भारतीय लोक कथाएं

Folk Tales in Hindi List

तारों का जन्म

चमगादड़ का जन्म

बनैला आदमी

गिरि और शोआन

तूफान से लड़ाई

महिला चित्रकार

ओसरी उत्सव

डायन और सड़क

शार्क का जन्म

किलपुट की वाफ्सी

कोचांग

जब पेड़ चलते थे

बदल

अजगर का जन्म

तोतारंग

चोरी हुआ टापू

धूर्त चमगादड़

सूरज की ओर

पहला पुरुष - टोमो

प्रियों का द्वीप : परी टापू

नारियल का जन्म

बौनों छा देश

द ग्रेट फेस्टीवल

निकोबारी जाति का जन्म

तोइया-बोग-लांको

तारों का जन्म

'ओंगी' जनजाति के लोगों का मानना है कि सृष्टि के आरंभ में, जब धरती बनी ही थी आसमान बहुत नीचे था।

फिर एक दिन, सूर्य और चन्द्रमा की रचना हुई। लेकिन छलपूर्वक उन्होंने अपना- अपना स्थान बदल लिया। वे धरती के और निकट आ गए।

उनके इस कृत्य से धरती बुरी तरह गर्म हो गई। इसकी सतह पर गहरी दरारें पड़ गईं। लोगों ने घर से निकलना बन्द कर दिया। उन्हें डर था कि तेज धूप के कारण उनका शरीर झुलस जाएगा।

झरने और नदियाँ सब सूख गए। पानी का कहीं नामोनिशान न रहा। पशु-पक्षी यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ मारे-मारे फिरने लगे।

एक दिन बुजुर्गों ने विचार-विमर्श के लिए एक बैठक बुलाई। उसमें युवकों को भी बुलाया गया। तय पाया गया कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो कुछ ही दिनों में धरती पर जीवन नष्ट हो जाएगा। अन्त में, सभी की सहमति से ता-चोई (एक विशेष प्रकार की लकड़ी) तथा चा-लोक (नारियल की डंडी) से तीर-कमान तैयार करने का निर्णय लिया गया।

निश्चय किया गया कि आसमान पर लगातार तब तक तीर मारते रहा जाए. जब तक कि उसे धरती से काफी दूर न धकेल दिया जाए। सूर्य और चन्द्रमा तब अपने- अपने स्थान पर पहुँच जाएँगे और इस तरह धरती असह्य गर्मी से बच जाएगी।

तब, एक दिन उन्होंने आकाश को तीर मारना शुरू किया।

लेकिन उनके सारे तीर आकाश में अटक गए। उनमें से एक भी तीर वापस धरती पर नहीं गिरा। होता यह कि जैसे ही तीर आसमान से टकराता आग निकलती और तारा बन जाती।

आसमान में इस तरह अनगिनत तारे बन गए।

लेकिन ओंगी हताश नहीं हुए। आसमान के साथ-साथ उन्होंने सूर्य और चन्द्रमा को भी पीछे धकेलने के लिए उन पर तीर मारना जारी रखा।

कुछ समय बाद सूर्य और चन्द्रमा वापस अपने-अपने स्थान पर चले गए। उसके बाद धरती की सतह भी ठंडी हो गई। वर्षा होने लगी। झरने और नदियाँ भरे-पूरे बहने लगे। वृक्ष ठग आए। पशु-पक्षियों में जीवन का संचार हो गया।

और इस तरह पूरे आकाश में टिमटिमाने वाले तारों का जन्म हुआ।

चमगादड़ का जन्म

बहुत समय पहले की बात है। एक विदेशी जलपोत कहीं दूर से आया। लेकिन इससे पहले कि वह किनारे पर लग पाता - तूफान में फँँस गया। नाविकों ने उसे बचाने की भरपूर कोशिश की लेकिन वह एक चट्टान से टकरा गया और चकनाचूर हो गया।

नाविकों और यात्रियों ने तैरकर किनारे पहुँचने की भरपूर कोशिश की लेकिन उनमें से अधिकांश डूब गए। बचे हुए लोगों में से कुछ किमिओस द्वीप पर जा पहुँचे। उन सभी के कपड़े फट चुके थे।

शरीर घायल थे। सभी की हालत दयनीय थी। काफी समय तक वे सागर-किनारे बेहोश पड़े रहे।

होश आने पर वे भोजन और आवास की तलाश में भटकने लगे। उस समय तक तूफान थम चुका था और मौसम शान्त हो गया था।

बिना कुछ खाए-पिए वे लोग जंगल में घुस पड़े। वहाँ उन्हें ऊँचे-ऊँचे नारियल के पेड़ नजर आए वे उन पर चढ़ गए उन्होंने 'फलों को तोड़कर पानी पिया और गूदा खाया।

चारों ओर अंधेरा छा गया था। आसपास की चीजें दिखाई देनी बन्द हो गई थीं। किसी तरह उन्होंने पेड़ों की शाखाओं को पकड़ा और उन पर लटक गए।

कपड़े फट चुके थे। शरीर घायल थे। सभी की हालत दयनीय थी। काफी समय तक वे सागर-किनारे बेहोश पड़े रहे।

होश आने पर वे भोजन और आवास की तलाश में भटकने लगे।

उस समय तक तूफान थम चुका था और मौसम शान्त हो गया था।

बिना कुछ खाए-पिए वे लोग जंगल में घुस पड़े। वहाँ उन्हें ऊँचे-ऊँचे नारियल के पेड़ नजर आए वे उन पर चढ़ गए उन्होंने फलों को तोड़कर पानी पिया और गूदा खाया।

चारों ओर अंधेरा छा गया था। आसपास की चीजें दिखाई देनी बन्द हो गई थीं। किसी तरह उन्होंने पेड़ों की शाखाओं को पकड़ा और उन पर लटक गए।

अण्डमानी आदिम जनजाति के लोगों का मानना है कि शाखाओं से लटके वे लोग रात भर में ही चमगादड़ बन गए। युवा लोग छोटे चमगादड़ और वृद्ध लोग बड़े चमगादड़ बने। इससे पहले उस द्वीप पर एक भी चमगादड़ नहीं था।

यही चमगादड़ बाद में बाकी द्वीपों के जंगलों में भी फैल गए।

बनैला आदमी

सुदूर दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार के जंगल में रहने वाले 'शोम्पेन' आदिवासी प्राचीन मंगोलियाई जनजाति के लोग हैं। सैकड़ों वर्ष पहले शोम्पेन-बस्ती में एक झोंपड़ी थी।

उसके एक ओर घना जंगल था और दूसरी ओर दूर-दूर तक फैला नीला, गहरा सागर। एक शाम, भय से काँपता सात- आठ साल का एक नंग-धड़ंग लड़का अपनी झोंपड़ी से बाहर निकला। आकाश पर चमकते तारों ने रात के गहराने का आभास दे डाला था।

लड़के ने उत्सुक नजरों से चारों ओर देखा। दरअसल, वह समुद्र से मछलियाँ पकड़ने को गए अपने माता-पिता की प्रतीक्षा कर रहा था। उसे उनकी चिता हो रही थी।

अचानक उसकी नजरें सामने जंगल की ओर उठ गईं। उसने दो भयंकर आँखों को अपनी ओर घूरता पाया। उसने तुरन्त अपनी निगाहें उधर से हटा लीं और समुद्र की ओर देखने लगा। लेकिन माता-पिता का उधर कुछ अता-पता न था।

वह दोबारा जंगल की ओर देखना नहीं चाहता था। लेकिन उसकी निगाहें पुनः उधर चली गईं। उसने कल्पना की कि वे उसका पीछा कर रहे किसी जंगली जानवर की आँखें थीं! उसके लम्बे बाल कंधों पर झूल रहे थे। बड़ा-सा पेट था, और मुँह में दो नुकीले दाँत थे।

लड़का बुरी तरह डर गया था। लेकिन हिम्मत करके उसने डर पर काबू पाया।

तभी उसकी नजर समुद्र की ओर गई। उसे एक नाव किनारे की ओर आती दिखाई दी। उसने सोचा कि उसके माता-पिता वापस लौट रहे हैं। वह महसूस कर रहा था कि डरावनी आँखें अभी भी उसे घूर रही हैं। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्‍या करे ?

लेकिन जैसे ही उसने देखा कि नाव से उसके माता-पिता ही उतर रहे हैं, वह तेजी से किनारे की ओर दौड़ गया।

वह बेचारा जिंदगी भर नहीं जान पाया कि उस शाम उसकी ओर घूरने वाली वे डरावनी आँखें किस जानवर की थीं और वह क्यों उसका पीछा कर रहा था।

गिरि और शोआन

बहुत समय पहले निकोबार में अरंग नाम का एक आदमी था। उसकी एक पत्नी थी। उन दोनों के तीन बेटे और तीन बेटियाँ थीं। अरंग काफी धनवान था। उसने परिवार के लिए एक आलीशान मकान बनाया।

एक दिन वह अपने बड़े बेटे शोआन के साथ समुद्र से मछली पकड़ने को गया। अचानक तेज आँधी आई , समुद्र में ज्यार आने लगा। उनकी डोंगी उलट गई।

बाप और बेटा दोनों समुद्र में डूब गए। जब पिता डूब रहा था तो लड़का डोंगी के ऊपर सरक आया और चिल्लाया, “मेरे पिता मर गए हैं। हाय, मैं क्या करूँ? मैं घर कैसे जाऊँगा ?

तभी एक ह्लेल उसके सामने आई। “मेरी पीठ पर बैठो। मैंने रास्ता देखा है।'' हेल ने कहा।

ह्लेल बहुत बड़ी मछली होती है। उसे सागर की रानी कहा जाता है। यद्यपि शोआन को उससे कुछ डर लगा लेकिन वह हिम्मत करके उसकी पीठ पर बैठ गया।

हल उसको मंजिल की ओर ले चली। उसे देखकर समुद्र के सभी जीव डर कर भागने लगे। उड़ने वाली मछलियाँ इधर-उधर उड़ गईं। शार्क गहरे सागर में उतर गई।

समुद्री साँप तलहटी की रेत में जा छिपे। डॉल्फिनें तेजी के साथ दूर तैर गईं।

तैरते-तैरते वे ह्लेल के देश में जा पहुँचे। वह कीमती पत्थर की एक बड़ी गुम्बदनुमा हवेली में उड़ने वाली मछलियाँ इधर-उधर उड़ गईं।

शार्क गहरे सागर में उतर गई। समुद्री साँप तलहटी की रेत में जा छिपे। डॉल्फिनें तेजी के साथ दूर तैर गईं।

तैरते-तैरते वे ह्लेल के देश में जा पहुँचे। वह कीमती पत्थर की एक बड़ी गुम्बदनुमा हवेली में रहती थी। उसकी दीवारें लाल मूँगे से बनी थीं। घर के अन्दर ह्नेल की बेटी “गिरि' बैठी थी।

शोआन वहाँ खूबसूरत गिरि की सेवा में रहने लगा।

“तुम्हें क्या-क्या काम आता है ?' गिरि ने पूछा।

“मैं जंगल से नारियल इकट्ठे कर सकता हूँ।” शोआन बोला।

“इससे क्या? नारियल यहाँ होता ही नहीं है।'” गिरि ने कहा।

मैं नाव बना सकता हूँ। नाव की हमें क्या जरूरत है ? कुछ और बताओ। “मैं बरछी से मछलियाँ मार सकता हूँ।'”

“तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे।”' गिरि तेज स्वर में बोली, “हम मछलियों को प्यार करते हैं। मेरे पिता मछलियों के राजा हैं। अब तुम मेरे बालों में कंघी करो।” गिरि ने शोआन को आदेश दिया।

शोआन उसके बालों में कंघी करने लगा। वह वहाँ रहता रहा। दोनों आपस में खूब हँसी-मजाक करते। कुछ समय बाद दोनों में प्रेम हो गया और उन्होंने परस्पर विवाह कर लिया। गिरि के पास दर्पण नहीं था। उसने शोआन से एक दर्पण लाने को कहा।

“मेरे घर में एक दर्पण है।'” शोआन बोला, “लेकिन मैं वहाँ जाऊँगा कैसे ?

