दोस्तों आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ गोनू झा की कहानियाँ शेयर करने जा रहे है।यह कहानियाँ बहुत मजेदार है। दोस्तों आप इन stories को पूरा पढ़े आपको बुहत मजा आएगा।

Gonu Jha Stories

Gonu Jha Stories in Hindi List

गोनू झा की कुश्ती

बिना जड़ का पेड़

नहले पे दहला

शेर का दूध

गोनू झा और मीठा महाभोज

लेने के देने

गोनू झा की चतुराई

गोनू झा की शिकारी बिल्ली

अंतिम उपदेश

स्वर्ग से बुलावा

इनाम का साझीदार

पंडित, नाई और गोनू झा

गोनू झा का शास्त्रार्थ

ग्रह-दोष निवारण

गोनू झा और पड़ोसी का बछड़ा

गोनू झा की कुश्ती

एक बार मिथिला के राजदरबार में दिल्ली का एक पहलवान आया।

वह सात फुट ऊँचा भारी डील-डौल वाला, मजबूत शरीर वाला पहलवान था जिसकी बांहों की मछलियां देखते ही बनती थी।

मिथिलानरेश कला के बहुत प्रेमी थे। पहलवान को दरबार में बड़े आदर के साथ लाया गया।

महाराज ने उसका स्वागत किया।

मिथिला नरेश! पहलवान गर्वीली वाली में बोला - मैं दिल्ली से आया हूँ और मेरा नाम ज्वालासिंह है।

दिल्ली में मेरे मुकाबले का कोई भी पहलवान नहीं है। मैं आसपास के राज्यों के सभी पहलवानों को कुश्ती में पछाड़ चुका हूँ और अब मिथिला आया हूँ। मैंने सुना है कि आपके राज्य में एक से बढ़कर एक मल्ल है।

तनिक मैं भी तो देखू कि मुझे कोई टक्कर दे सकता है या नहीं।

मल्ल ज्वालासिंह, हमें यह जानकर तो ख़ुशी हुआ कि तुम्हें अपनी शक्ति का घमंड है।

तुम यह क्यों भूल जाते हो कि संसार में हर कला का एक से बड़ा एक मर्मज्ञ पाया जाता है।

मिथिला नरेश ने कहा।

महाराज द्वंद्वकला में मुझे आज तक कोई ऐसा नहीं मिला जो मुझे पराजित कर सके। ज्वालासिंह बोला। अवश्य ऐसी ही बात होगी पर इसका अर्थ यह तो नहीं कि तुम कभी भी पराजित नहीं हो सकते . मुझे तो यही लगता है।

फिर ठीक है कल प्रातः अखाड़े में तुम्हारी भुजाओं की शक्ति और पैतरों का आकलन होगा। मिथिला नरेश ने कहा। और अगले दिन अखाड़े में ज्वालासिंह गरज रहा था।

मिथिला के कई मल्ल उससे द्वंद्वयुद्ध को तैयार थे। राजा के आते ही पहली कुश्ती शुरू हो गई।

ज्वालासिंह वास्तव में गजब का पहलवान था। उसने क्षण भर में प्रतिद्वंद्वी को चित कर दिया।

और उसके बाद तो मिथिला के चार और पहलवान उसके सामने घुटने टेक चुके थे।

अब मिथिला सम्मान खतरे में था। राजा चिंतित थे। उसे दिन ज्वालासिंह को राजा की आज्ञा से शाही मेहमान बनाकर भांति-भांति का भोजन कराया गया।

दूसरे दिन तो और भी गजब हुआ। मिथिला का कोई भी मल्ल ज्वालासिंह से भिड़ने को तैयार ही नहीं था। अब महाराज समझ गए कि मिथिला का सम्मान कोई नहीं बचा सकेगा।

उनके चेहरे पर उदासी छा गई और वह सब दरबारियों की तरफ देखने लगे।

क्या मिथिला में कोई ऐसा मल्ल नहीं जो ज्वालासिंह के दर्प को चूर-चूर कर सके। क्या हमने अपने मल्लों को व्यर्थ ही घी-दूध आदि खिलाया है। इस प्रकार तो मिथिला का सम्मान नहीं बचेगा।

दरबार में गोनू झा भी थे। उन्हें महाराज की उदासी देखकर अच्छा नहीं लगा। अब उन्हें कुछ सोचना होगा।

