बचपन की यादें

Bachpan ki Yaadein Stories List

बचपन की यादें

सच्ची सुंदरता

बेचारी स्वीटी

सुंदर कौन है?

चिड़िया का घोंसला

बचपन की यादें

एक शहर की एक गली में एक पुराना मकान था। उसमें एक बूढ़ा व्यक्ति रहता था। उसका न कोई रिश्तेदार था न कोई दोस्त। वह हमेशा अकेला रहता था। इस पुराने मकान के ठीक सामने एक छोटा-सा घर था।

उस घर में एक छोटा बच्चा रोहित, अपने माता-पिता के साथ रहता था। बूढ़े व्यक्ति को बच्चे बहुत अच्छे लगते थे। वह जब भी बच्चे को देखता था, प्यार से हाथ हिलाता था। छोटा बच्चा भी अपनी खिड़की में खड़े होकर जवाब में उसकी ओर देखकर हाथ हिलाता था।

धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती हो गई। रोहित बूढ़े व्यक्ति को 'दादाजी' कहकर बुलाने लगा। दादाजी अक्सर रोहित के लिए बिस्कुट लाते थे। कभी-कभी वे उसके पसंद की चाकलेट लाकर भी उसे देते थे।

एक दिन रोहित ने भी उन्हें अपना एक खिलौना दिया। अपना टीन का सिपाही यानी 'टिन दादाजी ने कहा कि वे इसे बहुत सम्हालकर रखेंगे। कुछ दिनों के बाद रोहित ने देखा कि दादाजी कहीं भी दिखाई हीं दे रहे हैं। उनके मकान को तोड़ दिया गया और वहाँ पर एक बेहद बँगला बनाया गया।

रोहित के पिता ने उस बँगले को ख़रीद लिया। रोहित और उसके माता-पिता बँगले में रहने लगे। धीरे-धीरे रोहित बड़ा होने लगा और बचपन के उन “दादाजी” को भूलने लगा। जब वह बड़ा हुआ और उसकी शादी हो गई, तब उसकी पत्नी भी वहीं रहने आई।

एक दिन वह अपनी पत्नी के साथ बँगले के बगीचे में हाथ से एक गड्ढा खोद रहा था। वहाँ वह एक बीज बोना चाहता था तभी उसकी उँगली में कुछ चुभा। उसने खोदकर देखा तो यह उसका अपना 'टिन सोल्जर' था, जो उसने दादाजी को दिया था। उसकी तलवार की नोंक रोहित की उँगली में चुभ गई थी।

अपना बचपन का खिलौना देखकर अचानक रोहित को बचपन की सारी बातें और दादाजी याद आ गए। उसे याद आया कि दादाजी ने कहा था, 'यह खिलौना मैं बहुत सम्हालकर रखूँगा।' रोहित ने अपनी पत्नी को बचपन की वह सारी बातें सुनाई। सुनाते-सुनाते उसकी आँखें भर आई।

वह 'टिन सोल्जर' रोहित ने अपने घर में सजा दिया। उसका यह पुराना खिलौना हमेशा उसे बचपन की मीठी यादों में ले जाता था। साथ ही उसे दादाजी भी याद आ जाते थे।

सच्ची सुंदरता

बहुत पुराने समय की बात है ।

एक बड़े से समुद्र के बीचों-बीच एक छोटा-सा सुंदर टापू था ।

पुरे टापू पर बहुत सारे पेड़-पौधे थे । मैदानों में हरी-हरी घास थी और हर रंग के सुंदर फूल वहाँ उगते थे ।

फूलों की महक से सारा वातावरण महकता रहता था ।

वहाँ एक बहुत ही अच्छा राजा राज्य करता था ।

सभी की खुशी में वह खुश होता था । और सबके दुखों को बाँटकर कम करता था ।

हर वर्ष वहाँ राज्य के कुलदेवता की पूजा की जाती थी और उसके लिए बगीचे के सबसे सुंदर फूल को चुना जाता था ।

यह चुनाव राजा करता था । उस भाग्यशाली फूल को कुलदेवता के चरणों में चढ़ाया जाता था ।

