गौतम बुद्ध का जन्म लुंबिनी में 563 ईसा पूर्व इक्ष्वाकु वंशीय क्षत्रिय शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में हुआ था। उनकी माँ का नाम महामाया था जो कोलीय वंश से थीं, जिनका इनके जन्म के सात दिन बाद निधन हुआ, उनका पालन महारानी की छोटी सगी बहन महाप्रजापती गौतमी ने किया। 29 वर्ष की आयुु में सिद्धार्थ विवाहोपरांत एक मात्र प्रथम नवजात शिशु राहुल और धर्मपत्नी यशोधरा को त्यागकर संसार को जरा, मरण, दुखों से मुक्ति दिलाने के मार्ग एवं सत्य दिव्य ज्ञान की खोज में रात्रि में राजपाठ का मोह त्यागकर वन की ओर चले गए। वर्षों की कठोर साधना के पश्चात बोध गया (बिहार) में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ गौतम से भगवान बुद्ध बन गए।

आज की इस पोस्ट में हमने गौतम बुद्ध की कुछ प्रचिलित कहानियाँ शेयर की है। इन कहानियों से आपको बहुत कुछ सिखने को मिलेगा। उम्मीद है कि आपको यह कहानियाँ पसंद आएगी।

Gautam Buddha Stories in Hindi

Gautam Buddha Stories in Hindi List

अमृत की खेती

दान की महिमा

शान्त मन

बुद्ध और भिखारी

रेत का घर

तीन गांठें

बुद्ध और अनुयायी

डाकू अंगुलिमाल और महात्मा बुद्ध

अपने दुःखों का कारण आप ही है

इस दुनिया में कोई गरीब नहीं

क्रोध एक दुश्मन

मारने वाले से बचाने वाला बड़ाई

गौतम बुद्ध और अंगुलिमाल की कहानी

महात्मा बुद्ध की सीख

आप क्या लेना पसंद करेंगे ? उदासी या मुस्कान

सबकुछ स्वीकार करना जरुरी नहीं

जीवन में सब्र का महत्व

अहंकार का उपहार

महत्वपूर्ण दान

बुद्ध और चक्षुपाल

परिश्रम और धैर्य

बुद्ध की सीख

मारने वाले से बचाने वाले का अधिक अधिकार

अछूत व्यक्ति

ऐसा सभी के साथ होता है

अमृत की खेती

एक बार भगवान बुद्ध भिक्षा के लिए एक किसान के यहां पहुंचे। तथागत को भिक्षा के लिए आया देखकर किसान उपेक्षा से बोला, श्रमण मैं हल जोतता हूं और तब खाता हूं। तुम्हें भी हल जोतना और बीज बोना चाहिए और तब खाना खाना चाहिए।

बुद्ध ने कहा- महाराज! मैं भी खेती ही करता हूं...।

इस पर किसान को जिज्ञासा हुई और वह बोला- मैं न तो तुम्हारे पास हल देखता हूं ना बैल और ना ही खेती का स्थल। तब आप कैसे कहते हैं कि आप भी खेती ही करते हो। आप कृपया अपनी खेती के संबंध में समझाइएं।

बुद्ध ने कहा- महाराज! मेरे पास श्रद्धा का बीज, तपस्या रूपी वर्षा और प्रजा रूपी जोत और हल है... पापभीरूता का दंड है, विचार रूपी रस्सी है, स्मृति और जागरूकता रूपी हल की फाल और पेनी है।

मैं वचन और कर्म में संयत रहता हूं। मैं अपनी इस खेती को बेकार घास से मुक्त रखता हूं और आनंद की फसल काट लेने तक प्रयत्नशील रहने वाला हूं। अप्रमाद मेरा बैल हे जो बाधाएं देखकर भी पीछे मुंह नहीं मोडता है। वह मुझे सीधा शांति धाम तक ले जाता है। इस प्रकार मैं अमृत की खेती करता हूं।

दान की महिमा

भगवान बुद्ध का जब पाटलिपुत्र में शुभागमन हुआ, तो हर व्यक्ति अपनी-अपनी सांपत्तिक स्थिति के अनुसार उन्हें उपहार देने की योजना बनाने लगा।

राजा बिंबिसार ने भी कीमती हीरे, मोती और रत्न उन्हें पेश किए। बुद्धदेव ने सबको एक हाथ से सहर्ष स्वीकार किया। इसके बाद मंत्रियों, सेठों, साहूकारों ने अपने-अपने उपहार उन्हें अर्पित किए और बुद्धदेव ने उन सबको एक हाथ से स्वीकार कर लिया।

इतने में एक बुढ़िया लाठी टेकते वहां आई। बुद्धदेव को प्रणाम कर वह बोली, ' भगवन्‌, जिस समय आपके आने का समाचार मुझे मिला, उस समय मैं यह अनार खा रही थी। मेरे पास कोई दूसरी चीज न होने के कारण मैं इस अधखाए फल को ही ले आई हूं। यदि आप मेरी इस तुच्छ भेंट स्वीकार करें, तो मैं अहोभाग्य समझूंगी।' भगवान बुद्ध ने दोनों हाथ सामने कर वह फल ग्रहण किया।

राजा बिंबिसार ने जब यह देखा तो उन्होंने बुद्धदेव से कहा, 'भगवन्‌, क्षमा करें! एक प्रश्न पूछना चाहता हूं। हम सबने आपको कीमती और बड़े-बड़े उपहार दिए जिन्हें आपने एक हाथ से ग्रहण किया लेकिन इस बुढ़िया द्वारा दिए गए छोटे एवं जूठे फल को आपने दोनों हाथों से ग्रहण किया, ऐसा क्यों?'

यह सुन बुद्धदेव मुस्कराए और बोले, 'राजन्‌! आप सबने अवश्य बहुमूल्य उपहार दिए हैं किंतु यह सब आपकी संपत्ति का दसवां हिस्सा भी नहीं है। आपने यह दान दीनों और गरीबों की भलाई के लिए नहीं किया है इसलिए आपका यह दान 'सात्विक दान' की श्रेणी में नहीं आ सकता। इसके विपरीत इस बुढ़िया ने अपने मुंह का कौर ही मुझे दे डाला है। भले ही यह बुढ़िया निर्धन है लेकिन इसे संपत्ति की कोई लालसा नहीं है। यही कारण है कि इसका दान मैंने खुले हृदय से, दोनों हाथों से स्वीकार किया है।'

शान्त मन

एक समय की बात है गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक सफर पर थे। सफर में चलते-चलते बुद्ध को प्यास लगी तो उन्होंने अपने एक शिष्य से कहा कि जाओ जाकर मेरे लिए पीने का पानी लेकर आओ।

अब ऐसे में उस शिष्य ने आसपास देखा तो कहीं कोई पानी का स्रोत नहीं मिला। लेकिन उसने और कोशिश की तो रास्ते में उसे एक पानी का स्त्रोत मिला।

वहां उसने देखा कि कुछ लोग उस पानी के स्त्रोत में कपड़े धो रहे हैं और तभी वहाँ से एक बैलगाड़ी उस पानी के स्त्रोत के ऊपर से गुजर गया। ऐसे में वहां का पूरा पानी गंदा हो गया और उसमें मिट्टी भर गया। फिर उसने सोचा कि इस गंदे पानी को, मिट्टी से भरे हुए पानी को मैं बुद्ध के लिए कैसे लेकर जा सकता हूं?

तो वह खाली हाथ ही वापस चला गया और गौतम बुद्ध से जाकर यह बात बताई। बुद्ध ने कहा कि ठीक है हम सब यहां इस बड़े से पेड़ की छाया में बैठकर आराम करते हैं।

कुछ समय बीता फिर गौतम बुद्ध ने उसी शिष्य को फिर से पानी लाने को कहा। अब वह शिष्य वापस से उसी पानी के स्रोत के पास गया। वहां जाकर उसने देखा कि वह पानी बिलकुल साफ था और पीने योग्य था। अब वह शिष्य बुद्ध के लिए वह पानी लेकर गया और उसने वह पानी गौतम बुद्ध को पिलाया।

बुद्ध ने सब को यह बात बताई कि जिस तरह से पानी में कीचड़ मिट्टी फैल गई थी। लेकिन उसे थोड़ी समय तक छोड़ देने तक उसका सारा मिट्टी नीचे बैठ गया और वह पानी वापस से साफ हो गया। उसी तरह से हमारा मस्तिष्क भी है। जब हमारा मस्तिष्क अशांत हो तब उसे वक्त देकर उसे शांत करो। हमारा मस्तिष्क भी थोड़े समय के बाद शांत जरूर होगा। अशांत मस्तिष्क से कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए। बस हमें करना यह है कि हमें अपने मस्तिष्क को थोड़ी देर तक शांत रखना है जिससे कि हम अच्छे फैसले ले सकते हैं। बच्चों की कहानियाँ ।

शिक्षा - अशांत मस्तिष्क से लिए हुए फैसले हमेशा गलत होते हैं। हमें हमेशा शांत मस्तिष्क के साथ ही कोई निर्णय लेना चाहिए जिससे कि गलतियां होने की गुंजाइश कम हो जाती है।

बुद्ध और भिखारी

एक बार एक भिखारी अपने जीवन से परेशान हो चुका था क्योंकि उसे अपने जीवन को चलाने के लिए भीख मांगना पड़ता था। उसे हर एक चीज के लिए भीख मांगना पड़ता था। इसी बात को लेकर वह दुखी रहता और दिन भर यही सोचता कि उसकी जीवन में बदलाव कैसे आएगा? यह सोचकर वह निराश हो जाता।

वह हर दिन देखता की बहुत सारे लोग निराश होकर, आंखों में आंसू लिए लोग और विभिन्न चिंताओं से परेशान लोग गौतम बुद्ध की तरफ जाते और वापस लौटते समय वे लोग बहुत ही खुश होते थे। वह भिखारी यह नहीं समझ पा रहा था कि गौतम बुद्ध उनके साथ ऐसा क्या करते थे कि वे बेहद खुश हो जाते थे? वापस लौटते हुए लोगों के हाथों में ना तो ढेर सारे पैसे होते थे ना ही सोने चांदी तो फिर ऐसा क्या होता था कि लोग बुद्ध के पास से लौटते वक्त इतना खुश होते थे? यह सब सोचकर वह भिखारी भी निर्णय लिया कि वह भी महात्मा बुद्ध के पास जाएगा और देखेगा कि ऐसा वहां क्या हो रहा है की दुखी लोग उनके पास जाकर खुश हो जाते हैं।

वह बुद्ध से मिलने के लिए उनके पास चल पड़ा। जहां बुद्ध मौजूद थे वहां बहुत लंबी कतार लगी हुई थी तो वह भिखारी भी कतार में लग गया। कतार में लगकर वह अपनी बारी का इंतजार करने लगा। देखते ही देखते उसकी बारी आई और उसने बुद्ध से कहा, “बुद्ध मैं बहुत ही गरीब हूं। मेरे पास कुछ भी नहीं है। मुझे अपना जीवन चलाने के लिए भी दूसरों से भीख मांगनी पड़ती है। अब आप ही बताइए कि मैं अपने जीवन को कैसे बेहतर कर सकूं?”

