हेलो, आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ Educational Stories in Hindi में शेयर करने जा रहे है। इन stories आपको बहुत कुछ सिखने मिलेगा। यह आपको life में आगे बढ़ने की परेणा देगी। आप इन Educational Stories को पूरा पढ़े। आपको यह Educational Stories बहुत पसंद आएगी। 

Educational Stories in Hindi

Educational Stories in Hindi

बहादुर कलहंस

चालाक गधा

फलों का भगवान

मेहनत पर भरोसा

सच्ची सफलता और विफलता

जंगल का तोता

सुनहरी चिड़िया

कुत्ता और खरगोश

अलसी होने का नतीजा

लालची शेर की कहानी

सुई देने वाली पेड़ की कहानी

लोमड़ी और अंगूर की कहानी

अहंकारी गुलाब की कहानी

दो मेंढ़कों की कहानी

मूर्ख गधा की कहानी

एक बूढ़े व्यक्ति की कहानी

रास्ते में बाधा की कहानी

स्कूल की दोस्ती

पोपटलाल का कुत्ता

बच्चे और उनके दादाजी

नकलची कौआ

गरीब भक्त

सबसे शक्तिशाली आशीर्वाद

रेगिस्तान की यात्रा

लोमड़ी और सारस की कहानी

क्रिस्टल बॉल की कहानी

नौकरी की चिंता

लालची व्यापारी

मेहनत के सपने

आदत का जिम्मेदार

आलू, अंडे और कॉफी बीन्स की कहानी

कौवे की गिनती

अपनी मदद आप स्वयं करते हैं

कड़वा सच

किंग कोबरा और चींटियाँ

कानी हिरनी

नागराज की चोरी

मधुमक्खी की प्राथना

हाथी और उसके दोस्तों की कहानी

लालची आदमी की कहानी

भूखे कुत्ते

बंदर की जिज्ञासा और कील

गधे से प्रेरणा

जिंदगी का बोझ

अपराध किसका?

घर के संस्कार

सबसे होशियार इंसान

शहद का स्वाद

चींटी और कबूतर की कहानी

बुद्धिमान किसान

किसकी भैस

कल किसने देखा है

दो भाई के दो अलग रास्ते

एक महत्वपूर्ण सबक

अच्छी आदते

सबसे कीमती चीज

सपनों की दुनिया

शेर और चूहे की कहानी

लकड़हारा और सुनहरी कुल्हाड़ी की कहानी

सपना सच हुआ

बहादुर कलहंस

बहुत पहले, रोम के शासकों को अपनी ताकत पर जरूरत से ज्यादा भरोसा हो गया था। तभी गाउल्स कहलाने वाले डाकुओं ने उन पर हमला कर दिया।

एक बहादुर सिपाही केपीटोल (जुपिटर के मंदिर) के पीछे खजाने की रक्षा कर रहे थे। गाउल्स ने खड़ी चट्टानों पर चढ़ने की बहुत कोशिश की परंतु असफल हुए।

बाद में उनको केपीटोल का गुप्त रास्ता पता चल गया। उन्होंने रात में हमले की योजना बनाई। अंधेरे में रोमन सिपाहियों को गर्ल्स के आने का पता नहीं चला,

लेकिन वहाँ रोमन भगवान को बली देने के लिए कलहंस रखी हुई थीं। कलहंसों ने दुश्मनों को देखा तो ज़ोर से शोर करने लगीं।

उनके शोर ने रोमनवासियों को जगा दिया। वे बहादुरी से गाउल्स के साथ लड़ने लगे। रोमन सेना भी वहाँ आ पहुँची और दुश्मनों को मार भगाया गया।

रोमन शासक कलहसो से बहुत खुश हुए। उन्होंने फैसला किया कि आगे से उनकी बली नहीं दी जाएगी। उस फैसले को आज भी माना जाता है।

चालाक गधा

एक दिन एक शेर अपनी प्यास बुझाने के लिए नदी के तट पर गया। वहाँ नदी के दूसरे तट पर एक गधा भी पानी पी रहा था। गधे को देखकर शेन ने उसे अपना भोजन बनाने के लिए एक योजना बनाई।

शेर बोला, “प्यारे गधे, क्या नदी के उस किनारे कोई घोड़ा भी है? मेरी इच्छा उसका गाना सुनने की है।” गधे को उसकी नीयत पर तनिक भी संदेह नहीं है। वह बोला.”श्रीमान क्या घोड़ा ही गा सकता है, मैं नहीं?

लीजिए मेरा गाना सुनिए।” यह कहकर उसने अपनी आँखें बंद की और जोर-जोर से रेंकना शुरू कर दिया। मौका पाकर शेर ने नदी पार की और गधे को पकड़ लिया। गधा भी चालाक था।

वह बोला, “श्रीमान् ! मैं आपका भोजन बनने के लिए तैयार हूँ। लेकिन मैंने सुना है कि ताकतवर एवं बलशाली शेर अपना भोजन करने से पहले भगवान की प्रार्थना करते हैं।” शेर अपने को जंगल का सबसे शक्तिशाली जानवर मानता था।

इसलिए उसने प्रार्थना करने के लिए अपनी आँखें बंद कर ली। अब गधे को भागने का अच्छा मौका मिल गया। वह वहाँ से तेजी से भाग निकला। इस तरह चालाकी में वह गधा शेर पर भारी पड़ा।

फलों का भगवान

केशवलाल का अपने घर के आसपास बहुत बड़ा बगीचा था। वह बहुत मेहनत से अपने बगीचे की देखभाल पुरे साल भर करता था। ज्यादा तर बगीचे के फल वह अपने परिवार में ही देता था और कुछ बचे हुए वह बाजार में बेचता था। वह बहुत ही साधारण जीवन जीता था पर अपनी बगीचे की देखभाल बहुत अच्छे से करता था।

एक दिन अपने बेटी के साथ जब केशवलाल फल उठा रहा था तो उसने एक अजनबी को पेड की शाखा पर बैठे हुए देखा और वह अजनबी फल तोड़ रहा था। केशवलाल यह देखकर गुस्सा हो गया और वह चिल्लाया, “कौन हो तुम? तुम मेरे पेड़ पर क्या कर रहे हो? क्या तुम्हें शर्म नहीं आती दिन के समय तुम फल चुरा रहे हो?”

पेड को शाखा पर बैठे अजनबी ने केशवलाल को देखा लेकिन उसने उसकी बात का जवाब नहीं दिया और फल उठाता रहा। केशवलाल बहुत गुस्सा हो गया और फिर चिल्लाया, “पूरे साल इन पेड़ों को रखवाली मैने की है, तुम्हें मेरी इजाजत के बिना इनके फल लेने का कोई अधिकार नहीं है। नीचे आ जाओ।”

पेड पर बैठे अजनबी ने जवाब दिया, “मै नीचे क्यों आऊ? यह भगवान का बगीचा है और मैं भगवान का सेवक हूं इसलिए मुझे यह फल तोड़ने का हक है और तुम्हें भगवान के काम और उसके सेवक के बीच में नहीं आना चाहिए।” केशवलाल उसका यह जवाब सुनकर बहुत हैरान हो गया।

केशवलाल ने एक डंडी ली और उसने अजनबी को मारना शुरू कर दिया। अजनबी चिल्लाने लगा, “तुम मुझे क्यों मार रहे हो? तुम्हें यह करने का कोई हक नहीं है।” केशवलाल ने ध्यान नहीं दिया और वह उसे लगातार मारता रहा।

अजनबी चिल्लाया, “तुम्हें भगवान से डर नहीं लगता। तुम एक मासूम इंसान को मार रहे हो?” केशवलाल ने जवाब दिया, “मुझे डर क्‍यों लगेगा? मेरे हाथ में जो छड़ी है वह भगवान की है और मैं भी भगवान का सेवक हूं इसलिए मुझे किसी चीज से डरने की जरूरत नहीं और तुम्हें भगवान के काम और उसके सेवक के बीच में नहीं बोलना चाहिए।”

अजनबी यह सुनकर चुप हो गया और फिर बोला, “रुको, मुझे मत मारो, मुझे माफ करो कि मैने तुम्हारे फल चुराए। यह तुम्हारा बगीचा है और मुझे फल तोड़ने के लिए तुम्हारी इजाजत लेनी चाहिए थी। इसलिए मुझे माफ करो और छोड दो।”

केशवलाल यह सुनकर मुस्कुराया और कहा, “क्योंकि अब तुम्हें तुम्हारी गलती का अहसास हो गया है मै तुम्हें माफ कर दूंगा।” इसके बाद केशवलाल ने उसे छोड़ दिया और वह अजनबी वहां से चला गया।

मेहनत पर भरोसा

अनूप और कल्पेश दो अच्छे दोस्त थे। वे दोनों एक ही कक्षा में साथ में ही पढ़ते थे। पढ़ाई में दोनों ही बड़े होशियार थे। पढ़ाई करना उनका पहला काम था। अन्य चीजों पर वे बाद में ध्यान देते थे।

पढ़ाई में उन दोनों मुकाबला रहता था। कभी अनूप प्रथम आता, तो कभी कल्पेश। दोनों में यह बताना मुश्किल था कि पढ़ाई में कौन आगे है। दोनों को उनके क्लास टीचर भी बहुत चाहते थे। क्लास के सभी बच्चे उन दोनों का बहुत आदर करते थे, क्योंकि वे दोनों पढ़ाई में होक्षियार होने के साथ ही स्राथ दयातु और नम्न स्वभाव के थे।

कक्षा आठ की परीक्षा हुई। दोनों ने जमकर परीक्षा दी। परीक्षा का रिजल्ट भी घोषित हुआ। इस बार का परीक्षा में अनूप और कल्पेश तो क्या, क्लास के सभी बच्चे और खुद अध्यापक भी हैरान रह गए थे। हर परीक्षाओं में तो अनूप और कल्पेश लगभग साथ-साथ ही रहते थे, मतलब कभी अनूप कल्पेश से दस-पन्द्रह मार्क्स से आगे रहता तो कभी कल्पेश अनूप से | मगर इस बार न जाने क्या हुआ कि कल्पेश ने अनूप से लगभग पचास मार्क्स से बाजी मार ली थी।

परीक्षा के रिजल्ट के बाद दोनों स्कूल से घर लौट रहे थे। अनूप ने कल्पेश से कहा, “क्यो कल्पेश! इस बार तो तुम मुझे बहुत पीछे छोड़ गए। मेरा ऐसा भाग्य कहां, जो तुम्हारे मार्क्स पा सकू।” “नहीं अनूप! ऐसा तो नहीं।” मुस्कराता हुआ कल्पेश बोला। वह अपनी प्रशंसा सुनकर फूला नहीं समा रहा था।

मन ही मन उसे अपने क्लास में सबसे अधिक मार्क्स से पास होने एवं अनूप के द्वार प्रशंसित होने से कल्पेश के मन में अभिमान जाग उठा। घमंड में कल्पेश के मन-मस्तिष्क पर ऐसा बुरा असर छोड़ा कि वह पढ़ाई रे धीरे-धीरे विचलित होने लगा। क्लास में जब शिक्षक पढ़ाने लगते तो वह दूसरे बच्चों से बातें करने लगता।

एक दिन शिक्षक इतिहास पढ़ा रहे थे। तीसरी पंक्ति में बैठे कल्पेश को बगल के एक लड़के से बातें करते देख शिक्षक ने कल्पेश को बहुत डांटा और छड़ी से उसे पीटा, और फिर उन्होंने पढ़ाना जारी रखा। इस सजा से कल्पेश का क्लास में बातें करना तो बन्द हो गया, परन्तु पढ़ाई पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह घमंड में आकर अनूप से भी कम बोलने लगा।

धीरे-धीरे परीक्षा आने लगी। क्लास के बच्चे जी जान से पढाई मे लग गए थे। कल्पेश बहुत ही आराम में था क्यों की उसे पता था की क्लास में पहला नंबर उससे कोई नहीं चीन सकता है।

परीक्षा हुई। कुछ दिनों बाद परीक्षा का रिजल्ट आ गया। इस बार अनूप क्लास में सबसे पहला आया था, जबकि कल्पेश इस बार अपना परीक्षा का रिजल्ट देखकर चौंक पड़ा। वह परीक्षा में फेल था। कल्पेश की अपनी करनी का फल मिल चुका था।

शिक्षा: दोस्तों जिंदगी में हमेशा अपनी मेहनत पर भरोसा करो।

सच्ची सफलता और विफलता

रमेश और सुरेश जुड़वाँ भाई थे। वे बचपन से एक ही स्कूल में और एक ही कक्षा में पढ़ते थे। अब वे दोनों १० वि कक्षा के छात्र थे।

उनकी ही कक्षा में अनिकेत नाम का एक छात्र था जो बहुत ही अमीर परिवार से से था। एक दिन अनिकेत अपने जन्मदिन पर बहुत महंगा मोबाइल लेकर कर स्कूल आया। सभी उसे देख कर बहुत चकित थे। हर कोई उस मोबाइल के बारे में बातें कर रहा था, कि तभी कक्षा के एक छात्र ने अनिकेत से पुछा, “यार, ये इतना महंगा मोबाइल आपको किसने दिया?”

“मेरे भाई ने मुझे यह मोबाइल गिफ्ट किया है, कल ही वह विदेश से आया है।” अनिकेत अपना मोबाइल दिखते हुए बोला।

यह सुनकर कक्षा में सभी उसके भाई की तारीफ़ करने लगे, हर कोइ यही सोच रहा था कि काश उनका भी ऐसा कोई भाई होता। रमेश भी कुछ ऐसा ही सोच रहा था, उसने सुरेश से कहा, “काश हमारा भी कोई ऐसा भाई होता!”

पर सुरेश की सोच अलग थी, उसने कहा, “काश मैं भी ऐसा बड़ा भाई बन पाता!”

शिक्षा: हमारी सफलता और विफलता हमारे दृष्टिकोण पर काफी हद तक निर्भर करती है। हमारी सोच ही है जो हमे एक अच्छा व्यक्ति बनाती है।

जंगल का तोता

एक शहर में मसाले बेच ने वाले का एक बहुत बड़ा व्यापारी था। आसपास के गांवों के लोग उसकी दुकानों पर मसाले खरीदने आते थे। शहर में सेठ के कई दुकाने थी। आसपास के गांवों में भी मसलो की कोई दुकाने नहीं थी इसलिए सेठ खुद ही कभी-कभी मसाले बेचने के लिए जाता था।

एक बार सेठ गांव में कुछ मसाले बेच ने के लिए गया था। वहां से लौटते समय एक पेड़ के नीचे वह आराम करने बैठ गया और थोड़ी ही देर में उसे नींद आ गई। जब वह नींद से जागा तो उसने अपने आसपास तोतों का समूह देखा। हरे रंग, लाल चोंच और गले पर काली पटृी वाले तोतों को देखकर सेठ ने सोचा, कितने सुंदर हैं ये तोते। एक दो तोतों को साथ ले जाऊं तो परिवार के लोग बहुत खुश होंगे।

यह सोचकर सेठ ने अपना गमछा तोतों के झुण्ड पर फेंका और एक तोता पकड़ लिया। इस तोते को सेठ अपने घर ले गया।

सेठ ने घर पहुंचकर तोते के लिए सोने का पिंजरा बनवाया। उसमें तोते के लिए बैठक और एक झूला रखवाया। पानी पीने के लिए कटोरी और खाने के लिए एक छोटी सी तश्तरी भी रखवाई। तोता सोने के पिंजरे में रहने लगा। उसे अमरूद, मिर्च आदि मनपसंद वस्तुएं खाने को दी जाने लगीं।

घर के बच्चे तथा सेठ तोते से बातें भी करते। तोता थोड़ा थोड़ा बोलना भी सीख गया। तोते के साथ बातें करने में सबको बहुत आनंद आने लगा।

कुछ दिनों बाद सेठ को गांव में से कुछ मसलो की आर्डर आयी और उसने खुद ही जाने का फैसला किया। जाते वक्त उसने अपने तोते से कहा, ”तोते राम, मैं गांव में जा रहा हूं। लौटते समय मैं तेरे माता पिता व सगे संबंधियों से मिलूंगा। तुझे उनके लिए कोई संदेश भेजना हो तो बता?“

तोते ने कहा,”सेठ जी, उन सबसे कहना, तोता भूखा नहीं है, तोता प्यासा भी नहीं है। तोता सोने के पिंजरे के अंदर आनंद से रह रहा है।“