“इसमें क्या है। मैं तुम्हें वहाँ पहुँचा दूँगी। तुम मेरी पीठ पर बैठो, मैं तुम्हें किनारे पर छोड़ देती हूँ।'' गिरि ने कहा।

गिरि शोआन को लेकर किनारे पर आ गई। वह समुद्र में एक बड़े पत्थर के पीछे रुक गई।

शोआन जल्दी लौटने का वादा करके अपने गाँव को चला गया। शीघ्र ही वह अपने घर जा पहुँचा।

शोआन को देखकर उसकी माँ को विश्वास ही नहीं हुआ कि वह जिंदा है! उसके जीवित लौट आने की खबर सुनकर गाँव के सारे लोग उसे देखने को उमड़ पड़े।

उसने सबको ह्लेल वाली घटना सुनाई और गिरि के साथ अपने विवाह की बात बताई। लोग उसकी बातों पर हँसने लगे। उसकी सारी बातें उन्हें गप लगीं। शोआन को उनके रवैये से बड़ा दुख हुआ। उसने दर्पण उठाया और घर से भाग खड़ा हुआ।

गाँव के लोग अनपढ़ और अंधविश्वासी थे। समुद्र में डूबने के वर्षो बाद वापस लौटे शोआन को वे उसका भूत समझ रहे थे। जब वह दर्पण उठाकर भागने लगा तो उनका संदेह विश्वास में बदल गया। उन्होंने उसका पीछा किया और बरछियों से उस पर वार किया।

बरहछियों ने भागते हुए शोआन के पूरे शरीर को बींध डाला। वह मर गया।

उधर, सागर में मूँगे की पहाड़ी के पीछे रुकी गिरि उसकी प्रतीक्षा करती रही। लेकिन वह गिरि के पास तक नहीं पहुँच पाया।

अक्सर ही चाँदनी रातों में मछुआरे सागर में दर्दभरी आवाजें सुनते हैं। उन्हें लगता है जैसे कोई स्त्री लम्बे समय से अपने पति के इन्तजार में सिसक रही हो।

वे लोग, जिन्हें गिरि की कहानी नहीं पता, इन आवाजों पर आश्चर्य करते हैं।गिरि शोआन के बिना अकेली अपने घर नहीं लौट सकती। इसलिए वह दर्दीली आवाज में उसे पुकारती है।

लौट आओ शोआन, लौट आओ... लौट आओ... !

तूफान से लड़ाई

एक बार कार निकोबार के कुछ लोग अपनी डोंगियों में बैठकर नारियल इकट्ठे करने के लिए कमोर्ता की ओर चले।

लेकिन उस टापू पर पहुँचने से पहले ही समुद्र में तूफान आ गया और वे घिर गए। हर आदमी डर गया।

उन्होंने बचने की लाख कोशिशें कीं लेकिन उनमें से अधिकतर उस तूफान में मारे गए।

बाकी के कुछ जैसे-तैसे तैरकर उस टापू तक पहुँचे और बच गए।

लेकिन अभी उनके दुर्भाग्य का अन्त नहीं हुआ था। वे एक भयंकर रोग का शिकार हो गए और तीन को छोड़कर शेष सभी मर गए।

उनके गाँव में, जब बहुत दिनों तक कोई लौटकर नहीं आया तो उन्होंने उन्हें मर चुके मान लिया और शोक मनाने लगे।

काफी दिनों बाद, बचे हुए तीनों लोग किसी तरह गाँव वापस आए और आप बीती गाँव वालों को सुनाई।

उनकी कष्टभरी दास्तान सुनकर गाँव वालों ने आसमान की ओर हाथ उठाकर ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उसने उन तीन लोगों के जीवन की रक्षा की।

इसके बाद उन्होंने सुअर के मांस की दावत की और आग के चारों ओर बैठकर मृत- आत्माओं की शान्ति के लिए रातभर ईश्वर से प्रार्थना के गीत गाए।

महिला चित्रकार

पुराने समय की बात है। दो युवतियों के बीच गहरी दोस्ती थी। जब भी समय मिलता, वे दोनों समुद्र के किनारे जातीं और पानी के थपेड़े खा रही चट्टानों पर बैठ जातीं | चट्टानों पर बैठकर वे तरह-तरह के चित्र बनातीं और शाम को अँधेरा होने पर ही घर लौटतीं।

एक दिन बनाए हुए कुछ चित्र उनके हाथ से खिसककर समुद्र में गिर गए।

ओ.ह...जल्दी पानी में कूद जा और चित्रों को निकालकर ला। एक सहेली ने दूसरी से कहा।

दूसरी तपाक्‌ से समुद्र में कूद पड़ी और चित्रों को ढूँढ़ती हुई पानी में दूर तक निकल गई। अचानक का-कू-को नाम की एक विशाल मछली उसके सामने आ गई और उसको निगल गई।

अपनी सहेली के. लौटने का इन्तजार करती दूसरी युवती समुद्र किनारे इधर-उधर घूम रहे केकड़ों को निहारती रही। काफी देर तक इन्तजार के बाद सहेली को ढूँढ़ने के लिए वह भी पानी में

कूद गई। बड़ी मछली का-कू-को ने उसे भी निगल लिया। दोनों सहेलियाँ अब 'उसके पेट में जा

मिलीं। कुछ देर बाद दोनों को जोर की भूख लग आई।

मछली को भी लगा कि उसके पेट में गई दोनों युवतियाँ भूखी हैं।

“सुनो, मेरे दिल से एक टुकड़ा काटकर खा लो और अपनी भूख मिटा लो।'” उसने उन दोनों को बताया। दोनों ने वैसा ही किया।

उनके ऐसा करते ही उस मछली ने उनसे कहा, आप दोनों मेरे भीतर रहकर मेरा ही दिल काटकर खा रही हैं, क्या यह अच्छी बात है ?

नहीं, बिल्कुल नहीं। दोनों ने कहा।

दूसरा दिन आया और पहले दिन वाला हादसा पुन: दोहराया गया। कई दिनों तक यह क्रम चलता रहा।

आखिर परेशान होकर एक दिन का-कू-को समुद्र के बीच खड़ी एक चट्टान के पास आई और दोनों सहेलियों को उस पर उगल कर भाग गई। दोनों सहेलियाँ पूरी तरह असहाय उस चट्टान पर पड़ी रहीं। उन्हें नहीं पता था कि वे किनारे तक कैसे पहुँचेंगी। तभी उन्हें एक शार्क अपनी ओर आती दिखाई दी। दोनों डर गईं।

“मेरी पीठ पर बैठो। शार्क ने पास आकर उनसे कहा, “मैं तुम दोनों को किनारे पहुँचा दूँगी।

मरता क्या न करता। कोई और चारा न देख वे दोनों शार्क की पीठ पर सवार हो गईं। कुछ ही समय में उसने उन्हें किनारे पर पहुँचा दिया। दोनों ने उसे धन्यवाद दिया।

अंधेरा हो चला था। दोनों सहेलियाँ घर की ओर चल पड़ीं।

ओसरी उत्सव

बहुत समय पहले की बात है। निकोबार में किमिउख और फरक्का नाम के दो गाँव थे। किमिउख गाँव का मुखिया एल्हट था और फरक्‍का गाँव का मुखिया होको चावरा टापू उनसे कुछ ही दूरी पर था। चावरा के निवासियों के साथ दोनों गाँवों के निवासियों के मधुर संबंध थे। चावरा के लोग होरी (निकोबारी डोंगी अर्थात्‌ छोटी नाव) बनाते और दोनों गाँवों के लोगों को बेचते थे। बदले में वे उनसे चाकू, सुअर और कपड़ा आदि ले जाते थे।

एक बार चावरा वालों ने अपनी होरियाँ किमिउख वालों को काफी मँहगे दामों में बेच दीं। इस पर दोनों गाँवों के लोग भड़क उठे और उन्होंने चावरा वालों से बदला लेने की ठानी। कुछ दिनों बाद उन्होंने 500 चाकू, 100 दाहे, 200 सुअर और कुछ कपड़ों के बदले में उनसे 12 होरियाँ हड़प लीं। बेचे गए चाकू लकड़ी के बने थे।

उन पर उन्होंने इतनी अच्छी तरह रंग किया था कि वे बिल्कुल लोहे के बने लगते थे।

शुरू-शुरू में तो चावरा वाले बहुत खुश हुए कि उन्होंने बहुत सस्ते में चाकू खरीद लिए। परन्तु अपने गाँव में पहुँचकर जैसे ही उनको पता लगा कि उन्हें ठगा गया है, वे भी बदला लेने को भड़क उठे।

कुछ दिनों बाद चावरा गाँव की ओर से फलों से लदी हुई एक होरी फरक्का और किमिउख गाँवों को भेजी गई।

उपहार पाकर दोनों गाँवों के लोग बहुत खुश हुए और उन्होंने एक बड़ी दावत का आयोजन किया। दस सुअर दावत के लिए काटे गए। एक बूढ़े और एक लड़की को छोड़कर, दोनों गाँवों के सभी लोगों ने पेट भरकर मांस और फल खाए।

वे सभी फल जहरीले थे। उन्हें खाकर वे सब-के-सब मर गए। किसी को पता ही नहीं चला कि वे कैसे मरे।

चावरा के लोग उन सबकी मौत की खबर पाकर खुशी से झूम उठे।

लेकिन वह बूढ़ा, जो बच गया था, चावरा वालों की चाल को भाँप गया। उसने चावरा के लोगों को उनके इस कुकृत्य के बारे में धिक्कारा और कहा कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।

उसके धिक्कारने पर चावरा के हर आदमी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने तब होरी-उत्सव का आयोजन किया। उसमें उन्होंने प्रार्थना की कि मरे हुए सभी लोगों की आत्मा को शांति मिले।

निकोबार में आज भी यह शोक-उत्सव मनाया जाता है। इसे 'ओसरी उत्सव' कहते हैं।

डायन और सड़क

'एक हजार साल पहले निकोबार में छुट्टी के दिन काम करने की प्रथा नहीं थी।

दरअसल, सप्ताह में एक रात डायनें जंगलों में इकट्टी होतीं थीं, सारी रात नाचती थीं, गाती थीं, और भूत-प्रेतों व प्रेतात्माओं को बुलाती थीं।

अगला दिन उनके आराम का दिन होता था। आम लोगों के बीच उस दिन को छुट्टी का दिन कहा जाता था, ताकि कोई भी आदमी उस दिन जंगल में जाकर उनके आराम में बाधा पहुँचाने का कारण न बन पाए। आराम में बाधा पहुँचाने वाले व्यक्ति को अपने जादू से वे कुछ भी बना सकती थीं।

लेकिन एक आदमी था जो छुट्टी के दिन भी काम करता था। किसी से भी डरे बिना वह अपने केले के बाग की देखभाल के लिए जंगल में जाता था।

एक छुट्टी वाले दिन, जब वह आदमी अपने केले के बाग में पहुँचा तो उसने एक पेड़ पर पके केलों का एक गुच्छा लटका देखा। वह खुशी से फूला न समाया।

काटकर उसे घर ले जाने के लिए उसने अपनी जेब से चाकू निकाला और उस पेड़ की ओर बढ़ गया। लेकिन जैसे ही उसने उस गुच्छे को काटा, वह सड़क बन गया। किसी को भी इस दुर्घटना का पता न चला।

