आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ Interesting Stories in Hindi for Class 9 शेयर करने जा रहे है। इन stories आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा।आप इन Interesting Stories in Hindi for Class 9 को पूरा पढ़े। आपको यह Stories बहुत पसंद आएगी।

Stories in Hindi for Class 9th

Stories in Hindi for Class 9th List

बुरा क्यों चाहूँ?

बच्चे का उद्धार

पति पत्नी का प्यार

वतन के लिए फाँसी भी मंजूर

भगवान् चाहिए

स्कूल में स्वामी विवेकानंद

खूनी झील

अपराधी कौन

टिडडे का घमंड

भेड़िये का बच्चा

मछुआरों का सपना

कीमती तोहफा

लोमड़ी और खट्टे अंगूर

सालाह देना

बेचारा चरवाहा

दो कुत्ते

अनूठी वतनपरस्ती

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शेर और गरीब गुलाम

एक साड़ी की कीमत

मजदूर के जूते

चोरी का कार्य

कौवे की परेशानी

बुद्धि का बल

अनूठा शौर्य

सफलता की तैयारी

लोमड़ी और सारस

अंगूठी की कीमत

आरी की कीमत

बूढ़ा आदमी और मौत

विशाल बरगद और सरकंडा

एक जुआरी और चिड़िया

पढ़ो ही नहीं, अमल भी करो

शास्त्रीजी तो साधु हैं

सदैव न्याय करना

शिकारी राजकुमार

लाभदायक लेनदेन

बुरा क्यों चाहूँ?

संत मार्टिन लूथर ने धर्म के नाम पर प्रचलित अनेक रूढ़ियों के विरुद्ध जन जागरण अभियान चलाया। इससे चिढ़कर कुछ रूढ़िवादियों ने उन पर निराधार आरोप लगाकर उन्हें बदनाम करने का काम शुरू कर दिया ।

एक दिन संत लूथर के एक मित्र ने कहा, ‘आप अच्छी बातों का प्रचार करें। पुरानी मान्यताओं पर प्रहार कर व्यर्थ ही अपना विरोध क्यों बढ़ा रहे हैं?’

उन्होंने उत्तर दिया, ‘मैं धर्म प्रचारक हूँ। धर्म के नाम पर फैल रहे अधर्म रूपी पाप का मूक दर्शन बनकर भी तो मैं परमात्मा का विरोध सहन करूँगा। इससे अच्छा है कि इन गलत मार्ग पर चलने वालों का विरोध झेलूँ, किंतु अंत में उन्हें ही चुप होना पड़ेगा।’

जब संत लूथर को पाखंडियों ने ज्यादा सताना शुरू किया, तो एक शिष्य ने कहा, ‘अब तो हद ही हो गई है । आपकी प्रार्थना भगवान् भी सुनते हैं क्यों न आप उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे इन पाखंडियों को दंडित करें। इतना ही नहीं, इनकी गलत शब्द उच्चारण करने वाली जीभ को लकवा मार जाए। ‘

संत लूथर ने कहा, ‘मैं प्रतिदिन भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि इन भ्रमित लोगों को सद्बुद्धि दो। उन्हें पाखंड के मार्ग से हटाकर सच्चे धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा दो ।

यदि मैं उनका बुरा चाहूँगा और उन्हें शाप दूँगा, तो फिर उनमें और मुझमें अंतर ही क्या रहेगा?’ शिष्य अपने गुरु का विशाल हृदय देखकर हतप्रभ रह गया।

बच्चे का उद्धार

एक जमाना था, जब आदमी को ‘दास’ की तरह बाजार में बेचा जाता था। कुछ दुष्ट किस्म के लोग बच्चों को उठा लेते थे और उन्हें मंडी में बेच देते थे। एक दिन बीबी खदीजा को किसी ने बताया कि एक मासूम-सुंदर बच्चा मंडी में बेचने के लिए लाया गया है ।

यह सुनकर उनका दिल पसीज गया। वे बाजार गईं और पैसे देकर उस बच्चे को खरीद लाईं | वे बच्चे को लेकर नबी के पास पहुँचीं। नबी बच्चों को बहुत प्यार करते थे।

उन्होंने अपनी सरपरस्ती में उसका बहुत प्रेम से पालन-पोषण किया। बच्चा अच्छे संस्कारों में ढलने लगा। वह नबी को ‘अब्बा हुजूर’ कहकर बहुत इज्जत देता ।

कुछ महीने बाद बच्चे के असली पिता को पता लगा कि उनका बिछुड़ा बच्चा नबी के पास है, जिसे बीबी खदीजा ने खरीदा था। पिता जैसे-तैसे धन जुटाकर नबी के पास पहुँचे। पिता ने रुपए उनके सामने रखकर प्रार्थना की, ‘मेरे बच्चे को मुझे सौंप दें। ‘

नबी ने कहा, ‘रुपए उठा लो। अपने बच्चे को ऐसे ही ले जाओ। यह तुम्हारी धरोहर है।’ प्रेम व सद्व्यवहार के कारण बच्चा नबी से इतना हिल मिल गया था कि उसने पिता के साथ जाने से इनकार कर दिया।

जब जबरदस्ती की जाने लगी, तो वह नबी के पैरों से लिपट गया। पिता ने यह दृश्य देखा, तो बोला, ‘आपने मेरे साधारण बच्चे को अच्छी तालीम देकर प्रेम के बंधन में जकड़ लिया है। मुझे इसी बात का संतोष है कि यह एक बहुत बड़े औलिया की देख-रेख में सच्चा इनसान बनेगा।’ इतना कहकर वे वहाँ से चले गए।

पति पत्नी का प्यार

एक बार एक शहर में एक आदमी रहता था, जिसकी शादी एक बहुत ही खूबसूरत लड़की के साथ हुई थी। शहर में हर कोई उसकी पत्नी की सुंदरता के लिए उसकी तारीफ करता था।

यह देखकर पति पत्नी को गर्व महसूस हुई, दोनों सुखी जीवन बिताने लगे। कुछ सालों के बाद, पत्नी ने एक दुर्लभ त्वचा रोगों से संक्रमित हो गई। उन्होंने कुछ डॉक्टर के पास गई

लेकिन कोई भी उसकी बीमार का इलाज नहीं कर पाया। जब पत्नी को पता चला वह बीमार के कारण अपनी सुंदरता खो देगी। वह इस बात से डरी हुई थी, कि अपनी पति का प्यार खो देगी।

पति ने उसे रोज खुश करने की कोशिश की। लेकिन वह हमेशा दुखी रहती, और अपने पति के सामने जाने से डरती थी। फिर एक दिन पति किसी काम के लिए, शहर से बाहर गया था।

वापस लौटते समय उसके साथ एक दुर्घटना हुई, उस दुर्घटना में उसकी दोनों आंखें की रोशनी चली गई। पत्नी को बहुत बुरा लगा, लेकिन समय के साथ वे दोनों सामान्य जीवन जीना सीख गए।

वह अब अपने पति से नहीं बच सकती थी। हर समय उसके साथ रहती थी, और काम में उसकी मदद करती थी। ऐसे ही कुछ साल बीत गए, वह दोनों अब बुड्ढा हो गया था।

फिर एक दिन पत्नी की मृत्यु हो गई, और पति अकेला हो गया। पति पत्नी से बहुत प्यार करता था, और अब वह उस जगह पर नहीं रहना चाहता था। इसलिए अंतिम संस्कार करने के बाद।

उन्होंने इस शहर को छोड़ने की तैयारी की। जाने से ठीक पहले एक पड़ोसी उसके पास आया और कहा, “क्या तुम अकेला रह पाओगे? इतने सालों से आपकी पत्नी आपके साथ रहे।

आप किसी के मदद के बिना इधर उधर जा पाओगे?” पति ने जवाब दिया, “मैं अंधा नहीं हूं, मैंने सिर्फ अंधे होने का नाटक किया। क्योंकि अगर मेरी पत्नी को पता होता कि,

मैं उसकी सबसे खराब स्थिति देख सकता हूं, तो वह ज्यादा घायल होता। मेरी पत्नी पहले से ही बहुत दर्द में थी, और मैं उसे किसी और दर्द में नहीं देखना चाहती थी।

इसीलिए मैं इतने सालों तक अंधे होने का नाटक किया। वह मेरी बहुत अच्छी पत्नी थी, और मैं चाहता था कि वह हमेशा खुश रहे।

शिक्षा: रिश्ता केवल सुंदर चेहरा के लिए नहीं है, बल्कि दोनों एक दूसरे के लिए है।

वतन के लिए फाँसी भी मंजूर

चंद्रशेखर आजाद और रामप्रसाद बिस्मिल के साथ स्वाधीनता के लिए सतत संघर्ष करने वाले अशफाक उल्ला खां पर काकोरी रेलवे स्टेशन के निकट सरकारी खजाना लूटने और एक अंग्रेज की हत्या के आरोप में मुकदमा चलाया गया।

रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह अशफाकउल्ला और राजेंद्र लाहिड़ी को अदालत ने मौत की सजा सुनाई, जबकि मन्मथनाथ गुप्त, शचींद्रनाथ बख्शी आदि को आजीवन कारावास का दंड दिया गया।

चंद्रभानु गुप्त और वकील कृपाशंकर हजेला ने इन क्रांतिकारियों को फाँसी से बचाने के लिए मुकदमे में पैरवी की थी । 19 दिसंबर, 1927 को फैजाबाद में अशफाक उल्ला खाँ को फाँसी दी जानी थी।

दो दिन पूर्व 17 दिसंबर को अशफाक के बड़े भाई रियासतुल्ला और शहंशाह खाँ अपने बच्चों के साथ वकील हजेला को लेकर अशफाक से अंतिम भेंट करने फैजाबाद जेल पहुँचे। मिलते ही दोनों भाई व भतीजे रोने लगे।

अशफाक उल्ला खाँ ने एक तरफ संकेत करते हुए कहा, ‘ये सामने जो तीन भाई खड़े हैं, इन्हें डेढ़ सेर गुड़ के लिए हुए झगड़े में हुई हत्या के आरोप में फाँसी दी जाएगी।

मुझे तो अपने प्रिय वतन की आजादी के संघर्ष के लिए फाँसी पर चढ़ाया जाएगा।’ कुछ क्षण रुककर उन्होंने कहा, ‘हिंदुओं में खुदीराम बोस व कन्हाई लाल दत्त वतन के लिए फाँसी पर झूले थे मगर मुसलमानों में मैं पहला खुशनसीब हूँ,

जो वतन के लिए शहीद होगा। इसके लिए आपको खुश होना चाहिए।’ 19 दिसंबर को अशफाक उल्ला खाँ हँसते-हँसते फाँसी पर झूल गए ।

भगवान् चाहिए

नरेंद्रदत्त स्वामी रामकृष्ण परमहंस के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। वे जानते थे कि स्वामीजी परम विरक्त, तपस्वी और सिद्ध पुरुष हैं। माँ काली उनसे बातें करती हैं।

