अमृता प्रीतम का जन्म 1919 में गुजरांवाला पंजाब (भारत) में हुआ। बचपन बीता लाहौर में, शिक्षा भी वहीं हुई। उन्होंने किशोरावस्था से  कविता, कहानी और निबंध लिखना शुरू किया। 

अमृता प्रीतम पंजाबी के सबसे लोकप्रिय लेखकों में से एक थी। पंजाब (भारत) के गुजराँवाला जिले में पैदा हुईं अमृता प्रीतम को पंजाबी भाषा की पहली कवयित्री माना जाता है। उन्होंने कुल मिलाकर लगभग 100 पुस्तकें लिखी हैं। अमृता प्रीतम उन साहित्यकारों में थीं जिनकी कृतियों का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। अपने अंतिम दिनों में अमृता प्रीतम को भारत का दूसरा सबसे बड़ा सम्मान पद्मविभूषण भी प्राप्त हुआ। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से पहले ही अलंकृत किया जा चुका था।

आज हम अमृता प्रीतम की कुछ कहानियाँ आपके साथ शेयर कर रहे है। उम्मीद है आपको यह कहानियाँ पसंद आएगी। 

अमृता प्रीतम की कहानियाॉं

Amrita Pritam Stories in Hindi List

अंतरव्यथा (नीचे के कपड़े) : अमृता प्रीतम

यह कहानी नहीं : अमृता प्रीतम

मणिया : अमृता प्रीतम

बृहस्पतिवार का व्रत : अमृता प्रीतम

एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना : अमृता प्रीतम

शाह की कंजरी : अमृता प्रीतम

जंगली बूटी : अमृता प्रीतम

एक ज़ब्तशुदा किताब : अमृता प्रीतम

अंतरव्यथा (नीचे के कपड़े) : अमृता प्रीतम

जिसके मन की पीड़ा को लेकर मैंने कहानी लिखी थी-'नीचे के कपड़े" उसका नाम भूल गई हूँ । कहानी में सही नाम लिखना नहीं था, और उससे एक बार ही मुलाकात हुई थी, इसलिए नाम भी याद से उतर गया है...

जब वह मिलने आई थी, बीमार थी। खूबसूरत थी, पर रंग और मन उतरा हुआ था। वह एक ही विश्वास को लेकर आई थी कि मैं उसके हालात पर एक कहानी लिख दूँ...

मैंने पूछा-इससे क्या होगा?

कहने लगी-जहाँ वह चिट्ठियाँ पड़ीं हैं जो मैं अपने हाथों से नहीं फाड़ सकती, उन्हीं चिट्ठियों में वह कहानी रख दूँगी...मुझे लगता है, मैं बहुत दिन जिंदा नहीं रहूँगी, और बाद में जब उन चिट्ठियों से कोई कुछ जान पाएगा, तो मुझे वह नहीं समझेगा जो मैं हूँ। आप कहानी लिखेंगी तो वहीं रख दूँगी। हो सकता है, उसकी मदद से कोई मुझे समझ ले मेरी पीड़ा को संभाल ले। मुझे और किसी का कुछ फिक्र नहीं है, पर मेरा एक बेटा है, अभी वह छोटा है, वह बड़ा होगा तो मैं सोचती हूँ कि बस वह मुझे गलत न समझे...

उसकी जिंदगी के हालात सचमुच बहुत उलझे हुए थे और मेरी पकड़ में नहीं आ रहा था कि मैं उन्हें कैसे समेट पाऊँगी। लिखने का वादा तो नहीं किया पर कहा कि कोशिश करूँगी..

मैं बहुत दिन वह कहानी नहीं लिख पाई। सिर्फ एक अहसास सा बना रहा कि उसका बच्चा मेरे जेहन में बड़ा हो रहा है, इतना बड़ा कि अब बहुत सी चीजें उसके हाथ लगती हैं, तो वह हैरान उन्हें देखे जा रहा है..

कहानी प्रकाशित हुई और बहुत दिन गुजर गए। मैं जान नहीं पाई कि उसके हाथों तक पहुँची या नहीं। सब वक्त के सहारे छोड़ दिया। उसका कोई अता-पता मेरे पास नहीं था...

एक अरसा गुजर गया था, जब एक दिन फोन आया, दिल्ली से नहीं था, कहीं बाहर से था। आवाज थी-'आपका बहुत शुक्रिया! मैंने कहानी वहीं रख दी है जहाँ चाहती थी...

इतने भर लफ्जों से कुछ पकड़ में नहीं आया था, इसलिए पूछा-'आप कौन बोल रही हैं? कौन सी कहानी?

जवाब में बस इतनी आवाज थी-'बहुत दूर से बोल रही हूँ, वही जिसकी कहानी आपने लिखी है-'नीचे के कपड़े...और फोन कट गया...

"नीचे के कपड़े???"

अचानक मेरे सामने कई लोग आकर खड़े हो गए हैं, जिन्होंने कमर से नीचे कोई कपड़ा नहीं पहना हुआ है।

पता नहीं मैंने कहाँ पढा था कि खानाबदोश औरतें अपनी कमर से अपनी घघरी कभी नहीं उतारती हैं। मैली घघरी बदलनी होतो सिर की ओर से नई घघरी पहनकर, अंदर से मैली घघरी उतार देती हैं और जब किसी खानाबदोश औरत की मृत्यु हो जाती है तो उसके शरीर को स्नान कराते समय भी उसकी नीचे की घघरी सलामत रखी जाती है। कहते हैं, उन्होंने अपनी कमर पर पड़ी नेफे की लकीर में अपनी मुहब्बत का राज खुदा की मखलूक से छिपाकर रखा होता है। वहाँ वे अपनी पसंद के मर्द का नाम गुदवाकर रखती हैं, जिसे खुदा की आँख के सिवा कोई नहीं देख सकता।

और शायद यही रिवाज मर्दों के तहमदों के बारे में भी होता होगा।

लेकिन ऐसे नाम गोदने वाला जरूर एक बार औरतों और मर्दों की कमर की लकीर देखता होगा। उसे शायद एक पल के लिए खुदा की आँख नसीब हो जाती है, क्योंकि वह खुदा की मखलूक की गिनती में नहीं जाता...

लेकिन मेरी आँख को खुदा की आँख वाला शाप क्यों मिल गया? मैं अपने सामने ऐसी औरतें और मर्द क्यों देख रहा हूँ, जिन्होंने कमर से नीचे कोई कपड़ा नहीं पहन रखा है, जिन्हें देखना सारी मखलूक के लिए गुनाह है?

कल से माँ अस्पताल में है। उसके प्राण उसकी साँसों के साथ डूब और उतरा रहे हैं। ऐसा पहले भी कई बार हुआ है और दो बार पहले भी उसे अस्पताल ले जाया गया था, पर इस बार शायद उसके मन को जीने का विश्वास नहीं बँध रहा है। अचानक उसने उंगली में से हीरे वाली अंगूठी उतारी और मुझे देकर कहा कि मैं घर जाकर उसकी लोहे वाली अलमारी के खाने में रख दूँ। अस्पताल में अभी दादी भी आई थी, पापा भी, मेरा बड़ा भाई भी, लेकिन माँ ने न जाने क्यों, यह काम उन्हें नहीं सौंपा। हम सब लौटने लगे थे, जब माँ ने इशारे से मुझे ठहरने के लिए कहा। सब चले गए तो उसने तकिए के नीचे से एक मुसा हुआ रुमाल निकाला, जिसके कोने से दो चाबियाँ बँधी हुई थीं। रुमाल की कसी हुई गाँठ खोलने की उसमें शक्ति नहीं थी, इसलिए मैंने वह गाँठ खोली। तब एक चाभी की ओर इशारा करके उसने मुझे यह काम सौंपा कि मैं उसकी हीरे की अंगूठी अलमारी के अंदर खाने में रख दूँ। यह भी बताया कि अंदर वाले की चाभी मुझे उसी अलमारी के एक डिब्बे में पड़ी हुई मिल जाएगी।

और फिर माँ ने धीरे से यह भी कहा कि मैं बम्बई वाले चाचाजी को एक खत डाल दूँ, दिल्ली आने के लिए। और दूसरी चाभी उसने उसी तरह रुमाल में लपेटकर अपने तकिए के नीचे रख ली।और जिस तरह तकदीरें बदल जाती हैं उसी तरह चाभियाँ भी बदल गई... घर में रोज के इस्तेमाल की माँ की एक ही अलमारी है, लेकिन फालतू सामान वाली कोठरी में लोहे की एक और भी अलमारी है, जिसमें फटे-पुराने कपड़े पड़े रहते हैं। पापा के ट्रांसफर के समय वह अलमारी लगभग टूट ही गई थी, पर माँ ने उसे फेंका नहीं था और साकड़-भाकड़ वाली उस अलमारी को फालतू कपड़ों के लिए रख लिया था।

घर पहुँचकर जब मैं माँ की अलमारी खोलने लगा, तो वह खुलती ही न थी। चाभी मेरी तकदीर की तरह बदली हुई थी। हाथ में थामी हुई हीरे की अंगूठी को कहीं संभालकर रखना था, इसलिए मैंने सामान वाली कोठरी की अलमारी खोल ली। यह चाभी उस अलमारी की थी। इस अलमारी में भी अंदर का खाना था। मैंने सोचा, उसकी चाभी भी जरूर इसी अलमारी के किसी डिब्बे में ही मिलनी थी...

और मैं फटे-पुराने कपड़ों की तहें खोलने लगा...

पुराने, उधड़े हुए सलमे के कुछ कपड़े थे, जो माँ ने शायद उनका सुच्चा सलमा बेचने के लिए रखे हुए थे और पापा के गर्म कोट भी थे, जो शायद बर्तनों से बदलने के लिए माँ ने संभालकर रखे हुए थे। मैंने एक बार गली में बर्तन बेचने वाली औरतों से माँ को एक पुराने कोट के बदले में बर्तन खरीदते हुए देखा था।

पर मैं हैरान हुआ-माँ ने वे सब टूटे हुए खिलौने भी रखे थे, जिनसे मैं छुटपन में खेला करता था। देखकर एक दहशत सी आई-चाभी से चलने वाली रेलगाड़ी इस तरह उलटी हुई थी, जैसे पटरी से गिर गई हो और उस भयानक दुर्घटना से उसके सभी मुसाफिर घायल हो गए हों-प्लास्टिक की गुड़िया, जो एक आँख से कानी हो गई थी, रबड़ का हाथी, जिसकी सूंड बीच में से टूट गई थी, मिट्टी का घोड़ा, जिसकी अगली दोनों टाँगें जैसे कट गई हों और कुछ खिलौनों की सिर्फ टाँगें और बाहें बिखरी पड़ी थीं-जैसे उनके धड़ और सिर उड़कर कहीं दूर जा पड़े हों- और अब उन्हें पहचाना भी नहीं जा सकता था..

मेरे शरीर में एक कंपन सी दौड़ गई-देखा कि इन घायल खिलौनों के पास ही मिट्टी की बनी शिवजी की मूर्ति थी, जो दोनों बाहों से लुंजी हो गई थी और ख्याल आया -जैसे देवता भी अपाहिज होकर बैठा हुआ है।

जहाँ तक याद आया, लगा कि मेरा बचपन बहुत खुशी में बीता था। बड़े भाई के जन्म के सात बरस बाद मेरा जन्म हुआ था, इसलिए मेरे बहुत लाड़ हुए थे। तब तक वैसे भी पापा की तरक्की हो चुकी थी, इसलिए मेरे वास्ते बहुत सारे कपड़े और बहुत सारे खिलौने खरीदे जाते थे...लेकिन पूरी यादों के लिए इन टूटे हुए खिलौनों की माँ को क्या जरूरत थी, समझ में नहीं आया...

सिर्फ खिलौने ही नहीं, मेरे फटे हुए कपड़े भी तहों में लगे हुए थे-टूटे हुए बटनों वाले छोटे-छोटे कुरते, टूटी हुई तनियों वाले झबले और फटी हुई जुराबें भी...

और फिर मुझे एक रुमाल में बँधी हुई वह चाभी मिल गई, जिसे मैं ढूँढ रहा था। अलमारी का अंदर वाला खाना खोला, ताकि हीरे की अंगूठी उसमें रख दूँ।

यही वह घड़ी थी जब मैंने देखा कि उस खाने में सिर्फ नीचे पहनने वाले कपड़े पड़े हुए थे..

और अचानक मेरे सामने वे लोग आकर खड़े हो गए हैं जिनके सिर भी ढँके हुए हैं, बाहें भी, ऊपर के शरीर भी- लेकिन कमर से नीचे कोई कपड़ा नहीं है...

प्रलय का समय शायद ऐसा ही होता होगा, मालूम नहीं। मेरे सामने मेरी माँ खड़ी हुई है, पापा भी, बम्बई वाले चाचा भी और कोई एक मिसेज चोपड़ा भी और एक कोई मिस नंदा भी- जिन्हें मैं जानता नहीं।

और खोए हुए से होश से मैंने देखा कि उनके बीच में कहीं भी मैं भी गुच्छा सा बनकर बैठा हुआ हूँ...

न जाने यह कौन सा युग है, शायद कोई बहुत ही पुरानी सदी, जब लोग पेड़ों के पत्तों में अपने को लपेटा करते थे..और फिर पेड़ों के पत्ते कागज जैसे कब हो गए, नहीं जानता...

अलमारी के खाने में सिर्फ कागज पड़े हुए हैं, बहुत से कागज जिन पर हरएक के तन की व्यथा लिखी हुई है-तन के ताप जैसी, तन के पसीने जैसी, तन की गंध जैसी...

ये सब खत हैं, बम्बई वाले चाचाजी के और सब मेरी माँ के नाम हैं...

तरह-तरह की गंध मेरे सिर को चढ रही है..

किसी खत से खुशी और उदासी की मिली-जुली गंध उठ रही है। लिखा है, 'वीनू! जो आदम और हव्वा खुदा के बहिश्त से निकाले गए थे-वह आदम मैं था और हव्वा तुम थीं...

किसी खत से विश्वास की गंध उठ रही है-'वीनू ! मैं समझता हूँ कि पत्नी के तौर पर तुम अपने पति को इंकार नहीं कर सकती, लेकिन तुम्हारा जिस्म मेरी नजर में गंगा की तरह पवित्र है और मैं शिवजी की गंगा को जटा में धारण कर सकता हूँ...

किसी खत से निराशा की गंध उठ रही है-'मैं कैसा राम हूँ, जो अपनी सीता को रावण से नहीं छुडा सकता...न जाने क्यों, ईश्वर ने इस जनम में राम और रावण को सगे भाई बना दिया!

किसी खत से दिलजोई की गंध उठ रही है-'वीनू! तुम मन में गुनाह का अहसास न किया करो। गुनाह तो उसने किया था, जिसने मिसेज चोपड़ा जैसी औरत के लिए तुम्हारे जैसी पत्नी को बिसार दिया था..

और अचानक एक हैरानी की गंध मेरे सिर को चढी, जब एक खत पढा-'तुम मुझसे खुशनसीब हो वीनू! तुम अपने बेटे को बेटा कह सकती हो, लेकिन मैं अपने बेटे को कभी भी अपना बेटा नहीं कह सकूँगा।

और अधिक हैरानी की गंध से मेरे सिर में एक दरार पड़ गई, जब एक दूसरे खत में मैंने अपना नाम पढा। लिखा था-'मेरी जान वीनू! अब तुम उदास न हुआ करो। मैं नन्हें से अक्षय की सूरत में हर वक्त तुम्हारे पास रहता हूँ। दिन में मैं तुम्हारी गोद में खेलता हूँ और रात को तुम्हारे पास सोता हूँ...

सो मैं..मैं...

जिंदगी के उन्नीस बरस मैं जिसे पापा कहता रहा था, अचानक उस आदमी के वास्ते यह लफ्ज मेरे होठों पर झूठा पड़ गया है...

बाकी खत मैंने पूरे होश में नहीं पढे, लेकिन इतना जाना है कि जन्म से लेकर मैंने जो भी कपड़ा शरीर पर पहना है, वह माँ ने कभी भी अपने पति की कमाई से नहीं खरीदा था। मिट्टी का खिलौना तक भी नहीं। मेरे स्कूल की और कॉलेज की फीसें भी वह घर के खर्च में से नहीं देती थी..

यह भी जाना है कि बम्बई में अकेले रहने वाले आदमी से कुछ ऐसी बातें भी हुई थीं, जिनके लिए कई खतों में माफियाँ माँगी गई हैं, और उस सिलसिले में कई बार किसी मिस नंदा का नाम लिखा गया है, जो खत लिखने वाले की नजरों में एक आवारा लड़की थी, जिसने मेनका की तरह एक ॠषि की तपस्या भंग कर दी थी...और कई खतों में माँ की झिड़कियाँ सी दी गई हैं कि ये सिर्फ उसके मन के वहम हैं, जिनके कारण वह बीमार रहने लगी है...

यह माँ, पापा, चाचा,मिसेज चोपड़ा, मिस नंदा-कोई भी खानाबदोशों के काफिलों में से नहीं है- पर खानाबदोशों की परंपरा शायद सारी मनुष्य जाति पर लागू होती है, सबकी घघरियों और सबके तहमदों पर, जहाँ उनके शरीर पर पड़ी उनके नेफे की लकीर पर लिखा हुआ नाम ईश्वर की आँख के सिवा किसी को नहीं देखना चाहिए।...और पता नहीं लगता कि आज मेरी आँख को ईश्वर की आँख वाला शाप क्यों लग गया है..