सेठ अपने मसाले बेचकर लौटते समय उसी पेड़ के नीचे आराम करने के लिए रूका। तभी तोतों का एक समूह उस पर टूट पड़ा। वे उसे चोंच से मारने लगे। उनमें से एक तोते ने सेठ से पूछा, ”सेठ जी, हमारा तोता क्या कर रहा है?“

सेठ ने उन्हें शांत करते हुए कहा, ”तोता भूखा नहीं है, तोता प्यासा नहीं है। तोता सोने के पिंजरे के अंदर आनंद कर रहा है।“

यह सुनकर सभी तोते बिना कुछ बोले जमीन पर मुर्दों की तरह लुढ़क गए। सेठ उनके पास गया उसने तोतों को हिला डुलाकर देखा, पर ऐसा लगा जैसे सारे तोते आघात से मर गए हों।

सेठ जी घर पर आए। सेठ को देखते ही तोते ने अपने माता पिता एवं सगे संबंधियों के समाचार पूछे।

सेठ ने कहा, ”तेरे माता पिता और सगे संबंधियों को जब मैंने तेरा संदेश सुनाया तो सभी लुढ़क गए। क्या उन्हें आघाल लगा होगा?“

पिंजरे के तोते ने कोई जवाब नहीं दिया। सेठ की बात सुनकर वह स्वयं भी पिंजरे में झूले से नीचे गिर पड़ा। सेठ ने यह देखा तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उसने पिंजरे का दरवाजा खोला और तोते को हिला डुलाकर देखा। सेठ जी को लगा वह तोता भी आघात से मर गया है। सेठ जी ने तोते को पिंजरे से बाहर निकालकर थोड़ी दूर पर रख दिया। मौका देखकर तोता पंख फड़फड़ाता हुआ उड़ गया।

जाते जाते उसने कहा, ”सेठ जी, मैं आपका आभारी हूं। मुझे अपने माता पिता का संदेश मिल गया है। मैं उनसे मिलने जा रहा हूं। आपका पिंजरा सोने का था, लेकिन वह पिंजरा था। मेरे लिए वह जेल थी।“ तोता उड़ता हुआ जंगल में अपने माता पिता और सगे संबंधियों के पास पहुंच गया। उसे लौटकर आया हुआ देख सब खुश हो गए।

अब मुक्त वातावरण में तोता सबके साथ आनंद से रहने लगा।

सुनहरी चिड़िया

एक जंगल में एक सुनहरी चिड़िया रहती थी। वह मीठे गीत गाया करती थी। जब वह गाना गाती तो उसकी चोंच से चमकदार मोती गिरते। एक दिन एक बहेलिए ने उसे पकड़ लिया।

उसने उसे अपने घर ले जाकर एक सोने के पिंजरे में रख दिया। वह उसे अच्छा खाना देता, लेकिन चिड़िया दुखी रहती। वह आजादी का आनंद लेना चाहती थी। अब वह पिंजरे में गाना भी नहीं गाती थी।

इस वजह से बहेलिए को एक भी मोती नहीं मिल पा रहा था। तंग आकर बहेलिए ने उस सुनहरी चिड़िया को राजा को उपहार स्वरूप भेंट कर दी। राजा ने वह चिड़िया राजकुमारी को दे दी।

राजकुमारी एक अच्छी लड़की थी। वह बहुत दयालु थी। उसने सुनहरी चिड़िया को आजाद कर दिया। चिड़िया अपनी आजादी से बहुत खुश थी, इसलिए वह पुन: गाने लगी।

फलस्वरूप उसकी चोंच से राजकुमारी के कमरे में मोती गिरने लगे। उस दिन से वह सुनहरी चिड़िया रोज राजकुमारी से मिलने आती और उसके लिए गाना गाती। वह जैसे ही गाना गाती वैसे ही उसकी चोंच से मोती झडते। यह उसकी तरफ से प्यारी राजकुमारी के लिए तोहफा था।

कुत्ता और खरगोश

एक कुत्ते और एक खरगोश के बीच बहुत पक्की दोस्ती थी। खरगाश का स्वभाव सीधा-सादा था, जबकि कुत्ता बहुत चालाक था।

एक दिन कुत्ते ने अचानक खरगोश को पकड़कर जोर से काट लिया। खरगोश दर्द के मारे मरा जा रहा था।

अब कुत्ता खरगोश के घाव को चाट-चाटकर उसे आराम पहुँचाने की कोशिश करने लगा। खरगोश कुत्ते के व्यवहार को देखकर दंग था और समझ नहीं पा रहा था कि वो क्या करे।

वह जानने की कोशिश कर रहा था कि कुत्ता क्या चाहता है। “पहले मुझे यह बताओ, तुम मेरे दोस्त हो या दुश्मन?

अगर तुम मेरे सच्चे दोस्त हो, तो तुमने मुझे इतने जोर से काटा क्यों? अगर तुम दुश्मन हो तो अब मेरे घावों को चाट क्यों रहे हो?

या तो मुझे मार डालो या मुझे अपनी मर्जी से जीवन जीने दो।”

शिक्षा: संदिग्ध मित्र तो शत्रु से भी बुरा होता है।

अलसी होने का नतीजा

उत्कर्ष बडा ही आलसी लड़का था। वह पढ़ाई में बहुत कमजोर था और अक्सर परीक्षा में फेल हो जाया करता था। अपनी मां से झूठ बोल कर वह पैसे ले लिया करता और मित्रों के साथ घूमता।

एक दिन स्कूल छूटने के बाद उत्कर्ष शाम के समय घूमने निकला। उसने सोचा कि पहले में चलकर नाश्ता कर लिया जाए। वह एक होटल में घुसा। होटल से निकल कर उसकी इच्छा सिनेमा देखने की हुई। तभी उसने देखा कि उसके जूते गंदा हो गए है और उसने सोचा क्यों न उन पर थोड़ी पोलिश लगवा दी जाए। यह सोचकर वह सामने की ओर बढ़ गया। वहीं एक पेड़ फे नीचे एक बूढा आदमी मोची का काम कर रहा था। उस समय उसके पास कोई ग्राहक भी नहीं था।

उत्कर्ष ने अपना दाहिना पांव उसके सामने कर दिया, और उस बूढ़े आदमी ने अपनी पोलिश की डिबिया खोली और मन लगा कर पालिश करने में जुट गया।

तभी उस बूढ़े आदमी का बेटा मामूली वेशभूषा में वहां आया। उसके हाथ में कुछ पुस्तकें थी। वह स्कूल से सीधा ही चला आ रहा था। आते ही उसने पुस्तकें एक किनारे रख दीं और बड़े प्रसन्‍न मन से अपने पिता से बोला, “बापू, अब तुम उठो। दिन भर काम करते-करते तुम थक गए होंगे। जरा आराम कर लो। सर के जूते मैं चमका देता हूँ।”

अपने बेटे की बात सुनकर बूढ़ा आदमी धीरे से उठा और घर की ओर चल दियां। यह सब देख कर तो उत्कर्ष अचरज में पड गया। उसने पूछा, “क्यों भाई, क्या तुम कहीं नौकरी करते हो?“ “जी नहीं, मै पढ़ता हूँ।” बूढ़े आदमी के बेटे ने कहा।

“लेकिन उसके बाद भी तुम यह नींच काम करते हो, क्या तुम्हें शर्म नहीं आती?” उत्कर्ष ने पूछा। “काम करने में शर्म कैसी। मेरे बापू यही काम करके मुझे पढ़ा लिखा रहे हैं।

शाम को मैं उनकी मदद किया करता हूँ। बूढे हो गए हैं न, थक जते हैं। उनकी हर तरह से मदद करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ। दुनिया में कोई काम छोटा नहीं होता, दरअसल जो काम करता है उसे ही बड़ा आदमी कहलाता है” उस लड़के ने जवाब दिया।

शिक्षा: उस लड़के की यह बात सुनकर उत्कर्ष जैसे आसमान से धरती पर आ गिरा। आज उसे अपने जीवन का सही सबक मिल गया था। उसने सोचा की उसे काम तो नहीं करना पढ़ता है। पर वह अपना कर्तव्य, जो की पढ़ाई करना जरूर पूरा करेगा।

लालची शेर की कहानी

गर्मी के एक दिन में, जंगल के एक शेर को बहुत जोरों से भूख लगी। इसलिए वो इधर उधर खाने की तलाश करने लगा। कुछ देर खोजने के बाद उसे एक खरगोश मिला, लेकिन उसे खाने के बदले में उसे उसने छोड़ दिया क्यूंकि उसे वो बहुत ही छोटा लगा।

फिर कुछ देर धुंडने के बाद उसे रास्ते में एक हिरन मिला, उसने उसका पीछा किया लेकिन चूँकि वो बहुत से खाने की तलाश कर रहा था ऐसे में वो थक गया था, जिसके कारण वो हिरन को पकड़ नहीं पाया।

अब जब उसे कुछ भी खाने को नहीं मिला तब वो वापस उस खरगोश को खाने के विषय में सोचा। वहीँ जब वो वापस उसी स्थान में आया था उसे वहां पर कोई भी खरगोश नहीं मिला क्यूंकि वो वहां से जा चूका था। अब शेर काफ़ी दुखी हुआ और बहुत दिनों तक उसे भूखा ही रहना पड़ा।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की अत्यधिक लोभ करना कभी भी फलदायक नहीं होता है।

सुई देने वाली पेड़ की कहानी

एक जंगल के पास दो भाई रहा करते थे। इन दोनों में से जो भाई बड़ा था वो बहुत ही ख़राब बर्ताव करता था छोटे भाई के साथ। जैसे की वो प्रतिदिन छोटे भाई का सब खाना ख लेता था और साथ में छोटे भाई के नए कपड़े भी खुद पहन लेता था।

एक दिन बड़े भाई ने तय किया की वो पास के जंगल में जाकर कुछ लकड़ियाँ लायेगा जिसे की वो बाद में बाज़ार में बेच देगा कुछ पैसों के लिए।

जैसे ही वह जंगल में गया वहीं वो बहुत से पेड़ काटे, फ़िर ऐसे ही एक के बाद एक पेड़ काटते हुए, वह एक जादुई पेड़ पर ठोकर खाई।

ऐसे में पेड़ ने कहा, अरे मेहरबान सर, कृपया मेरी शाखाएं मत काटो। अगर तुम मुझे छोड़ दो तब, मैं तुम्हें एक सुनहरा सेब दूंगा। वह उस समय सहमत हो गया, लेकिन उसके मन में लालच जागृत हुआ। उसने पेड़ को धमकी दी कि अगर उसने उसे ज्यादा सेब नहीं दिया तो वह पूरा धड़ काट देगा।

ऐसे में जादुई पेड़, बजाय बड़े भाई को सेब देने के, उसने उसके ऊपर सैकड़ों सुइयों की बौछार कर दी। इससे बड़े भाई दर्द के मारे जमीन पर लेटे रोने लगा।

अब दिन धीरे धीरे ढलने लगा, वहीँ छोटे भाई को चिंता होने लगी। इसलिए वह अपने बड़े भाई की तलाश में जंगल चला गया। उसने उस पेड़ के पास बड़े भाई को दर्द में पड़ा हुआ पाया, जिसके शरीर पर सैकड़ों सुई चुभी थी। उसके मन में दया आई, वह अपने भाई के पास पहुंचकर, धीरे धीरे हर सुई को प्यार से हटा दिया।

ये सभी चीज़ें बड़ा भाई देख रहा था और उसे अपने पर गुस्सा आ रहा था। अब बड़े भाई ने उसके साथ बुरा बर्ताव करने के लिए छोटे भाई से माफी मांगी और बेहतर होने का वादा किया। पेड़ ने बड़े भाई के दिल में आए बदलाव को देखा और उन्हें वह सब सुनहरा सेब दिया जितना की उन्हें आगे चलकर जरुरत होने वाली थी।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की हमेशा सभी को दयालु और शालीन बनना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोगों को हमेशा पुरस्कृत किया जाता है।

लोमड़ी और अंगूर की कहानी

बहुत दिनों पहले की बात है, एक बार एक जंगल में एक लोमड़ी को बहुत भूख लगी। उसने पूरी जंगल में छान मारा लेकिन उसे कहीं पर भी खाने को कुछ भी नहीं मिला। इतनी मेहनत से खोज करने के बाद भी , उसे कुछ ऐसा नहीं मिला जिसे वह खा सके।

अंत में, जैसे ही उसका पेट गड़गड़ाहट हुआ, वह एक किसान की दीवार से टकरा गया। दीवार के शीर्ष पर पहुँचकर, उसने अपने सामने बहुत से बड़े, रसीले अंगूरों को देखा। वो सभी अंगूर दिखने में काफ़ी ताज़े और सुंदर थे। लोमड़ी को ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वे खाने के लिए तैयार हैं।

अंगूर तक पहुँचने के लिए लोमड़ी को हवा में ऊंची छलांग लगानी पड़ी। कूदते ही उसने अंगूर पकड़ने के लिए अपना मुंह खोला, लेकिन वह चूक गया। लोमड़ी ने फिर कोशिश की लेकिन फिर चूक गया।

उसने कुछ और बार कोशिश की लेकिन असफल रहा।

अंत में, लोमड़ी ने फैसला किया कि वो अब और कोशिश नहीं कर सकता है और उसे घर चले जाना चाहिए। जब वह चला गया, तो वह मन ही मन बुदबुदाया, “मुझे यकीन है कि अंगूर वैसे भी खट्टे थे।”

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की जो हमारे पास नहीं है उसका कभी तिरस्कार न करें; कुछ भी आसान नहीं आता।

अहंकारी गुलाब की कहानी

एक बार की बात है, दूर एक रेगिस्तान में, एक गुलाब का पौधा था जिसे अपने सुंदर रूप (गुलाब का फ़ुल) पर बहुत गर्व था। उसकी एकमात्र शिकायत यह थी की, एक बदसूरत कैक्टस के बगल में बढ़ रही थी।

हर दिन, सुंदर गुलाब कैक्टस का अपमान करता था और उसके लुक्स पर उसका मजाक उड़ाता था, जबकि कैक्टस चुप रहता था। आस-पास के अन्य सभी पौधों ने गुलाब को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह भी अपने ही रूप से प्रभावित थी।

एक चिलचिलाती गर्मी, रेगिस्तान सूख गया, और पौधों के लिए पानी नहीं बचा। गुलाब जल्दी मुरझाने लगा। उसकी सुंदर पंखुड़ियाँ सूख गईं, अपना रसीला रंग खो दिया।

एक दिन दोपहर में, गुलाब ने ये नज़ारा देखा की एक गौरैया कुछ पानी पीने के लिए अपनी चोंच को कैक्टस में डुबा रही थी। यह देखकर गुलाब के मन में कुछ संकोच आयी।

हालांकि शर्म आ रही थी फिर भी, गुलाब ने कैक्टस से पूछा कि क्या उसे कुछ पानी मिल सकता है? इसके जवाब में, दयालु कैक्टस आसानी से सहमत हो गया। गुलाब को अपनी गलती की एहसास हुआ, वहीं उसने एक दूसरे का मदद किया इस कठिन गर्मी को पार करने के लिए।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की कभी भी किसी को उनके दिखने के तरीके से मत आंकिए।

दो मेंढ़कों की कहानी

एक बार मेंढकों का एक दल पानी की तलाश में जंगल में घूम रहा था। अचानक, समूह में दो मेंढक गलती से एक गहरे गड्ढे में गिर गए।

दल के दूसरे मेंढक गड्ढे में अपने दोस्तों के लिए चिंतित थे। गड्ढा कितना गहरा था, यह देखकर उन्होंने दो मेंढकों से कहा कि गहरे गड्ढे से बचने का कोई रास्ता नहीं है और कोशिश करने का कोई मतलब नहीं है।

वे लगातार उन्हें हतोत्साहित करते रहे क्योंकि दो मेंढक गड्ढे से बाहर कूदने की कोशिश कर रहे थे। वो दोनों जितनी भी कोशिश करते लेकिन काफ़ी सफल नहीं हो पाते।

जल्द ही, दो मेंढकों में से एक ने दूसरे मेंढकों पर विश्वास करना शुरू कर दिया – कि वे कभी भी गड्ढे से नहीं बच पाएंगे और अंततः हार मान लेने के बाद उसकी मृत्यु हो गई।

दूसरा मेंढक अपनी कोशिश जारी रखता है और आखिर में इतनी ऊंची छलांग लगाता है कि वह गड्ढे से बच निकलता है। अन्य मेंढक इस पर चौंक गए और आश्चर्य किया कि उसने यह कैसे किया।

अंतर यह था कि दूसरा मेंढक बहरा था और समूह का हतोत्साह नहीं सुन सकता था। उसने ये सोचा कि वे उसके इस कोशिश पर खुश कर रहे हैं और उसे कूदने के लिए उत्साहित कर रहे हैं !