जब गाँव के लोगों ने कई दिनों तक उसे नहीं देखा तो वे उसकी खोज में निकल पड़े। उनको सिर्फ इतना पता था कि वह छुट्टी के दिन भी अपने केले के बाग में जाता था। वे वहाँ भी उसको ढूँढ़ने के लिए गए।

लेकिन उसकां वहाँ भी अता-पता न मिला। गाँव वालों ने मान लिया कि या तो वह मारा गया या समुद्र में डूब गया। उसकी मौत पर वे विलाप कर उठे।

वह आदमी, दिन भर तो सड़क बनकर नीचे पड़ा रहता लेकिन रात को पुनः आदमी बन जाता। आदमी बनकर वह नाचता, गाता और दूसरी डायनों की तरह प्रेतात्माओं को बुलाता, उनसे बातें करता।

जब वह आदमी बनता तब उसकी त्वचा का रंग सुर्ख-लाल होता। जब वह सड़क बनता, तब भी उस पर लाल धारियाँ पड़ी होती थीं।

लोगों को आश्चर्य होता कि वह सड़क सिर्फ दिन में ही दिखाई देती थी, रात में गायब हो जाती थी। लेकिन किसी को भी सच्चाई का पता न था।

वह आदमी भी, हालाँकि दिनभर के लिए सड़क बन जाता था, परन्तु उसकी इच्छाएँ मरी नहीं थीं। वह जब भी कोई पका केला देखता, उसका जी ललचा जाता। रात में वह पके केले खाने को दौड़ता।

लोग हालाँकि आज तक लाल धारियों वाली उस सड़क का रहस्य नहीं जान पाए हैं।

उन्हें नहीं मालूम कि यह वही आदमी है जिसने अपने बुजुर्गों की हिदायत और अपने रिवाजों को नहीं माना और डायनों के आराम करने के दिन भी काम करने के लिए घर से निकल गया था।

शार्क का जन्म

'काफी पुरानी बात है। निकोबार में तामलु और फुको नामक दो गाँवों के बीच टोसलो नाम का एक गाँव था। टोसलो के लोग जन्म से ही जंगली और खूँखार थे।

दूसरे गाँव के किसी आदमी पर या किसी अन्य अनजान आदमी पर उनकी नजर पड़ जाती तो वे उस पर हमला बोल देते और जब तक उसे मार न गिराते, चैन न लेते।

पड़ोस के दोनों गाँवों के लोग टोसलो वालों से हमेशा डरे रहते थे।

वे कभी भी उस गाँव के बीच से गुजरने की हिम्मत नहीं करते थे। उधर से गुजरने का अर्थ था-मौत।

अंततः दोनों पड़ोसी गाँव वालों ने मिलकर टोसलो पर आक्रमण कर दिया और उनको उनके गाँव से बाहर खदेड़ दिया।

खदेड़े जाकर टोसलो वाले चौकबाक नामक जगह पर पहुँच गए। वे वहाँ रहने लगे परन्तु अपना जंगलीपन न छोड़ पाए।

उनका नया गाँव चौकबाक टिपटॉप नामक गाँव से अधिक दूरी पर नहीं था। हुआ यों कि एक दिन टिपटॉप का एक लड़का अपने छोटे भाई को साथ लेकर चौकबाक के समीप से गुजर रहा था।

वह अपने आसपास किसी भी तरह के खतरे से अनजान था। उनको देखकर चौकबाक का एक निवासी छुरा हाथ में लेकर चुपचाप उनके पीछे लग गया।

उसने एकाएक छोटे भाई पर छुरे से हमला किया।

छोटा भाई चिल्लाया, “भैया, बचाओ। पीछे से एक आदमी मुझ पर हमला कर रहा है।

बड़े भाई ने इस चीख-पुकार को छोटे भाई की शरारत समझा। इसलिए उसने उसकी चीख पर कोई ध्यान नहीं दिया।

कुछ ही पल बाद चौकबाक वाले ने छोटे भाई पर पुन: हमला किया। लड़का बुरी तरह चीखा- चिल्लाया और बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा। उसके गिरते ही चौकबाक वाले ने उसका सिर काट डाला। लड़का मर गया।

जैसे ही बड़े भाई ने मुड़कर देखा। उसे छुरा हाथ में लिए अपना दुश्मन नजर आया।

उसे देखकर वह बेतहाशा अपने गाँव की ओर भागा और हाँफता हुआ किसी तरह घर पहुँचा।

बाद में सारा किस्सा उसने गाँव वालों को सुनाया। उसे सुनकर सभी ने चौकबाक वालों का खात्मा कर डालने की कसम खाई और उसी दिन उन पर हमला कर दिया।

उनके हमले से बचकर चौकबाक के लोग जान बचाकर भाग खड़े हुए। कुछ मर गए औरं ब्रांकी समुद्र में जा कूदे। वे फिर कभी वापस नहीं आए।

कहा जाता है कि वे दुष्ट और निर्दयी लोग शार्क बन गए तथा “बदमाश मछली ' कहे जाने लगे। आज भी वे पहले जितने ही दुष्ट और निर्दयी हैं।

आदमी को समुद्र में देखते ही वे उस पर हमला करते हैं। शायद, पुरानी दुश्मनी का बदला लेने के लिए।

किलपुट की वाफ्सी

बहुत साल पहले की बात है। एक विदेशी जलयान ने कार-निकोबार में लंगर डाला। निकोबार के लोगों ने नारियल के बदले जलयान के लोगों से दूसरी वस्तुएँ लेना शुरू कर दिया।

एक दिन किलपुट भी अपनी डोंगी में बैठकर कुछ सामान लेने को गया। लेकिन उसे थोड़ी देर हो गई। सभी लोग जलयान से सामान की अदला-बदली करके अपनी-अपनी डोंगी में आ चुके थे।

किलपुट जलयान के बोर्ड पर ही खड़ा रह गया। जलयान के लोगों को उसके वहाँ रह जाने का पता ही नहीं चला और वे जलयान को अपने देश की ओर ले गए। किलपुट के दोस्तों को भी इस बात का पता न चला।

समुद्र में तैरती उसकी खाली डोंगी को देखकर उन्होंने समझा कि किलपुट समुद्र में डूबकर मर गया। वे उसकी डोंगी को लेकर गाँव में वापस आ गए। किलपुट की मौत का समाचार आग की तरह पूरे गाँव में फैल गया। किलपुट के माँ-बाप पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।

उधर, जलयान पर चढ़ा किलपुट एक अनजान देश में पहुँच गया। भरण-पोषण के लिए वहाँ उसने एक डोंगी बनाई और उसमें बैठकर समुद्र से मछालियाँ पकड़ने और बेचने का धन्धा करने लगा। इससे उसने अपार धन कमाया। इसके बाद वहाँ पर उसने विवाह भी कर लिया। उसके दो सन्तानें हुई एक बेटा और एक बेटी। दिन बीतते गए लेकिन किलपुट निकोबार के अपने पुश्तैनी गाँव को न भूल सका। वह अपनी पत्नी और बच्चों के बीच बैठकर उन्हें अपने प्रिय गाँव के किस्से सुनाता और अपना मन हल्का करता। परन्तु जब भी वह वापस लौटने की बात उठाता उसकी पत्नी और बच्चे उदास हो जाते। वह रुक जाता।

आखिर, एक बार किलपुट ने एक बड़ी डोंगी बनाई। तरह-तरह के कपड़े, खाने-पीने की वस्तुएँ और पानी अपने साथ उसमें रखा। और एक दिन चुपचाप वह अपने गाँव के लिए अथाह समुद्र में निकल पड़ा। बड़ी मुसीबतों के बाद आखिर एक दिन वह अपने गाँव के किनारे पहुँच गया। डोंगी से उतरकर जब वह अपने घर के निकट पहुँचा तो उसने देखा कि गाँव वाले मिलकर 'ओसरी उत्सव' की तैयारी कर रहे है। उसे लगा कि हर आदमी ने उसे मरा हुआ मान लिया है। तभी तो वे सब उसके लिए रो- बिलख रहे थे।

वहाँ से चलकर किलपुट अपने सुअरों के बाड़े की तरफ गया। उसने सुअरों के कानों पर पहचान- चिह बना रखे थे। वे जैसे के तैसे थे। अचानक कुछ लोग उधर आ निकले और उससे पूछताछ करने लगे।

“मैं एक विदेशी हूँ।'' वह बोला। फिर उसने लोगों से पूछा, “आप लोग यह क्या कर रहे हैं ?

लोगों ने उसे बताया, “गाँव के एक नौजवान की समुद्र में डूबने से मौत हो गई थी। उसी के शोक में यह सब हो रहा है।

“डूबने वाले का नाम क्‍या था?” किलपुट ने उनसे पूछा। “किलपुट।” उन्होंने बताया।

“मैं मरा नहीं,” किलपुट बोला, “जिन्दा हूँ।' यह कहकर उसने पूरा किस्सा उन्हें सुनाया।

गाँव वालों की खुशी का ठिकाना न रहा। इतने वर्षों बाद उसे पाकर वे झूम उठे।

शोक का उत्सव 'ओसरी' किलपुट की वापसी के उत्सव में बदल गया।

कोचांग

स्ट्रेट द्वीप के एक पहाड़ पर कोचांग नाम का एक आदमी रहता था। वह बहुत परिश्रमी और ईमानदार था।

वह 'पुलुगा' का पक्का भक्त था। उसका विश्वास था कि सूर्य, चन्द्रमा, तारे, धरती, समुद्र सब को पुलुगा ने बनाया है। वह जब तक चाहे इन्हें बनाए रख सकता है और जब चाहे इन्हें नष्ट कर सकता है।

कोचांग की इच्छा थी कि उस पहाड़ पर, जहाँ वह रहता था, एक शानदार मकान बनाए। उसे विश्वास था कि पुलुगा की कृपा से एक न एक दिन उसकी यह इच्छा अवश्य पूरी होगी।

दिन पर दिन बीतते रहे। कोचांग अपने काम में मस्त रहता। वह सुबह घर से निकलता समुद्र तट से पत्थर इकट्ठे करता, जंगल में जाकर पेड़ काटता और लकड़ियाँ इकट्ठी करता। जब उसके पास पत्थर और लकड़ियाँ अच्छी संख्या में इकट्ठे हो गए, तब उसने पहाड़ पर एक अच्छी जगह को चुना और वहाँ पर मकान बनाना शुरूँ कर दिया। दिन-रात मेहनत करके उसने एक आलीशान मकान खड़ा कर लिया। सजावट के लिए उसने विभिन्न प्रकार की समुद्री-वस्तुओं का प्रयोग किया। उसके बाद उसने एक मनोहारी बाग तैयार किया। उसमें उसने नारियल, सुपारी, पपीता, केला, कटहल आदि 'फल तथा कंद-मूल लगाए। पौधे जब बड़े हो गए तो मधुमक्खियों ने कटहल के पेड़ों पर अपने छत्ते बना लिए। जंगल में सुअरों की कोई कमी नहीं थी। जब भी उसका मन करता वह समुद्र से मछली और कछुए पकड़ लाता। इस तरह कोचांग एक सुखी और समृद्ध आदमी बन गया।

कहा जाता है कि ईश्वर अपने भक्तों की कड़ी से कड़ी परीक्षा लेता है। पुलुगा ने भी कोचांग की परीक्षा लेने की सोची। एक रात, जब कोचांग गहरी नींद में था, समुद्र में भयंकर तूफान उठा। तेज- तर्रार बारिश और तीखी आँधी ने उसे और अधिक भयानक बना दिया था। कोचांग नींद से उछल पड़ा। कहीं कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। बारिश के रुक जाने के भी कोई आसार नजर नहीं आ रहे थे। पानी ने घर में घुसना आरंभ कर दिया था। घर को सजाने के लिए उसके द्वारा कठिन श्रम से जोड़ा गया सारा सामान उसी की नजसें के आगे नष्ट होता जा रहा था।