सिर्फ यह जानता हूँ कि ईश्वर की आँख ईश्वर के चेहरे पर हो तो वरदान है, लेकिन इन्सान के चेहरे पर लग जाए तो शाप हो जाती है...।

यह कहानी नहीं : अमृता प्रीतम

पत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया, सड़कों की तरह और वे दोनों तमाम उम्र उन सड़कों पर चलते रहे....

सड़कें, एक-दूसरे के पहलू से भी फटती हैं, एक-दूसरे के शरीर को चीरकर भी गुज़रती हैं, एक-दूसरे से हाथ छूड़ाकर गुम भी हो जाती हैं, और एक-दूसरे के गले से लगकर एक-दूसरे में लीन भी हो जाती थीं। वे एक-दूसरे से मिलते रहे, पर सिर्फ तब, जब कभी-कभार उनके पैरों के नीचे बिछी हुई सड़कें एक-दूसरे से आकर मिल जाती थीं।

घड़ी-पल के लिए शायद सड़कें भी चौंककर रुक जाती थीं, और उनके पैर भी...

और तब शायद दोनों को उस घर का ध्यान आ जाता था जो बना नहीं था...

बन सकता था, फिर क्यों नहीं बना? वे दोनों हैरान-से होकर पाँवों के नीचे की ज़मीन को ऐसे देखते थे जैसे यह बात उस ज़मीन से पूछ रहे हों...

और फिर वे कितनी ही देर ज़मीन की ओर ऐसे देखने लगते मानों वे अपनी नज़र से ज़मीन में उस घर की नींवें खोद लेंगे।...

और कई बार सचमुच वहाँ जादू का एक घर उभरकर खड़ा हो जाता और वे दोनों ऐसे सहज मन हो जाते मानों बरसों से उस घर में रह रहे हों...

यह उनकी भरपूर जवानी के दिनों की बात नहीं, अब की बात है, ठण्डी उम्र की बात, कि अ एक सरकारी मीटिंग के लिए स के शहर गई। अ को भी वक्त ने स जितना सरकारी ओहदा दिया है, और बराबर की हैसियत के लोग जब मीटिंग से उठे, सरकारी दफ्तर ने बाहर के शहरों से आने वालों के लिए वापसी टिकट तैयार रखे हुए थे, स ने आगे बढ़कर अ का टिकट ले लिया, और बाहर आकर अ से अपनी गाड़ी में बैठने के लिए कहा।

पूछा - “सामान कहाँ है?”

“होटल में।”

स ने ड्राइवर से पहले होटल और फिर वापस घर चलने के लिए कहा।

अ ने आपत्ति नहीं की, पर तर्क के तौर पर कहा - “प्लेन में सिर्फ दो घंटे बाकी हैं, होटल होकर मुश्किल से एयरपोर्ट पहुँचूँगी।”

“प्लेन कल भी जाएगा, परसों भी, रोज़ जाएगा।” स ने सिर्फ इतना कहा, फिर रास्ते में कुछ नहीं कहा।

होटल से सूटकेस लेकर गाड़ी में रख लिया, तो एक बार अ ने फिर कहा -

“वक्त थोड़ा है, प्लेन मिस हो जाएगा।”

स ने जवाब में कहा - “घर पर माँ इन्तज़ार कर ही होगी।”

अ सोचती रही कि शायद स ने माँ को इस मीटिंग का दिन बताया हुआ था, पर वह समझ नहीं सकी - क्यों बताया था?

अ कभी-कभी मन से यह ‘क्यों’ पूछ लेती थी, पर जवाब का इन्तज़ार नहीं करती थी। वह जानती थी - मन के पास कोई जवाब नहीं था। वह चुप बैठी शीशे में से बाहर शहर की इमारतों के देखती रही...

कुछ देर बाद इमारतों का सिलसिला टूट गया। शहर से दूर बाहर आबादी आ गई, और पाम के बड़े-बड़े पेड़ों की कतारें शुरु हो गईं...

समुद्र शायद पास ही था, अ के साँस नमकीन-से हो गए। उसे लगा-पाम के पत्तों की तरह उसके हाथों में कम्पन आ गया था-शायद स का घर भी अब पास था...

पेड़ों-पत्तों में लिपटी हुई-सी कॉटेज के पास पहुँचकर गाड़ी खड़ी हो गई। अ भी उतरी, पर कॉटेज के भीतर जाते हुए एक पल के लिए बाहर केले के पेड़ के पास खड़ी हो गई। जी किया - अपने काँपते हुए हाथों को यहाँ बाहर केले के काँपते हुए पत्तों के बीच में रख दे। वह स के साथ भीतर कॉटेज में जा सकती थी, पर हाथों की वहाँ ज़रूरत नहीं थी - इन हाथों से न वह अब स को कुछ दे सकती थी, न स से कुछ ले सकती थी...

माँ ने शायद गाड़ी की आवाज़ सुन ली थी, बाहर आ गईं। उन्होंने हमेशा की तरह माथा चूमा और कहा -”आओ, बेटी।”

इस बार अ बहुत दिनों बाद माँ से मिली थी, पर माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए - जैसे सिर पर बरसों का बोझ उतार दिया हो - और उसे भीतर ले जाकर बिठाते हुए उससे पूछा -”क्या पियोगी, बेटी?”

स भी अब तक भीतर आ गया था, माँ से कहने लगा - “पहले चाय बनवाओ, फिर खाना।”

अ ने देखा - ड्राइवर गाड़ी से सूटकेस अन्दर ला रहा था। उसने स की ओर देखा, कहा - “बहुत थोड़ा वक्त है, मुश्किल से एयरपोर्ट पहुँचूँगी।”

स ने उससे नहीं, ड्राइवर से कहा - “कल सवेरे जाकर परसों का टिकट ले आना।” और माँ से कहा -”तुम कहती थीं कि मेरे कुछ दोस्तों को खाने पर बुलाना है, कल बुला लो।”

अ ने स की जेब की ओर देखा जिसमें उसका वापसी का टिकट पड़ा हुआ था, कहा -”पर यह टिकट बरबाद हो जाएगा...”

माँ रसोई की तरफ जाते हुए खड़ी हो गई, और अ के कन्धे पर अपना हाथ रखकर कहने लगी -”टिकट का क्या है, बेटी! इतना कह रहा है, रुक जाओ।”

पर क्यों? अ के मन में आया, पर कहा कुछ नहीं। कुर्सी से उठकर कमरे के आगे बरामदे में जाकर खड़ी हो गई। सामने दूर तक पाम के ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। समुद्र परे था। उसकी आवाज़ सुनाई दे रही थी। अ को लगा - सिर्फ आज का ‘क्यों’ नहीं, उसकी ज़िन्दगी के कितने ही ‘क्यों’ उसके मन के समुद्र के तट पर इन पाम के पेड़ों की तरह उगे हुए हैं, और उनके पत्ते अनेक वर्षों से हवा में काँप रहे हैं।

अ ने घर के मेहमान की तरह चाय पी, रात को खाना खाया, और घर का गुसलखाना पूछकर रात को सोने के समय पहनने वाले कपड़े बदले। घर में एक लम्बी बैठक थी, ड्राइंग-डाइनिंग, और दो और कमरे थे - एक स का, एक माँ का। माँ ने ज़िद करके अपना कमरा अ को दे दिया, और स्वयं बैठक में सो गई।

अ सोने वाले कमरे में चली गई, पर कितनी ही देर झिझकी हुई-सी खड़ी रही। सोचती रही - मैं बैठक में एक-दो रातें मुसाफिरों की तरह ही रह लेती, ठीक था, यह कमरा माँ का है, माँ को ही रहना चाहिए था...

सोने वाले कमरे के पलंग में, पद… में, और अलमारी में एक घरेलू-सी बू-बास होती है, अ ने इसका एक घूँट-सा भरा। पर फिर अपना साँस रोक लिया मानो अपने ही साँसो से डर रही हो...

बराबर का कमरा स का था। कोई आवाज़ नहीं थी। घड़ी पहले स ने सिर-दर्द की शिकायत की थी, नींद की गोली खाई थी, अब तक शायद सो गया था। पर बराबर वाले कमरों की भी अपनी बू-बास होती है, अ ने एक बार उसका भी घूँट पीना चाहा, पर साँस रुका रहा।

फिर अ का ध्यान अलमारी के पास नीचे फर्श पर पड़े हुए अपने सूटकेस की ओर गया, और उसे हँसी-सी आ गई - यह देखो मेरा सूटकेस, मुझे सारी रात मेरी मुसाफिरी की याद दिलाता रहेगा...

और वह सूटकेस की ओर देखते हुए थकी हुई-सी, तकिए पर सिर रखकर लेट गई...

न जाने कब नींद आ गई। सोकर जागी तो खासा दिन चढ़ा हुआ था। बैठक में रात को होने वाली दावत की हलचल थी।

एक बार तो अ की आँखें झपककर रह गईं - बैठक में सामने स खड़ा था। चारखाने का नीले रंग का तहमद पहने हुए। अ ने उसे कभी रात के सोने के समय के कपड़ों में नहीं देखा था। हमेशा दिन में ही देखा था - किसी सड़क पर, सड़क के किनारे, किसी कैफे में, होटल में, या किसी सरकारी मीटिंग में - उसकीयह पहचान नई-सी लगी। आँखों में अटक-सी गई...

अ ने भी इस समय नाइट सूट पहना हुआ था, पर अ ने बैठक में आने से पहले उस पर ध्यान नहीं दिया था, अब ध्यान आया तो अपना-आप ही अजीब लगा - साधारण से असाधारण-सा होता हुआ...

बैठक में खड़ा हुआ स, अ को आते हुए देखकर कहने लगा -”ये दो सोफे हैं, इन्हें लम्बाई के रुख रख लें। बीच में जगह खुली हो जाएगी।”

अ ने सोफों को पकड़वाया, छोटी मेज़ों को उठाकर कुर्सियों के बीच में रखा। फिर माँ ने चौके से आवाज़ दी तो अ ने चाय लाकर मेज़ पर रख दी।

चाय पीकर स ने उससे कहा -”चलो, जिन लोगों को बुलाना है, उनके घर जाकर कह आएँ और लौटते हुए कुछ फल लेते आएँ।”

दोनों ने पुराने परिचित दोस्तों के घर जाकर दस्तक दी, सन्देशे दिए, रास्ते से चीजें खरीदीं, फिर वापस आकर दोपहर का खाना खाया, और फिर बैठक को फूलों से सजाने में लग गए।

दोनों ने रास्ते में साधारण-सी बातें की थीं - फल कौन-कौन-से लेने हैं? पान लेने हैं या नहीं? ड्रिंक्स के साथ के लिए कबाब कितने ले लें? फलाँ का घर रास्ते में पड़ता है, उसे भी बुला लें? - और यह बातें वे नहीं थीं जो सात बरस बाद मिलने वाले करते हैं।

अ को सवेरे दोस्तों के घर पर पहली-दूसरी दस्तक देते समय ही सिर्फ थोड़ी-सी परेशानी महसूस हुई थी। वे भले ही स के दोस्त थे, पर एक लम्बे समय से अ को जानते थे, दरवाज़ा खोलने पर बाहर उसे स के साथ देखते तो हैरान-से हो कह उठते -”आप।”

पर वे जब अकेले गाड़ी में बैठते, तो स हँस देता -”देखा, कितना हैरान हो गया, उससे बोला भी नहीं जा रहा था।”

और फिर एक-दो बार के बाद दोस्तों की हैरानी भी उनकी साधारण बातों में शामिल हो गई। स की तरह अ भी सहज मन से हँसने लगी।

शाम के समय स ने छाती में दर्द की शिकायत की। माँ ने कटोर में ब्राण्डी डाल दी, और अ से कहा -”लो बेटी! यह ब्राण्डी इसकी छाती पर मल दो।”

इस समय तक शायद इतना कुछ सहज हो चुका था, अ ने स की कमीज़ के ऊपर वाले बटन खोले, और हाथ से उसकी छाती पर ब्राण्डी मलने लगी।

बाहर पाम के पेड़ों के पत्ते और केलों के पत्ते शायद अभी भी काँप रहे थे, पर अ के हाथ में कम्पन नहीं था। एक दोस्त समय से पहले आ गया था, अ ने ब्राण्डी में भीगे हुए हाथों से उसका स्वागत करते हुए नमस्कार भी किया, और फिर कटोरी में हाथ डोबकर बाकी रहती ब्राण्डी को उसकी गर्दन पर मल दिया - कन्धों तक।

धीरे-धीरे कमरा मेहमानों से भर गया। अ फ्रिज सर बरफ निकालती रही और सादा पानी भर-भर फ्रिज में रखती रही। बीच-बीच में रसोई की तरफ जाती, ठण्डे कबाब फिर से गर्म करके ले आती। सिर्फ एक बार जब स ने अ के कान के पास होकर कहा -”तीन-चार तो वे लोग बी आ गए हैं, जिन्हें बुलाया नहीं था। ज़रूर किसी दोस्त ने उनसे भी कहा होगा, तुम्हें देखने के लिए आ गए हैं” - तो पल-भर के लिए अ की स्वाभाविकता टूटी, पर फिर जब स ने उससे कुछ गिलास धोने के लिए कहा, तो वह उसी तरह सहज मन हो गई।

महफिल गर्म हुई, ठंडी हुई, और जब लगभग आधी रात के समय सब चले गए, अ को सोने वाले कमरे में जाकर अपने सूटकेस में से रात के कपड़े निकालकर पहनते हुए लगा - कि सड़कों पर बना हुआ जादू का घर अब कहीं भी नहीं था....

यह जादू का घर उसने कई बार देखा था - बनते हुए भी, मिटते हुए भी, इसलिए वह हैरान नहीं थी। सिर्फ थकी-थकी सी तकिए पर सिर रखकर सोचने लगी - कब की बात है... शायद पचीस बरस हो गए- नहीं तीस बरस .... जब पहली बार वे ज़िन्दगी की सड़कों पर मिले थे - अ किस सड़क से आई थी, स कौन-सी सड़क से आया या, दोनों पूछना भी भूल गये थे, और बताना भी। वे निगाह नीची किए ज़मीन में नींवें खोदते रहे, और फिर यहाँ जादू का एक घर बनकर खड़ा हो गया, और वे सहज मन से सारे दिन उस घर में रहते रहे।

फिर जब दोनों की सड़कों ने उन्हें आवाज़ें दीं, वे अपनी-अपनी सड़क की ओर जाते हुए चौंककर खड़े हो गए। देखा - दोनों सड़कों के बीच एक गहरी खाई थी। स कितनी देर उस खाई की ओर देखता रहा, जैसे अ से पूछ रहा हो कि इस खाई को तुम किस तरह से पार करोगी? अ ने कहा कुछ नहीं था, पर स के हाथ की ओर देखा था, जैसे कह रही हो - तुम हाथ पकड़कर पार करा लो, मैं महज़ब की इस खाई को पार कर जाऊँगी।

फिर स का ध्यान ऊपर की ओर गया था, अ के हाथ की ओर। अ की उँगली में हीरे की एक अँग्ïठी चमक रही थी। स कितनी देर तक देखता रहा, जैसे पूछ रहा हो - तुम्हारी उँगली पर यह जो कान्ïन का धागा लिपटा हुआ है, मैं इसका क्या करूँगा? अ ने अपनी उँगली की ओर देखा था और धीरे से हँस पड़ी थी, जैसे कह रही हो - तुम एक बार कहो, मैं कानून का यह धागा नाखूनों से खोल लूँगी। नाखूनों से नहीं खुलेगा तो दाँतों से खोल लूँगी।

पर स चुप रहा या, और अ भी चुप खड़ी रह गई थी। पर जैसे सड़कें एक ही जगह पर खड़ी हुई भी चलती रहती हैं, वे भी एक जगह पर खड़े हुए चलते रहे...

फिर एक दिन स के शहर से आने वाली सड़क अ के शहर आ गई थी, और अ ने स की आवाज़ सुनकर अपने एक बरस के बच्चे को उठाया था और बाहर सड़क पर उसके पास आकर खड़ी हो गई थी। स ने धीरे से हाथ आगे करके सोए हुए बच्चे को अ से ले लिया था और अपने कन्धे से लगा लिया था। और फिर वे सारे दिन उस शहर की सड़कों पर चलते रहे...

वे भरपूर जवानी के दिन थे - उनके लिए न धूप थी, न ­ड। और फिर जब चाय पीने के लिए वे एक कैफे में गए तो बैरे ने एक मर्द, एक औरत और एक बच्चे को देखकर एक अलग कोने की कुर्सियाँ पोंछ दी थीं। और कैफे के उस अलग कोने में एक जादू का घर बनकर खड़ा हो गया था...

और एक बार... अचानक चलती हुई रेलगाड़ी में मिलाप हो गया था। स भी था, माँ भी, और स का एक दोस्त भी। अ की सीट बहुत दूर थी, पर स के दोस्त ने उससे अपनी सीट बदल ली थी और उसका सूटकेस उठाकर स के सूटकेस के पास रख दिया था। गाड़ी में दिन के समय ठंड नहीं थी, पर रात ठंडी थी। माँ ने दोनों को एक कम्बल दे दिया था। आधा स के लिए आधा अ के लिए। और चलती गाड़ी में उस साझे के कम्बल के किनारे जादू के घर की दीवारें बन गई थीं...

जादू की दीवारें बनती थीं, मिटती थीं, और आखिर उनके बीच खँडहरों की-सी खामोशी का एक ढेर लग जाता था...

स को कोई बन्धन नहीं था। अ को था। पर वह तोड़ सकती थी। फिर यह क्या था कि वे तमाम उम्र सड़कों पर चलते रहे...