यह सब सुनकर बुद्ध ने कहा, “तुम गरीब नहीं हो। तुम्हें ऐसा लगता है क्योंकि आज तक कभी तुमने किसी के लिए कुछ भी नहीं किया। ना ही तुमने कभी किसी को दान दिया। ना ही तुमने दूसरों के लिए कुछ किया।”

यह सब सुनकर भिखारी के मन में एक आशंका जाग उठी। अपनी आशंका को दूर करने के लिए भिखारी ने पूछा, “मैं तो एक भिखारी हूं। मैं लोगों को दान कैसे दे सकता हूं और कैसे लोगों की सहायता कर सकता हूं? मुझे तो खुद अपना जीवन चलाने के लिए दूसरों से मांगना पड़ता है।”

यह सब सुनने के बाद गौतम बुध थोड़ी देर चुप रहे और फिर उसे बोले, “तुम्हारे पास हाथ है जिससे तुम लोगों की सेवा में लगा सकते हो और दूसरों का भला कर सकते हो। इसके अलावा तुम्हारे पास मुह है जिससे तुम लोगों से अच्छी-अच्छी बातें कर सकते हो और दूसरों का हौसला बढ़ा सकते हो। यह सब करके भी तुम दूसरों की सहायता कर सकते हो। जरूरी नहीं कि दान सिर्फ पैसों से किया जाए। हम चाहे तो हम शिक्षा का भी दान कर सकते है। चाहे तो अन्न का भी दान कर सकते हैं। ऊपर वाले ने अगर किसी को पूर्णतःअच्छा शरीर दिया है तो वह गरीब नहीं है। वह बस दिमाग से गरीब है। उसे इस विचार से हटकर दूसरों की सेवा में लगाना चाहिए।”

बुद्ध की यह सब बातें सुन लेने के बाद वह भिखारी बहुत ही ज्यादा खुश हो गया और उसका मन अब संतुष्ट था।

शिक्षा - हम सब इस बात की चिंता में समय बर्बाद करते हैं कि हम गरीब हैं लेकिन यह सत्य नहीं है। सत्य तो यह है कि जब तक हमारा शरीर पूरी तरह से बेहतर है तो हम उसका उपयोग करके आगे बढ़ सकते हैं और खुद के जीवन को बेहतर बना सकते हैं। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ अपने गरीबी पर ध्यान दें और उसे बदलने की कोशिश ना करें तो वह मूर्ख है।

इसके अलावा हमें इस कहानी से यह भी सीख मिलती है कि दान सिर्फ धन का ही नहीं शिक्षा, भोजन, अच्छे विचार, आदि का भी किया जाना जरूरी है। अगर आपके पास धन नहीं है तो आप शिक्षा का दान कर सकते हैं या फिर आप दूसरों के लिए अच्छे विचारों का भी दान कर सकते हैं। इससे समाज बेहतर होता है।

रेत का घर

एक गाँव में नदी के किनारे कुछ बच्चे खेलते हुए रेत के घर बना रहे। थे।किसी का पैर किसी के घर को लग जाता और वो बिखर जाता इस बात पर झगड़ा हो जाता। थोड़ी बहुत बचकानी उम्र वाली मारपीट भी हो जाती। फिर वह बदले की भावना से सामने वाले के घर के ऊपर बैठ जाता और उसे मिटा देता और फिर से अपना घर बनाने में तल्लीन हो जाया करता। यही बच्चो का काम था।

‘महात्मा बुध चुपचाप एक और खड़े ये सारा तमाशा अपने शिष्यों के साथ देख रहे थे। बच्चे अपने आप में ही मशगूल थे तो किसी ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया। इतने में एक स्त्री आकर बच्चो को कहती है। साँझ हो गयी है तुम सब की माएं तुम्हारा रास्ता देख रही है। बच्चो ने चौंकते हुए देखा दिन बीत गया है साँझ हो गयी है और अँधेरा होने को इसके बाद वो अपने ही बनाये घरों पर उछले कूदे सब मटियामेट कर दिया और किसी ने नहीं देखा कौन किसका घर तोड़ रहा है।

सब बच्चे भागते हुए अपने घरों की और चल दिए। महात्मा बुद्ध ने अपने शिष्यों से कहा तुम मानव जीवन की कल्पना इन बच्चो की इस क्रीडा से कर सकते हो क्योंकि तुम्हारे बनाये शहर,राजधानियां सब ऐसे ही रह जाती है और तुम्हे एक दिन यह सब छोड़कर जाना ही होती है, तुम यहाँ जिंदगी की भागदौड़ में सब भूल जाते हो और खुद से कभी मिल नहीं पाते जबकि जाना तो सबका तय ही है इसलिए कभी भी अधिक लम्बा सोच कर समय बर्बाद नहीं करना चाहिए वर्तमान में जीना चाहिए।

तीन गांठें

भगवान बुद्ध अक्सर अपने शिष्यों को शिक्षा प्रदान किया करते थे।

एक दिन प्रातः काल बहुत से भिक्षुक उनका प्रवचन सुनने के लिए बैठे थे। बुद्ध समय पर सभा में पहुंचे, पर आज शिष्य उन्हें देखकर चकित थे क्योंकि आज पहली बार वे अपने हाथ में कुछ लेकर आए थे। । ‘ करीब आने पर शिष्यों ने देखा कि उनके हाथ में एक रस्सी थी। बुद्ध ने आसन ग्रहण किया और बिना किसी से कुछ कहे वे रस्सी में गांठे लगाने लगे।

वहाँ उपस्थित सभी लोग यह देख सोच रहे थे कि अब बुद्ध आगे क्या करेंगे। तभी बुद्ध ने सभी से एक प्रश्न किया, ‘मैंने इस रस्सी में तीन गांठें लगा दी हैं, अब मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि क्या यह वही रस्सी है, जो गाँठें लगाने से पूर्व थी?’

एक शिष्य ने उत्तर में कहा, ‘गुरूजी इसका उत्तर देना थोड़ा कठिन है, ये वास्तव में हमारे देखने के तरीके पर निर्भर है। एक दृष्टिकोण से देखें तो रस्सी वही है, इसमें कोई बदलाव नहीं आया है। दूसरी तरह से देखें तो अब इसमें तीन गांठें लगी हुई हैं जो पहले नहीं थीं; अतः इसे बदला हुआ कह सकते हैं। पर ये बात भी ध्यान देने वाली है कि बाहर से देखने में भले ही ये बदली हुई प्रतीत हो पर अंदर से तो ये वही है जो पहले थी; इसका बुनियादी स्वरुप अपरिवर्तित है।’

‘सत्य है!’, बुद्ध ने कहा , ‘ अब मैं इन गांठों को खोल देता हूँ।’ यह कहकर बुद्ध रस्सी के दोनों सिरों को एक दुसरे से दूर खींचने लगे। उन्होंने पुछा, ‘तुम्हें क्या लगता है, इस प्रकार इन्हें खींचने से क्या मैं इन गांठों को खोल सकता हूँ? ‘नहीं-नहीं, ऐसा करने से तो या गांठें तो और भी कस जाएंगी और इन्हे खोलना और मुश्किल हो जाएगा।’, एक शिष्य ने शीघ्रता से उत्तर दिया।

बुद्ध ने कहा, ‘ठीक है, अब एक आखिरी प्रश्न, बताओ इन गांठों को खोलने के लिए हमें क्या करना होगा ?’ शिष्य बोला , ‘इसके लिए हमें इन गांठों को गौर से देखना होगा, ताकि हम जान सकें कि इन्हें कैसे लगाया गया था, और फिर हम इन्हे खोलने का प्रयास कर सकते हैं।’

रात बीत गई, सब लोग चले गए पर शौरपुच्छ बेसुध कार्य-निमग्न रहा। बुद्ध उसके पास पहुंचे और बोले-शौरपुच्छ! तुमने प्रसाद पाया या नहीं?

शौरपुच्छ का गला रुंध गया। भाव-विभोर होकर उसने तथागत को साष्टांग प्रणाम किया। बुद्ध ने कहा-वत्स परमात्मा किसी से धन और संपत्ति नहीं चाहता, वह तो निष्ठा का भूखा है। लोगों की निष्ठाओं में ही वह रमण किया करता है और तुमने स्वयं यह जान लिया।

बुद्ध और अनुयायी

भगवान् बुद्ध क एक अनुयायी ने कहा , ‘प्रभु ! मुझे आपसे एक निवेदन करना है। बुद्धः बताओ क्या कहना है ?

‘ अनुयायी: मेरे वस्त्र पुराने हो चुके हैं। अब ये पहनने लायक नहीं रहे। कृपया मुझे नए वस्त्र देने का कष्ट करें! बुद्ध ने अनुयायी के वस्त्र देखे, वे सचमुच बिलकुल जीर्ण हो चुके थे और जगह जगह से घिस चुके थे, इसलिए उन्होंने एक अन्य अनुयायी को नए वस्त्र देने का आदेश दे दिए।

कुछ दिनों बाद बुद्ध अनुयायी के घर पहुंचे। बुद्ध : क्या तुम अपने नए वस्त्रों में आराम से हो ? तुम्हे और कुछ तो नहीं चाहिए? अनुयायी: धन्यवाद प्रभु। मैं इन वस्त्रों में बिलकुल आराम से हूँ और मुझे और कुछ नहीं चाहिए। बुद्धः अब जबकि तुम्हारे पास नए वस्त्र हैं तो तुमने पुराने वस्त्रों का क्या किया ?

अनुयायी: मैं अब उसे ओढने के लिए प्रयोग कर रहा हूँ ? बुद्धः तो तुमने अपनी पुरानी ओढ़नी का क्या किया ? अनुयायी: जी मैंने उसे खिड़की पर परदे की जगह लगा दिया है। बुद्धः तो क्या तुमने पुराने परदे फेंक दिए ? अनुयायी: जी नहीं , मैंने उसके चार टुकड़े किये और उनका प्रयोग रसोई में गरम पतीलों को आग से उतारने के लिए कर रहा हूँ.

बुद्धः तो फिर रौइ के पुराने कपड़ों का क्या किया ? अनुयायी: अब मैं उन्हें पोछा लगाने के लिए प्रयोग करूँगा। बुद्धः तो तुम्हारा पुराना पोछा क्या हुआ ? अनुयायी: प्रभु वो अब इतना तार-तार हो चुका था कि उसका कुछ नहीं किया जा सकता था, इसलिए मैंने उसका एक-एक धागा अलग कर दिए की बत्तियां त्यार कर ली, उन्ही में से एक आपके कक्ष में कल प्रकाशित था। बुद्ध अनुयायी से प्रसन्न हो गए वे प्रसन्न थे कि वे वस्तुओं को बर्बाद नहीं करता और उसमे समझ है की उनका प्रयोग किस तरह से किया जा सकता है।

डाकू अंगुलिमाल और महात्मा बुद्ध

बहुत पुरानी बात है मगध राज्य में एक सोनापुर नाम का गाँव था। उस गाँव के लोग शाम होते ही अपने घरों में आ जाते थे। और सुबह होने से पहले कोई कोई भी घर के बाहर कदम भी नहीं रखता था। इसका कारण डाकू अंगुलीमाल था।

डाकू अंगुलीमाल मगध के जंगलों की गुफा में रहता था। वह लोगों को लूटता था और जान से भी मार देता था। लोगों को डराने के लिए वह जिसे भी मारता उसकी एक ऊँगली काट लेता और उन उँगलियों की माला बनाकर पहनता। इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा। गाँव के सभी लोग परेशान थे कैसे इस डाकू के आतंक से छुटकारा मिले।

एक दिन गौतम बुद्ध उस गाँव में आये। गाँव के लोग उनकी आवभगत करने लगे। गौतम बुद्ध ने देखा कि गाँव के लोगों में किसी बात को लेकर देहशत फैली है!