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की दूसरों की राय आपको तभी प्रभावित करेगी जब आप उसपर विश्वास करेंगे, बेहतर इसी में है की आप खुद पर ज़्यादा विश्वास करें, सफलता आपके कदम चूमेगी।

मूर्ख गधा की कहानी

एक नमक बेचने वाला रोज अपने गधे पर नमक की थैली लेकर बाजार जाता था।

रास्ते में उन्हें एक नदी पार करना पड़ता था। एक दिन नदी पार करते वक्त, गधा अचानक नदी में गिर गया और नमक की थैली भी पानी में गिर गई। चूँकि नमक से भरा थैला पानी में घुल गया और इसलिए थैला ले जाने के लिए बहुत हल्का हो गया।

इसकी वजह से गधा बहुत ही खुश था। अब फिर गधा रोज वही चाल चलने लगा, इससे नमक बेचने वाले को काफ़ी नुक़सान उठाना पड़ता।

नमक बेचने वाले को गधे की चाल समझ में आ गई और उसने उसे सबक सिखाने का फैसला किया। अगले दिन उसने गधे पर एक रुई से भरा थैला लाद दिया।

अब गधे ने फिर से वही चाल चली। उसे उम्मीद थी कि रुई का थैला अभी भी हल्का हो जाएगा।

लेकिन गीला रुई (कपास) ले जाने के लिए बहुत भारी हो गया और गधे को नुकसान उठाना पड़ा। उसने इससे एक सबक सीखा। उस दिन के बाद उसने कोई चाल नहीं चली और नमक बेचने वाला खुश था।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की भाग्य हमेशा साथ नहीं देता है, हमेशा हमें अपने बुद्धि का भी इस्तमाल करना चाहिए।।

एक बूढ़े व्यक्ति की कहानी

गाँव में एक बुढ़ा व्यक्ति रहता था। वह दुनिया के सबसे बदकिस्मत लोगों में से एक था। सारा गाँव उसके अजीबोग़रीब हरकत से थक गया था।

क्यूँकि वह हमेशा उदास रहता था, वह लगातार शिकायत करता था और हमेशा खराब मूड में रहता था।

जितना अधिक वह जीवित रहा, उतना ही वो दुखी रहता और उसके शब्द उतने ही जहरीले थे। लोग उससे बचते थे, क्योंकि उसका दुर्भाग्य संक्रामक हो गया था।

उससे जो भी मिलता उसका दिन अशुभ हो जाता। उसके बगल में खुश रहना अस्वाभाविक और अपमानजनक भी था।

इतना ज़्यादा दुखीं होने के वजह से उसने दूसरों में दुख की भावना पैदा की।

लेकिन एक दिन, जब वह अस्सी साल के हुए, एक अविश्वसनीय बात हुई। ये बात लोगों में आज के तरह फैल गयी।

“वह बूढ़ा आदमी आज खुश था, वह किसी भी चीज़ की शिकायत नहीं कर रहा था, बल्कि पहली बार वो मुस्कुरा रहा था, और यहाँ तक कि उसका चेहरा भी तरोताज़ा दिखायी पड़ रहा था।”

यह देख कर पूरा गांव उसके घर के सामने इकट्ठा हो गया। और सभी ने बूढ़े आदमी से पूछा की : तुम्हें क्या हुआ है?

जवाब में बूढ़ा आदमी बोला: “कुछ खास नहीं। अस्सी साल से मैं खुशी का पीछा कर रहा हूं, और यह बेकार था, मुझे ख़ुशी कभी नहीं मिली। और फिर मैंने खुशी के बिना जीने और जीवन का आनंद लेने का फैसला किया। इसलिए मैं अब खुश हूं।”

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की खुशी का पीछा मत करो। जीवन का आनंद लो।

रास्ते में बाधा की कहानी

बहुत पुराने समय की बात है, एक राजा ने जानबूझकर एक बड़ा सा चट्टान रास्ते के बीचों बीच में रखवा दिया। वहीं वो पास के एक बड़े से झाड़ी में छुप गया। वो ये देखना चाहता था की आख़िर कौन वो चट्टान रास्ते से हटाता है।

उस रास्ते से बहुत से लोग आने जाने लगे लेकिन किसी ने भी उस चट्टान को हटाना ठीक नहीं समझा। यहाँ तक की राजा के दरबार के ही बहुत से मंत्री और धनी व्यापारी भी उस रास्ते से गुजरे, लेकिन किसी ने भी उसे हटाना ठीक नहीं समझा। उल्टा उन्होंने राजा को ही इस बाधा के लिए ज़िम्मेदार ठहराया।

बहुत से लोगों ने राजा पर सड़कों को साफ न रखने के लिए जोर-जोर से आरोप लगाया, लेकिन उनमें से किसी ने भी पत्थर को रास्ते से हटाने के लिए कुछ नहीं किया।

तभी एक किसान सब्जियों का भार लेकर आया। शिलाखंड (चट्टान) के पास पहुंचने पर किसान ने अपना बोझ नीचे रखा और पत्थर को सड़क से बाहर धकेलने का प्रयास किया। काफी मशक्कत के बाद आखिरकार उसे सफलता मिली।

जब किसान अपनी सब्जियां लेने वापस गया, तो उसने देखा कि सड़क पर एक पर्स पड़ा था, जहां पत्थर पड़ा था।

पर्स में कई सोने के सिक्के और राजा का एक नोट था जिसमें बताया गया था कि सोना उस व्यक्ति के लिए था जिसने सड़क से चट्टान को हटाया था।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की जीवन में हमारे सामने आने वाली हर बाधा हमें अपनी परिस्थितियों को सुधारने का अवसर देती है, और जबकि आलसी शिकायत करते हैं, दूसरे अपने दयालु हृदय, उदारता और काम करने की इच्छा के माध्यम से अवसर पैदा कर देते हैं।

स्कूल की दोस्ती

नरेंद्र बिहार के एक छोटे से गांव के सर्वोदय विद्यालय में पढता था। दरअसल नरेंद्र का परिवार दिल्ली शहर का था, क्यों की नरेंद्र के पिता भारतीय सेना में थे इसलिए दो साल पहले ही उसके पिताजी का उस गांव में बदली हुई थी। नरेंद्र पढ़ाई और खेल में बहुत अच्छा था, इसलिए वह उस गांव के विद्यालय में बहुत लोकप्रिय था।

एक दिन अचानक उसके पिताजी की बदली पटना शहर में हुई। दो महीने के अंदर नरेंद्र के परिवार को वह गांव छोड़कर पटना जाना पढ़ रहा था। दूसरे विद्यालय में वह कैसे जाएगा, उसका मन लगेगा या नहीं यह सोचकर नरेंद्र परेशान था।

उसकी परेशानी को देखकर उसकी की माँ ने उसे समझाया, “बेटा, हमें यह गांव छोड़कर तो जाना ही पड़ेगा। परंतु तुम्हें ज़्यादा निराश होने की जरूरत नहीं, थोड़े ही दिनों में वहां भी तुम्हारे मित्र बन जाएंगे और तुम्हारा मन स्कूल व मित्रों में लगने लगेगा।”

ट्रांसफर का ऑर्डर लेकर जब नरेंद्र के पिता अपने परिवार के साथ पटना पहुँचे तो यह नया शहर नरेंद्र के मन को एकदम भा गया। वहां शीघ्र ही एक अच्छे विद्यालय में नरेंद्र को दाखिला मिल गया। परंतु जब नए विद्यालय में नरेंद्र को उसकी कक्षा के विद्यार्थियों ने चिढ़ाना शुरू किया तो उसे बहुत बुरा लगा। नरेंद्र बहुत दुखी लगने लगा।

एक दिन जब उसकी माँ ने उससे खुलकर इसका कारण पूछा तो फिर नरेंद्र ने माँ से सभी बातें स्पष्ट बता दीं। वह माँ से यह बताते हुए कि कक्षा के विद्यार्थी उसे चिढ़ाते है और उसे अपने साथ नहीं खेलने नहीं देते है।

उसकी माँ ने उसे समझाया, “बेटा विद्यालय तो जाना ही होगा। जब तुम्हें बच्चे चिढ़ाएं तो तुम कुछ मत कहना और न ही मुँह बनाना। बल्कि उनके साथ हँसने लगना। और तुम बच्चों से खुद ही बात करने की कोशिश करना। उन्हें यदि पढ़ाई में कोई दिक्कत होती हो तो उनकी मदद करना। धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”

नरेंद्र माँ की बताई तरकीब के अनुसार चलता गया। अब पुराने विद्यालय की ही तरह नरेंद्र इस विद्यालय में भी प्रसिद्ध होने लगा था। अपनी पढ़ाई और मेहनत के दम पर उसने अध्यापकों के बीच भी अपनी अच्छी पहचान बना ली थी। अब सब बच्चे भी उससे मित्रता करने को आतुर थे।

शिक्षा: जीवन में कोई सही निर्णय नहीं है, क्योंकि हम जो भी निर्णय लेते हैं वह नया और अप्रत्याशित होता है।

पोपटलाल का कुत्ता

एक दिन पोपटलाल गाँव की गलियों में घूम रहा था, उसने देखा की एक घर के बाहर एक कुत्ते का बच्चा कटोरे में खाना खा रहा है। वो कटोरा बहुत ही अनोखा था। उसने सोचा, “इस कटोरे की कीमत बाज़ार में बहुत ज्यादा होगी। लगता है इस घर के मालिक को इस कटोरे की कद्र नहीं जानते, इसलिए उसमे कुत्ते के पिल्लै को खाना खिला रहा है।”

उसने पास ही बैठे उस घर के मालिक से कहा, “भाई साहब! मुझे आपके कुत्ते के पिल्लै अच्छे लगे, मैं दोनों के लिए १००० रुपयों दूंगा। वैसे भी इस साधारण कुत्ते की क्या कीमत।”

वह आदमी बोला, “साहब! 1000 बहुत कम हैं, हाँ मुझे आप ८००० अभी दे तो कुत्ते के दोनों पिल्लै आपके।”

पोपटलाल ने कुछ मोलभाव करना चाह पर वो घर का मालिक नहीं माना। अनोखे कटोरे की लालच में पोपटलाल ने उसे ८००० रूपये दे भी डाले। पोपटलाल सोच रहा था की कटोरे की कीमत तो कम से कम उससे पांच गुने ज्यादा होगी।

कुत्ते के पिल्लो को ले जाते हुवे पोपटलाल ने अपना दाव खेला, “भाई साहब! अब जब पिल्लै मैंने खरीद ही लिया हैं, तो आप इस कटोरे का क्या करेंगे? ये भी मैं ५० में खरीद लेता हूँ।

घर का मालिक बोला, “नहीं साहब वो तो मैं नहीं बेचूंगा।”

पोपटलाल तो चकरा गया और पूछने लगा, “ऐसा क्यू?? क्या खास है इस कटोरे में?”

घर का मालिक बोला, “वो तो मुझे नहीं मालूम, पर ये मेरे लिए बहुत लकी हैं। पिछले पिछले महीने से मैंने जब से इस कटोरे में कुत्तों को खाना देना शुरू किया हैं, मैंने पन्द्रह कुत्तों बेच दी हैं।

बच्चे और उनके दादाजी

एक गाँव में दो चतुर बच्चे अपने माता-पिता के साथ रहते थे। एक दिन उनके दादाजी उनके साथ रहने के लिए आए। वह एक नाविक रह चुके थे। बच्चों को उनसे कहानियाँ सुनना अच्छा लगता था।

वह उन्हें बताते, कैसे वह समुद्री डाकुओं से लड़े। धीरे-धीरे दादाजी कहानियाँ सुनाकर ऊब गए। वह अपने हमउम्र लोगों से बातें करना चाहते थे। गाँव के पास ‘नाविक की वापसी’ नामक एक सराय थी।

बच्चों ने दादाजी को उसके बारे में बताते हुए कहा-“आपको वहाँ जाना चाहिए। वह नाविकों से भरा रहता है।” लेकिन दादाजी ने कहा-” अब मैं नए दोस्त नहीं बना सकता।”

बच्चों ने उस सराय के मालिक के बच्चों को बताया-“हमारे दादाजी एक नाविक थे। वह समुद्री डाकुओं और गड़े हुए खजाने की बहुत सी कहानियाँ जानते हैं और यह भी जानते हैं कि डाकुओं ने खज़ाना कहाँ छुपाया था।”

जल्दी ही, दादाजी को सराय से निमंत्रण आने लगे। दादाजी अब अपना समय सराय में बिताने लगे और वह अब यहाँ पर खुश थे। बच्चे भी खुश थे क्योंकि अब दादाजी हमेशा उनके साथ ही रहने वाले थे।

नकलची कौआ

एक बार एक जंगल में एक मूर्ख कौआ रहता था। एक दिन उसने एक चील को एक कमज़ोर मेमने पर हमला करते हुए देखा। उसके देखते-देखते,

उस चील ने मेमने को अपने ताकतवर पंजों में उठा लिया और फिर वह उसे अपने घोंसले में ले गया। कौआ उस चील से बहुत प्रभावित हुआ। कौए ने सोचा वह भी ऐसा कर सकता है।

उसने भी अपना शिकार ढूंढना शुरु किया। आकाश में उड़ते हुए उसे भी एक मेमना दिखा। वह आकाश से सीधा उस पर जा गिरा। उसने मेमने को अपने पंजों में पकड़ने की कोशिश की, परंतु वह उसके लिए बहुत भारी था।

यही नहीं, वह उसके बालों में बुरी तरह से फंस गया। चरवाहे ने उसे देख लिया और पिंजरे में बंद कर दिया। इस तरह मूर्ख कौआ चील की नकल करने के कारण खुद ही जाल में फंस गया।

गरीब भक्त

एक गाँव में एक निर्धन व्यक्ति रहता था। वह इतना निर्धन था कि मुश्किल से अपने परिवार के लिए एक वक्त का खाना जुटा पाता था। लेकिन उसने कभी अपनी निर्धनता की शिकायत किसी से नहीं की।

उसके पास जो कुछ था, वह उसी में संतुष्ट था। वह देवी का बहुत बड़ा भक्त था। इसीलिए वह पूजा करने के लिए हमेशा मंदिर जाता था। मंदिर जाने के बाद ही वह अपने कार्य पर जाता था।

एक दिन देवी को अपने इस गरीब भक्त पर दया आ गई। इसलिए एक दिन सुबह-सुबह देवी ने अपनी दिव्य शक्ति से मंदिर के बाहर एक सोने के सिक्कों से भरा थैला रख दिया।

वह भक्त मंदिर आया और आँखें बंद करके मंदिर के चारों ओर देवी का ध्यान करते हुए परिक्रमा करने लगा। आँखें बंद होने के कारण वह सोने के सिक्कों से भरा थैला नहीं देख पाया और यूँ ही चला गया। यह देखकर देवी ने सोचा, ‘समय से पहले और भाग्य से अधिक किसी को कुछ नहीं मिलता।’.

सबसे शक्तिशाली आशीर्वाद

पटना शहर में एक गरीब दर्जी अपने इकलौते बेटे के साथ एक छोटे से घर में रहता था। उसका सपना था की उसका बेटा बहुत अच्छी पढ़ाई करके एक अच्छी से नौकरी करे। इसलिए उन्होंने तय किया कि उसके बेटे को सबसे अच्छी शिक्षा मिलेगी, चाहे उनकी वर्तमान स्थिति कैसी भी हो।

पिता दिन रात मेहनत करता और अपने बेटे के पढाई का खर्चा उठता। बेटा ही खूब मन लगाकर पढता।

एक दिन पिता का सपना सच हो गया। बेटा पढ़ लिख कर बहुत बड़ा आदमी बन गया और वह अब शहर की सबसे अच्छी कंपनी का मुखिया था।

एक दिन बेटा अपने बड़े और आलिशान ऑफिस में बैठा हुआ था, तभी उसके पिता उसका ऑफिस देखने आये। बेटा अपने ऑफिस की शानदार कुर्सी पर बैठा हुआ था। पिता का देख बेटा खुश हो गया और अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया।

पिता ने बेटे को कुर्सी पर बैठाया और बेटे के पीछे खड़े हो गए और उसके कंधो पर अपना हाथ रखते हुए कहा “बेटा, तुम्हे पता है कि आज इस दुनिया में सबसे शक्तिशाली इंसान का एहसास किसे होता होगा?”