पिछले कई वर्षों से बागीचे के सबसे सुंदर लाल गुलाब के फूलों को इसके लिए चुना जा रहा था ।

इसलिए गुलाब का पौधा बहुत ही घमंडी हो गया था ।

उसे लगता था कि वही एक है, जो सब फूलों में सबसे सुंदर हैं ।

घमंड के कारण वह तितलियों और मधुमक्खियों को अपने फूलों पर बैठने भी नहीं देता था ।

यहाँ तक कि पक्षियों को अपनी डालियों के पास भी आने नहीं देता था ।

उसके ऐसे व्यवहार के कारण कोई तितली या पक्षी उसके पास आना ही नहीं चाहते थे ।

हर वर्ष की तरह एक बार फिर वह दिन आने वाला था, जब कुलदेवता की पूजा की जानी थी ।

गुलाब के पौधे को पूरा विश्वास था कि राजा आएँगे और उसी को चुनेंगे ।

गुलाब के पौधे के पीछे मिटटी के ढेर पर एक पौधा अपने आप उग आया था ।

छोटा-सा, नाजुक-सा । उस पर चमकदार पीले रंग के छोटे-छोटे फूल उगे थे ।

वह एक जंगली पौधा था, इसलिए कभी कोई उसकी ओर ध्यान ही नहीं देता था ।

उसके फूल छोटे थे, लेकिन बेहद सुंदर थे ।

घंटी के आकार के उन फूलों की पंखुड़ियाँ किनारों पर गहरे लाल रंग की थी ।

वह जानता था कि उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देता है फिर भी वह बड़े प्यार से सभी तितलियों और पतंगों को अपने पास बुलाकर अपना रस पीने देता था ।

पक्षी उसकी डालियों पर बैठ कर खुश होते थे ।

यह सब देखकर पौधे को खुशी होती थी कि वह किसी के काम तो आ सका ।

और फिर वह दिन आया, जब राजा बागीचे में फूल चुनने आए । माली उन्हें सीधा गुलाब के पौधे के पास ले गया । इस बार तो गुलाब और भी सुंदर और बड़े खिले हैं महाराज! वह बोला ।

उसने सबसे बड़ा गुलाब तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन महाराज ने रोक लिया वे किसी और सुंदर फूल को ढूँढ़ रहे थे ।

वापिस जाने के लिए जैसे ही घूमे, उनकी निगाह पीले रंग के फूल पर पड़ी ।

उन्होंने घूमकर देखा तो उनको वह पीले फूलों वाला जंगली पौधा दिखाई दिया ।

उसके आस-पास अनेक तितलियाँ और पतंगे घूम रहे थे ।

जबकि गुलाब का पौधा अकेला, अलग खड़ा था । राजा धीरे से जंगली पौधे के पास गए और बोले - यह वह पौधा है जो बिना खाद-पानी के उग आया है ।

बाकी सभी पौधों का माली विशेष ध्यान रखते हैं ।

समय से पानी देते हैं, खाद डालते हैं, काट-छाँट करते हैं, इसलिए वे इतने सुंदर हैं । लेकिन यह वह पौधा है, जो अपनी हिम्मत से खड़ा है ।

फिर भी कितना स्वस्थ है, सुंदर है । सबसे अच्छी बात यह है कि इसके अच्छे स्वभाव के कारण सभी तितलियाँ उसके पास आकर बेहद खुश हैं ।

यही है सच्ची सुंदरता इसलिए कुलदेवता की पूजा के लिए मैं इस जंगली फूल को चुनता हूँ ।

बेचारी स्वीटी

एक छोटी बच्ची थी स्वीटी । यूँ तो देखने में एकदम गोल-मटोल थी, लेकिन वह हमेशा बीमार रहती थी ।

बीमार भी वह अचानक ही पड़ जाती थी । एक बार स्वीटी के हाथ में इतना ज्यादा दर्द हुआ कि उस पर पट्टी बाँधनी पड़ी ।

ऐसा अँगेजी के टैस्ट के ठीक पहले हुआ । उसकी अध्यापिका ने पूछा, दर्द बहुत ज्यादा है ?