नरेंद्र प्रतिदिन मंदिर जाकर अपने गुरु के दर्शन अवश्य करते थे। स्वामी रामकृष्ण परमहंस भी प्रेम से उनके सिर पर हाथ फेरते। उन्हें उपदेश देकर उनका मार्गदर्शन करते ।

एक दिन नरेंद्र उनके पास पहुँचे, तो परमहंसजी ने उनकी उपेक्षा की। नरेंद्र उठे और आश्रम का काम करके पुनः उनके पास आए। इस बार भी गुरुदेव उनसे नहीं बोले ।

नरेंद्र सोचने लगे कि कहीं उनसे कोई भूल तो नहीं हो गई । उन्होंने उस समय लौटने में ही भलाई समझी | अगले दिन वे पुनः स्वामी रामकृष्ण के दर्शन को पहुँचे। 

स्वामीजी ने कहा, ‘नरेंद्र, तू कल यहाँ कई बार आकर बैठा, लेकिन मैंने तुमसे बात नहीं की। ‘ नरेंद्र ने कहा, ‘मैं आपके पास बात करने नहीं, दर्शन करने आता हूँ। दर्शन से ही मुझे सबकुछ मिल जाता है। ‘

स्वामी रामकृष्ण ने कहा, ‘मैंने तेरी श्रद्धा की परीक्षा के लिए ऐसा किया और तू उस कसौटी पर खरा उतरा। आज तू मुझसे सिद्धियों के उपयोग का मंत्र सीख ले। ‘

नरेंद्र ने पूछा, ‘बाबा, क्या इन सिद्धियों से ईश्वर को पाने में मदद मिलेगी।’ उन्होंने कहा, ‘नहीं, सिद्धियों के कारण तेरी ख्याति फैलेगी।’ नरेंद्र ने कहा, ‘मुझे ईश्वर को पाना है । ख्याति पाने की कोई इच्छा नहीं है । ‘ रामकृष्ण ने उन्हें गले से लगा लिया। नरेंद्र ही आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के रूप में प्रसिद्ध हुए।

स्कूल में स्वामी विवेकानंद

एक बार की बात है, एक बार स्कूल टिफिन के दौरान नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद) अपने दोस्तों के साथ बात कर रहे थे। और हर कोई उन्हें इतनी ध्यान में सुन रहा था।

कि उन्हें पता नहीं था, उनके आसपास क्या हो रहा है। फिर टिफिन समाप्त हो गया और शिक्षक कक्षा में प्रवेश करके पढ़ाना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद शिक्षक ने कुछ आवाज सुनी,

और देखा कि कुछ छात्रों पीछे बैठे बातें कर रहे थे। शिक्षक इससे नाराज हो गए और उन्होंने छात्रों से पूछना शुरू किया कि वह कक्षा में क्या पढ़ा रहे हैं।

लेकिन कक्षा में कोई भी उनका उत्तर नहीं दे पाया। फिर जब शिक्षक नरेंद्र से सवाल किया, तब नरेंद्र ने प्रत्येक प्रश्न का सही जवाब दिया। और फिर शिक्षक ने इस बारे में पूछताछ की,

कि कौन एक छात्रों था जो दूसरों से बातें कर रहा था। कक्षा में सभी छात्र नरेंद्र की ओर इशारा किया लेकिन शिक्षक ने यह मानने से इनकार कर दिया।

क्योंकि वह केवल एक ही था, जिसने सभी प्रश्नों का सही ढंग से उत्तर दिया। शिक्षक को लगा कि सभी झूठ बोल रहे हैं, इसीलिए उन्होंने पूरे कक्षा को दंडित किया।

सिर्फ नरेंद्र को छोड़कर, बाकी सभी को सजा के रूप में बेंच पर खड़े रहने के लिए कहा। फिर भी नरेंद्र अपने दोस्तों के साथ गया, और अन्य छात्रों के साथ बेंच पर खड़ा हो गया।

शिक्षक ने उसे नीचे आने के लिए कहा। लेकिन नरेंद्र ने कहा, “नहीं सर मुझे भी खरा रहना चाहिए क्योंकि मैं वही था जो उनसे बात कर रहा था।”

शिक्षा: हमें कक्षा में हमेशा अपनी ध्यान पढ़ाई में देना चाहिए।

खूनी झील

वीरपुर के जंगल में सभी जानवर एक साथ मिलजुल कर रहता था, उस जंगल में एक झील था। सभी जानवर का यह मानना था वह एक खूनी झील है, लेकिन जंगल में पानी पीने के लिए और कोई भी रास्ता नहीं था।

इसीलिए सभी जानवर को पानी पीने के लिए उसी झील में जाना पड़ता था। सभी जानवर दिन में पानी पीने के लिए जाता था। शाम को कोई भी पानी पीने के लिए उस झील में नहीं जाता था।

क्योंकि शाम को जो भी जानवर पानी पीने के लिए जाता था, वह और कभी लौटकर नहीं आता था। इसीलिए जंगल में सभी जानवर झील के पास अकेला जाने से डरता था।

एक दिन एक हिरण दूसरे जंगल से इस जंगल में रहने के लिए आया। वहां एक पेड़ में एक बंदर रहता था। वह हिरन को अकेला देखकर उससे पूछा, “अरे हिरण भाई तुम कहां से आए हो?

तुम्हारा नाम क्या है? आज से पहले तुम्हें इस जंगल में कभी नहीं देखा।” हिरण ने उत्तर दिया, “मेरा नाम चिन्नू है, मैं पास के जंगल से आया हूं, मैं इस जंगल में रहने के लिए आया।

“अच्छा तो ठीक है, इस जंगल के सभी जानवर बहुत ही अच्छा है। वह सब तुमसे दोस्ती करेगा। अभी तुम थोड़ा आराम कर लो शाम को मैं तुम्हें सभी जानवर से मिलाती हूं।

अगर तुम्हें किसी भी चीज की जरूरत हो तो मुझे बुला लेना, मैं सामने ही पेड़ पर रहती हूं रहता हूं।” हिरण ने कहा, “वह तो ठीक है बंदर भाई तुम्हारा नाम तो बताओ मैं तुम्हें बुलाऊंगा कैसे। और हां यहां पानी पीने के लिए कोई नदी या झील है क्या?”

बंदर ने कहा, “माफ करना मेरा नाम जग्गू है, पास में एक झील है तुम वहां जाकर पानी पी सकते हो।” शाम होने पर जग्गू बंदर हिरण को जंगल के सभी जानवर से मिलवाता है।

तभी हिरण की दोस्ती एक खरगोश से होती है, समय के साथ हिरण और खरगोश की दोस्ती गहरी होती जाती है। एक दिन हिरण पानी पीने के लिए उस झील में गया।

हिरण को झील के पानी में एक मगरमच्छ दिखाई दी, हिरण मगरमच्छ को देखकर कांपने लगा। किसी तरह जान बचाकर वहां से जंगल की ओर भागा, रास्ते में उसे खरगोश मिली।

हिरण खरगोश को मगरमच्छ के बारे में बताइए। खरगोश ने कहा, “चिन्नू भाई क्या तुम नहीं जानते हो वह एक खूनी झील है, तुम्हें शाम को वहां नहीं जाना चाहिए था।” तभी वहां जग्गू बंदर आया।

हिरण बंदर को सभी बात खोल कर बताती है। जग्गू बंदर ने कहा, “मुझे माफ करना हिरण भाई मैं तुम्हें उस खूनी झील के बारे में बताना भूल गया।” हिरण ने कहा, “ठीक है बंदर भाई आज के बाद अकेला उस चीज में कभी नहीं जाऊंगा।”

फिर खरगोश ने सारी रात यह सोचने लगी, “खूनी झील में मगरमच्छ आया कहां से। इसका मतलब कोई भी जानवर उस झील में गायब नहीं होती, उसे मगरमच्छ ने खा लेता है।

इस मगरमच्छ की कहानी सबके सामने लाना ही पड़ेगा।” खरगोश ने मगरमच्छ का सच सबके सामने लाने के लिए अगले दिन सुबह सबके साथ उस झील में गया।

मगरमच्छ सभी जानवर को एक साथ आते हुए देख कर डर जाता है। इसीलिए पानी के अंदर ऐसे चुप गया जैसे कि वह एक पत्थर है। उसे देखकर खरगोश ने कहा, “यह पत्थर कहां से आया।

पहले तो यहां कुछ भी नहीं था, नहीं नहीं वह पत्थर नहीं है वह मगरमच्छ ही है।” कोई भी जानवर उसकी बातों का यकीन नहीं करता, खरगोश नहीं है मगरमच्छ की तरकीब समझ जाता है।

इसीलिए खरगोश की मन में एक विचार आया, “अरे यह तो पत्थर ही है, लेकिन इस बात का यकीन तब करूंगा जब पत्थर अपना परिचय खुद देगा।” खरगोश की बात सुनते ही मगरमच्छ ने कहां,

“हां मैं एक पत्थर हूं यहां कोई भी मगरमच्छ नहीं रहता, यहां तो बस मैं ही रहता हूं।” फिर खरगोश ने कहा “हा हा हा बेवकूफ मगरमच्छ यह भी नहीं जानता पत्थर बोलते नहीं है चल बाहर निकल।

सभी जानवर समझ जाता है, और सभी मिलकर मगरमच्छ को झील से भगा देता है। फिर सभी जानवर जंगल में एक साथ लौट गया और खुशी खुशी रहने लगा।

शिक्षा: हमें हमेशा अपने विवेक से काम लेना चाहिए।

अपराधी कौन

एक बार एक समुद्री जहाज़ काफी स्थानों से व्यापार करके लौट रहा था। अचानक समुद्र की लहरें तेज़ हो गई| विशाल लहरों की गड़गड़ाहट ऐसे प्रतीत हो रही थी मानो किसी जंगली जानवर की भयंकर गर्जना हो।

कुछ समय बाद जहाज़ अपना सन्तुलन खो जाने के कारण एक चट्टान से जा टकराया तथा उस जहाज़ के टुकड़े-टुकड़े हो गए। उसमें सवार सभी यात्री मारे गए परन्तु एक व्यक्ति बच गया। वह बेहोश था।

जब उसे होश आया तो वह गुस्से से चिल्ला उठा और बोला, “पहले तो तुमने अपनी शांत लहरों से व्यापारियों को भ्रमित और प्रभावित किया और जब वे आधी यात्रा में पहुँच गए तो तुमने एक विशाल जंगली पशु की भाँति उन्हें खा लिया।

उन मासूमों की जान लेकर तुम्हें क्या मिला?” यह कहकर वह रोने लगा। तभी समुद्र एक लड़की के रूप में प्रकट होकर बोला, “कृप्या तुम मुझे दोष मत दो। मेरा स्वभाव बिल्कुल शान्त है।

