार एक लोमड़ी बहुत भूखी थी. वह भोजन की तलाश में इधर – उधर भटकती रही लेकिन कही से भी उसे कुछ भी खाने को नहीं मिला.

अंत में थक हारकर वह एक बाग़ में पहुँच गयी. वहां उसने अंगूर की एक बेल देखी. जिसपर अंगूर के गुच्छे लगे थे.

वह उन्हें देखकर बहुत खुश हुई. वह अंगूरों को खाना चाहती थी, पर अंगूर बहुत ऊँचे थे. वह अंगूरों को पाने के लिए ऊँची – ऊँची छलांगे लगाने लगी.

किन्तु वह उन तक पहुँच न सकी. वह ऐसा करते – करते बहुत थक चुकी थी. आखिर वह बाग से बाहर जाते हुए कहने लगी कि अंगूर खट्टे है. अगर मैं इन्हें खाऊँगी तो बीमार हो जाउंगी.

शिक्षा: दोस्तों कभी भी हो हमें हर चीज में या हर हालात में हमेशा अच्छाई ढूंढनी चहिये. हम अगर कोई चीज प्राप्त न कर सके तो उसे बुरा नहीं कहना चाहिए (हमें इस लोमड़ी की तरह अंगूर खट्टे है कभी नहीं बोलना है).

पूंछ और गुल्ली

एक बार एक लकडहारा जंगल से लकड़ियों को काटकर एक मैदान में ले गया। लकड़ियां बहुत बड़ी बड़ी थीं।

अतः वह अपनी सहजता के लिए वहां जाकर उन लकड़ियों को चीरने लगा, तांकि घर तक ले जाने में उसे आसानी हो। उसने थोड़ी लकड़ी की बल्लियां चीर डाली,

और फिर आई एक बड़ी सी बल्ली की बारी। वह लकड़ी की बल्ली बहुत ही मोटी और बड़ी थी।

लकड़हारे को उसे चीरने में बड़ी कठिनाई हो रही थी। अभी बल्ली आधी ही चिरी थी कि, लकड़हारे को याद आया कि, उसकी एक कुल्हाड़ी जंगल में ही छूट गयी है।

वह आधी चिरी हुई लकड़ी में एक छोटी सी गुल्ली फंसा कर जंगल चला गया अपनी कुल्हाड़ी लेने के लिये।

मैदान के पास में एक पेड़ था,पेड़ में एक बन्दर बैठा हुआ था। वह बहुत देर से लकड़हारे को लकड़ियां चीरते हुए देख रहा था। उसको उस लकड़ी की छोटी सी गुल्ली में बहुत ही दिलचस्पी थी।

जब लकडहारा जंगल की ओर चल दिया, तब वह बन्दर पेड़ से उस लकड़ी के पास चला आया और ध्यान से उस लकड़ी की गुल्ली को देखने लगा।

कुछ देर देखने के बाद उसने उस लकड़ी की गुल्ली को हाथ लगाया। उसे वह बहुत पसंद आई। वह उसे निकालने की कोशिश करने लगा।

इतने में उड़की पूछ लकड़ी के चीरे हुए भाग में चले गई। बन्दर ने जोर लगा कर उस गुल्ली को निकाल लिया।

जैसे ही गुल्ली निकली वैसे ही उसकी पूंछ लकड़ी के दोनों भागों के बीच फंस गईं बन्दर को बहुत दर्द हो रहा था। उसने अपनी पूंछ को बहुत निकालने का प्रयास किया परन्तु पूंछ नहीं निकली।

उसने अब जोर लगाया तो उसकी पूंछ का दबा हुआ हिस्सा वही लकड़ी के बीच में ही रह गया। उसकी पूंछ अब कट चुकी थी वहां की जगह पूंछ कटने से लहूलुहान हो गयी।

बन्दर जल्दी अपनी वैसी ही हालत में वहां से भाग निकला।

शिक्षा: “जिन चीजों के बारे में जानकारी न हो उन्हें किसी के परामर्श के बिना नहीं छूना चाहिए।”

फूटा हुआ, अनमोल घड़ा

एक किसान था, वह दिन भर अपने खेत में व्यस्त रहता था, और शाम को घर जाकर अपने मिट्टी के घड़े का शीतल और निर्मल जल पीता था। जिससे उसकी पूरे दिन की थकान मिट जाती थी।

वह सुबह उठकर उस घड़े को नदी से भर लाता था, शाम तक उसका वह पानी चल जाता था।

एक दिन उसका मटका गलती से दरवाजे के कोने से टकराकर टूट गया। वह परेशान हुआ। फिर उसने सोचा कि एक नया घड़ा बाजार से ले आता हूँ। वह बाजार घड़े की दुकान में गया।

वह घर ले जाने के लिए घड़े देख ही रहा था कि उसे दो सुंदर घड़े दिखे। उसको एक ही घड़ा लेना था परन्तु घड़ों की सुंदरता देख वह दोनो ही घड़े घर ले आया।

वह नदी से दोनों घड़े भर लाया और पुराने घड़े के स्थान पर रख दिया। लेकिन उसने देखा कि एक घड़े में तो आधा ही पानी था, उसने मटके को अच्छे से देखा, तो पीछे से एक जगह से वह फूटा हुआ था।

उसने कुछ सोचा और वह बाहर चला गया। अब वह रोज उन दोनों घड़ों में पानी लाने लगा।

फूटा घड़ा बहुत अचंभित था उसने रोते रोते एक दिन अच्छे घड़े से बोला, “देखो न हमारे मालिक कितने अच्छे हैं,मैं फूटा हुआ हूं लेकिन फिर भी वे मुझे भी अपने उपयोग में लाते हैं। मैं सच मे किसी के लायक नहीं हूं।”

अच्छा घड़ा बोला, “ऐसा मत सोचो। लेकिन हां यह तो सत्य ही है, की मैं पूरा पानी घर तक लाता हूँ और तुम पानी बर्बाद कर देते हो, ऐसे हमारे मालिक की मेहनत भी बर्बाद होती है।”

फूटा घड़ा और जोर जोर से रोने लगा। शाम भी हो गयी थी। किसान घर आया। उसने फूटे घड़े की रोने की आवाज सुनी, तो वह उसके पास गया और उससे रोने का कारण पूछा,

तब फूटा घड़ा बोला, “मालिक मैं आपके किसी भी कम का नही हूँ, कृपया आप मेरी जगह एक अच्छा घड़ा दुकान से ले आइए।”

किसान बोला, “मुझे उस दिन ही इस बात का पता चल गया था, जिस दिन मैं तुम्हें लेकर आया था, लेकिन मैं ने तुम्हें इसलिए नहीं बदल, क्योंकि तुम्हारी वजह से आज एक बहुत अच्छा काम हुआ है,

जब मैं तुम्हें भरकर लाता था तो तुम्हारा पानी उस बेजान रास्ते पर पड़ता था, अतः मैं ने वहां बहुत सारे फूल के पौधों लगा दिए थे, तुम अनजाने में उन पौधों की रोज सिंचाई कर देते थे।

आज वह पौधे बहुत बड़े और सुंदर भी हो गए हैं। फूलों को तो मैं बेचकर अपने लिए पैसे भी जुटाने लग गया हूँ। इस प्रकार तुमने मेरी आमदनी को और अधिक बड़ा दिया है।

तुम्हें यकीन नही है तो कल सुबह जब हम पानी भरने जाएंगे तब देख लेना।”

फूटे घड़े ने रोना बन्द कर दिया। अगली सुबह जब वे पानी भरने जा रहे थे, तो फूटे घड़े ने रस्ते के पौधों और उनमें उगे फूलों को देखा। वह बहुत खुश हुआ।

तब से उसने भी अपनी कमजोरी को नजरअंदाज कर दिया। और वह भी खुश रहने लगा।

शिक्षा: “अपने गुणों को इतना विकसित करिए कि आपकी कमियों को लोग नजरअंदाज कर सकें।

मालिक का स्वागत

एक बार एक व्यापारी के पास एक कुत्ता और एक गधा था। उसने उन दोनों को अपने कार्य के लिए पाल रखा था। कुत्ता घर की रखवाली किया करता था,

और गधा, अपने मालिक का बोझ बाहर इधर से उधर, ले जाया करता था। वास्तव में गधे का कार्य थोड़ा कठिन था, किन्तु कुत्ते का भी सरल नहीं था।

लेकिन गधे को लगता था की उसके साथ भेदभाव हो रहा है, इसलिये वह कुत्ते से ईर्ष्या करने लग गया।

एक दिन गधे ने सोचा, “कुत्ते को तो घर से बाहर ही नहीं जाना पड़ता, घर में ही रहता है। कितने मजे है उसके।

ऊपर से एक मैं हूं, जो दिन भर मालिक की डंडी से मार खा खाकर भी इधर उधर मालिक का सामान पहुंचाता हूँ। फिर भी मालिक उसी को प्यार करते हैं। मेरी तो कोई परवाह ही नहीं है उनको।”

कुछ देर बाद उसने और सोचा, “जब मालिक थके हुए आते हैं तो कुत्ता उनको देखकर प्यार से भौंकता है, पूंछ हिलाता है, और खड़ा भी हो जाता है।

शायद तभी मालिक खुशहोते हैं और उसे प्यार करने लग जाते हैं। अब से मैं भी ऐसा ही करूँगा तब मालिक मुझसे भी प्रसन्न रहेंगे और मुझे भी प्यार करेंगे।”

शाम को व्यापारी घर आया। जैसे ही गधे को पता लगा कि, मालिक घर आ गया है, वह उसके पास गया, वह अपनी आवाज में ढेंचू- ढेंचू करने लगा, फिर सब अपने मालिक को देखकर पूंछ हिलाई और फिर खड़ा भी हो गया।

व्यापारी को यह सब देखकर आश्चर्य हुआ और उसने सोचा कि, आज मेरा गधा पागल हो गया है, उसने अपनी छड़ी उठाई और उसकी खूब पिटाई की।

गधा तो खुश करने गया था और पिट कर आ गया।

शिक्षा: “किसी से भी बैरभाव या ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।

घमण्डी नाग

एक बार जंगल में एक नाग था। वह अकेला ही था। वह बहुत जल्द बड़ा हो रहा था। वह चींटियों के अंडों, कीड़े मकोड़ों, और अन्य छोटे छोटे जीवों को खाकर अपना पेट भर करता था।

वह इन सब चीजों को खाकर बहुत हट्टा कट्टा और जहरीला हो गया। वह अपने आपको बहुत अधिक बलशाली समझने लगा। अब उसे यह लगने लगा, कि वही जंगल का राजा है।

उसे ही जंगल का राजा बनना चाहिए। वैसे भी जंगल के सभी बड़े बड़े जानवर उससे डरते थे। सभी पशु-पक्षियों में उसका खौफ देखते ही बनता था।

एक दिन उसे लगा कि, मैं जंगल का राजा हूँ, मुझे रहने के लिए अच्छी जगह पसन्द करनी चाहिए। फिर वह रेंगता हुआ निकल पड़ा, अपने नए घर की खोज में।

कुछ ही देर में उसकी खोज समाप्त हुई और उसे एक बड़ा सा पेड़ दिख, उसने सोचा यहीं पेड़ के नीचे मैं अपना घर बनाऊंगा।

लेकिन यह क्या!!

उसने देखा कि वहां पेड़ के नीचे तो पहले से ही चींटियों का घर था। उसने गुस्से से अपनी पूंछ से चींटियों का घर तोड़ डाला। सभी चींटियों को बहुत गुस्सा आया और वे बाहर आ गयी।

नाग ने कहा, “चली जाओ यहां से सब, यहाँ मैं रहूंगा।”

चीटियां उससे डरने की बजाय और क्रोधित हो गई। अब हजारों की संख्या में चीटियां सांप के ऊपर चढ़ गई। नाग को भी सुई चुभने जैसी पीड़ा पूरे शरीर में होने लगी।

वह कुछ नहीं कर सका। थोड़े ही देर में वह तड़प तड़प कर मर गया।

चींटियों ने वापस कड़ी मेहनत से अपना घर बनाया। और वहां रहने लगीं।

शिक्षा: “स्वयं को महान औऱ दूसरों कप तुच्छ समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए।”

संगीतमयी गधा

एक धोबी के पास एक गधा था। धोबी उससे दिन भर मजदूरी करवाता था, और उसे पेट भर भोजन भी नहीं देता था। धोबी बहुत ही निर्दयी और कंजूस था। वह रात को उसे खुला छोड़ देता था करने के लिए।

वहां कोई अच्छी घांस की जगह भी नहीं थी, जहां जाकर वह कर सके। गधा बहुत ही कमजोर,दुबला पतला हो गया।

एक दिन गधा रात में चर ही रहा था कि उसकी मुलाकात एक गीदड़ से हो गयी। गीदड़ बहुत ही मोटा खासा हट्टा कट्टा था। ऐसा लगता था कि वह दुनिया का सबसे सुखी जानवर है।

गधा गीदड़ के पास गया। दोनो ने बातचीत शुरू की। दोनों की बातें ही ही रही थी कि गीदड़ ने गधे से पूछा, “क्या बात है गधे दोस्त तुम तो काफी दुबले पतले हो, तुम खाना नहीं खाते हो क्या?