पिता आगे कुछ और बोल पाते तभी बेटे ने कहा “पिता जी मैं हूँ सबसे शक्तिशाली इंसान।” पिता ने सोचा था कि बेटा उन्हें ही सबसे शक्तिशाली कहेगा लेकिन बेटे के इस जवाब से उन्हें बहुत निराशा हुई।

“ठीक कहा बेटा” इतना कहते ही पिता बेटे के ऑफिस से जाने ही लगे थे कि एक बार और पीछे मुड़ कर वही सवाल बेटे से किया “बेटा, तुम्हे अभी भी लगता है कि तुम सबसे शक्तिशाली हो?”

बेटे ने कहा “नहीं पिता जी, इस दुनिया में अगर कोई सबसे शक्तिशाली है तो वो आप हैं”

“लेकिन अभी तो तुमने कहा था कि तुम ही सबसे शक्तिशाली हो” पिता ने फिर पुछा

“हाँ, वो मैंने इसलिए कहा था क्यूंकि उस वक़्त दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान के हाथ मेरे कंधे पर थे, इसलिए उस वक़्त मैं खुद को सबसे शक्तिशाली मेहसूस कर रहा था” बेटे ने जवाब दिया ये सुन पिता की आँखों में आंसू आ गए और उन्होंने अपने बेटे को गले से लगा लिया।

शिक्षा: माता पिता का आशीर्वाद ही है जो हमें इस दुनिया के सबसे शक्तिशाली बना सकता है।

रेगिस्तान की यात्रा

एक आदमी रेगिस्तान में यात्रा कर रहा था। साथ में था उसका ऊंट और ऊंट पर लदा था ढेर सारा सामान। ऊंट और वह दोनों ही पसीने से तर बतर थे। गरमी से थक कर उस आदमी ने फैसला किया कि अब वह कहीं आराम करेगा। इसलिए यात्रा बीच में ही रूक गई। ऊंट की पीठ से अपना तंबू उतारकर आदमी ने एक जगह गाढ़ दिया और उसके अंदर जाकर सुस्ताने लगा।

ऊंट भी छाया चाहता था मगर आदमी ने डपटकर उसे धूप में ही खड़े रहने का हुक्म सुना दिया। उस ने तंबू में करीब दो घंटे तक आराम किया। जब सूरज थोड़ा सा ढल गया, तब उस ने भोजन किया और ऊंट पर सवार होकर यात्रा के लिए चल पड़ा। ऊंट बेचारा मन मसोसकर रह गया। उसे गुस्स तो बहुत आ रहा था अपने निर्दयी मालिक पर, पर अब वो कुछ नहीं कर सकता था।

रात हो गई। मौसम ठण्डा होने लगा था। रेगिस्तान में दिन जितने गरम होते हैं, रातें उतनी ही ठण्डी होती हैं। आधी रात होते-होते उस आदमी के दांत ठंड से किटकिटाने लगे तो उसने फिर ऊंट को रोका और उसकी पीठ से तंबू उतराकर रेत में ही लगाया तथा उसके अंदर घुसकर आराम करने का विचार किया।

इस बार ऊंट पहले से ही तैयार था। उसने कहा, ”मालिक, मुझे भी ठंड लग रही है।“

”तो?“ आदमी ने घूरकर उसकी ओर देखा और टैंट में घुस गया। ऊंट बार बार तंबू में सिर घुसेड़कर पूछता, ”मालिक मैं भी अंदर आ जाऊं?“

उस आदमी ने सोचा कि ऐसे तो यह बेहूदा ऊंट मुझे सोने ही नहीं देगा। इसलिए उसने कहा, ”ठीक है, तुम भी अपना सिर तंबू के अंदर कर लो।“ ऊंट खुश हो गया। वह मन ही मन मुस्करा रहा था।

कुछ ही समय गुजरा था कि ऊंट ने फिर कहा, ”वाह मालिक, मजा आ गया। अब मेरे सिर को ठंड नहीं लग रही है। आप बुरा न मानें तो अपनी अगली टांगें भी तंबू के अंदर कर लूं।“ आदमी ने सोचा इसमें बुराई क्या है? उसने अपने पैर सिकोड़ लिए और ऊंट ने गरदन और अगली टांगें भी टैंट में कर लीं।

आदमी की आंखें झपकी ही थी कि ऊंट जोर जोर से कराहने लगा। आदमी ने पूछा, ”अब क्या हुआ?“ ऊंट बोला, ”ऐसे तो मैं बीमार हो जाऊंगा मालिक! आधा शरीर गरम और आधा ठंडा हो रहा है। देख लीजिए, अगर मैं बीमार हो गया तो आपको भी यात्रा बीच में ही छोड़नी पड़ेगी।“

वह आदमी बेचारा सोच में पड़ गया। फिर बोला, ”तो क्या करूं?“ ”करें क्या मालिक? मैं अपना बाकी शरीर भी अंदर कर लेता हूं।“ ऊंट बोला।

”नहीं, नहीं! इस तंबू में दो की जगह नहीं है।“ ”हां, यह बात तो है मालिक।“ ऊंट बोला, ”ऐसा कीजिए, आप थोड़ा बाहर निकल जाइए। मैं अंदर लेट जाता हूं।“ यह कहकर ऊंट तंबू में घुस गया और आदमी को सारी रात रेगिस्तान की ठंड में गुजरानी पड़ी।

इस तरह समझदार ऊंट ने अपना बदला चुकाकर सारा हिसाब किताब बराबर कर लिया। अगली यात्रा पर ऊंट के मालिक ने बड़ा तंबू खरीद ने का सोचा, उसे उसका सबक मिल चूका था।

लोमड़ी और सारस की कहानी

एक दिन, एक स्वार्थी लोमड़ी ने एक सारस को रात के खाने के लिए आमंत्रित किया। सारस निमंत्रण से बहुत खुश हुआ, क्यूंको उसे खाने का काफ़ी शौक़ था। वह समय पर लोमड़ी के घर पहुँची और अपनी लंबी चोंच से दरवाजा खटखटाया।

लोमड़ी ने उसे घर पर आमंत्रित किया और अंदर अंदर आने को कहा। फिर उसे खाने की मेज पर ले गई और उन दोनों के लिए उथले कटोरे में कुछ सूप परोसा। चूंकि कटोरा सारस के लिए बहुत उथला था, इसलिए वह सूप बिल्कुल नहीं पी सकती थी। लेकिन, लोमड़ी ने जल्दी से अपना सूप चाट लिया।

सारस गुस्से में और परेशान थी, लेकिन उसने अपना गुस्सा नहीं दिखाया और विनम्रता से व्यवहार किया। वहीं उसने मन ही मन एक योजना बनायी, लोमड़ी को सबक सिखाने के लिए।

उसने फिर लोमड़ी को अगले ही दिन रात के खाने पर आमंत्रित किया। जब लोमड़ी उसके घर पर आयी, तब उसने भी सूप परोसा, लेकिन इस बार सूप को दो लंबे संकरे फूलदानों में परोसा। सारस ने अपने फूलदान से सूप को खा लिया, लेकिन लोमड़ी अपनी संकीर्ण गर्दन के कारण उसमें से कुछ भी नहीं पी सकी।

अब ये सब देखकर लोमड़ी को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह भूखा घर चला गया।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की एक स्वार्थी कार्य जल्दी या बाद में उलटा अवस्य पड़ ही जाता है।

क्रिस्टल बॉल की कहानी

बहुत दिनों पहले की बात है। एक बार एक छोटा सा लड़का राम अपने बगीचे में खेल रहा था। उसे अपने बगीचे के बरगद के पेड़ के पीछे एक क्रिस्टल बॉल मिली। पेड़ ने उससे कहा कि यह एक जादूयी क्रिस्टल बॉल है जो की उसकी इच्छा की पूर्ति करेगा।

यह सुनकर वह बहुत खुश हुआ और उसने बहुत सोचा, लेकिन दुर्भाग्य से उसे ऐसी कोई भी चीज़ नहीं मिली जिसे की वो उस क्रिस्टल बॉल से माँग सके। इसलिए, उसने क्रिस्टल बॉल को अपने बैग में रखा और तब तक इंतजार किया जब तक कि वह अपनी इच्छा पर फैसला नहीं कर लेता।

ऐसे ही सोचते सोचते बहुत दिन बीत गए, लेकिन उसे अभी तक भी ये समझ में नहीं आ रहा था की वो आख़िर में क्या माँगे। एक दिन उसका मित्र उसे उस क्रिस्टल बॉल के साथ देख लेता है। वहीं उसने राम से वो क्रिस्टल बॉल चुराया और गाँव के सभी लोगों को दिखाया।

उन सभी ने अपने लिए महल और धन और बहुत सारा सोना माँगा, लेकिन वे सभी भी एक से अधिक इच्छा नहीं कर सके। अंत में, हर कोई नाराज था क्योंकि उन्हें वो सब कुछ नहीं मिल पाया जिन्हें की उन्हें चाह थी।

वे सभी बहुत दुखी हुए और उन्होंने राम से मदद मांगने का फैसला किया। उनकी बातें सुनकर राम ने एक इच्छा माँगना चाहा, वहीं राम ने अपनी ये इच्छा माँगी कि सब कुछ पहले जैसा हो जाए। इससे पहले जो सभी गाँव वालों ने अपने लालच को पूरा करने की कोशिश की थी उनकी सभी चीजें ग़ायब हो गयी।

यानी की उनके द्वारा माँगी गयी महल और सोना गायब हो गया और गाँव वाले एक बार फिर खुश और संतुष्ट हो गए। अंत में सभी ने राम को उसकी सूझ बुझ के लिए धन्यवाद कहा।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की पैसा और दौलत हमेशा खुशी नहीं लाते।

नौकरी की चिंता

शामलाल ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भी उसे नौकरी नहीं मिली इसलिए वह डिप्रेशन में चला गया। वह अकेले कमरे में रहने लगा। उसके माता-पिता ने भी बहुत कोशिश की उसे नौकरी दिलाने लेकिन वो भी असफल रहे।

एक दिन शामलाल के पिता ने उसे अपने कमरे में रोते हुए देखा। उसने अनदेखा किया और रसोईघर में जाकर शामलाल को आवाज दी। शामलाल थोड़ी देर में रसोईघर में आया। शामलाल के पिता ने तीन बर्तनों में पानी भरा और तीनों को आग पर रख दिया।

जब बर्तन में रखा पानी उबलने लगा तो उन्होंने एक बर्तन में कुछ आलू डाले, दूसरे में अंडे डाले और तीसरे में कॉफी के बीज डाले। फिर उन्होंने पानी को उबलने दिया। वह अपनी बेटे से बिना कोई शब्द कहे चुपचाप बैठ गए। शामलाल को प्रतीक्षा करने में मुश्किल हो रही थी और वह सोच रहा था कि उसके पिता क्‍या कर रहे है।

पंद्रह मिनट बाद उसके पिता ने गैस बंद की। उन्होंने बर्तन में से आलू निकाले और एक कटोरी में डाल दिए। फिर उन्होंने अंडे निकाले और उसे दूसरी कटोरी में डाल दिए। फिर उन्होंने कॉफी निकाली और कप में डालीं।

अपने बेटे की तरफ देखते हुए उन्‍होंने उससे पूछा, “तुम क्या देख रहे हो?” शामलाल ने जवाब दिया, “आलू, अंडे और कॉफी” फिर पिता ने कहा, “थोड़ा करीब से देखों और आलू को छूकर देखो।” शामलाल पास गया और उसने देखा कि आलू नरम थे।

फिर पिता ने उसे अंडा लेकर तोड़ने के लिए कहा। अंडे का छिलका उतारने पर शामलाल ने देखा कि अंडा अंदर से पका हुआ था। फिर आखिर में पिता ने उसे कॉफो पीने के लिए कहा। कॉफी की खुशबू से उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने अपने पिता से पूछा, “इसका कया मतलब है?” फिर उसके पिता ने बताया कि, “आलू, अंडे और कॉफी को मैंने एक हो मात्रा में पानी में उबाला। लेकिन तीनों पर उसका प्रभाव अलग अलग हुआ।

आलू मजबूत था लेकिन गर्म पानो में डालकर बह नरम और कमजोर हो गया। अंडा पहले नाजुक था और उसकी बाहरी परत उसका ध्यान रखती है लेकिन पानी में डालकर बह मजबूत हो गा। लेकिन काफी के. चीज अनमोल थे। जब उन्हें उबलते हुए पानी में डाला गया तो कुछ नया निकलकर सामने आया।”

फिर पिता ने अपने बेटे शामलाल से पूछा, “तुम इनमें से कौन हो? जब तुम्हारे सामने कोई मुसीबत आती है तो तुम किस, तरह सामना करते हो? क्‍या तुम आलू हो, अंडा हो, या कॉफी के बीज हो?”

शिक्षा: जिंदगी मे सीखना और मुश्किलों को दूर करना चलता रहता है। हमें हर दिन कुछ नया अनुभव करने को मिलता है जिससे हम अपनी जिंदगी को बेहतर बनाते हैं।

लालची व्यापारी

एक भिखारी को बाज़ार में चमड़े का एक बटुआ पड़ा मिला। उसने बटुए को खोलकर देखा। बटुए में सोने की सौ सिक्के थे। तभी भिखारी ने एक व्यापारी को चिल्लाते हुए सुना, “मेरा चमड़े का बटुआ खो गया है! जो कोई उसे खोजकर मुझे सौंप देगा, मैं उसे एक अच्छा सा ईनाम दूंगा!”

भिखारी बहुत ईमानदार आदमी था। उसने बटुआ व्यापारी को सौंपकर कहा, “ये रहा आपका बटुआ। क्या आप मुझे ईनाम देंगे?”