उसने सोचा--जरूर मुझसे कोई भयंकर भूल हुई है, जिसके कारण पुलुगा नाराज हो उठे हैं। उसने पुलुगा की स्तुति करनी शुरू कर दी, '“हे पुलुगा, आप बड़े दयावान हैं। मुझसे अनजाने में हुई किसी भी भूल को कृपा करके क्षमा कर दें।

परन्तु घनघोर वर्षा और तूफान ने थमने का नाम न लिया।

कमरे में आधी ऊँचाई तक पानी भर चुका था। अचानक उसको मकान के छप्पर से नीचे को लटकती एक रस्सी नजर आई। उसने उसे कसकर पकड़ लिया। उस रस्सी के सहारे वह ऊपर को चढ़ता गया और आकाश में जा पहुँचा।

वहाँ उसने बेहद मनोहारी दृश्य देखा। वहाँ उसने बड़े-बड़े महल देखे। फलों से लदे बाग देखे। हीरे-जवाहरातों के फूल वाले बगीचे देखे। चारों ओर परियाँ उड़ रही थीं।

कोचांग उन्हें देखकर मंत्रमुग्ध हो गया।

उसने सोचा इतनी खूबसूरत जगह धरती पर तो हो नहीं सकती। मैं जरूर स्वर्ग में आ गया हूँ। पुलुगा भी यहीं पर कहीं रहते होंगे।

वह यह सब सोच ही रहा था कि रस्सी एक बड़े महल में उसे ले गई। कोचांग ने देखा कि वहाँ चारों ओर प्रकाश ही प्रकाश फैला था। देवदूतों ने उसका स्वागत किया और अन्दर ले गए। जैसे ही वह अन्दर पहुँचा, उसे एक दिव्य-स्वर सुनाई पड़ा--' धरती के बेटे, तुम कैसे हो ?

कोचांग डर गया और काँपने लगा। किसी तरह उसके मुँह से निकला-आप कौन हैं ?

“मैं सृष्टि का निर्माता पुलुगा हूँ।

यह सुनते ही कोचांग श्रद्धापूर्वक दण्डवत्‌ लेट गया। होठों ही होठों में वह बुदबुदाया, ''स्वामी, भयंकर तूफान ने मेरे घर और सम्पत्तियों नष्ट कर दिया है।

“तब, तुम क्‍या चाहते हो ?'' दिव्य-स्वर ने पूछा।

“मैं चाहता हूँ कि तूफान थम जाए और मेरी धन-सम्पत्ति नष्ट होने से बच जाए।'' कोचांग विनयपूर्वक बोला।

“मैं अब सिर्फ एक ही चीज को बचा सकता हूँ।” पुलुगा ने कहा, “तुम्हें या तुम्हारी धन-सम्पत्ति को बोलो, क्या चाहिए ?

“भगवन, मैंने कठोर श्रम करके अपना मकान बनाया था। उसे अपनी ही आँखों के आगे नष्ट होते मैं नहीं देख सकता। उससे अच्छा है कि आप मुझे ही नष्ट कर डालें। इस पर मुझे कोई पछतावा नहीं होगा।'' कोचांग ने कुछ देर मन में विचार करने के बाद कहा।

यह आदमी हृदय की गहराइयों तक सच्चा और ईमानदार है पुलुगा ने सोचा यह अपने जीवन की चिन्ता न करके अपने श्रम से खड़ी की गई चीजों को बचाना चाहता है। मुझे इस आदमी की रक्षा करनी चाहिए।

तब कोचांग को पुनः दिव्य-स्वर सुनाई पड़ा, “तुम्हारे उत्तर से मैं सन्तुष्ट हुआ। तुम्हारा कोई . अहिंत नहीं होगा। मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। तुम सफल हुए। जाओ, अपने घर जाओ।

पलक झपकते ही उसने पाया कि वह अपने कमरे में पुलुगा के अभिवादन में दण्डवत्‌ लेटा पड़ा था। भयंकर वर्षा और तूफान थम चुके थे। पानी उतर चुका था। उसका घर और बाग-बगीचे सब पहले जैसे ही हो गए थे।

कोचांग ने श्रद्धापूर्वक एक बार पुन: पुलुगा का अभिवादन किया और वह सुखपूर्वक रहने लगा।

जब पेड़ चलते थे

बेशक वे बड़े सुनहरे दिन थे। उन दिनों आदमी जंगलों में भटकता फिरता था। आदमी की तरह ही पेड़ भी घूमते-फिरते थे। आदमी उनसे जो कुछ भी कहता, वे उसे सुनते-समझते थे। जो कुछ भी करने को कहता, वे उसे करते थे। कोई आदमी जब कहीं जाना चाहता था तो वह पेड़ से उसे वहाँ तक ले चलने को कहता था।

पेड़ उसकी बात मानता और उसे गंतव्य तक ले जाता था। जब भी कोई आदमी पेड़ को पुकारता, पेड़ आता और उसके साथ जाता।

पेड़ उन दिनों चल ही नहीं सकते थे बल्कि आदमी की तरह दौड़ भी सकते थे। असलियत में, वे वो सारे काम कर सकते थे जो आदमी कर सकता है।

उन दिनों 'इलपमन' नाम की एक जगह थी। वास्तव में वह मनोरंजन की जगह थी। पेड़ और आदमी वहाँ नाचते थे, गाते थे, खूब आनन्द करते थे। वहाँ वे भाइयों की तरह हँसते-खेलते थे।

लेकिन समय बदला। इस बदलते समय में आदमी के भीतर शैतान ने प्रवेश किया। उसके भीतर बुराइयाँ पनप उठीं।

एक दिन कुछ लोगों ने पेड़ों पर लादकर कुछ सामान ले जाना चाहा। परन्तु उन पर उन्होंने इतना अधिक बोझ लाद दिया कि पेड़ मुश्किल से ही कदम बढ़ा सके। वे बड़ी मुश्किल से डगमगाते हुए चल पा रहे थे।

पेड़ों की उस हालत पर उन लोगों ने उनकी कोई मदद नहीं की। वे उल्टे उनका मजाक उड़ाने लगते।

पेड़ों को बहुत बुरा लगा। वे मनुष्य के ऐसे मित्रताविहीन रवैये से खिन्‍न हो उठे | वे सोचने लगे कि मनुष्य के हित की इतनी चिन्ता करने और ऐसी सेवा करने का नतीजा उन्हें इस अपमान के रूप में मिल रहा है।

उसी दिन से पेड़ स्थिर हो गए। उन्होंने आदमी की तरह इधर-उधर घूमना और दौड़ना बन्द कर दिया।

अब आदमी को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह पेड़ के पास गया और उससे पहले की तरह ही दोस्त बन जाने की प्रार्थना कौ। लेकिन पेड़ नहीं माने। वे अचल बने रहे।

इस तरह आदमी के भददे और अपमानजनक रवैये ने उससे उसका सबसे अच्छा मित्र और मददगार छीन लिया।

बदल

आदिकाल में निकोबार में अनगिनत सुअर थे। वे वहाँ के लोगों को खूब परेशान किया करते थे। एक दिन एक आदमी खाली हाथ कहीं जा रहा था। अचानक उसका सामना सुअरों के एक झुंड से हो गया। उन्होंने उस पर हमला कर दिया। आदमी कुछ न कर सका और मारा गया।

उसकी मौत की खबर पाकर उसका बड़ा भाई दुख के सागर में डूब गया। उसने सुअरों से बदला लेने की कसम खा ली। उसने अपने फरसे की धार को पैना करना शुरू किया। सारी रात वह उसे धारदार बनाता रहा।

अगले दिन, स्वेरे-सवेरे वह जंगल में गया। फरसे की धार को आँकने के लिए उसने एक तगड़ा प्रहार एक पेड़ पर किया और एक ही वार में उसे काट डाला। लेकिन उसे तसल्ली नहीं हुई। वह घर लौट आया और दोबारा उसकी धार को तेज करने के लिए बैठ गया। घंटों मेहनत के बाद उसने उसे एक मक्खी पर टैस्ट किया और उसके दो टुकड़े कर डाले।

धार से सन्तुष्ट होकर वह फरसे को थामे घर से निकला और उसी जगह जा पहुँचा, जहाँ पर उसके भाई को सुअरों ने मार डाला था।

वहाँ, वह एक ऊँचे पेड़ पर जा चढ़ा और चीख-चीखकर सुअरों को ललकारने लगा। उसकी आवाज सुनकर सुअर वहाँ आ गए। उसे ऊँचे पेड़ पर चढ़ा पाकर वे एक के ऊपर एक चढ़ने लगे। बड़ा भाई यही चाहता था। धारदार फरसे से उसने वे सारे सुअर मार डाले।

इसके बाद उसने पुनः पुकारना शुरू किया। सुअरों का एक बड़ा झुंड पुन: वहाँ आ पहुँचा। उन्होंने भी पहले झुंड के सुअरों की तरह एक के उपर एक खड़े होकर बड़े भाई तक पहुँचने की कोशिश की और मारे गए।

लेकिन तीसरी बार पुकारने पर सुअर नहीं आए। उनके स्थान पर एक देव आया और उससे सुअरों की हत्या रोकने का आग्रह किया। बड़े भाई ने उसकी बात को नहीं सुना। उसने मारे गए सभी सुअरों को इकट्ठा करके आग में भूनना शुरू कर दिया। लेकिन एक तरफ से भुन जाने के बाद जैसे ही बह दूसरी ओर भूनने के लिए उन्हें पलटता, पहली तरफ का हिस्सा पहले-जैसा हो जाता। वह बार- बार उन्हें भूनता और पलटता रहा।

आखिर परेशान होकर उसने एक तरफ के हिस्से को ही खाकर अपनी भूख मिटा ली। इसके बाद, जैसे ही वह अपने घर के दरवाजे पर पहुँचा, देव उसके सामने प्रकट होकर बोला, अगर मैं तुमको शार्क बना दूँ तो कैसा रहे ?