मैं ने आज तक तुम्हारे जितना दुबला पतला जानवर कहीं भी नहीं देखा।”

गधा उसकी बात सुनकर रोने लगा, और गीदड़ से बोला, “क्या बताऊँ दोस्त ! आज तुम पहले ऐसे हो जिसने मुझसे इतने प्यार से बात की है और मुझे मेरे पतले होने के बारे में चिंता व्यक्त की है,

तुम ही मेरे सबसे अच्छे मित्र हो, परिवार के नहीं हुए तो क्या हुआ, मैं तुम्हें आज से अपना परिवार ही मानता हूं। मैं तुम्हें मेरे बारे में बताता हूं। “

थोड़ा रुककर वह फिर बोला, “मैं एक धोबी के वहाँ काम करता हूं वह बहुत ही निर्दयी है। वह मुझसे दिन भर मजदूरी करता है, कभी इधर कभी उधर ले जाता है, वो भी भारी भरकम बोझ के साथ।

मुझे तो वह खाना भी नहीं देता और रात में चरने के लिए छोड़ देता है, देखो न यहां तो चरने के लिए मैदान भी नहीं है तुम ही सोचो क्या खाऊं मैं ?..तभी मेरी हालत ऐसी ही हैं।

यदि मुझे वह काम के बदले थोड़ा भी खाना देता तो मुझे इधर उधर भटकना नहीं पड़ता। और न ही मेरी ऐसी हालत होती।”

गधा अब जोर जोर से रोने लगा।

गीदड़ ने उसे चुप कराया और कहा, “देखो तुमने मुझे अपना परिवार माना है ना, और मुझे अपनी सारी परेशानी भी बताई है। मैं भी अबसे तुम्हें अपना परिवार ही मानता हूं,

और तुम्हारी समस्या मेरी समस्या है। मैं तुम्हारी समस्या का समाधान करूँगा।”

वह बोला, “मेरी हालत देखो, मैं भी पहले तुम्हारे जैसा ही दुबला पतला था। फिर मुझे एक बाग का पता लगा, वहां हमेशा ही फल और सब्जियां लगी रहती हैं, ककड़ियाँ, तरबूज, तोरई, लौकी और बैंगन तो सदाबहार ही हैं।

उस बाग में बड़ी ही तीव्र सुरक्षा है, लेकिन मैं ने एक गुप्त रास्ता बना रखा है, जिसमें से होकर मैं वहां जाता हूँ और पेट भर खाना खाकर वहां से चला आता हूँ। तूम अब मेरे साथ चलो।

तुम्हारी आत्मतृप्ति आज मैं ने नहीं कराई तो मैं भी तुम्हारा दोस्त नहीं।”

गधा, गीदड़ के साथ चल दिया। दोनो उस बाग में पहुंचे। जब गधे ने उतनी सारी, फल और सब्जियां देखी तो वह दंग रह गया। उसने झटपट खाना प्रारंभ किया। कुछ देर बाद उसका पेट भर गया।

उसने गीदड़ को धन्यवाद दिया और कहा कि अपने जीवन में आज उसने पहली बार इतना अच्छा भोजन पेट भर कर खाया है।

दोनो वापस चले गए। अब वे दोनों रोज वहां एक साथ आते और भोजन करते फिर वहां से चले जाते।

गधा थोड़े ही दिनों में मोटा हो गया।

एक दिन जब उन दोनो ने भोजन कर लिया तब गधा कहने लगा, “दोस्त मैने आज बहुत खा लिया है, मेरा पेट भर गया है। तुम खाओ, तब तक मैं गाना गाता हूँ। आज मैं बहुत खुश हूँ और मेरा मन गाने का हो रहा है।

गीदड़ ने उसकी बात सुनकर खाना छोड़ दिया। और उसे समझाया कि, इस बाग के चारों ओर पहरेदार हैं, वे तुम्हारी आवाज सुनकर यहाँ आ जाएंगे और हमे खूब मारेंगे। तो तुम अपना गाना मत गाओ।

गधे को लगा कि उसका दोस्त उससे जल रहा है, क्योंकि उसे गाना नहीं आता। उसने उसकी बात नहीं सुनी और गाने की जिद पर अड़ा रहा। गीदड़ ने सोचा, यह ऐसे नहीं मानेगा।

गीदड़ बोला, “अच्छा ठीक है, मैं ना तुम्हारे लिये कुछ इनाम ले आता हूँ तुम मेरे जाने के 10 मिनट बाद गाना शुरू करना।”

गीदड़ वहां से भाग गया। 10 मिनट बाद गधे ने गाना शुरू किया। उसकी आवाज सुनकर खेत के पहरेदार वहां आ गए और गधे को देख लिया उन्होंने सोचा कि यह वही है,

जो रोज उनकी खेती का नुकसान करता था। उन्होंने उसे खूब पीटा।

गधा मौका मिलते ही वहां से भाग आया। लेकिन वह बहुत तकलीफ में था। और पछता भी रहा था,कि उसने अपने मित्र की बात क्यो नहीं सुनी।

शिक्षा: “अपने हितैषियों की सलाह न मानने का नतीजा बुरा ही होता है।”

दांत और गोरंभ

वर्धमान नामक नगर में दन्तिल नाम का एक आभूषणों का व्यापारी रहता था। दन्तिल ने अपनी व्यवहार कुशलता से न केवल नगरवासियों का मन जीत लिया या, अपितु वहां के राजा को भी प्रसन्न कर रखा था।

नगर में उसके समान कोई चतर व्यक्ति नहीं था। वैसे तो कहावत यही है कि जो व्यक्ति राजा का हित करता है, वह समाज की दृष्टि में हीन होता है, और जो समाज का हितैषी होता है,

राजा उससे द्वेष करता है परंतु दन्तिल इसका अपवाद था। इस प्रकार समय बीत रहा था कि दन्तिल की कन्या का विवाह निश्चित हो गया। उस अवसर पर सेठ ने सारी प्रजा और राजकर्मचारियों को आमंत्रित कर उनका आदर-सत्कार किया।

उस विवाह में राजा और रानी के साथ-साथ राजभवन के कर्मचारी भी आए थे। उनमें राजभवन में झाडू देने वाला गोरंभ भी था। उस अवसर पर गोरंभ किसी ऐसे उच्च आसन पर बैठ गया जो उसके लिए नहीं था।

नगर सेठ ने यह देखा तो उसे अपमानित कर वहां से निकाल दिया गोरंभ के लिए यह अपमान असह्य हो गया। उसने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि वह सेठ से इस अपमान का बदला अवश्य चुकाएगा और उसे राजा की नजरों में गिराकर ही दम लेगा।

एक दिन प्रभात के समय राजा के शयनकक्ष में झाडू लगाते समय गोरंभ यूं बड़बड़ाने लगा, जैसे वह स्वयं से ही बातें कर रहा हो-‘देखो दन्तिल कितना भ्रष्ट हो गया है कि अब महारानी तक का आलिंगन करने लगा है राजा ने जब यह सुना तो हड़बड़ाकर उठ बैठा।

उसने गोरंभ से पूछा-‘गोरंभ! क्या सचमुच दन्तिल ने महारानी का आलिंगन किया था ?’ गोरंभ बोला-‘महाराज। मैं रात-भर जुआ खेलता रहा था, इस कारण अब मुझे बड़ी नींद आ रही है।

उस नींद के झोंके में मैं क्या कुछ बड़बड़ा गया, मुझे स्वयं इसकी याद नहीं है।’ राजा विचार करने लगा कि गोरंभ की तरह दन्तिल भी महल में निर्बाध रूप से आता-जाता रहता है।

हो सकता है गोरंभ ने कभी महारानी को दन्तिल के साथ आलिंगनबद्ध होते देख लिया हो, अन्यथा उसके मुंह से ऐसी बात क्यों निकलती! वह सोचने लगा कि स्त्रियों के विषय में तो संदेह की कोई बात ही नहीं।

वे एक ही समय में एक व्यक्ति से बातचीत करती है तो उसी समय उनके मन में दूसरा व्यक्ति समाया हुआ होता है। स्त्रियों के हृदय का भाव जानना बहुत कठिन है।

इस प्रकार राजा के मन में स्त्रियों के विषय में अनेक प्रकार के भाव उठने लगे। जिसका परिणाम यह निकला कि राजा ने दन्तिल का महल में आना-जाना निषिद्ध कर दिया।

राजा के इस व्यवहार से दन्तिल को बड़ी चिन्ता हुई। वह विचार करने लगा तो उसने पाया कि कौए में पवित्रता, जुआरी में सत्यता, सर्प में क्षमा, स्त्रियों में काम-शांति, कातर में धैर्य, नशेबाज में विवेक और राजा में मैत्री भाव किसने देखा या सुना है।

‘मैंने इसके अथवा इसके किसी प्रिय का कभी कोई अनिष्ट तो किया नहीं, फिर भी यह राजा मुझ पर अप्रसन्न क्यों हुआ ?” दन्तिल राजा को प्रसन्न करने के उद्देश्य से एक बार राजभवन की ओर गया तो द्वारपाल ने उसे रोक दिया।

गोरंभ ने जब यह देखा तो उसने कहा-‘भाई। ध्यान रखना, यह सेठ तो राजा का विशेष कृपापात्र है। कहीं इसे नाराज करके तुम भी मेरी तरह ही धक्के मारकर न निकाल दिए जाओ।’

दन्तिल ने सुना तो उसका माथा ठनका। उसे विश्वास हो गया कि राजा को गोरंभ ने ही भड़काया है। वह सोचने लगा कि राजा की सेवा में नियुक्त व्यक्ति चाहे कितना ही कुलहीन, मूर्ख और राजा द्वारा सम्मानित क्यों न हो, लोक में उसका आदर होता है।

उसे गोरंभ का अपने द्वारा किया गया अपमान याद हो आया। दन्तिल राजभवन के द्वार से वापस आ गया। रात को उसने गोरंभ को आदरपूर्वक अपने घर बुलवाया और उसका खूब स्वागत-सत्कार किया।

विदा करते समय उससे अपने पिछले व्यवहार की क्षमा मांगी तो गोरंभ बोला-‘आप चिन्ता न कीजिए सेठ। राजा किस प्रकार आपको अनुगृहीत करता है, यह आप अब मेरी बुद्धि के चमत्कार से देखेंगे।’

किसी ने ठीक ही कहा है कि तराजू की डंडी की भांति ही क्रूर व्यक्तियों का स्वभाव होता है। वे तनिक-से भार से कभी ऊपर हो जाते हैं तो कभी नीचे।

इस प्रकार दूसरे दिन जब गोरंभ प्रातःकाल के समय राजा के शयनकक्ष में सफाई करने गया तो पहले की भांति ही बड़बड़ाने लगा—’हमारे महाराज भी बड़े विचित्र हैं, मलत्याग करते वक्त भी ककड़ी खाते रहते हैं।’

राजा ने सुना तो वह गुस्से से बोला- ‘गोरी ! यह क्या बकवास कर रहा है ? तूने कभी मुझको ऐसा करते देखा था ?’ गोरंभ ने फिर उसी प्रकार कह दिया कि वह रात-भर जुआ खेलता, जागता रहा है इसलिए नींद में वह क्या कुछ बड़बड़ा गया, उसे कुछ मालूम नहीं।

तब राजा ने विचार किया कि उसने कभी ऐसा कृत्य नहीं किया फिर भी इस मूर्ख ने इस प्रकार की बात मुख से निकाली, तब निश्चय ही दन्तिल के बारे में भी इसने इसी प्रकार कहा होगा।

यह विचार आते ही उसको पश्चात्ताप होने लगा। उसने दन्तिल को सम्मान पूर्वक राजभवन में बुलवाया और उसका खूब स्वागत-सत्कार किया। दन्तिल का राजभवन में पुनः आवागमन होने लगा।

यह कथा सुनाकर दमनक ने संजीवक से कहा-‘इसलिए मैं कहता हूं कि गर्व के कारण जो छोटे-बड़े सभी राजसेवकों का सत्कार नहीं करता उसे दन्तिल की तरह पदच्युत होकर अपमान सहन करना पड़ता है।

संजीवक बोला—’मित्र ! तुम ठीक कहते हो। मैं तुम्हारे कथनानुसार ही कार्य करूंगा।’ तदन्तर दमनक संजीवक को लेकर पिंगलक के समक्ष उपस्थित हुआ और उसे प्रणाम करके कहने लगा—’महाराज ! संजीवक आपकी सेवा में उपस्थित है।

अब आप जो उचित समझें, कीजिए।’ संजीवक ने भी पिंगलक को प्रणाम किया और उसके सम्मुख खड़ा हो गया। पिंगलक ने उसे अपने समीप बैठाते हुए कहा-‘कहिए मित्र ! आप कुशल से तो हैं ? आप कहां से पधारे हैं ?’