मगर मैं क्या करूँ? ये तेज़ तूफानी हवाएँ मेरी आज्ञा लिये बिना मुझ पर आक्रमण कर देती हैं और मेरी लहरों को अपने बहाव के साथ चलाती हैं। दोषी ये तेज़ तूफानी हवाएँ हैं।”

शिक्षाः इल्ज़ाम लगाने से पहले असली अपराधी ढूंढना चाहिए।

टिडडे का घमंड

एक बार की बात है। एक घमंडी टिड्डे ने शेर को चुनौती दी कि वह उसे पकड़ कर दिखाए और उसे युद्ध करे। शेर गुस्से से बोला, “ऐ बेवकूफ टिड्डे! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे ललकारने की? मुझे तुम्हारी चुनौती मंजूर है।”

इतना कहकर शेर ने टिड्डे पर आक्रमण कर दिया लेकिन टिड्डा तुरन्त शेर की ओर बढ़ा और उसके मुँह पर डंक मार कर उड़ गया। शेर ने उसे पकड़ने के लिए अपने ही मुँह को अपने पंजे से नोंच डाला परंतु टिड्डा हाथ नहीं आया।

आखिरकार शेर ने हार मान ली। टिड्डा अपने ऊपर गर्व महसूस करता हुआ वहाँ से चल दिया। वह खुश था यह सोचकर कि उसने शेर जैसे ताकतवर दुश्मन को हरा दिया।

अपनी ही धुन में वह उड़ रहा था और सोच-सोच कर अपनी जीत पर खुश हो रहा था। अचानक उसे एक झटका लगा और उसने खुद को एक मकड़ी के जाल में फंसा पाया। मौत उसकी तरफ बढ़ रही थी। वह जाल में पूरी तरह फँस चुका था और उसने दम तोड़ दिया।  

शिक्षा: घमंड इंसान को हमेशा गिराता है।

भेड़िये का बच्चा

एक बार एक चरवाहे को एक भेड़िए का बच्चा मिला जो मदद के लिए रो रहा था। चरवाहे को उस पर दया आ गई और चरवाहा उस बच्चे को घर ले आया।

चरवाहे ने अपनी भेड़ों के साथ ही उस भेड़िये के बच्चे की भी परवरिश की। चरवाहे ने जल्द ही उस बच्चे को आस-पास की भेड़ें चुराने का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया।

भेड़िये का बच्चा अब बड़ा होने के साथ साथ एक पक्का चोर बन चुका था। अब वह आस-पास की भेड़ों को चुराने लगा। इस प्रकार बाड़े में भेड़ों की संख्या बढ़ने लगी। वह बच्चा अब एक भेड़िया बन चुका था।

चरवाहा इस बात से बेखबर था कि उसने एक चोर को पनाह दी है और वही चोर बाद में लुटेरा बन सकता है। कुछ समय बाद चरवाहे ने भेड़ों की संख्या कम होते देखी तो उसे पता लगा कि वह भेड़िया ही उसकी सभी भेड़ों को एक-एक करके खा रहा है।

शिक्षा: जैसा बोओगे वैसी ही फसल पाओगे।

मछुआरों का सपना

मछुआरों का एक समूह एक बड़ी मछली पकड़ने की आशा लेकर नाव पर सवार हुआ। समुद्र में नाव पर सवार वे सोच रहे थे कि काश कोई बड़ी मछली मिल जाए तो उसे बेचकर मिले धन से वे लोग भी अच्छा खाना खा सकें ।

रोज़ की तरह दाल-चावल न खाकर वह भी कम से कम एक दिन तो काजू करी, चिकन और नारियल की चटनी के साथ बिरयानी खा सकें। पूरा दिन गुजर गया परन्तु एक भी मछली उनके जाल में नहीं फँसी।

वे सभी बहुत ज्यादा निराश होकर नाव में बैठ गए। तभी अचानक एक शार्क से जान बचाने के लिए बड़ी टूना मछली नाव में कूदी और तुरन्त मछुआरों ने उसे पकड़ लिया।

इस अचानक मिले उपहार को पाकर वे बहुत खुश थे। उन्होंने उस टूना मछली को बेच कर मिली बड़ी धन राशि से रात को अच्छा खाना खाया और इस प्रकार उनका सपना पूरा हुआ।

शिक्षा: कभी-कभी किस्मत अचानक हमारा सपना मुफ्त में पूरा करा देती है।

कीमती तोहफा

मोहन काका डाक विभाग के कर्मचारी थे। बरसों से वे माधोपुर और आस पास के गाँव में चिट्ठियां बांटने का काम करते थे।

एक दिन उन्हें एक चिट्ठी मिली, पता माधोपुर के करीब का ही था लेकिन आज से पहले उन्होंने उस पते पर कोई चिट्ठी नहीं पहुंचाई थी।

रोज की तरह आज भी उन्होंने अपना थैला उठाया और चिट्ठियां बांटने निकला पड़े। सारी चिट्ठियां बांटने के बाद वे उस नए पते की ओर बढ़ने लगे।

दरवाजे पर पहुँच कर उन्होंने आवाज़ दी, “पोस्टमैन!”

अन्दर से किसी लड़की की आवाज़ आई, “काका, वहीं दरवाजे के नीचे से चिट्ठी डाल दीजिये।”

“अजीब लड़की है मैं इतनी दूर से चिट्ठी लेकर आ सकता हूँ और ये महारानी दरवाजे तक भी नहीं निकल सकतीं !”, काका ने मन ही मन सोचा।

“बहार आइये! रजिस्ट्री आई है, हस्ताक्षर करने पर ही मिलेगी!”, काका खीजते हुए बोले

“अभी आई।”, अन्दर से आवाज़ आई।

काका इंतज़ार करने लगे, पर जब 2 मिनट बाद भी कोई नहीं आयी तो उनके सब्र का बाँध टूटने लगा।

“यही काम नहीं है मेरे पास, जल्दी करिए और भी चिट्ठियां पहुंचानी है”, और ऐसा कहकर काका दरवाज़ा पीटने लगे।

कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला।

सामने का दृश्य देख कर काका चौंक गए।

एक 12-13 साल की लड़की थी जिसके दोनों पैर कटे हुए थे। उन्हें अपनी अधीरता पर शर्मिंदगी हो रही थी।

लड़की बोली, “क्षमा कीजियेगा मैंने आने में देर लगा दी, बताइए हस्ताक्षर कहाँ करने हैं?”

काका ने हस्ताक्षर कराये और वहां से चले गए।

इस घटना के आठ-दस दिन बाद काका को फिर उसी पते की चिट्ठी मिली। इस बार भी सब जगह चिट्ठियां पहुँचाने के बाद वे उस घर के सामने पहुंचे!

“चिट्ठी आई है, हस्ताक्षर की भी ज़रूरत नहीं है…नीचे से डाल दूँ।”, काका बोले।

“नहीं-नहीं, रुकिए मैं अभी आई।”, लड़की भीतर से चिल्लाई।

कुछ देर बाद दरवाजा खुला।

लड़की के हाथ में गिफ्ट पैकिंग किया हुआ एक डिब्बा था।

“काका लाइए मेरी चिट्ठी और लीजिये अपना तोहफ़ा।”, लड़की मुस्कुराते हुए बोली।

“इसकी क्या ज़रूरत है बेटा”, काका संकोचवश उपहार लेते हुए बोले।

लड़की बोली, “बस ऐसे ही काका…आप इसे ले जाइए और घर जा कर ही खोलियेगा!”

काका डिब्बा लेकर घर की और बढ़ चले, उन्हें समझ नहीं आर रहा था कि डिब्बे में क्या होगा!

घर पहुँचते ही उन्होंने डिब्बा खोला, और तोहफ़ा देखते ही उनकी आँखों से आंसू टपकने लगे।

डिब्बे में एक जोड़ी चप्पलें थीं। काका बरसों से नंगे पाँव ही चिट्ठियां बांटा करते थे लेकिन आज तक किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था।

ये उनके जीवन का सबसे कीमती तोहफ़ा था…काका चप्पलें कलेजे से लगा कर रोने लगे; उनके मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था- बच्ची ने उन्हें चप्पलें तो दे दीं पर वे उसे पैर कहाँ से लाकर देंगे?

लोमड़ी और खट्टे अंगूर

एक बार की बात है, एक घने जंगल में एक लोमड़ी रहती थी एक बार दोपहर को लोमड़ी खाने की खोज में जंगल में गई थी। वह कुछ दिनों से भूखा थे, उसे कुछ दिनों से भजन नहीं मिली थी।

इसीलिए लोमड़ी भोजन की खोज में वहां गई थी, लेकिन खाने को कुछ भी नहीं मिली थी। लोमड़ी भजन की खोज करते करते बीमार हो गई थी, उसकी शरीफ पर शक्ति नहीं था।

फिर लोमड़ी को एक अंगूर का पेड़ दिखा, लोमड़ी ने सोचा यह अंगूर तो बहुत स्वादिष्ट और मीठा होगी। अंगूर को देखते ही मुंह में पानी आ गई, शायद मेरी भूख मिटेगी यह अंगूर फल खाकर।

यह सोचकर लोमड़ी पेड़ के पास गया। और जोर से कूदा अंगूर की तरफ लेकिन अंगूर बहुत ऊपर थी, लोमड़ी अंगूर तक पहुंच नहीं पाया।

फिर लोमड़ी दो कदम पीछे जाकर फिर से कूदा अंगूर की तरफ लेकिन अंगूर तक पहुंच नहीं पाया। लोमड़ी को अंगूर खाने का बहुत इच्छा थी, वह फिर से चार कदम पीछे जाकर जोर से कूदा अंगूर की तरफ।

लेकिन इस बार वह वहां से फिसल कर नीचे गिरी, उसके पैरों में बहुत चोट आई। लोमड़ी नीचे बैठकर अंगूर को देखते देखते सोच रहा था। ‘अंगूर तो बहुत ऊपर है, मैं शायद अंगूर तक पहुंच नहीं पाऊंगा।

और मुझे लगता है अंगूर अभी तक पके नहीं है। यह तो जरूर कच्चा और खट्टा होगी, मुझे तो यह खट्टा अंगूर खाना नहीं चाहिए।” फिर लोमड़ी बहा से जा रही थी,

तब एक खरगोश ने लोमड़ी को देखा यह सब करते हुए। खरगोश ने लोमड़ी को कहा, “लोमड़ी भाई आप इतनी कोशिश करने के बाद भी अंगूर को छू नहीं पाया?”