मैं गहरे सागर में उतर जाऊँगा। उसने जवाब दिया। “तो तैयार हो जाओ।” देव ने क्रोधपूर्वक कहा।

बड़ा भाई शार्क बन जाने के लिए सिर झुकाकर नीचे बैठ गया। अचानक कहीं से एक साँप वहाँ आ पहुँचा और बडे भाई के शरीर पर चारों तरफ लिपट गया। जैसे ही देव ने श्राप फूँका, साँप मर गया।

वास्तव में, बड़े भाई द्वारा मारे गए सुअरों की आत्मा ही देव के रूप में प्रकट हुई थी।

बड़े भाई को मारकर वह सुअरों की हत्या का बदला लेना चाहती थी।

अजगर का जन्म

निकोबार में 'कुन-येन-से ' त्यौहार के मौके पर ढेरों फलों की जरूरत पड़ती थी।

गाँव वाले जंगल के अपने बागों से फल एकत्र करते थे।

वर्षों पहले की बात है। एक बार जंगल से फल एकत्र करके गाँव को वापसी के समय रास्ते में उन्हें प्यास लगी। तब, उनमें से एक आदमी नारियल के एक पेड़ पर चढ़ गया।

उसने नीचे खड़े अपने साथियों को ओर ढेर सारे हरे नारियल गिरा दिए।

डाब पीकर नीचे खड़े लोगों ने अपनी प्यास बुझाई और उससे घर चलने के लिए नीचे उतर आने का आग्रह किया। लेकिन वह आदमी बोला, मुझे घर लौटने में दो या तीन दिन लग जाएँगे।

मैं नारियल के फूल खाकर ताकतवर बनना चाहता हूँ। मैं आने वाले कुन- येन-से त्यौहार में अपनी ताकत का प्रदर्शन करना चाहता हूँ। तुम लोग जाओ।

उसकी बात मानकर सभी लोग फलों के साथ गाँव को लौट आए।

दो दिनों तक वह आदमी नारियल के फूल खाता रहा।

तीसरे दिन उसने महसूस किया कि उसके शरीर के निचले हिस्से में मांस इकट्ठा हो गया है और वह काफी भारी हो गया है।

अभी वह कुछ सोच ही रहा था कि इतने में ही वह एक अजगर के रूप में बदल गया।

अजगर बन जाने पर वह नारियल के पेड़ से नीचे उतरा और जंगल को पार करके अपने घर जा पहुँचा।

वहाँ उसने देखा कि उसकी पत्नी सहित कुछ औरतें मुरब्बा बनाने के लिए फल छील रही थीं।

अजगर को घर में आया देखकर वे डर गईं।

चीख-पुकार करती हुई वे सब-की-सब इधर-उधर भाग उठीं उसकी पत्नी और साथ ही काम कर रही एक औरत इस भगदड़ में ठोकर खाकर अजगर के सामने गिर पड़ीं वह उन्हें निगल गया।

अजगर के पेट में जाकर दोनों औरतों को ऐसा लगा जैसे कि वे एक बड़े कमरे में आ गई हैं।

परन्तु बाहर निकलने का कोई भी रास्ता उन्हें न मिला।

उनके हाथों में फल छीलने वाले चाकू थे।

उन्होंने अजगर के पेट को उन चाकुओं से चीरकर बाहर निकलने की योजना बनाई।

दोनों ने वैसा ही किया और अजगर के पेट से निकलकर बाकी औरतों के. पास आ गईं।

सभी ने उन दोनों के साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

निकोबार में माना जाता है कि उन दिनों अजगर सूरज और चाँद को भी निगल सकता था। आज भी, उसी की वजह से सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण होते हैं।

तोतारंग

काफी समय पहले की बात है। कार निकोबार के परसा नामक गाँव में तोतारांग नाम का एक युवक रहता था। असलियत में, परसा एक पहाड़ का नाम था। उसकी तलहटी में बसे गाँव को भी लोग उसी नाम से पुकारने लगे थे।

तोतारांग खूबसूरत और ताकतवर नौजवान था। अपनी कमर में वह हर समय लकड़ी की एक तलवार लटकाए घूमता था।

इधर-उधर मटरगस्ती करते हुए उसने लपाती गाँव में रहने वाली वामीरो नाम की सुन्दरी की चर्चा सुनी। ऐसे घुँघराले बाल, ऐसी गहरी नीली आँखें, मोती जैसे ऐसे सफेद दाँत किसी और के हैं ही नहीं लोग कहते उसके अच्छे आचरण और व्यवहार के कारण सभी उसको चाहते हैं।

इन सब चर्चाओं ने तोतारांग के मन में वामीरों को देखने की इच्छा जगा दी। अन्तत: एक दिन घूमता-घामता वह लपाती गाँव में वामीरों के घर के सामने जा पहुँचा।

वामीरों उस समय बाहर ही खड़ी थी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

उस पहली ही मुलाकात में तोतारांग और बामीरो एक-दूसरे की ओर आकर्षित हो गए। उन्होंने एक-दूसरे से मिलना-जुलना शुरू कर दिया। कभी वे जंगल में मिलते तो कभी सागर-तट पर।

वे परस्पर प्यार-भरी बातें करते और साथ-साथ जीने-मरने की कसमें खाते।

लेकिन जब लड़की के घर वालों को इस बारे में पता चला तो उन्होंने वामीरो की जमकर पिटाई की और उसे कभी भी तोतारांग से न मिलने की चेतावनी दी।

लेकिन जब लड़की के घर वालों को इस बारे में पता चला तो उन्होंने वामीरो की जमकर पिटाई की और उसे कभी भी तोतारांग से न मिलने की चेतावनी दी।

तोतरांग को इस बारे में कुछ पता न चला। वह रोजाना अपने मिलन-स्थल पर पहुँचता और घंटों वामीरो का इंतजार करके वापस लौट जाता। बहुत दिनों तक ऐसा चलता रहा।

एक दिन गाँव में एक तमाशा होने वाला था। गाँव के सभी लोग उसका मजा लेने को उत्सुक खड़े थे। वहाँ पर अचानक तोतारांग और वामीरो की मुलाकात हो गई।

तोतारांग ने उसके सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। लेकिन उसने मना कर दिया और उससे हमेशा के लिए वहाँ से चले जाने की विनती की।

तोतारांग बहुत हताश हुआ। उसकी समझ में नहीं आया कि वामीरो मना क्‍यों कर रही है। क्रोध में, उसने कमर में बँधी अपनी तलवार निकाली और पहाड़ के एक हिस्से पर चोट की | पहाड़ का वह हिस्सा कटकर समुद्र में जा गिरा।

तोतारांग पहाड़ी के उस टुकड़े पर बैठ गया और उसे खेता हुआ समुद्र में बढ़ गया। आगे एक स्थान पर जाकर वह टुकड़ा अटक गया। तब, तोतारांग ने उधर से और वामीरो ने इधर से एक दूसरे को पुकारना प्रारम्भ किया।

अब, न तो तोतारांग इस दुनिया में है और न ही वामीरो। लेकिन पहाड़ी का वह टुकड़ा अभी भी समुद्र में है।

लोग उसे “लिटिल अण्डमान' कहते हैं।

चोरी हुआ टापू

बहुत समय पहले काकना गाँव के पास एक छोटा-सा टापू था। छोटा होने पर भी वह एक दर्शनीय टापू था। उस पर कोई रहता नहीं था। लोग उस पर सिर्फ घूमने और शिकार करने के लिए जाते थे।

टापू पर 'साका' नाम का एक पक्षी भी आता-जाता था। पूरी दूनिया में वह एक ही पक्षी था। वह छोटा परन्तु बहुत चतुर-चालाक था।

वर्षों तक साका टापू में उड़ान भरता रहा। उसको टापू इतना अधिक भाया कि उसने उसे अपने साथ ले जाने की योजना बनाई ताकि उसके रहने की जगह हमेशा खूबसूरत बनी रहे। उसके सिवा कोई औरं वहाँ न हो।

एक रात, जब सारी दुनिया सोई हुई थी, साका ने सोचा--- अच्छा मौका है। ऐसे में मुझे इस टापू को ले उड़ना चाहिए।

साका कल्पना में खो गया। उसे लगा कि पूरा टापू उसके घर में है और वह आराम से यपू में उड़ान भर रहा है। वहाँ उसका एक प्यारा घोंसला है। तरह-तरह के दूसरे पक्षी आसपास चहक रहे हैं।

सभी उस टापू की प्रशंसा कर रहे हैं और वहाँ रुक जाना चाहते है। अचानक उसकी तन्द्रा टूटी और वह उस छोटे टापू को पीठ पर लादकर अपने निवास की ओर उड़ चला।

साका छोटा था। वह बड़ी सावधानी के साथ उस भारी-भरकम टापू को लेकर उड़ रहा था। दिन निकलने से पहले वह अपने निवास पर पहुँच जाना चाहता था। लेकिन समय उसकी उड़ान की तुलना में तेजी से गुजर रहा था।

जैसा कि उसको डर था, रात समाप्त हो गई। दिन निकल आया।

लोग जाग उठे। उन्होंने साका को टापू लेकर जाते हुए देख लिया।

पूरब की ओर से आती सूरज की पहली किरण पड़ते ही साका ने टापू को नीचे फेंक दिया और तेजी से अपने निवास की ओर उड़ गया। टापू उलटकर समुद्र में जा गिरा।

लोगों का मानना है कि चौरा के रास्ते में सागर के बीच झाँकता 'छोटा टापू' ही वह चोरी गया टापू है।

धूर्त चमगादड़

एक बार पशुओं और पक्षियों के बीच लड़ाई छिड़ गई। इस लड़ाई में कभी पशुओं की जीत होती तो कभी पक्षी जीत जाते। लेकिन लड़ाई थी कि रुकने का नाम ही नहीं लेती थी।

उस लड़ाई में पशुओं और पक्षियों के बीच सबसे अधिक धूर्त प्राणी चमगादड़ था।

जब पक्षियों की जीत होती तो वह उड़कर उनकी ओर पहुँच जाता और कहता, मैं भी पक्षी हूँ।

देखो, ये मेरे पंख हैं। मैं उड़ भी सकता हूँ। हम सब भाई-भाई हैं।

इस तरह वह पक्षियों के साथ रहना शुरू कर देता।

और जब पशु जीत जाते तो वह उनके खेमे में चला जाता। कहता, देखो, मेरे पंख जरूर हैं लेकिन मैं पक्षी नहीं हूँ। उनसे तो मुझे बहुत घृणा है। भाई, मैं तो;पशु ही हूँ, आप जैसा।

ये देखो, मेरी नाक और कान एकदम आप जैसे हैं। मैं पक्षियों की तरह अंडे नहीं देता, आपकी तरह बच्चों को जन्म देता हूँ। मैं उनकी चोंच में चुग्गा नहीं देता, आपकी तरह स्तनपान कराता हूँ। हम परस्पर भाई-भाई हैं। यह कहकर वह पशुओं के साथ रहना शुरू कर देता।

कुछ समय बाद पशुओं और पक्षियों के बीच लड़ाई का दौर समाप्त हो गया। दुनिया में किसी भी किस्म का पशु और किसी भी किस्म का पक्षी ऐसा नहीं था जिसने इस लड़ाई में भाग न लिया है। समय-समय पर चमगादड़ भी इधर या उधर शामिल होता आया था।

लेकिन लड़ाई का दौर समाप्त होने पर उसका चालाकी भरा सारा खेल समाप्त हो गया। द्वोनों पक्षों को उसकी धूर्तता का पता चल गया। अब, वह बेचारा न पशुओं के बीच बैठ सका और न पक्षियों के बीच।

उन्होंने मिलकर उसको शाप दिया कि हे चमगादड़ ! तू पक्षियों की तरह न घोंसले में रह पाएगा और न पशुओं की तरह घरों में। तू पेड़ की शाखों पर उलटा लटकेगा। साथ ही, रात की बजाय तू दिन में सोया करेगा और दिन की बजाय रात में जागा करेगा।

अपनी धूर्तता के परिणामस्वरूप तभी से, चमगादड़ शाखों पर उलटा लटका रहता है, दिन में सोता है। और रात में जागता है।

सूरज की ओर

'बहुत पहले की बात है।

एक आदमी ने सूरज की ओर जाना शुरू किया। उसे रास्ता नहीं पता था। रास्ते में उसे अनेक कठिनाइयाँ आईं, लेकिन वह चलता रहा। जब सूरज डूब गया, वह वहीं रुक गया।

घना जंगल उसके चारों ओर था। जंगल में उसने थोड़ी जगह साफ की और एक झोंपड़ी बना ली।

उसके चारों ओर उसने केला, पपीता, सुपारी, नारियल आदि फलों के पौधे रौंप दिए। इनसे उसे पर्याप्त भोजन मिलने लगा।

इस तरह समय बीतता रहा।

एक दिन मलक्का गाँव के लोगों ने एक पक्षी को चोंच में मछली दबाकर पश्चिम की तरफ उड़ते देखा। उन लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ।

वापसी में वे उसका पीछा करने लगे।

कुछ समय बाद वह पक्षी एक झरने में जा उतरा।

पानी वहाँ चाँदी की तरह चमक रहा था। लोगों ने सोचा कि पक्षी ने यहीं कहीं से मछली पकड़ी होगी | उन्हें उस जगह का नाम नहीं पता था।

लेकिन वे खुश थे कि उन्होंने एक झरने को खोज लिया है। इधर-उधर देखने पर उन्हें वहाँ एक झोंपड़ी दिखाई दी।

उसके चारों ओर 'फलों का बगीचा था। उन्हें आश्चर्य हुआ कि ऐसे घने और सुनसान जंगल में कौन अकेला रहा है ! वे धीरे-धीरे झोंपड़ी तक गए और उसका दरवाजा खटखटाया।

आदमी बाहर आया।

“आप कौन हैं ?” उसने उनसे पूछा।

“हम मलक्का के निवासी हैं।'' वे बोले, '“हम पूरब की ओर उड़ते एक पक्षी का पीछा करते हुए यहाँ पहुँचे हैं। आप कौन हैं और यहाँ अकेले क्‍यों रहते हैं ?