पिंगलक से आश्वासन पाकर संजीवक ने अपनी आद्योपान्त कया उसको सुना दी। पिंगलक ने उसकी कथा सुनकर उसे आश्वस्त कर दिया। फिर अपना राजकाज दमनक और करटक के जिम्मे सौंपकर स्वयं संजीवक के साथ रहकर मौजमस्ती करने लगा।

इसका परिणाम यह निकला कि सिंह शिकार करने में लापरवाही बरतने लगा। वह अपनी आवश्यकता-भर के लिए शिकार करता। उस पर आश्रित मांसभोजी प्राणी भूखे रहने लगे जो उनके लिए एक चिन्ता का विषय बन गया।

कहते हैं कि जो राजा अपने सेवकों को वेतन देने में कभी देर नहीं करता, उसके सेवक डांटने-फटकारने पर भी कभी उसको छोड़कर नहीं जाते। किंतु पिंगलक तो इसके विपरीत आचरण कर रहा था।

अतः भूख से पीड़ित दमनक और करटक ने परस्पर विचार-विमर्श किया। वे सोचने लगे कि जब भगवान शंकर के गले में लिपटा सर्प गणेशजी के वाहन चूहे को खाना चाहता है और जब सर्प मारकर खाने वाले मोर को पार्वती का वाहन सिंह खाने की इच्छा करता है तो फिर वे ही यह अहिंसा का नाटक क्यों कर रहे हैं ?

दमनक कहने लगा—’भाई करटक ! राजा की दृष्टि में हम तो कुछ रहे ही नहीं। उसके लिए अब बस संजीवक ही है। भोजन न मिलने के कारण शेष सेवक तो राजा का साथ छोड़ ही चुके हैं। मैं समझता हूं, हमें राजा को समझाना चाहिए। इस समय यही हमारा कर्तव्य है।’

मित्र सम्प्राप्ति

दक्षिण दिशा में महिलारोप्य नामक एक नगर था। उसके निकट ही एक ऊंचा और विशाल बरगद का पेड़ था। अनेक पक्षी उसके फल खाते थे। उसके कोटर (खोखल) में अनेक छोटे-छोटे जीव-जन्तु रहते थे। यात्री उसकी छाया में विश्राम करते थे। उसी वृक्ष पर एक कौा रहता था।

उसका नाम लघुपतनक या एक बार भोजन की तलाश में छह नगर और उड़कर जा रहा था । सस्ते में उसने एक ऐसा ्यकत देखा जो यमदूत की तरह राबणा या ।

वह हाय मे जाल लिए उसी बरगद के वृक्ष की ओर जा रहा या कौए ने सोचा कि यह वधिक निश्चय ही जाल फेंककर और चावलों के दाने बिखेरकर उस वृक्ष के पक्षियों का शिकार करेगा।

यह सोचकर वह कौआ अपने वृक्ष पर वापस लौट आया। उसने सब पक्षियों को शिकारी, जाल और चावल के विषय में सावधान कर दिया। यधिक उस वृक्ष के निकट पहुंचा। उसने अपना जाल विणया और चावल के दाने विल दिए।

पक्षियों ने लघुपतनक की बात याद रखी, थे उस जाल में नहीं फंसे । तभी कबूतरों का एक विशाल झुंड यहां आया। इस झुंड का स्वामी था चित्रग्रीव ।

लघुपतनक ने उसे भी समझाया, किंतु कौए के समझाने पर भी वह और उसका परिवार चावलों के लालच में जाल में फंस गया। इतने सारे कबूतरों को अपने जाल में फंसा देखकर शिकारी हर्षित हो गया।

अपना इंडा लिए वह उन्हें मारने के लिए आगे लपका। मृत्यु को अपने निकट आते देखकर भी चित्रग्रीव ने अपना धैर्य न खोया। उसने अपने साथी कबूतरों से कहा-‘हमें भयभीत नहीं होना चाहिए।

हम सबको एक साय उड़कर जाल को ऊपर ले जाना चाहिए, तभी हमारी मुक्ति हो सकती है। अपने राजा का आदेश सुनते ही सभी कबूतर जाल को लेकर आकाश में उड़ गए।

शिकारी यह सोचता हुआ उनके पीछे भागा कि अभी तो इन पक्षियों में आपस में सहयोग है, जब ये आपस में लड़ेंगे, तभी इनका पतन होगा। लघुपतनक उत्सुकता से यह सब देख रहा था।

जाल समेत कबूतर उड़ते चले गए। शिकारी निराश होकर सोचने लगा कि पक्षी तो मिले नहीं, जीविका का साधन जाल भी चाय से जाता रहा। कुछ आगे जाने पर चित्रग्रीव ने जब यह देखा कि शिकारी बहुत पीछे छूट गया है,

तो उसने अपने साथियों से कहा-‘हम लोगों का नगर की पूर्वोत्तर दिशा की ओर बढ़ना है। वहां जंगल के बीच मेरा एक मित्र चूहा रहता है। उसका नाम हिरण्यक है।

वह इस जाल को काटकर हम मुक्त कर देगा। वे सब हिरण्यक के पास पहुंचे। बिल के पास पहुंचकर चित्रग्रीव ने हिरण्यक को पुकारा-मित्र हिरण्यक ! शीघ्र आओ, मैं बहुत संकट में हूं।’

अपने मित्र की आवाज पहचानकर हिरण्यक बिना किसी भय के अपने बिल से बाहर निकल आया। जाल में फंसे अपने मित्र पर निगाह पड़ते ही उसने चिंतित स्वर में पूछा-‘यह सब कैसे हो गया मित्र?” ‘बस कुछ न पूछो।’

चित्रग्रीव बोला-‘जीभ के स्वाद के लालच में यह सहन करना पड़ा। अब तुम शीघ्रता से हमारे बंधन काट दो।’ हिरण्यक कहने लगा—’वैसे तो पक्षी सौ-सवा सौ योजन से भी मांस को देख लिया करते हैं,

किंतु भाग्य के प्रतिकूल होने के कारण समीप ही बिछाए जाल को भी आप लोग देख नहीं पाए।’ यह कहकर हिरण्यक चित्रग्रीव के बंधन काटने के लिए उसके समीप पहुंचा तो चित्रग्रीव बोला-‘नहीं मित्र ! पहले मेरे अनुचरों के बंधन काट दो।

उसके बाद मेरे बंधन काट देना।’ हिरण्यक को कुछ रोष आ गया। उसने कहा—’नहीं, यह ठीक नहीं। स्वामी के बाद ही सेवकों का स्थान आता है।’

चित्रग्रीव बोला-‘नहीं मित्र ! ऐसा सोचना उचित नहीं है। ये सभी मेरे आश्रित हैं। ये सब अपने-अपने परिवारों को छोड़कर मेरे साथ आए हैं। मेरा कर्तव्य यह है कि मैं पहले इनको मुक्त कराऊं।

जो राजा अपने अनुचरों का सम्मान करता है, उसके अनुचर विपत्ति पड़ने पर भी उसका साथ नहीं छोड़ते और फिर ईश्वर न करे, मेरे बंधन काटते समय तुम्हारा दांत टूट गया या तब तक शिकारी ही यहां आ पहुंचा, तब इनके बंधे रह जाने से तो मुझे नरक में भी स्थान नहीं मिलेगा।’

चित्रग्रीव की बात सुनकर हिरण्यक बोला—’मित्र ! राजधर्म तो मैं भी जानता हूं। मैं तो आपकी परीक्षा ले रहा था। अब मैं पहले आपके साथियों के ही बंधन करेंगे। अपने इस आचरण से आपका यश हमेशा बढ़ता ही रहेगा।’

कुछ ही प्रयास के बाद हिरण्यक ने सभी कबूतरों के बंधन काट डाले, फिर वह चित्रग्रीव से बोला-‘अब तुम स्वतंत्र हो मित्र । अपने साथियों के साथ जहां जाना चाहो, जा सकते हो।

जब भी इस प्रकार की कोई मुसीबत तुम्हारे ऊपर आए, मेरा स्मरण कर लेना।’ चित्रग्रीव ने अपने मित्र को धन्यवाद दिया और अपने झुंड सहित अपने गंतव्य की ओर उड़ गया।

हिरण्यक भी फिर से अपने बिल में घुस गया। लघुपतनक नाम का वह कौआ यह सब देखकर आश्चर्यचकित हो उठा। उसने साचा-‘यह चूहा तो बहुत बुद्धिमान है।

इसने सौ द्वार वाला अपना बिल भी किलेनुमा बनाया हुआ है, ताकि शत्रु यदि एक ओर से हमला करे तो यह किसी अन्य द्वार से निकलकर सुरक्षित स्थान पर पलायन कर सके।

यद्यपि मेरा स्वभाव किसी पर सहसा हा विश्वास कर लेने का नहीं, तथापि मैं इस चूहे को अपना मित्र अवश्य बनाऊंगा।’ यह सोचकर वह वृक्ष से उतरा और हिरण्यक के बिल के पास पहुंचा।

उसने अपनी वाणी में मधुरता घोलते हुए आवाज लगाई-मित्र हिरण्यक, बाहर आ जाओ।। हिरण्यक सोचने लगा कि क्या किसी कबूतर का बंधन रह गया है ? उसने बिल के अंदर से ही पूछा-‘आप कौन हैं ? ‘मैं लघुपतनक नाम का कौआ हूं।’

हिरण्यक बिल के अंदर से बोला-‘मैं तुमसे नहीं मिलना चाहता। तुम यहां से चले जाओ।’ लघुपतनक बोला-‘हिरण्यक ! मुझसे डरो मत मित्र। मैंने तुमको चित्रमीव और उसके साथियों को बंधनमुक्त करते देखा है।

इसी प्रकार तुम मेरी भी सहायता कर सकते हो। मैं तुमसे मित्रता करना चाहता हूं भाई।’ ‘पर तुम तो भक्षक हो और मैं तुम्हारा भोजन हूं। हमारी-तुम्हारी मित्रता संभव नहीं है।’ इस बार अपने विल में से थोड़ा-सा मुंह निकालकर हिरण्यक ने कहा।

कौआ बोला-‘देखो, अगर तुम मेरे साय मित्रता नहीं करोगे तो मैं तम्हारे बिल के द्वार पर ही अपनी जान दे दूंगा।’ ‘लेकिन तुम तो मेरे शत्रु हो।’ हिरण्यक बोला-‘शत्रु के साय कोई कैसे मित्रता कर सकता है ?

इस पर कौआ बोला-‘पर अभी तो मुझे आपका दर्शन भी नहीं मिला, अभी वैर कहां से आ गया ! यह सुनकर हिरण्यक चूहा बोला-‘वैर दो प्रकार का होता है कृत्रिम और स्वाभाविक। तुम तो मेरे स्वाभाविक वैरियों में से हो।’

‘कृपया दोनों प्रकार के वैरों के लक्षण तो बताइए ? हिरण्यक ने बताया-‘जो वैर किसी कारण से उत्पन्न होता है, वह कृत्रिम कहलाता है। वह समाप्त होने योग्य उपकार से समाप्त हो जाता है।

किंतु जो स्वाभाविक वैर है, वह तो कभी भी समाप्त नहीं होता। जिस प्रकार नेवले और सर्प का, घास चरने वाले व मांसाहारी जीवों का, जल और अग्नि का, देव और दैत्यों का, कुत्तों और बिल्लियों का, धनिकों और दरिद्रों का, पली और सहपलियों का, सिंहों और हाथियों का, बाघ एवं हिरणों का, सज्जनों एवं दुर्जनों का। इनका वैर स्वाभाविक वैर कहलाता है।’

इस पर लघुपतनक बोला-‘मैं इसे ठीक नहीं मानता। किसी के साय मित्रता और शत्रुता तो कारण से ही की जाती है, अतः किसी से अकारण शत्रुता नहीं करनी चाहिए।

यदि संभव हो तो इस संसार में सभी के साथ मित्रता की जानी चाहिए। अतः मेरे साथ मित्रता करने के लिए आप एक बार बाहर निकलकर मर साय भेंट तो कर लीजिए।’

‘इसकी आवश्यकता ही क्या है ? नीतिशास्त्र में कहा है कि एक बार भी मित्रता केट जाने के बाद जो व्यक्ति पुनः संधि के द्वारा उसे जोड़ने की इच्छा रखता है, वह गर्भ धारण करने वाली खच्चरी की भांति स्वयं ही विनष्ट हो जाता है।

किसी को यह व्याकरण शास्त्र के प्रणेता पाणिनि को एक सिंह ने मार डाला था। मीमांसा शास्त्र के प्रवर्तक जैमिनि मुनि को सहसा एक हाथी ने कुचल डाला था।

छंद-शास्त्र के प्रवर्तक आचार्य पिंगल को समुद्र के किनारे किसी ग्राह ने निगल लिया था। अज्ञानी और क्रूर को किसी के गुणों से कोई मतलब नहीं होता।’

‘यह तो ठीक है, परंतु आपस में एक-दूसरे के उपकार से ही मनुष्यों में संधि होती है। मृगों और पक्षियों की मित्रता भी किसी कारण से हो जाती है। मूर्खो की मित्रता भय और लोभ के कारण होती है, किंतु सज्जनों की मित्रता तो दर्शन मात्र से ही हो जाती है।

अतः मेरा विश्वास करो मित्र ! मैं सज्जन हूं और चाहो तो शपय आदि से तुम्हें विश्वास दिला सकता हूं।’ इस पर हिरण्यक बोला-‘आपकी शपय पर मुझे विश्वास नहीं।