लोमड़ी ने कहा “नहीं नहीं यह अंगूर तो खट्टा है, इसलिए मैं अंगूर खाए बिना यहां से जा रही थी” खरगोश लोमड़ी की बात सुनकर हंसी, और उसने एक लता को लेकर

रस्सी जैसा घुमा घुमा कर अंगूर की तरफ फेंकी, और यह लता अंगूर में अटक गई। फिर खरगोश लता को जोर से खींची और अंगूर आ कर नीचे गिर पड़ी।

खरगोश अंगूर को उठाकर खाने लगा और कहा, “अंगूर तो बहुत मीठा है आज मेरी पेट भर गई” यह बोलकर खरगोश वहां से चली गई। और लोमड़ी वहां बैठे बैठे देखती रही।

शिक्षा: आपके असफलता के लिए आप किसी और को दोष नहीं दे सकते।

सालाह देना

एक बार एक छोटा लड़का मिठाई खाने का जुनून सवार हो गया। अधिक मिठाई खाने के कारण उनकी मां चिंतित थे। और उसे खाने से रोकने के लिए कई तरीके आजमाएं लेकिन कुछ काम नहीं हुआ।

निकट गांव में एक बुद्धिमान व्यक्ति रहता था, जिसे सभी लोग सम्मान करता था। एक दिन उसकी मां उसे बुद्धिमान व्यक्ति के पास ले जाने का फैसला किया।

इस उम्मीद में कि उसका बेटा उसकी बात माने। फिर मां अपने बेटे के साथ बुद्धिमान व्यक्ति के पास गया और उनसे कहा, “मेरा बेटा हर बार मिठाई खाता चाहता है,

क्या आप उसे बताएंगे, कि यह उनके शहद के लिए बुरा है।” उसकी बात सुनने के बाद बुद्धिमान व्यक्ति कुछ देर सोचा, और उस समय उस लड़के को कोई भी सलाह नहीं दिया।

उसने उसकी मां को एक महीने बाद वापस आने के लिए कहा, फिर एक महीने बाद मां बेटे को लेकर बुद्धिमान व्यक्ति के पास आया। इस बार बुद्धिमान व्यक्ति ने लड़के को लेकर टहलने गया।

उन्होंने लड़के की ओर देखा और कहा, “लड़का तुम्हें मिठाई खाना बंद कर देना चाहिए। क्योंकि यह तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।” लड़के ने सिर हिलाया,

और वादा किया कि वह अब मिठाई नहीं खाएगा। इसके बाद मां अपने बेटे के साथ चली गई। कुछ दिनों बाद वह बुद्धिमान व्यक्ति के पास लौटी और बोली, “आपकी मदद के लिए धन्यवाद।

लड़के ने अपना वादा निभाया है और तब से मिठाई नहीं खाई है।” वह एक बात को लेकर उत्सुक थी। इसीलिए बुद्धिमान व्यक्ति से पूछा, “जब हम पहली बार तुम्हारे पास आई थी,

तो आप मेरे बेटे को मिठाई खाना बंद करने के लिए क्यों नहीं कहा था। आपने मुझे एक महीने बाद वापस आने के लिए क्यों कहा?” बुद्धिमान व्यक्ति ने मुस्कुराया और जवाब दिया।

“उस समय मैं खुद मिठाई खाता था, और मुझे यह बताने का अधिकार नहीं था। लेकिन अब मैं मिठाई नहीं खाता हूं इसीलिए मैं सक्षम था, आपकी बच्चे को बताने के लिए।”

शिक्षा: हमेशा सुनिश्चित करें कि आपकी क्रिया आपके शब्दों से मेल खाती है या नहीं।

बेचारा चरवाहा

समुद्र तट पर बसे एक गाँव में एक चरवाहा रहता था। वह दूध बेचकर आसानी से अपने जीवन का निर्वाह करता था। एक दिन उसके मन में विचार आया कि क्यों न वह समुद्र पार कर व्यापार करे।

यह सोच उसने अपनी सभी भेड़ें बेच दी तथा काफी मात्रा में खजूर खरीद लिये। उसने अपनी यात्रा आरम्भ की। बीच रास्ते में वह उस धन को गिनने लगा जो उसने खजूर की बोरियों को बेचकर कमाया था।

तभी अचानक तेज हवाएँ चलने लगीं और उन हवाओं ने एक भयंकर तूफान का रूप ले लिया। लहरें तेज होने के कारण उसकी नाव डगमगाने लगी और डूबने की स्थिति में आ गई।

उसने खजूर के अपने सारे बोरे समुद्र में फेंक दिए ताकि खाली नाव के सहारे वह आसानी से किनारे तक पहुँच सके। वह बहुत दुखी था।

कुछ समय बाद तूफान शांत हो गया। चरवाहा बड़े ध्यान से समुद्र की ओर देखते हुए दुःखी स्वर में बोला, “शायद सागर काफी मात्रा में खजूर चाहता था, तभी तो अब वह शांत है।”  

शिक्षा: बदकिस्मती (दुर्भाग्य) भी मनुष्य को एक सबक सिखा देती है।

दो कुत्ते

एक आदमी ने एक ही नस्ल के दो कुत्ते खरीदे। दोनों ही बहुत चतुर, बलशाली और चुस्त थे। एक कुत्ते को उसके शिकार के लिए तैयार किया तथा दूसरे को घर की रखवाली के लिए नियुक्त किया।

जब वह शिकार करके लौटा तो उन दोनों के लिए उसने शिकार का कुछ हिस्सा निकाला और उसमें से आधा-आधा दोनों कुत्तों में बाँट दिया। लेकिन शिकारी कुत्ते को यह बात पसन्द नहीं आई।

वह चौकीदार कुत्ते के पास गया और गुस्से से बोला, “तुम पूरे दिन यहाँ छाँव में बैठे रहते हो और कुछ नहीं करते। मैं पूरे दिन कड़ी धूप में भाग-दौड़ करता हूँ और सारी तकलीफ उठाता हूँ।

मालिक फिर भी तुम्हें मेरे शिकार में से आधा हिस्सा देता है। मेरी मेहनत का फल तुम खाते हो।” इस पर चौकीदार कुत्ता बोला,

“मुझ पर इल्ज़ाम लगाने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? यह सवाल जाकर मालिक से करो। यह मेरी गलती नहीं है। जो काम मुझे दिया गया है में तो वही काम करता हूँ।”  

शिक्षाः हमें सिर्फ अपने काम पर ध्यान देना चाहिए।

अनूठी वतनपरस्ती

हकीम अजमल खाँ दिल्ली के जाने-माने चिकित्सक होने के साथ-साथ धर्मपरायण व्यक्ति थे। अभावग्रस्त रोगियों की निःशुल्क चिकित्सा के लिए वे सदैव तत्पर रहते थे।

हकीम जी कांग्रेस के कर्मठ सदस्य भी थे। उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय भाग लिया था। गांधीजी के आह्वान पर उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का संकल्प लिया था।

एक बार वे जामा मस्जिद में जुम्मे की नमाज अदा करने पहुँचे। नमाज के बाद सैकड़ों लोगों ने जय-जयकार करते हुए उनकी दरियादिली के प्रति आभार व्यक्त किया।

हकीम साहब ने कहा, ‘मैं गरीब मरीजों की चिकित्सा कर कोई एहसान नहीं करता। मैं मजहब के इस सार को जानता हूँ कि गरीबों और मरीजों की खिदमत करना ही सच्चा धर्म है।’

एक बार किसी रजवाड़े के राजा ने बीमार रानी के इलाज के लिए हकीम साहब को सादर बुलवाया। महल विदेशी कपड़ों से सजा हुआ था । हकीम साहब ने राजा रानी को विदेशी पोशाक में देखा, तो विनम्रता से कहा, ‘गांधीजी की प्रेरणा से सारे देश में स्वदेशी की लहर चल रही है ।

आप भी विदेशी वस्तुओं की जगह खादी के वस्त्रों का उपयोग किया करें।’ रानी ने खुरदरी होने की वजह से बदन पर खादी के चुभने की बात कही, तो हकीम साहब ने कहा, ‘अपनी माँ कुरूप होने पर भी अपनी है। इसी तरह स्वदेश में बनी वस्तुओं से प्रेम करना चाहिए । ‘ राजपरिवार उनकी बातों से प्रभावित हो खादी का उपयोग करने लगा ।


शरीर परमात्मा का है

स्वामी रामतीर्थ का नाम तीर्थ राम था । वे बचपन से ही अत्यंत प्रतिभाशाली थे। धन्ना भगत नामक एक संत के सान्निध्य में आकर उन्होंने धर्मशास्त्रों और उपनिषदों का गहन अध्ययन किया ।

वेदांत से प्रभावित होकर आखिरकार वे वैराग्य की ओर उन्मुख हो गए। उन्होंने लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ाई की और एम. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरांत स्यालकोट के मिशन कॉलेज तथा लाहौर के कॉलेज में शिक्षण कार्य भी किया।

एक दिन वे लाहौर में आयोजित सत्संग में श्रीरामकथा सुन रहे थे। श्रीराम की लीला का वर्णन सुनते ही अचानक वे रो पड़े और बोले, ‘प्यारे राम, मुझ दीन पर दया करो।

क्या मैं किष्किंधा के बंदरों से भी गया बीता हूँ, जिन्होंने अपना समय आपके बीच बैठकर बिताया? क्या मैं शबरीजी के बराबर भी सौभाग्यशाली नहीं हूँ, जिनके जूठे बेर आपने खाए।’

उन्होंने शरीर की सुध-बुध खोकर संकल्प लिया, ‘अब यह शरीर मेरा नहीं, परमात्मा का है। ‘ वर्ष 1897 में दीपावली के दिन तीर्थराम संन्यास लेकर स्वामी रामतीर्थ हो गए।

उन्होंने अपने पिता गोस्वामी हीरानंदजी को पत्र में लिखा, ‘आज का दिन दीवाली का है। मैं भी जुआ खेलने बैठा हूँ और अपना जीवन दाँव पर लगाकर उसे भगवान् के लिए समर्पित कर चुका हूँ।’

स्वामी रामतीर्थ ने अमेरिका और ब्रिटेन में जाकर सनातन धर्म का प्रचार कर भक्ति भागीरथी प्रवाहित की। उन्होंने भारतीय संस्कृति का संदेश जन-जन तक पहुँचाया।

शेर और गरीब गुलाम

एक बार एक छोटी सी राज्यों में एक राजा रहते थे, राजा की बहुत गुलाम थी। राजा अपनी गुलामों के साथ बहुत खराब व्यवहार करती थी, कुछ काम को लेकर उन्हें मारती थी।

एक दिन एक गुलाम राजा से बचने के लिए वहां से भाग गई। उसने सोचा अगर मैं यहां रहूंगी तो सेनाओं ने मुझे पकड़ कर राजा के पास ले जाएगा, यह सोचकर गुलाम जंगल की ओर चली गई।

जंगल में जाते जाते उसने एक शेर की आवाज सुनी, वह शेर से डर के एक पेड़ के पीछे जाकर छुप गई। लेकिन शेर आवाज करते करते गुलाम के पास आया।

उसने देखा शेर की पैरों में कांटा फस गई थी, इसी कारण शेर लंगड़ा ते हुए उसके पास आया। फिर गुलाम धीरे धीरे शेर के पास गई, और शेर की पैरों में से कांटा निकाली।