“मैं भी कभी मलक्का में ही रहता था।” उसने उत्तर दिया, “एक दिन मैंने सूरज की तरफ चलना शुरू किया। सूर्यास्त तक मैं यहाँ पहुँचा और तब से यहीं रहने लगा।

यह सुनकर मलक्कावासियों ने अपने गाँव से आए उस पहले आदमी को गले लगाया और पुनः मिलने का वादा करके वापस अपने गाँव को लौट गए।

एक दिन “पहले आदमी ' को पता चला कि घर में नमक का एक कण भी नहीं है। वह नमक की खोज में झोंपड़ी से बाहर निकला। कुछ दूर चलने पर उसने एक अन्य आदमी को देखा।

“नमस्ते भाई, आप कौन हैं और कहाँ से आए हैं ?”' पहले आदमी ने पूछा।

“मैं फोबोई गाँव का रहने वाला हूँ और लम्बे समय से यहाँ रह रहा हूँ।'' वह बोला।

दोनों आदमी गहरे दोस्त बन गए। कुछ समय तक बातें करने के बाद दोबारा मिलने का वादा करके वे अपने-अपने रास्ते पर चले गए।

पहला पुरुष - टोमो

सृष्टि की रचना के दौरान आदिकाल में सबसे पहले यह धरती बनी, फिर पेड़-पौधे और फिर पशु- पक्षी। पुलुगा (ईश्वर) ने उसके बाद एक पुरुष की रचना की। उसे नाम दिया - टोमो। उसका रंग काला था। उसका शरीर मजबूत और ऊँचा था। उसमें मस्तिष्क भी था और स्वाभिमान भी। पुलुगा ने जंगल में ले-जाकर उसे फल वाले तमाम वृक्ष दिखाए और कहा, “ भूख लगने पर तुम जिस फल को चाहो खा सकते हो।

इसके बाद पुलुगा ने टोमों को एक विशेष बाग की ओर संकेत करके बताया, “परन्तु तुम कभी भी उस बाग में मत जाना।

चले भी जाओ तो उस बाग के किसी भी फल को मत खाना। वह तोताथेमी का बाग है।

पुलुगा ने टोमो को चोम और बेल के दो टुकड़ों को परस्पर रगड़कर आग जलाना सिखाया। पुलुगा ने ही टोमो को चाना-बी-भी (सूर्य की माता, अदिति) की स्तुति करना सिखाया। उसने कहा, “जब तक आग चलती रहती है चाना-बी-भी वहाँ उपस्थित रहती है।

परन्तु उसके बुझते ही वह वापस अपने लोक को चली जाती है। इसके बाद पुलुगा ने टोमो को सुअर का मांस पकाना सिखाया। पुलुगा ने अपने दो विश्वसनीय गणों लाची और पुंगा-अउ-भोला--को भी टोमो की मदद के लिए धरती पर रखा।

धरती पर पहली स्त्री के बारे में अण्डमानी लोगों के बीच अनेक लोककथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि धरती पर रहना सिखाने के दौरान पुलुगा ने महसूस किया कि टोमो को एक साथी की भी आवश्यकता है। पुलुगा ने तब चान-आ-ए-लबादी नाम की स्त्री की रचना की।

कुछ का कहना है कि चान-आ-ए-लबादी सागर में तैर रही थी।

टोमो उसकी ओर बुरी तरह आकर्षित हो गया और उसने उससे अपने साथ रहने की प्रार्थना की | वह बिड द्वीप पर आ गई। टोमो के दो पुत्र और दो पुत्रियाँ हुईं। बेटों के नाम बिरदा और बोरोला थे तथा बेटियों के नाम रिओला और रोमिला।

समय बीतता गया। द्वीप पर सुअरों की संख्या इतनी अधिक हो गई कि वे टोमो की पत्नी के लिए परेशानी पैदा करने लगे। वह उनसे इतनी अधिक नाराज हो गई कि उसने सुआ मारकर सुअरों के नाक और कान छेद डाले। कहते हैं कि सूँघने और सुनने की शक्ति सुअरों को तभी से मिली। पुलुगा ने तब धरती पर जंगल उगा दिया और सुअरों से कहा, “जान बचाकर वहाँ भाग जाओ।” और तभी से आदमी के लिए सुअर का शिकार करना बहुत कठिन हो गया। आदमी को देखते ही वे घने जंगल में दौड़ लगा जाते और छिप जाते।

तब पुलुगा ने मनुष्य को तीर, कमान और तुरही बनाना सिखाया।

उसने उसे मछली पकड़ने के लिए डोंगी बनाना भी सिखाया और मछली को पकाना भी।

पुलुगा ने चान-आ-ए-लबादी को भी बाँस, पत्ती और झाड़ियों की लकड़ियों से चटाइयाँ व टोकरियाँ बुनना सिखाया।

पुलुगा ने मनुष्य को सूर्यास्त के बाद काम न करने की आज्ञा दी क्योंकि इससे उसके सहयोगी बुतू को सिरदर्द होता है। उसने मनुष्यों को भाषा सिखाई ताकि वे बोलकर परस्पर अपने उद्गार प्रकट कर सकें।

जैसे-जैसे समय बीता---स्त्री-पुरुष के जोड़े सारी धरती पर फैल गए।

प्रियों का द्वीप : परी टापू

अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ

पोर्टब्लेयर से लगभग 20 मील दूर उत्तर-पूर्व दिशा में हैदलॉक नामक द्वीप है। आज यह एक आकर्षक पर्यटन-स्थल है। पुराने जमाने में इसको “परी टापू' नाम से जाना जाता था।

कहा जाता है कि इस खूबसूरत द्वीप को प्रेम में हताश एक परी द्वारा बनाया और बसाया गया था। लोगों का विश्वास है कि किसी जमाने में यह परियों का द्वीप था। बेहद खूबसूरत परियाँ उस जमाने में निर्भव होकर इस द्वीप पर उछलती-कूदती और नाचती-खेलती थीं।

उन परियों की राजकुमारी एक बेहद सुन्दर, सुशील और दयालु परी थी। परियों के अलावा कभी भी किसी मनुष्य ने उसे नहीं देखा था। वह अपने आपको अधिकतर एक अंधेरे कमरे में बंद रखती थी।

दिनभर में, सूर्योदय से पहले, वह सिर्फ एक बार बाहर निकलती थी। उस समय अपनी सहेली परियों के साथ वह घर के समीप वाले एक तालाब में नहाने के लिए जाती थी। उसके और उसकी सहेलियों के वहाँ पहुँचने पर सारा वातावरण चमक उठता था। वह सूर्योदय से पहले ही स्नान करती और अपनी सहेलियों के साथ वापस लौट आती।

एक बार समुद्र में भयंकर तूफान आया। वह राजकुमारी के नहाने के लिए जाने का समय था। लेकिन तूफान की भयावहता को देखकर उसकी सहेलियों ने उसके साथ जाने से इंकार कर दिया।

चारों ओर अंधकार छाया हुआ था। राजकुमारी राजमहल से निकली और उस अंधकार में अकेली ही तालाब की ओर बढ़ चली। तेज हवाओं को झेलती, धीरे-धीरे उड़ती हुई आखिर वह वहाँ पहुँच ही गई। उसने अपने पंख और कपड़े उतारकर किनारे पर रख दिए। वह रोजाना ही ऐसा करती थी क्योंकि कपड़े या पंख अगर गीले हो जाएँ तो परियाँ उड़ नहीं सकतीं। कपड़े उतारते ही उसके शरीर की आभा से आसपास का वातावरण चमक उठा। उस प्रकाश में उसने देखा कि एक नौजवान तालाब के किनारे लेटा हुआ है। वह डर गई।

लेकिन उसने देखा कि नौजवान बेहोश था।

मैं बिना आवाज किए चुपचाप नहा लूँगी और लौट जाऊँगी उसने सोचा।

“आह...आह!” जैसे ही राजकुमारी ने नहाना शुरू किया उसे सीढ़ियों पर पड़े नौजवान के कराहने का स्वर सुनाई दिया।

उसने तालाब से निकलकर फुर्ती से अपने कपड़ें और पंख पहने। फिर, अपने चुल्लू में पानी भरा और पास जाकर उस नौजवान के चेहरे पर छिड़का।

युवक को होश आ गया और वह उठ खड़ा हुआ। अपने समीप इतनी खूबसूरत युवती को पाकर वह जड़वत्‌ रह गया। उसने स्वण में भी यह नहीं सोचा था कि इस नीरव स्थान में उसे ऐसी अनुपम सुन्दरी के दर्शन होंगे।

परी ने मधुर स्वर में उससे पूछा, “आप कौन हैं ?

“मैं पूरब देश का राजकुमार हूँ।'” युवक ने बताया।

“आप यहाँ किसलिए आए हैं ?'' परी ने पूछा।

“मैं समुद्री-यात्रा के लिए निकला था।'” युवक ने बताया, “मेरा पोत कल रात तूफान में फँस गया और टूट गया। मैं नहीं जानता कि मैं कैसे यहाँ आ गया। आप कौन हैं ?

“मैं ? मैं यहाँ की राजकुमारी हूँ।”' परी ने कहा। उसने महसूस किया कि वह उस सुन्दर राजकुमार के आकर्षण में बँध-सी गई है। उसकी आँखें राजकुमार के प्रति प्रेम से चमक उठीं।

यही हाल उस राजकुमार के हृदय का भी था। दोनों एक-दूसरे के प्रेमजाल में फँस चुके थे। दोनों एक-दूसरे को निहारते काफी समय तक वहाँ बैठे रहे।

सूर्योदय होने को था। परी को एकाएक ध्यान आया कि उसे सूरज निकलने से पहले ही अपने महल में पहुँच जाना है। वह उठ खड़ी हुई। घर जाने के लिए राजकुमार से विदा लेते

समय उस ने उसे एक गुप्त स्थान का पता बताया।

“जब तक तूफान थम नहीं जाता, आप उस स्थान पर जाकर रहें। जब तुम्हें सुबह का तारा आकाश में नजर आए, तुम चुपचाप इस तालाब के किनारे आ जाना। मैं यहीं पर तुमको मिलूँगी। जाते-जाते वह बोली।

उस दिन के बाद राजकुमारी ने नहाने के लिए तालाब पर अकेले जाना शुरू कंर दिया। अपनी सभी सहेलियों से उसने साथ चलने के लिए मना कर दिया। वह अकेली तालाब पर पहुँचती।

जैसे ही सुबह का तारा आकाश में टिमटिमाता, चोरी छिपे राजकुमार भी वहीं आ जाता।। दोनों लम्बे समय तक प्यार-भरी बातें करते और सूर्य की पहली किरण धरती पर पड़ने से पहले ही अपने-अपने स्थान को लौट जाते।

कुछ दिनों बाद राजकुमार को अपने परिवार की याद सताने लगी। बह'उदास रहने लगा। लेकिन .वह परी-राजकुमारी के प्रेमजाल में इतना अधिक फँस चुका था कि उसे छोड़कर कहीं और जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। फिर भी, हिम्मत करके उसने उसे इस बारे में बता ही दिया। लेकिन राजकुमारी भी उसे जाने देना नहीं चाहती थी।

“देखो, तूफान अभी तक पूरी तरह रुका नहीं है; और ऐसे में, कोई भी नाव सागर में टिकी नहीं रह सकती थी। तुम्हारी इच्छा जानकर मेरा मन बुरी तरह व्याकुल हो उठा है।”' परी ने कहा।

राजकुमार ने परी को सांत्वना दी और जाने देने के लिए पुनः प्रार्थना की। लेकिन बेकार। परी नहीं मानी। परेशान राजकुमार घुटनों के बल उसके सामने बैठ गया और भिक्षा माँगने के अंदाज में बोला, “अगर कुछ दिनों के लिए तुम अपने पंख मुझे दे दो तो मैं उड़कर अपने माता-पिता के पास जा सकता हूँ। मैं उन्हें तुम्हारे बारे में बताना चाहता हूँ। तुम्हारे साथ अपने विवाह की अनुमति पाते ही मैं यहाँ लौट आऊँगा और तुमसे विवाह कर लूँगा। उसके बाद हम अपने देश को लौट जाएँगे।

“सो तो ठीक है। लेकिन इतना लम्बा समुद्र इन छोटे-छोटे पंखों से उड़कर तुम कैसे पार करोगे?” राजकुमारी आशंकित-स्वर में बोली, “रास्ते में बारिश आ गई और पंख गीले हो गए तो ?