कहा जाता है कि शपथ खाकर मित्रता करने वाले शत्रु पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए। देवराज इन्द्र ने शपथ लेने के बाद ही वृत्रासुर का वध किया था विश्वास के कारण उत्पन्न होने वाला भय मनुष्य के मूल को भी नष्ट कर देता है।’

हिरण्यक की दात सुनकर लघुपतनक को विश्वास हो गया कि यह चूहा नीति शास्त्र को बहुत गहरी जानकारी रखता है। अतः वह बोला-‘मित्र ! विद्वानों ने कहा है कि साय-साय सात कदम चलने या आपस में सात वाक्य बोलने पर भी मित्रता हो जाती है, फिर हम तो इतनी देर से वार्तालाप कर रहे हैं, अतः मित्र तो हम बन ही चुके ।

रही बात तुम्हारे भय की, तो मैं पहले ही विश्वास दिला चुका हूं कि मुझसे डरने की आवश्यकता नहीं। तुम अगर अपने दुर्ग से बाहर नहीं आना चाहते तो न सही, भीतर से ही मेरे साथ वार्तालाप अथवा गोष्ठी कर लिया करना।

हिरण्यक सोचने लगा कि यह लघुपतनक कौआ बहुत ही भाषणपटु और चतुर है। इसके साथ मैत्री करने में कोई नुकसान नहीं होगा। उसने कहा-‘यदि तुम मझसे मैत्री करना ही चाहते हो तो मेरी एक बात तुम्हें माननी होगी।

वह यह कि कभी मेरे दुर्ग के भीतर प्रविष्ट होने की चेय न करना। नहीं सोचना चाहिए कि मैं भगवान हूं, अतः कोई मेरा अनिष्ट नहीं कर सकता। लघुपतनक ने उसकी यह बात सहर्ष मान ली। उस दिन से दोनों में मैत्री हो गई।

कभी लघुपतनक अपने मित्र हिरण्यक के लिए कोई भोज्य पदार्थ ले आता तो कभी हिरण्यक उसे अपने द्वारा इकट्ठा किया हुआ भोज्य पदार्थ खिलाता।

हिरण्यक अब निःशंक होकर बिल के बाहर बैठकर अपने मित्र से वार्तालाप करने लगा। एक दिन कौए ने आंखों में आंसू भरते हुए अपने मित्र चूहे से कहा-‘मित्र! मुझे इस देश से विरक्ति हो गई है अब मैं कहीं अन्यत्र जाना चाहता हूं।’

चूहे ने कारण पूछा तो कौआ बोला-‘बात यह है कि वर्षा न होने के कारण इस देश में अकाल पड़ गया है अकाल के कारण जब लोग स्वयं ही भूखे रहते हैं तो हमें भोजन कहां से मिले।

लोगों की भूख इतनी बढ़ गई है कि अब पर-घर में पक्षियों को फंसाने के लिए लोगों ने जाल फैला दिए हैं वह तो मेरी आयु के कुछ दिन शेष रहे होंगे तभी मैं उनसे बचकर निकल आया हूं, अन्यया आज तो मेरा पकड़ा जाना भी निश्चित था।

बस मेरी विरक्ति का यही कारण है अपने घर से तो मैं विदेश के लिए निकलकर आ गया हूँ|” ‘कहां जाना चाहते हो?’ ‘दक्षिण देश के एक दुर्गम वन में एक सरोवर है। वहां मेरा मित्र मंथरक नाम का कछुआ रहता है यह अपने परिवार से मुझे मछली आदि ला दिया करेगा। इस तरह से मेरे दुर्दिन अच्छी तरह से कट जाएंगे।’

‘तथ तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा।’ हिरण्यक बोला—’मुझे भी यहां बड़ा कए है।” ‘तुम्हें क्या कर है मित्र ?’ ‘यह एक लम्बी कहानी है। वहीं पहुंचने पर सुनाऊंगा।’

‘किंतु मैं तो उड़ने वाला जीव हूं। तुम मेरे साथ किस प्रकार चल पाओगे ? ‘तुम मुझे अपना मित्र समझते हो तो मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर ले चलो। अन्यथा मेरी कोई दूसरी गति नहीं है।’

कौए ने प्रसन्न होकर कहा-‘वाह ! यह तो मेरा सौभाग्य है। वहां रहकर आपके साथ सुख के दिन व्यतीत होंगे। बस तुम मेरी पीठ पर आराम से बैठ जाना।

मैं तुम्हें आराम से वहां तक पहुंचा दूंगा।’ ‘पर क्या तुम्हें उड़ने की सभी नदियों का ज्ञान है? कहीं ऐसा न हो कि रास्ते में ही मुझे गिरा दो और भूमि पर ऊंचाई से गिरने के कारण मेरा प्राणान्त हो जाए।

इस पर कौआ बोला-‘तुम्हारी आशंका निराधार है पुत्र। सुनो, उड़ने की गतिया आठ प्रकार की होती हैं-सम्पात, विपात, महापात, अनुपात, वक्र गति, तिर्यक गति, ऊर्ध्वगति एवं लघुगति। और मुझे इन सभी गतियों का अच्छी तरह से ज्ञान है।’

कौए की बात सुन हिरण्यक की चिंता दूर हो गई। वह खुशी-खुशी कौए की पीठ पर चढ़ गया। कौआ धीरे-धीरे उड़कर उसे सरोवर के पास ले गया।

मंथरक ने उसको इस प्रकार आते देखकर सोचा-‘यह तो कोई असाधारण प्रकार का कौआ लगता है।’ वह डर गया और सरोवर में जाकर छिप गया।

लघुपतनक ने हिरण्यक को सरोवर के तट पर स्थित एक वृक्ष के कोटर में बैठा दिया और स्वयं उसी की शाखा पर बैठकर अपने मित्र मंथरक को पुकारना आरंभ कर दिया।

अपने मित्र की आवाज पहचान कर कछुआ जल से बाहर आया। दोनों मित्र एक-दूसरे से मिलकर बहुत प्रसन्न हुए। हिरण्यक भी कोटर से निकलकर उनके समीप आ बैठा।

उसे देखकर मयंक ने पूछा-‘मित्र ! यह कौन है ? तुम्हारा भक्ष्य होने पर तुम इसे अपनी पीठ पर बैठाकर लाए हो, इसका क्या रहस्य है ?’ कौए ने बताया-‘मित्र मेरा ! यह मेरा परम मित्र है।

यूं समझ लो, हम दोनों दो तन एक प्राण हैं। हिरण्यक नाम है इसका। इसमें असंख्य गुण हैं। किसी कारण से अपने स्थान से हमें विरक्ति हो गई है, इसलिए अब आपके पास चले आए हैं।’

एक बुद्धिमान हंस

एक बहुत बड़ा विशाल पेड़ था। उस पेड़ पर बहुत सारे हंस रहते थे। उनमें एक बहुत सयाना हंस था, बुद्धिमान और बहुत दूरदर्शी। सब उसका आदर करते ‘ताऊ’ कहकर बुलाते थे।

एक दिन उसने एक नन्ही-सी बेल को पेड़ के तने पर बहुत नीचे लिपटते पाया। ताऊ ने दूसरे हंसों को बुलाकर कहा, देखो, इस बेल को नष्ट कर दो। एक दिन यह बेल हम सबको मौत के मुंह में ले जाएगी।

एक युवा हंस से हंसते हुए बोला, ताऊ, यह छोटी-सी बेल हमें कैसे मौत के मुंह में ले जाएगी?

सयाने हंस ने समझाया, आज यह तुम्हें छोटी-सी लग रही है। धीरे-धीरे यह पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आएगी। फिर बेल का तना मोटा होने लगेगा और पेड़ से लपट जाएगा, ऐसे में पेड़ पर चढ़ने के लिए नीचे से ऊपर तक सीढ़ी बन जाएगी। कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुंच जाएगा और हम सभी मारे जाएंगे।

दूसरे हंस को यकीन न आया, एक छोटी-सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी?

तीसरा हंस बोला, ताऊ, तू तो एक छोटी-सी बेल को खींचकर ज्यादा ही लंबा कर रहा है।

एक हंस बड़बड़ाया और बोला- यह ताऊ अपनी अक्ल का रौब डालने के लिए अंट-शंट कहानी बना रहा है।

इस प्रकार किसी दूसरे हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। इतनी दूर तक देख पाने की उनमें अक्ल ही कहां थी?

समय बीतता रहा। बेल लिपटते-लिपटते ऊपर शाखाओं तक पहुंच गई। बेल का तना मोटा होना शुरू हुआ और सचमुच ही पेड़ के तने पर सीढ़ी बन गई। जिस पर आसानी से चढ़ा जा सकता था। सबको ताऊ की बात की सच्चाई सामने नजर आने लगी। पर अब कुछ नहीं किया जा सकता था क्योंकि बेल इतनी मजबूत हो गई थी कि उसे नष्ट करना हंसों के बस की बात नहीं थी।

एक दिन जब सब हंस दाना चुगने बाहर गए हुए थे तब एक बहेलिया उधर आ निकला। पेड़ पर बनी सीढ़ी को देखते ही उसने पेड़ पर चढ़कर जाल बिछाया और चला गया। अंधेरा होते ही को सारे हंस लौट आए और जब पेड़ से उतरे तो बहेलिए के जाल में बुरी तरह फंस गए।

जब वे जाल में फंस गए और फड़फड़ाने लगे, तब उन्हें ताऊ की बुद्धिमानी और दूरदर्शिता का पता लगा। सब ताऊ की बात न मानने के लिए लज्जित थे और अपने आपको कोस रहे थे। ताऊ सबसे रुष्ट था और चुप बैठा था।

एक हंस ने हिम्मत करके कहा, ताऊ, हम मूर्ख हैं, लेकिन अब हमसे मुंह मत फेरो।

दूसरा हंस बोला, इस संकट से निकालने की तरकीब तू ही हमें बता सकता हैं। आगे हम तेरी कोई बात नहीं टालेंगे। सभी हंसों ने हामी भरी तब ताऊ ने उन्हें बताया, मेरी बात ध्यान से सुनो। सुबह जब बहेलिया आएगा, तब मुर्दा होने का नाटक करना। बहेलिया तुम्हें मुर्दा समझकर जाल से निकालकर जमीन पर रखता जाएगा। वहां पर तुम सभी मरे के समान पड़े रहना। जैसे ही वह अन्तिम हंस को नीचे रखेगा, मैं सीटी बजाऊंगा। मेरी सीटी सुनते ही सब उड़ जाना।

सुबह बहेलिया आया। हंसों ने वैसा ही किया, जैसा ताऊ ने समझाया था।

सचमुच बहेलिया हंसों को मुर्दा समझकर जमीन पर पटकता गया। सीटी की आवाज के साथ ही सारे हंस उड़ गए। बहेलिया चुपचाप होकर देखता रह गया।

शिक्षा: बुद्धिमानों की सलाह गंभीरता से लेनी चाहिए और साथ ही अपने से सयानों की बात पर एक बार जरुर गोर करना चाहिए।

पानी और प्यासा कौआ

गर्मियों के दिन थे. दोपहर के समय बहुत ही सख्त गर्मी पड़ रही थी। एक कौआ पानी की तलाश में इधर – उधर भटक रहा था. लेकिन उसे कही भी पानी नहीं मिला. अंत में वह थका हुआ एक बाग में पहुँचा. वह पेड़ की शाखा पर बैठा हुआ था की अचानक उसकी नजर वृक्ष के नीचे पड़े एक घड़े पर गई. वह उड़कर घड़े के पास चला गया।

वहां उसने देखा कि घड़े में थोड़ा पानी है. वह पानी पीने के लिए नीचे झुका लेकिन उसकी चोंच पानी तक न पहुँच सकी. ऐसा इसलिए हो रहा था क्योंकि घड़े में पानी बहुत कम था।

परन्तु वह कौआ हताश नहीं हुआ बल्कि पानी पीने के लिए उपाय सोचने लगा. तभी उसे एक उपाय सूझा. उसने आस – पास बिखरे हुए कंकर उठाकर घड़े में डालने शुरू कर दिए. लगातार पानी में कंकड़ डालने से पानी ऊपर आ गया. फिर उसने आराम से पानी पिया और उड़ गया।

शिक्षा: अगर हम सफल होने के लिए अपने कदम बढ़ाएंगे तो हमें सफलता प्राप्त करने के रास्ते आसानी से मिलने लगेंगे. जहाँ चाह वहीं राह है.

सुगन्ध और खनखनाहट

एक बार दो मित्र, चिंटू और शंकर अपने विद्यालय से घर को जा रहे थे।

उन दोनों में से एक मित्र, शंकर बहुत ही बुद्धिमान था। वह किसी भी प्रकार के कार्य में अपने मित्र की साहयता किया करता था।

जब वे दोनों, विद्यालय से घर जा रहे थे तो, रास्ते में एक मिठाई की दुकान थी। चिंटू को दूर से मिठाई की बहुत अच्छी खुशबू आ रही थी। उस से रुका नही गया,

वह खुशबू की ओर खींचा, दुकान की ओर चल दिया। उसको रोकते हुए उसका दोस्त भी उसके पीछे पीछे चल दिया।

चिंटू थोड़ा गरीब था, उसके पास 2-3 चिल्लर ही थे जेब मे, इसलिए उसने केवल खुशबू से ही काम चलाया। वह दुकान से जाने लगा। तब दुकानदार ने कहा, “ओए बच्चे, पैसे निकाल पैसे!”