फिर शेर गुलाम को धन्यवाद देकर वहां से चली गई, फिर गुलाम जंगल में घर बनाकर वहां रहने लगे। ऐसे ही कुछ दिन बीत गई, एक दिन राजा के कुछ सेनाओं ने जंगल में आया शिकार करने के लिए।

सेनाओं ने कुछ जानवरों को पकड़ कर पिंजरे में बंद करके लेकर गई राजा के पास। वहां एक सेना ने राजा को कहा, “महाराज जब हम शिकार करने के लिए गई थी, तब वहां जंगल में गुलाम को देखा।”

उसकी बात सुनकर राजा ने आदेश दिया उसे पकड़ने की, राजा की आदेश मानकर सेनाओं ने जंगल में गया। और गुलाम को पकड़ कर लेकर आया। राजा गुलाम को देख कर कहा,

“तो तुम हो जो यहां से भाग गई थी, तुम्हें तो सजा जरूर मिलेगी।” फिर राजा ने सेना को आदेश दिया, “इसे पकड़कर शेर के पिंजरे में डाल दो ताकि शेर को आज भरपेट खाना मिले।”

यह कहकर राजा ने वहां से चला गया। फिर सेनाओं ने गुलाम को पकड़कर शेर के पिंजरे में डालकर बाहर से बंद करके, अपनी अपनी कमरे में जाकर सो गई।

गुलाम डर के मारे पिंजरे के अंदर अपनी आंखें बंद करके शेर का इंतजार कर रही थी। तब शेर उसकी तरफ देखकर आवाज दी गुलाम बहुत डर गई, शेर ने उसे पहचान लिया था।

शेर पास जाकर उसकी पैर चाटने लगी, फिर गुलाम को याद आया। गुलाम पिंजरे से एक हाथ बाहर निकल कर एक पत्थर उठाई, और पत्थर से पिंजरे को तोड़कर शेर को बाहर निकाली।

उसके साथ बाकी सभी जानवरों को भी बाहर निकाली। फिर गुलाम ने जानवरों के साथ जंगल में जाकर रहने लगी, राजा की सेनाओं ने और कभी गुलाम को पकड़ नहीं पाई।

शिक्षा: दूसरों की जरूरत में हमें हमेशा मदद करना चाहिए।

एक साड़ी की कीमत

एक बार की बात है, श्री लाल बहादुर शास्त्री एक कपड़ा मिल में गए। और उनके साथ मिल के मालिक भी थे। मिल के आसपास देखने के बाद शास्त्री जी उस मिल के गोदाम देखने गए।

वहां उन्होंने कुछ साड़ी देखा, शास्त्री जी मिल के मालिक से उन्हें कुछ साड़ी दिखाने का अनुरोध किया। मालिक उसके अनुरोध से खुश था। और उसने अपने कर्मचारी को

उसके लिए सबसे अच्छी साड़ी लाने के लिए कहां, कर्मचारी ने उसे विभिन्न प्रकार की साड़ियां दिखाई। शास्त्री जी ने उन साड़ी में से एक को पसंद किया, और मालिक से इसकी कीमत पूछी।

मिल मालिक ने बताया कि उस साड़ी की कीमत ₹800 है। शास्त्री जी ने कहा, “यह बहुत महंगा है क्या आप मुझे वह साड़ियां दिखा सकते हैं जो थोड़ा कम महंगा है।”

मालिक ने कर्मचारी को उससे कम महंगी साड़ी लाने के लिए कहां। मिल मालिक ने उसे अन्य साड़ियों को दिखाना शुरू किया। जैसे कि ₹500, ₹400 वाला। लेकिन शास्त्री जी ने कहा,

अभी भी बहुत महंगी है, इससे सस्ती साड़ियां है, मेरे जैसा गरीब व्यक्ति के लिए। मालिक उसकी प्रतिक्रिया से आश्चर्यचकित था। उसने कहां, “आप भारत के प्रधानमंत्री हैं,

आप को गरीब कैसे कहा जा सकता है? इसके अलावा आपको साड़ी के लिए पैसा नहीं देना होगा, यह आपके लिए एक उपहार है।” शास्त्री जी ने उत्तर दिया, “नहीं मेरे प्यारे दोस्त,

मैं इस तरह के महंगे उपहार शिकार नहीं कर सकता। क्योंकि मैं प्रधानमंत्री हो सकता हूं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे उन सभी चीजों को शिकार करना चाहिए,

जो मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। हालांकि मैं एक प्रधानमंत्री हूं लेकिन मैं सीमित समय के लिए हूं, कृपया मुझे कुछ सस्ती साड़ियां दिखाएँ, जिन्हें मैं खरीद सकता हूं।”

अंत में शास्त्री जी ने अपनी पत्नी के लिए एक सस्ती साड़ी खरीदी, जो खरीद सकते थे। लाल बहादुर शास्त्री जी इतने ईमानदार और नेक थे, प्रलोभन उसे बिल्कुल भी दबा नहीं सकता था।

शिक्षा: सच्चा और ईमानदारी को हमेशा पुरस्कृत किया जाता है।

मजदूर के जूते

एक बार एक शिक्षक संपन्न परिवार से सम्बन्ध रखने वाले एक युवा शिष्य के साथ कहीं टहलने निकले। उन्होंने देखा की रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे पड़े हैं, जो संभवतः पास के खेत में काम कर रहे गरीब मजदूर के थे जो अब अपना काम ख़त्म कर घर वापस जाने की तयारी कर रहा था।

शिष्य को मजाक सूझा उसने शिक्षक से कहा, “गुरु जी क्यों न हम ये जूते कहीं छिपा कर झाड़ियों के पीछे छिप जाएं ; जब वो मजदूर इन्हें यहाँ नहीं पाकर घबराएगा तो बड़ा मजा आएगा !!”

शिक्षक गंभीरता से बोले, “किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है। क्यों ना हम इन जूतों में कुछ सिक्के डाल दें और छिप कर देखें की इसका मजदूर पर क्या प्रभाव पड़ता है !!”

शिष्य ने ऐसा ही किया और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए।

मजदूर जल्द ही अपना काम ख़त्म कर जूतों की जगह पर आ गया। उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले उसे किसी कठोर चीज का आभास हुआ, उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की अन्दर कुछ सिक्के पड़े थे, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और वो सिक्के हाथ में लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट -पलट कर देखने लगा।

फिर उसने इधर -उधर देखने लगा, दूर -दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने सिक्के अपनी जेब में डाल लिए। अब उसने दूसरा जूता उठाया, उसमे भी सिक्के पड़े थे। मजदूर भावविभोर हो गया, उसकी आँखों में आंसू आ गए, उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा –

“हे भगवान्, समय पर प्राप्त इस सहायता के लिए उस अनजान सहायक का लाख -लाख धन्यवाद, उसकी सहायता और दयालुता के कारण आज मेरी बीमार पत्नी को दवा और भूखें बच्चों को रोटी मिल सकेगी।”

मजदूर की बातें सुन शिष्य की आँखें भर आयीं। शिक्षक ने शिष्य से कहा – “क्या तुम्हारी मजाक वाली बात की अपेक्षा जूते में सिक्का डालने से तुम्हे कम ख़ुशी मिली ?”

शिष्य बोला, “आपने आज मुझे जो पाठ पढाया है, उसे मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा। आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है। देने का आनंद असीम है। देना देवत्त है।”

चोरी का कार्य

एक बार रामकृष्ण, अपने शिष्यों को अपने ही घर से थोड़ा चावल चोरी करने के लिए कहा। लेकिन एक शर्त थी, कि कोई भी उन्हें चावल चोरी करते हुए नहीं देखना चाहिए।

एक हफ्ते बाद एक को छोड़कर उनके सभी शिष्यों चावल के साथ वापस आया। सभी शिष्यों बहुत खुश था क्योंकि वे सब को छुपा कर घर से चावल चुराने के लिए दिए गए कार्य को पूरा करने में सक्षम रहे।

फिर रामाकृष्ण उस शिष्यों से खाली हाथ आने का कारण पूछा। शिष्यों ने उसे बताया, कि वह घर में सभी से छुपकर चावल चोरी करने की कोशिश की।

लेकिन वह हमेशा खुद को चावल चुराते हुए देखता है। इसलिए कोई भी स्थिति नहीं थी जब वह चावल चुरा सकता है, और कोई भी उसे नहीं देख रहा है।

क्योंकि हम जो भी करते हैं, वह कभी एक व्यक्ति से छुपा नहीं होता है और वह है हमारा आत्मा। और वह शिष्यों जो खाली हाथ आया था वह स्वामी विवेकानंद था।

शिक्षा: जब भी हम कुछ गलत करने की कोशिश करते हैं। भले ही हम सब से छुपकर करें, लेकिन हम इसे अपने से छुपा नहीं सकते।

कौवे की परेशानी

यदि आपको सुखी रहना है तो किसी से अपनी तुलना नहीं करो। ‘आप’ आप ही हो। आप के समान कोई नहीं। फिर क्यों दूसरों से अपनी तुलना करना, इर्षा करना ? आइये इस बात को एक कहानी के माध्यम से समझते हैं –

एक कौआ जंगल में रहता था और अपने जीवनसे संतुष्ट था। एक दिन उसने एक हंस को देखा, “यह हंस कितना सफ़ेद है, कितना सुन्दर लगता है।”, उसने मन ही मन सोचा।

उसे लगा कि यह सुन्दर हंस दुनिया में सबसे सुखी पक्षी होगा, जबकि मैं तो कितना काला हूँ ! यह सब सोचकर वह काफी परेशान हो गया और उससे रहा नहीं गया, उसने अपने मनोभाव हंस को बताये ।

हंस ने कहा – “वास्तिकता ऐसी है कि पहले मैं खुदको आसपास के सभी पक्षिओ में सुखी समझता था। लेकिन जब मैने तोते को देखा तो पाया कि उसके दो रंग है तथा वह बहुत ही मीठा बोलता है। तब से मुझे लगा कि सभी पक्षिओ में तोता ही सुन्दर तथा सुखी है।”

अब कौआ तोते के पास गया।

तोते ने कहा – “मै सुखी जिंदगी जी रहा था, लेकिन जब मैंने मोर को देखा तब मुझे लगा कि मुझमे तो दो रंग ही, परन्तु मोर तो विविधरंगी है। मुझे तो वह ही सुखी लगता है।”

फिर कौआ उड़कर प्राणी संग्रहालय गया। जहाँ कई लोग मोर देखने एकत्र हुए थे।

जब सब लोग चले गए तो कौआ उसके पास जाकर बोला –“मित्र, तुम तो अति सुन्दर हो।कितने सारे लोग तुम्हे देखने के लिए इकट्ठे होते है ! प्रतिदिन तुम्हे देखने के लिए हजारो लोग आते है ! जब कि मुझे देखते ही लोग मुझे उड़ा देते है।मुझे लगता है कि अपने इस ग्रह पर तो तुम ही सभी पक्षिओ में सबसे सुखी हो।”

मोर ने गहरी सांस लेते हुए कहाँ – “मैं हमेशा सोचता था कि ‘मैं इस पृथ्वी पर अतिसुन्दर हूँ, मैं ही अतिसुखी हूँ।’ परन्तु मेरे सौन्दर्य के कारण ही मैं यहाँ पिंजरे में बंद हूँ। मैंने सारे प्राणी में गौर से देखे तो मैं समझा कि ‘कौआ ही ऐसा पक्षी है जिसे पिंजरे में बंद नहीं किया जाता।’ मुझे तो लगता है कि काश मैं भी तुम्हारी तरह एक कौआ होता तो स्वतंत्रता से सभी जगह घूमता-उड़ता, सुखी रहता !”