अब तो उम्र बीत गई... अ ने उम्र के तपते दिनों के बारे में भी सोचा और अब के ठण्डे दिनों के बारे में भी। लगा - सब दिन, सब बरस पाम के पत्तों की तरह हवा में खड़े काँप रहे थे।

बहुत दिन हुए, एक बार अ ने बरसों की खामोशी को तोड़कर पूछा था - “तुम बोलते क्यों नहीं? कुछ भी नहीं कहते। कुछ तो कहो।”

पर स हँस दिया था, कहने लगा -”यहाँ रोशनी बहुत है, हर जगह रोशनी होती है, मुझसे बोला नहीं जाता।”

और अ का जी किया था - वह एक बार सूरज को पकड़कर बुझा दे...

सड़कों पर सिर्फ दिन चढ़ते हैं। रातें तो घरों में होती हैं... पर घर कोई था नहीं, इसलिए रात भी कहीं नहीं थी - उनके पास सिर्फ सड़कें थीं, और सूरज था, और स सूरज की रोशनी में बोलता नहीं था।

एक बार बोला था...

वह चुप-सा बैठा हुआ था जब अ ने पूछा था -”क्या सोच रहे हो?” तो वह बोला - “सोच रहा हूँ, लड़कियों से फ्लर्ट करूँ और तुम्हें दुखी करूँ।”

पर इस तरह अ दुखी नहीं, सुखी हो जाती। इसलिए अ भी हँसने लगी थी, स भी।

और फिर एक लम्बी खामोशी...

कई बार अ के जी में आता था -हाथ आगे बढ़ाकर स को उसकी खामोशी में से बाहर ले आए, वहाँ तक जहाँ तक दिल का दर्द है। पर वह अपने हाथों को सिर्फ देखती रहती थी, उसने हाथों से कभी कुछ कहा नहीं था।

एक बार स ने कहा था -”चलो चीन चलें।”

“चीन?”

“जाएँगे, पर आएँगे नहीं।”

“पर चीन क्यों?”

यह ‘क्यों’ भी शायद पाम के पेड़ के समान था जिसके पत्ते फिर हवा में काँपने लगे...

इस समय अ ने तकिए पर सिर रख हुआ था, पर नींद नहीं आ रही थी। स बराबर के कमरे में सोया हुआ था, शायद नींद की गोली खाकर।

अ को न अपने जागने पर गुस्सा आया, न स की नींद पर। वह सिर्फ यह सोच रही थी - कि वे सड़कों पर चलते हुए जब कभी मिल जाते हैं तो वहाँ घड़ी-पहर के लिए एक जादू का घर क्यों बनकर खड़ा हो जाता है?

अ को हँसी-सी आ गई - तपती हुई जवानी के समय तो ऐसा होता था, ठीक है, लेकिन अब क्यों होता है? आज क्यों हुआ?

यह न जाने क्या था, जो उम्र की पकड़ में नहीं आ रहा था...

बाकी रात न जाने कब बीत गई - अब दरवाज़े पर धीरे से खटका करता हुआ ड्राइवर कह रहा या कि एयरपोर्ट जाने का समय हो गया है...

अ ने साड़ी पहनी, सूटकेस उठाया, स भी जागकर अपने कमरे से आ गया, और वे दोनों दरवाज़े की ओर बढ़े जो बाहर सड़क की ओर खुलता था...

ड्राइवर ने अ के हाथ से सूटकेस ले लिया था, अ को अपने हाथ और खाली-खाली से लगे। वह दहलीज़ के पास अटक-सी गई, फिर जल्दी से अन्दर गई और बैठक में सोई हुई माँ को खाली हाथों से प्रणाम करके बाहर आ गई...

फिर एयरपोर्ट वाली सड़क शुरु हो गई, खत्म होने को भी आ गई, पर स भी चुप था, अ भी...

अचानक स ने कहा -”तुम कुछ कहने जा रही थीं?”

“नहीं।”

और वह फिर चुप हो गया।

फिर अ को लगा - शायद स को भी - कि बहुत-कुछ कहने को था, बहुत-कुछ सुनने को, पर बहुत देर हो गई थी, और अब सब शब्द ज़मीन में गड़ गए थे - पाम के पेड़ बन गए थे और मन के समुद्र के पास लगे हुए उन पेड़ों के पत्ते शायद तब तक काँपते रहेंगे जब तक हवा चलती रहेगी..

एयरपोर्ट आ गया और पाँवों के नीचे स के शहर की सड़क टूट गई....

मणिया : अमृता प्रीतम

संध्या गहराने को थी, जब विद्या के पति जयदेव अपने काम से वापस आए, और विद्या ने घर का दरवाज़ा खोलते हुए देखा, उनके साथ एक अजीब-सा दिखता आदमी था, बहुत मैला-सा बदन और गले में एक लंबा-सा कुर्ता पहने हुए...

विद्या ने कुछ पूछा नहीं, पर कुछ पूछती हुई निगाहों से अपने पति की ओर देखा। जयदेव हल्का-सा मुस्करा दिए, फिर विद्या से नहीं, उस आदमी से कहने लगे, यह बीबी जी हैं, बहुत अच्छी हैं, तुम मन लगा कर काम करोगे, तो बहुत खुश होंगी...

घर के भीतर आते हुए, जयदेव ने बरामदे में पड़ी हुई एक चटाई की ओर देखा और उस आदमी से कहने लगे, तुम यहाँ बैठो, फिर हाथ-पैर धो लेना...

और घर के बड़े कमरे की ओर जाते हुए विद्या से कहने लगे, तुम चाहती थीं कि काम के लिए कोई ऐसा आदमी मिले, जो खाना पकाना भले ही न जानता हो, मगर ईमानदार हो...

विद्या ने, कुछ घबराई-सी, पूछा, इसे कहाँ से पकड़ लाए हो?

आहिस्ता बोलो, जयदेव ने कमरे के दीवान पर बैठते हुए कहा और पूछा, मनू कहाँ है?

खेलने गया है, अभी आता होगा, लेकिन यह आदमी... विद्या कह रही थी, जब जयदेव कहने लगे, मनू से एक बात कहनी है, यह बहुत सीधा आदमी है, लेकिन डरा हुआ है, ख़ासकर बच्चों से डरा हुआ है...एक मेरे दफ़्तर के शर्मा जी हैं, उनके पास था।

वे इसकी मेहनत की और इमानदारी की तारीफ करते हैं, लेकिन उनके बच्चे उनके वश की बात नहीं हैं, उनके पाँच बच्चे हैं, एकदम से शरारती, इसका क़द ज़रा लंबा है, वे इसे शुतुरमुर्ग कहकर परेशान करते थे...उनकी, शर्मा जी की पत्नी भी तेज़ मिजाज़ की हैं...यह कितनी बार उनके घर से भाग जाता था, लेकिन कहीं ठिकाना नहीं था, वे फिर से पकड़कर इसे ले जाते थे...

लेकिन यह कुछ सीख भी पाएगा? विद्या कह रही थी जब जयदेव कहने लगे, ऊपर का काम तो करेगा, घर की सफाई करेगा, बर्तन करेगा...सिर्फ मनू को अच्छी तरह समझा देना कि वह इससे बदसलूकी न करे...फिर देखेंगे...अब एक प्याला चाय दे दो, उसको भी चाय पूछ लेना...

विद्या कमरे से लौटने को हुई, फिर भीतर के छोटे कमरे में जाकर एक कमीज़ पाजामा निकाल लाई, और हाथ में साबुन का एक टुकड़ा और एक पुराना-सा तौलिया लेकर, बाहर चटाई पर बैठे हुए उस आदमी से पूछने लगी, तुम्हारा नाम क्या है?

उसने जवाब नहीं दिया, और विद्या कुछ ख़ामोश रहकर कहने लगी, देखो आँगन में उस दीवार के पीछे एक नल है, वहाँ जाकर नहा लो, अच्छी तरह साबुन से, और यह कपड़े पहन लो?

वह आदमी सिर झुकाए बैठा था, उसने एक बार डरी-डरी-सी आँखों से ऊपर को देखा, पर उठा नहीं, न विद्या के हाथ से कपड़े लिए...

इतने में जयदेव उठकर आए और बोले, मणिया, उठो, जैसे बीबी जी कह रही हैं, यह कपड़े ले लो, और वहाँ जाकर नहा लो।

पास से विद्या मुस्करा दी, तुम्हारा नाम तो बहुत अच्छा है, मणिया...

मणिया ने आहिस्ता से उठकर विद्या के हाथ से कपड़े भी ले लिए, साबुन और तौलिया भी, और जहाँ उन लोगों ने संकेत किया था, वहाँ आँगन में बनी एक छोटी-सी दीवार की ओर चल दिया...

विद्या ने रसोई में जाकर चाय बनाई, मणिया के लिए एक गिलास चाय वहाँ रसोई में ही रख दी, और बाकी चाय दो प्यालों में डालकर बड़े कमरे में चली गई...

और फिर जब मणिया नहा कर कमीज पजामा पहन कर रसोई की तरफ आया, तो विद्या ने उसे चाय का गिलास देते हुए एक नज़र हैरानी से उसकी ओर देखा, और हल्के से मुस्कराती हुई बड़े कमरे में जाकर जयदेव से कहने लगी, ज़रा देखो तो उसे, आप पहचान नहीं सकेंगे। वह अच्छी ख़ासी शकल का है, और भरी जवानी में है। मैं समझी थी, बड़ी उम्र का है...

और कुछ ही दिनों में, विद्या इत्मीनान से अपने पति से कहने लगी, एकदम कहना मानता है, कुछ बोलता नहीं, लेकिन दिन भर घर की सफाई में लगा रहता है। मनू से थोड़ी-थोड़ी बात करने लगा है, वह इसे अपनी किताबों से तस्वीरें दिखाता है, तो यह खुश हो उठता है, लेकिन एक बात समझ में नहीं आती, अकेले में बैठता है, तो अपने से कुछ बोलता रहता है, लगता है, थोड़ा सा पागल है...

घर की दीवार से सटा हुआ, एक नीम का पेड़ था, वह मणिया जब भी ख़ाली होता, उस पेड़ के नीचे बैठा रहता...उस वक्त अगर कोई पास से गुज़रे तो देख सकता था कि वह अकेला बैठा आहिस्ता-आहिस्ता कुछ इस तरह बोलता था, जैसे किसी से बात कर रहा हो, और वह भी कुछ गुस्से में...

विद्या को उसका यह रहस्य पकड़ में नहीं आता था, और एक दिन पेड़ के मोटे से तने की ओट में होकर विद्या ने सुना, वह मणिया एक दुःख और गुस्से में जाने किससे कह रहा था, सब काम खुद करती हैं, साग़-सब्ज़ी कैसे पकाना है, मुझे कुछ नहीं सिखातीं, आटा भी नहीं मलने देतीं...

विद्या से रहा नहीं गया, वह ज़ोर से हँस दी, और पेड़ की ओट से बाहर आकर कहने लगी- मणिया, तुम खाना पकाना सीखोगे? आओ मेरे साथ...तूने मुझसे क्यों नहीं कहा- यह मेरी शिकायत किससे कर रहा था?

मणिया शर्मिंदा-सा, नीम से झड़ती हुई पत्तियाँ बुहारने लगा...

मणिया अब साग़-सब्ज़ी भी काटने-पकाने लगा था और बाज़ार से ख़रीद कर भी लाने लगा था। एक दिन बाज़ार से भिंडी लानी थी, मणिया बाज़ार गया तो क़रीब एक घंटा लौटा नहीं। आया तो उसके हाथ के थैले में बहुत छोटी-छोटी और ताज़ी भिंडियाँ थीं, लेकिन उसका साँस ऐसे फूल रहा था, जैसे कहीं से भागता हुआ आया हो। आते ही कहने लगा, देखो जी, कितनी अच्छी भिंडी लाया हूँ, पास वाले बाज़ार से नहीं, उस दूसरे बड़े बाज़ार से लाया हूँ...

विद्या ने भिंडी को धोकर छलनी में डाल दिया, पानी सुखाने के लिए, और कहने लगी, भिंडी तो बढ़िया है, क्या इस बाज़ार में नहीं थी?

मणिया कहने लगा, इस बाज़ार में, जहाँ आप लोग सब्ज़ी लेते हैं, वह आदमी बहुत ख़राब है, उसके पास पकी हुई और बासी भिंडी थी, वह कहता था, मैं वहीं से ले जाऊँ, और साथ मुझे ज़हर भी दे देता था...

ज़हर? विद्या चौंक गई, और मणिया की ओर ऐसे देखने लगी, जैसे वह आज बिल्कुल पगला गया हो...पूछा, वह तुम्हें ज़हर क्यों देने लगा?

मणिया जल्दी से बोल उठा, इसलिए कि मैं उसकी सड़ी हुई भिंडी ख़रीद लूँ...कहता था, मैं जो सब्ज़ी देता हूँ, तुम चुपचाप ले लिया करो, मैं रोज़ के तुम्हें बीस पैसे दूंगा...इस तरह के पैसे ज़हर होते हैं...

विद्या मणिया की ओर देखती रह गई, फिर हल्के से मुस्कराकर पूछने लगी, यह तुम्हें किसने बताया था कि इस तरह के पैसे ज़हर होते हैं?

मणिया आज बहुत खुश था, बताने लगा, माँ ने कहा था...जब मैं छोटा था, किसी ने मुझे किसी दूसरे के बाग़ से आम तोड़कर लाने को कहा था, और मैं तोड़ लाया था। उस आदमी ने मुझे पचास पैसे दिए थे, और जब मैंने माँ को दिए, तो कहने लगीं, यह ज़हर तू नहीं खाएगा, जाओ उस आदमी के पैसे उसी को दे के आओ, और फिर से किसी के कहने पर तू चोरी नहीं करेगा।

और विद्या चुपचाप उसकी ओर देखती रह गई थी। उस दिन उसने मणिया से पूछा, अब तुम्हारी माँ कहाँ है? तुम उसे गाँव में छोड़कर शहर में क्यों आए हो?

मणिया माँ के नाम से बहुत दर चुप रह गया, फिर कहने लगा, माँ नहीं है, मर गई, मेरा गाँव में कोई नहीं है...

दिन गुज़रते गए और विद्या को लगने लगा, जैसे मणिया को अब इस घर से मोह हो आया है। ख़ासकर मनू से, जो उसे पास बिठाकर कई बार कहानियाँ सुनाता है, और एक दिन जब मनू ने किसी बात की ज़िद में आकर रोटी नहीं खाई थी, तो विद्या ने देखा कि मणिया ने भी रोटी नहीं खाई थी...

एक शाम विद्या ने अपनी अलमारी खोलकर हरे रेशम का एक सूट निकाला, जो उसे कल सुबह कहीं जाने के लिए पहनना था। देखा कि कमीज पर कितनी ही सलवटें थीं। उसने मणिया को कहा, जाओ, अभी यह कमीज प्रेस करवा के ले आओ, बिंदिया से कहना, अभी चाहिए?

मणिया गया, पर उल्टे पाँव लौट आया, और कमीज़ पलंग पर रख दी...

विद्या ने पूछा, क्या हुआ, बिंदिया ने कमीज प्रेस नहीं की?

वह नहीं करती... मणिया ने इतना-सा कहा, और रसोई में जाकर बर्तन मलने लगा...विद्या ने फिर आवाज़ दी, मणिया! क्या हुआ, वह क्यों नहीं करती? जाओ उसे बुलाकर लाओ।

मणिया, उसी तरह बर्तन मलता रहा, गया नहीं, तो विद्या ने फिर से कहा। जवाब में मणिया कहने लगा, साहब आते ही होंगे, अभी मुझे आटा मलना है, अभी दाल भी पकी नहीं और अभी चावल बीनने हैं, और मनू साहब ने कुछ मीठा पकाने को कहा था...अभी...

विद्या हैरान थी कि आज मणिया को क्या हो गया। उसने आज तक किसी काम में आनाकानी नहीं की थी...और विद्या ने कुछ ऊँची आवाज़ में कहा, मैं देख लेती हूँ रसोई में, तुम जाओ, बिंदिया को अभी बुलाकर लाओ...

मणिया बर्तन वहीं छोड़कर गया, लेकिन उल्टे पाँव लौट आया, कहने लगा- वह नहीं आती। और फिर चुपचाप बर्तन मलने लगा।

विद्या की पकड़ में कुछ नहीं आ रहा था। वह सोच रही थी, जाने क्या हुआ, बिंदिया ऐसी तो नहीं थी...

इतने में दरवाज़े की ओर से बिंदिया की पायल सुनाई दी, और वह हँसती-हँसती आकर कहने लगी, आप मुझे कमीज़ दीजिए, मैं अभी प्रेस किए लाती हूँ।

पर हुआ क्या है? विद्या ने पूछा तो बिंदिया हँसने लगी, मणिया से पूछो।

वह तो कुछ बताता नहीं। विद्या ने कहा, और भीतर जाकर कमीज ले आई। उसने फिर मणिया की ओर देखा और पूछा, बोलो मणिया, क्या बात हुई थी? तू तो कहता था, वह प्रेस नहीं करती, और देखो वह खुद लेने आई है।

मणिया ने न इधर को देखा, और न कोई जवाब दिया। बिंदिया हँसती रही और फिर कहने लगी, बात कुछ नहीं थी, यह जब भी आपके कपड़े लेकर आता था, मैं इसे मज़ाक़ से कहती थी, देखो, इतने कपड़े पड़े हैं, पहले यह प्रेस करूँगी और फिर तुम्हारे कपड़े, अगर अभी करवाने हैं तो नाच कर दिखाओ। और यह हँसता भी था, नाचता भी था, और मैं सारा काम छोड़कर, आपके कपड़े प्रेस करने लगती थी...आज पता नहीं क्या हुआ, मैंने इसे नाचने को कहा, तो यह वहाँ से भाग आया। मैंने मज़ाक में कहा था, अब मैं कमीज़ प्रेस नहीं करूँगी।

विद्या चुपचाप सुनती रही, फिर कहने लगी, और क्या बात हुई थी?