तब चिंटू बोला, “काहे के पैसे ? मैंने तो मिठाई ली ही नहीं।”

दुकानदार बोला, “ये मिठाई है, इसकी सुगन्ध के भी रुपये लगते है। रुपये तो तुझे देने ही होंगे।”

चिंटू घबरा गया, उसके पास रुपये नहीं थे। तभी शंकर ने अपने दोस्त के कान में कुछ कहा। चिंटू का चेहरा खिलखिला उठा। वह दुकानदार के पास गया,

और अपने जेब के रुपये उस दुकानदार के सामने खनका दिए। फिर वह दुकान से जाने लगा। तब दुकानदार ने फिर से चिंटू को रोक, “बेटा पैसे तो दे कर जा” दुकानदार बोला।

चिंटू ने कहा, “जिस प्रकार मिठाई को सूंघना मिठाई खाने के बराबर है, उसी प्रकार रुपये की खनखनाहट भी रुपये लेने के ही बराबर है।”

सब हंसने लगे गए, और दोनों दोस्त ख़ुशी-ख़ुशी वहां से चले गए।

शिक्षा: “कभी भी भोले लोगों, और अपने से कम सामर्थ्यवान लोगों को परेशान नहीं करना चाहिए।”

चमगादड़ों की कथा

एक बार जंगल में पशुओं तथा पक्षियों में युद्ध की स्थिति बन आई। चमगादड़ भी जंगल में ही रहते थे, अतः उन्हें भी अब इस युद्ध में शामिल होना ही था।

नहीं तो वे जीतने वाले पक्ष द्वारा जंगल से निकाल दिये जाते।

अब चमगादड़ों ने सोचा, कि हम पक्षियों की तरह उड़ भी सकते हैं, तथा हमारे जानवरों के जैसे बच्चे जन्म लेते हैं। हम किसी के भी समुदाय में शामिल हो सकते हैं।

लेकिन उन्होंने सोचा कि वेजीतने वाले पक्ष की सहायता करेंगे जिससे कि भविष्य में उन्हें कोई परेशानी न हो। युध्द प्रारंभ हुआ। लेकिन चमगादड़ अभी किसी के पक्ष मे नहीं गए।

फिर एक समय आया कि, पशुओं की जीत होना पक्की हो गयी। तभी चमगादड़ों ने न आव देखा न ताव, वे,सभी जानवरों में शामिल हो गए।

लेकिन थोड़ी ही देर में पूरा खेल पलट गया। अब पक्षियों का जीतना तय हो गया।चमगादड़ फिर पक्षियों के झुंड में शामिल हो गए।

लेकिन अंत में पक्षियों और पशुओं की संधि हो गयी। दोनों पक्षों ने उन चमगादड़ों को अपने समूह से निकाल फेंका।

माना जाता है, तब से ही चमगादड़ काली काली कोठरियों में रहने लगे और आज कल भी ऐसी ही जगहों पर पाए जाते हैं।

शिक्षा: “अपना फायदा कभी-कभी, कहीं का नहीं छोड़ता।”

मां की जीत

एक बार रस्ते में दो महिलाएं एक बच्चे के लिए बहुत झगड़ा कर रहीं थी, एक महिला बोली, यह बच्चा मेरा, है। दूसरी महिला बोली, यह बच्चा मेरा है। इस तरह दोनों महिलाएं अपना अपना हक उस पर जताने लगीं।

आते जाते सभी लोग उन दोनों को देखकर बहुत हैरान हो रहे थे। तभी एक इंसान ने उन दोनों को न्यायाधीश के पास पहुंचा दिया।

दोनो महिलाओं ने बच्चे के लिए अपनी ममता दिखाई। और दोनों ने अपना अपना पक्ष रखा।

न्यायाधीश को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वे किस के पक्ष में फैसला लें। तभी उन्हें एक युक्ति सूझी।

उन्होंने दोनों महिलाओं से कहा, “आप दोनो थोड़ा सब्र रखिए मैं किसी को भी निराश नहीं होने दूंगा।”

इतना कहकर उन्होंने एक व्यक्ति को ख़ंजर लेकर बुलवाया। व्यक्ति ख़ंजर लेकर उनके पास पहुंच गया। अब न्यायाधीश बोले, “इस बच्चे के बीचोबीच से दो टुकड़े कर दो।

आधा हिस्सा इस महिला को दे देंगे और बचा हुआ आधा हिस्सा दूसरी महिला को दे देंगे।”

दोनों महिलाओं ने भी यह बात सुन ली। उनमे से एक महिला यह बात सुनकर जोर जोर से रोने लगी। वह रोते रोते बोली, “दया करें साहब !

कृपया करके आप मेरे लाल को न मारें भले ही आप मेरे बच्चे को इन्हें सौंप दीजिए मैं कुछ नहीं कहूंगी। बस आप इसको मारें नहीं। बस इतना ही चाहती हूँ मैं।”

जबकि दुसरी महिला चुप रही और बच्चा मिलने की बात से बहुत खुश हुई।

न्यायाधीश की युक्ति सफल हुई। उन्होंने बच्चे को मारने की बात से विचलित हुई महिला को बच्चा सौंपने का फैसला किया। क्योंकि एक मां अपने बच्चे को किसी दूसरे व्यक्ति को देने के लिए तैयार हो जाती है,

परन्तु वह अपने बच्चे को कभी मरता हुआ नहीं देख सकती।

महिला बच्चा पाकर बहुत खुश हुई। दूसरी महिला को बच्चे को चोरी करने के जुर्म में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

शिक्षा: “सच बोलने से कभी नही घबराना चाहिए। क्योंकि अंत में जीत सच्चाई की ही होती है।

किसान और उसके चार बेटे

एक किसान था। उसके चार बेटे थे। वे चारों हर समय आपस में लड़ते रहते थे। किसान उनके इस व्यवहार से बड़ा दुखी था। एक दिन उसने उन्हें समझाने का एक उपाय सोचा।

उसने चारों को अपने कमरे में बुलाया और उन्हें एक-एक लकड़ी की छड़ तोड़ने को दी। चारों ने झट से तोड़ दी। फिर किसान ने उन्हें एक-एक कर लकड़ी का गट्ठर तोड़ने के लिए दिया।

चारों ने उसे तोड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन नहीं तोड़ पाए। तब किसान उन्हें समझाते हुए बोला, “देखा तुमने? तुमने एक-एक लकड़ी कितनी आसानी से तोड़ दी, जबकि लकड़ी के गट्ठर को हिला भी नहीं पाए।

इसी तरह यदि तुम चारों एक साथ रहोगे तो कोई तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। लेकिन यदि तुम आपस में ही लड़ते रहोगे तो कोई भी बाहर वाला तुम्हें आसानी से हरा सकता है।” किसान के बेटे समझ गए कि एकता में ही शक्ति है।

शिक्षा: हमें मिल-जुलकर रहना चाहिए।

दुष्टों का स्वभाव

सर्दियों की बात है। खूब कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। ठंड से बचने के लिए जीव-जंतु सूरज के छिपते ही अपने-अपने घरों में आश्रय ले लेते थे। एक दिन एक लकड़हारा शाम को अपने घर लौट रहा था।

रास्ते में उसे एक साँप बेहोशी की हालत में मिला। वह ठंड के कारण बेहोश हो गया था। लकड़हारे को साँप पर दया आ गई। उसने साँप को उठा लिया और अपनी कमीज के अंदर रख लिया।

फिर वह अपने घर की ओर चल पड़ा। कुछ देर बाद बदन की गर्मी पाकर जब साँप की ठंड दूर हुई तो वह होश में आया। उसने जब स्वयं को कमीज के अंदर पाया तो उसे लगा कि कोई शत्र उसे मारने के लिए ले जा रहा है।

अतः होश में आते ही उसने लकड़हारे को डस लिया। लकड़हारे की तुरंत मौत हो गई। बेचारे लकड़हारे को बेवजह अपनी जान गंवानी पड़ी।

शिक्षा: दुष्ट कभी भी अपनी दुष्टता नहीं छोड़ते। हमें उनसे सावधान रहना चाहिए।

मां का प्यार

एक जंगल में बहुत सारे पशु-पक्षी अपने अपने परिवार के साथ रहते थे। वे सभी खुशी खुशी जंगल में रहते थे।

एक दिन जंगल के जानवरों के बीच प्रतियोगिता की घोषणा हुई कि जिस पशु अथवा पक्षी का बच्चा सबसे अच्छा होगा, उसको इनांम देकर सम्मानित किया जाएगा।

सभी अपने अपने बच्चों को लेकर उस निश्चित प्रतियोगिता वाले दिन प्रतियोगिता वाले स्थान पर पहुंच गए। सब एक एक कर कतार में लग गए। सबके बच्चों की जांच होने लगी, कि कौनसा बच्चा सभी में से सुंदर है!

तभी एक बन्दरिया की बारी आ गयी। बन्दरिया की नाक देखकर जांच करने वाला बोला, “छी कितनी बदसूरत है यह! इसको कौन लेकर आया प्रतियोगिता में?”

बन्दरिया को बहुत बुरा लगा। वह रोते हुए दौड़कर अपनी मां के पास चले गई। उसने अपनी मां को बताया कि, उन दूसरे जानवरों ने मेरे बारे में भला बुरा कहा।

तभी उसकी मां ने उसे पुचकारा और उससे कहा, “ये लोग तुझे क्या पहचानेंगे मुझे पता है ना तू कितनी सुंदर है, मेरे लिए मेरी बच्ची ही संसार की सबसे सुंदर और सबसे अच्छी बच्ची है।

तुझे किसी प्रतियोगिता की जरूरत नहीं है।” उसने अपनी बेटी को गले से लगा लिया।

पास में खड़े प्रतियोगिता में आए हुए सभी जानवर उसको देख रहे थे। सब उनकी बात सुनकर बहुत भावुक हो गए और उनके लिए ताली बजाने लगे।

शिक्षा: “केवल सूरत ही सुंदरता का प्रमाण देने के लिये पर्याप्त नहीं है। सुंदरता तो सीरत, कार्यो और गुणों से ही सिद्ध होती है।”

डरपोक व्यक्ति

एक बार एक राजा ने पड़ोसी राजा से युद्ध की घोषणा कर दी। वह युद्ध के लिए अपनी सेना को सशक्त बनाना चाहता था। इसलिए उसने युवकों से सेना में भर्ती होने को कहा। गाँव,

नगर, शहर से युवा सेना में भर्ती होने के लिए आने लगे। एक गाँव में एक डरपोक व्यक्ति रहता था। राजा के आह्वान पर वह भी सेना में भर्ती होने चल दिया।

वह रास्ते में इसी उधेड़बुन में था कि सेना में भर्ती हो या लौट जाए। तभी उसे कौओं का शोर सुनाई दिया। वह डर के मारे रुक गया और इधर-उधर देखने लगा। उसने देखा कि एक पेड़ पर बहुत सारे कौए बैठे हुए हैं।

वह डर के मारे चिल्लाकर बोला,”अरे दुष्टों! चुप करो। तुम मुझे मारकर खाना चाहते हो। पर मैं ऐसा नहीं होने दूंगा।” कौए और जोर-जोर से काँव-काँव करने लगे। कौओं का बढ़ता शोर सुनकर वह डरपोक व्यक्ति उल्टे पाँव लौट गया।

शिक्षा: हमें अपने डर पर विजय प्राप्त करनी चाहिए न की उससे डर कर भागना चाहिए।

एक चालाक लोमड़ी

एक लोमड़ी बहुत भूखी थी. वह अपनी भूख मिटने के लिए भोजन की खोज में इधर – उधर घूमने लगी. जब उसे सारे जंगल में भटकने के बाद भी कुछ न मिला तो वह गर्मी और भूख से परेशान होकर एक पेड़ के नीचे बैठ गई।

अचानक उसकी नजर ऊपर गई. पेड़ पर एक कौआ बैठा हुआ था। उसके मुंह में रोटी का एक टुकड़ा था।

कौवे को देखकर लोमड़ी के मुँह में पानी भर आया। वह कौवे से रोटी छीनने के उपाय सोचने लगी।

तभी उसने कौवे को कहा, ” क्यों भई कौआ भैया! सुना है तुम गीत बहुत अच्छे गाते हो. क्या मुझे गीत नहीं सुनाओगे?