बुद्धि का बल

विश्व के महानतम दार्शनिकों में से एक सुकरात एक बार अपने शिष्यों के साथ बैठे कुछ चर्चा कर रहे थे। तभी वहां अजीबो-गरीब वस्त्र पहने एक ज्योतिषी आ पहुंचा।

वह सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए बोला,” मैं ज्ञानी हूँ,मैं किसी का चेहरा देखकर उसका चरित्र बता सकता हूँ। बताओ तुममें से कौन मेरी इस विद्या को परखना चाहेगा?”

शिष्य सुकरात की तरफ देखने लगे।

सुकरात ने उस ज्योतिषी से अपने बारे में बताने के लिए कहा।

अब वह ज्योतिषी उन्हें ध्यान से देखने लगा।

सुकरात बहुत बड़े ज्ञानी तो थे लेकिन देखने में बड़े सामान्य थे, बल्कि उन्हें कुरूप कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी।

ज्योतिषी उन्हें कुछ देर निहारने के बाद बोला, ” तुम्हारे चेहरे की बनावट बताती है कि तुम सत्ता के विरोधी हो, तुम्हारे अंदर द्रोह करने की भावना प्रबल है। तुम्हारी आँखों के बीच पड़ी सिकुड़न तुम्हारे अत्यंत क्रोधी होने का प्रमाण देती है”

ज्योतिषी ने अभी इतना ही कहा था कि वहां बैठे शिष्य अपने गुरु के बारे में ये बातें सुनकर गुस्से में आ गए और उस ज्योतिषी को तुरंत वहां से जाने के लिए कहा।

पर सुकरात ने उन्हें शांत करते हुए ज्योतिषी को अपनी बात पूर्ण करने के लिए कहा।

ज्योतिषी बोला, "तुम्हारा बेडौल सिर और माथे से पता चलता है कि तुम एक लालची ज्योतिषी हो, और तुम्हारी ठुड्डी की बनावट तुम्हारे सनकी होने के तरफ इशारा करती है।”

इतना सुनकर शिष्य और भी क्रोधित हो गए पर इसके उलट सुकरात प्रसन्न हो गए और ज्योतिषी को इनाम देकर विदा किया। शिष्य सुकरात के इस व्यवहार से आश्चर्य में पड़ गए और उनसे पूछा, ” गुरूजी, आपने उस ज्योतिषी को इनाम क्यों दिया, जबकि उसने जो कुछ भी कहाँ वो सब गलत है ?”

“नहीं पुत्रों, ज्योतिषी ने जो कुछ भी कहा वो सब सच है, उसके बताये सारे दोष मुझमें हैं, मुझे लालच है, क्रोध है, और उसने जो कुछ भी कहा वो सब है, पर वह एक बहुत ज़रूरी बात बताना भूल गया, उसने सिर्फ बाहरी चीजें देखीं पर मेरे अंदर के विवेक को नही आंक पाया, जिसके बल पर मैं इन सारी बुराइयों को अपने वष में किये रहता हूँ, बस वह यहीं चूक गया, वह मेरे बुद्धि के बल को नहीं समझ पाया !”, सुकरात ने अपनी बात पूर्ण की।

अनूठा शौर्य

श्री गुरु गोविंदसिंहजी संत कवि और परम पराक्रमी योद्धा थे। एक बार वह आनंदपुर से चलकर कीरतपुर, रोपड़ होते हुए नाहण रियासत में पहुँचे। नाहण के राजा मेदनी प्रकाश गुरु तेगबहादुरजी के अनूठे बलिदान के कारण पूरे परिवार के प्रति श्रद्धा भावना रखते थे।

उन्हें पता चला कि गोविंदसिंहजी नाहण आए हुए हैं, तो वे राजमहल से नंगे पाँव उनके स्वागत के लिए जा पहुँचे। गुरु गोविंदसिंह को पता था कि नाहण के राजा का श्रीनगर के राजा से विवाद इस सीमा तक पहुँच चुका है कि कभी भी युद्ध की स्थिति आ सकती है।

उन्होंने नाहण नरेश को उपदेश देते हुए कहा, ‘अहंकार ही तमाम झगड़ों की जड़ है। जो प्राणी अपने को तुच्छ मानकर केवल भगवान् को बड़ा मानता है, उसका कभी किसी से बैर नहीं हो सकता।

अतः दोनों राजा अहंकार का त्याग कर बैर खत्म करो।’ गुरुजी के प्रयास से दोनों राजा शत्रुता त्याग कर मित्र बन गए।

एक दिन गुरुजी को पता चला कि नाहण के जंगल में एक बब्बर शेर का आतंक व्याप्त है। उन्होंने दोनों राजाओं से कहा, ‘राजा का परम कर्तव्य है कि वह प्रजा को सताने वाले का खात्मा करे । ‘

गुरुजी राजाओं के साथ हाथी पर बैठकर जंगल में जा पहुँचे। उन्होंने जैसे ही शेर को देखा कि तलवार लेकर जूझ पड़े। उन्होंने शेर को यमलोक पहुँचा दिया। सभी उनका शौर्य देखकर चकित हो उठे।

गुरुजी उपदेश में कहा करते थे, ‘पीड़ितों की रक्षा सहायता करना भगवान् की भक्ति ही है। ‘

सफलता की तैयारी

शहर से कुछ दूर एक बुजुर्ग दम्पत्ती रहते थे। वो जगह बिलकुल शांत थी और आस -पास इक्का -दुक्का लोग ही नज़र आते थे।

एक दिन भोर में उन्होंने देखा की एक युवक हाथ में फावड़ा लिए अपनी साइकिल से कहीं जा रहा है, वह कुछ देर दिखाई दिया और फिर उनकी नज़रों से ओझल हो गया।दम्पत्ती ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया, पर अगले दिन फिर वह व्यक्ति उधर से जाता दिखा।अब तो मानो ये रोज की ही बात बन गयी, वह व्यक्ति रोज फावड़ा लिए उधर से गुजरता और थोड़ी देर में आँखों से ओझल हो जाता।

दम्पत्ती इस सुन्सान इलाके में इस तरह किसी के रोज आने -जाने से कुछ परेशान हो गए और उन्होंने उसका पीछा करने का फैसला किया।अगले दिन जब वह उनके घर के सामने से गुजरा तो दंपत्ती भी अपनी गाडी से उसके पीछे -पीछे चलने लगे। कुछ दूर जाने के बाद वह एक पेड़ के पास रुक और अपनी साइकिल वहीँ कड़ी कर आगे बढ़ने लगा। १५-२० कदम चलने के बाद वह रुका और अपने फावड़े से ज़मीन खोदने लगा।

दम्पत्ती को ये बड़ा अजीब लगा और वे हिम्मत कर उसके पास पहुंचे,“तुम यहाँ इस वीराने में ये काम क्यों कर रहे हो ?”

युवक बोला, “जी, दो दिन बाद मुझे एक किसान के यहाँ काम पाने क लिए जाना है, और उन्हें ऐसा आदमी चाहिए जिसे खेतों में काम करने का अनुभव हो, चूँकि मैंने पहले कभी खेतों में काम नहीं किया इसलिए कुछ दिनों से यहाँ आकार खेतों में काम करने की तैयारी कर रहा हूँ!!”

दम्पत्ती यह सुनकर काफी प्रभावित हुए और उसे काम मिल जाने का आशीर्वाद दिया।

लोमड़ी और सारस

एक बार जंगल में एक लोमड़ी और एक सरस पड़ोसी जैसा रहता था, दोनों बहुत ही अच्छा दोस्त था। लेकिन लोमड़ी बहुत चालाक थी, वह दूसरों के साथ चालाकी करता था।

एक बार लोमड़ी की जन्मदिन पर लोमड़ी उसकी सभी दोस्तों को आमंत्रण किया, सारस को भी आमंत्रण किया। लोमड़ी ने अपने जन्मदिन पर सारस के साथ चालाकी करने का सोचा।

शाम होते ही सारस लोमड़ी के जन्मदिन पार्टी मैं उसके घर गया। सारस आते ही लोमड़ी उसका शुक्रिया अदा किया, और दोनों खाना खाने के लिए टेबल पर गया।

लोमड़ी ने सारस के साथ चालाकी करने के लिए चिकन सूप बनाया था। सूप एक प्लेट में डालकर सारस को पीने के लिए दिया, और एक प्लेट अपने लिए रखा।

लेकिन सूप प्लेट में होने के कारण सारस उसे पी नहीं पाया। सारस सूप पीने के लिए बहुत कोशिश किया, लेकिन उसकी हॉट लंबी होने के कारण नहीं पी पाया।

लोमड़ी ने सूप आराम से पिया उसने चिकन सूप का आनंद लिया। और सारस दुखी होकर घर लौट गया, लेकिन सारस लोमड़ी की चालाकी समझ गई थी।

कुछ दिन जाने के बाद सारस की जन्मदिन आया, उसने लोमड़ी को सबक सिखाने के लिए उसे आमंत्रण करने गया उसके घर पर। लोमड़ी सरस को देखकर मन मन सोचा।

“यह सारस कितना बेवकूफ है मैं उसे इतना बेवकूफ बनाया, फिर भी आया मुझे आमंत्रण करने।” फिर लोमड़ी ने सारस की जन्मदिन पार्टी में गया उसके घर पर। सारस लोमड़ी को देख कर कहा,

“तुम आ गए हो दोस्त, मेरा भाई आज बहुत ही अच्छा चिकन सूप बनाया है, चलो हम दोनों जाकर सूप पीते हैं।” इस बार सारस लोमड़ी को सबक सिखाने के लिए चिकन सूप ग्लास में दिया।

लोमड़ी की मुंह ग्लास के अंदर जा नहीं पाया, लेकिन सारस उसकी होठों को सूप में डूबा कर आराम से पिया। लोमड़ी ने बहुत कोशिश करने की बावजूद उसने सूप पी नहीं पाया।

उसने सोचा यह सारस तो मुझसे भी ज्यादा चालाक है, लोमड़ी को अपनी गलती का एहसास हुआ। लोमड़ी ने सारस से माफी मांगा, फिर दोनों अच्छा दोस्त बनकर खुशी से रहने लगा।