बिंदिया हँसते-हँसते कहने लगी, और तो कोई बात नहीं हुई, आज तो इसे मेरी माँ ने एक लडडू भी दिया था, खाने को, लेकिन यह लडडू भी वहाँ छोड़ आया...

तुम काहे का लडडू इसे खिला रही थीं? विद्या ने मुस्कराकर पूछा तो बिंदिया कुछ सकुचाती-सी कहने लगी, मेरी सगाई हुई है, माँ ने इसे वही लडडू दिया था...

बिंदिया यह कहकर चली गई, कमीज प्रेस करके लाई, फिर से जाती बार मणिया को कहती गई, अरे, तू आज किस बात से रूठ गया... पर मणिया ने उसकी ओर नहीं देखा, खामोश दूसरी ओर देखता रहा। रात हुई, सबने खाना खाया, मनू ने रोज़ की तरह मणिया को बुलाकर कुछ तस्वीरें दिखाई पर मणिया सबकी ओर कुछ इस तरह देखता रहा जैसे कहीं बहुत दूर खड़ा हो और दूर से किसी को पहचान न पा रहा हो...

सुबह की चाय मणिया ही सबको कमरे में देता था। सूरज निकलने से पहले, लेकिन जब सूरज की किरण खिड़की में से विद्या की चारपाई तक आ गई, तब भी कहीं मणिया की आवाज़ नहीं आ रही थी...

विद्या जल्दी से उठी, रसोईघर में गई, पर मणिया वहाँ नहीं था। जयदेव भी उठे, देखा, कुछ परेशान हुए, पर विद्या ने कहा, आप घबराइए नहीं, मैं बाहर नीम के पेड़ तले देखती हूँ, वह ज़रूर वहीं होगा...

और जिस तरह एक बार आगे विद्या ने हौले से जाकर पेड़ के तने की ओट में होकर मणिया को देखा और सुना था, वहाँ गई तो मणिया सचमुच वहीं था, अपने में खोया-सा, कहीं अपने से बाहर बहुत दूर और कांपते से होठों से बोले जा रहा था, जाओ, तुम भी जाओ, तुम भी अलसी हो...तुम वही हो, अलसी...जाओ...जाओ...

विद्या ने मणिया के क़रीब जाकर उसके कंधे पर हाथ रख दिया और आहिस्ता से कुछ इस तरह बोली, जैसे नीम के पेड़ से नीम की पत्तियाँ झड़ रही हों, अलसी कौन थी? वह कहाँ चली गई?

मणिया की आँखें कुछ इतनी दूर, इतनी दूर देख रही थीं कि पास कौन खड़ा था, उसे पता नहीं चल रहा था...पर एक आवाज़ थी, जो फिर-फिर से उसके कानों से टकरती रही थी, कौन थी अलसी? मणिया अपने में खोया-सा बोलने लगा, वह मेरे साथ खेलती थी...हम दोनों जंगल में खेलते थे, कहती थी, नदी के पार जाओ और उस पार की बेरी के बेर तोड़कर लाओ...मैं नदी में तैर जाता था और दूसरे किनारे पर से बेर लाता था...

वह कहाँ चली गई? विद्या की आवाज़ हवा के झोंके की तरह उसके कानों में पड़ी तो वह कहने लगा, अलसी का ब्याह हो गया, वह चली गई...

विद्या ने मणिया के कंधे को झकझोरा, कहा, चलो उठो। मणिया ने एक बार विद्या की ओर देखा, पर कहा कुछ नहीं। उसी तरह फिर ख़ला में देखने लगा...

विद्या ने फिर एक बार पूछा, अलसी ने जाते समय तुम्हें कुछ नहीं कहा था?

मणिया अपने बदन पर झड़ती नीम की पत्तियों को मुठ्ठी में भरता हुआ कहने लगा, आई थी, ब्याह के लडडू देने के लिए... और मणिया मुठ्ठी खोलकर नीम की पत्तियों को ज़मीन पर बिखेरता कहने लगा, मुझे लडडू खिलाती है...

विद्या ने उसके सिर पर से नीम की पत्तियाँ झाड़ते हुए, कुछ ज़ोर से कहा, अब उठो, चलो, चाय बनाओ।

मणिया एक फर्माबरदार की तरह उठ खड़ा हुआ और घर में आकर चाय बनाने लगा...

वह छुट्टी का दिन था, विद्या को और जयदेव को आज कहीं जाना था, इसलिए चाय पीकर मनू को घर में छोड़कर चले गए...

दोपहर ढलने लगी थी, जब वे दोनों वापस आए, तो घर में मनू था, पर मणिया नहीं था। मनू ने बताया, उसे खिलाया था, फिर कहीं चला गया, और अभी तक आया नहीं है...

जयदेव उसकी तलाश में घर से निकलने लगे, तो विद्या ने कहा, वह आपको नहीं मिलेगा, वह आज दूसरी बार अपना गाँव छोड़कर चला गया है...

जयदेव ने विद्या की ओर देखा, पूछा, पर क्यों?

विद्या कुछ देर ख़ामोश रही, फिर कहने लगी, अब एक और अलसी का ब्याह होने वाला है...

बृहस्पतिवार का व्रत : अमृता प्रीतम

बृहस्पतिवार का व्रत’ कहानी उस ज़मीन पर खड़ी है, जिससे मैं वाकिफ नहीं थी। एक बार एक अजनबी लड़की ने आकर मिन्नत-सी की कि मैं उसकी कहानी लिख दूँ। और एक ही साँस में उसने कह दिया—‘मैं कॉलगर्ल हूँ।’ उसी से, तन-बदन बेचने वाली लड़कियों के रोज़गार का कुछ अता-पता लिया, और उसके अंतर में पलती हुई उस पीड़ा को जाना, जो घर का एक स्वप्न लिए हुए, मन्नत-मुराद माँगती हैं किसी आने वाले जन्म के लिए....

आज बृहस्पतिवार था, इसलिए पूजा को आज काम पर नहीं जाना था...

बच्चे के जागने की आवाज़ से पूजा जल्दी से चारपाई से उठी और उसने बच्चे को पालने में से उठाकर अपनी अलसाई-सी छाती से लगा लिया, ‘‘मन्नू देवता ! आज रोना नहीं, आज हम दोनों सारा दिन बहुत-सी बातें करेंगे...सारा दिन....’’

यह सारा दिन पूजा को हफ्ते में एक बार नसीब होता था। इस दिन वह मन्नू को अपने हाथों से नहलाती थी, सजाती थी, खिलाती थी और उसे कन्धे पर बिठाकर आसपास के बगीचे में ले जाती थी।

यह दिन आया का नहीं, माँ का दिन होता था...

आज भी पूजा ने बच्चे को नहला-धुलाकर और दूध पिलाकर जब चाबी वाले खिलौने उसके सामने रख दिए, तो बच्चे की किलकारियों से उसका रोम-रोम पुलकित हो गया.....

चैत्र मास के प्रारम्भिक दिन थे। हवा में एक स्वाभाविक खुशबू थी, और आज पूजा की आत्मा में भी एक स्वाभाविक ममता छलक रही थी। बच्चा खेलते-खेलते थककर उसकी टाँगों पर सिर रखकर ऊँघने लगा, तो उसे उठाकर गोदी में डालते हुए वह लोरियों जैसी बातें करने लगी—‘मेरे मन्नू देवता को फिर नींद आ गई...मेरा नन्हा-सा देवता...बस थोड़ा-सा भोग लगाया, और फिर सो गया...’’

पूजा ने ममता से विभोर होकर मन्नू का सिर भी चूम लिया, आँखें भी, गाल भी, गरदन भी—और जब उसे उठाकर चारपाई पर सुलाने लगी तो मन्नू कच्ची नींद के कारण रोने लगा। पूजा ने उसे उठाकर फिर कन्धे से लगा लिया और दुलारने लगी, ‘‘मैं कहीं नहीं जा रही, मन्नू ! आज मैं कहीं नहीं जाऊँगी...।’’

लगभग डेढ़ वर्ष के मन्नू को शायद आज भी यह अहसास हुआ था कि माँ जब बहुत बार उसके सिर व माथे को चूमती है, तो उसके बाद उसे छोड़कर चली जाती है।

और कन्धे से कसकर चिपटे हुए मन्नू को वह हाथ से दुलारती हुए कहने लगी, ‘‘हर रोज तुम्हें छोड़कर चली जाती हूँ न...जानते हो कहाँ जाती हूँ ? मैं जंगल में से फूल तोड़ने नहीं जाऊँगी, तो अपने देवता की पूजा कैसे करूँगी ?’’

और पूजा के मस्तिष्क में बिजली के समान वह दिन कौंध गया, जब एक ‘गेस्ट हाउस’ की मालकिन मैडम डी. ने उसे कहा था—‘‘मिसिज़ नाथ ! यहाँ किसी लड़की का असली नाम किसी को नहीं बताया जाता। इसलिए तुम्हें जो भी नाम पसन्द हो रख लो।’’

और उस दिन उसके मुँह से निकला था—‘‘मेरा नाम पूजा होगा।’’

गेस्ट हाउस वाली मैडम डी. हँस पड़ी थी—‘‘हाँ, पूजा ठीक है, पर किस मन्दिर की पूजा ?’’

और उसने कहा था—‘‘पेट के मन्दिर की।’’

माँ के गले से लगी बाँहों ने जब बच्चे को आँखों में इत्मीनान से नींद भर दी, तो पूजा ने उसे चारपाई पर लिटाते हुए, पैरों के बल चारपाई के पास बैठकर अपना सिर उसकी छाती के निकट, चारपाई की पाटी पर रख दिया और कहने लगी—‘‘क्या तुम जानते हो, मैंने अपने पेट को उस दिन मन्दिर क्यों कहा था ? जिस मिट्टी में से किसी देवता की मूर्ति मिल जाए, वहाँ मन्दिर बन जाता है—तू मन्नू देवता मिल गया तो मेरा पेट मन्दिर बन गया....’’

और मूर्ति को अर्ध्य देने वाले जल के समान पूजा की आँखों में पानी भर आया, ‘‘मन्नू, मैं तुम्हारे लिए फूल चुनने जंगल में जाती हूँ। बहुत बड़ा जंगल है, बहुत भयानक, चीतों से भरा हुआ, भेड़ियों से भरा हुआ, साँपों से भरा हुआ...’’

और पूजा के शरीर का कंपन, उसकी उस हथेली में आ गया, जो मन्नू की पीठ पर पड़ी थी...और अब वह कंपन शायद हथेली में से मन्नू की पीठ में भी उतर रहा था।

उसने सोचा—मन्नू जब खड़ा हो जाएगा, जंगल का अर्थ जान लेगा, तो माँ से बहुत नफरत करेगा—तब शायद उसके अवचेतन मन में से आज का दिन भी जागेगा, और उसे बताएगा कि उसकी माँ किस तरह उसे जंगल की कहानी सुनाती थी—जंगल की चीतों की, जंगल के भेड़ियों की और जंगल के साँपों की—तब शायद....उसे अपनी माँ की कुछ पहचान होगी।

पूजा ने राहत और बेचैनी का मिला-जुला साँस लिया। उसे अनुभव हुआ जैसे उसने अपने पुत्र के अवचेतन मन में दर्द के एक कण को अमानत की तरह रख दिया हो....

पूजा ने उठकर अपने लिए चाय का एक गिलास बनाया और कमरे में लौटते हुए कमरे की दीवारों को ऐसे देखने लगी जैसे वह उसके व उसके बेटे के चारों ओर बनी हुई किसी की बहुत प्यारी बाँहें हों...उसे उसके वर्तमान से भी छिपाकर बैठी हुई....

पूजा ने एक नज़र कमरे के उस दरवाजे की तरफ देखा—जिसके बाहर उसका वर्तमान बड़ी दूर तक फैला हुआ था....

शहर के कितने ही गेस्ट हाउस, एक्सपोर्ट के कितने ही कारखाने, एअर लाइन्स के कितने ही दफ्तर और साधारण कितने ही कमरे थे, जिनमें उसके वर्तमान का एक-एक टुकड़ा पड़ा हुआ था....

परन्तु आज बृहस्पतिवार था—जिसने उसके व उसके वर्तमान के बीच में एक दरवाज़ा बन्द कर दिया था।

बन्द दरवाज़े की हिफाजत में खड़ी पूजा को पहली बार यह खयाल आया कि उसके धन्धे में बृहस्पतिवार को छुट्टी का दिन क्यों माना गया है ?

इस बृहस्पतिवार की गहराई में अवश्य कोई राज़ होगा—वह नहीं जानती थी, अतः खाली-खाली निगाहों से कमरे की दीवारों को देखने लगी...

इन दीवारों के उस पार उसने जब भी देखा था—उसे कहीं अपना भविष्य दिखाई नहीं दिया था, केवल यह वर्तमान था...जो रेगिस्तान की तरह शहर की बहुत-सी इमारतों में फैल रहा था....

और पूजा यह सोचकर काँप उठी कि यही रेगिस्तान उसके दिनों से महीनों में फैलता हुआ—एक दिन महीनों से भी आगे उसके बरसों में फैल जाएगा।

और पूजा ने बन्द दरवाज़े का सहारा लेकर अपने वर्तमान से आँखें फेर लीं। उसकी नज़रें पैरों के नीचे फर्श पर पड़ीं, तो बीते हुए दिनों के तहखाने में उतर गईं। तहखाने में बहुत अँधेरा था....बीती हुई ज़िन्दगी का पता नहीं क्या-क्या, कहाँ-कहाँ पड़ा हुआ था, पूजा को कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। परन्तु आँखें जब अँधेरे में देखने की अभ्यस्त हुईं तो देखा—तहखाने के बाईं तरफ, दिल की ओर, एक कण-सा चमक रहा था। पूजा ने घुटनों के बल बैठकर उसे हाथ से छुआ। उसके सारे बदन में एक गरम-सी लकीर दौड़ गई और उसने पहचान लिया—यह उसके इश्क का ज़र्रा था, जिसमें कोई आग आज भी सलामत थी।

और इसी रोशनी में नरेन्द का नाम चमका—नरेन्द्रनाथ चौधरी का जिससे उसने बेपनाह मुहब्बत की थी। और साथ ही उसका अपना नाम भी चमका—गीता, गीता श्रीवास्तव।

वह दोनों अपनी-अपनी जवानी की पहली सीढ़ी चढ़े थे—जब एक-दूसरे पर मोहित हो गए थे। परन्तु चौधरी और श्रीवास्तव दो शब्द थे-जो एक-दूसरे के वजूद से टकरा गए थे

उस समय नरेन्द्र ने अपने नाम से चौधरी व गीता ने अपने नाम से श्रीवास्तव शब्द झाड़ दिया था। और वह दोनों टूटे हुए पंखों वाले पक्षियों की तरह हो गए थे।

चौधरी श्रीवास्तव दोनों शब्दों की एक मजबूरी थी—चाहे-अलग-अलग तरह की थी। चौधरी शब्द के पास अमीरी का गुरूर था। इसलिए उसकी मजबूरी उसका यह भयानक गुस्सा था, जो नरेन्द्र पर बरस पड़ा था। और श्रीवास्तव के पास बीमारी और गरीबी की निराशा थी—जिसकी मजबूरी गीता पर बरस पड़ी थी, और पैसे के कारण दोनों को कॉलेज की पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी।

और जब एक मन्दिर में जाकर दोनों ने विवाह किया था, तब चौधरी और श्रीवास्तव दोनों शब्द उनके साथ मन्दिर में नहीं गए थे। और मन्दिर से वापस लौटते कदमों के लिए चौधरी-घर का अमीर दरवाज़ा गुस्से के कारण बन्द हो गया था और श्रीवास्तव-घर का गरीबी की मजबूरी के कारण।

फिर किसी रोज़गार का कोई भी दरवाज़ा ऐसा नहीं था, जो उन दोनों ने खटखटाकर न देखा हो। सिर्फ देखा था कि हर दरवाज़े से मस्तक पटक-पटककर उन दोनों मस्तकों पर सख्त उदासी के नील पड़ गए थे।

रातों को वह बीते हुए दिनों वाले होस्टलों में जाकर, किसी अपने जानने वाले के कमरे में पनाह माँग लेते थे और दिन में उनके पैरों के लिए सड़कें खुल जाती थीं। वही दिन थे—जब गीता को बच्चे की उम्मीद हो आई थी।

गीता की कॉलेज की सहेलियों ने और नरेन्द्र के कॉलेज के दोस्तों ने उन दिनों में कुछ पैसे इकट्ठे किए थे, और दोनों ने जमुना पार की एक नीची बस्ती में सरकण्डों की एक झुग्गी बना ली थी—जिसके बाहर चारपाई बिछाकर गीता आलू, गोभी और टमाटर बेचने लगी थी, और नरेन्द्र नंगे पाँव सड़कों पर घूमता हुआ काम ढूँढ़ने लगा था।

खैरायती हस्पताल के दिन और भी कठिन थे—और जब गीता अपने सात दिन के मन्नू को गोद में लेकर, सरकण्डों की झुग्गी में वापस आई थी—तो बच्चे के लिए दूध का सवाल भी झुग्गी में आकर बैठ गया था।