तब गौतम बुद्ध ने गाँव वालों से इसका कारण पूछा- ये सुनते ही गाँव ‘ वालों ने अंगुलिमाल के आतंक का पूरा किस्सा उन्हें सुनाया। अगले ही दिन गौतम बुद्ध जंगल की तरफ निकल गये, गाँव वालों ने उन्हें बहुत रोका पर वो नहीं माने। बुद्ध को आते देख अंगुलिमाल हाथों में तलवार लेकर खड़ा हो गया, पर बुद्ध उसकी गुफा के सामने से निकल गए उन्होंने पलटकर भी नहीं देखा।

अंगुलिमाल उनके पीछे दौड़ा, पर दिव्य प्रभाव के कारण वो बुद्ध को पकड़ नहीं पा रहा था। थक हार कर उसने कहा- ‘रुको’ बुद्ध रुक गए और मुस्कुराकर बोले- मैं तो कबका रुक गया पर तुम कब ये हिंसा रोकोगे।

अंगुलिमाल ने कहा- सन्यासी तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता। सारा मगध मुझसे डरता है। तुम्हारे पास जो भी माल है निकाल दो वरना, जान से हाथ धो बैठोगे। मैं इस राज्य का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति हूँ। बुद्ध जरा भी नहीं घबराये और बोले- मैं ये कैसे मान लूँ कि तुम ही इस राज्य के सबसे शक्तिशाली इन्सान हो। तुम्हे ये साबित करके दिखाना होगा।

अंगुलिमाल बोला बताओ- ‘कैसे साबित करना होगा?’ बुद्ध ने कहा- ‘तुम उस पेड़ से दस पत्तियां तोड़ कर लाओ।’ अंगुलिमाल ने कहा- बस इतनी सी बात, ‘मैं तो पूरा पेड़ उखाड़ सकता हूँ । अंगुलिमाल ने दस पत्तियां तोड़कर ला दीं। बुद्ध ने कहा- ‘अब इन पत्तियों को वापस पेड़ पर जाकर लगा दो।’

अंगुलिमाल ने हैरान होकर कहा- ‘टूटे हुए पत्ते कहीं वापस लगते हैं। क्या?’ तो बुद्ध बोले – ‘जब तुम इतनी छोटी सी चीज़ को वापस नहीं जोड़ सकते तो तुम सबसे शक्तिशाली कैसे हुए?’ यदि तुम किसी चीज़ को जोड़ नहीं सकते तो कम से कम उसे तोड़ो मत, यदि किसी को जीवन नहीं दे सकते तो उसे मृत्यु देने का भी तुम्हे कोई अधिकार नहीं है।

ये सुनकर अंगुलीमाल को अपनी गलती का एहसास हो गया। और वह बुद्ध का शिष्य बन गया। और उसी गाँव में रहकर लोगों की सेवा करने लगा। आगे चलकर यही अंगुलिमाल बहुत बड़ा सन्यासी बना और अहिंसका नाम से प्रसिद्ध हुआ।

अपने दुःखों का कारण आप ही है

एक समय की बात है, भगवान बुद्ध एक नगर में घुम रहे थे। उस नगर के आम नागरिकों के मन में बुद्ध के विरोधियों ने यह बात बैठा दी थी कि वह एक ढोंगी है और हमारे धर्म को भ्रष्ट कर रहा है। इस वजह से वहां के लोग उन्हें अपना दुश्मन मानते थे। जब नगर के लोगों ने बुद्ध को देखा तो उन्हें भला बुरा कहने लगे और बदुआएं देने लगे।

गौतम बुद्ध नगर के लोगों की उलाहने शांति से बिना बोलने सुनते रहे लेकिन जब नगर के लोग उन्हें बोलते-बोलते थक गए तो महात्मा बुद्ध बोले- 'क्षमा चाहता हूं! लेकिन अगर आप लोगों की बातें खत्म हो गयी है तो मैं यहां जाऊं।'

भगवान बुद्ध कि यह बात सुन वहां के लोग बड़े आर्श्चयचकित हुए। वही खड़ा एक आदमी बोला - 'ओ! भाई हम तुम्हारा गुणगान नहीं कर रहे है। हम तो तुम्हें गालियाँ दे रहे हैं। क्या इसका तुम पर कोई असर नहीं होता???'

बुद्ध बोले - आप सब मुझे चाहे जितनी गालियाँ दो मैं उन्हें लूगा ही नहीं। आपके गालियाँ देने से मुझपर कोई असर नहीं पड़ता जब तक कि मैं उन्हें स्वीकार नहीं करता।

बुद्ध आगे बोले - और जब मैं इन गालियाँ को लूंगा ही नहीं तो यह कहां रह जाएगी? निश्चित ही आपके पास।

मित्रों, बुद्ध के जीवन का यह छोटा सा प्रसंग हमारे जीवन में एक नया परिवर्तन ला सकता है क्योंकि बहुत से लोग अपने दुःखों का कारण दुसरों को मानते है। जो कि अच्छी बात नहीं है। ऐसा कर हम स्वयं के लिए गडढ़ा खोद रहे होते है। यह सब हम पर निर्भर है कि हम लोगों के negative बातों को कैसे लेते है। उन्हें स्वीकार कर रहे है या नकार रहे है।

इस दुनिया में कोई गरीब नहीं

एक समय की बात है भगवान गौतम बुद्ध एक गाँव में धर्म सभा को संबोधित कर रहे थे। लोग अपनी विभिन्न परेशानियों को लेकर उनके पास जाते और उसका हल लेकर खुशी-खुशी वहां से लौटते।

उसी गांव के सड़क के किनारे एक गरीब व्यक्ति बैठा रहता तथा महात्मा बुद्ध के उपदेश शिविर में आने जाने वाले लोगों को बड़े ध्यान से देखता। उसे बड़ा आश्चर्य होता कि लोग अंदर तो बड़े दुःखी चेहरें लेकर जाते है लेकिन जब वापस आते है तो बड़े खुश और प्रसन्न दिखाई देते है।

उस गरीब को लगा कि क्यों न वो भी अपनी समस्या को भगवान के समक्ष रखे? मन में यह विचार लिए वह भी महात्मा बुद्ध के पास पहुंचा। लोग पंक्तिबध खड़े होकर अपनी समस्या को बता रहे थे।

जब उसकी बारी आई तो उसने सबसे पहले महात्ममा बुद्ध को प्रणाम किया और फिर कहा - 'भगवान इस गाँव में लगभग सभी लोग खुश और समृध है। फिर मैं ही क्यो गरीब हूं?'

इस पर उन्होने मुस्कुराते हुए कहा - 'तुम गरीब और निर्धन इसलिए हो क्योंकि तुमने आज तक किसी को कुछ दिया ही नहीं।'

इस पर वह गरीब व्यक्ति बड़ा आर्श्चयचकित हुआ और बोला - 'भगवान, मेरे पास भला दूसरों को देने के लिए क्या होगा। मेरा तो स्वयं का गुजारा बहुत मुश्किल से हो पाता है। लोगों से भीख मांग कर अपना पेट भरता हूं।'

भगवान बुद्ध कुछ देर शांत रहे, फिर बोले- तुम बड़े अज्ञानी हो। औरो के साथ बाटने के लिए ईश्वर ने तुम्हे बहुत कुछ दिया है। मुस्कुराहट दी है जिससे तुम लोगों में आशा का संचार कर सकते हो। मुख दिया है ताकि लोगों से दो मीठे शब्द बोल सकते है, उनकी प्रशंसा कर सकते हो। दो हाथ दिये है लोगों की मदद कर सकते हो। ईश्वर ने जिसको ये तीन चीजें दी है वह कभी गरीब और निर्धन हो ही नहीं सकता। निर्धनता का विचार आदमी के मन में होता है, यह तो एक भ्रम है इसे निकाल दो।

कभी भी मन में निर्धनता का भाव उत्पन्न न होने दो गरीबी अपने आप दूर हो जाएगी। भगवान बुद्ध का संदेश सुनकर उस आदमी का चेहरा चमक उठा और उसने इस उपदेश को अपने जीवन में उतारा जिससे वह फिर कभी दुखी नहीं हुआ।

क्रोध एक दुश्मन

एक समय की बात है भगवान गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे हुए थे और उन्हें उपदेश दे रहे थे। तब उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “क्रोध इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन है। क्रोध करने वाला व्यक्ति खुद को हानि पहुंचाता ही है लेकिन दूसरों को भी हानि पहुंचाता है। वह प्रतिशोध की आग में जलता है और अपने जीवन को बर्बाद करता है।”

उनके उपदेश खत्म हो जाने के बाद उनके शिष्यों में से एक शिष्य खड़ा होता है और उसे बोलता है, “तू एक ढोंगी है! तेरी बातें मनुष्यों के रहन-सहन से विपरीत है। तू जो भी कहता है उसे अपने जीवन में अनुसरण नहीं करता और दूसरों को यह सब करने कहता है।”

जब उसका वह शिष्य गौतम बुद्ध को उल्टी-सीधी बातें कह रहा था तब गौतम बुद्ध ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और वे शांत बैठे थे। लेकिन ऐसे में वह व्यक्ति और भी ज्यादा गुस्सा हो गया और गुस्से में आकर उसने गौतम बुद्ध के मुंह पर थूक दिया। इसके बाद भी महात्मा गौतम बुद्ध को गुस्सा नहीं आया और वे शान्त थे। उन्होंने अपने चेहरे से थूक को पोछा और वह चुपचाप बैठ गए।

यह सब देखकर उस शिष्य को समझ नहीं आया कि वह क्या करेगा। गुस्से में आकर वह उस जगह को छोड़कर चला गया और अगले दिन अपने घर पहुंचा। जैसे ही वह अपने घर पहुंचा तब तक उसका दिमाग शांत हो चुका था। दिमाग के सांत होते ही उसे इस बात का एहसास हुआ कि उसने कितनी बड़ी गलती की है। उसे पाप हुआ है। वह खुद को मन ही मन कहने लगा, “यह मैंने क्या कर दिया। मैंने महात्मा बुद्ध का अपमान किया है। ऐसा पाप मैं कैसे कर सकता हूं। मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। मुझे जाकर उनसे माफ़ी मांगनी होगी।”

यह कहकर वह तुरंत हि गौतम बुद्ध के पास चला गया लेकिन गौतम बुद्ध उस स्थान पर नहीं थे। ऐसे में वह शिष्य जगह-जगह भटककर उन्हें खोजने लगा। जैसे ही उसे महात्मा बुद्ध मिले तो वह उनके पैरों पर गिर गया और उनसे कहने लगा, “मुझे माफ कर दीजिए। मुझसे गलती हुई है। मैंने आपका अपमान किया है। मैंने यह बहुत बड़ा पाप किया है।”

यह सब देखकर गौतम बुद्ध ने उससे कहा, “शांत हो जाओ, क्या बात है मुझे बताओ? तुम कौन हो?”