महाराज, मैं ज्वालासिंह से मल्ल्युद्ध करूंगा। गोनू झा गरजकर बोले - यद्यपि यह मेरा क्षेत्र नहीं है क्योंकि मैं बचपन में कुश्ती लड़ता था तो मुझ पर कोई जिन्न सवार हो जाता था।

प्रतिद्वंद्वी के हाथ-पैर टूट जाते थे। तन घरवालों ने मुझे कुश्ती लड़ने से रोक दिया। फिर बहुत दिनों बाद एक ज्योतिषी ने मुझे बताया कि मेरे हाथों में मानहत्या की रेखा है जो कभी लड़ते-भिड़ते मेरे हाथों होगी।

इसलिए मैं द्वंद्व नहीं करता पर आज बात मिथिला के सम्मान की है तो मैं अवश्य लडूंगा।

ज्वालासिंह भौंचक्का-सा उस कमजोर से आदमी को देख रहा था जो इतनी गरज के साथ चुनौती स्वीकार कर रहा था।

महाराज समझ गए कि गोनू झा बुद्धि का कोई प्रयोग करके उस पहलवान का गर्व चूर करना चाहता है।

हाँ भाई ज्वालासिंह। गोनू झा बोले - कुश्ती के तो विद्वान हो और सैकड़ों कुसगतियाँ जीती भी होगी। कुश्ती की सरगम तो जानते होंगे।

स....... सरगम! ज्वाला सिंह अचकचाया।

अरे, सरगम नहीं जानते कुश्ती की ? कैसे पहलवान हो ?

जानता हूँ न ! सब जानता हूँ। ज्वाला सिंह को कहना पड़ा। भरे दरबार में वह कैसे कह देता कि वह मल्ल होकर भी कुश्ती की सरगम नहीं जनता। होती होगी कोई ऐसी चीज। उसे क्या ? उठाकर दे मारेगा।

तो फिर कल हमारी कुश्ती पंचम स्वर, द्रुत लय और पटक ताल से होगी।

साथ ही कालभैरब राग में होगी। गोनू झा बोले।

ज्वाला सिंह ने सहमति में सिर तो हिला दिया पर उसका दिल लरज उठा। उसने आज तक उस तरिके से कुश्ती न लड़ी थी, जिस तरीके से उसका प्रतिद्वंद्वी बता रहा था वह तो एक भी न जानता था।

ज्वाला सिंह इसी उधेड़बुन में था। रात्रि का भोजन करने के बाद आराम कर रहा था कि दरबारी बोला-कल तो वास्तव में मजा आ जाएगा।

असली कुश्ती तो कल ही देखने को मिलेगी। गोनू झा पटक ताल में जरा कच्चे हैं पर द्रुत लय में उनका जवाब नहीं .आप पलक भी न झपकेंगे कि आपकी रीढ़ की हड्डी में दरार पद जाएगी। क्या गजब का पैंतरा है उनका।

ज्वाला सिंह ने होंठो पर जुबान फिराई।

आपने कहाँ सीखी यह मल्ल विद्या ?? दरबारी ने पूछा।

दिल्ली से ही।

हूँ। दिल्ली में दांव-पेंच तो सब सिखाए जाते हैं। पर जब तक लय, ताल का पता न चले तो क्या सीखा। गोनू झा तो राग काल भैरब के उस्ताद हैं। और कालभैरब तो आप खुद जानते हैं बड़े ही क्रोधी मल्ल है।

ज्वाला सिंह को तो कुछ सूझ ही नहीं रहा था ।

अब..... मुझे आराम करने दो। वह दरबारी से बोला - प्रातः जल्दी जागना है।

दरबारी हँसता हुआ वहां से चला गया।

सुबह अखाड़े में गोनू झा शेर की भांति गरज रहे थे। चारों तरफ भीड़ का कोलाहल था।

मिथिला नरेश अपनी गद्दी पर बैठे थे। पर दिल्ली के पहलवान ज्वाला सिंह का कहीं अता-पता नहीं था। सारे मिथिला में खोजने पर भी वह कहीं नहीं मिला।

महाराज समझ गए कि गोनू झा को विजेता घोषित कर दिया गया और ढेरों पुरस्कारों से नवाजा गया।

महाराज के पूछने पर गोनू झा ने हँसते हुए बताया कि उन्होंने ज्वाला सिंह को सुर,लाय,ताल की उलझन में तो डाल ही दिया था।