और कमेटी के नलके से पानी भरकर लाने वाला समय।

पूजा के पैरों में दर्द की एक लहर उठकर आज भी, उसके पैरों को सुन्न करती हुई, ऊपर की रीढ़ की हड्डी में फैल गई, जैसे उस समय फैलती थी, जब वह गीता थी, और उसके हाथ में पकड़ी हुई पानी की बाल्टी का बोझ, पीठ में भी दर्द पैदा करता था, और गर्भ वाले पेट में भी।

पूजा ने तहखाने में पड़े हुए दिनों को वहीं हाथ से झटककर अँधेरे में फेंक दिया और उस सुलगते हुए कण की ओर देखने लगी, जो आज भी उसके मन के अँधेरे में चमक रहा था।

जब वह घबराकर नरेन्द्र की छाती से कसकर लिपट जाती थी—तो उसकी अपनी छाती में से सुख पिघलकर उसकी रगों में दौड़ने लगता था।

पूजा के पैरों से फिर एक कंपन उसके माथे तक गया—जब तहखाने में पड़े हुए दिनों में से—अचानक एक दिन उठकर काँटे की तरह उसके पैरों में चुभ गया—जब नरेन्द्र को हर रोज़ हल्का-हल्का बुखार चढ़ने लगा था, और वह मन्नू को नरेन्द्र की चारपाई के पास डालकर नौकरी की तलाश करने चली गई थी। उसे यह विचार आया कि वह इस देश में जन्मी-पली नहीं थी, बाप की तरफ से वह श्रीवास्तव कहलाती थी, परन्तु वह नेपाल की लड़की थी, माँ की तरफ से नेपाली, इस कारण उसे शायद अपने या किसी और देश के दूतावास में ज़रूर कोई नौकरी मिल जाएगी—और इसी सिलसिले में वह सब्जी बेचने का काम नरेन्द्र को सौंपकर हर रोज़ नौकरी की तलाश में जाने लगी थी।

‘मिस्टर एच’—पूजा को यह नाम अचानक इस तरह याद आया जैसे वह जीवन के जलकर राख हुए कुछ दिनों को कुरेद रही हो, और अचानक उसका हाथ उस राख में किसी गर्म अंगारे को छू गया हो।

वह उसे एक दूतावास के ‘रिसेप्शन रूम’ में मिला था। एक दिन कहने लगा, ‘‘गीता देवी ! मैं तुम्हें हर रोज़ यहाँ चक्कर लगाते देखता हूँ। तुम्हें नौकरी चाहिए ? मैं तुम्हें नौकरी दिलवा देता हूँ। यह लो, तुम्हें पता लिख देता हूँ, अभी चली जाओ। आज ही नौकरी का प्रबन्ध हो जाएगा...’’ और पूजा, जब गीता होती थी, कागज़ का वह टुकड़ा पकड़कर, अचानक मेहरबान हुई किस्मत पर हैरान खड़ी रह गई थी।

वह पता एक गेस्ट हाउस की मालकिन—‘मैडम डी.’ का था, जहाँ पहुँचकर वह और भी हैरान रह गई थी, क्योंकी नौकरी देने वाली मैडम डी. उसे ऐसे तपाक से मिली जैसे पुराने दिनों की कोई सहेली मिली हो। गीता को एक ठण्डे कमरे में बिठाकर उसने गर्म चाय और भुने हुए कबाब खिलाए थे।

नौकरी किस-किस काम की होगी, कितने घंटे वह कितने तनख्वाह—जैसे सवाल उसकी होंठों पर जितनी बार आते रहे, मैडम डी. उतनी बार मुस्करा देती थी। कितनी देर के बाद उसने केवल यह कहा था—‘‘क्या नाम बताया था ? मिसिज़ गीता नाथ ? परन्तु इसमें कोई आपत्ति तो नहीं अगर मैं मिसिज़ नाथ की अपेक्षा तुम्हें मिस नाथ कहा करूँ ?’’

गीता हैरान हुई, पर हँस पड़ी—‘‘मेरे पति का नाम नरेन्द्र नाथ है। इसी कारण अपने आपको मिसिज़ नाथ कहती हूँ। आप लोग मुझे मिस नाथ कहेंगे तो आज जाकर उन्हें बताऊँगी कि अब मैं उनकी पत्नी के साथ-साथ उनकी बेटी हो गई हूँ।’’

मैडम डी. कुछ देर तक उसके मुँह की तरफ देखती रही, कुछ बोली नहीं, और जब गीता ने पूछा, ‘‘तनख्वाह कितनी होगी ?’’ तो उसने जवाब दिया था—‘‘पचास रुपए रोज़।’’

‘‘सच ?’’ कमरे के सोफे पर बैठी गीता—जैसे खुशी से दोहरी होकर मैडम डी. के पास घुटनों के बल बैठ गई थी।

‘‘देखो ! आज तुमने कोई अच्छे कपड़े नहीं पहने हैं ! मैं तुम्हें अपनी एक साड़ी उधार देती हूँ, तुम साथ वाले बाथरूम में हाथ धोकर वह साड़ी पहन लो।’’ मैडम डी. ने कहा, और गीता मन्त्रमुग्ध-सी उसके कहने पर जब कपड़े बदलकर आई तो मैडम डी. ने पचास रुपए उसके सामने रख दिए, ‘‘आज की तनख्वाह।’’

इस परी-कहानी जैसी नौकरी के जादू के प्रभाव से अभी गीता की आँखें मुँदी जैसी थीं कि मैडम डी. उसका हाथ पकड़कर उसे ऊपर की छत के उस कमरे में छोड़ आई, जहाँ परी-कहानी का एक राक्षस उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

कमरे के दरवाज़े पर बार-बार दस्तक सुनी, तो पूजा ने इस तरह हाँफते हुए दरवाज़ा खोला जैसे वह तहखाने में से बहुत-सी सीढ़ियाँ चढ़कर बाहर आई हो।

‘‘रात की रानी—दिन में सो रही थी ?’’ दरवाज़े से अन्दर आते हुए शबनम ने हँसते-हँसते कहा, और पूजा के बिखरे हुए बालों की तरफ देखते हुए कहने लगी, ‘‘तेरी आँखों में तो अभी भी नींद भरी हुई है, राम के खसम ने क्या सारी रात जगाए रखा था ?’’

शबनम को बैठने के लिए कहते हुए पूजा ने ठण्डी साँस ली, ‘‘कभी-कभी जब रात का खसम नहीं मिलता, तो अपना दिल ही अपना खसम बन जाता है, वह कम्बख्त रात को जगाए रखता है...।’’ शबनम हँस पड़ी, और दीवान पर बैठते हुए कहने लगी, ‘‘पूजा दीदी ! दिल तो जाने कम्बख्त होता है या नहीं, आज का दिन ही ऐसा होता है, जो दिल को भी कम्बख्त बना देता है। देख, मैंने भी तो आज पीले कपड़े पहने हुए हैं और मन्दिर में आज पीले फूलों का प्रसाद चढ़ाकर आई हूँ...।’’ ‘‘आज का दिन ? क्या मतलब ?’’ पूजा ने शबनम के पास दीवान पर बैठते हुए पूछा। ‘‘आज का दिन, बृहस्पतिवार का। तुझे पता नहीं ?’’ ‘‘सिर्फ इतना पता है कि आज के दिन छुट्टी होती है’’—पूजा ने कहा। तो शबनम हँसने लगी—‘‘देख ले। हमारे सरकारी दफ्तर में भी छुट्टी होती है....।’’

‘‘मैं सोच रही थी कि हमारे धन्धे में इस बृहस्पतिवार को छुट्टी का दिन क्यों माना गया है...’’

‘‘हमारे संस्कार’’ शबनम के होंठ पर एक बल खाकर हँसने जैसे हो गए। वह कहने लगी—‘‘औरत चाहे वेश्या भी बन जाए परन्तु उसके संस्कार नहीं मरते। यह दिन औरत के लिए पति का दिन होता है। पति व पुत्र के नाम पर वह व्रत भी रखती है, पूजा भी करती है—‘‘छः दिन धन्धा करके भी वह पति और पुत्र के लिए दुआ माँगती है...’’

पूजा की आँखों में पानी-सा भर आया—‘‘सच।’’ और वह धीरे से शबनम को कहने लगी—‘‘मैंने तो पति भी देखा है, पुत्र भी। तुमने तो कुछ भी नहीं देखा...’’ ‘‘जब कुछ न देखा हो, तभी तो सपना देखने की जरूरत पड़ती है...’’ शबनम ने एक गहरी साँस ली, ‘‘इस धन्धे में आकर किसने पति देखा है...?’’ और कहने लगी—‘‘जिसे कभी मिल भी जाता है, वह भी चार दिन के बाद पति नहीं रहता, दलाल बन जाता है...तुझे याद नहीं, एक शैला होती थी...’’

‘‘शैला ?’’ पूजा को वह साँवली और बाँकी-सी लड़की याद हो आई, जो एक दिन अचानक हाथ में हाथी-दाँत का चूड़ा पहनकर और माँग में सिन्दूर भरकर, मैडम को अपनी शादी का तोहफा देने आई थी, और गेस्ट हाउस में लड्डू बाँट गई थी। उस दिन उसने बताया था कि उसका असली नाम कान्ता है। शबनम कहने लगी—‘‘वही शैला, जिसका नाम कान्ता था। तुझे पता है उसका क्या हुआ ?’’

‘‘कोई उसका ग्राहक था, जिसने उसके साथ विवाह कर लिया था...’’

‘‘ऐसे पति विवाह के मन्त्रों को भी धोखा दे देते हैं। उससे शादी करके उसे बम्बई ले गया था, यहाँ दिल्ली में उसे बहुत-से लोग जानते होंगे, बम्बई में कोई नहीं जानता, इसलिए वहाँ वे नेक ज़िन्दगी शुरू करेंगे...’’

‘‘फिर ?’’ पूजा की साँस जैसे रुक-सी गई।

‘‘अब सुना है कि वहाँ बम्बई में वह आदमी उस ‘नेक ज़िन्दगी’ से बहुत पैसे कमाता है’’...

पूजा के माथे पर त्योरियाँ पड़ गईं, वह कहने लगी, ‘‘फिर तू मन्दिर में उस तरह का पति क्यों माँगने गई थी ?’’

शबनम चुप-सी हो गई, फिर कहने लगी, ‘‘नाम बदलने से कुछ नहीं होता। मैंने नाम तो शबनम रख लिया है, परन्तु अन्दर से वही शकुन्तला हूँ—जो बचपन में किसी दुष्यन्त का सपना देखती थी...अब ये समझ लिया है कि जैसे शकुन्तला की ज़िन्दगी में वह भी दिन आया था, जब दुष्यन्त उसे भूल गया था...मेरा यह जन्म उसी दिन जैसा है।’’

पूजा का हाथ अनायास ही शबनम के कन्धे पर चला गया और शबनम ने आँखें नीची कर लीं। कहने लगी—‘‘मैं जानती हूँ...इस जन्म में मेरा यह शाप उतर जाएगा।’’

पूजा का निचला होंठ जैसे दाँतो तले आकर कट गया। कहने लगी—‘‘तू हमेशा यह बृहस्पतिवार का वृत रखती है ?’’

‘‘हमेशा...आज के दिन नमक नहीं खाती, मन्दिर में गुण और चने का प्रसाद चढ़ाकर केवल वही खाती हूँ...बृहस्पति की कथा भी सुनती हूँ, जप का मन्त्र भी लिया हुआ है....और भी जो विधियाँ हैं...’’शबनम कह रही थी, जब पूजा ने प्यार से उसे अपनी बाँहों में ले लिया और पूछने लगी—‘‘और कौन-सी विधियाँ ?’’ शबनम हँस पड़ी, ‘‘यही कि आज के दिन कपड़े भी पीले ही रंग के होते हैं, उसी का दान देना और वही खाने....मन्त्र की माला जपने और वह भी सम में....इस माला के मोती दस, बारह या बीस की गिनती में होते हैं। ग्यारह, तेरह या इक्कीस की गिनती में नहीं—यानी जो गिनती—जोड़ी-जोड़ी से पूरी आए, उसका कोई मनका अकेला न रह जाए...’’

शबनम की आँखों में आँसू आने को थे कि वह ज़ोर से हँस पड़ी। कहने लगी, ‘‘इस जन्म में तो यह ज़िन्दगी का मनका अकेला रह गया है, पर शायद अगले जन्म में इसकी जोड़ी का मनका इसे मिल जाए...’’ और पूजा की ओर देखते हुए कहने लगी, ‘‘जिस तरह दुष्यन्त की अँगूठी दिखाकर शकुन्तला ने उसे याद कराया था—उसी तरह शायद अगले जन्म में मैं इस व्रत-नियम की अँगूठी दिखाकर उसे याद करा दूँगी कि मैं शकुन्तला हूँ...’’

पूजा की आँखे डबडबा आई ..आज से पहले उसने किसी के सामने ऐसे आँखे नहीं भरी थी कहने लगी तू जो शाप उतार रही है ,वह मैं चढ़ा रही हूँ ..मैंने इस जन्म में पति भी पाया ,पुत्र भी ..पर ..

सच तेरे पति को बिलकुल मालुम नहीं ? शबनम से हैरानी से पूछा बिलकुल पता नहीं ..जब मैंने यह कहा था की मुझे दूतावास में काम मिल गया है तब बहुत डर गयी थी जब उसने दूतावास का नाम पूछा था उस समय एक बात सूझ गयी मैंने कहा की मुझे एक जगह बैठने का काम नहीं मिला है काम इनदरेक्ट है मुझे कई कम्पनियों में जाना पड़ता है उनसे इश्तिहार लाने होते हैं ...जिन में इतनी कमीशन मिल जाती है जो ऑफिस में बैठने में नहीं मिलती ..पूजा ने बताया और कहने लगी वह बहुत बीमार था इस लिए हमेशा डाक्टरों और दवाई की बाते होती रहती थी ...फिर डाकटर ने उसको सोलन भेज दिया हस्पताल में क्यों की घर में रहने से बच्चो को बीमार होने का खतरा रहता ..इस लिए अभी तक शक का कोई मौका नहीं मिला उसको ...

शबनम ने कहा की कई लड़कियों ने जिन्होंने घर में बताया हुआ है वह किसी एक्सपोर्ट कंपनी में काम करती है उनके घर वाले सब जानते हैं पर चुप रहते हैं ... पूजा ने कहा अगर नरेंदर को पता चल जाये तो वह तो आत्महत्या कर लेगा वह जी नहीं पायेगा पर जब वह हस्पताल से वापस आएगा .और किसी दिन उसको कुछ पता चल गया तो .....शबनम की बात सुन कर पूजा कहने लगी कुछ पैसा इक्कठा हो जाए तो दो तीन रिक्शा किराए पर दाल दूंगी पैसे आ जायेंगे

शबनम ने यह सुन कर कहा की यह काम कोई आसान नहीं है वह दिन बीत गए जब यह मजदुर अपने मालिकों को कुछ कमा कर देते थे ..पूजा चिंता में डूब गयी ....तो शबनम ने कहा तुम्हे अगर यह धंधा छोड़ना भी है तो अभी इस साल मत सोचना यह १९८२ में सीजन का साल है शहर में ट्रेड फेयर लगने वाला है जितनी कमाई इस साल होगी उतनी पांच सालों में नहीं हो सकती है ...एक बार हाथ में पैसा इकट्ठा हो जाये ....

पूजा इस साल के पैसो की गिनती सी करने लगी ..जब मन्नू के जागने की आवाज़ आई तो वह जल्दी से दीवान से उठते हुए शबनम से बोली --तू जाना मत ,कुछ खा कर जाना .."और साथ ही हंस पड़ी ..तुम्हारे व्रत के खाने में नमक खाना मना है न , इसलिए किसी चीज में इस दुनिया का नमक नहीं डालूंगी ..."

एक जीवी, एक रत्नी, एक सपना : अमृता प्रीतम

पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने की ढेरी "पता नहीं तरकारी बेचनेवाली स्त्री का मुख कैसा था कि मुझे लगा पालक के पत्तों की सारी कोमलता, टमाटरों का सारा रंग और हरी मिर्चों की सारी खुशबू उसके चेहरे पर पुती हुई थी।

एक बच्चा उसकी झोली में दूध पी रहा था। एक मुठ्ठी में उसने माँ की चोली पकड़ रखी थी और दूसरा हाथ वह बार-बार पालक के पत्तों पर पटकता था। माँ कभी उसका हाथ पीछे हटाती थी और कभी पालक की ढेरी को आगे सरकाती थी, पर जब उसे दूसरी तरफ बढ़कर कोई चीज़ ठीक करनी पड़ती थी, तो बच्चे का हाथ फिर पालक के पत्तों पर पड़ जाता था। उस स्त्री ने अपने बच्चे की मुठ्ठी खोलकर पालक के पत्तों को छुडात़े हुए घूरकर देखा, पर उसके होठों की हँसी उसके चेहरे की सिल्वटों में से उछलकर बहने लगी। सामने पड़ी हुई सारी तरकारी पर जैसे उसने हँसी छिड़क दी हो और मुझे लगा, ऐसी ताज़ी सब्जी कभी कहीं उगी नहीं होगी।

कई तरकारी बेचनेवाले मेरे घर के दरवाज़े के सामने से गुज़रते थे। कभी देर भी हो जाती, पर किसी से तरकारी न ख़रीद सकती थी। रोज़ उस स्त्री का चेहरा मुझे बुलाता रहता था।

उससे खरीदी हुई तरकारी जब मैं काटती, धोती और पतीले में डालकर पकाने के लिए रखती-सोचती रहती, उसका पति कैसा होगा! वह जब अपनी पत्नी को देखता होगा, छूता होगा, तो क्या उसके होंठों में पालक का, टमाटरों का और हरी मिर्चों का सारा स्वाद घुल जाता होगा?