गौतम बुद्ध के यह पूछने पर वह शिष्य चौक गया। वह सोचने लगा की महात्मा बुद्ध मुझे कैसे भुल सकते है। मैने तो उनका अपमान किया था।

यह सोचकर उसने महात्मा बुद्ध से पूछा, “मैं वही शिष्य हूं जिससे कल आपका अपमान किया था और आप इतनी जल्दी मुझे भूल गए।”

“हमें कल की बातों को कल में हि छोड़ देना चाहिए। वह अच्छा हो या बुरा उसके बारे में बार-बार विचार नहीं करना चाहिए। मैं बीती हुई बातों को पीछे छोड़कर आगे चलता हूं और ऐसा ही हम सब को भी करना चाहिए।” महात्मा बुद्ध ने उस शिष्य से कहा।

महात्मा बुद्ध की यह बातें सुनकर वह शिष्य और भी ज्यादा प्रभावित हुआ और उनसे बोला मैं आज से आपकी हर बातों को माना करूंगा।

शिक्षा - इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि क्रोध करना इंसान के लिए सबसे खतरनाक है। यह मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है जो उसे बर्बाद कर सकता है। इसलिए मनुष्य को कभी भी क्रोध नहीं करना चाहिए।

इस कहानी से हमें यह भी सीख मिलती है कि बीती हुई बातों को हमें भूलकर आगे बढ़ना चाहिए। अगर कोई मनुष्य अपनी बीती हुई बातों पर ज्यादा ध्यान देता है तो उसका ध्यान पूरी तरह से भूतकाल में लगा होता है और वह इंसान कभी भी आगे बढ़ने की और विचार नहीं कर पाता। इसीलिए हमेशा पुरानी बातों को छोड़कर आगे बढ़ने की सोचे।

मारने वाले से बचाने वाला बड़ाई

गौतम बुद्ध को हम बहुत अच्छे से जानते हैं जिन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की और उन्होंने लोगों के जीवन में ढेरों बदलाव लेकर आए थे। यह कहानी भी उनके बचपन की है जब वे छोटे थे और उन्हें गौतम बुद्ध के नाम से नहीं बल्कि सिद्धार्थ के नाम से जाना जाता था। उनके एक चचेरे भाई भी थे जिनका नाम देवदत्त था। चलिए जानते हैं इस कहानी के बारे में –

राजा सिद्धार्थ के महल के पास एक उद्यान था जहां पर राजा सिद्धार्थ बैठकर प्रकृति का आनंद लिया करते थे। एक दिन जब वे अपने बगीचे में बैठे हुए थे कि तभी एक घायल हंस उनके पैर के पास आकर गिरा। उसके शरीर में एक तीर लगा हुआ था। उसे देखने से प्रतीत हो रहा था कि किसी शिकारी उसका शिकार किया है।

हंस को तकलीफ में देखकर और उसे यूं ही फड़फड़ाता देख कर राजा सिद्धार्थ का दिल पिघल गया और उन्होंने उस हंस की सहायता करनी चाही।

उन्होंने सबसे पहले उस हंस के शरीर से वह तीर निकाला और घायल जगह पर मलहम लगाकर उसकी पट्टी की। यह सब कर लेने के बाद देवदत्त कुछ खोजता हुआ सिद्धार्थ के पास आया।

देवदत्त जैसे ही सिद्धार्थ के पास पहुंचा उसने कहा, “अच्छा तो यह तुम्हारे पास है। लाओ इसे मुझे दे दो इसका शिकार मैंने किया है। इसका शिकार करने में मुझे बहुत मेहनत करनी पड़ी थी। इसपर मेरा अधिकार है।”

देवदत्त की यह बात सुनकर सिद्धार्थ ने उससे कहा, “नहीं यह हंस घायल था और मेरे पास आया। मैंने इसकी मदद की और उसकी जान बचाई। इसीलिए इस पर अधिकार मेरा है।” दोनों भाइयों के बीच उस हंस के अधिकार को लेकर बहस होने लगी। अब वे जानना चाहते थे कि उस हंस पर किसका अधिकार ज्यादा है? ऐसे में उन दोनों ने निर्णय लिया कि वे दोनों राजा के पास जाएंगे। सिद्धार्थ की पिताजी कपिलवस्तु के राजा थे।

वे दोनों राजा के पास गए। राजा के पास पहुंचते ही देवदत्त ने सबसे पहले कहा, “महाराज इस हंस पर सबसे ज्यादा अधिकार मेरा है क्योंकि मैंने इसका शिकार किया है। इस वजह से आप सिद्धार्थ से कहिए कि वह यह हंस मुझे दे दे।”

जैसे ही देवदत्त की बात पूरी हुई तब राजा ने दोनों को शांत किया और फिर उनसे पूछा कि पूरी बात क्या है?

ऐसे में सिद्धार्थ ने राजा को पूरी बात बताई और उनसे बोला, “पिताजी बात यह है कि इस हंस का शिकार देवदत्त ने किया था लेकिन यह हंस घायल होकर मेरे कदमों के पास आ गिरा। इसे घायल देखकर मैंने इसका इलाज किया और इसे ठीक किया। अब आप ही बताइए कि इस हंस पर सबसे ज्यादा अधिकार मेरा है।”

राजा ने इस मामले पर अच्छे से विचार किया। विचार कर लेने के बाद उन्होंने सभा में सबसे एक बड़ी बात कही और वह बात यह थी कि “मारने वाले से ज्यादा बचाने वाला का अधिकार सबसे ज्यादा होता है। इसीलिए इस हंस पर सबसे बड़ा अधिकार सिर्फ और सिर्फ सिद्धार्थ का है क्योंकि उसने उस हंस को मारा नहीं बल्कि उसे घायल देखकर उसका इलाज किया और उसकी जान बचाई। राजा के ऐसा कह लेने के बाद देवदत्त को बात अच्छे से समझ आ गई। वह भी जान चुका था कि मारने वाले से ज्यादा बचाने वाले का अधिकार सबसे ज्यादा होता है।

शिक्षा - इस कहानी से हमें समझ में आता है कि मारने वाले से ज्यादा बचाने वाला बड़ा होता है और उसका अधिकार भी मारने वाले से ज्यादा होता है। इसीलिए हमें भी दूसरों की मदद करनी चाहिए और परेशान लोगों की सहायता करनी चाहिए। ऐसा करने से हम अपने आसपास के समाज को अच्छा और बेहतर बनाते हैं। एक अच्छा समाज ही एक अच्छे देश की पहचान होती है। इसीलिए आप भी आज से प्रण लीजिए कि आप भी दूसरों की सहायता जरूर करेंगे।

अगर हम सिद्धार्थ के स्वभाव की बात करें तो वह बहुत ही शांत है और दूसरों की मदद करने में हमेशा आगे रहते हैं। उन्होंने हंस को तकलीफ में देखा तो उसकी मदद करने के लिए तुरंत उठ पड़े। इसे यह बात पता चलती है कि सिद्धार्थ को दूसरों को तकलीफ में देख कर खुद को भी तकलीफ होती है।

अगर हम देवदत्त की बात करें तो वह एक लड़ाकू बालक था जिसमें सब्र की कमी थी। देवदत्त बस इतना ही जानता था मरने वाले का अधिकार ज्यादा होता है। वह जीवो को मारने में संकोच नहीं करता था जोकि गलत है। वह सिद्धार्थ के विपरीत था।

गौतम बुद्ध और अंगुलिमाल की कहानी

बहुत सालों पहले भारत में मगध नाम का एक राज्य था। वह राज्य बहुत ही संपन्न था। राज्य में एक सोनापुर नाम का गांव था जहां के लोग अपना सारा काम दिन में किया करते थे। लेकिन रात होते ही सारे लोग अपने घर के अंदर चले जाते और कोई भी रात के समय अपने घरों से बाहर नहीं निकलता था।

लोग ऐसा बस एक ही कारण से किया करते थे और वह था अंगुलिमाल। अंगुलिमाल बहुत ही खतरनाक डाकू था जो लोगों को लूटकर मार देता था। वह लोगों के बीच डर बनाए रखने के लिए मारे हुए व्यक्ति की उंगलियां काटकर उसका माला बनाकर पहनता था।

अंगुलिमाल मगध के एक गुफा में रहा करता था। वह जिस जंगल के गुफा में रहता था लोग वहां से भी गुजरने से डरते थे। क्योंकि सबको अंगुलिमाल से बहुत डर लगता था।

एक दिन गौतम बुद्ध सोनापुर से गुजर रहे थे कि तभी उन्होंने लोगों को चिंतित देखा। लोगों को इस तरह से परेशान देखकर गौतम बुद्ध ने उन सबसे पूछा, “क्या बात है आप सब इतने डरे हुए क्यों है?”

ऐसे में लोगों ने महात्मा बुद्ध के सवालों का जवाब दिया, “यहाँ एक डाकू अंगुलिमाल का बुरा प्रकोप है। वह लोगों को लूटकर मार देता है और उनकी उंगलियों को काटकर उसका माला बनाकर पहन लेता है। इसीलिए हमारे गांव के लोग बेहद डरे हुए हैं। अब आप ही बताइए कि हम क्या करें।”

“अच्छा ऐसी बात है। तो फिर वह अंगुलिमाल रहता कहां है?” महात्मा बुद्ध ने लोगों से पूछा।

ऐसे में एक व्यक्ति सामने आया और महात्मा बुद्ध को बोला, “वह जंगलों में रहता है। जंगलों के अंदर एक गुफा है जिसके अंदर अंगुलिमाल रहता है।”

यह सब सुन लेने के बाद महात्मा बुद्ध अंगुलिमाल से मिलने जंगल की ओर चल पड़े। सोनापुर गांव के लोगों ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन फिर भी वह नहीं रुके और जंगल की ओर चल पड़े।

जैसे ही वह जंगल के पास जा पहुंचे तब अंगुलिमाल अपने गुफा में से निकलकर हाथ में तलवार लिए खड़ा हो गया। गौतम बुद्ध ने अंगुलिमाल को अनदेखा किया और आगे बढ़ चले। यह देखकर अंगुलिमाल बुद्ध का पीछा करने लगा। पीछा करते-करते अंगुलिमाल जोर से चिल्लाकर बोला, “ए सन्यासी रुक जा।”

“मैं तो रुक गया। तुम कब रखोगे? तुम अपनी यह हिंसा कब बंद करोगे?” महात्मा बुद्ध ने कहा।

ऐसे में अंगुलिमाल क्रोधित हो गया फिर उसने गौतम बुद्ध से कहा, “सन्यासी तु मुझे जानता नहीं है। मैं इस राज्य का सबसे शक्तिशाली मनुष्य हूँ।”

“मैं नहीं मानता कि तुम सबसे शक्तिशाली मनुष्य हो।” गौतम बुद्ध ने कहा।

यह सुनकर अंगुलिमाल बोला, “अच्छा अगर ऐसी बात है तो तुम ही बताओ की मैं ऐसा क्या कर जिससे तुम मनोगे?”

“तुम जाओ और उस पेड़ में से 10 पत्तियाँ तोड़कर लाओ।” महात्मा बुद्ध ने कहा।

महात्मा बुद्ध के कहने पर अंगुलिमाल ने वही किया। वह पेड़ के पास गया और उसमें से दस पत्तियाँ तोड़ लाया। फिर बुद्ध ने कहा, “जाओ अब इन पत्तियों को वापस से उस पेड़ मे जोड़ दो।”

यह सुनकर अंगुलिमाल अचंभित हो गया और उसने महत्मा बुद्ध से कहा, “ये कैसा बेहूदा मज़ाक है। भला कोई पत्तियों को तोड़कर वापस पेड़ से जोड़ सकता है क्या?”