“ईनाम?” व्यापारी ने अपने सिक्के गिनते हुए हिकारत से कहा, “इस बटुए में तो दो सौ सिक्के थे! तुमने आधी रकम चुरा ली और अब ईनाम मांगते हो? दफा हो जाओ वर्ना मैं सिपाहियों को बुला लूँगा।”

इतनी ईमानदारी दिखाने के बाद भी व्यर्थ का दोषारोपण भिखारी से सहन नहीं हुआ। वह बोला, “मैंने कुछ नहीं चुराया है! मैं दरबार जाने के लिए तैयार हूँ।”

दरबार के अदालत में दोनों की बात सुनी और कहा, “मुझे तुम दोनों पर यकीन है. मैं इंसाफ करूँगा। व्यापारी, तुम कहते हो कि तुम्हारे बटुए में दो सौ सिक्के थे। लेकिन भिखारी को मिले बटुए में सिर्फ सौ सिक्के। इसका मतलब यह है कि यह बटुआ तुम्हारा नहीं है। चूंकि भिखारी को मिले बटुए का कोई दावेदार नहीं है इसलिए मैं ईनाम में भिखारी को पुरे सौ सिक्के देता हूँ।”

लालची व्यापारी हाथ मलता रह गया। अब वह चाहकर भी अपने बटुए को अपना नहीं कह सकता था क्योंकि ऐसा करने पर उसे कड़ी सजा हो जाती। भिखारी को ईमानदारी का एक अच्छासा ईनाम मिल गया था।

मेहनत के सपने

एक गांव में एक भिकारी रहता था जो बेहद आलसी और गरीब था। वह मेहनत वाला कोई काम नहीं करना चाहता था लेकिन वह अमीर बनने के सपने देखता था। उसे उसका रोज का खाना भी भिक में ही मिलता था।

एक दिन गांव में बड़ी सी शादी थी। शादी के दिन दूल्हे ने उसे दूध का मटका दिया। भिकारी दूध को उबाला, उसमें से कूछ दूध पीया और बाकी दूध मटके में डाल दिया। उसने दूध में थोड़ा सा दही मिलाकर दूध को दही जमाने के लिए रख दिया। फिर वह आराम करने के लिए लेट गया।

वह दूध के मटके को देखकर बेहद खुश होता रहा और सोते हुए भी उस दही के मटके के बारे में सपने देखने लगा। उसने सोचा कि अगर वह अमीर बन गया तो उसके सारे दुख दूर हो जाएंगे। फिर उसका ध्यान उस दूध के मटके की तरफ चला गया जिसमें उसने दही जमाने के लिए रखा था।

वह सपने देखता रहा, “सुबह तक दूध का मटका दही में बदल जाएगा। मै दही में मदानी मार के उसमें से मक्खन निकालूंगा और फिर मै मक्खन को गर्म करके उसका घी बनाऊंगा। फिर मै बाजार जाकर उस घी को बेचूंगा और उसमें से पैसे कमाऊंगा।

उस पैसे से मैं एक मुर्गी खरीदूंगा। वह मुर्गी अंडे देगी और थोड़े समय बाद उन अंडों में से और मुर्गियां और मुर्गें निकलेंगे। यह मुर्गे और मुर्गियां बहुत सारे अंडे पैदा करेंगे। फिर कुछ समय में मेरा खुद का मुर्गी फार्म होगा।” वह सोचता रहा।

“फिर मै अपने फार्म की सारी मुर्गियां बेच दूंगा और फिर उससे गांव खरीदूंगा और दूध का व्यापार शुरू करूंगा। मुझसे फिर सारे गांव के लोग दूध खरीदेंगे। मैं बहुत आमिर बन जाऊंगा। सब लोग मेरा आदर करेंगे और अगर वह कोई भी गलत काम करेगा तो मै उसे गुस्सा करूंगा। उसे सही काम आदत डालने के लिए मैं उसे डंडे से भी मारूंगा।” अपने सपने में उस भिकारी ने अपने पलंग के पास रखे डंडे को उठा लिया और उस डंडे को मटके पर मार दिया। दूध का मटका टूट गया और वह अपने सपने से जाग गया। फिर उसे अहसास हुआ कि वह दिन में सपने देख रहा था।

शिक्षा: आपके सपने मेहनत के बिना कभी पूरे नहीं होंगे।

आदत का जिम्मेदार

एक आदमी को रोज़ दारू पिने की बुरी आदत पड़ गयी थी। उसकी इस आदत से घरवाले बड़े परेशान रहते थे। गांव के लोगों ने उसे समझाने कि भी बहुत कोशिश कि, लेकिन वो हर किसी को एक ही जवाब देता, “मैंने ये आदत नहीं पकड़ी, इस आदत ने मुझे पकड़ रखा है।”

वास्तव में सचमुच वो इस आदत को छोड़ना चाहता था, पर कई कोशिशों के बावजूद वो ऐसा नहीं कर पा रहा था। उसके परिवार वालों ने सोचा कि शायद शादी करवा देने से वो ये आदत छोड़ दे सकता है, इसलिए उसकी शादी करा दी गयी।

पर कुछ दिनों तक सब ठीक चला और फिर से वह शराब पिने लगा। उसकी पत्नी भी अब काफी चिंतित रहने लगी, और उसने निश्चय किया कि वह किसी न किसी तरह अपने पति की इस आदत को छुड़वा ही लेगी।

एक दिन गांव में प्रसिद्ध साधु महाराज आ गए। वो अपने पति को लेकर उनके आश्रम पहुंची। साधु ने कहा, “बताओ पुत्री तुम्हारी क्या समस्या है?”

पत्नी ने दुखी स्वर में सारी बातें साधु महाराज को बता दी। साधु महाराज उनकी बातें सुनकर समस्या कि जड़ समझ चुके थे, और समाधान देने के लिए उन्होंने पति-पत्नी को अगले दिन आने के लिए कहा।

अगले दिन वे आश्रम पहुंचे तो उन्होंने देखा कि साधु महाराज एक पेड़ को पकड़ के खड़े है। उन्होंने साधु से पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं, और पेड़ को इस तरह क्यों पकडे हुए हैं?

साधु ने कहा, “आप लोग जाइये और कल आइयेगा” फिर चौथे दिन भी पति-पत्नी पहुंचे तो देखा कि फिर से साधु पेड़ को पकड़ के खड़े हैं।

उन्होंने पूछा, “महाराज माफ़ करिये पर आप ये क्या कर रहे हैं? आप इस पेड़ को छोड़ क्यों नहीं देते?”

साधु बोले, “मैं क्या करूँ बालक ये पेड़ मुझे छोड़ ही नहीं रहा है?”

पति हँसते हुए बोला, “महाराज आप पेड़ को पकडे हुए हैं, पेड़ आप को नहीं! आप जब चाहें उसे छोड़ सकते हैं”

साधू-महाराज गंभीर होते हुए बोले, “इतने दिनों से मै तुम्हे क्या समझाने कि कोशिश कर रहा हूँ। यही न कि तुम दारू पिने की आदत को पकडे हुए हो, ये आदत तुम्हे नहीं पकडे हुए है!”

पति को अपनी गलती का अहसास हो चुका था। वह समझ गया कि किसी भी आदत के लिए वह खुद जिम्मेदार है, और वह अपनी इच्छा शक्ति के बल पर जब चाहे उसे छोड़ सकता है।

आलू, अंडे और कॉफी बीन्स की कहानी

एक लड़का था जिसका नाम जॉन था और वो काफ़ी उदास था। उसके पिता को वह रोता हुआ मिला।

जब उसके पिता ने जॉन से पूछा कि वह क्यों रो रहे हैं, तो उसने कहा कि उसके जीवन में बहुत सारी समस्याएं हैं। उसके पिता बस मुस्कुराए और उसे एक आलू, एक अंडा और कुछ कॉफी बीन्स लाने को कहा। उसने उन्हें तीन कटोरे में रखा।

फिर उन्होंने जॉन से उनकी बनावट को महसूस करने के लिए कहा और फिर उन्होंने प्रत्येक कटोरी में पानी भर देने का निर्देश दिया।

जॉन ने वैसा ही किया जैसा उसे बताया गया था। उसके पिता ने फिर तीनों कटोरे उबाले।

एक बार जब कटोरे ठंडे हो गए, तो जॉन के पिता ने उन्हें अलग-अलग खाद्य पदार्थों की बनावट को फिर से महसूस करने के लिए कहा।

जॉन ने देखा कि आलू नरम हो गया था और उसकी त्वचा आसानी से छिल रही थी; अंडा कठिन और सख्त हो गया था; वहीं कॉफी बीन्स पूरी तरह से बदल गई थी और पानी के कटोरे को सुगंध और स्वाद से भर दिया था।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की जीवन में हमेशा समस्याएँ और दबाव होंगे, जैसे कहानी में उबलता पानी। इन समस्याओं पर आप इस तरह से प्रतिक्रिया करते हैं, यही सबसे अधिक मायने रखती है!

कौवे की गिनती

एक दिन की बात है, अकबर महाराज जे अपने सभा में एक अजीब सा सवाल पूछा, जिससे पूरी सभा के लोग हैरान रह गए। जैसे ही वे सभी उत्तर जानने की कोशिश कर रहे थे, तभी बीरबल अंदर आए और पूछा कि मामला क्या है।

उन्होंने उससे सवाल दोहराया। सवाल था, “शहर में कितने कौवे हैं?“

बीरबल तुरंत मुस्कुराए और अकबर के पास गए। उन्होंने उत्तर की घोषणा की; उनका जवाब था की, नगर में इक्कीस हजार पांच सौ तेईस कौवे हैं। यह पूछे जाने पर कि वह उत्तर कैसे जानते हैं, तब बीरबल ने उत्तर दिया, “अपने आदमियों से कौवे की संख्या गिनने के लिए कहें।

यदि अधिक मिले, तो कौवे के रिश्तेदार उनके पास आस-पास के शहरों से आ रहे होंगे। यदि कम हैं, तो हमारे शहर के कौवे शहर से बाहर रहने वाले अपने रिश्तेदारों के पास जरूर गए होंगे।”

यह जवाब सुनकर, राजा को काफ़ी संतोष मिला। इस उत्तर से प्रसन्न होकर अकबर ने बीरबल को एक माणिक और मोती की जंजीर भेंट की। वहीं उन्होंने बीरबल की बुद्धि की काफ़ी प्रसंशा करी।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की आपके उत्तर में सही स्पष्टीकरण होना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि सही उत्तर का होना।

अपनी मदद आप स्वयं करते हैं

एक बार एक धनी व्यापारी व्यापार के उद्देश्य से पानी के जहाज द्वारा अपने शहर से दूसरे शहर जा रहा था। वह अपने साथ कीमती रत्न एवं सोने के सिक्कों से भरा एक संदूक भी ले जा रहा था।

रास्ते में तूफान आ गया। जहाज इधर-उधर हिलोरें लेने लगा। कुछ घंटों के बाद तूफान तो थम गया, लेकिन जहाज की तली में एक छेद हो गया। अब जहाज में पानी भरने लगा।

यह देखकर कुछ लोग जहाज में ही डूब गए और कुछ सौभाग्यशाली तैरकर किनारे पहुँच गए। यह देखकर व्यापारी ने प्रार्थना करनी शुरू की, “हे भगवान! कृपा करके मेरा जीवन बचा लो।”

एक व्यक्ति व्यापारी के पास गया और बोला, “कूदो और तैरकर समुद्र के किनारे पहुँचो। भगवान उसकी मदद करता है जो अपनी मदद स्वयं करते हैं।” लेकिन व्यापारी ने उसकी एक न सुनी।

वह जहाज में ही रहा। थोड़ी देर में जहाज डूब गया और वह व्यापारी भी जहाज के साथ डूबकर अकाल मृत्यु का ग्रास बना।

कड़वा सच

जंगल के राजा शेर के जन्मदिन के अवसर पर सभी पशु-पक्षी आमंत्रित शेर की माँद में एक विशाल भोज की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई थीं। सभी पशु-पक्षी सज-धजकर नियत समय पर समारोह में पहुँचे।

समारोह में गधे को छोड़कर सभी पशु-पक्षी आए थे। शेर ने केक काटा और सभी ने जन्मदिन का गीत गाया। उसके बाद सभी ने भोज का आनंद लिया। शेर को गधे के आने की पूरी उम्मीद थी, लेकिन वह नहीं आया। तब शेर ने सोचा।

‘हो न हो, किसी जरूरी कार्य की वजह से गधा नहीं आ पाया होगा।’ अगले दिन जब शेर गधे से मिला तो उसने गधे से इस विषय में पूछा। गधा बोला, “मुझे समारोह आदि में जाने से नफरत है।

मुझे घर पर रहकर आराम करना ही अधिक पंसद है।” गधे ने शेर से सत्य ही कहा था, जो कि कड़वा था। गधे की बात सुनकर शेर को बहुत गुस्सा आया और उसने गधे को जंगल से निष्कासित कर दिया।

तभी से गधा आदमी के साथ रह रहा है और उसका बोझ उठाने को विवश है। उसकी यह दशा एक कड़वा सच कहने के कारण हुई। किसी ने ठीक ही कहा है कि सच हमेशा कड़वा होता है।

किंग कोबरा और चींटियाँ

बहुत समय पहले की बात है, एक भारी किंग कोबरा एक घने जंगल में रहता था। वह रात में शिकार करता था और दिन में सोता रहता था।

धीरे-धीरे वह काफी मोटा हो गया और पेड़ के जिस बिल में वह रहता था, वह उसे छोटा पड़ने लगा। वह किसी दूसरे पेड़ की तलाश में निकल पड़ा।

आखिरकार, कोबरा ने एक बड़े पेड़ पर अपना घर बनाने का निश्चय किया, लेकिन उस पेड़ के तने के नीचे चींटियों की एक बड़ी बाँबी थी,

जिसमें बहुत सारी चींटियाँ रहती थीं। वह गुस्से में फनफनाता हुआ बाँबी के पास गया और चींटियों को डाँटकर बोला, “मैं इस जंगल का राजा हूँ।

मैं नहीं चाहता कि तुम लोग मेरे आस-पास रहो । मेरा आदेश है कि तुम लोग अभी अपने रहने के लिए कोई दूसरी जगह तलाश लो। अन्यथा, सब मरने के लिए तैयार हो जाओ! “

चींटियों में काफी एकता थी। वे कोबरा से बिलकुल भी नही डरीं। देखते ही देखते हजारों चींटियाँ बाँबी से बाहर निकल आईं।

सबने मिलकर कोबरे पर हमला बोल दिया। उसके पूरे शरीर पर चींटियाँ रेंग- रेंगकर काटने लगीं! दुष्ट कोबरा दर्द के मारे चिल्लाते हुए वहाँ से भाग गया।

कानी हिरनी

एक कानी हिरनी समुद्र तट के पास घास चर रही थी। उसे हमेशा सतर्क रहना पड़ता था क्योंकि शिकारी कभी भी उस पर हमला कर सकते थे।

वह बार-बार आसपास के मैदान पर नजर डाल लेती थी। उसका मानना था कि शिकारी आएँगे तो इसी रास्ते से आएँगे।

वह समुद्र की ओर कभी नहीं देखती थी क्योंकि उसे लगता था कि समुद्र की ओर से तो शिकारी आएँगे नहीं।

एक दिन, कुछ लोग एक नाव पर सवार होकर आए। हिरनी को चरते देखकर, उन्होंने उस पर तीर चला दिया। देखते ही देखते हिरनी जमीन पर गिर पड़ी।

अंतिम साँस लेते हुए हिरनी स्वयं से बोली, “भाग्य का खेल कितना निराला है! मैं सोचती थी कि खतरा जमीन की ओर से आएगा, लेकिन मेरे दुश्मन तो समुद्र की ओर से आ गए।”

शिक्षा: खतरे प्राय: उस ओर से आते हैं, जहाँ से उनके आने की आशंका कम होती है।

नागराज की चोरी

यह बहुत पुरानी कहानी है। माजुली गांव के बहार एक बडासा जंगल था। उस जंगल में एक नागराज रहता था। उसने जंगल में एक पहाड़ी के नीचे अपना बिल बना रखा था। नागराज मतलब नागों का राजा इसलिए उसके सर पर एक कीमती मणि जड़ी हुई थी। जब वह सोता था तो उस मणि को सर से उतार कर बिल में छुपा देता था और रात को जब वो शिकार पर निकलता तो मणि को अपने सर पर धारण कर लेता था।

एक दिन जब वह नींद से जागा तो यह देखकर हैरान रह गया कि उसकी कीमती मणि अपनी जगह से गायब है। उसने बहुत ढूंढा लेकिन मणि उसे कहीं नहीं मिली। वो जोर-जोर से रोने और चिल्लाने लगा। जागराज की चीख पुकार सुनकर जंगल के बहुत सारे प्राणी इकट्ठे हो गए। सब ने उससे रोने का कारण पूछा तो नागराज ने बताया कि उसकी कीमती मणि चोरी हो गई है।

खबर जंगल के राजा शेर तक पहुँची तो शेर ने सभा बुलाकर नागराज की मणि को ढूंढने को जिम्मेदारी चतुर लोमडी को सौपायी। लोमड़ी हमेशा चलाख और बुद्धिमान होती है। लोमड़ी ने खोजबीन शुरू कर दी। उसने देखा कि नागराज के बिल के आसपास बहुत सारे चूहों के बिल भी थे।

लोमडी को लगा कि हो न हो, यह चोरी किसी चूहे ने ही की होगी। लेकिन इतने सारे चूहों में से चोर को पकड़ना आसान काम नहीं था।

उसने अगले दिन सारे चूहों को एक जगह इकट्ठा होने को कहा। सारे चूहे उपस्थित हुए और लोमडी ने उनसे पूछताछ शुरू कर दी। फिर 24 घंटे के अंदर ही मणि चुराने वाले चूहे को पकड़कर महाराज शेर के पास ले गया। शेर ने दोबारा सभा बुलाई औए मणि बरामद करके नागराज को उसकी कीमती मणि लौटा दी, फिर उसने लोमडी से पूछा कि आखिर उसने इतने सारे चूहों में से चोर चूहे को इतनी जल्दी कैसे पकड़ लिया।

होशियार लोमड़ी ने बताया, “महाराज, मैने सब चूहों को इकट्ठा करके उनसे एक दूसरे के बारे में जानकारी देने को कहा तो मुझे पता चला कि एक चूहा अचानक बहुत घमंडी और स्वार्थी हो गया है। उसने सबके साथ बात करना और मिलना जुलना बंद कर दिया है।