कभी-कभी मुझे अपने पर खीज होती कि इस स्त्री का ख़याल किस तरह मेरे पीछे पड़ गया था। इन दिनों मैं एक गुजराती उपन्यास पढ़ रही थी। इस उपन्यास में रोशनी की लकीर-जैसी एक लड़की थी-जीवी। एक मर्द उसको देखता है और उसे लगता है कि उसके जीवन की रात में तारों के बीज उग आए हैं। वह हाथ लम्बे करता है, पर तारे हाथ नहीं आते और वह निराश होकर जीवी से कहता है, "तुम मेरे गाँव में अपनी जाति के किसी आदमी से ब्याह कर लो। मुझे दूर से सूरत ही दिखती रहेगी।" उस दिन का सूरज जब जीवी देखता है, तो वह इस तरह लाल हो जाता है, जैसे किसी ने कुँवारी लड़की को छू लिया हो कहानी के धागे लम्बे हो जाते हैं, और जीवी के चेहरे पर दु:खों की रेखाएँ पड़ जाती हैं इस जीवी का ख़याल भी आजकल मेरे पीछे पड़ा हुआ था, पर मुझे खीज नहीं होती थीं, वे तो दु:खों की रेखाएँ थीं, वही रेखाएँ जो मेरे गीतों में थीं, और रेखाएँ रेखाओं में मिल जाती हैं पर यह दूसरी जिसके होठों पर हँसी की बूँदे थीं, केसर की तुरियाँ थीं।

दूसरे दिन मैंने अपने पाँवों को रोका कि मैं उससे तरकारी ख़रीदने नहीं जाऊँगी। चौकीदार से कहा कि यहाँ जब तरकारी बेचनेवाला आए तो मेरा दरवाज़ा खटखटाना दरवाजे पर दस्तक हुई। एक-एक चीज़ को मैंने हाथ लगाकर देखा। आलू-नरम और गड्डों वाले। फरसबीन-जैसे फलियों के दिल सूख गए हों। पालक-जैसे वह दिन-भर की धूल फाँककर बेहद थक गई हो। टमाटर-जैसे वे भूख के कारण बिलखते हुए सो गए हो। हरी मिर्चें-जैसे किसी ने उनकी साँसों में से खुशबू निकाल ली हो, मैंने दरवाज़ा बन्द कर लिया। और पाँव मेरे रोकने पर भी उस तरकारी वाली की ओर चल पड़े।

आज उसके पास उसका पति भी था। वह मंडी से तरकारी लेकर आया था और उसके साथ मिलकर तरकारियों को पानी से धोकर अलग-अलग रख रहा था और उनके भाव लगा रहा था। उसकी सूरत पहचानी-सी थी इसे मैंने कब देखा था, कहाँ देखा था- एक नयी बात पीछे पड़ गई।

"बीबी जी, आप!"

"मैं पर मैंने तुम्हें पहचाना नहीं।"

"इसे भी नहीं पहचाना? यह रत्नी!"

"माणकू रत्नी।" मैंने अपनी स्मृतियों में ढूँढ़ा, पर माणकू और रत्नी कहीं मिल नहीं रहे थे।

"तीन साल हो गए हैं, बल्कि महीना ऊपर हो गया है। एक गाँव के पास क्या नाम था उसका आपकी मोटर खराब हो गई थी।"

"हाँ, हुई तो थी।"

"और आप वहाँ से गुज़रते हुए एक ट्रक में बैठकर धुलिया आए थे, नया टायर ख़रीदने के लिए।"

"हाँ-हाँ।" और फिर मेरी स्मृति में मुझे माणकू और रत्नी मिल गए।

रत्नी तब अधखिली कली-जैसी थी और माणकू उसे पराए पौधे पर से तोड़ लाया था। ट्रक का ड्राइवर माणकू का पुराना मित्र था। उसने रत्नी को लेकर भागने में माणकू की मदद की थी। इसलिए रास्ते में वह माणकू के साथ हँसी-मज़ाक करता रहा।

रास्ते के छोटे-छोटे गाँवों में कहीं ख़रबूजे बिक रहे होते, कहीं ककड़ियाँ, कहीं तरबूज़! और माणकू का मित्र माणकू से ऊँची आवाज़ में कहता, "बड़ी नरम हैं, ककडियाँ ख़रीद ले। तरबूज तो सुर्ख लाल हैं और खरबूजा बिलकुल मिश्री है ख़रीदना नहीं है तो छीन ले वाह रे रांझे!"

'अरे, छोड़ मुझे रांझा क्यों कहता है? रांझा साला आशिक था कि नाई था? हीर की डोली के साथ भैंसें हाँककर चल पड़ा। मैं होता न कहीं।'

'वाह रो माणकू! तू तो मिर्ज़ा है मिर्ज़ा!'

'मिर्ज़ा तो हूँ ही, अगर कहीं साहिबाँ ने मरवा न दिया तो!' और फिर माणकू अपनी रत्नी को छेड़ता, 'देख रत्नी, साहिबाँ न बनना, हीर बनना।'

'वाह रे माणकू, तू मिर्ज़ा और यह हीर! यह भी जोड़ी अच्छी बनी!' आगे बैठा ड्राइवर हँसा।

इतनी देर में मध्यप्रदेश का नाका गुज़र गया और महाराष्ट्र की सीमा आ गई। यहाँ पर हर एक मोटर, लॉरी और ट्रक को रोका जाता था। पूरी तलाशी ली जाती थी कि कहीं कोई अफ़ीम, शराब या किसी तरह की कोई और चीज़ तो नहीं ले जा रहा। उस ट्रक की भी तलाशी ली गई। कुछ न मिला और ट्रक को आगे जाने के लिए रास्ता दे दिया गया। ज्यों ही ट्रक आगे बढ़ा, माणकू बेतहाशा हँस दिया।

'साले अफ़ीम खोजते हैं, शराब खोजते हैं। मैं जो नशे की बोतल ले जा रहा हूँ, सालों को दिखी ही नहीं।'

और रत्नी पहले अपने आप में सिकुड़ गई और फिर मन की सारी पत्तियों को खोलकर कहने लगी,

'देखना, कहीं नशे की बोतल तोड़ न देना! सभी टुकड़े तुम्हारे तलवों में उतर जाएँगे।'

'कहीं डूब मर!'

'मैं तो डूब जाऊँगी, तुम सागर बन जाओ!'

मैं सुन रही थी, हँस रही थी और फिर एक पीड़ा मेरे मन में आई, 'हाय री स्त्री, डूबने के लिए भी तैयार है, यदि तेरा प्रिय एक सागर हो!'

फिर धुलिया आ गया। हम ट्रक में से उतर गए और कुछ मिनट तक एक ख़याल मेरे मन को कुरेदता रहा- यह 'रत्नी' एक अधखिली कली-जैसी लड़की। माणकू इसे पता नहीं कहाँ से तोड़ लाया था। क्या इस कली को वह अपने जीवन में महकने देगा? यह कली कहीं पाँवों में ही तो नहीं मसली जाएगी?

पिछले दिनों दिल्ली में एक घटना हुई थी। एक लड़की को एक मास्टर वायलिन सिखाया करता था और फिर दोनों ने सोचा कि वे बम्बई भाग जाएँ। वहाँ वह गाया करेगी, वह वायलिन बजाया करेगा। रोज़ जब मास्टर आता, वह लड़की अपना एक-आध कपड़ा उसे पकड़ा देती और वह उसे वायलिन के डिब्बे में रखकर ले जाता। इस तरह लगभग महीने-भर में उस लड़की ने कई कपड़े मास्टर के घर भेज दिए और फिर जब वह अपने तीन कपड़ों में घर से निकली, किसी के मन में सन्देह की छाया तक न थी। और फिर उस लड़की का भी वही अंजाम हुआ, जो उससे पहले कई और लड़कियों का हो चुका था और उसके बाद कई और लड़कियों का होना था। वह लड़की बम्बई पहुँचकर कला की मूर्ती नहीं, कला की कब्र बन गई, और मैं सोच रही थी, यह रत्नी यह रत्नी क्या बनेगी?

आज तीन वर्ष बाद मैंने रत्नी को देखा। हँसी के पानी से वह तरकारियों को ताज़ा कर रही थी, 'पालक एक आने गठ्ठी, टमाटर छह आने रत्तल और हरी मिर्चें एक आने ढेरी।' और उसके चेहरे पर पालक की सारी कोमलता, टमाटरों का सारा रंग और हरी मिर्चों की सारी खुशबू पुती हुई थी।

जीवी के मुख पर दु:खों की रेखाएँ थीं - वहीं रेखाएँ, जो मेरे गीतों में थीं और रेखाएँ रेखाओं में मिल गई थीं।

रत्नी के मुख पर हँसी की बूँदे थीं- वह हँसी, जब सपने उग आएँ, तो ओस की बूँदों की तरह उन पत्तियों पर पड़ जाती है; और वे सपने मेरे गीतों के तुकान्त बनते थे।

जो सपना जीवी के मन में था, वही सपना रत्नी के मन में था। जीवी का सपना एक उपन्यास के आँसू बन गया और रत्नी का सपना गीतों के तुकान्त तोड़ कर आज उसकी झोली में दूध पी रहा था।

शाह की कंजरी : अमृता प्रीतम

उसे अब नीलम कोई नहीं कहता था। सब शाह की कंजरी कहते थे।

नीलम को लाहौर हीरामंडी के एक चौबारे में जवानी चढ़ी थी। और वहां ही एक रियासती सरदार के हाथों पूरे पांच हजार में उसकी नथ उतरी थी। और वहां ही उसके हुस्न ने आग जला कर सारा शहर झुलसा दिया था। पर फिर वह एक दिन हीरा मंडी का रास्ता चौबारा छोड़ कर शाहर के सबसे बड़े होटल फ्लैटी में आ गयी थी। वही शहर था, पर सारा शहर जैसे रातों रात उसका नाम भूल गया हो, सबके मुंह से सुनायी देता था -शाह की कंजरी।

गजब का गाती थी। कोई गाने वाली उसकी तरह मिर्जे की सद नहीं लगा सकती थी। इसलिये चाहे लोग उसका नाम भूल गये थे पर उसकी आवाज नहीं भूल सके। शहर में जिसके घर भी तवे वाला बाजा था, वह उसके भरे हुए तवे जरूर खरीदता था। पर सब घरों में तवे की फरमायिश के वक्त हर कोई यह जरूर कहता था "आज शाह की कंजरी वाला तवा जरूर सुनना है।"

लुकी छिपी बात नहीं थी। शाह के घर वालों को भी पता था। सिर्फ पता ही नहीं था, उनके लिये बात भी पुरानी हो चुकी थी। शाह का बड़ा लड़का जो अब ब्याहने लायक था, जब गोद में था तो सेठानी ने जहर खाके मरने की धमकी दी थी, पर शाह ने उसके गले में मोतियों का हार पहना कर उससे कहा था, "शाहनिये! वह तेरे घर की बरकत है। मेरी आंख जोहरी की आंख है, तूने सुना हुआ नहीं है कि नीलम ऐसी चीज होता है, जो लाखों को खाक कर देता है और खाक को लाख बनाता है। जिसे उलटा पड़ जाये, उसके लाख के खाक बना देता है। और जिसे सीधा पड़ जाये उसे खाक से लाख बना देता है। वह भी नीलम है, हमारी राशि से मिल गया है। जिस दिन से साथ बना है, मैं मिट्टी में हाथ डालूं तो सोना हो जाती है।

"पर वही एक दिन घर उजाड़ देगी, लाखों को खाक कर देगी," शाहनी ने छाती की साल सहकर उसी तरफ से दलील दी थी, जिस तरफ से शाह ने बत चलायी थी। " मैं तो बल्कि डरता हूं कि इन कंजरियों का क्या भरोसा, कल किसी और ने सब्ज़बाग दिखाये, और जो वह हाथों से निकल गयी, तो लाख से खाक बन जाना है।" शाह ने फिर अपनी दलील दी थी।

और शाहनी के पास और दलील नहीं रह गयी थी। सिर्फ वक़्त के पास रह गयी थी, और वक़्त चुप था, कई बरसों से चुप था। शाह सचमुच जितने रुपये नीलम पर बहाता, उससे कई गुणा ज्यादा पता नहीं कहां कहां से बह कर उसके घर आ जाते थे। पहले उसकी छोटी सी दुकान शहर के छोटे से बाजार में होती थी, पर अब सबसे बड़े बाजार में, लोहे के जंगले वाली, सबसे बड़ी दुकान उसकी थी। घर की जगह पूरा महल्ला ही उसका था, जिसमें बड़े खाते पीते किरायेदार थे। और जिसमें तहखाने वाले घर को शाहनी एक दिन के लिये भी अकेला नहीं छोड़ती थी।

बहुत बरस हुए, शाहनी ने एक दिन मोहरों वाले ट्रंक को ताला लगाते हुए शाह से कहा था, " उसे चाहे होटाल में रखो और चाहे उसे ताजमहल बनवा दो, पर बाहर की बला बाहर ही रखो, उसे मेरे घर ना लाना। मैं उसके माथे नहीं लगूंगी।"

और सचमुच शाहनी ने अभी तक उसका मूंह नहीं देखा था। जब उसने यह बात कही थी, उसका बड़ा लड़का स्कूल में पढ़ता था, और अब वह ब्याहने लायक हो गया था, पर शाहनी ने ना उसके गाने वाले तवे घर में आने दिये, और ना घर में किसी को उसका नाम लेने दिया था।

वैसे उसके बेटे ने दुकान दुकान पर उसके गाने सुन रखे थे, और जने जने से सुन रखा था- "शाह की कंजरी। "

बड़े लड़के का ब्याह था। घर पर चार महीने से दर्जी बैठे हुए थे, कोई सूटों पर सलमा काढ़ रहा था, कोई तिल्ला, कोई किनारी, और कोई दुप्पटे पर सितारे जड़ रहा था। शाहनी के हाथ भरे हुए थे - रुपयों की थैली निकालती, खोलती, फिर और थैली भरने के लिये तहखाने में चली जाती।

शाह के यार दोस्तों ने शाह की दोस्ती का वास्ता डाला कि लड़के के ब्याह पर कंजरी जरूर गंवानी है। वैसे बात उन्होंने ने बड़े तरीके से कही थी ताकी शाह कभी बल ना खा जाये, " वैसे तो शाहजी कॊ बहुतेरी गाने नाचनेवाली हैं, जिसे मरजी हो बुलाओ। पर यहां मल्लिकाये तर्रन्नुम जरूर आये, चाहे मिरजे़ की एक ही ’सद’ लगा जाये।"

फ्लैटी होटल आम होटलों जैसा नहीं था। वहां ज्यादातर अंग्रेज़ लोग ही आते और ठहरते थे। उसमें अकेले अकेले कमरे भी थे, पर बड़े बड़े तीन कमरों के सेट भी। ऐसे ही एक सेट में नीलम रहती थी। और शाह ने सोचा - दोस्तों यारों का दिल खुश करने के लिये वह एक दिन नीलम के यहां एक रात की महफिल रख लेगा।

"यह तो चौबारे पर जाने वाली बात हुई," एक ने उज्र किया तो सारे बोल पड़े," नहीं, शाह जी! वह तो सिर्फ तुम्हारा ही हक बनता है। पहले कभी इतने बरस हमने कुछ कहा है? उस जगह का नाम भी नहीं लिया। वह जगह तुम्हारी अमानत है। हमें तो भतीजे के ब्याह की खुशी मनानी है, उसे खानदानी घरानों की तरह अपने घर बुलाओ, हमारी भाभी के घर।"

बात शाह के मन भा गयी। इस लिये कि वह दोस्तों यारों को नीलम की राह दिखाना नहीं चाहता था (चाहे उसके कानों में भनक पड़ती रहती थी कि उसकी गैरहाजरी में कोई कोई अमीरजादा नीलम के पास आने लगा था।) - दूसरे इस लिये भी कि वह चाहता था, नीलम एक बार उसके घर आकर उसके घर की तड़क भड़क देख जाये। पर वह शाहनी से डरता था, दोस्तों को हामी ना भार सका।

दोस्तों यारों में से दो ने राह निकाली और शाहनी के पास जाकर कहने लगे, " भाभी तुम लड़के की शादी के गीत नहीं गवांओगी? हम तो सारी खुशियां मनायेंगे। शाह ने सलाह की है कि एक रात यारों की महफिल नीलम की तरफ हो जाये। बात तो ठीक है पर हजारों उजड़ जायेंगे। आखिर घर तो तुम्हारा है, पहले उस कंजरी को थोड़ा खिलाया है? तुम सयानी बनो, उसे गाने बजाने के लिये एक दिन यहां बुला लो। लड़के के ब्याह की खुशी भी हो जायेगी और रुपया उजड़ने से बच जायेगा।"

शाहनी पहले तो भरी भरायी बोली, "मैं उस कंजरी के माथे नहीं लगना चाहती," पर जब दूसरों ने बड़े धीरज से कहा, "यहां तो भाभी तुम्हारा राज है, वह बांदी बन कर आयेगी, तुम्हारे हुक्म में बधीं हुई, तुम्हारे बेटे की खुशी मनाने के लिये। हेठी तो उसकी है, तुम्हारी काहे की? जैसे कमीन कुमने आये, डोम मरासी, तैसी वह।"

बात शाहनी के मन भा गयी। वैसे भी कभी सोते बैठते उसे ख्याल आता था- एक बार देखूं तो सही कैसी है?