ऐसे में बुद्ध ने कहा, “तुम खुद्को सबसे शक्तिशाली कहते हो और इन पत्तियों को जोड़ नही सकते। अगर तुम किसीको जोड़ नहीं सकते तो उसे तोड़ो मत। अगर तुम किसीको जीवन नहीं दे सकते तो उन्हें मारों मत।”

यह सुनकर अंगुलिमाल की आंखें खुल गई। वह बुद्ध के चरणों में गिर गया और उनसे माफ़ी माँगने लगा। इसके बाद से अंगुलिमाल बुरे काम करना छोड़ दिया और वह महात्मा बुद्ध का शिष्य बन गया।

शिक्षा - इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि इंसान चाहे कितना भी बुरा क्यों ना हो वह बदल सकता है।

महात्मा बुद्ध की सीख

एक स्त्री का एक ही बेटा था, वह भी मर गया तो रोती-बिलखती वह महात्मा बुध्दके पास पहुंची और उनके पैरों में गिरकर बोली, ‘महत्माजि, आप किसी तरह मेरे लाल को जीवित कर दें।’

महत्मा बुद्ध ने उसके प्रति सहानुभूति जताते हुए कहा, ‘तुम शोक न करो। बुद्ध ने उस महिला को सत्य बताने के लिए सराहना देते हुए कहा, में तुम्हारे बेटे को जीवित कर दूंगा लेकिन एक शर्त है की तुम किसी ऐसे घर से भिक्षा के रूप में कुछ भी मांग लाओ जहाँ किसी यक्ति की कभी मृत्यु न हुई हो। उस स्त्री को कुछ तसल्ली हुई और दौड़कर गाँव पहुंची।

अब वह ऐसा घर खोजने लगी जहाँ किसी की मृत्यु न हुई हो। बहुत बहुत ढूंढा लेकिन ऐसा कोई घर उसे नहीं मिला। वह निराश होकर महात्मा बुध्द के पास आई और वस्तुस्थिति से अवगत कराया। तब बुध्द बोले, ‘यह संसार-चक्र है। यहाँ जो आता है। उसे एक दिन अवश्य ही जाना पड़ता है। तुम्हें इस दुःख को धैर्यता से सहन करना चाहिए।

तब महिला हो को बुद्ध के वचन समझ आये और उस महिला ने फिर बुद्ध से संन्यास लिया और मोक्ष की राह पर चलने लगी।

आप क्या लेना पसंद करेंगे ? उदासी या मुस्कान

एक बार गौतम बुद्ध किसी गाँव से गुजर रहे थे। उस गाँव के लोगों को गौतम बुद्ध के बारे में गलत धारणा थी जिस कारण वे बुद्ध को अपना दुश्मन मानते थे। जब गौतम बुद्ध गाँव में आये तो गाँव वालों ने बुद्ध को भला बुरा कहा और बदुआएं देने लगे।

गौतम बुद्ध गाँव वालों की बातें शांति से सुनते रहे और जब गाँव वाले बोलते बोलते थक गए तो बुद्ध ने कहा – ‘अगर आप सभी की बातें समाप्त हो गयी हो तो मैं प्रस्थान करूँ।’ बुद्ध की बात सुनकर गाँव वालों को आश्चर्य हुआ। ‘उनमें से एक व्यक्ति ने कहा – ‘हमने तुम्हारी तारीफ नहीं की है। हम तुम्हे बदुआएं दे रहे है। क्या तुम्हे कोई फर्क नहीं पड़ता?’

बुद्ध ने कहा – ‘जाओ मैं आपकी गालियाँ नहीं लेता। आपके द्वारा गालियाँ देने से क्या होता है, जब तक मैं गालियाँ स्वीकार नहीं करता इसका कोई परिणाम नहीं होगा। कुछ दिन पहले एक व्यक्ति ने मुझे कुछ उपहार दिया था लेकिन मैंने उस उपहार को लेने से मना कर । दिया तो वह व्यक्ति उपहार को वापस ले गया। जब मैं लूंगा ही नहीं तो कोई मुझे कैसे दे पाएगा।’

बुद्ध ने बड़ी विनम्रता से पूछा – ‘अगर मैंने उपहार नहीं लिया तो उपहार देने वाले व्यक्ति ने क्या किया होगा।’ भीड़ में से किसी ने कहा – ‘उस उपहार को व्यक्ति ने अपने पास रख दिया होगा।’

बुद्ध ने कहा – ‘मुझे आप सब पर बड़ी दया आती है क्योंकि मैं आपकी इन गालियों को लेने में असमर्थ हूँ और इसलिए आपकी यह गालियाँ आपके पास ही रह गयी है।’

सबकुछ स्वीकार करना जरुरी नहीं

गौतम बुद्ध जगह-जगह घूमकर उपदेश दिया करते और अच्छे विचारों को बांटा करते। वे लोगों के जीवन के दुखों को दूर किया करते। उनकी बातों को सुनकर लोग बहुत खुश हो जाते। इसीलिए लोगों उन्हें बहुत पसंद किया करते थे। लेकिन कुछ ऐसे भी लोग थे जो गौतम बुद्ध से ईर्ष्या करते थे।

एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ भ्रमण कर रहे थे कि तभी एक व्यक्ति उनके पास आया और उन्हें उल्टी-सीधी गालियां देने लगा और उन्हें ढोंगी बोला। यह सब सुन लेने के बाद भी महात्मा बुद्ध ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी वे शांति और चुपचाप रहे। ऐसे में उस व्यक्ति ने फिर से गौतम बुद्ध को उल्टी-सीधी गालियां दी और उनके पूर्वजों के बारे में भला बुरा कहने लगा लेकिन फिर भी महात्मा बुद्ध ने उसे कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और वे शांत रहें।

यह सब देखकर उनके शिष्य और आस-पास मौजूद लोग अचरज में थे कि महात्मा बुध उस व्यक्ति को कोई जवाब क्यों नहीं दे रहे?

कुछ देर बाद वह व्यक्ति अपने आप ही शांत हो गया। उसके शान्त हो जाने के बाद बुद्ध ने कहा, “अगर कोई हमें तोहफा देता है तो यह हमारे ऊपर है कि उसे हम लेते हैं या नहीं। अगर हम उसे अपना लेते हैं तो वह हमारे पास आ जाता है। वहीं अगर हम उसे नहीं अपनाते तो वह उसी व्यक्ति के पास चला जाता है जिसने वह तोहफा दिया था। उसी प्रकार इस व्यक्ति द्वारा दिया गया अपशब्द स्वीकार करना या ना करना मेरे ऊपर है। हमें कभी भी तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देनी चाहिए। हमें हमेशा शांत होकर सही या गलत के बारे में विचार करके प्रतिक्रिया देनी चाहिए। इससे बुरी से बुरी बातें टल जाती है और मुसीबतों से छुटकारा भी मिलता है।”

बुद्ध की यह सब बातें सुन लेने के बाद वह व्यक्ति शर्मिंदा हो गया और तुरंत बुद्ध के चरणों में गिर गया और उनसे माफी मांगने लगा। बुद्ध ने उसे माफ किया और भी आगे बढ़ चले।

शिक्षा - कुछ भी स्वीकार करना या ना करना हमारे ऊपर है इसीलिए हमें जीवन के लिए अच्छी चीजों को स्वीकार करना चाहिए और वही ऐसी चीजों को अस्वीकार करना चाहिए जो हमारे जीवन के लिए अच्छी नहीं है। इस कहानी से हमें यह भी सीख मिलती है कि जरूरी नहीं कि दूसरे द्वारा किया गया अपमान सच में आपका अपमान करता हो। आप अपमानित तब होते हैं जब आप अपनी प्रतिक्रिया देते हैं। अगर आपका कोई अपमान करें तो उसे आप एक अच्छी प्रतिक्रिया दीजिए। ऐसा करने से आपका अपमान नहीं होगा लेकिन अगर आप बुरी प्रतिक्रिया देंगे तो इससे आपका अपमान होना तय है। इसीलिए सोच समझकर प्रतिक्रिया देनी चाहिए।

जीवन में सब्र का महत्व

यह कहानी बहुत ही पुरानी है। उस समय महात्मा गौतम बुद्ध पुरे भारतवर्ष में घुम-घुम कर बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रसार कर रहे थे।

धर्म प्रचार के सिलसिले में वे अपने कुछ अनुयायीयों के साथ एक गाँव में घुम रहे थे। काफी देर तक भ्रमण करते रहने से उन्हें बहुत प्यास लग गई थी।

प्यास बढ़ता देख, उन्होंने एक शिष्य को पास के गाँव से पानी लाने के लिए कहा। शिष्य जब गाँव में पहुंचा तो उसने देखा की वहां एक छोटी सी नदी बह रही है जिसमें काफी लोग अपने वस्त्र साफ कर रहे थे और कई अपने गायों को नहला रहे थे। इस कारण नदी का पानी काफी गंदा हो गया था।

शिष्य को नदी के पानी का ये हाल देख लगा कि गुरूजी के लिए यह गंदा पानी ले जाना उचित नहीं होगा। इस तरह वह बिना पानी के ही वापस आ गया। लेकिन इधर गुरूजी का तो प्यास से गला सूखा जा रहा था। इसलिए पुनः उन्होंने पानी लाने के लिए दूसरे शिष्य को भेजा। इस बार वह शिष्य उनके लिए मटके में पानी भर कर लाया।

यह देख महात्मा बुद्ध थोड़ा आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने शिष्य से पूछा गाँव में बहने वाली नदी का पानी तो गंदा था फिर ये पानी कहां से लाये?

शिष्य बोला - 'हाँ गुरूजी, उस नदी का जल सही में बहुत गंदा था परंतु जब सभी अपना कार्य खत्म करके चले गये तब मैने कुछ देर वहां ठहर कर पानी में मिली मिट्टी के नदी के तल में बैठने का इंतजार किया। जब मिट्टी नीचे बैठ गई तो पानी साफ हो गया। वही पानी लाया हूं।'

महात्मा बुद्ध शिष्य का यह उत्तर सुनकर बहुत खुश हुए तथा अन्य शिष्यों को एक शिक्षा दी कि हमारा जीवन भी नदी के जल जैसा ही है। जीवन में अच्छे कर्म करते रहने से यह हमेशा शुद्ध बना रहता है परंतु अनेको बार जीवन में ऐसे भी क्षण आते है जब हमारा जीवन दुख और समस्याओं से घिर जाता है, ऐसी अवस्था में जीवन समान यह पानी भी गंदा लगने लगता है।

मित्रों, इसलिए हमें जीवन में दुःख और बुराईयों को देखकर अपना साहस नहीं खोना चाहिए और धैर्य रखना चाहिए गंदगी समान ये समस्याएँ स्वयं ही धीरे-धीरे खत्म हो जाती हैं।

अहंकार का उपहार

महात्मा बुद्ध के पास सेठ रतनचंद दर्शन को आए तो साथ में ढेरों साम्रगी उपहारस्वरूप लाए। वहाँ उपस्थित जन-समूह एक बार तो वाह-वाह कर उठा। सेठ रतनचंद का सिर तो गर्व से तना जा रहा था। बुद्ध के साथ वार्तालाप प्रारंभ हुआ तो सेठ ने बताया कि इस नगर के अधिसंख्य चिकित्सालयों, विद्यालयों और अनाथालयों का निर्माण मैंने ही कराया है। आप जिस सिंहासन पर बैठे हैं वह भी मैंने ही भेंट किया है, आदि-आदि। कई दान सेठजी ने गिनवा दिए। सेठ जी ने जब जाने की आज्ञा चाही तो बुद्ध बोले - "जो कुछ साथ लाए थे, सब यहाँ छोड़कर जाओ।"