बिलकुल भी नहीं लिख सकती ? नहीं टीचर, बिलकुल नहीं, स्वीटी बोली ।

टीचर को उस पर तरस आ गया और बोली, कोई बात नहीं बेटी, मैं बाद में तुम्हारा टैस्ट ले लूँगी ।

कुछ दिन बाद स्वीटी गले पर पट्टी बाँधकर आई ।

टीचर ने उससे पूछा, गला दर्द कर रहा है क्या ? हाँ, बहुत ज्यादा, स्वीटी फुसफुसाकर बोली ।

ओ हो मैं तो आज गाने की परीक्षा लेने वाली थी, टीचर ने कहा ।

लेकिन बेचारी स्वीटी की तो ठीक से बोल भी नहीं प् रही थी । वह कैसे गया सकती थी ।

कुछ दिन बीते और एक दिन स्वीटी पैर पर पट्टी बाँधकर स्कूल आई ।

बेचारी स्वीटी ठीक से चल भी नहीं पा रही थी । और मजे की बात यह थी की उसी दिन स्कूल में खेल कूद की प्रतियोगिताएँ थी ।

सभी बच्चे भाग-दौड़ रहे थे और बेचारी स्वीटी एक और चुपचाप बैठी थी, उदास ।

तब टीचर ने उसे बुलाया और पूछा, स्वीटी तुम्हारी आँखों में तो दर्द नहीं हो रहा है ना ?

नहीं टीचर, अभी तक तो नहीं, स्वीटी बोली ।

अगर होगा न, तो आँखों पर भी पट्टी बाँध लेना । सब बच्चे जान जाएँगे कि तुम्हें अपने झूठ बोलने पर शर्म आने लगी है । टीचर ने कहा ।

स्वीटी को अपनी गलती पर बहुत शर्म आई । उस दिन के बाद स्वीटी को फिर कभी दर्द के कारण पट्टी नहीं बाँधनी पड़ी ।

सुंदर कौन है?

सीमा पांचवीं कक्षा में पढ़ती थी ।

पढ़नेलिखने में बहुत कमजोर थी ।

बस उस की एक ही विशेषता थी की वह दिखने में सुंदर थी, इसलिए सब उस की सुंदरता की तारीफ करते थे ।

सीमा को इस बात का घमंड हो गया और वह ऐसी लड़कियों से नफरत करने लगी, जो सुंदरता में कुछ कम थी ।

उसे सब से अधिक वंदना से नफरत थी, क्योंकि उस का रंग कुछ काला था ।

वह हमेशा उसे 'काली बिल्ली' कह कर चिढ़ाती थी ।

लेकिन वंदना का स्वभाव इतना अच्छा था कि वह उसे कभी कुछ न कहती ।

वंदना बड़ी भोली भाली लड़की थी ।

पढ़ने लिखने में बड़ी होशियार थी ।

सभी अध्यापिकाएं उसे बहुत प्यार करती थी ।

घर पर भी माँ उस से बहुत खुश थी ।

हर काम में माँ को सहयोग देती ।

सभी काम वह मन लगा का करती थी ।

वह बड़ी बड़ी सफाई पसंद थी इसलिए हमेशा साफसुथरी भी रहती थी ।

सीमा सारे दिन घर से बाहर खेला करती, अर्द्धवार्षिक परीक्षा निकट आ गई, लेकिन उसे तो किसी बात की चिंता नहीं थी ।

एक दिन सीमा सवेरे अपने घर से बाहर निकली । उस के पापा नई गेंद लाए थे, इसलिए वह बहुत खुश थी ।

वह सीधी अपनी एक सहेली दिव्या के घर गई ।

दिव्या उस समय अपने घर की सफाई करने में मदद कर रही थी ।

सीमा को देखते ही वह बोली, आओ सीमा ।

दिव्या, चलो बाहर खेलने के लिए चलते हैं ।

नहीं सीमा, मुझे तो अभी बहुत काम करना है ।

फिर सवेरे-सवेरे पढ़ने का समय होता है ।

मैं शाम को खेलूंगी ।

यह सुन कर सीमा ने मन ही मन कहा, बड़ी आई काम करने वाली और मुंह फुला कर बाहर चली आई ।

इस के बाद वह अपनी दूसरी सहेली रीता के यहां गई और नई गेंद दिखाते हुए बोली, रीता क्या तुम मेरे साथ चलेगी ?