उसने उसे कभी देखा नहीं था पर कल्पना जरूर थी - चाहे डर कर, सहम कर, चहे एक नफरत से। और शहर में से गुजरते हुए, अगर किसी कंजरी को टांगे में बैठते देखती तो ना सोचते हुए ही सोच जाती - क्या पता, वही हो?

"चलो एक बार मैं भी देख लूं,"वह मन में घुल सी गयी, " जो उसको मेरा बिगाड़ना था, बिगाड़ लिया, अब और उसे क्या कर लेना है! एक बार चन्दरा को देख तो लूं।"

शाहनी ने हामी भर दी, पर एक शर्त रखी - "यहां ना शराब उड़ेगी, ना कबाब। भले घरों में जिस तरह गीत गाये जाते हैं, उसी तरह गीत करवाउंगी। तुम मर्द मानस भी बैठ जाना। वह आये और सीधी तरह गा कर चली जाये। मैं वही चार बतासे उसकी झोली में भी डाल दूंगी जो ओर लड़के लड़कियों को दूंगी, जो बन्ने, सहरे गायेंगी।"

"यही तो भाभी हम कहते हैं।" शाह के दोस्तों नें फूंक दी, "तुम्हारी समझदारी से ही तो घर बना है, नहीं तो क्या खबर क्या हो गुजरना था।"

वह आयी। शाहनी ने खुद अपनी बग्गी भेजी थी। घर मेहेमानों से भरा हुआ था। बड़े कमरे में सफेद चादरें बिछा कर, बीच में ढोलक रखी हुई थी। घर की औरतों नें बन्ने सेहरे गाने शुरू कर रखे थे...।

बग्गी दरवाजे पर आ रुकी, तो कुछ उतावली औरतें दौड़ कर खिड़की की एक तरफ चली गयीं और कुछ सीढ़ियों की तरफ...।

"अरी, बदसगुनी क्यों करती हो, सहरा बीच में ही छोड़ दिया।" शाहनी ने डांट सी दी। पर उसकी आवाज़ खुद ही धीमी सी लगी। जैसे उसके दिल पर एक धमक सी हुयी हो...।

वह सीढ़ियां चढ़ कर दरवाजे तक आ गयी थी। शाहनी ने अपनी गुलाबी साड़ी का पल्ला संवारा, जैसे सामने देखने के लिये वह साड़ी के शगुन वाले रंग का सहारा ले रही हो...।

सामने उसने हरे रंग का बांकड़ीवाला गरारा पहना हुआ था, गले में लाल रंग की कमीज थी और सिर से पैर तक ढलकी हुयी हरे रेशम की चुनरी। एक झिलमिल सी हुयी। शाहनी को सिर्फ एक पल यही लगा - जैसे हरा रंग सारे दरवाजे़ में फैल गया था।

फिर हरे कांच की चूड़ियों की छन छन हुयी, तो शाहनी ने देखा एक गोरा गोरा हाथ एक झुके हुए माथे को छू कर आदाब बजा़ रहा है, और साथ ही एक झनकती हुई सी आवाज़ - "बहुत बहुत मुबारिक, शाहनी! बहुत बहुत मुबारिक..."

वह बड़ी नाजुक सी, पतली सी थी। हाथ लगते ही दोहरी होती थी। शाहनी ने उसे गाव-तकिये के सहारे हाथ के इशारे से बैठने को कहा, तो शाहनी को लगा कि उसकी मांसल बांह बड़ी ही बेडौल लग रही थी...।

कमरे के एक कोने में शाह भी था। दोस्त भी थे, कुछ रिश्तेदार मर्द भी। उस नाजनीन ने उस कोने की तरफ देख कर भी एक बार सलाम किया, और फिर परे गाव-तकिये के सहारे ठुमककर बैठ गयी। बैठते वक्त कांच की चूड़िया फिर छनकी थीं, शाहनी ने एक बार फिर उसकी बाहों को देखा, हरे कांच की और फिर स्वभाविक ही अपनी बांह में पड़े उए सोने के चूड़े को देखने लगी....

कमरे में एक चकाचौध सी छा गयी थी। हरएक की आंखें जैसे एक ही तरफ उलट गयीं थीं, शाहनी की अपनी आंखें भी, पर उसे अपनी आंखों को छोड़ कर सबकी आंखों पर एक गुस्सा-सा आ गया...

वह फिर एक बार कहना चाहती थी - अरी बदशुगनी क्यों करती हो? सेहरे गाओ ना ...पर उसकी आवाज गले में घुटती सी गयी थी। शायद ओरों की आवाज भी गले में घुट सी गयी थी। कमरे में एक खामोशी छा गयी थी। वह अधबीच रखी हुई ढोलक की तरफ देखने लगी, और उसका जी किया कि वह बड़ी जोर से ढोलक बजाये.....

खामोशी उसने ही तोड़ी जिसके लिये खामोशी छायी थी। कहने लगी, " मैं तो सबसे पहले घोड़ी गाऊंगी, लड़के का ’सगन’ करुंगी, क्यों शाहनी?" और शाहनी की तरफ ताकती, हंसती हुई घोड़ी गाने लगी, "निक्की निक्की बुंदी निकिया मींह वे वरे, तेरी मां वे सुहागिन तेरे सगन करे...."

शाहनी को अचानक तस्सली सी हुई - शायद इसलिये कि गीत के बीच की मां वही थी, और उसका मर्द भी सिर्फ उसका मर्द था - तभी तो मां सुहागिन थी....

शाहनी हंसते से मुंह से उसके बिल्कुल सामने बैठ गयी -जो उस वक्त उसके बेटे के सगन कर रही थी...

घोड़ी खत्म हुई तो कमरे की बोलचाल फिर से लौट आयी। फिर कुछ स्वाभाविक सा हो गया। औरतों की तरफ से फरमाईश की गयी - "डोलकी रोड़ेवाला गीत।" मर्दों की तरफ से फरमाइश की गयी "मिरजे़ दियां सद्दां।"

गाने वाली ने मर्दों की फरमाईश सुनी अनसुनी कर दी, और ढोलकी को अपनी तरफ खींच कर उसने ढोलकी से अपना घुटना जोड़ लिया। शाहनी कुछ रौ में आ गयी - शायद इस लिये कि गाने वाली मर्दों की फरमाईश पूरी करने के बजाये औरतों की फरमाईश पूरी करने लगी थी...

मेहमान औरतों में से शायद कुछ एक को पता नहीं था। वह एक दूसरे से कुछ पूछ रहीं थीं, और कई उनके कान के पास कह रहीं थीं - "यही है शाह की कंजरी..."

कहनेवालियों ने शायद बहुत धीरे से कहा था - खुसरफुसर सा, पर शाहनी के कान में आवाज़ पड़ रही थी, कानों से टकरा रही थी - शाह की कंजरी.....शाह की कंजरी.....और शाहनी के मूंह का रंग फीका पड़ गया।

इतने में ढोलक की आवाज ऊंची हो गयी और साथ ही गाने वाली की आवाज़, "सुहे वे चीरे वालिया मैं कहनी हां...." और शाहनी का कलेजा थम सा गया -- वह सुहे चीरे वाला मेरा ही बेटा है, सुख से आज घोड़ी पर चढ़नेवाला मेरा बेटा...

फरमाइश का अंत नहीं था। एक गीत खत्म होता, दूसरा गीत शुरू हो जाता। गाने वाली कभी औरतों की तरफ की फरमाईश पूरी करती, कभी मर्दों की। बीच बीच में कह देती, "कोई और भी गाओ ना, मुझे सांस दिला दो।" पर किसकी हिम्मत थी, उसके सामने होने की, उसकी टल्ली सी आवाज़ .....वह भी शायद कहने को कह रही थी, वैसे एक के पीछे झट दूसरा गीत छेड़ देती थी।

गीतों की बात और थी पर जब उसने मिरजे की हेक लगायी, "उठ नी साहिबा सुत्तिये! उठ के दे दीदार..." हवा का कलेजा हिल गया। कमरे में बैठे मर्द बुत बन गये थे। शाहनी को फिर घबराहट सी हुई, उसने बड़े गौर से शाह के मुख की तरफ देखा। शाह भी और बुतों सरीखा बुत बना हुआ था, पर शाहनी को लगा वह पत्थर का हो गया था...

शाहनी के कलेजे में हौल सा हुआ, और उसे लगा अगर यह घड़ी छिन गयी तो वह आप भी हमेशा के लिये बुत बन जायेगी... वह करे, कुछ करे, कुछ भी करे, पर मिट्टी का बुत ना बने...

काफी शाम हो गयी, महफिल खत्म होने वाली थी...

शाहनी का कहना था, आज वह उसी तरह बताशे बांटेगी, जिस तरह लोग उस दिन बांटते हैं जिस दिन गीत बैठाये जाते हैं। पर जब गाना खत्म हुआ तो कमरे में चाय और कई तरह की मिठायी आ गयी...

और शाहनी ने मुट्ठी में लपेटा हुआ सौ का नोट निकाल कर, अपने बेटे के सिर पर से वारा, और फिर उसे पकड़ा दिया, जिसे लोग शाह की कंजरी कहते थे।

"रहेने दे, शाहनी! आगे भी तेरा ही खाती हूं।" उसने जवाब दिया और हंस पड़ी। उसकी हंसी उसके रूप की तरह झिलमिल कर रही थी।

शाहनी के मुंह का रंग हल्का पड़ गया। उसे लगा, जैसे शाह की कंजरी ने आज भरी सभा में शाह से अपना संबंध जोड़ कर उसकी हतक कर दी थी। पर शाहनी ने अपना आप थाम लिया। एक जेरासा किया कि आज उसने हार नहीं खानी थी। वह जोर से हंस पड़ी। नोट पकड़ाती हुई कहने लगी, "शाह से तो तूने नित लेना है, पर मेरे हाथ से तूने फिर कब लेना है? चल आज ले ले..."

और शाह की कंजरी नोट पकड़ती हुई, एक ही बार में हीनी सी हो गयी...

कमरे में शाहनी की साड़ी का सगुनवाल गुलाबी रंग फैल गया... 

जंगली बूटी : अमृता प्रीतम

अंगूरी, मेरे पड़ोसियों के पड़ोसियों के पड़ोसियों के घर, उनके बड़े ही पुराने नौकर की बिल्कुल नई बीवी है। एक तो नई इस बात से कि वह अपने पति की दूसरी बीवी है, सो उसका पति ‘दुहाजू’ हुआ। जू का मतलब अगर ‘जून’ हो तो इसका मतलब निकला ‘दूसरी जून में पड़ा चुका आदमी’, यानी दूसरे विवाह की जून में, और अंगूरी क्योंकि अभी विवाह की पहली जून में ही है, यानी पहली विवाह की जून में, इसलिए नई हुई। और दूसरे वह इस बात से भी नई है कि उसका गौना आए अभी जितने महीने हुए हैं, वे सारे महीने मिलकर भी एक साल नहीं बनेंगे।

पाँच-छह साल हुए, प्रभाती जब अपने मालिकों से छुट्टी लेकर अपनी पहली पत्नी की ‘किरिया’ करने के लिए गाँव गया था, तो कहते हैं कि किरिया वाले दिन इस अंगूरी के बाप ने उसका अंगोछा निचोड़ दिया था। किसी भी मर्द का यह अँगोछा भले ही पत्नी की मौत पर आंसुओं से नहीं भीगा होता, चौथे दिन या किरिया के दिन नहाकर बदन पोंछने के बाद वह अँगोछा पानी से ही भीगा होता है, इस पर साधारण-सी गाँव की रस्म से किसी और लड़की का बाप उठकर जब यह अँगोछा निचोड़ देता है तो जैसे कह रहा होता है—‘‘उस मरनेवाली की जगह मैं तुम्हें अपनी बेटी देता हूँ और अब तुम्हें रोने की ज़रूरत नहीं, मैंने तुम्हारा आँसुओं भीगा हुआ अँगोछा भी सुखा दिया है।’’

इस तरह प्रभाती का इस अंगूरी के साथ दूसरा विवाह हो गया था। पर एक तो अंगूरी अभी आयु की बहुत छोटी थी, और दूसरे अंगूरी की माँ गठिया के रोग से जुड़ी हुई थी इसलिए भी गौने की बात पाँच सालों पर जा पड़ी थी... फिर एक-एक कर पाँच साल भी निकल गए थे और इस साल जब प्रभाती अपने मालिकों से छु्ट्टी लेकर अपने गाँव गौना लेने गया था तो अपने मालिकों को पहले ही कह गया था कि या तो वह बहू को भी साथ लाएगा और शहर में अपने साथ रखेगा, या फिर वह भी गांव से नहीं लौटेगा। मालिक पहले तो दलील करने लगे थे कि एक प्रभाती की जगह अपनी रसोई में से वे दो जनों की रोटी नहीं देना चाहते थे। पर जब प्रभाती ने यह बात कही कि वह कोठरी के पीछे वाली कच्ची जगह को पोतकर अपना चूल्हा बनाएगी, अपना पकाएगी, अपना खाएगी तो उसके मालिक यह बात मान गये थे। सो अंगूरी शहर आ गयी थी। चाहे अंगूरी ने शहर आकर कुछ दिन मुहल्ले के मर्दों से तो क्या औरतों से भी घूँघट न उठाया था, पर फिर धीरे-धीरे उसका घूँघट झीना हो गया था। वह पैरों में चाँदी के झाँझरें पहनकर छनक-छनक करती मुहल्ले की रौनक बन गयी थी। एक झाँझर उसके पाँवों में पहनी होती, एक उसकी हँसी में। चाहे वह दिन के अधिकरतर हिस्सा अपनी कोठरी में ही रहती थी पर जब भी बाहर निकलती, एक रौनक़ उसके पाँवों के साथ-साथ चलती थी।

‘‘यह क्या पहना है, अंगूरी ?’’

‘‘यह तो मेरे पैरों की छैल चूड़ी है।’’

‘‘और यह उँगलियों में ?’’

‘‘यह तो बिछुआ है।’’

‘‘और यह बाहों में ?’’

‘‘यह तो पछेला है।’’

‘‘और माथे पर ?’’

‘‘आलीबन्द कहते हैं इसे।’’

‘‘आज तुमने कमर में कुछ नहीं पहना ?’’

‘‘तगड़ी बहुत भारी लगती है, कल को पहनूंगी। आज तो मैंने तौक भी नहीं पहना। उसका टाँका टूट गया है कल शहर में जाऊँगी, टाँका भी गढ़ाऊँगी और नाक कील भी लाऊँगी। मेरी नाक को नकसा भी था, इत्ता बड़ा, मेरी सास ने दिया नहीं।’’

इस तरह अंगूरी अपने चाँदी के गहने एक नख़रे से पहनती थी, एक नखरे से दिखाती थी।

पीछे जब मौसम फिरा था, अंगूरी का अपनी छोटी कोठरी में दम घुटने लगा था। वह बहुत बार मेरे घर के सामने आ बैठती थी। मेरे घर के आगे नीम के बड़े-बड़े पेड़ हैं, और इन पेड़ों के पास ज़रा ऊँची जगह पर एक पुराना कुआँ है। चाहे मुहल्ले का कोई भी आदमी इस कुएँ से पानी नहीं भरता, पर इसके पार एक सरकारी सड़क बन रही है और उस सड़क के मज़दूर कई बार इस कुएँ को चला लेते हैं जिससे कुएँ के गिर्द अकसर पानी गिरा होता है और यह जगह बड़ी ठण्डी रहती है।

‘‘क्या पढ़ती हो बीबीजी ?’’ एक दिन अंगूरी जब आयी, मैं नीम के पेड़ों के नीचे बैठकर एक किताब पढ़ रही थी।

‘‘तुम पढ़ोगी ?’’

‘‘मेरे को पढ़ना नहीं आता।’’

‘‘सीख लो।’’

‘‘ना।’’

‘‘क्यों ?’’

‘‘औरतों को पाप लगता है पढ़ने से।’’

‘‘औरतों को पाप लगता है, मर्द को नहीं लगता ?’’

‘‘ना, मर्द को नहीं लगता ?’’

‘‘यह तुम्हें किसने कहा है ?"

‘‘मैं जानती हूँ।’’

"फिर तो मैं पढ़ती हूँ मुझे पाप लगेगा?’’