सेठ जी चकित होकर बोले - 'प्रभु, मैंने तो सब कुछ आपके समक्ष अर्पित कर दिया है।'

बुद्ध बोले - "नहीं, तुम जिस अंहकार के साथ आए थे उसी के साथ वापस जा रहे हो। यह सांसारिक वस्तुएँ मेरे किसी काम की नहीं। अपना अहम यहाँ त्याग कर जाओ, वही मेरे लिए बड़ा उपहार होगा।"

महात्मा बुद्ध का यह कथन सुनकर सेठ जी उनके चरणों में नतमस्तक हो गए। भीतर समाया हुआ सारा अहंकार अश्रु बनकर बुद्ध के चरणों को धो रहा था।

महत्वपूर्ण दान

भगवान बुद्ध एक पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठे हुए थे। हर भक्त की भेंट स्वीकार कर रहे थे। तभी एक वृद्धा आई। उसने काँपती आवाज में कहा - 'भगवन, मैं बहुत गरीब हूँ। मेरे पास आपको भेंट देने के लिए कुछ भी नहीं है। हाँ, आज एक आम मिला है। मैं इसे आधा खा चुकी थी, तभी पता चला कि तथागत आज दान ग्रहण करेंगे। अतः मैं यह आम आपके चरणों में भेंट करने आई हूँ। कृपा कर इसे स्वीकार करें।'

गौतम बुद्ध ने अपनी अंजुरी (पात्र) में वह आधा आम प्रेम और श्रद्धा से रख दिया, मानो कोई बड़ा रत्न हो। वृद्धा संतुष्ट भाव से लौट गई। वहाँ उपस्थित राजा यह देखकर चकित रह गया। उसे समझ नहीं आया कि भगवान बुद्ध वृद्धा का जूठा आम प्राप्त करने के लिए आसन छोड़कर नीचे तक, हाथ पसारकर क्यों आए? पूछा - 'भगवन, इस वृद्ध में और इसकी भेंट में क्या ऐसी विशेषता है?'

बुद्ध मुस्कराकर बोले - "राजन, इस वृद्धा ने अपनी सम्पूर्ण संचित पूंजी मुझे भेंट कर दी जबकि आप लोगों ने अपनी सम्पूर्ण सम्पति का केवल एक छोटा भाग ही मुझे भेंट किया है। दान के अहंकार में डूबे हुए बग्घी पर चढ़कर आए हो। वृद्धा के मुख पर कितनी करूणा और कितनी नम्रता थी। युगों-युगों के बाद ऐसा दान मिलता है।"

बुद्ध और चक्षुपाल

एक बार भगवान बुद्ध जेतवन विहार में रह रहे थे, भिक्षु चक्षुपाल भगवान से मिलने के लिए आए थे। उनके आगमन के साथ उनकी दिनचर्या, व्यवहार और गुणों की चर्चा भी हुई।

भिक्षु चक्षुपाल अंधे थे। एक दिन विहार के कुछ भिक्षुओं ने कुछ मरे हुए कीड़ों को चक्षुपाल की कुटी के बाहर पाया और उन्होंने चक्षुपाल की निंदा करनी शुरू कर दी कि उन्होंने इन जीवित प्राणियों की हत्या की।

भगवान बुद्ध ने निंदा कर रहे उन भिक्षुओं को बुलाया और पूछा कि क्या तुमने भिक्षु को कीड़े मारते हुए देखा है। उन्होंने उत्तर दिया- नहीं।

इस पर भगवान बुद्ध ने उन साधकों से कहा कि जैसे तुमने उन्हें कीड़ों को मारते हुए नहीं देखा वैसे ही चक्षुपाल ने भी उन्हें मरते हुए नहीं देखा और उन्होंने कीड़ों को जान बूझकर नहीं मारा है इसलिए उनकी भर्त्सना करना उचित नहीं है।

भिक्षुओं ने इसके बाद पूछा कि चक्षुपाल अंधे क्यों हैं? उन्होंने इस जन्म में अथवा पिछले जन्म में क्या पाप किए।

भगवान बुद्ध ने चक्षुपाल के बारे में कहा कि वे पूर्व जन्म में एक चिकित्सक थे। एक अंधी स्त्री ने उनसे वादा किया था कि यदि वे उसकी आंखें ठीक कर देंगे तो वह और उसका परिवार उनके दास बन जाएंगे। स्त्री की आंखें ठीक हो गईं। पर उसने दासी बनने के भय से यह मानने से इंकार कर दिया।

चिकित्सक को तो पता था कि उस स्त्री की आंखें ठीक हो गई हैं। वह झूठ बोल रही है। उसे सबक सिखाने के लिए या बदला लेने के लिए चक्षुपाल ने दूसरी दवा दी, उस दवा से महिला फिर अंधी हो गई। वह कितना ही रोई-पीटी, लेकिन चक्षुपाल जरा भी नहीं पसीजा। इस पाप के फलस्वरूप अगले जन्म में चिकित्सक को अंधा बनना पड़ा।

परिश्रम और धैर्य

एक बार भगवान बुद्ध अपने अनुयायियों के साथ किसी गांव में उपदेश देने जा रहे थे। उस गांव से पूर्व ही मार्ग में उन लोगों को जगह-जगह बहुत सारे गड्ढे़ खुदे हुए मिले। बुद्ध के एक शिष्य ने उन गड्ढों को देखकर जिज्ञासा प्रकट की, आखिर इस तरह गड्ढे़ का खुदे होने का तात्पर्य क्या है?

बुद्ध बोले, पानी की तलाश में किसी व्यक्ति ने इतनें गड्ढे़ खोदे है। यदि वह धैर्यपूर्वक एक ही स्थान पर गड्ढे़ खोदता तो उसे पानी अवश्य मिल जाता, पर वह थोडी देर गड्ढ़ा खोदता और पानी न मिलने पर दूसरा गड्ढ़ा खोदना शुरू कर देता।

व्यक्ति को परिश्रम करने के साथ धैर्य भी रखना चाहिए।

बुद्ध की सीख

भगवान बुद्ध सदविचारों का प्रचार करने के बाद राजग्रह लौटे लेकिन नगर में सन्नाटा था। उनके अनुयायी ने उन्हें बताया भगवन एक राक्षसी को बच्चों का मांस खाने की लत लग गयी है। नगर के अनेक बच्चे गायब हो गये है। इससे नागरिकों ने या तो नगर छोड दिया हैं या वे अपने घरों में दुबके बैठे है।

भगवान बुद्ध को यह भी पता चला कि उस राक्षसी के कईं बच्चे है। एक दिन बुद्ध राक्षसी की अनुपस्थिति में खेल के बहाने उसके छोटे बच्चे ओ अपने साथ ले आये। राक्षसी जब घर लौटी तो अपने बच्चे को गायब पाकर बैचेन हो उठी, सबसे छोटा होने के कारण उसका उस बालक से अधिक लगाव था।। बैचेनी में ही उसने अपनी रात काटी सुबह जोर-जोर से उसका नाम पुकार कर उसे ढूंढने लगी।

विछोह के दर्द से वह तडप रही थी। । अचानक उसे सामने से बुद्ध गुजरते हुए दिखाई दिये। उसने सोचा कि बुद्ध सच्चे संत हैं जरूर अतंर्यामी होंगे। वह उनके पैरों में गिरकर बोली – भगवन मेरा बच्चा कहां हैं यह बताईये। उसे कोई हिसंक पशु न खा पाये ऐसा आशीर्वाद दिजिए।

बुद्ध ने कहा- इस नगर के अनेक बच्चो को तुमने खा लिया, कितनी ही इकलौती संतानों को भी तुमने नही बक्शा है। क्या तुमने कभी सोचा कि उनके माता पिता कैसे जिन्दा रह रहे होंगे? बुद्ध के वचन सुनकर वह पश्ताप की अग्नि में जलने लगी। उसने संकल्प किया कि अब वह हिंसा नही करेगी। भगवान बुद्ध ने उसे समझाया कि वास्तविक सुख दूसरों को दुख देने या दूसरों का रक्त बहाने में नहीं अपितु उन्हें सुख देने में है। उन्होंने उसका बच्चा उसे वापस कर दिया।

मारने वाले से बचाने वाले का अधिक अधिकार

एक दिन राजकुमार सिद्धार्थ अपने चचेरे भाई देवदत्त के साथ बाग में घुमने के लिए गये। जहां सिद्धार्थ कोमल हृदय का बालक था वहीं देवदत्त झगडालु व कठोर स्वभाव का था। सिद्धार्थ की सभी प्रशंसा करते थे। देवदत्त की प्रशंसा कोई नहीं करता था।

इसलिए देवदत्त मन ही मन सिद्धार्थ से जलता था। जहाँ वे दोनां घुम रहे थे, उनसे थोडी ही दूरी पर एक हंस उड रहा था। उस हंस को देखकर सिद्धार्थ बहुत प्रसन्न हो रहा था। तभी देवदत्त ने कमान पर तीर चढाया और हंस की ओर छोड दिया। तीर सीधा जाकर हंस को लगा। वह घायल हो गया और छटपटा कर नीचे गिर पडा।

सिद्धार्थ ने दौडकर उस घायल हंस को उठाया। उसने हंस के घायल शरीर से बह रहे लहु को साफ किया। और उसे पानी पिलाया, तभी देवदत्त वहां आ पहुंचा। उसने क्रोध से सिद्धार्थ की ओर देखा और बोला- इस हंस को चुपचाप मुझे दे दो सिद्धार्थ इसे मैंने तीर मारकर नीचे गिराया है। नहीं! सिद्धार्थ ने हंस की पीठ सहलाते हुए उत्तर दिया- मैं इस हंस को तुम्हे नही दे सकता।

तुम निर्दयी हो तुमने इस निर्दोष हंस पर तीर चलाया है। यदि मैं इसे न बचाता तो इस बेचारे की जान चली जाती । देखो सिद्धार्थ! देवदत्त उसे घुरकर बोला यह हंस मेरा है। इसे मैंने तीर मारकर नीचे गिराया है। इसे चुपचाप मुझे देदो। यदि नहीं दोगे तो मैं राज दरबार में जाकर तुम्हारी शिकायत करूंगा।

सिद्धार्थ ने उसे हंस देने से साफ-साफ़ मना कर दिया। देवदत्त राजा शुद्धोदन के दरबार में जा पहुचा। और सिद्धार्थ की शिकायत की। शुद्धोदन ने उसकी शिकायत को ध्यानपूर्वक सुना फिर सिद्धार्थ को बुलावा भेजा। कुछ ही देर में सिद्धार्थ हंस को लेकर राज दरबार में उपस्थित हो गया। राज दरबार के उचे सिंहासन पर राजा शुद्धोदन बैठे थे आसपास के नीचे आसनो पर राज्यमंत्री, तथा अन्य पदाधिकारी बैठे थे।

कई सैनिक हथियार लिए द्वार के निकट खडे थे। शुद्धोदन के संकेत करने पर देवदत सिर झुकाकर बोला- महाराज! जो हंस इस समय सिद्धार्थ के पास हैं वह मेरा हैं, इसे मैंने तीर मारकर प्रथ्वी पर गिराया था। सिद्धार्थ ने इसे उठाकर इस पर अपना अधिकार कर लिया है। यह हंस मेरा हैं कृपया इसे मुझे दिलाया जाये। राजा शुद्धोदन ने सिद्धार्थ की ओर देखा और बोलने की ओर संकेत दिया।