नहीं, मैं तुम्हारे साथ अभी नहीं जा सकती । मुझे अभी पढ़ाई करनी है, घर का काम करना है ।

यह सुनकर वह चुपचाप बिना कुछ कहे गुस्से से बाहर चली गई ।

इस के बाद वह अपनी कई सहेलियों के घर गई, पर सभी पढ़ाई कर रही थी ।

किसी को खेलने की फुरसत नही थी ।

सीमा सोचने लगी, इन सब को क्या हो गया है ?

इन्हें तो बस घर का काम करना और पुस्तकें पढ़ना ही पसंद है ?

फिर कुछ सोच कर सीमा अपनी प्रिय सहेली नीता के घर गई, लेकिन वह भी उस समय पढ़ाई कर रही थी ।

सीमा ने उस की पुस्तक बंद करते हुए कहा, क्या हरदम तोते की तरह पुस्तकें रटती रहती हो ।

चलो, बाहर खेलने चलते हैं ।

सीमा, वार्षिक परीक्षा निकट है ।

मुझे पढ़ाई करनी है, इसलिए मैं तुम्हारे साथ खेलने नहीं चल सकती ।

तुम भी अपने घर जा कर पढ़ाई करो, वरना इस बार फिर फेल हो जाओगी ।

सीमा उदास मन से लौटने लगी, तभी उसे नीता की आवाज सुनाई दी ।

वह अपने माँ से कह रही थी, देखो न माँ सीमा सवेरे-सवेरे खेलने के लिए आ गई ।

उसे पढ़ाई की बिलकुल चिंता नहीं है ।

मैं अब उस के साथ नहीं रहूंगी । जब देखो, तब वह अपनी सुंदरता की चर्चा करती रहती है ।

माँ मुझे तो वंदना बहुत अच्छी लगती है । वह बहुत मेहनती है ।

पढ़ने लिखने में भी बहुत होशियार है । बस, उस का रंग ही थोड़ा सा काला है ।

यह सीमा तो उस बेचारी को 'काली बिल्ली' कह कर चिढ़ाती रहती है ।

यह सुनकर उस की माँ बोली, नीता सुंदरता रंग से नहीं, गुणों से होती है ।

अच्छे गुण ही वंदना की सुंदरता है ।

सीमा इस के आगे कुछ न सुन सकी । वह चुपचाप अपने घर की ओर जा रही थी, लेकिन तभी रास्ते में केले के छिलके पर उस का पैर पड़ गया ।

वह फिसल गई ।

वंदना अपने घर के बाहर खड़ी थी । उस ने सीमा को गिरते देखा तो तुरंत दोनों हाथ पकड़ कर उसे बड़े प्यार से उठाया ।

यह देख कर सीमा की आँखे भर आई । वह मन ही मन सोच रही थी कि वह वंदना से कितनी नफरत करती है, लेकिन वंदना के मन में उस के लिए कितना प्यार है ।

वह बोली, वंदना तुम सबसे सुंदर हो और मैं 'काली बिल्ली' हूँ ।

मैंने तुम्हें काफी तंग किया है, बहुत चिढ़ाया है, मुझे माफ कर दो ।

अरे, भला सहेली से माफी मांगी जाती है ?

सचमुच, सीमा ने अपनी सुंदरता पर घमंड करना और वंदना को चिढ़ाना छोड़ दिया ।

इस कहानी से हमे ये सीख मिलती है कि "सुंदरता रंग से नहीं गुणों से होती है " ।

चिड़िया का घोंसला

इस बार गर्मी की छुट्टियों में एनी अपनी सहेलियों के साथ खेलने के बजाय सारा दिन पार्क में बैठी छोटे-छोटे पक्षियों को घोंसला बनाते देखती रहती ।