‘‘सहर की औरत को पाप नहीं लगता, गांव की औरत को पाप लगता है।’’

मैं भी हँस पड़ी और अंगूरी भी। अंगूरी ने जो कुछ सीखा-सुना हुआ था, उसमें कोई शंका नहीं थी, इसलिए मैंने उससे कुछ न कहा। वह अगर हँसती-खेलती अपनी जिन्दगी के दायरे में सुखी रह सकती थी, तो उसके लिए यही ठीक था। वैसे मैं अंगूरी के मुँह की ओर ध्यान लगाकर देखती रही। गहरे साँवले रंग में उसके बदन का मांस गुथा हुआ था। कहते हैं—औरत आटे की लोई होती है। पर कइयों के बदन का मांस उस ढीले आटे की तरह होता है जिसकी रोटी कभी भी गोल नहीं बनती, और कइयों के बदन का मांस बिलकुल ख़मीरे आटे जैसा, जिसे बेलने से फैलाया नहीं जा सकता। सिर्फ़ किसी-किसी के बदन का मांस इतना सख़्त गुँथा होता है कि रोटी तो क्या चाहे पूरियाँ बेल लो।...मैं अंगूरी के मुँह की ओर देखती रही, अंगूरी की छाती की ओर, अंगूरी की पिण्डलियों की ओर... वह इतने सख़्त मैदे की तरह गुथी हुई थी कि जिससे मठरियाँ तली जा सकती थीं और मैंने इस अंगूरी का प्रभाती भी देखा हुआ था, ठिगने क़द का, ढलके हुए मुँह का, कसोरे जैसा और फिर अंगूरी के रूप की ओर देखकर उसके ख़ाविन्द के बारे में एक अजीब तुलना सूझी कि प्रभाती असल में आटे की इस घनी गुथी लोई को पकाकर खाने का हक़दार नहीं—वह इस लोई को ढककर रखने वाला कठवत है। इस तुलना से मुझे खुद ही हंसी आ गई। पर मैंने अंगूरी को इस तुलना का आभास नहीं होने देना चाहती थी। इसलिए उससे मैं उसके गाँव की छोटी-छोटी बातें करने लगी।

माँ-बाप की, बहन-भाइयों की, और खेतों-खलिहानों की बातें करते हुए मैंने उससे पूछा, ‘‘अंगूरी, तुम्हारे गांव में शादी कैसे होती है ?’’

‘‘लड़की छोटी-सी होती है। पाँच-सात साल की, जब वह किसी के पाँव पूज लेती है।’’

‘‘कैसे पूजती है पाँव?’’

‘‘लड़की का बाप जाता है, फूलों की एक थाली ले जाता है, साथ में रुपये, और लड़के के आगे रख देता है।’’

‘‘यह तो एक तरह से बाप ने पाँव पूज लिये। लड़की ने कैसे पूजे ?’’

‘‘लड़की की तरफ़ से तो पूजे।’’

‘‘पर लड़की ने तो उसे देखा भी नहीं?’’

‘‘लड़कियाँ नहीं देखतीं।’’

‘‘लड़कियाँ अपने होने वाला ख़ाविन्द को नहीं देखतीं।’’

‘‘ना’’

‘‘कोई भी लड़की नहीं देखती?’’

‘‘ना’’

पहले तो अंगूरी ने ‘ना’ कर दी पर फिर कुछ सोच-सोचकर कहने लगी, ‘‘जो लड़कियाँ प्रेम करती हैं, वे देखती हैं।’’

‘‘तुम्हारे गाँव में लड़कियाँ प्रेम करती हैं?’’

‘‘कोई-कोई’’

‘‘जो प्रेम करती हैं, उनको पाप नहीं लगता?’’ मुझे असल में अंगूरी की वह बात स्मरण हो आयी थी कि औरत को पढ़ने से पाप लगता है। इसलिए मैंने सोचा कि उस हिसाब से प्रेम करने से भी पाप लगता होगा।

‘‘पाप लगता है, बड़ा पाप लगता है।’’ अंगूरी ने जल्दी से कहा।

‘‘अगर पाप लगता है तो फिर वे क्यों प्रेम करती हैं ?’’

‘‘जे तो...बात यह होती है कि कोई आदमी जब किसी की छोकरी को कुछ खिला देता है तो वह उससे प्रेम करने लग जाती है।’’

‘‘कोई क्या खिला देता है उसको?’’

‘‘एक जंगली बूटी होती है। बस वही पान में डालकर या मिठाई में डाल कर खिला देता है। छोकरी उससे प्रेम करने लग जाती है। फिर उसे वही अच्छा लगता है, दुनिया का और कुछ भी अच्छा नहीं लगता।’’

‘‘सच?’’

‘‘मैं जानती हूँ, मैंने अपनी आँखों से देखा है।’’

‘‘किसे देखा था ?’’

‘‘मेरी एक सखी थी। इत्ती बड़ी थी मेरे से।’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या? वह तो पागल हो गयी उसके पीछे। सहर चली गयी उसके साथ।’’

‘‘यह तुम्हें कैसे मालूम है कि तेरी सखी को उसने बूटी खिलाई थी ?’’

‘‘बरफी में डालकर खिलाई थी। और नहीं तो क्या, वह ऐसे ही अपने माँ-बाप को छोड़कर चली जाती? वह उसको बहुत चीज़ें लाकर देता था। सहर से धोती लाता था, चूड़ियाँ भी लाता था शीशे की, और मोतियों की माला भी।’’

‘‘ये तो चीज़ें हुईं न! पर यह तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि उसने जंगली बूटी खिलाई थी!’’

‘‘नहीं खिलाई थी तो फिर वह उसको प्रेम क्यों करने लग गयी?’’

‘‘प्रेम तो यों भी हो जाता है।’’

‘‘नहीं, ऐसे नहीं होता। जिससे माँ-बाप बुरा मान जाएँ, भला उससे प्रेम कैसे हो सकता है ?’’

‘‘तूने वह जंगली बूटी देखी है?’’

‘‘मैंने नहीं देखी। वो तो बड़ी दूर से लाते हैं। फिर छिपाकर मिठाई में डाल देते हैं, या पान में डाल देते हैं। मेरी माँ ने तो पहले ही बता दिया था कि किसी के हाथ से मिठाई नहीं खाना।’’

‘‘तूने बहुत अच्छा किया कि किसी के हाथ से मिठाई नहीं खाई। पर तेरी उस सखी ने कैसे खा ली?’’

‘‘अपना किया पाएगी’’

‘‘किया पाएगी’’ कहने को तो अंगूरी ने कह दिया पर फिर शायद उसे सहेली का स्नेह याद आ गया या तरस आ गया, दुखे मन से कहने लगी, ‘‘बावरी हो गई थी बेचारी! बालों में कंघी भी नहीं लगाती थी। रात को उठ-उठकर गाती थी।’’

‘‘क्या गाती थी?’’

‘‘पता नहीं, क्या गाती थी। जो कोई जड़ी बूटी खा लेती है, बहुत गाती है। रोती भी बहुत है।’’

बात गाने से रोने पर आ पहुँची थी। इसलिए मैंने अंगूरी से और कुछ न पूछा।

और अब थोड़े ही दिनों की बात है। एक दिन अंगूरी नीम के पेड़ के नीचे चुपचाप मेरे पास आ खड़ी हुई। पहले जब अंगूरी आया करती थी तो छन-छन करती, बीस गज़ दूर से ही उसके आने की आवाज़ सुनाई दे जाती थी, पर आज उसके पैरों की झाँझरें पता नहीं कहाँ खोयी हुई थीं। मैंने किताब से सिर उठाया और पूछा, ‘‘क्या बात है, अंगूरी ?’’

अंगूरी पहले कितनी ही देर मेरी ओर देखती रही और फिर धीरे से बोली "मुझे पढना सीखा दो बीबी जी"... और चुपचाप फिर मेरी आँखों में देखने लगी...

लगता है इसने भी जंगली बूटी खा ली...

"क्यूँ अब तुम्हे पाप नहीं लगेगा, अंगूरी"... यह दोपहर की बात थी शाम को जब मैं बाहर आई तो वह वहीं नीम के पेड़ के नीचे बैठी थी और उसके होंठो पर गीत था पर बिलकुल सिसकी जैसा...मेरी मुंदरी में लागो नगीन्वा, हो बैरी कैसे काटूँ जोबनावा ..अंगूरी ने मेरे पैरों की आहट सुन ली और चुप हो गयी...

"तुम तो बहुत मीठा गाती हो... आगे सुनाओ न गा कर"

अंगूरी ने आपने कांपते आंसू वही पलकों में रोक लिए और उदास लफ़्ज़ों में बोली "मुझे गाना नहीं आता है"

"आता तो है"

"यह तो मेरी सखी गाती थी उसी से सुना था"

"अच्छा मुझे भी सुनाओ पूरा"

"ऐसे ही गिनती है बरस की... चार महीने ठंडी होती है, चार महीने गर्मी और चार महीने बरखा"... और उसने बारह महीने का हिसाब ऐसे गिना दिया जैसे वह अपनी उँगलियों पर कुछ गिन रही हो...

"अंगूरी?"

और वह एक टक मेरे चेहरे की तरफ देखने लगी... मन मैं आया की पूछूँ की कहीं तुमने जंगली बूटी तो नहीं खा ली है... पर पूछा की "तुमने रोटी खाई?"

"अभी नहीं"

"सवेरे बनाई थी? चाय पी तुने?"

"चाय? आज तो दूध ही नहीं लिया"

"क्यों नहीं लिया दूध?"

"दूध तो वह रामतारा..."

वह हमारे मोहल्ले का चौकीदार था, पहले वह हमसे चाय ले कर पीता था पर जब से अंगूरी आई थी वह सवेरे कहीं से दूध ले आता था, अंगूरी के चूल्हे पर गर्म कर के चाय बनाता और अंगूरी, प्रभाती और रामतारा तीनो मिल कर चाय पीते... और तभी याद आया की रामतारा तो तीन दिन से अपने गांव गया हुआ है।

मुझे दुखी हुई हंसी आई और कहा कि क्या तूने तीन दिन से चाय नही पी है?

"ना"

"और रोटी भी नहीं खायी है न"

अंगूरी से कुछ बोला न गया... बस आँखों में उदासी भरे वही खड़ी रही...

मेरी आँखों के सामने रामतारे की आकृति घूम गयी... बड़े फुर्तीले हाथ पांव, अच्छा बोलने, पहनने का सलीका था।

"अंगूरी... कहीं जंगली बूटी तो नहीं खा ली तूने?"

अंगूरी के आंसू बह निकले और गीले अक्षरों से बोली मैंने तो सिर्फ चाय पी थी... कसम लगे न कभी उसके हाथ से पान खाया, न मिठाई... सिर्फ चाय... जाने उसने चाय में ही... और अंगूरी की बाकी आवाज़ आंसुओ में डूब गयी।

एक ज़ब्तशुदा किताब : अमृता प्रीतम

वे दोनों एक-दूसरे को आमने-सामने देखकर नीचे धरती की ओर देखने लग पड़ीं।

नीचे कुछ भी नहीं था, पर दोनों को पता था कि दोनों के बीच एक लाश है...

''सब लोग चले गए ?''

''सब लोग जा सकते थे इसलिए चले गए। माँ दूसरे बेटे के पास रहने के लिए, दोनों बच्चे होस्टल में। अब सिर्फ़ मैं हूँ, अकेली...।''

''बच्चे छुट्टियों में आएंगे, कभी-कभी माँ भी आएगी।''

''हाँ, कभी-कभी।''

''पर मेरे पास कभी कोई नहीं आएगा।''

''आज तू ज़िन्दगी में पहली बार घर के अगले दरवाजे से आई है।''

''यह दरवाजा तो तेरा था, कभी भी मेरा नहीं था इसलिए।''

''पर जब तू पिछले दरवाजे से आती थी, मुझे पता चल जाता था। उस दिन एक मर्द अपने घर में ही चोर होता था।''

''घर में नहीं, सिर्फ़ बागीचे वाली अपनी लायब्रेरी में... वहाँ मैं उसकी एक किताब की तरह हुआ करती थी।''

''पर औरत एक किताब नहीं होती।''

''होती है, पर ज़ब्तशुदा...।''

''क्या मतलब ?''

''यही कि तू शादीशुदा थी, मैं नहीं।''

एक औरत ज़ोर से हँस पड़ी। शायद उसका सारा रुदन हँसी की योनि में पड़ गया। वह उस दूसरी औरत को कहने लगी, ''इसलिए आज मैं विधवा हूँ, तू नहीं...।''

''मेरा हक न पहले लफ्ज़ पर था, न दूजे पर।''

''तूने मुझसे बस ये दो लफ्ज़ नहीं छीने, बाकी सब कुछ छीन लिया।''

''एक और भी है तीसरा लफ्ज़ जो सिर्फ़ तेरे पास है, मेरे पास नहीं।''

''कौन सा ?''

''उसके बच्चे की माँ होने का।''

''तीन लफ्ज़, सिर्फ़ तीन लफ्ज़... पर वह खुद इन तीन लफ्ज़ों से बाहर था।''

''इसीलिए खाली हाथ था।''

''पर इन लफ्ज़ों के सिवा उसके पास मुहब्बत के सारे लफ्ज़ थे।''

''हाँ, पर जब ये तीन लफ्ज़ ज़ोर से हँसते थे, ज़िन्दगी के बाकी लफ्ज़ रो पड़ते थे।''

''तूने ये भी उससे मांगे थे ?''

''नहीं, क्योंकि मांगने पर मिल नहीं सकते थे।''

''अगर मिल जाते, तू आज मेरी तरह विधवा होती...।''

''अब भी हूँ।''

''पर सबकी नज़र में कुआँरी।''

''छाती में पड़ी हुई लाश किसी को नज़र नहीं आती।''

''पर मेरी छाती में उस वक्त भी उसकी लाश थी, जब वह जीवित था।''

''हाँ, समझती हूँ।''

''मैं तब भी एक कब्र की तरह ख़ामोश थी।''

''शायद, हम तीनों ही कब्रों के समान थे। एक दूसरे की लाश को अपनी-अपनी मिट्टी में संभाल कर बैठी हुई कब्रें...।''

''शायद। पर अगर तू उसकी ज़िन्दगी में न आती...''

''कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।''

''कैसे ?''

''फिर वह खाली कब्र की तरह जीता।''

''शायद, शायद नहीं।''

''उसने अन्तिम समय कुछ कहा था ?''

''कुछ नहीं, सिर्फ़...।''

''अब जो कुछ तुझसे गुम हुआ है, वह मुझसे भी गुम हो चुका है। इसलिए जो कुछ उसने कहा था, मुझे बता दे।''

''कुछ नहीं कहा था। बस, जब कोई कमरे में आता था, वह आँखें खोल कर एक बार ज़रूर उसकी ओर देखता था, फिर चुपचाप आँखें मूंद लेता था।''

''शायद, वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा था।''

''शायद...।''

''तूने मुझे बुलाया क्यों नहीं था ?''

''घर में उसकी माँ थी, उसका छोटा भाई था, बच्चे भी... मैं सबकी नज़र में उसको बचाना चाहती थी।''

''क्या खोया, क्या बचाया, इसका हिसाब लग सकेगा ?''

''मैंने जो खोना था, खो चुकी थी। मुझे अपना ख्याल नहीं था।''

''तूने ठीक कहा था, अगर मैं उसकी ज़िन्दगी में न आती...।''

''मैं नफ़रत के दुख से बच जाती... और शायद दूसरे दुख से नहीं बच सकती थी।''

''दूसरा दुख ?''

''खालीपन का... शुरू से ही जानती थी, पाकर भी कुछ नहीं पाया। वह मेरे बिस्तर में भी मेरा नहीं होता था। खाली-खाली आँखों से शून्य में देखता रहता था।''

''फिर तो तुझे तसल्ली होती होगी, अगर वह अन्तिम समय में भी सिर्फ़ शून्य में देखता ?''

''शायद होती... यह तसल्ली ज़रूर होती कि उसकी लाश पर सिर्फ़ मेरा हक है... पर अब...।''

''अब ?''

''लगता है, तूने उसकी लाश भी मुझसे छीन ली है।''

''सिर्फ़ लाश...।''

''नहीं, उसे भी छीना था, जब वह जिन्दा था।''

''वह अकेला कभी नहीं था। उसके अन्दर तू भी शामिल थी, बच्चे भी... मैंने जब भी उसे पाया, तेरे और तेरे बच्चों समेत पाया।''

''पर जब तू उसके करीब होती होगी, उस वक्त उसके जेहन में न मैं होती होऊँगी, न बच्चे...।''

''कुछ चीज़ों को याद नहीं करना होता, वे होती हैं, चाहे दीवार से परे हों, पर इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता।''

''उसने तुझे यह बताया था ?''

''यह कहने वाली या पूछने वाली बात नहीं थी। जब वह कभी अकेला होता तो शायद पूछ लेती।''

''पर वहाँ लायब्रेरी में वह सदैव तेरे पास अकेला होता था।''

''वहाँ उसकी बीवी एक खुली किताब-सी होती थी और बच्चे भी, किताब की तस्वीरों की तरह...।''

''और तू ?''

''मैं एक खाली किताब थी जिस पर उसने जो इबारत लिखनी चाही, कुछ लिख ली...।''

''तन की इबारत भी ?''

''हाँ, तन की इबारत भी... पर वह बहुत देर बाद की बात है।''

''बहुत देर बाद की ? किससे बहुत देर बाद की ?''

''मन की इबारत लिखने से बहुत देर बाद की।''

''क्या उस वक्त भी मैं एक खुली किताब की तरह उसके सामने होती थी ?''

''हाँ, होती थी... इसलिए वह हमेशा एक कांपती हुई कलम की तरह होता था।''

''वह बच्चों को बहुत प्यार करता था।''

''हाँ, इसलिए उसने अपना दूसरा बच्चा दुनिया से लौटा दिया था।''

''दूसरा बच्चा ?''

''वह मेरी खाली किताब में एक फटी हुई तस्वीर जैसी बात है।''

दोनों गहरी चुप्पी में खो गईं। पहली खुली हुई किताब की भाँति और दूसरी खाली किताब की तरह... फिर पहली ने एक ठंडी साँस भरते हुए कहा, ''पर आज तू मेरे पास क्यो आई है ?''

''क्यों ? पता नहीं...''

''मैं ही तो तेरे रास्ते की दीवार थी।''

वह दूसरी, पहली के कंधे पर सिर रख कर रो पड़ी, कहने लगी, ''शायद इसलिए कि जब कोई बहुत अकेला होता है, उसे किसी दीवार से सिर लगाकर रोने की ज़रूरत होती है।''

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