रात को एक विश्वस्त दरबारी द्वारा उसे इतना भयभीत कर दिया गया कि उसने भाग जाने में ही भलाई समझी।

महाराज प्रसन्न हो गए। मिथिला का सम्मान जो बच गया था।

बिना जड़ का पेड़

राजा के दरबार में एक व्यापारी संदूक के साथ पहुँचा। उसने गर्व से कहा, 'महाराज, मैं व्यापारी हूँ और बिना बीज एवं पानी के पेड़ उगाता हूँ। आपके लिए मैं एक अदभुत उपहार लाया हूँ, लेकिन आपके दरबार में एक-से-एक ज्ञानी-ध्यानी हैं, इसलिए पहले मुझे कोई यह बताए कि इस संदूक में क्या है? अगर बता देगा तो आपके यहाँ चाकरी करने को तैयार हूँ।

सभासद पंडितों, पुरोहितों और ज्योतिषियों की ओर देखने लगे, लेकिन उन लोगों ने सिर झुका लिए।

सभा में गोनू झा भी उपस्थित थे। उन्हें उसकी चुनौती स्वीकार करना आवश्यक लगा, अन्यथा दरबार की जग हॅंसाई होती। गोनू झा ने विश्वासपूर्वक कहा, मैं बता सकता हूँ कि संदूक में क्या है, लेकिन इसके लिए मुझे रातभर का समय चाहिए और व्यापारी को संदूक के साथ मेरे यहाँ ठहरना होगा। संदूक बदला न जाए, इसकी निगरानी के लिए हम रातभर जगे रहेंगे और व्यापारी चाहे तो पहरेदार भी रखवा सकते हैं।

सभी मान गए और व्यापारी गोनू झा के यहाँ चला गया।

रातभर दोनो संदूक की रखवाली करते रहे। रात काटनी थी, इसलिए किस्सा-कहानी भी चलती रही। बातचीत के क्रम में गोनू झा ने कहा, 'भाई, कुछ दिन पूर्व मुझे एक व्यापारी मिला था; उसने भी यही कहा था कि बिना बीज-पानी के पेड़ उगाता हूँ। पेड़ में भाँति-भाँति के फूल खिलते हैं, वह भी रात में। क्या आप भी रात में पेड़ उगाकर भाँति-भाँति के फूल खिला सकते हैं?

उसने अहंकार से कहा, क्यों नहीं! मेरे पेड़ रात में ही अच्छे लगते हैं और उनके रंग-बिरंगे फूल देखते ही बनते हैं।

यह सुनते ही गोनू झा की आँखों में चमक आ गई और वे निश्चिंत हो गए।

दूसरे दिन दोनों दरबार में उपस्थित हुए। गोनू झा ने जेब से कुछ आतिशबाजी निकालछोड़ी ।

सभासद झुँझला गए। महाराज की भी आँखे लाल-पीली हो गईं और कहा, 'गोनू झा, यह क्या बेवक्त की शहनाई बजा दी! सभा का सामान्य शिष्टाचार भी भूल गए?

गोनू झा ने वातावरण को सहज करते हुए कहा, 'महाराज, सर्वप्रथम धृष्टता के लिए क्षमा चाहता हूँ, लेकिन यह मेरी मजबूरी थी। इसी में व्यापारी भाई के रहस्यमय प्रश्न का उत्तर छुपा है। इसमें ही बिना जड़ के भाँति-भाँति के रंगों में फूल खिलते हैं।

व्यापारी अवाक रह गया। उसने सहमते हुए कहा, 'महाराज, इन्होंने मेरे गूढ प्रश्न का उत्तर दे दिया। फिर उसने विस्मयपूर्वक गोनू झा से पूछा, आपने कैसे जाना कि इसमें आतिशबाजी ही है?