पार्क में तरह-तरह के पक्षी आते थे - गौरैया, कबूतर, कठफोड़वा, लवा और बुलबुल ।

एनी किसी भी पक्षी को देखते ही पहचान जाती थी, क्योंकि उस की मैम ने उसे सभी पक्षियों के सुंदर चित्र दिखाए थे और कहा था कि इन छुट्टियों में तुम सब पक्षियों की आदतें गौर से देखना और गरमी

की छुट्टियों के बाद जब स्कूल खुलेगा तब तुम सब को पक्षियों पर एक लेख लिखने के लिए दिया जाएगा ।

सब से अच्छे लेख पर जो किताब इनाम में दी जाने वाली थी, वह भी बच्चों को दिखाई गई थी ।

मैम ने उम्हें जानवरों और पक्षियों की कहानियों वाली उस किताब के रंगीन चित्र भी दिखाए थे और कहानियां भी पढ़ कर सुनाई थी ।

एनी को वह किताब इतनी पसंद आई थी कि उस ने मन ही मन यह निश्चय कर लिया था कि जैसे भी हो वह इस किताब को पाने के लिए मेहनत करेगी और इसलिए एनी अपनी छुट्टियां खेलने के बजाय पार्क में बैठ कर पक्षियों की आदतों को जानने में गुजार रही थी ।

एनी देखती कि पक्षी अपना घोंसला बनाने के लिए कितने धैर्य से छांटछांट कर पुराणी सुतली, घास, पत्तियां और घोंसले को आरामदेह बनाने के लिए पंख आदि जमा करते हैं ।

एनी का जी चाहता, कितना अच्छा होता कि मैं भी इन पक्षियों की कुछ मदद कर सकती ।

अचानक एनी को एक खयाल आया । इन दिनों ज्यादातर पक्षियों ने अपने घोंसले बना लिए थे, फिर भी कुछ पक्षी ऐसे थे जिन के घोंसले अभी तक तैयार नहीं हुए थे ।

कुछ शरारती लड़कों ने पत्थर मार कर इन के घोंसले नष्ट कर दिए थे । एनी ने उन्हें गुस्सा कर रोकना चाहा ।

एनी ने सोचा-क्यों न मैं अपने हाथों से एक घोंसला बना कर बगीचे के किसी पेड़ पर लटका दूं ।

हो सकता है कोई पक्षी वहां रहने आ जाए, आह, कितना अच्छा लगेगा जब पक्षी वहां अंडे देंगे और कुछ दिनों में घोंसला छोटे-छोटे पक्षियों से भर जाएगा ।

पक्षियों की चहचहाहट से मेरे बगीचे में रौनक आ जाएगी, यह सोच कर एनी बहुत खुश हुई ।

अब तो एनी को अपने आप गुस्सा आ रहा था कि इतनी अच्छी बात उसे पहले क्यों नहीं सूझी ? कुछ मिनटों का ही तो काम होगा और बस घोंसला तैयार हो जायेगा । पक्षियों के चोंच से बने घोंसलों के मुकाबले मेरा यह घोंसला ज्यादा सफाई से बना हुआ होगा, एनी ने सोचा ।

अगले दिन एनी की मां यह देख कर बड़ी हैरान हुई कि एनी सारा दिन तिनके, कागज आदि ही बुनती रही ।

कहां तो एनी ने सोचा था कि घोंसला बनाना तो कुछ मिनटों का ही काम है और कहां एनी को सारी शाम घोंसला बनाते- बनाते गुजर गई ।

घोंसला को टिकाने के लिए एनी ने बांस की कुछ तीलियां भी लगाई थी । अब वे तीलियां टिक नहीं रही थी ।

बेचारी एनी ने धागे की पूरी रील लगा दी ।

तब कहीं जा कर घोंसला इधर-उधर से बंध कर तैयार हुआ, पर घोंसला अजीब ऊबड़खाबड़ सा बना था ।

यह तो पक्षियों को बहुत चुभेगा, यह सोच कर एनी मां के पास गई और बोली, मां, यह घोंसला अंदर से कितना सख्त है, इसे जरा नरम बना दो न ।

मां ने एक छोटी कटोरी ली और घोंसले के अंदर उसे गोलमोल घुमा कर काफी हद तक उसे आरामदेह बना दिया । ऊबड़खाबड़ तिनके और कागज बैठ गए थे |