सिद्धार्थ ने सिर झुकाकर शांत स्वर में कहा- महाराज! यह हंस निर्दोष हैं यह बिना किसी को कोई कष्ट दिये उडा जा रहा था, देवदत्त ने इसे तीर मारकर घायल कर दिया। मैंने इसका उपचार किया है। इसके प्राण बचाये है। मैं समझता हूं कि प्राण लेने वाले से अधिक प्राण बचाने वाले का अधिकार होता है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूं कि यह हंस मेरे पास ही रहने दिया जाये। मैं इसे बिलकुल स्वस्थ करके आकाश में उडा देना चाहता हूं।

शुद्धोदन ने अपने सभा-सदों से विचारविमर्श किया। वे सभी एक ही स्वर में बोले महाराज! राजकुमार सिद्धार्थ का कहना बिलकुल ठीक है। जीवन लेने वाले से बचाने वाले का अधिक अधिकार होता है। अतः हंस राजकुमार सिद्धार्थ के पास ही रहने देना चाहिए। राजा शुद्धोदन ने सभासदों की बात मान ली । उन्होंने सिद्धार्थ से कहा- इस हंस पर तुम्हारा अधिकार हैं, तुम इसे ले जा सकते हो।

अछूत व्यक्ति

एक दिन गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एकदम शांत बैठे हुए थे। उन्हें इस प्रकार बैठे हुए देख उनके शिष्य चिंतित हुए कि कहीं वे अस्वस्थ तो नहीं हैं। एक शिष्य ने उनसे पूछा कि- ‘आज वह मौन क्यों बैठे हैं। क्या शिष्यों से कोई गलती हो गई है ?’

इसी बीच एक अन्य शिष्य ने पूछा कि क्या वह अस्वस्थ हैं ? पर बुद्ध मौन रहे। तभी कुछ दूर खड़ा व्यक्ति जोर से चिल्लाया, ‘आज मुझे सभा में बैठने की अनुमति क्यों नहीं दी गई है ?’ बुद्ध आँखें बंद करके ध्यान मग्न हो गए। वह व्यक्ति फिर से चिल्लाया, ‘मुझे प्रवेश की अनुमति क्यों नहीं मिली ?’ इस बीच एक उदार शिष्य ने उसका पक्ष लेते हुए कहा कि उसे सभा में आने की अनुमति प्रदान की जाये।

बुद्ध ने आखें खोली और बोले, ‘नहीं वह अछूत है, उसे आज्ञा नहीं दी जा सकती। यह सुन शिष्यों को बड़ा आश्चर्य हुआ।’ बुद्ध उनके मन का भाव समझ गए और बोले, ‘हाँ वह अछूत है।’ इस पर कई शिष्य बोले कि- हमारे धर्म में तो जात-पांत का कोई भेद ही नहीं, फिर वह अछूत कैसे हो गया ?

तब बुद्ध ने समझाया, ‘आज वह क्रोधित हो कर आया है। क्रोध से जीवन की एकाग्रता भंग होती है। क्रोधी व्यक्ति प्रायः मानसिक हिंसा कर बैठता है। इसलिए वह जबतक क्रोध में रहता है तब तक अछूत होता है। इसलिए उसे कुछ समय एकांत में ही खड़े रहना चाहिए।’ क्रोधित शिष्य भी बुद्ध की बातें सुन रहा था, पश्चाताप की अग्नि में तपकर वह समझ चुका था की अहिंसा ही महान कर्तव्य व परम धर्म वह बुद्ध के चरणों में गिर पड़ा और कभी क्रोध न करने की शपथ ली।

आशय यह कि क्रोध के कारण व्यक्ति अनर्थ कर बैठता है और बाद में उसे पश्चाताप होता है। इसलिए हमें क्रोध नहीं करना चाहिए। असल मायने में क्रोधित व्यक्ति अछूत हो जाता है और उसे अकेला ही छोड़ देना चाहिए। क्रोध करने से तन, मन, धन तीनों की हानि होती है।

क्रोध से ज्यादा हानिकारक कोई और वस्तु नहीं है। बुद्ध ने कहा भी है क्रोध को पाले रखना गर्म कोयले को किसी और पर फेंकने की नीयत से पकडे रहने के समान है. इसमें आप ही जलते हैं।

ऐसा सभी के साथ होता है

एक दिन सिद्धार्थ ने अपने सारथी छंदक को नगर भ्रमण के लिए चलने को कहा, छंदक ने तुरंत राजकुमार के प्रिय घोडे कंथक को तैयार किया। उस पर राजकुमार को सवार कराकर वह नगर-भ्रमण के लिए चल पडा।

राजा शुद्धोधन ने ऐसा प्रंबध कराया था कि राजकुमार को मार्ग में काई करूणाजनक दृष्य दिखाई न दे, ताकि उसके मन में विरक्ति की भावना उत्पन्न न हो। जिस मार्ग से उन्हें जाना था, उसे स्वच्छ करके सजाया गया था। उस मार्ग पर दोनों ओर सुन्दर-सुन्दर लडकेलडकियां खडे थे। जब सिद्धार्थ उनके पास से गुजरते तो वे उन पर फूल बरसाते।

कहीं दुख या कष्ट का नाम भी दिखाई नही दे रहा था। राजकुमार सिद्धार्थ भी उस समय प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। एका-एक उनकी दृष्टि कहीं दूर उठ गई। एक झुकी हुई कमर वाला वृद्ध व्यक्ति उन्हीं की ओर चला आ रहा था। उसका मुंह झुर्रियों से भरा हुआ था आंखे अन्दर को धंसी हुइ थी। हाथ-पैर कांप रहे थे। वह लाठी का सहारा लेकर बडी मुश्किल से चल पा रहा था।

जरा उधर देखों छंदक सिद्धार्थ ने उस वृद्ध की ओर संकेत करते हुए कहा- उस आदमी की ओर जिसकी कमर झुकी हुई है। मुझे बताओं की उसे क्या हो गया है ? वह इतना असुंदर क्यों है ? वह ठीक से चल क्यो नही पा रहा? राजकुमार! छंदक ने उत्तर दिया – वह व्यक्ति बुढा हो गया है। उसकी आयु अधिक हो गयी है। अधिक आयु हो जाने पर व्यक्ति ऐसा ही हो जाता है।

तो क्या आयु अधिक हो जाने पर मैं और यशोधरा भी ऐसे ही हो जायेंगे ? सिद्धार्थ ने चिंतित स्वर में पूछा- हम भी बुढे हो जायेंगे ? हम भी असुंदर हो जायेंगे ? हम भी ठीक से नहीं चल पायेंगे ? सच यही हैं राजकुमार! छंदक ने उत्तर दिया – ऐसा सभी के साथ होता है। बुढा हो जाने पर मनुष्य की यही दषा होती है। शरीर इसी प्रकार कमजोर और असुंदर हो जाता है।

सिद्धार्थ की सारी प्रसन्नता छू मन्तर हो गयी। उन्होंने छंदक को महल लौट चलने की आज्ञा दी। जब सिद्धार्थ अपने महल पहुंचे तो उन्होंने यशोधरा को अपनी प्रतिक्षा करते हुए पाया। उन्हें उदास देखकर यशोधरा ने पूछा- क्या बात है। स्वामी! क्या आप थक गये है ?

नहीं यषोधरा! सिद्धार्थ ने एक लंबी सास लेकर उत्तर दिया- मैं थका हुआ नहीं हू। बात यह हैं कि आज मैंने एक ऐसे व्यक्ति को देखा जो बहुत कमजोर था। उसका पूरा शरीर कांप रहा था, उसकी आंखें झुकी हुई थी, और वह असुंदर हो गया था। छंदक कहता है, वह बुढ हो । चुका है, बुढा हो जने पर ऐसा ही होता है, यह देखकर मेरा मन उदास हो गया। इस प्रकार तो मेरी दषा भी आगे चलकर ऐसी ही हो जायेगी।

आप व्यर्थ ही दुखी हो रहे है। यशोधरा ने कहा- छोडिए इस बात को! आप अपने मनोरंजन कक्ष में जाईये पिताजी ने आपके मनोरंज के लिए ख़ास नर्तकी और गायिका को बुलाया है। आप वहां जाकर मनोरंजन कीजिये आपकी सारी उदासी दूर हो जायेगी। यशोधरा की बात मानकर सिद्धार्थ मनोरंजन कक्ष में चले गये। वहां नर्तकी और गायिका ने अपनी कला का भरपूर प्रदर्शन किया।

उन्होंने सिद्धार्थ की उदासी को दूर करने का पूरा-पूरा प्रयास किया, लेकिन सिद्धार्थ की उदासी दूर न हुई। उनकी आंखों के सामने रह-रह कर वही वृद्ध व्यक्ति घुम रहा था। जिसे उसने मार्ग में देखा था। वह बार-बार यह सोच रहा था कि क्या बुढा होने से बचने का कोई उपाय नही है? कुछ दिनों बाद अचानक सिद्धार्थ ने पुनः भ्रमण की इच्छा व्यक्त की इस बार छंदक एक रथ सजाकर ले आया।

रथ पर सवार होकर सिद्धार्थ पुनः नगर की ओर भ्रमण की ओर चल पडे। इस बार छंदक पूरा प्रयास कर रहा था कि राजकुमार को कोई करूणाजनक दृष्य दिखाई न दे, लेकिन जो होना होता हैं, वह होकर ही रहता है। मार्ग में सिद्धार्थ को एक रोगी व्यक्ति दिखाई दिया, वह रोग के कारण कराह रहा था

सिद्धार्थ ने तत्काल रथ रूकवाया और छंदक से पूछा – इसे क्या हो गया है। यह इस प्रकार कराह क्यो रहा है ? राजकुमार! छंदक ने उत्तर दिया- इसे रोग ने घेर रखा है। यह रोग के कष्ट को सहन नहीं कर पा रहा। इसी कारण कराह रहा है। परन्तु इसे रोग ने क्यों घेर लिया ? सिद्धार्थ ने आश्चर्य से पूछा।

छंदक ने उत्तर दिया- रोग तो बडे-बडे स्वस्थ व्यक्तियों को भी घेर लेता है। उन्हें भी रूला देता है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। अपने जीवन काल में कोई न कोई रोग लगभग प्रत्येक व्यक्ति को हो जाता है। ओह! सिद्धार्थ बडबडाये- तो रोग भी मनुष्य को कष्ट पहुंचाते है। । इनसे भी मनुष्य नही बच सकता, मैं भी नहीं बच सकूँगा, जब मुझे भी कोई रोग हो जायेगा तो मै इसी तरह दर्द से कराहूंगा।

छंदक ने रथ को आगे बडाया, थोडा आगे चलने पर सिद्धार्थ को एक शव यात्रा जाती हुई दिखाई दी। उन्होंने पुनः छंदक से प्रश्न किया- यह कैसा दृष्य है ? चार व्यक्ति अपने कंधों पर किसे लेकर जा रहे हैं ? इनके पीछे कुछ लोग रोते हुए क्यो जा रहे है ? राजकुमार! छंदक ने उत्तर दिया- यह व्यक्ति मर गया है, यह चारों इसके संबधी है, ये इसके शव को उठाकर शमशान मै ले जार रहे है, जो पीछे-पीछे रोते हुए जा रहे है, वे इसके कुटंब के लोग है। शमशान में इस मृतक शरीर को जला दिया जायेगा।

यह व्यक्ति मर क्यो गया ? सिद्धार्थ ने अगला प्रश्न किया। छंदक ने कहा- मृत्यु इस संसार का एक अटल सत्य है, मृत्यु ने आज तक किसी को नही छोडा। कोई भी व्यक्ति किसी भी समय मर सकता है

यह सुनकर सिद्धार्थ का दिमाग घुम गया। वह ठण्डी सांस लेकर सोचने लगे – क्या इसी को जीवन कहते है ? जिसमें मनुष्य को तरहतरह के रोग घेर लेते है, जिसमे कभी भी मृत्यु का आगमन हो सकता है। मनुष्य जब बूढा हो जाता है। तो वह दूर्बल और असहाय हो जाता है उसके शरीर को जलाकर भस्म कर दिया जाता है। क्या जीवन के इन भयानक दुखों से छुटकारा नही मिल सकता ?