कौआ अपनी प्रशंसा को सुनकर बहुत खुश हुआ. वह लोमड़ी की बातो में आ गया. गाना गाने के लिए उसने जैसे ही अपना मुँह खोला, रोटी का टुकड़ा नीचे गिर गई।

लोमड़ी ने झट से वह टुकड़ा उठाया और वहां से भाग गई। अब कौआ अपनी मूर्खता पर पछताने लगा।

शिक्षा: यह छोटी-सी कहानी हमें स्पष्ट सन्देश देती है कि हमें हमेशा झूठी प्रसंशा से बचना चाहिए।

मालिक और नौकर

एक बार एक हिरन शिकारियों से बचते-बचाते घोड़ों के अस्तबल में जाकर छिप गया। अस्तबल के नौकर ने उसे नहीं देखा। जब शिकारियों ने उससे हिरन के बारे में पूछा तो नौकर ने मना कर दिया।

शिकारी चले गए। नौकर ने अस्तबल में जाकर देखा तो उसे हिरन दिखाई नहीं दिया। वह घास के पीछे छिपा था। कुछ समय बाद मालिक आया। उसने नौकर से पूछा, “यहाँ पर सब ठीक है न?” नौकर ने हामी भर दी।

तब मालिक स्वयं अस्तबल में गया और अच्छी तरह से अस्तबल का निरीक्षण करने लगा। उसे देखकर हिरन डर के मारे काँपने लगा, जिससे घास हिलने लगी।

मालिक ने उसे देख लिया और नौकर को बुलाकर पूछा, “क्या यहाँ कोई आया था?” “हाँ मालिक ! एक हिरन को ढूँढते हुए शिकारी आए थे।” नौकर ने बताया। “वहाँ देखो।” मालिक ने इशारा किया।

अस्तबल में घास के पीछे छिपे हिरन को देखकर नौकर हैरान रह गया कि वह कब आया। हिरन ने आव देखा न ताव और वहाँ से तेजी से भाग निकला।

शिक्षा: हमें हर काम पूरी सावधानी व लगन के साथ करना चाहिए।

बच्चे की धमकी

एक किसान ने अपने फार्म हाउस में बकरियाँ, मुर्गियाँ, गाएँ आदि पाली हुई थीं। सभी के लिए वहाँ पर अलग-अलग जगह थी। एक दिन किसान गलती से एक बकरी के बच्चे को बाड़े में बंद करना भूल गया।

किसान उस दिन घर पर नहीं था। किसान की अनुपस्थिति में बकरी का बच्चा आजादी का पूरा मजा लेने लगा। वह फार्म हाउस की छत पर जा चढ़ा और खूब धमा-चौकड़ी मचाने लगा।

तभी उसने देखा कि एक भेड़िया उधर ही चला आ रहा है। वह चिल्लाकर बोला, “दुष्ट भेड़िए! तुम्हारी यहाँ आने की हिम्मत कैसे हुई?

तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम यहाँ से चले जाओ। हमारे फार्म हाउस की तरफ फिर कभी नजर उठाकर भी मत देखना।” यह सुनकर भेड़िया बोला,

“वाह! अभी तो बड़े बहादुर बन रहे हो। यह बहादुरी तुम छत पर खड़े होकर दिखा रहे हो? हिम्मत है तो सामने आओ।” बकरी का बच्चा चुप हो गया।

शिक्षा:अनुकूल परिस्थितियां निर्बल में भी ताकत भर देते हैं।

लालची कुत्ता

एक गाँव में एक कुत्ता था। वह बहुत लालची था। वह भोजन की खोज में इधर – उधर भटकता रहा. लेकिन कही भी उसे भोजन नहीं मिला. अंत में उसे एक होटल के बाहर से मांस का एक टुकड़ा मिला. वह उसे अकेले में बैठकर खाना चाहता था. इसलिए वह उसे लेकर भाग गया.एकांत स्थल की खोज करते – करते वह एक नदी के किनारे पहुँच गया. अचानक उसने अपनी परछाई नदी में देखी।

उसने समझा की पानी में कोई दूसरा कुत्ता है जिसके मुँह में भी मांस का टुकड़ा है.उसने सोचा क्यों न इसका टुकड़ा भी छीन लिया जाए तो खाने का मजा दोगुना हो जाएगा. वह उस पर जोर से भौंका. भौंकने से उसका अपना मांस का टुकड़ा भी नदी में गिर पड़ा।

अब वह अपना टुकड़ा भी खो बैठा. अब वह बहुत पछताया तथा मुँह लटकाता हुआ गाँव को वापस आ गया।

शिक्षा: लालच बुरी बला है. हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए. जो भी इंसान लालच करता है वह अपनी लाइफ में कभी भी खुश नहीं रह सकता. हमें अपनी मेहनत या किस्मत का जितना भी मिल गया. उससे अपना काम निकालना चाहिए.

चूहा और साधु

किसी गाँव में एक साधु रहता था। वह साधु एक मंदिर में रहता था और लोगों की सेवा करता था। भिक्षा मांगकर जो कुछ भी उसे मिलता वह उसे उन लोगों को दान कर देता जो मंदिर साफ़ करने में उसका सहयोग करते थे।

उस मंदिर में एक चूहा भी रहता था। वह चूहा अक्सर उस साधु का रखा हुआ अन्न खा जाता था। साधु ने चूहे को कई बार भगाने की कोशिश की लेकिन वह चकमा देकर छिप जाता।

साधु ने उस चूहे को पकड़ने की काफी कोशिश की लेकिन वह हरबार असफल रहता। साधु एकदिन परेशान होकर अपने एक मित्र के पास गया।

उसके मित्र ने उसे एक योजना बताई कि चूहे ने मंदिर में अपना कहीं बिल बना रखा होगा और वह वहां अपना सारा खाना जमा करता होगा। अगर उसके बिल तक पहुंचकर सारा खाना निकाल लिया जाये तो चूहा खुद ही कमजोर होकर मर जायेगा।

अब साधु और उसके मित्र ने जहाँ तहाँ बिल खोजना शुरू कर दिया। अंततः उनको बिल मिल ही गया जिसमें चूहे ने खूब सारा अन्न चुराकर इकठ्ठा कर रखा था। बिल खोदकर सारा अन्न बाहर निकाल दिया गया।

अब चूहे को खाना नहीं मिला तो वह कमजोर हो गया और साधु ने अपनी छड़ी से कमजोर चूहे पर हमला किया। अब चूहा डर कर भाग खड़ा हुआ और फिर कभी मंदिर में नहीं आया।

शिक्षा: अपने शत्रु को हराना है तो पहले उसकी शक्तियों पर हमला कर दो। शक्तियां खत्म तो शत्रु स्वयं कमजोर पड़ जायेगा।

नन्हीं चिड़िया

बहुत समय पुरानी बात है, एक बहुत घना जंगल हुआ करता था। एक बार किन्हीं कारणों से पूरे जंगल में भीषण आग लग गयी। सभी जानवर देख के डर रहे थे की अब क्या होगा?

थोड़ी ही देर में जंगल में भगदड़ मच गयी सभी जानवर इधर से उधर भाग रहे थे पूरा जंगल अपनी अपनी जान बचाने में लगा हुआ था। उस जंगल में एक नन्हीं चिड़िया रहा करती थी उसने देखा क़ि सभी लोग भयभीत हैं जंगल में आग लगी है मुझे लोगों की मदद करनी चाहिए।

यही सोचकर वह जल्दी ही पास की नदी में गयी और चोच में पानी भरकर लाई और आग में डालने लगी। वह बार बार नदी में जाती और चोच में पानी डालती। पास से ही एक उल्लू गुजर रहा था उसने चिड़िया की इस हरकत को देखा और मन ही मन सोचने लगा बोला क़ि ये चिड़िया कितनी मूर्ख है इतनी भीषण आग को ये चोंच में पानी भरकर कैसे बुझा सकती है।

यही सोचकर वह चिड़िया के पास गया और बोला कि तुम मूर्ख हो इस तरह से आग नहीं बुझाई जा सकती है।

चिड़िया ने बहुत विनम्रता के साथ उत्तर दिया-“मुझे पता है कि मेरे इस प्रयास से कुछ नहीं होगा लेकिन मुझे अपनी तरफ से best करना है, आग कितनी भी भयंकर हो लेकिन मैं अपना प्रयास नहीं छोड़ूँगी”

उल्लू यह सुनकर बहुत प्रभावित हुआ।

शिक्षा: तो मित्रों यही बात हमारे जीवन पर भी लागू होती है कि जब कोई भी परेशानी आती है तो इंसान घबराकर हार मान लेता है लेकिन हमें बिना डरे प्रयास करते रहना चाहिए यही इस कहानी की शिक्षा है।

बिल्ली के गले में घंटी कौन बंधेगा

एक बार एक गांव में एक पनवाड़ी रहता था। उसकी पैन की दुकान थी। साथ ही उसने सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान भी रखी थी। वह दोनो दुकानों को खूब चलाता था। उसकी दुकान अनाज से भरी रहती थी।

एक बार हुआ यूं कि उसकी दुकान में बहुत सारे चूहे उतपन्न हो गए। अब उसे बहुत चिंता होने लगी। तभी वह कुछ दिनों बाद ही कहीं से 1 बिल्ली को ले आया। उसने बिल्ली को दुकान में ही छोड़ दिया।

बिल्ली ने थोड़े ही दिनों, में बहुत से चूहों को खत्म कर दिया। वह जब भी दुकान मे इधर उधर घूमती, उसे कोई न कोई चूहा अवश्य ही मिल जाता। चूहों की संख्या अब दुकान में बहुत ही कम हो चुकी थी।

चूहों को चिंता होने लगी के, यदि इसी प्रकार चलता रहा तो एक दिन वे सब समाप्त हो जाएंगे। समस्या का समाधान निकालने के लिए उन सभी ने एक सभा करने की सोची।

सभा हुई। सभा में सभी बचे हुए चूहे एकत्रित हुए। चूहों के सरदार ने चूहों को बचाने के संदर्भ में सभी से उनकी राय लेनी चाही।

किसी को कोई मुख्य उपाय नहीं सूझ पा रहा था। किसी ने कुछ उपाय बताया किसी ने कुछ। लेकिन कोई भी सात्विक समाधान नहीं बता पाया।

चूहों के सरदार को तो बहुत चिंता होने लगी, कि अब क्या होगा! क्योंकि सभा से भी कुछ समाधान नहीनिकल पा रहा था।

तभी सभा में से एक चूहा उठा, और बोला, सरदार जी! मेरी बात सुनिए, इस समस्या का कोई बेहतर सुझाव ढूंढना ही हमारी जान को बचा सकता है, क्योंकि बिल्लियां बहुत ही चालाक और फुर्तीली होती हैं।

कहीं चूहा दिखा नहीं, वे लपक कर उसका शिकार कर लेती है। मुझे ऐसा लगता है कि, हम सबको मिलकर उसके गले मे घण्टी बांध देनी चहिए।

जिससे कि जब बिल्ली हमको पकड़ने आएगी तब वह घण्टी बजेगी और जैसे ही घण्टी बजेगी हम सतर्क हो जाएंगे और उस जगह से भाग जाएंगे।”

यह सुझाव सभा में अब तक का सबसे बेहतरीन सुझाव था। लेकिन अब समस्या यह थी कि,” बिल्ली के गले में घण्टी बांधेगा कौन!”

एक समस्या से निकले तो वे लोग दूसरी समस्या में गिर गए।

थोड़े ही दिनों में बिल्ली ने उन बचे हुए चूहों को भी अपना शिकार बना लिया।

शिक्षा: “जिस चीज पर अमल न किया जा सके ऐसे सुझावों से दूर रहना ही ठीक रहता है।”

बच्चे की दाढ़ी

सोहन नाम का एक बहुत ही शरारती बच्चा था। वह अकसर गांव में बहुत ही शरारत किया करता था। वह बुद्धिमान भी था।

लेकिनगांव में सब उसकी शरारतों से बहुत परेशान थे।सबको उसकी शरारतों के बारे अच्छे से मालूम था। वह किसी के घर भी जाता था,

तो, उस घर के लोग पहले से ही सतर्क हो जाते थे कि यह कोई शैतानी न कर दे।

एक दिन सोहन किसी नाई की दुकान के बाहर से गुजर रहा था, तब उसने सोचा कि यह नाइ का काम कितना मजेदार है, इसको देखने में मुझे बड़ा मजा आता है। क्यों न मैं इसे अंदर जाकर देखूँ!

वह अंदर चला गया। कोई नाई के पास बाल की कटिंग करवाने आया था कोई दाड़ी बनवाने।

नाई की कैंची खच खच चलती और बाल झट से कट जाते। इसी प्रकार दाड़ी का भी था। अब सोहन ने अपनी शैतानी शुरू कर दी, वह नाई के समान के साथ छेड़छाड़ करने लग गया।

नाई ने जब यह सब देखा तो उसने सोहन से पुछा, “ओ छोटू, तुम्हें भी बाल कटवाने हैं क्या?”