अब एक छोटा सा घोंसला तैयार था जो न गोल कहा जा सकता था, न चौरस और न लंबा ।

चिड़ियाँ चोंच से घोंसला बनाती हैं, पर कितने सलीके और सफाई से बनाती हैं । हाथों से तो कभी ऐसे घोंसला बनाए ही नहीं जा सकते ।

सुबह एनी ने बड़ी शान से वह घोंसला बगीचे के एक पेड़ पर लटका दिया और खुद कुछ दूरी पर खड़ी इंतजार करती रही कि कोई पक्षी आ कर उसे अपना घर बना ले ।

पर जब काफी समय गुजर गया और कोई पक्षी न आया तो एनी बड़ी निराशा हुई । अचानक उस ने देखा लवा पक्षियों के एक जोड़े ने, जो घोंसला के ऊपर मंडरा रहा था, चोंच मारमार कर घोंसला तोड़फोड़ डाला ।

'शैतान, पक्षी ' गुस्से से एनी बड़बड़ाई ।

एनी की आवाज सुनकर उसकी मां वहां आ गई ।

मां, देखो न, उन्हें मेरा घोंसला पसंद नहीं आया, एनी ने सुबकते हुए कहा ।

मां भी वहीं खड़ी हो कर पक्षियों की हरकतें देखने लंगी ।

अचानक मां जोर से हंस पड़ी, देखो, एनी, ये पक्षी पहले घोंसले से तिनके चुनचुन कर एक नया घोंसला तैयार कर रहे हैं । हो सकता है ये लोग और किसी के बनाए घोंसलों में रहना पसंद न करते हों । मां, मैं जो लेख लिखूंगी न, उस में यह बात भी जरूर लिखूंगी, एनी बोली ।

एनी, पक्षियों ने घोंसला चाहे जिस कारण तोड़ा हो, पर वे तुम्हारा बड़ा एहसान मान रहे होंगे कि तुम ने घोंसला बनाने का सारा सामान एक जगह जमा कर रखा है, मां ने कहा ।

मां, तुम ने एक बात पर गौर किया ? एनी ने मां से कहा, यह लवा अपना घोंसला झाड़ियों के अंदर बनाती है ।

हाँ, एनी, अभी तक तो मैं ने यही देखा सुना था कि लवा अपना घोंसला पेड़ पर या घरों के रोशनदानों आदि में बनाती है । आज पहली बार मैं यह तरीका देख रही हूँ ।

एनी सारा दिन बगीचे में बैठी लवा पक्षियों को काम में जुटे देखती रहती । एनी की मौजूदगी का पक्षी भी बुरा नहीं मानते थे । शायद उन्हें पता था कि वह उन की मित्र है ।

जल्दी ही घोंसला छोटे-छोटे लवा पक्षियों से भर गया । इसी बीच एनी को लवा पक्षी की एक और दिलचस्प आदत का पता चला ।

आमतौर पर पक्षी उड़ते हुए आते हैं और सीधे अपने घोंसले पर ही उतरते हैं, पर लवा कभी ऐसा नहीं करती। वह हमेशा अपने घोंसले से थोड़ी दूरी पर उतरती है और फिर फुदकफुदक कर और थोड़ा इधर-उधर पता चले ।

घूम कर अपने घोंसले में जाती है । शायद वह नहीं चाहती कि किसी को उसी के घोंसले की जगह पता चले ।

छुट्टियों के बाद जब लेख प्रतियोगिता हुई तो एनी को प्रथम पुरस्कार मिला । इनाम वाली किताब हाथ में पकड़े एनी अपनी सहेलियों को बता रही थी, तुम्हें पता है, मैं ने एक नहीं दो इनाम जीते हैं । एक तो यह किताब और दूसरा अपने बगीचे में छोटे-छोटे लवा पक्षियों से भरा घोंसला ।

इस कहानी से हमे ये सीख मिलती है कि "कोई प्रतियोगिता जीतने से ज्यादा, दूसरों की मदद कर के खुशी मिलती है । "

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