इसका कोई तो उपाय होगा? सिद्धार्थ मन ही मन ऐसा सोच रहे थे कि तभी उन्हें एक संन्यासी दिखाई दिया, उसने भगवा वेष धारण कर रखा था। साधना और तपस्या के करण उसका मुख मण्डल चमक रहा था। उसके होंठ मुस्कुरा रहे थे। सिद्धार्थ को वह संसार का सबसे प्रसन्न व्यक्ति दिखाई दिया।

उन्होंने पूछा- छंदक यह स्वस्थ और तेजस्वी व्यक्ति कौन है ? छंदक ने उत्तर दिया- यह एक सन्यासी है। इसने संसार के सभी सुख त्याग रखें है। इसने संयम द्वारा अपनी इंद्रियो को वश में कर रखा है। यह अपने ईश्वर की तपस्या साधना करता है। इसलिए यह स्वस्थ निरोग व सुंदर है। तपस्या के कारण ही इसका मुखमण्डल चमक रहा है।

सिद्धार्थ को जैसे अपने सभी प्रश्नों के उत्तर मिल गये।

वह एकदम शांत हो गये। उस संन्यासी के दर्शन मात्र से ही। उसके मन का सारा क्लेष दूर हो गया। उसने मन ही मन सोचा – रोग, बुढापा तथा जन्म – मरण के कष्ठ से छुटकारा पाने का उपाय संयम, त्याग तथा तपस्या है। जीवन का सार सत्य की खोज करना है। संसार के सभी सुख नकली है।, मैं अब इन झुठे सुखों में नही फंसूगा मैं उस तेजस्वी संन्यासी की तरह बनूंगा।

रथ अपने पूरे वेग से दौडता रहा, और उससे भी अधिक वेग से दौडता रहा सिद्धार्थ का मन। उसे बार-बार उस संन्यासी का ध्यान आता था। । उनके मन में विरक्ती की भावना बढती ही जा रही थी। जब सिद्धार्थ राजमहल में लौटे तो उन्हें एक शुभ समाचार मिला, यशोधरा ने स्वस्थ व सुंदर पुत्र को जन्म दिया था।

दास-दासियों ने सिद्धार्थ को घेर लिया और उन्हें बधाईयां देने लगी ‘उन्हें यह आशा थी कि सिद्धार्थ से उन्हें पुरस्कार मिलेगा लेकिन । सिद्धार्थ पर इस शुभ सूचना का कोई प्रभाव दिखाई न दिया। चारों ओर हर्ष का सागर लहरा रहा था। पूरे राजमहल में बाधाईयों के स्वर गूंज रहे थे। वहां राजा शुद्धोधन व रानी प्रजावति तो प्रसन्नता से पागल हुए जा रहे थे। वे बधाई देने वाले को मुंह मांगा पुरस्कार दे रहे थे।

कपिलवस्तु में नये राजकुमार के जन्म लेने के उपलक्ष्य में नाच गाने व उत्सव होने लगे। लेकिन सिद्धार्थ को उनमें कोई रूचि न थी। वह उदास, अपने भवन में घूम रहे थे। उनके मन में संघर्ष चल रहा था, वे किसी भी उत्सव में सम्मिलित नही हुए। अपने नवजात पुत्र से भी मिलकर सिद्धार्थ को प्रसन्नता न हुई। उनका मन सब कुछ त्यागकर शान्ति व सत्य की खोज करना चाहता था।

एक रात आषाढ़ की पूर्णिमा का चन्द्रमा प्रथ्वी पर अपनी शीतल चांदनी बिखेर रहा था, राजभवन मे यशोधरा अपने पुत्र को छाती से लिपटाये सुख की निद्रा सो रही थी, दासीयां भी अपना कार्य समाप्त करके गहरी निद्रा का आनन्द ले रही थी। सिद्धार्थ अपने बिस्तर से एकाएक उठ खडे हुए। और भवन से बाहर चले गये।

भवन से बाहर निकलकर वह सहसा ठिठके उनके मन मे एक बार यशोधरा व राहुल को देखने की इच्छा उत्पन्न हुई वह वापस जाने के लिए मुडे, परन्तु जिस प्रकार कोई सर्प अपनी केंचुली का उतार कर उसकी ओर नही देखता वैसे ही सिद्धार्थ ने भी अपने मोह को एक ही झटके से त्याग दिया। धीरे-धीरे चलते हुए सिद्धार्थ वहां जा पहुंचे जहां उनका सारथी छंदक सो रहा था। सिद्धार्थ ने उसे जगाया।

छंदक ने चोंक कर अपनी आंखे खोली व निकट बंधे कंथक घोडे ने भी हिनहिना कर सिद्धार्थ की ओर देखा राजकुमार! छंदक ने नम्रता से आष्चर्य से कहा- आप और यहां ? वह भी रात के इस समय, सबकुछ ठीक तो हैं न ? छंदक! सिद्धार्थ ने आदेश दिया- तुरन्त रथ तैयार करों मैं इसी समय राजभवन से बाहर जाना चाहता हूं।

छंदक ने ध्यानपूर्वक सिद्धार्थ की ओर देखा वह कुछ पूछना चाहता था।, परन्तु पूछने का साहस न कर सका, रथ को तैयार करके वह सिद्धार्थ के निकट ले आया। सिद्धार्थ रथ पर सवार हुए तथा छंदक को नगर से बाहर वन की ओर चलने के लिए कहा। चारों और गहरा अंधकार था, वहां सन्नाटा छाया हुआ था।

जंगली जीव-जंतुओं की आवाजे कभी-कभी सन्नाटे को भंग कर देती, वातावरण बहुत डरावना हो जाता। घने जंगल के निकट स्द्धिार्थ ने छंदक को रथ रोकने का आदेश दिया। रथ रूकते ही सिद्धार्थ नीचे उतर आये। सामने ही यमुना नदि अपने पूरे वेग से बह रही थी। उस समय वे अनुप्रिय नामक स्थान के निकट खडे थे। सिद्धार्थ ने अपनी राजसी वेशभूषा उतार दी।

साथ ही उन्होंने एक-एक करके अपने आभूषण भी उतार दिये। अपने वस्त्र व आभुषण उन्होंने छंदक को दे दिये। तथा लौट जाने का आदेश दिया। छंदक सिद्धार्थ के पैरों में गिरकर फुट-फूट कर रोने लगा वह हाथ जोडकर कहने लगा-यह आप क्या कर रहे हैं राजकुमार। जब आपके माताजी व पिताजी को आपके संन्यासी बन जाने की बात का पता चलेगा तो उन पर दुखों का पहाड़ टूट पडेगा। रानी यशोधरा पर क्या बितेगी? आप अपना निर्णय बदल लिजिए। मेरे साथ राजमहल लौट चलिए।

नहीं छंदक! सिद्धार्थ ने सुंदर व सुंगधित बालों को काटकर कहा मैं अब नहीं लौटूंगा। मैंने सोच विचार करके ही यह निर्णय लिया है। मैं सत्य व ज्ञान का मार्ग खोजना चाहता हूं। जिससे मानव शान्ति पा सके। तुम आंसू पोछ लो और राजभवन लौट जाओ। छंदक को सिद्धार्थ की आज्ञा का पालन करना पडा। उसने सिद्धार्थ क चरण स्पर्श किये उनके कीमती वस्त्रों व आभुषणों को रथ में रखा और कपिलवस्तु की और चल पडा।

जिस समय छंदक राजभवन मे लौटा सुबह का प्रकाश चारों और फैल चुका था। राजा शुद्धोधन बाग में भ्रमण कर रहे थे। जब उन्होंने सिद्धार्थ का खाली रथ देखा तो उनके माथे पर बल पड गये।

उन्होंने क्रोध से छंदकी ओर देखा और पूछा तुम बिना बतायें सिद्धार्थ का कहां ले गये थे, वह इस समय कहां है ? छंदक ने रोते हुए वह पूरी बात बता दी। फिर रथ से सिद्धार्थ के कीमती वस्त्र व आभूषण लाकर उन्हें सौंप दिये।

शुद्धोधन उन वस्त्र आभूषणों को छाती से लिपटाकर फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने कहा विद्वान पंडितो व ज्योतिषियों की भविष्यवाणी ‘आज सच हो गई। मेरा बेटा संसार के सभी सुखों को ठुकरा कर । संन्यासी बनने चला गया। रानी प्रजावति को जब इस बात की सुचना मिली तो वह पछाड़ खा कर गिर पडी। जब यशोधरा तो पता चला तो वह भी इस बात को सहन न कर सकी। वह विलाप करने लगी। हैं स्वामी तुम बिना कहे ही घर छोडकर चले गये मुझसे कम से कम एक बार मिल तो लेते।

क्या मैं इस योग्य भी

गये मुझसे कम से कम एक बार मिल तो लेते। क्या मैं इस योग्य भी नही थी। क्या तुम्हे अपने छोटे से पूत्र का भी धन नही आया। कम से कम उससे तो मिलकर जाते। इसके बाद यशोधरा ने भी राजसी वेशभूषा उतार फैंकी केवल सुहाग चिन्हों को छोडकर उसने सभी

आभूषणों का त्याग कर दिया। वह साधारण भोजन करती तथा प्रथ्वी पर सोती उसकी यह दशा देखकर प्रजावति बहुत दुखी होती। वह यशोधरा को छाती से लगाकर रो पडती। और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखने के लिए कहती। यह तेरे खेलने खाने की आयु हैं बहू वे यशोधरा से कहती- परन्तु तुने तो सिद्धार्थ की तरह ही संसार के सभी सुख छोड दिये।

क्या यह ठीक है ? इस तरह रहने से क्या तुम बिमार नही पड जाओगी ? तब राहुल की देखभाल कौन करेगा ? माताजी यशोधरा उत्तर देती – मेरे पति अब संन्यासी बन चुके है। वे प्रथ्वी पर शयन करेंगे तथा जंगली फूल फलों का भोजन करेंगे ऐसे मैं भला राजभवन में सुख के साथ कैंसे रह सकती हूं। आप कृपया दुखी न हो राहुल मे ही इसके पिताजी की छवी को देखें। इससे आपको शांति मिलेगी।

प्रजावती राहुल को छाती से लिपटाकर रो पड़ी। सिद्धार्थ के चले जाने के बाद कपिलवस्तु का हर व्यक्ति उदास हो गया। राजमहल में तो दुख का साम्राज्य ही स्थापित हो गया ऐसे में केवल नन्हे राहुल की लिकारीयां ही राजमहल में गूंजती तथा सबका मन बहलाती।

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