“कुछ नहीं होगा...कुछ नहीं होगा।”' राजकुमार उद्दिग्न-स्वर में बोला, “तुम्हें अपने प्यार पर भरोसा है न!

न चाहते हुए भी परी-राजकुमारी को उसकी बातों को मानना पड़ गया।

अगले दिन, जैसे ही आकाश में सुबह का तारा चमका, राजकुमार तालाब पर जा पहुँचा। परी को उसके जाने का दुःख था। परन्तु उससे भी अधिक चिन्ता उसे अपने पंखों की थी। वह जानती थी कि अगर पंख नहीं रहे तो सारी परियाँ उसे राजकुमारी मानने से इंकार कर देंगी। अगर पंख नहीं रहे तो सूर्य की पहली किरण पड़ते ही उसके शरीर की कान्ति भी नष्ट होनी शुरू हो जाएगी तथा ठीक सातवें दिन उसका शरीर अदृश्य हो जाएगा फिर कोई भी

देंगी। अगर पंख नहीं रहे तो सूर्य की पहली किरण पड़ते ही उसके शरीर की कान्ति भी नष्ट होनी शुरू हो जाएगी तथा ठीक सातवें दिन उसका शरीर अदृश्य हो जाएगा फिर कोई भी उसे देख नहीं पाएगा और न वह ही किसी से कुछ कह पाएगी।

लेकिन उसे अपने प्यार पर पूरा भरोसा था। अत: उसने अपने पंख उतारकर राजकुमार को दे दिए।

पंख लगाकर राजकुमार वहाँ से दूर उड़ गया और फिर कभी भी वापस नहीं आया।

हैवलॉक द्वीप में, परी-राजकुमारी और उस राजकुमार के मिलने का स्थान वह तालाब

आज भी देखा जा सकता है। ऐसा लगता है जैसे अभी-अभी कोई वहाँ से नहाकर गया है।

समुद्र के किनारे पर आसपास की शेष सभी चट्टानों से भिन्न एकदम साफ और चिंकनी एक चट्टान है। लोगों का विश्वास है कि प्रेम में धोखा खाकर अदृश्य हुई वह परी-राजकुमारी आज भी उस चट्टान पर बैठी अपने प्रेमी के इंतजार में अंतहीन समुद्र को ताक रही है। कोई भी उसे देख या छू नहीं सकता। वह सब-कुछ देख तो सकती है परन्तु किसी के भी कानों तक आवाज नहीं पहुँचा सकती और न ही किसी को छू सकती है। उसका शरीर हवा जैसा अदृश्य है जिसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है। वह किसी का अहित नहीं करती।

राजकुमार ने-उसे धोखा दिया अथवा रास्ते में ही पंख गीले हो जाने के कारण वह उड़ नहीं सका और समुद्र में डूबकर मर गया कोई नहीं जानंता।

नारियल का जन्म

पुराने समय में कार-निकोबार के एल्कामेरो में दो मित्र रहते थे। एक का नाम असोंगी और दूसरे का एनालो था। दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे। वे साथ-साथ काम करते, जो कुछ वे कमाते उससे साथ-साथ खाते और दुःख-सुख में साथ रहते। दोनों पूरे दिन काम में लगे रहते थे। कार-निकोबार में एक बार सूखा पड़ा।

हालांकि निकोबार चारों ओर समुद्र से घिरा था लेकिन पूरे साल पानी की एक बूँद भी नहीं बरसी थी। सारे कुएँ सूख गए थे। मनुष्य, जानवर, पक्षी बिना पानी के मर रहे थे।

असोंगी एक अच्छा जादूगर था। उसके गाँव वाले ही नहीं दूर-दूर से दूसरे लोग भी उसका जादू देखने को आते थे।

एक दिन दोनों दोस्त घास काटने को गए। असोंगी को अपनी छुरी तेज करनी थी, लेकिन आसपास कहीं पानी नजर नहीं आ रहा था। ऐसे में असोंगी जंगल में घुस गया और जादू के बल पर जमीन से पानी निकाल लिया।

उसे लेकर वह अपने मित्र एनालो के पास आया। एनालो को बड़ा आश्चर्य हुआ।

“यह पानी तुम कहाँ से ले आए?”' उसने असोंगी से पूछा।

“जंगल के भीतर से।'” असोंगी ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।

“देखो, मैं तुम्हारा सबसे गहरा दोस्त हूँ।'” एनालो लालचपूर्वक बोला, “मुझे भी यह जादू सिखाओ न! “'एनालो, मेरे दोस्त, मुझे तुम्हारी दोस्ती पर कोई शक नहीं।”' असोंगी ने सपाट आवाज में बोलना शुरू किया, “लेकिन, मेरे गुरुजी का कहना था कि हर विद्या हर आदमी को नहीं सिखाई जा सकती।

इसलिए रात में वह सिर एनालो से बहुत-सी बातें किया करता था।

इससे डरकर एनालो गाँव छोड़कर भाग गया। वह दूसरे गाँव में जा पहुँचा। वहाँ उसने शादी की और आराम से रहने लगा। कुछ समय बाद उसके घर एक पुत्री का जन्म हुआ। वह एक खूबसूरत लड़की थी। सभी उसे प्यार करते थे।

एक बार अचानक लड़की बीमार पड़ गई। एनालो ने उसका बहुत इलाज कराया लेकिन किसी भी दवा से उसे आराम नहीं हुआ।

दुःखी और थका-हारा एनालो एक रात जल्दी सो गया। गहरी नींद में उसने एक स्वप्न॑ देखा। सपने में उसके दोस्त असोंगी के कटे हुए सिर ने उससे यह कहा :

“इस सिर को जमीन में दबा दो। उससे एक पेड़ उगेगा। जब उस पर फल आ जाएँ तब उस फल को तोड़ना। उस फल को काटने पर उसके भीतर पानी निकलेगा। वह पानी अपनी बेटी की पिलाओ।

वह ठीक हो जाएगी। एनालो की नींद टूट गई। वह मुँह-अँधेरे ही उठ बैठा और दौड़ता हुआ अपने पुराने गाँव में पहुँचा। घर में खम्भे पर लटके असोंगी के सिर को उसने उसके बताए अनुसार जमीन में दबा दिया।

कुछ समय बाद उस सिर से एक पेड़ पैदा हुआ। उस पर फल लगे। एनालो ने फलों को बीच से काटा और पानी निकालकर बेटी को पिलाया। कुछ ही दिनों में लड़की बिल्कुल चंगी हो गई।

एनालो उसे स्वस्थ देखकर बहुत खुश हुआ। उसे दुःख हुआ कि उसने असोंगी जैसे भला चाहने वाले मित्र के साथ घात किया।

निकोबार के लोग आज भी नारियल को असोंगी के सिर से पैदा हुआ फल मानते हैं।

बौनों छा देश

हजारों साल पहले मलक्का के लोग घूमते-घामते एक ऐसी जगह जा पहुँचे जहाँ एक गुफा-सी थी। उसमें इतना अंधेरा था कि वे चाहकर भी उसके भीतर जाने का साहस न कर सके।

तब उन्होंने नारियल की कुछ सूखी पत्तियों को इकट्ठा करके उन्हें जलाया। उस प्रकाश में वे उसके भीतर गए। अन्दर उन्हें एक संकरा रास्ता दिखाई पड़ा। उस रास्ते को पार करके वे एक शानदार जगह पर जा पहुँचे।

वास्तव में यह पाताल में बौनों का शहर था। उन्होंने वहाँ ढेर सारी हरी घास और अंडों का अम्बार देखा। ये अंडे बौने चोरों ने पक्षियों के घोंसलों से चुराए थे।

मलक्कावासियों ने उन अंडों को वहाँ से चुराया और अपने घर ले आए। इसके बाद वे जब भी मौका पाते, उस पाताल-गुफा में घुस जाते, अंडों को चुराते और मलक्का लौट आते।

लेकिन एक दिन अंडे चुराते हुए उन्हें बौनों ने पकड़ा लिया। तुम लोग कौन हो ? और हमारे अंडे क्यों चुरा रहे हो ? बौनों ने पूछा।

“हम पृथ्वीवासी है। लेकिन आप कौन हैं ? आपके पूर्वज कौन थे?” मलक्का वालों ने पूछा।

हम भी अपने पूर्वजों के वंशज हैं। लेकिन आप आगे से हमारे अंडे नहीं चुरा सकते।”' बौनों ने कहा।

“इसके लिए तुम लोगों को हमारे साथ नृत्य करना होगा।”' मलक्कावासी बोले, , “अगर हम जीते तो अंडे ले जाएँगे और अगर आप जीते तो हम आगे कभी यहाँ नहीं आएँगे।

बौने सहमत हो गए। नृत्य-प्रतियोगिता शुरू हो गई। दोनों जाति के लोग कई दिनों तक लगातार नाचते रहे। अंत में, मलक्का वाले हार गए। अतः वे अपने गाँव को लौट आए।

बौनों ने तब गुफा के आगे सुपारी का एक पेड़ उगा दिया और उसका मुँह पत्थरों से बंद कर दिया। तब से मलक्का के लोग पाताल में उतरने का रास्ता भूल गए और कभी वहाँ नहीं जा पाए।

द ग्रेट फेस्टीवल

बहुत समय पहले की बात है। उन दिनों समूचे निकोबार द्वीप समूह का मालिक तोकिलाया हुआ करता था।

वह इतना शक्तिशाली था कि पूरे द्वीप समूह में एक पत्ता भी उसके आदेश के बिना नहीं हिल सकता था।

एक बार उसके मन में विश्व-भ्रमण की इच्छा जागी। उसने गाँवों के मुखियाओं और बुजुर्गों के सामने अपनी यह इच्छा रखी। हर एक ने उसकी इच्छा का स्वागत किया और उसके जाने की तैयारियाँ शुरू हो गईं। रास्ते के लिए हर आदमी ने उसे अलग तरह का उपहार दिया।

तोकिलाया ने यात्रा शुरू की। वर्षों बीत गए लेकिन द्वीपों का मालिक तोकिलाया वापस नहीं लौटा। गाँव वालों की बेचैनी बढ़ गई। उन्होंने मान लिया कि तोकिलाया मर चुका है और अब कभी भी वापस नहीं लौटेगा। छ: महीने तक उन्होंने उपवास रखा।