शिक्षा: सबके साथ ऐसा उपयोग करो, जैसा उपयोग तुम्हें मिलना चाहिए।

अंगूठी की कीमत

एक नौजवान शिष्य अपने गुरु के पास पहुंचा और बोला,” गुरु जी एक बात मेरी समझ नहीं आती, आप इतने साधारण वस्त्र क्यों पहनते हैं। इन्हे देख कर लगता ही नहीं कि आप एक ज्ञानी व्यक्ति हैं जो सैकड़ों शिष्यों को शिक्षित करने का महान कार्य करता है।

शिष्य की बात सुनकर गुरु जी मुस्कुराये। फिर उन्होंने अपनी ऊँगली से एक अंगूठी निकाली और शिष्य को देते हुए बोले,” मैं तुम्हारी जिज्ञासा अवश्य शांत करूँगा, लेकिन पहले तुम मेरा एक छोटा सा काम कर दो। 

इस अंगूठी को लेकर बाज़ार जाओ और किसी सब्जी वाले या ऐसे ही किसी दुकानदार को इसे बेच दो। बस इतना ध्यान रहे कि इसके बदले कम से कम सोने की एक अशर्फी ज़रूर लाना।”

शिष्य फ़ौरन उस अंगूठी को लेकर बाज़ार गया लेकिन थोड़ी देर में अंगूठी वापस लेकर लौट आया।

“क्या हुआ, तुम इसे लेकर क्यों लौट आये ?”, गुरु जी ने पुछा।

"गुरु जी, दरअसल, मैंने इसे सब्जी वाले, किराना वाले, और अन्य दुकानदारों को बेचने का प्रयास किया पर कोई भी इसके बदले सोने की एक अशर्फी देने को तैयार नहीं हुआ”

गुरु जी बोले,” अच्छा कोई बात नहीं अब तुम इसे लेकर किसी जौहरी के पास जाओ और इसे बेचने की कोशिश करो।”

शिष्य एक बार फिर अंगूठी लेकर निकल पड़ा लेकिन इस बार भी कुछ ही देर में वापस आ गया।

“क्या हुआ, इस बार भी कोई इसके बदले 1 अशर्फी भी देने को तैयार नहीं हुआ ?”, गुरूजी ने पुछा।

शिष्य के हाव -भाव कुछ अजीब लग रहे थे, वो घबराते हुए बोला,” अरररे … नहीं गुरु जी, इस बार मैं जिस किसी जौहरी के पास गया, सभी ने ये कहते हुए मुझे लौटा दिया की यहाँ के सारे जौहरी मिलकर भी इस अनमोल हीरे को नहीं खरीद सकते इसके लिए तो लाखों अशर्फियाँ भी कम हैं”

“यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है ”, गुरु जी बोले, ” जिस प्रकार ऊपर से देखने पर इस अनमोल अंगूठी की कीमत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। 

उसी प्रकार किसी व्यक्ति के वस्त्रों को देखकर उसे आँका नहीं जा सकता। व्यक्ति की विशेषता जानने के लिए उसे भीतर से देखना चाहिए, बाह्य आवरण तो कोई भी धारण कर सकता है लेकिन आत्मा की शुद्धता और ज्ञान का भण्डार तो अंदर ही छिपा होता है।"

शिष्य की जिज्ञासा शांत हो चुकी थी। वह समझ चुका था कि बाहरी वेश-भूषा से व्यक्ति की सही पहचान नहीं हो सकती है। जो बात मायने रखती है, वो ये कि व्यक्ति भीतर से कैसा है !

आरी की कीमत

एक बार की बात है एक बढ़ई था। वह दूर किसी शहर में एक सेठ के यहाँ काम करने गया। एक दिन काम करते-करते उसकी आरी टूट गयी। बिना आरी के वह काम नहीं कर सकता था, और वापस अपने गाँव लौटना भी मुश्किल था, इसलिए वह शहर से सटे एक गाँव पहुंचा। इधर-उधर पूछने पर उसे लोहार का पता चल गया।

वह लोहार के पास गया और बोला- भाई मेरी आरी टूट गयी है, तुम मेरे लिए एक अच्छी सी आरी बना दो।

लोहार बोला, “बना दूंगा, पर इसमें समय लगेगा, तुम कल इसी वक़्त आकर मुझसे आरी ले सकते हो।”

बढ़ई को तो जल्दी थी सो उसने कहा, ” भाई कुछ पैसे अधिक ले लो पर मुझे अभी आरी बना कर दे दो!”

“बात पैसे की नहीं है भाई…अगर मैं इतनी जल्दबाजी में औजार बनाऊंगा तो मुझे खुद उससे संतुष्टि नहीं होगी, मैं औजार बनाने में कभी भी अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखता!”, लोहार ने समझाया।

बढ़ई तैयार हो गया, और अगले दिन आकर अपनी आरी ले गया।

आरी बहुत अच्छी बनी थी। बढ़ई पहले की अपेक्षा आसानी से और पहले से बेहतर काम कर पा रहा था।

बढ़ई ने ख़ुशी से ये बात अपने सेठ को भी बताई और लोहार की खूब प्रसंशा की।

सेठ ने भी आरी को करीब से देखा!

“इसके कितने पैसे लिए उस लोहार ने?”, सेठ ने बढ़ई से पूछा।

“दस रुपये!”

सेठ ने मन ही मन सोचा कि शहर में इतनी अच्छी आरी के तो कोई भी तीस रुपये देने को तैयार हो जाएगा। क्यों न उस लोहार से ऐसी दर्जनों आरियाँ बनवा कर शहर में बेचा जाये!

अगले दिन सेठ लोहार के पास पहुंचा और बोला, “मैं तुमसे ढेर सारी आरियाँ बनवाऊंगा और हर आरी के दस रुपये दूंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है… आज के बाद तुम सिर्फ मेरे लिए काम करोगे। किसी और को आरी बनाकर नहीं बेचोगे।”

“मैं आपकी शर्त नहीं मान सकता!” लोहार बोला।

सेठ ने सोचा कि लोहार को और अधिक पैसे चाहिए। वह बोला, “ठीक है मैं तुम्हे हर आरी के पन्द्रह रूपए दूंगा…।अब तो मेरी शर्त मंजूर है।”

लोहार ने कहा, “नहीं मैं अभी भी आपकी शर्त नहीं मान सकता। मैं अपनी मेहनत का मूल्य खुद निर्धारित करूँगा। मैं आपके लिए काम नहीं कर सकता। मैं इस दाम से संतुष्ट हूँ इससे ज्यादा दाम मुझे नहीं चाहिए।”

“बड़े अजीब आदमी हो…भला कोई आती हुई लक्ष्मी को मना करता है?”, व्यापारी ने आश्चर्य से बोला।

लोहार बोला, “आप मुझसे आरी लेंगे फिर उसे दुगने दाम में गरीब खरीदारों को बेचेंगे। लेकिन मैं किसी गरीब के शोषण का माध्यम नहीं बन सकता। अगर मैं लालच करूँगा तो उसका भुगतान कई लोगों को करना पड़ेगा, इसलिए आपका ये प्रस्ताव मैं स्वीकार नहीं कर सकता।”

सेठ समझ गया कि एक सच्चे और ईमानदार व्यक्ति को दुनिया की कोई दौलत नहीं खरीद सकती। वह अपने सिद्धांतों पर अडिग रहता है।

अपने हित से ऊपर उठ कर और लोगों के बारे में सोचना एक महान गुण है। लोहार चाहता तो आसानी से अच्छे पैसे कमा सकता था पर वह जानता था कि उसका जरा सा लालच बहुत से ज़रूरतमंद लोगों के लिए नुक्सानदायक साबित होगा और वह सेठ के लालच में नहीं पड़ता।

बूढ़ा आदमी और मौत

एक दिन एक बूढ़ा लकड़हारा जंगल में लकड़ियाँ काट रहा था। लकड़ियाँ काटते-काटते वह बड़बड़ाने लगा, “मैं दिनों-दिन बूढ़ा होता जा रहा हूँ, इसलिए ज्यादा दिन तक यह कठिन काम नहीं कर पाऊंगा।

मेरी टांगों और बाँहों में हर समय दर्द होता रहता है। मैं और अधिक जीना नहीं चाहता। अब मैं मर जाना चाहता हूँ।” यह कहते ही उसने अपनी कुल्हाड़ी एक ओर फेंक दी।

कुल्हाड़ी फेंकते ही तेज बिजली कड़की और यमराज उसके सामने आकर खड़े हो गए और कहा, “मैं तुम्हें अपने साथ ले जाने आया हूँ।”

यमराज को अपने सामने देखकर लकड़हारा डर के मारे कांपते हुए बोला, “माफ करना, मैं अभी मरना नहीं चाहता। आप कृप्या मुझे मेरी कुल्हाड़ी उठाकर दे दें ताकि मैं लकड़ियाँ काट सकूँ।”

शिक्षा: बिना सोचे-विचारे कुछ नहीं बोलना चाहिए।

विशाल बरगद और सरकंडा

जंगल में एक विशाल बरगद का पेड़ और कुछ सरकंडे साथ-साथ खड़े थे। एक दिन तेज हवा के झोंके से एक सरकंडा पूरी तरह नीचे झुक गया। यह देखकर बरगद बड़े घमंड से बोला,

“तुमने अपनी हालत देखी है? हवा के झोंके के सामने खड़े भी नहीं रह सकते। मुझे देखो, मैं हमेशा तनकर खड़ा रहता हूँ, चाहे कितनी भी तेज हवा क्यों न चले।” एक दिन बहुत तेज तूफान आया,

जिससे छोटा-सा सरकंडे का पौधा बुरी तरह झुक गया। उसे देखकर एक बार फिर पेड़ हँसते हुए बोला, “देखा, तूफान भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सका। मैं अब भी तनकर खड़ा हूँ।” तभी जोर की आंधी चलने लगी।

सैकड़ों पेड़ टूटकर गिर गए और धमाके के साथ बरगद का पेड़ भी उखड़कर धरती पर आ गिरा। आज सरकंडे का पौधा बोल, “दिया, अपने घमंड का फल।

हमेशा तनकर रहते हो और हवा के झोंके को रास्ता नहीं देते, जबकि मैं कमजोर और छोटा हूँ, इसलिए हवा के झोंके को झुककर रास्ता दे देता हूँ। यही कारण है कि मैं इस आंधी-तूफान में भी खड़ा हूँ, जबकि तुम जड़ से उखड़ गए हो।”

एक जुआरी और चिड़िया

एक अमीर खर्चीला आदमी अपना सारा धन जुए और सट्टे में गँवा चुका था। एक दिन वह काफी धूल से भरे रास्ते से गुजर रहा था। उसने देखा कि पेड़ की डाली पर एक चिड़िया (अबाबील) बैठी है। वह सोचने लगा,