वो जब भी अपने बिल से बाहर आता तो अपनी नाक चढ़ाकर, दोस्तों को अनदेखा करके चलता था। पहले वो ऐसा नहीं था। चूहों की यह बातें सुनकर मुझे शक हो गया कि उसी चूहे ने मणि चुराई होगी, क्योंकि जब किसी मूर्ख अनाड़ी को दौलत मिल जाती है तो वो घमंडी, स्वार्थी हो जाता है।

शेर राजा ने लोमडी की चतुराई पर उसे शब्बाशी दी और चोर चूहे को जंगल से निकाल दिया।

मधुमक्खी की प्राथना

एक बार एक मधुमक्खी ने एक बरतन में शहद इकटृा किया और ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए उनके समक्ष प्रस्तुत किया। ईश्वर उस भेंट से बहुत प्रसन्न हुए और मधुमक्खी से बोले कि वह जो चाहे इच्छा करे, उसे पूरा किया जाएगा।

मधुमक्खी यह सुनकर बहुत प्रसन्न हुई और बोली, “हे सर्वशक्तिमान ईश्वर, यदि आप सचमुच मुझसे प्रसन्न हैं तो मुझे यह वरदान दें कि मैं जिसे भी डंक मारूं, वह दर्द से तड़प उठे।”

ईश्वर यह सुनकर बहुत क्रोधित हुए, ”क्या इसके अतिरिक्त तुम्हारी अन्य कोई इच्छा नहीं है। ठीक है, मैंने वादा किया है कि तुम्हारी इच्छा पूरी करूंगा, परंतु एक शर्त है। वह यह कि तुम जिसे डंक मारोगी उसे तो बहुत दर्द होगा, परंतु तुम भी तुरंत मर जाओगी।“

दूसरे ही क्षण ईश्वर वहां से चले गए।

शिक्षा: जो दूसरों का बुरा चाहते हैं, उनका भी बुरा ही होता है।

हाथी और उसके दोस्तों की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, एक अकेला हाथी एक अजीब जंगल में बसने आया। यह जंगल उसके लिए नया था, और वह दोस्त बनाने के लिए देख रहा था।

वो सबसे पहले एक बंदर से संपर्क किया और कहा, “नमस्ते, बंदर भैया ! क्या आप मेरे दोस्त बनना चाहेंगे?” बंदर ने कहा, तुम मेरी तरह झूल नहीं सकते क्यूंकि तुम बहुत बड़े हो, इसलिए मैं तुम्हारा दोस्त नहीं बन सकता।

इसके बाद हाथी एक खरगोश के पास गया और वही सवाल पूछा। खरगोश ने कहा, तुम मेरे बिल में फिट होने के लिए बहुत बड़े हो, इसलिए मैं तुम्हारा दोस्त नहीं बन सकता।

फिर हाथी तालाब में रहने वाले मेंढक के पास गया और वही सवाल पूछा। मेंढक ने उसे जवाब दिया, तुम मेरे जितना ऊंची कूदने के लिए बहुत भारी हो, इसलिए मैं तुम्हारा दोस्त नहीं बन सकता। अब हाथी वास्तव में उदास था क्योंकि वह बहुत कोशिशों के वाबजूद दोस्त नहीं बना सका।

फिर, एक दिन, सभी जानवरों को जंगल में इधर उधर दौड़ रहे थे, ये देखकर हाथी ने दौड़ रहे एक भालू से पूछा कि इस उपद्रव के पीछे का कारण क्या है।

भालू ने कहा, जंगल का शेर शिकार पर निकला है – वे खुद को उससे बचाने के लिए भाग रहे हैं। ऐसे में हाथी शेर के पास गया और कहा कि कृपया इन निर्दोष लोगों को चोट न पहुंचाओ। कृपया उन्हें अकेला छोड़ दें।

शेर ने उसका मजाक उड़ाया और हाथी को एक तरफ चले जाने को कहा। तभी हाथी को गुस्सा आ गया और उसने शेर को उसकी सारी ताकत लगाकर धक्का दे दिया, जिससे वह घायल हो गया और वहां से भाग खड़ा हुआ।

अब बाकी सभी जानवर धीरे-धीरे बाहर आ गए और शेर की हार को लेकर आनंदित होने लगे। वे हाथी के पास गए और उससे कहा, “तुम्हारा आकार एकदम सही है हमारा दोस्त बनने के लिए !”

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की एक व्यक्ति का आकार उनके मूल्य का निर्धारण नहीं करता है।

लालची आदमी की कहानी

एक बार एक छोटे से शहर में एक लालची आदमी रहता था। वह बहुत ही धनी था, लेकिन इसके वाबजुद भी उसकी लालच का कोई अंत नहीं था। उसे सोना और क़ीमती वस्तुएँ काफ़ी प्रिय थीं।

लेकिन एक बात ज़रूर थी की, वह अपनी बेटी को किसी भी चीज से ज्यादा प्यार करता था। एक दिन उसे एक परी दिखाई दी। जब वो उसके पास आया तो उसने देखा की, पेड़ की कुछ शाखाओं में परी के बाल फंस गए थे।

उसने उसकी मदद की और परी उन शाखाओं से आज़ाद हो गयी। लेकिन जैसे-जैसे उसका लालच हावी हुआ, उसने महसूस किया कि उसके इस मदद के बदले में एक इच्छा माँगकर (उसकी मदद करके) वो आसानी से अमीर बन सकता है।

ये सुनकर, परी ने उसे एक इच्छा की पूर्ति करने का मौक़ा भी दिया। ऐसे में उस लालची आदमी ने कहा की, “जो कुछ मैं छूऊं वह सब सोना हो जाए।” बदले में ये इच्छा को भी उस परी ने पूरी कर दी थी।

जब उसकी इच्छा पूर्ण हो गयी, तब वो लालची आदमी अपनी पत्नी और बेटी को अपनी इच्छा के बारे में बताने के लिए घर भागा। उसने हर समय पत्थरों और कंकड़ को छूते हुए और उन्हें सोने में परिवर्तित होते देखा, जिसे देखकर वो बहुत ही खुश भी हुआ।

घर पहुंचते ही उसकी बेटी उसका अभिवादन करने के लिए दौड़ी। जैसे ही वह उसे अपनी बाहों में लेने के लिए नीचे झुका, वह एक सोने की मूर्ति में बदल गई। ये पूरी घटना अपने सामने देखते ही उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।

वो काफ़ी ज़ोर से रोने लगा और अपनी बेटी को वापस लाने की कोशिश करने लगा। उसने परी को खोजने की काफ़ी कोशिश करी लेकिन वो उसे कहीं पर भी नहीं मिली। उसे अपनी मूर्खता का एहसास हुआ, लेकिन अब तक काफ़ी देर हो गयी थी।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की लालच हमेशा पतन की ओर ले जाता है। ज़रूरत से ज़्यादा लालच करना हमें हमेशा दुःख प्रदान करता है।

भूखे कुत्ते

तीन कुत्ते थे, जो आपस में गहरे मित्र थे। एक दिन, तीनों कुत्ते भूखे थे और उन्हें खाने-पीने को कुछ नहीं मिल रहा था।

अचानक उन्हें पानी की धारा में नीचे एक हड्डी पड़ी दिखी। उन्होंने वह हड्डी उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन उस तक नहीं पहुंच पाए।

तीनों ने निश्चय किया कि अगर सारा पानी पी लिया जाए तो उन्हें हड्डी मिल जाएगी।

तीनों ने पानी पीना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में उनके पेट भर गए और फूलने लगे। वे तब भी नहीं रुके और लगातार पानी पीते गए।

उनके पेट और अधिक फूलते गए और फट गए। उनके पेटों से सारा पानी भी बाहर निकल पड़ा। तीनो कुत्ते उसी पानी की धारा में नीचे मरे पड़े थे।

शिक्षा: अगर तुम मूर्खतापूर्ण तरीकों से किसी असंभव कार्य करने की कोशिश करोगे तो तुम्हें हानि होना निश्चित है।

बंदर की जिज्ञासा और कील

एक व्यापारी ने एक मंदिर बनवाना शुरू किया और मजदूरों को काम पर लगा दिया। एक दिन, जब मजदूर दोपहर में खाना खा रहे थे, तभी बंदरों का एक झुंड वहाँ आ गया।

बंदरों को जो सामान हाथ लगता, उसी से वे खेलने लगते। एक बंदर को लकड़ी का एक मोटे लट्टे में एक बड़ी-सी कील लगी दिखाई दी।

कील की वजह से लट्टे में बड़ी दरार सी बन गई थी। बंदर के मन में आया कि वह देखे कि आखिर वह है क्या।

जिज्ञासा से भरा बंदर जानना चाहता था कि वह कील क्या चीज है। बंदर ने उस कील को हिलाना शुरू कर दिया।

वह पूरी ताकत से कील को हिलाने और बाहर निकालने की कोशिश करता रहा। आखिरकार, कील तो बाहर निकल आई लेकिन लट्टे की उस दरार में बंदर का पैर फँस गया।

कील निकल जाने की वजह से वह दरार एकदम बंद हो गई। बंदर उसी में फँसा रह गया और पकड़ा गया। मजदूरों ने उसकी अच्छी पिटाई की।

शिक्षा: जिस बात से हमारा कोई लेना-देना न हो, उसमें अपनी टाँग नहीं अड़ाना चाहिए।

गधे से प्रेरणा

पवन अपने गधे को लेकर दूसरे गांव से लौट रहा था। गलती से वह गधा पैर खिसकने के कारण सीधे एक बड़े गहरे गड्डे में गिर गया।

उसे निकलने के लिए पवन ने पूरी कोशिश की लेकिन वह उस गधे को निकाल नहीं पाया।

बहुत कोशिशों के बाद, जब शाम हो गयी और अँधेरा होने लगा तो पवन को लगा की उसके गधे को उस गड्डे से निकालना अब असंभव हैं। तो उसने उसे जिन्दा ही मिट्टी से ढक देने का सोचा और वह ऊपर से मिट्टी डालने लगा।

बहुत देर तक मिट्टी डालने के बाद पवन अपने घर चला गया।

पर ढेर सारी मिट्टी डालने के कारण वह गधा अपने ऊपर गिरे हुए मिट्टी की मदद से धीरे-धीरे उस पर अपना पैर रख-रख कर उस गड्डे के ऊपर चढ़ गया।

अगले दिन जब पवन सुबह उठा तो उसने देखा उसका गधा उसके घर के बहार ही खड़ा था। गधे को अपने घर देखकर उसे यकीन ही नहीं हो रहा था।

कभी हार मत मानो। जिंदगी में चमत्कार होते ही रहेंगे।

जिंदगी का बोझ

एक घने जंगल में एक साधु महाराज रहा करता था। कई गांव के लोग अपनी समस्याएं लेकर आते थे और साधु महाराज उनका समाधान करते थे।

एक बार जब साधु महाराज बाजार गए थे तब उन्हें एक आदमी मिला। उसने साधु महाराज से पूछा, “गुरुदेव, खुश रहने का राज क्या है?”

साधु महाराज बोले, “तुम मेरे साथ जंगल में चलो, वहीं पर मैं तुम्हें खुश रहने का राज बताता हूं।”

वह आदमी बड़ी उत्सुकता से साधु महाराज से साथ जंगल जाने लगा।

रास्ते में साधु महाराज ने एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उस आदमी को दे दिया और कहा, “इसे पकड़ो और चलो मेरे साथ।”

उस आदमी को समझ में नहीं आ रहा था, कि उनसे पत्थर उठाने के लिए क्‍यों कह रहे हैं। इसमें खुश रहने का क्या राज है? लेकिन उसने कोई सवाल जवाब नहीं करते हुए साधु महाराज की बात को मानना ही उचित समझा और पत्थर को उठाया और चलने लगा।

कुछ समय बाद उस व्यक्ति के हाथ में दर्द होने लगा, लेकिन वह चुप रहा और चलता रहा।

लेकिन जब चलते हुए बहुत समय बीत गया और उससे दर्द सहा नहीं गया, तो उसने कहा कि गुरुदेव अब मैं इस पत्थर का वजन नहीं उठा सकता हूं। मेरे हाथों में बहुत तेज दर्द हो रहा है।

साधू महाराज ने कहा कि पत्थर को नीचे रख दो। पत्थर को नीचे रखने से उस आदमी को बड़ी राहत महसूस हुई।

तब साधु महाराज ने कहा, “यही है खुश रहने का राज, जिस तरह इस पत्थर को | मिनट तक हाथ में रखने पर थोड़ा सा दर्द होता है और घंटे तक

हाथ में रखने पर ज्यादा दर्द होता है। ठीक उसी तरह दुखों के बोझ को जितने ज्यादा समय तक हम अपने जीवन में रखेंगे उतने ही ज्यादा हम दुखी और निराश रहेंगे। अगर तुम खुश रहना चाहते हो तो दुःख रूपी पत्थर को जल्दी से जल्दी अपनी जिंदगी से बहार निकल दो”

अपराध किसका?

एक बार रामपुर के राजा के मन में एक बात आई। वह जानना चाहते थे कि जो लोग किसी न किसी अपराध के कारण दंडित किए जाते हैं, उनमें सचमुच कोई पश्चाताप की भावना आती है या नहीं।

दूसरे दिन वह राजा अचानक अपने राज्य के बंदी गृह में पहुंच गया और सभी कैदियों से उनके द्वारा किए गए अपराध के बारे में पूछने लगा।

एक कैदी ने कहा, ”राजन! मैंने कोई अपराध नहीं किया है। मैं निर्दोष हूं।”

दूसरा बंदी बोला, ”महाराज! मुझे मेरे पड़ोसिओं ने फंसाया गया है। मैं भी निर्दोष हूं।”

इसी तरह सभी बंदी अपने आप को निर्दोष साबित करने लगे। फिर राजा ने अचानक देखा कि एक व्यक्ति सिर नीचे किए हुए आंसू बहा रहा था। राजा ने उसके पास जाकर पूछा कि तुम क्‍यों रो रहे हो?

उस कैदी ने बड़ी विनग्रता से कहा, “हे राजन! मैंने गरीबी से तंग आकर चोरी की थी। मुझे आपके न्याय पर कोई शक नहीं है। मैंने अपराध किया था, जिसका मुझे दंड मिला।”

राजा ने सोचा कि दंड का विधान सभी के अंदर प्रायश्चित का भाव पैदा नहीं करता है। लेकिन उन सभी कैदियों में से एक यही ऐसा व्यक्ति है जो अपनी गलती का प्रायश्चित कर रहा है। यदि इस व्यक्ति को दंड से मुक्त किया जाए तो यह अपने अंदर सुधार कर सकता है।

राजा ने उसे तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया और उसे दरबार में नौकरी पर रख दिया।

घर के संस्कार

चंद्रकांत और सोमनाथ एक ही क्लास में पढ़ते थे और वे एक दूसरे के पड़ोसी भी थे। सोमनाथ पढ़ाई के साथ-साथ खेलने में भी अच्छा था और चंद्रकांत स्कूल छूटने के बाद सिर्फ खेलता और गांव भर घूमता रहता था।

एक दिन स्कूल में खेल दिवस आयोजित किया था और सोमनाथ ने कई खेल में हिस्सा लिया था। चंद्रकांत ने खेल दिवस पर कोई भी खेल में हिस्सा नहीं लिया था, वह सिर्फ अपने दोस्तों के साथ ग्राउंड पर दूसरे छात्रों का मजाक उड़ा रहा था।

अगले दिन स्कूल में प्राइज वितरण समारोह हुआ, सोमनाथ ने कई ईनाम जित लिए थे। चंद्रकांत को कई घंटे बेंच पर खड़ा किया गया। चंद्रकांत ने यह बात अपनी माँ को बताई। उसकी माँ ने उसे अपनी बेइज़्ज़त समझा। वह सोमनाथ के घर जा कर उसकी माँ से उलाहना देने ली, “अरे इनाम क्या मिल गया है कि सारे स्कूल में नचा-नचा कर दिखा रहा था। और हमारे चंद्रकांत को बेंच पर खड़ा करवा दिया।”

“किसने खड़ा करवा दिया बेंच पर? सोमनाथ ने?”” सोमनाथ की माँ ने पूछा। उन्हें पूरी स्थिति का पता नहीं था।

“हाँ, और क्या?” चंद्रकांत की माँ ने गुस्से से कहा।

“सोमनाथ को क्या पड़ी है जो बेंच पर खड़ा करवाएगा। पढ़ाई नहीं की होगी इसलिए रखा होगा।” सोमनाथ की माँ ने कहा।

“अरे तुम लोग दुश्मनी निकलवाते हैं। जलते हैं कि हम अच्छा खाते हैं अच्छा पहनते है।” चंद्रकांत की माँ ने कहा।

मगर सोनू की माँ ने धीरज से काम लिया। बोली, “कल स्कूल चल कर पता करेंगे की हुआ क्या था।’”

“मैं देख लूंगी एक-एक को। स्कूल के मैनेजर से कह कर उस मास्टरनी को न निकलवा दिया तों कहना। जब देखो तब हमारे चंद्रकांत को सजा देती रहती है। अरे, और भी तो बच्चे हैं स्कूल में।’” चंद्रकांत की माँ का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था।

तभी सोमनाथ घर में आया। आते ही उसने उत्साह में कहा, “माँ, आज बड़ा ही मजा आया!!”