सोहन छेड़छाड़ में व्यस्त था अचानक से नाई की आवाज को सुनने पर वह डर गया। और उसके हाथ से कैंची नीचे गिर गयी। उसने सोचा कि कैंची गिरकर टूट गयी होगी अतः वह झट से वहां से भाग निकला।

अगले दिन सुबह को वह फिर से नाई की दुकान में आया। वह बाहर से ही खड़ा होकर अंदर झांकने लगा, फिर उसने देखा कि, कैंची तो सही सलामत ही है।

तब वह थोड़ी हिम्मत जुटाकर नाई के पास आया। उसने कहा, “नाई चाचा, मुझे भी अपनी दाड़ी बनवानी है।”

नाई थोड़ा हंसा उसे समझ आ गया कि यह शरारती लड़का है, इसे सीधे सीधे समझाया तो इसको समझ नहीं आएगा। अतः नाई ने कहा, “ठीक है। बैठ जाओ कुर्सी पर।”

नाई ने सोहन को कुरसी पर बैठा दिया। उसने सोहन के गले में तौलिया लपेट दिया और उसके मुह में दाड़ी को निकालने वाला शेविंग फॉम लगा दिया। फिर उसको ऐसे ही बैठे रहने दिया और अपने अन्य कार्य करने लग गया।

बहुत देर हो गयी थी, सोहन ने सोचा, इतनी देर हो गयी औऱ यह तो मेरी दाढ़ी बना ही नही रहे खाली एक जगह पर बैठा दिया है। तब उसने तंग आकर नाई से कहा, “मेरी भी तो दाड़ी बनाइए।”

नाई ने कहा, “बेटा मुझे पता है। लेकिन मैं तुम्हारी दाढ़ी उगने का इंतजार कर रहा हूं। हा हा हा..” वह हंसने लगा। और उसकी दुकान में उस समय जितने भी ग्राहक थे सब हंसने लगे।

सोहन को अपनी मूर्खता का एहसास हुआ और वह शर्मिंदा होकर वहां से चला गया।

शिक्षा: “दूसरों को परेशान करने वाले एक दिन स्वयं हँसी का पात्र बन जाते हैं।”

जन्मदिन की दावत

एक बार जंगल में सारस और लोमड़ी में बहुत ही पक्की मित्रता थी। सारस, लोमड़ी को बहुत ही अच्छा मानता था। पतन्तु लोमड़ी सारस को थोड़ा कम ही पसन्द करती थी।

लोमड़ी बहुत चालक भी थी।

एक दिन सारस का जन्मदिन था। उसने अपने घर पर अपने जन्मदिन की दावत रखी। उसने अपनी प्रिय मित्र लोमड़ी को बुलाया। लोमड़ी दिन में ही सारस के घर आ गयी।

सारस ने भिन्न भिन्न प्रकार के व्यंजन बनाए थे। सारस ने लोमड़ी का अभिनंदन किया। खाने का समय हुआ दोनो खाने के लिए बैठे।

तभी अचानक खाना खाते समय लोमड़ी के गले में एक हड्डी फंस गयी। लोमड़ी बे स्वयं से वह हड्डी निकालने की बहुत कोशिश की, परन्तु वह हड्डी निकाल ही नहीं पा रही थी।

तब उसने सोचा,कि कहीं ये हड्डी मेरे गले से नहीं निकली तो मैं तो कभी भी कुछ भी खा ही नहीं पाऊंगी। फिर मैं भूख प्यास से वैसे ही मर जाऊँगी। इस सारस का जन्मदिन मेरा मरन-दिन बन जाएगा।

फिर उसने कुछ सोचकर सारस से कहा, “सारस तुम्हारी चोंच थोड़ा लंबी है, क्या तुम मेरे गले में फंसी हुई हड्डी को निकाल सकते हो? कृपया कर मेरी मदद कर दो, मैं तुम्हारे लिए एक उपहार भी लाई हूँ।

यदि तुमने मेरे गले की हड्डी निकाल दी तो वह उपहार मैं तुम्हें अभी दे दूँगी।”

सारस ने हामी भरी। लोमड़ी ने मुँह फैलाया, सारस ने अपनी लम्बी चोंच को उसके मुंह में डालकर उसके गले में फँसी हड्डी निकाल दी।

फिर सारस बोला, “लाओ मेरा तोहफा अब!”

लोमड़ी बोली, “कैसा तोहफा! मैं तो तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं लाई।” इतना कहकर वह हंसने लगी। और खाना खा कर वहां से चलेगयी।

सारस को बहुत बुरा लगा।।

शिक्षा: “मतलबी मित्रों से बेहतर शत्रुता होती है।”

मूर्ति की माया

एक बार एक मूर्तिकार ने भगवान कृष्ण के बालपन की एक बहुत ही सुंदर मूर्ति बनाई। उसे मूर्ति को जल्द ही मूर्ति को उसके निश्चित स्थान पर पहुंचाना था।

उसके पास मूर्ति को पहुंचाने का कोई साधन नहीं था, और कोई भी साधन उसे इधर उधर से कई प्रयासों के बाद भी नहीं मिला।

अतः वह मूर्ति को एक कपड़े से ही ढककर अपने हाथ में ही पकड़कर चल पड़ा।

रस्ते में चलते चलते हवा के कारण वह कपड़ा जो कि मूर्ति के ऊपर ढका हुआ था वह खिसक-खिसक कर गिर गया। अब रास्ते में चलते हुए सभी लोगों को वह सुंदर मूर्ति साफ दिख रही थी।

सब उस मूर्ति को देखकर उसको प्रणाम करने लग गए। मूर्तिकार ने सोचा, सब उसे प्रणाम कर रहे हैं, उसमें थोड़ा घमण्ड आ गया।

वह अब उसको प्रणाम करते हुए लोगों को देखकर चलने लगा। तभी रस्ते में एक पत्थर आया, मूर्तिकार उसको नही देख सका और ठोकर लगने की वजह से वह गिर गया।

उसकी मूर्ति के टुकड़े टुकड़े हो गए। अब उसको बहुत पछतावा हुआ।

शिक्षा: “घमण्ड कभी भी लाभप्रद नहीं होता।”

खूबसूरत सींग, मुसीबत की जड़

एक जंगल में एक बारहसिंघा रहता था। वह बहुत ही सुंदर था। उसे अपने सींग बहुत ही प्रिय थे। परन्तु जब वह अपने पैरों को देखता था तो, उसे बहुत बुरा लगता था।

क्योंकि उसके पैर पतले दुबले और बदसूरत थे। कभी कभी वह खुद को कोसते हुए भगवान से प्रश्न करता था कि उसको ऐसे बदसूरत पैर क्यों दिए!

एक दिन वह जंगल में घास चर रहा था, तब एक शेर ने उसे देख लिया, वह छिप कर बारहसिंघा को देख ही रहा था कि, बारहसिंघा को शेर के उसके आस-पास होने की भनक लग गयी।

उसने मन में सोचा कि आज तो बच पाना नामुमकिन है। परन्तु वह अपनी जी-जान लगाकर वहां से भाग निकला।

बारहसिंघा को भागते देख शेर भी उसके पीछे, उसे पकड़ने लपका। आगे एक पेड़ था। बारहसिंघा के सींग उस पेड़ की डालियों में उलझ गए, उसने बहुत कोशिश की परन्तु उसके सींग निकल ही नहीं पाए।

शेर उसकी ओर पहुंचने ही वाला था कि उसने अपने पैरों की मदद से खड़े होकर अपने सींगों को हिलाया।उसके सींग डालियों से निकल गए।

वह फिर से पूरी ताकत लगा कर भागा, और शेर की पहुंच से बहुत दूर निकल गया।

शेर हाथ मलता रह गया। और बारहसिंघा भाग गया।

अपने घर जाकर बारहसिंघा सोचने लगा, जिन सीगों पर मुझे अभिमान था। वे ही आज मेरी मृत्यु का कारण बन रहे थे, और जिन पैरों को मैं बिल्कुल भी पसन्द नहीं करता था, उन्होंने मुझे आज एक नया जीवन दिया।

तबसे वह कभी भी अपने पैरों को नहीं कोसता।

शिक्षा: “कभी कभी जिन चीजो को हम पसन्द नहीं करते, वहीं हमारे प्राणों की रक्षा करती हैं।”

डरपोक गिलहरी

एक जंगल में एक गिलहरी रहती थी। वह बहुत ही डरपोक थी।जंगल में कुछ भी घटित होता था तो, वह बहुत ही घबरा जाती थी। उसको थोड़ी सी आवाज से भी बहुत डर लगता था।

एक बार वह एक पेड़ पर बैठी इधर-उधर देख रही थी। शायद वह कुछ सोच रही थी। तभी पेड़ का एक पत्ता उस पर गिर गया। वह बहुत ही ज्यादा घबरा गई।

उसने सोचा कि आसमान उसके ऊपर गिर रहा है। वह झटपट पेड़ से नीचे उतरी और चिल्ला चिल्लाकर भागने लगी, “भागो सब, आसमान गिर रहा है।….भागो…..!”

तभी उसकी आवाज एक खरगोश ने सुनी, खरगोश भी बहुत डरपोक था। उसने आव देखा न ताव वह भी उसके पीछे भागने लगा।

तभी जंगल के हिरन, लोमड़ी, चूहा और हाथी, सब एक धुन में ही गिलहरी की बातों में आकर भागने लगे। सब एक साथ बोल रहे थे, “आसमान गिर रहा है, भागो….. भागो…….!”

वे सब हल्ला करते हुए शेर की गुफा के समीप चले गए। शेर खाना खाकर अपनी गुफा में सोया हुआ था। कोलाहल से उसकी नींद खुल गयी।

उसको थोड़ा गुस्सा आया और वह मामले को देखने के लिए बाहर आया। उसने अपनी एक दहाड़ लगाई और सभी जानवर रुक गए। उसने पूछा, “क्या बात है, तुम सब भाग क्यों रहे हो?”

तभी चूहा बोला, “महाराज! आसमान गिर रहा है। आप भी हमारे साथ किसी सुरक्षित स्थान पर चलिए।”

आसमान के गिरने की बात सुनकर शेर को बहुत हंसी आई। शेर बोला, “दिखाओ मुझे कहाँ गिर रहा है आसमान, और तुमसे यह कहा किसने कि आसमान गिर रहा है।”

सबने एक-दूसरे का मुह देखा, तब सबकी नजर जाकर गिलहरी पर रुकी, फिर वह बोली, “महाराज मैं झूठ नहीं बोल रही हूँ। आप चलिये मेरे साथ। वहीं पेड़ में जब मैं बैठी थी,

तो, तब मेरे ऊपर आसमान का थोड़ा सा टुकड़ा गिरा, वह अभी वहीं होगा, चलिये मेरे साथ।”

सभी जानवरऔरशेरगिलहरी के साथ उस जगह चल दिये। सब वहां पहुंच गए सबने इधर उधर देखा। कहीं कुछ भी नही था। पेड़ के नीचे बस कुछ पत्ते गिरे थे।

शेर ने कहा, “यहां तो कहीं आसमान का टुकड़ा नहीं है। बस ये पत्ते जरूर है।”

सब समझ गए कि गिलहरी ने पत्ते को ही आसमान का टुकड़ा समझ लिया। सभी जानवर अपनी मूर्खता पर शर्मिंदा हुए। और शेर हंसने लगा। अब सभी जानवर अपने अपने घर चले गए।

शिक्षा: “सुनी-सुनाई बातों पर कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।”

सफेद खाल का भेड़िया

एक बार जंगल मे एक भेड़िया टहल रहे था, तो टहलते हुए उसे एक भेड़ की सफेद खाल मिल गई। भेड़िया बहुत खुश हुआ। उसने इस खाल के जरिए भेड़ो के झुंड में जाने की योजना बनाई।

भेड़िये ने भेड़ की खाल पहन ली। अब उसे कोई भी नहीं पहचान सकता था कि वह भेड़िया है या फिर भेड़। उस दिन एक चरवाहा भेड़ो को लेकर जंगल मे चराने के लिए आया।

वह भेड़ो को देखकर बहुत ही खुश हुआ। वह जल्द से भेड़ो के झुंड में शामिल हो गया और घांस चरने का नाटक करने लगा।

तभी भेड़िये ने मन में सोचा, “जब ये चरवाहा मुझे भेड़ों के साथ उनके तबेले में बंद कर देगा, तभी अंधेरा होने पर मैं एक भेड़ पकडूँगा और फुर्र हो जाऊँगा किसी को पता भी नहीं चलेगा कि, यह काम मैंने किया है।

यह खाना तो मेरा, कई दिनों तक चल जाएगा। फिर जब मेरा खाना खत्म होगा तो यह भेड़ की खाल तो है ही मेरे पास, फिर से किसी अन्य भेड़ो के झुंड में शामिल होकर मैं एक और भेड़ का शिकार करूँगा।

मेरा जीवन तो धन्य हो गया है, भेड़ की खाल को पाकर।”

सभी भेड़ो ने पेट भर घांस चर ली। अब शाम हो चुकी थी, चरवाहा भेड़ो को लेकर घर को चल दिया। घर मे आने के बाद वह भेड़ो को वहीं तबेले मे बांध कर अपने कमरे की ओर चल दिया। रात होने ही वाली थी।

यहां तक तो भेड़िये की योजना ने काम करा, लेकिन इसके बाद कुछ यूं हुआ कि भेड़िये की सारी भविष्य की योजना धरी की धरी रह गयी।

उस ही दिन चरवाहे के घर पर बहुत से मेहमान आ गए। अब उतनी रात को वह क्या खाने पीने का इंतजाम कर पाता, अतः उसने सोचा कि एक भेड़ को ही काट देता हूँ मेहमान भी खुश हो जाएंगे।

वह तबेले में गया और सबसे मोटी भेड़ देखकर ले आया। रात में कुछ अच्छे से दिख नहीं रहा था, चरवाहा पहचान नहीं सका और उसको हलाल कर दिया।