उसके बाद रिवाज्ञ के अनुसार उन्होंने नए कपड़े पहने और मातम मनाने लगे। उन्होंने खूब खाया-पीया और नाचना-गाना किया। अन्त में, उन्होंने नारियल का एक पौधा सागर के किनारे लगाया और शपथ ली कि मालिक के आने से पहले वे फल नहीं खाएँगे।

आखिर एक दिन, मालिक लौट आया। शुरू-शुरू में तो किसी को इस पर विश्वास ही नहीं हुआ। लेकिन बाद में उनको विश्वास हो गया कि वह उनका खोया हुआ मालिक तोकिलाया ही था। वे घंटों आपस में बातें करते रहे और बीते दिनों की कहानियाँ सुनते- सुनाते रहे।

सागर-किनारे लगाए गए पेड़ के नारियल खाकर लोगों ने अपनी शपथ को पूरा किया और एक बड़ा जश्न मनाया।

आज भी उस जश्न को “द ग्रेट फेस्टीवल' के रूप में हर साल मनाया जाता है।

निकोबारी जाति का जन्म

'निकोबारी जनजाति का जन्म कैसे हुआ ? इस बारे में तरह-तरह की कहानियाँ प्रचलित हैं। हर कहानी एक-दूसरे से भिन्न है। प्रमुख रूप से प्रचलित चार कहानियाँ यहाँ प्रस्तुत हैं-

॥ पहली कहानी ॥

कई सौ साल पहले निकोबार द्वीप घने जंगलों से घिरा था।

इसके चारों ओर आज की ही तरह गहरा नीला समुद्र दूर-दूर तक फैला था।

द्वीप पर कहीं भी आदमी का कोई नामोनिशान नहीं था।

हर जगह सन्नाटा था। निकोबार ट्वीपसमूह में चावरा नामक एक द्वीप था। निकोबारी जनजाति के लोगों का विश्वास है कि उनके पूर्वज इस चावरा द्वीप से ही यहाँ आए थे।

उनका मानना है कि किसी समय में, बहुत वर्ष पहले, पूरब दिशा से सात आदमी अपनी सात पत्नियों के साथ चावरा में आए। वे सात लोग कौन थे और पूरब दिशा के किस देश से आए थे ? कोई नहीं जानता। वे सात पुरुष अपनी पत्लियों के साथ चावरा में रहने लगे।

कुछ समय बाद, उन लोगों ने तय किया कि उन्हें आसपास के द्वीपों की ओर बढ़ना चाहिए। यह निश्चय करके उनमें से छः जोड़े छ: अलग-अलग द्वीपों पर चले गए और वहीं बस गए। एक जोड़ा चावरा में ही रह गया। आने वाले समय में उनके बेटे, पोते, पड़पोते हुए। उनके इन वंशजों ने स्वयं को निकाबारी कहना शुरू किया।

वे लोग किसी भी द्वीप में क्यों न फैल गए हों, अपने मूल द्वीप चावरा के प्रति उनका प्यार सदा बना रहा, जहाँ से वे चले थे। जब भी उन्हें कोई मौका मिलता, वे अपनी डोंगी सागर में डालते और बना रहा, जहाँ से वे चले थे।

जब भी उन्हें कोई मौका मिलता, वे अपनी डोंगी सागर में डालते और चावरा की ओर चल देते।

इन यात्राओं के दौरान बहुत से मौके ऐसे भी आए जब वे रास्ता भटक गए और चावरा की बजाय मलाया, सिंगापुर या रंगून पहुँच गए।

कभी-कभी यह भी हुआ कि भटककर वे जापान की ओर चले गए। कितने ही लोगों की डोंगियाँ समुद्री तूफान और झंझावात के कारण उलट गईं, और वे मर गए।

परन्तु, इन सारी कठिनाइयों के बावजूद भी चावरा द्वीप से उनके लगाव और प्यार में कोई कमी नहीं आई। वे अब भी चावरा को ही अपना मूल द्वीप मानते हैं।

॥ दूसरी कहानी॥

निकोबार द्वीप में एक बार भारी वर्षा हुई। इतनी भारी कि पूरा द्वीप पानी में डूब गया। हर जगह पानी ही पानी नजर आता था, और कुछ नहीं। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, स्त्री-पुरुष-बच्चा, सिवा एक आदमी के कहीं कुछ नहीं बचा।

उस आदमी के अलावा पीपल का एक पेड़ भी बचा जो गहरे पानी के ऊपर अपनी चोटी हिला रहा था। उस पीपल की उस सबसे ऊँची शाखा पर बैठकर उस आदमी ने किसी तरह अपने प्राण बचाए थे।

कितने ही दिन और कितनी ही रातें गुजर गईं। वह धेर्यपूर्वक वहीं बैठा रहा। फिर, एक दिन बाढ़ का पानी धीरे-धीरे उतरना शुरू हुआ।

जब नीचे जमीन नजर आने लगी तो आदमी उस पीपल के पेड़ से उतरकर नीचे आया। ऊँचे पेड़ों को छोड़कर बाकी सब कुछ नष्ट हो चुका था। आदमी नाम की कोई चीज धरती के उस हिस्से पर नहीं बची थी। पशु और पक्षी सब जहाँ-तहाँ मरे पड़े थे। आदमी भोजन की तलाश में यहाँ-वहाँ भटकता रहा।

एकाएक उसे किसी के जोर-जोर से पुकारने की आवाज सुनाई दी। ऐसे समय में, जबकि उसके सिवा एक भी मनुष्य जीवित न बचा हो, मानव-स्वर ने उसे अचरज में डाल दिया। उसने तेजी से साथ आवाज की दिशा में बढ़ना शुरू किया। उसने देखा कि दूर एक घनी झाड़ी में, एक औरत उलझी पड़ी है और पीड़ा से कराह रही है।

आदमी ने वहाँ पहुँचकर उसे झाड़ी से निकाला और दोनों साथ-साथ रहने लगे।

निकोबारी आदिवासी मानते हैं कि वे स्त्री-पुरुष के उसी जोड़े की सन्तान हैं।

॥ तीसरी कहानी॥

पुराने समय में निकाबार द्वीप पूरी तरह घने जंगल से घिरा था।

आदमी नाम की कोई चीज वहाँ नहीं थी।

कहा जाता है कि पूरब दिशा के किसी देश की एक राजकुमारी अपने एक दास से प्यार करती थी। उस दास से राजकुमारी को गर्भ ठहर गया।

यह खबर जब राजा के कानों में पड़ी तो वह विचलित हो उठा।

उसके क्रोध का ठिकाना न रहा। उसने उस दास को मृत्युदंड सुनाकर मर॒वा दिया। गर्भवती होने के कारण राजकुमारी को उसने मृत्युदंड तो नहीं दिया परन्तु एक बड़े बक्से में उसे जीवित बन्द करके समुद्र में फिकवा दिया। वह बक्सा कई माह तक समुद्र की लहरों के थपेड़े खा- खाकर पानी में भटकता रहा।

सौभाग्य से एक सुबह, अध्दमृत हो चुकी राजकुमारी वाला वह बड़ा बक्सा एक द्वीप के किनारे पर आ टिका। यह कोई और नहीं, कार-निकोबार द्वीप था। निश्चित समय पर राजकुमारी ने एक बेटे को जन्म दिया। बड़ा होकर वह एक सुन्दर और ताकतवर नौजवान बना। आज की निकोबारी जनजाति उस नौजवान की ही संतति है।

॥ चौथी कहानी॥

पुराने समय में पानी का एक जहाज निकोबार द्वीप के पास से होकर गुजर रहा था।

अचानक बड़ा भयानक समुद्री तूफान उठ आया। तूफानी लहरों ने उस जलयान को हल्के पत्ते की तरह किनारे की एक चट्टान पर दे मारा।

जलयान चकनाचूर हो गया और डूब गया। उसमें सवार स्त्री-पुरुष पानी में इधर-उधर बिखर गए।

उनमें से कुछ तैरकर और कुछ लहरों द्वारा फेंक दिए जाने के कारण किनारे पर आ लगे। द्वीप से बाहर जाने का कोई साधन उन बचे हुए लोगों के पास नहीं बचा था।

उन्होंने अपने आप को भाग्य के हवाले कर दिया और पूरी तरह वहीं पर निवास करने लगे।

कहा जाता है कि वर्तमान निकोबारी आदिम जनजाति के पूर्वज यही लोग थे।

तोइया-बोग-लांको

अंडमान व निकोबार द्वीप समूह की आदिम जनजातियों में से एक ' ओंगी' है। नीग्रो-मूल के होने के कारण वे गहरे-काले रंग के होते हैं। उनका कद छोटा होता है। आँखें लाली लिए हुए तथा बाल घुंघराले होते हैं।

प्रारम्भ में, ये आदिवासी चिड़िया टापू के पास कालापहाड़ पर रहते थे। बाद में, कुछ दूसरी जनजातियों ने उन्हें कालापहाड़ से दूर खदेड़ दिया। आज ओंगियों को भी नहीं पता कि उन्हें वहाँ से खदेड़ भगाने वाले लोग कौन थे। उनका विश्वास है कि किसी दैवी-शक्ति ने उन्हें कालापहाड छोड़कर भाग जाने को विवश किया होगा।

महीनों तक जंगलों, पहाड़ों से गुजरते और समुद्र-यात्रा करते वे लोग 'टाम्बेग्वे' नामक स्थान पर पहुँचे। लेकिन वह जगह उन्हें पसन्द नहीं आई। इसलिए वे आगे सुदूर दक्षिण कीं ओर “टोको-बुली' नामक स्थान की ओर बढ़ गए जिसे आज “डुगोंग क्रीक ' के नाम से जाना जाता है। उन्होंने टोको-बुली को अपना स्थाई निवास बनाया। वहाँ उन्होंने अपनी झोंपड़ियाँ बनाईं और वहीं बस गए।

उन्होंने जंगली सुअरों और जंगली मुर्गियों का शिकार किया। समुद्री मछलियों और केकड़ों को पकड़ा। जंगल से शहद इकट्टा किया। इस तरह उन्होंने अपने भोजन की व्यवस्था कर ली।

एक बार उनके मन में अपने प्राचीन निवास-स्थान कालापहाड़ को देखने की इच्छा जागी। उन्होंने कुछ बड़े पेड़ों को काटा और उनसे नावें बनाना शुरू कर दिया। इस काम में उन्हें वर्षों लग गए। अंततः कुछ मर्द, औरतें और बच्चे हर्ष व उल्लास के साथ नावों में बैठे और कालापहाड़ की ओर चल पड़े।

विश्वास था कि इस भयंकर दुर्घटना के पीछे 'तोमेल' की दुष्ट आत्मा का हाथ था। वह उन्हें नष्ट कर देना चाहती थी। ओंगी 'तोमेल' के श्राप और क्रोध से बहुत डरते थे।

ऐसे में सभी ओंगियों ने तोइया-बोग-लांको की पूजा की। उसे वे महान दैवी-शक्ति का स्वामी मानते थे। तब कहीं जाकर तूफान थमा। समुद्र शांत हो गया। ओंगियों को विश्वास हो गया कि देवता उन पर प्रसन्न है।

उनका विश्वास है कि महाशक्ति का स्वामी ऊपर आसमान में कहीं रहता है। उसंकी कृपा से ही उन्हें भोजन और पानी मिलता है। उसी की कृपा से वे भले-चंगे रह पाते हैं। इसलिए मुसीबत के समय में वे महाशक्ति के स्थामी तोइया-बोग-लांको की पूजा करते हैं।

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