“हाँ, मजा क्‍यों नहीं आया होगा? चंद्रकांत को बैंच पर खड़ा करवा कर तुम्हे मजा जो आ रहा है।” चंद्रकांत की माँ बोल पड़ी।

सोमनाथ सहम गया। उसे यह पता था कि चंद्रकांत को बैच पर खड़ा किया गया था। वह धीरे से बोला, “चाची, चंद्रकांत दो दिन से होम वर्क नहीं करके ले जा रहा है। इसीलिए उसे सजा मिली। मैंने कहा मेरी कॉपी से उतार ले। वह भी वह नहीं करता।”

“हाँ, तू तो बहुत तेज है। देख लूंगी सबको” कहती हुई वह चली गई।

सोमनाथ की माँ चंद्रकांत की माँ को देखती रह गई। फिर उन्होंने सोमनाथ के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “चल, बैग रख कर हाथ मुँह घो ले। स्कूल से इतनी देर में क्यों आया?”

“माँ देखो मुझे कितने सारे इनाम मिले है।” सोमनाथ अपने इनाम अपनी माँ को दिखते हुए बोला।

शिक्षा: वो कहते है न संस्कार घर से ही आते है। दूसरों को दोष देने से पहले खुद को देखें।

सबसे होशियार इंसान

एक बार एक छोटे प्राइवेट हवाई जहाज में शाम के समय एक डॉक्टर, एक वकील, एक छोटा बच्चा और एक पंडित जी जा रहे थे। अचानक हवाई जहाज के इंजिन में कुछ तकनीकी खराबी हो गई। पायलट की तमाम

कोशिशों के बावजूद हवाई जहाज नीचे जाने लगा। पायलट ने पैराशूट लेकर मुसाफिरों से कहा कि वह कूद जाए और खुद को बचा लें। दुर्भाग्य से सिर्फ तीन पैराशूट बचे थे और हवाई जहाज में चार लोग बाकि थे।

एक पैराशूट डॉक्टर ने ले लिया और कहा “मैं डॉक्टर हूं, मैं जिंदगियां बचाता हूं इसलिए मुझे जीना चाहिए।” यह कहकर वह कूद गया।

फिर वकील ने कहा, “मैं वकील हूं और वकील दुनिया के सबसे होशियार इंसान होते है।” उसने पैराशूट लिया और वह भी कूद गया।

पंडित जी ने छोटे लड़के की ओर देखा और कहा, “बेटा, मैने अपनी जिंदगी जी ली है। तुम अभी छोटे हो और तुम्हारी पूरी जिंदगी पड़ी हे। यह आखिरी पैराशूट लो और आराम से जीना।”

छोटे लड॒के ने पैराशूट पंडित जी को वापिस किया और कहा, “आप परेशान ना हो। जो आदमी खुद को सबसे होशियार बता रहा था वह मेरा बैग लेकर नीचे कूद गया है। हमारे पास दोनों पैराशूट सुरक्षित है। हम आराम से नीचे कूद सकते है।”

शिक्षा: आपके काम से आपकी पहचान नहीं होती बल्कि एक अच्छा इंसान बनने से आपकी पहचान होती है।

शहद का स्वाद

कावेरी गांव में दो अच्छे मित्र रमाकांत और सुयोग रहते थे। वे दोनों सातवीं कक्षा में पढ़ते थे और अधिकतर साथ ही रहते-खेलते थे।

एक दिन स्कूल छूटने के बाद उन्होंने शहद खाने का विचार किया। बाजार से खरीदे हुए शहद मे वह स्वाद नहीं होता था इसलिए दोनों ने मधुमखियों की खोज शुरू कर दी। मधुमखियों को ढूढ़ ने के लिए उन्हें गांव के बाहरी जंगल में जाना पड़ता था। रमाकांत ने सुयोग को बताया कि गांव के थोड़े बाहर चलने के बाद नदी किनारे जंगल में एक पेड़ पर मधुमखियों का घोसला है।

योजना के अनुसार दूसरे दिन दोनों जंगल की ओर चल पड़े। रमाकांत ने अपने साथ एक लम्बी सी लकड़ी भी ले ली थी। सुयोग अपने घर से एक बड़ी सी टोकरी लेके आया था।

जब वे जंगले के नदी किनारे पहुंच गए तो मधुमखियों का घोसला देखकर बहुत खुश हुए। अब वे जल्दी से जल्दी शहद खाना चहते थे।

वे यह भी जानते ये कि मधुमखियां अपनी और अपने शहद की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहती है। संकट आते ही वे संघर्ष करने पर उतारू हो जाती हैं।

सुयोग ने अपनी बड़ी सी टोकरी पेड़ के निचे रख दी और लकड़ी पकड़ने रमाकांत की मदद करने के लिए चला गया। लकड़ी को पकड़कर दोनों बार -बार मधुमखियों के घोसले को चुबने लगे।

थोड़ी ही देर बाद थोड़ा शहद सुयोग के टोकरी में गिरा और दोनों देखकर बहुत खुश हो गए। अब तक तो वहा कोई भी मधुमखियां वहा पर नहीं आयी थी पर जैसे ही सुयोग अपनी टोकरी लगे गया उस पर मधुमक्खियों के समूह ने हमला कर दिया। कई बार मना करने के बाद भी सुयोग रमाकांत की ओर भागने लगा जो की झाड़ियो के पीछे छुपा था।

कुछ देर बाद चार-पांच मधुमक्खियों ने रमाकांत पर ही अपना हमला चढ़ा दिया। अब रमाकांत और सुयोग एक साथ दर्द से पीड़ित होकर भग्ग रहे थे। न तो सुयोग कुछ कह पा रहा था और न ही रमाकांत। दोनों ही दर्द के मारे भाग रहे थे।

कुछ देर बाद सुयोग का चेहरा सूज कर भारी हो गया। आंखों का पूरी तरह खुल पाना भी मुश्किल था। कपिल की जीभ भी सूज कर फूल गई। दोनों मित्र ने अपने जीवन का सबक सिख लिया था और स्वादिष्ट शहद का स्वाद ही नहीं ले पाए क्यों की सुयोग अपनी टोकरऋ वही छोड़कर होगा था।

चींटी और कबूतर की कहानी

भीषण गर्मी के दिनों में एक चींटी पानी की तलाश में इधर-उधर घूम रही थी। कुछ देर घूमने के बाद उसने एक नदी देखी और उसे देखकर प्रसन्न हुई। वह पानी पीने के लिए एक छोटी सी चट्टान पर चढ़ गई, लेकिन वह फिसल कर नदी में गिर गई।

वह जब डूब रही थी तब उसे एक कबूतर ने देख लिया। वह कबूतर जो की पास के एक पेड़ पर बैठा हुआ था उसने उसकी मदद की। चींटी को संकट में देखकर कबूतर ने झट से एक पत्ता पानी में गिरा दिया।

चींटी पत्ती की ओर बढ़ी और उस पर चढ़ गई। फिर कबूतर ने ध्यान से पत्ते को बाहर निकाला और जमीन पर रख दिया। इस तरह चींटी की जान बच गई और वह हमेशा कबूतर की ऋणी रही।

इस घटना के बाद चींटी और कबूतर सबसे अच्छे दोस्त बन गए और उनके दिन खुशी से बीते। लेकिन एक दिन जंगल में एक शिकारी आया। उसने पेड़ पर बैठे सुंदर कबूतर को देखा और अपनी बंदूक से कबूतर पर निशाना साधा।

यह सब वह चींटी देख रहा था जिसे की उस कबूतर ने बचाया था। यह देखकर उस चींटी ने शिकारी की एड़ी पर काट लिया, जिससे वह दर्द से चिल्लाया और उसके हाथ से बंदूक गिरा दी। कबूतर शिकारी की आवाज से घबरा गया और उसे एहसास हुआ कि उसके साथ क्या हो सकता है। वह अपनी जान बचाने के लिए वहाँ से उड़ गया!

जब वह शिकारी वहाँ से चला गया फिर कबूतर वहाँ उस चींटी के पास आया और उसकी जान बचाने के लिए उसे धनयवाद दिया। इस तरह दोनों दोस्त विपत्ति के समय में एक दूसरे के काम आए।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की एक अच्छा काम कभी बेकार नहीं जाता, समय आने पर वो अवस्य फल देता है।

बुद्धिमान किसान

एक दिन एक किसान मेले से अपने घर लौट रहा था। उसने मेले से एक भैंस ने खरीदी थी। जब वह घने जंगल से होकर गुजर रहा था, एक डाकू उसका रास्ता रोक लिया। उसके हाथ में एक मोटा-सा डंडा था।

वह बोला, “तुम्हारे पास जो कुछ भी है, वह सब मुझे दे दो।” । किसान डर गया। उसने अपने सारे पैसे डाकू को दे दिए। तब डाकू बोला, “अब मुझे तुम्हारी भैंस भी चाहिए।” यह सुनकर किसान ने भैंस की रस्सी भी भी डाकू के हाथ में दे दी।

फिर किसान बोला, “मेरे पास जो कुछ भी था, मैंने सब तुम्हें दे दिया। कृपा करके आप मुझे अपना डंडा दे दीजिए।” डाकू ने पूछा, ” लेकिन तुम्हें इसकी क्या आवश्यकता है?” वह बोला, “मैं यह डंडा अपनी पत्नी को दूंगा ।

यह डंडा देखकर वह बड़ी खुश होगी कि मैं मेले से उसके लिए कुछ तो लाया हूँ।” डाकू ने डंडा किसान को दे दिया। किसान ने बिना वक्त गंवाए डाकू को जोर-जोर से मारना शुरू कर दिया।

डाकू पैसे और भैंस छोड़कर वहाँ से भाग खड़ा हुआ। इस तरह से बुद्धिमान किसान ने अपना सामान डाकू से बचा लिया।

किसकी भैस

पेवरा गांव के एक किसान ने अपने लिए एक भैस खरीद ने की सोची। वह एक दिन सुबह शहर चला गया। शहर का रास्ता बहुत ही लामा था, और घने जंगल से जाना पड़ता था। शहर में भैस खरीद ने के बाद वह घर की ओर रवाना हुआ।

सुनसान रास्ते में वह पैदल ही चला जा रहा था। बीच रास्ते में उसे एक चोर मिला। उसके हाथ में मोटा डण्डा था और शरीर से भी वो अच्छा तगड़ा था। उसने किसान को देखते ही कहा, “क्या भाई आज कल खेत में बहुत कमाई हो रही है? पर कोई बात नहीं यह भैंस तो मेरे साथ जाएगी।“

किसान ने झट कहा, “क्यों भाई? यह तो मैंने खरीदी है।” चोर बोला, “तो? जो कह दिया सो करो। भैंस छोड़ कर चुपचाप यहाँ से चलते बनो, वरना लाठी देखी है, तुम्हारी खोपड़ी के टुकड़े- टुकड़े कर दूँगा।

अब तो किसान का गला सूख गया। हालाँकि शारीरिक बल में वह चोर से कम नहीं था। पर खाली हाथ वह करे भी तो क्या करे? विपरीत समय में बुद्धिबल काम आया।

किसान बोला, “ठीक है भाई, भैंस भले ही ले लो, पर किसान की चीज यों छीन लेने से तुम्हें पाप लगेगा। बदले में कुछ देकर भैंस लेते तो पाप से बच जाते।”

चोर बोला, “यहाँ मेरे पास देने को क्या है?” किसान ने झट कहा, “और कुछ न सही, लाठी देकर भैंस का बदला कर लो।”

चोर ने खुश हो कर लाठी किसान को पकडा दी और भैंस पर दोंनो हाथ रख कर खड़ा हो गया। तभी किसान कड़क कर बोला, “चल हट भैंस के पास से, नहीं तो अभी तुम्हारी खोपड़ी के दो टुकड़े करूँगा।”

चोर ने पूछा, “क्यों?” किसान बोला, “क्यों क्या? जिस की लाठी उस की भैंस।” चोर को अपनी बेवकूफी समझ आ गयी और उसने वहाँ से भागने में ही भलाई समझी।

शिक्षा: जिसमें अक्ल है, उसमें ताकत है।

कल किसने देखा है

शांतिनगर में एक अमीर व्यापारी रहता था। थोड़ा बहुत बूढ़ा होने के बाद भी वह बहुत मेहनत करता था। एक दिन उन्हें न जाने क्या सूझा कि अपने एक नौकर को बुलाकर कहा, ‘पता करो हमारे पास कितना धन है और कब तक के लिए पर्याप्त है?”

कुछ दिन बाद नौकर हिसाब लेकर आया और सेठ जी से बोला, “जिस हिसाब से आज खर्चा हो रहा है, उस तरह अगर आज से कोई कमाई न भी हो तो आपकी अगली दो पीढ़िया खा सकती हैं।”

व्यापारी चौंक पड़े। उन्होंने पूछा, “तब तीसरी और चौथी पीढ़ी का क्या होगा?” व्यापारी सोचने लगे और तनाव में आ गए। फिर बीमार रहने लगे। बहुत इलाज कराया मगर कुछ फर्क नहीं पड़ा।

एक दिन व्यापारी का एक दोस्त हालचाल पूछने आया। व्यापारी बोले, “इतना कमाया फिर भी तीसरी और चौथी पीढ़ी तक के लिए कुछ नहीं है। उसका दोस्त बोला, “एक साधु थोड़ी दूर पर रहते है अगर उन्हें सुबह को खाना खिलाएं तो आपका रोग ठीक हो जाएगा।”

अगले ही दिन व्यापारी भोजन लेकर साधु जी के पास पहुंचे। साधु जी ने उसे आदर के साथ बैठाया। फिर अपनी पत्नी को आवाज दी, “व्यापारी जी खाना लेकर आए हैं।”

इस पर साधु जी की पत्नी बोली, “आज खाना तो कोई दे गया है।” साधु जी ने कहा, “माफ़ करना व्यापारी जी, आज का खाना तो कोई दे गया है। इसलिए आपका भोजन स्वीकार नहीं कर सकते। हमारा नियम है कि सुबह जो एक समय का खाना पहले दे जाए, हम उसे ही स्वीकार करते हैं। मुझे क्षमा करना।”

व्यापारी बोले, “क्या कल के लिए ले आऊं?” इस पर साधू जी बोले, “हम कल के लिए आज नहीं सोचते। कल आएगा, तो ईश्वर अपने आप भेज देगा।”

व्यापारी जी घर की ओर चल पड़े। रास्‍ते भर वह सोचते रहे कि कैसा आदमी है यह। इसे कल की बिल्कुल भी चिंता नहीं है और मैं अपनी तीसरी और चौथी पीढ़ी तक को लेकर रो रहा हूं। उनकी आंखें खुल गईं। व्यापारी ने सारी चिंता छोड़कर सुख से रहने लगे।

दो भाई के दो अलग रास्ते

केरला के एक छोटे से गांव में दो भाई रहते थे। एक का नाम मोहित था, वह शहर का सबसे बड़ा बिजनेसमैन था। तो दूसरे का नाम मंगल था, वह शराबी था। मंगल गांव में अपने भाई के पैसो से रह रहा था, और पूरा दिन सिर्फ शराब ही पिता रहता था। वह किसी की एक बात नहीं सुनता था। छोटे भाई मोहित ने भी उसे समजना बंद किया था क्यों की मंगल उसका बड़ा भाई था और वह बहुत गुस्सा होता था। लेकिन हर महीने मोहित उसे पैसो की मदद करता था।

एक दिन गांव के कुछ लोगो ने इस समस्या के बारे में दोनों भाइयों से बात करने की सोची। वे पहले बड़े भाई यानी मंगल के घर चले गए। मंगल हमेशा की तरह शराब पि कर जमीन पर लेता था। लोगों ने उसे कुर्सी पर बैठाया और ज्यादा शराब पिने की वजा पूछ ने लगे।

मंगल बोला, “मेरे पिता शराबी थे, वे अक्सर मेरी माँ और हम दोनों भाइयों को पीटा करते थे। भला तुम लोग मुझसे और क्या उम्मीद कर सकते हो। मैं भी वैसा ही हूँ।”

फिर वे छोटे भाई के पास चले गए। वो अपने काम में व्यस्त था और थोड़ी देर बाद उनसे मिलने आया।

गांव के लोगों ने इस भाई से भी वही प्रश्न किया, “आप इतने सम्मानित बिजनेसमैन हैं, सभी आपकी प्रशंसा करते हैं, आखिर आपकी प्रेरणा क्या है?”