असल मे वह मोटी भेड़ और कोई नहीं भेड़ की खाल ओढे भेड़िया ही था।

भेड़िये का पूरा प्लान असफल हो गया और उस दिन वह चरवाहे के मेहमानों का भोजन बन गया।

शिक्षा: “बुराई का अंत भी बुरा ही होता है।”

गधे का भाग्य

काफी समय पहले की बात है। एक माली के पास एक गधा था। माली गधे पर फूल लादकर शहर ले जाता था। एक दिन गधे ने सोचा, ‘यह माली मुझसे बहुत मेहनत कराता है।

क्यों न मैं विधाता के पास जाकर अपने लिए किसी नए मालिक की मांग करूँ!’ यह सोचकर वह विधाता के पास पहुँच गया और उनसे बोला, “माली सारा दिन मुझसे बहुत मेहनत कराता है।

मैं उसके साथ खुश नहीं हूँ। कृपा करके आप मुझे कोई और मालिक दे दीजिए।’ विधाता ने उसे एक कुम्हार के पास भेज दिया। यहाँ उसकी हालत और भी खराब थी।

कुम्हार सारा दिन उस पर ढेर सारे बर्तन रखकर बेचने जाता। थोड़े दिनों बाद गधा फिर विधाता के पास गया और बोला, “मुझे कोई और मालिक दे दीजिए।”

विधाता को गधे पर बहुत गुस्सा आया। उन्होंने उसे एक कसाई के हाथ बिकवा दिया। उसे देखते ही कसाई बोला, “इस गधे की खाल से तो अच्छा चमड़ा बनेगा।” यह सुनकर गधा अपनी मूर्खता पर आँसू बहाने लगा।

शिक्षा: संतोषी व्यक्ति कभी सुखी नहीं रहता।

कुएँ के मेंढक

एक बार भीषण गर्मी पड़ी। महीनों तक वर्षा नहीं हुई। बारिश न होने से सभी नदी-नाले, तालाब आदि सूख गए। पानी में रहने वाले जीव-जन्तु पानी की तलाश में जहाँ-तहाँ मारे-मारे भटकने लगे।

पानी की खोज में बेहाल दो मेंढक एक कुएँ के पास आए। आगे चलने वाले मेंढक ने दूसरे मेंढक से हैरानी से पूछा, “देखो! यह कैसा गड्ढा है?” दूसरे मेंढक ने पास आकर देखा तो खुशी से बोला,

“अरे ! यह तो कुआँ है। देखो, इसके अंदर कितना पानी है। चलो, इसके अंदर चलते हैं।” दूसरा मेंढक थोड़ा समझदार था। वह बोला, “मित्र! पानी के लालच में जल्दबाजी न करो।

जरा सोचो कि हम लोग कुएँ में चले तो जाएंगे पर बाहर कैसे निकलेंगे। हमें हमेशा कुएँ में ही रहना पड़ेगा।” पहले मेंढक को दूसरे मेंढक की बात सही लगी। इसलिए उसने कुएँ में कूदने का विचार छोड़ दिया और दोनों वहाँ से चल पड़े।

शिक्षा: कोई भी काम करने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार करना चाहिए।

बच्चा

एक चरवाहे के पास काफी सारी बकरियाँ थीं। उसने बकरियों की रखवाली के लिए कुत्ते पाले हुए थे। उनमें एक नन्हा बकरी का बच्चा भी था। उसकी माँ उसे हमेशा अपने पास रखती।

एक दिन जब चरवाहा उन्हें चराने के लिए जंगलले गया तो नन्हा बकरी का बच्चा अपने झुंड से अलग होने की कोशिश करने लगा। उसकी माँ ने उसे समझाया, ” अपने झुंड के साथ रहो। वरना भेड़िए तुम्हें अकेले पाकर खा जाएंगे।

कहीं मत जाना, मेरे साथ ही रहना।” । बच्चे ने सिर हिला दिया, लेकिन वह सबसे नजर बचाता हुआ दूर निकल गया। एक भेड़िया उस पर नजर गड़ाए बैठा था। भेड़िया तुरंत बकरी के बच्चे को खाने के लिए आगे बढ़ा।

बकरी का बच्चा डर से कांपने लगा। वह पछता रहा था कि उसने अपनी माँ का कहना क्यों नहीं माना। बचने का उपाय सोचकर वह बोला,

“भेड़िए भाई! मैंने सुना है कि तुम बहुत अच्छा गाते हो। मेरी इच्छा है कि मरने से पहले तुम्हारा गाना सुनूँ।” भेड़िया जोर-जोर से चिल्लाने लगा।

उसकी आवाज सुनकर कुत्ते वहाँ आ गए और वह भाग खड़ा हुआ।बकरी के बच्चे की जान बच गई और उसने उस दिन से सदा अपनी माँ की बात मानने की शपथ ली।

शिक्षा: हमें हमेशा अपने से बड़ों की बात माननी चाहिए।

भगवान हर्मिज तथा एक इंसान

एक आदमी समुद्र तट पर खड़े होकर प्रकृति की सुंदरता को निहार रहा था। समुद्र, उसमें चल रहे पोत, पहाड़ और ठंडी हवाएँ उसके मन में खुशियाँ भर रही थीं।

अचानक उसे दिखाई दिया कि सवारियों से भरा एक पोत समुद्र में डूब गया। उस आदमी को बेहद दुख हुआ। उसने मन-ही-मन कहा कि भगवान का बर्ताव अन्यायपूर्ण है,

क्योंकि उन्होंने किसी एक अपराधी को सजा देने के लिए इतने सारे निर्दोष लोगों को मार दिया है। जिस स्थान पर वह खड़ा था वहाँ चीटियाँ भरी हुई थीं। जब वह भगवान को कोस रहा था तब एक चींटी ने उसे काट लिया।

उसे मारने के लिए वह आगे बढ़ा तो उसके पैर बहुत सारी चींटियों पर पड़ गए जिससे वे सभी कुचलकर मर गईं। तभी भगवान हर्मिज प्रकट हुए और बोले,

“मुझे आशा है कि अब तुम समझ चुके हो कि भगवान इंसानों को ठीक उसी तरह से आँकता है जिस तरह से तुमने चींटियों को आँका है।”

शिक्षा:दूसरों को दोष मत दीजिए, बल्कि अपनी कमियों पर ध्यान दीजिए।

धोबी का गधा

किसी दूर गाँव में एक धोबी रहता था। धोबी रोज लोगों के घर-घर जाता और लोगों के गंदे कपड़े धोने के लिए लेकर जाता था। धोबी के पास एक गधा था जिस पर वो कपड़े लादकर लाया और ले जाया करता था। गधा अब काफी बूढ़ा हो चुका था इसलिए वह काफी कमजोर भी हो गया था।

एक दिन ऐसे ही कड़ी दोपहर में धोबी कपड़े लादकर गधे के उपर रखकर ले जा रहा था। गर्मी की वजह से गधे और धोबी दोनों का बुरा हाल था। अचानक गधे का पैर लड़खड़ाया और बेचारा गधा एक बड़े गढ्ढे में जा गिरा। गधा बेचारा कमजोर तो था ही, फिर भी उसने पूरी ताकत लगायी लेकिन गड्ढे से बाहर नहीं निकल पाया। धोबी ने भी अपनी तरफ से पूरा प्रयास किया लेकिन गढ्ढा गहरा होने की वजह से गधा बाहर नहीं निकल पा रहा था।

अब तो गधा डर से बुरी तरह चिल्लाने लगा। धोबी भी जब प्रयास करते करते थक गया तो उसने सोचा ये गधा बूढ़ा हो चुका है और अब किसी काम का भी नहीं है तो इसको निकालने से कोई फायदा नहीं है, क्यों ना गड्ढे को मिटटी से भरकर इस गधे को यहीं दफना दिया जाये। यही सोचकर धोबी ने गाँव के लोगों को आवाज लगायी। सारे लोग अपना फावड़ा लेकर आ गए। सब मिलकर जल्दी जल्दी गड्ढे में मिटटी डालने लगे।

पहले तो गधे को कुछ समझ में नहीं आया कि ये क्या हो रहा है? लेकिन जब उसे अहसास हुआ कि ये लोग उसे दफ़नाने वाले हैं तो उसकी आखों में आँसू आ गए। कुछ देर तक गधा चिल्लाता रहा, बाद में उसने चिल्लाना भी बंद कर दिया। सब लोग और तेजी से गड्ढे में मिटटी डालने लगे।

थोड़ी देर बाद धोबी ने जब गड्ढे में झाँककर देखा तो वो हैरान रह गया। गधा वहाँ कुछ विचित्र सी हरकत कर रहा था।

जैसे ही कोई गधे की पीठ पर मिटटी डालता, गधा तुरंत अपनी पीठ हिलाकर मिटटी नीचे गड्ढे में गिरा देता और खुद एक कदम ऊपर हो जाता। यही क्रम चलता रहा जैसे ही गधे की पीठ पे मिटटी डाली जाती वो पीठ हिलाकर मिटटी नीचे गिरा देता और खुद उस मिटटी पे चढ़कर एक कदम ऊपर हो जाता।

धीरे धीरे गढ्ढा मिटटी से भर गया और गधा उछलता हुआ गड्ढे से बाहर निकल आया और सारे लोग गधे को हैरानी से देखते रह गए।

शिक्षा: दोस्तों ये कहानी हमें बहुत बड़ी सीख देती है कि आपकी समस्या कितनी भी बड़ी क्यों न हो? गड्ढा कितना भी गहरा क्यों ना हो? घबराइये मत, हर परेशानी को मिटटी की तरह हिलाकर नीचे गिराते जाइये फिर देखिये आप हर समस्या से बाहर निकल आएंगे।

दो बिल्लियाँ और बन्दर

एक नगर में दो बिल्लियाँ रहती थी. एक दिन उन्हें रोटी का एक टुकड़ा मिला. वे दोनों आपस में लड़ने लगी. वे उस रोटी के टुकड़े को दो समान भागों में बाँटना चाहती थी लेकिन उन्हें कोई ढंग नहीं मिल पाया.

उसी समय एक बन्दर उधर से निकल रहा था. वह बहुत ही चालाक था. उसने बिल्लियों से लड़ने का कारण पूछा. बिल्लियों ने उसे सारी बात सुनाई. वह तराजू ले आया और बोला, ” लाओ, मैं तुम्हारी रोटी को बराबर बाँट देता हूँ. उसने रोटी के दो टुकड़े लेकर एक – एक पलड़े में रख दिए. वह बन्दर तराजू में जब रोटी को तोलता तो जिस पलड़े में रोटी अधिक होती, बन्दर उसे थोड़ी – सी तोड़ कर खा लेता.

इस प्रकार थोड़ी – सी रोटी रह गई. बिल्लियों ने अपनी रोटी वापस मांगी. लेकिन बन्दर ने शेष बची रोटी भी मुँह में डाल ली. फिर बिल्लियाँ उसका मुँह देखती रह गई.

शिक्षा: बचपन से आपने सुना होगा की कभी भी हमें आपस में लड़ना नहीं चाहिए. कोई भी दोस्त या परिवार तब तक बहुत मजबूत होता है, जब तक उनमे आपसी प्यार और विश्वास होता है पर जब वह आपस में लड़ने लगते है तो इससे दूसरे लोग भी फायदा उठाते है. वह इस लड़ाई को बड़ा बनाकर अपना मुनाफा ढूंढ लेते है. इसलिए लड़ने से अच्छा है एक साथ रहना साथ ही कोई भी मुसीबत हो उसे मिलकर दूर करना।

चार मित्र और शिकारी

जंगल में हिरन, कौआ, कछुआ और चूहे की गाढ़ी मित्रता थी। एकबार जंगल में शिकारी आया और उस शिकारी ने हिरन को अपने जाल में फंसा लिया।

अब बेचारा हिरन असहाय सा जाल में फंसा था उसे लगा कि आज मेरी मृत्यु निश्चित है। इस डर से वह घबराने लगा। तभी उसके मित्र कौए ने ये सब देखा और उसने कछुआ और चूहे हो भी हिरन की सहायता के लिए बुला लिया।

कौए ने जाल में फंसे हिरन पर इस तरह चोंच मारना शुरू कर दिया जैसे कौये किसी मृत जानवर की लाश को नोंचकर खाते हैं। अब शिकारी को लगा कि कहीं यह हिरन मर तो नहीं गया।

तभी कछुआ उसके आगे से गुजरा। शिकारी ने सोचा हिरन तो मर गया इस कछुए को ही पकड़ लेता हूँ। यही सोचकर वह कछुए के पीछे पीछे चल दिया।

इधर मौका पाते ही चूहे ने हिरन का सारा जाल काट डाला और उसे आजाद कर दिया।

शिकारी कछुए के पीछे- पीछे जा ही रहा था कि तभी कौआ उड़ता हुआ आया और कछुए को अपनी चौंच में दबाकर उड़ाकर ले गया। इस तरह सभी मित्रों ने मिलकर एक दूसरे की जान बचायी।

शिक्षा: साथ में मिलकर कार्य करने से कठिन कार्य भी आसान हो जाते हैं।

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