“अहा! अबाबील! इसका मतलब गर्मी का मौसम आने वाला है। अब तो मैं अपना यह कीमती कोट बेच कर धन प्राप्त कर सकता हूँ और उस धन से जुआ खेलकर फिर से अपनी किस्मत को आजमा सकता हूँ।”

उसने अपना कोट बेच दिया और एक बार फिर वह जुए में हारकर प्राप्त धन गँवा बैठा। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। ठंडी-ठंडी बर्फीली हवाएँ चलने लगीं। सर्दी का मौसम अभी गया नहीं था।

एक दिन वह ठिठुरता हुआ उसी रास्ते से गुजरा और उसने देखा कि वह अबाबील ठंड से जमकर मर गई है। वह बोला, “तुम्हारी वजह से मैं ठिठुर रहा हूँ। तुमने अपनी जान तो गँवा दी लेकिन मेरी जान भी खतरे में डाल दी। ”

शिक्षा: हर कार्य उचित समय पर ही करना चाहिए।

पढ़ो ही नहीं, अमल भी करो

महान् ब्रह्मनिष्ठ संत स्वामी रामानंद सरस्वती गाँवों व नगरों में पहुँचकर धर्म, सदाचार, कर्तव्यपालन व भक्ति का प्रचार किया करते थे।

एक बार काशी में कोलकाता के एक विद्वान् देवीचरण गांगुली अपनी पत्नी व पुत्र के साथ उनके सत्संग के लिए पहुँचे। श्री गांगुली ने अनेक धर्मशास्त्रों का गहन अध्ययन कर रखा था।

उन्होंने स्वामीजी से कहा, ‘महाराज, मैंने अपना अब तक का जीवन विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन और सत्संग में खपा दिया। देश के सभी तीर्थों की कई कई बार यात्राएँ कीं, किंतु मुझे अभी तक सुख-शांति की अनुभूति नहीं हुई। इसका क्या कारण है?’

स्वामी रामानंदजी ने पूछा, ‘आपने धर्मशास्त्रों में जो भी पढ़ा, क्या उसमें से कुछ बातों का पालन करने का प्रयास किया है? प्रत्येक व्यक्ति को ईमानदारी से अर्जित अपनी आय का कुछ अंश गरीबों,

बेसहारा लोगों और बीमारों की सेवा में खर्च करना चाहिए। सात्त्विक जीवन जीना चाहिए। आपने क्या कभी इनमें से कुछ नियमों का पालन किया है?’

देवीचरण गांगुली स्वामीजी के वचन सुनकर चुप बैठे रहे। स्वामीजी ने कहा, ‘जिस प्रकार औषधि खाने से ही लाभ होता है, उसी प्रकार जब तक पढ़ी-सुनी बातों पर अमल नहीं करोगे, उनका लाभ नहीं होगा।

तीर्थयात्रा के फेर में न पड़कर धर्म के सारभूत तत्त्वों को जीवन में उतारने में अपना समय बिताएँ । इन्हीं कर्मों से आपको शांति मिलेगी।’

शास्त्रीजी तो साधु हैं

लालबहादुर शास्त्री एक बार पंडित मदनमोहन मालवीय से मार्गदर्शन लेने पहुँचे। मालवीयजी ने उनसे कहा, ‘उसी राजनेता को सम्मान मिलता है, जो अपने साथियों के सुख दुःख में सहभागी बनता है। दूसरी बात यह हमेशा ध्यान रखना कि कथनी और करनी में कभी कोई अंतर न आने पाए।’

कुछ दिनों बाद ही शास्त्रीजी राष्ट्रीय आंदोलन के सिलसिले में गिरफ्तार कर नैनी जेल भेज दिए गए । झुंसी (प्रयाग) के संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी शास्त्रीजी की सात्त्विकता से काफी प्रभावित थे ।

ब्रह्मचारीजी एक दिन फल-मिठाई एवं अन्य सामग्री लेकर शिष्यों के साथ जेल पहुँचे। उन्हें शास्त्रीजी को सौंप दिया। शास्त्रीजी ने वे सामग्रियाँ अपने उन साथियों में बाँट दीं, जो उनके साथ सत्याग्रह में गिरफ्तार हुए थे।

उन्होंने ब्रह्मचारीजी से कहा, ‘ये सभी मेरे नेतृत्व में सत्याग्रह कर जेल आए हैं। मेरा कर्तव्य है कि जो सामग्री जेल में पहुँचे, पहले इन सबको दूँ।

ब्रह्मचारीजी के एक शिष्य कुछ वस्त्र लाए थे । शास्त्रीजी ने उन वस्त्रों को ऐसे विचाराधीन कैदियों में बाँट दिया, जो फटे-पुराने कपड़े पहने रहते थे। शास्त्रीजी ने कहा, ‘महाराज, मैंने मालवीयजी के समक्ष

व्रत लिया था कि दो जोड़ी कपड़ों से ज्यादा वस्त्र अपने पास नहीं रखूँगा। मैं एक जोड़ी धोती-कुरता अपने हाथों से धोकर सुखा देता हूँ और अगले दिन उसे बदल लेता हूँ।’

उनकी इस विरक्ति भावना को देखकर ब्रह्मचारीजी ने कहा, ‘आज पता लगा कि हम गेरुआ वस्त्रधारी साधुओं से बड़े और सच्चे संत तो हमारे शास्त्रीजी हैं। ‘

सदैव न्याय करना

खानदेश (महाराष्ट्र) के जिलाधीश लक्ष्मणराव देशमुख ईश्वर में दृढ़ विश्वास रखने वाले तथा वेदों के अनुसार जीवनयापन करने वाले अधिकारी थे। वे अंग्रेज अफसरों के अन्यायपूर्ण आदेशों को निर्भीकता के साथ मानने से इनकार कर देते थे ।

आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती के वेद संबंधी विचारों से वे प्रभावित हुए। मई 1883 में देशमुख स्वामीजी के सत्संग के लिए अजमेर गए ।

स्वामीजी अजमेर से जोधपुर जा रहे थे। देशमुख ने उन्हें अपना परिचय दिया और कहा, ‘मैं आपसे योग विद्या सीखने और सत्संग के लिए आया हूँ।’ स्वामीजी ने कहा, ‘मेरे साथ जोधपुर चलो।’

रास्ते में स्वामीजी ने उन्हें वैदिक धर्म के महत्त्व से अवगत कराया। उन्होंने बताया, ‘सत्य पर सदैव अटल रहना चाहिए। सत्य बात कहने में कदापि नहीं हिचकना चाहिए । सत्यवादी व सदाचारी से बड़ा दूसरा कोई धर्मात्मा नहीं होता।’

जिलाधीश देशमुख जोधपुर में एक सप्ताह तक स्वामीजी के साथ रहे। एक दिन स्वामीजी ने उनसे कहा, ‘आप जिलाधीश हैं। किसी के साथ अन्याय न होने पाए और किसी असहाय का उत्पीड़न न हो – इसका पूरा ध्यान रखना अधिकारी का परम धर्म और दायित्व होता है । ‘

योग की शिक्षा व सद्प्रेरणा प्राप्त कर देशमुख खानदेश लौटने लगे, तो उन्होंने स्वामीजी का चरणस्पर्श कर कहा, ‘जो वर्षों की साधना के बाद नहीं मिल सकता, वह मुझे आपके पावन सान्निध्य से मिल गया है। मैं आजीवन आपके बताए सद्मार्ग पर चलता रहूँ, ऐसा आशीर्वाद दें।’

शिकारी राजकुमार

एक समय की बात है। एक राजा था जो भाग्य पर बहुत अधिक भरोसा करता था। उसका बेटा बहुत ही निपुण शिकारी था। एक रात राजा ने एक डरावना सपना देखा कि उसका बेटा एक शेर के द्वारा मारा गया।

वह जान गया था कि मृत्यु का देवता उसका दरवाजा खटखटा रहा है, ताकि वह उसके बेटे को ले जा सके। उसने अपने बेटे के लिए एक बहुत बड़ा महल बनवाया और उसे सख्त हिदायत दी कि वह शिकार पर न जाए।

महल की दीवारों पर अलग-अलग जानवरों की तस्वीर लगा दी गईं। उनमें एक शेर की तस्वीर भी थी। लेकिन इन सब चीजों से राजकुमार संतुष्ट नहीं था। वह महल की चारदीवारी से उकता गया था।

एक दिन उसने गुस्से में दीवार में लगी शेर की तस्वीर पर घूसा मार दिया और तस्वीर पर लगी लोहे की कील उसके हाथ में चुभ गई जिससे उसके पूरे शरीर में जहर फैल गया और कुछ ही दिनों के भीतर उसकी मृत्यु हो गई।

शिक्षा: होनी को कोई नहीं टाल सकता।

लाभदायक लेनदेन

गुरु नानक जी के पिता जानते थे कि नानक जी लोगों से संवाद करना पसंद करता है। इसीलिए उन्होंने फैसला किया, उसकी बेटी नानक जी को पैसा कमाना सीखना होगा।

इसलिए एक दिन गुरु नानक के पिता ने भाई वाला को ₹20 दिए और कहां, “नानक के साथ बाजार में जाओ इन पैसों से कुछ खरीदो और उन्हें लाभदायक दर पर बेचो।”

इसीलिए नानक उसकी भाई बाला के साथ कुछ सामान खरीदने के लिए बाजार में गए। जब वे अपने गाँव से दस मील दूर थे, तब उनका सामना हर्मिट्स का एक समूह से होता है।

जो एक पेड़ के नीचे बैठे थे। उन्हें देखकर नानक जी भाई बाला को कहा, “पिता ने हमें कुछ लाभदायक लेनदेन करने के लिए कहा,

और इन हर्मिट्स को खिलाने से ज्यादा लाभदायक कुछ नहीं हो सकता। मैं सच्चा लाभदायक लेनदेन करने के लिए, इस तरह के शानदार अवसर को छोड़कर आगे नहीं बढ़ सकता।”

फिर नानक जी भाई बाला से सारे पैसे ले लिए और उन्हें पैसे देते हुए कहा, “मैं यह पैसा आपकी सेवा में दे रहा हूं।” उस हर्मिट् समूह के मुखिया ने जवाब दिया,

बेटा, यह धन हमारे लिए किसी काम का नहीं है। क्योंकि हम किसी गांव या शहरों में नहीं जाते हैं, हम हमेशा यहां जंगल में रहते हैं। यदि आप हमें भजन देते हैं, तो हम इसे स्वीकार करेंगे।

तब नानक जी और भाई बाला बाजार में जाकर भोजन और कपड़े खरीदे। नानक जी ने उन सभी को हर्मिट्स का समूह को पेशकश की और खली हाथ घर लौट गए।

शिक्षा: अधिक पैसा कमाना लाभदायक हो सकता है, लेकिन सच्चा लाभ दूसरों की मदद करने में है।

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