“मेरे पिता“ मोहित ने बोला

लोगों ने आश्वर्य से पूछा, “भला वो कैसे?”

“मेरे पिता शराबी थे, नशे में वो हमें मारा- पीटा करते थे। मैं ये सब चुप -चाप देखा करता था, और तभी मैंने निश्चय कर लिया था की मैं ऐसा बिलकुल नहीं बनना चाहता। मुझे तो एक सभ्य, सम्मानित और बड़ा आदमी बनना है और मैं वही बना।” मोहित ने अपनी बात पूरी की।

शिक्षा: हमारी सोच ही है जो हमे एक अच्छा व्यक्ति बनाती है।

एक महत्वपूर्ण सबक

भोरिया नगर में एक व्यापारी का परिवार रहता था। उस परिवार में दो भाई रहते थे। सौरभ बड़ा भाई और शुभम छोटा भाई था, जिसमें सौरभ की शादी हो चुकी थी। सौरभ की पत्नी अपूर्वा में एक बुरी आदत यह थी कि वह घर की हर बात अपने पड़ोसियों को बता दिया करती थी। इस बात को लेकर सौरभ बहुत परेशान रहा करता था।

एक दिन उसने सोचा क्यों न अपूर्वा को सबक सीखा दिया जाये और उसने एक योजना बनाई। सौरभ ने अपूर्वा को बिना बताये अपने छोटे भाई शुभम को दुकान का सामान लेने शहर भेज दिया। योजना के अनुसार उसी रात उसने अपने घर के आंगन में गड्डा खोदकर उसमें एक मरा हुआ कुत्ता डाल दिया। जब सौरभ गड्डे को भर रहा था तभी अपूर्वा की नींद खुल गई।

उसने देखा कि उसका पति घर के आंगन में एक गड्डे को भर रहा हैं। उसने पास आकर धीरे से पूछा, “अजी ये क्या कर रहे हैं?”

सौरभ ने इशारा करते हुए कहा, “चुप रहो। मैंने छोटे भाई को जान से मार डाला है और उसकी लाश यहीं गाड दी है। अब यह पूरी दुकान और व्यापर हमारा है। यदि छोटा भाई होता तो हमें उसका हिस्सा देना पड़ता था। इसलिये उसे रास्ते से ही हटा दिया। यह बात तुम किसी से मत कहना।”

इतना कहकर सौरभ गड्डे की मिट्टी को बराबर करके घर में सोने के लिए चला गया।

दूसरे दिन सुबह सौरभ दुकान में काम करने चला गया। अपूर्वा भी अपना घर का काम निपटाकर पड़ोस में बैठने चली गई। बात ही बात में उसने अपनी पडोसिन से कहा, “अरे सुन किसी से कहना मत, कल रात हमारे पति ने अपने छोटे भाई को जान से मार डाला।” यह बात शाम होते-होते पूरे गांव में फैल गई। पुलिस में भी किसी ने इस बात की सूचना दे दी।

शाम को जब सौरभ दुकान से लौटा तो देखा उसके घर पर चार पुलिस वाले खड़े हैं। उन्हें देखकर वह बिलकुल घबराया नहीं। पुलिस ने कडकदार आवाज में कहा, “हमें खबर मिली है कि तुमने छोटे भाई को जान से मार दिया है और उसकी लाश कहीं छिपा दी है।’”

यह सुनकर सौरभ बोला, “साहब भला मैं अपने भाई को जान से क्यों मारूंगा? कल ही मैंने उसे दुकान का सामान लेने शहर भेजा है। शायद वह अब आता ही होगा हा रात में मैंने आगर में एक गड्डा खोदा और उसमें एक मरा हुआ कुत्ता गाड़ दिया है। यह मैंने इसलिए किया क्योंकि मेरी पत्नी की एक बुरी आदत थी कि वह घर की जरा-सी बात को बाहर के लोगों को बता देती थी। उसकी आदत को सुधारने के लिये मैंने यह सब

कुछ किया। ताकि इससे उसे सबक मिल जाय।” इतना कहकर सौरभ ते पोलिस को गड्डे के पास ले गया और खोद कर मरा हुआ कुत्ता दिखा दिया।

अपूर्वा ने सब के सामने अपने पति से क्षमा मांगते हुए कहा, “अब मैं भविष्य में कभी भी घर की बात बाहर नहीं कहूँगी।”

शिक्षा: घर की बाते हमेशा घर में ही रही तो अच्छी बात है।

अच्छी आदते

एक बूढ़ा रास्ते से कठिनता से चला जा रहा था। उस समय हवा बड़े जोरों से चल रही थी। अचानक उस बूढ़े का हैट हवा से उड़ गया। उसके पास ही तीन लड़के स्कूल जा रहे थे। उनसे बूढ़े ने कहा, “मेरा हैट उड़ गया है, उसे पकड़ो। नहीं तो मै बिना हैट का हो जाऊंगा।”

वे लड़के उसकी बात पर ध्यान न देकर टोपी के उड़ने का मजा लेते हुए हंसने लगे। इतने में नीतू नाम की एक लड़की, जो स्कूल में पढ़ती थी, उसी रास्ते पर आ पहुंची।

उसने तुरंत ही दौड़कर वह हैट पकड़ लिया और अपने कपड़े से धूल झाड़कर तथा पोंछकर उस बूढ़े को दे दिया। उसके बाद वे सब लड़के स्कूल चले गए।

गुरूजी ने हैट वाली यह घटना स्कूल की खिड़की से देखी थी। इसलिए स्कूल की सुबह की असेम्ली में उन्होंने सब विद्यार्थियों के सामने वह हैट वाली बात कही और नीतू के अच्छे काम के लिए को भेंट दी।

जो तीन लड़के गरीब की हैट उड़ते देखकर हंसे थे, वे इस घटना का देखकर बहुत लज्जित और दुखी हुए।

सबसे कीमती चीज

सीलमपुर गांव में एक भिखारी रहता था। वह बड़ी मुश्किल से अपना गुजारा करता था। उसे ठीक से खाने या पिने नहीं मिलता था, जिस वजह से उसका बूढ़ा शरीर सूखकर कांटा हो गया था। वह अपने आप को बहुत ही कमज़ोर महसूस करने लगा था।

एक दिन वह रास्ते के एक ओर बैठकर गिड़गिड़ाते हुए भीख मांगा करता था। एक बालक उस रास्ते से रोज अपने स्कूल के लिए निकलता था। भिखारी को देखकर उसे बड़ा बुरा लगता। उसका मन बहुत ही दुखी होता।

वह छोटा बालक सोचता, “आखिर यह आदमी क्यों भीख मांगता है? भगवान उसे उठा क्यों नहीं लेते?”

एक दिन उससे न रहा गया। वह भिखारी के पास गया और अपनी टिफिन में से कुछ रोटियां देते हुए बोला, “बाबा, तुम्हारी ऐसी हालत हो गई है फिर भी तुम जीना चाहते हो तुम भीख मांगते हो, पर ईश्वर से यह प्रार्थना क्यों नहीं करते कि वह तुम्हें अपने पास बुला ले?

भिखारी ने हस्ते हुए बोला, “बेटा तुम जो कह रहे हो, वही बात मेरे मन में भी उठती है। मैं भगवान से रोज प्रार्थना करता हूं, पर वह मेरी सुनता ही नहीं। शायद वह चाहता है कि मैं इस धरती पर रहूं, जिससे दुनिया के लोग मुझे देखें और समझें कि एक दिन मैं भी उनकी ही तरह था, लेकिन वह दिन भी आ सकता है, जबकि वे मेरी तरह हो सकते हैं। इसलिए बेटा किसी को घमंड नहीं करना चाहिए।

लड़का भिखारी की ओर देखता रह गया। उसने जो कहा था, उसमें कितनी बड़ी सच्चाई समाई हुई थी। हमारी जिंदगी सबसे कीमती चीज है।

सपनों की दुनिया

पप्पू अपने गांव में मूर्खता के लिए जाना जाता था। एक दिन सुबह-सुबह पप्पू अंडे खरीदने बाज़ार पहुँच गया। बाज़ार से उसने अंडे खरीदे और उन अंडों को एक टोकरी नें भरकर अपने सिर पर रख लिया, फिर वह घर की ओर जाने लगा।

घर जाते-जाते उसे अलग-अलग खयाल आने लगे जैसे कि, अगर इन अंडों से बच्चे निकलें तो मेरे पास ढेर सारी मुर्गियाँ होंगी। वह सब मुर्गियाँ ढेर सारे अंडे देंगी।

उन अंडों को बाज़ार में बैच कर मै धनवान बन जाऊंगा। अमीर बन जाने के बाद मै एक नौकर रखूँगा जो मेरे लिए शॉपिंग कर लाएगा। उसके बाद में अपनें लिए एक महल जैसा आलीशान घर बनवाऊंगा। उस बड़े से घर में हर प्रकार की भव्य सुख-सुविधा होंगी।

भोजन करने के लिए, आराम करने के लिए और बैठने के लिए उसमें अलग-अलग कमरे होंगे। घर सजा लेने के बाद मैं एक गुणवान, रूपवान और धनवान लड़की से शादी करूंगा।

अपनी पत्नी के लिए भी एक नौकर रखूँगा और उसके लिए अच्छे-अच्छे कपड़े, गहने वगैरह ख़रीदूँगा। शादी के बाद मेरे २-३ बच्चे होंगे, बच्चों को में खूब लाड़ प्यार से बड़ा करूंगा। और फिर उनके बड़े हो जाने के बाद उनकी शादी करवा दूंगा। फिर उनके बच्चे होंगे। फिर में अपने पोतों के साथ खुशी-खुशी खेलूँगा।

पप्पू अपने ख़यालों में चले जा रहा था, तभी उसके पैर को एक बड़ा सा पत्थर लगा और सिर पर रखी हुई अंडों की टोकरी धड़ाम से ज़मीन पर आ गिरी। अंडों की टोकरी ज़मीन पर गिरते ही सारे अंडे फूट कर बरबाद हो गए। अंडों के फूटने के साथ-साथ पप्पू के सपनें भी टूट कर चूर-चूर हो गए।

शेर और चूहे की कहानी

एक बार की बात है जब एक शेर जंगल में सो रहा था उस समय एक चूहा उसके शरीर में उछल कूद करने लगा अपने मनोरंजन के लिए। इससे शेर की नींद ख़राब हो गयी और वो उठ गया साथ में गुस्सा भी हो गया।

वहीँ फिर वो जैसे ही चूहे को खाने को हुआ तब चूहे ने उससे विनती करी की उसे वो आजाद कर दें और वो उसे कसम देता है की कभी यदि उसकी जरुरत पड़े तब वो जरुर से शेर की मदद के लिए आएगा। चूहे की इस साहसिकता को देखकर शेर बहुत हँसा और उसे जाने दिया।

कुछ महीनों के बाद एक दिन, कुछ शिकारी जंगल में शिकार करने आये और उन्होंने अपने जाल में शेर को फंसा लिया। वहीँ उसे उन्होंने एक पेड़ से बांध भी दिया। ऐसे में परेशान शेर खुदको छुड़ाने का बहुत प्रयत्न किया लेकिन कुछ कर न सका। ऐसे में वो जोर से दहाड़ने लगा।

उसकी दहाड़ बहुत दूर तक सुनाई देने लगी। वहीँ पास के रास्ते से चूहा गुजर रहा था और जब उसने शेर की दहाड़ सुनी तब उसे आभास हुआ की शेर तकलीफ में है। जैसे ही चूहा शेर के पास पहुंचा वो तुरंत अपनी पैनी दांतों से जाल को कुतरने लगा और जिससे शेर कुछ देर में आजाद भी हो गया और उसने चूहे को धन्यवाद दी। बाद में दोनों साथ मिलकर जंगल की और चले गए।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की उदार मन से किया गया कार्य हमेशा फल देता है।

लकड़हारा और सुनहरी कुल्हाड़ी की कहानी

एक समय की बात है जंगल के पास एक लकड़हारा रहता था। वो जंगल में लकड़ी इकठ्ठा करता था और उन्हें पास के बाज़ार में बेचता था कुछ पैसों के लिए।

एक दिन की बात है वो एक पेड़ काट रहा था, तभी हुआ ये की गलती से उसकी कुल्हाड़ी पास की एक नदी में गिर गई। नदी बहुत ज्यादा गहरी थी और वास्तव में तेजी से बह रही थी- उसने बहुत प्रयत्न किया अपने कुल्हाड़ी को खोजने की लेकिन उसे वो वहां नहीं मिली। अब उसे लगा की उसने कुल्हाड़ी खो दी है, वहीँ दुखी होकर वो नदी के किनारे बैठकर रोने लगा।

उसके रोने की आवाज सुनकर नदी के भगवान उठे और उस लकड़हारे से पूछा कि क्या हुआ। लकड़हारा ने उन्हें अपनी दुखद कहानी बताई। नदी के भगवान को उस लकड़हारे के ऊपर दया आई और वो उसकी मेहनत और सच्चाई देखकर उसकी मदद करने की पेशकश की।

वो नदी में गायब हो गए और एक सुनहरी कुल्हाड़ी वापस लाया, लेकिन लकड़हारे ने कहा कि यह उसका नहीं है। वो फिर से गायब हो गए और अब की बार उन्होंने चांदी की कुल्हाड़ी लेकर वापस आये, लेकिन इस बार भी लकड़हारे ने कहा कि ये कुल्हाड़ी उसका भी नहीं है।

अब नदी के भगवान पानी में फिर से गायब हो गए और अब की बार वो एक लोहे की कुल्हाड़ी के साथ वापस आ गए – लकड़ी का कुल्हाड़ी देखकर लकड़हारा मुस्कुराया और कहा कि यह उसकी कुल्हाड़ी है।

नदी के भगवान ने लकड़हारे की ईमानदारी से प्रभावित होकर उसे सोने और चांदी की दोनों कुल्हाड़ियों से भेंट किया।

शिक्षा: इस कहानी से हमें ये सिख मिलती है की ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है।

सपना सच हुआ

बिटू बहुत गरीब था। एक दिन वह रामलाल की दुकान पर गया। रामलाल ने उससे पूछा, “तुम यहाँ क्यों खड़े हो?”. बिट्टू ने जवाब दिया,”मैंने पिछली रात एक सपना देखा। सपने में मैंने देखा कि तुम्हारी दुकान के आगे मुझे सोना मिला है।”

उसकी बात सुनकर रामलाल हँसने लगा। वह हँसकर बोला, “तुम बड़े ही बेवकूफ हो। सपने कभी सच नहीं होते। चलो मैं भी तुम्हें अपने सपने के बारे में बताता हूँ। मैंने भी देखा कि तुम्हारे घर के आँगन के नीचे सोना है।”

बिट्टू ने रामलाल के सपने को गम्भीरतापूर्वक लिया और वह वापस घर की ओर चल पड़ा। घर पहुँचकर उसने अपना आँगन खोदना शुरू किया। काम खोदने के बाद उसे मिट्टी के अन्दर एक घड़ा नजर आया। उसने वह घड़ा निकाला।

वह सोने के सिक्कों से भरा हुआ था। बिटू मन-ही-मन बोला, ‘धन्यवाद रामलाल, कभी कभी सपने भी सच हो जाते हैं। आज तुम्हारे सपने की वजह से मैं एक धनी आदमी बन गया हूँ।

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