गोनू झा ने सहजता से कहा, व्यापारी, जब आपने यह कहा कि बिना बीज-पानी के पेड़ उगते हैं और उनमें भाँति-भाँति के फूल खिलते हैं, तब तक तो मुझे संदेह रहा, परंतु मेरे पूछने पर यह कहा कि रात ही में आपकी यह फसल अच्छी लगती है, तब जरा भी संशय नहीं रहा कि इसमें आतिशबाजी छोड़ कुछ अन्य सामान नहीं होगा।

व्यापारी मनहूस हो गया। राजा ने कहा, 'व्यापारी, आपको दुःखी होने की जरूरत नहीं है। आप यहाँ रहने के लिए स्वतंत्र हैं, पर अपना कमाल रात में दिखाकर लोगों का मनोरंजन कीजिएगा। अगर प्रदर्शन प्रशंसनीय रहा तो पुरस्कार भी पाइएगा, पर अभी पुरस्कार के हकदार गोनू झा ही हैं।

नहले पे दहला

तीन घनिष्ठ मित्र बड़े ही गप्पी थे। उनमें एक दीवान का बेटा, दूसरा व्यापारी का पुत्र और तीसरा राजकुमार था।

एक दिन बातों ही बातों में तीनों में स्वयं को सबसे बड़ा गप्पी सिद्ध करने की शर्त लग गई और यह तय हुआ कि जो बात को झूठी कहेगा, उसे सौ रुपए दंड देना होगा।

सबसे पहले दीवान के पुत्र ने कहा, 'मेरे पितामह यहाँ के राजा थे और वर्तमान राजा का पिता उनका सेवक था।

यह सुनते ही राजा का बेटा उछल पड़ा 'यह झूठ है; यहाँ के राजा मेरे ही प्रपितामह, पितामह और मेरे पिता रहे हैं। मेरे पितामह कहीं किसी के यहाँ सेवक नहीं रहे।

दीवान के बेटे ने चहकते हुए कहा, अगर यह बात झूठ है तो लाओ सौ रुपए। राजकुमार को शर्त के अनुसार रुपए देने पड़े। अब व्यापारी के पुत्र की बारी आई। उसने गंभीर होते हुए कहा, उन दिनों यहाँ के राजा बहुत गरीब थे। एक बार वह अपने पौत्र के साथ मेरे दादा के यहाँ भीख माँगने पहुँचे।

इतना सुनना था कि राजकुमार ने झपटते हुए कहा, 'यह भी सरासर झूठ है। मेरे पितामह या पिता के साथ कभी ऎसी स्थिति नहीं आई।

व्यापारी के पुत्र ने प्रसन्नता से शर्त को स्मरण कराते हुए कहा, तब तुम हारे और मैं जीता, इसलिए लाओ सौ रुपए।

उसे भी रुपए देने पड़े। अब राजकुमार की बारी आई। उसने अनमने भाव से कहा, 'अभी मुझे घर जाना है; कल फिर हम लोग यहीं उपस्थित होंगे।

राजकुमार उधेड़बुन में पड़ा रहा कि कैसे झूठ का पुल बाँधा जाए, ताकि रुपए वापस हों। उसे कुछ स्मरण नहीं हो रहा था। अंत मे उसने गोनू झा से संपर्क किया। गोनू झा ने आश्वस्त करते हुए कहा, 'राजकुमार, यह तो बाऍं हाथ का खेल है; सिर्फ अपनी जगह मुझे कहानी कहने के लिए मनवा लेना।

उसके दोनों मित्रों को कोई एतराज न हुआ। गोनू झा साधारण वेशभूषा में पहुँचे थे। उन्होंने गप कहनी शुरू की, एक बार भीषण अकाल पड़ा। प्रजा अन्न के लिए त्राहि -त्राहि करने लगी। राजा कागज बनवा-बनवाकर अन्न देने लगे। तुम दोनों के दादा भी आए। राजा उन्हें एक-एक क्विंटल गेहूँ दे रहे थे, परंतु बहुत बार कहने पर दस-दस क्विंटल दे दिया। वे तो अब इस संसार में नहीं रहे। उनके पुत्र अथवा पौत्रों ने भी गेहूँ नहीं लौटाया। ऎसे कृतघ्न आज के लोग हो गए हैं। खैर, राजा के कागज दुरुस्त है; आज नहीं तो कल सधाना ही पड़ेगा।

इतना सुनते ही दीवान और व्यापारी के पुत्र उछले एक स्वर से कहा, 'यह बिल्कुल असत्य है। हमारे दादा अथवा पिता ने कभी इसकी चर्चा नहीं की।

गोनू झा ने हॅंसते हुए कहा, अगर झूठ है तो लाओ सौ-सौ रुपए और सत्य है तो गेहूँ ही चुकता करो।

दोनों ने रुपए देने में ही खैरियत समझी।

शेर का दूध

एक बार मिथिला नरेश को ईर्ष्य़ालु दरवारियों ने सुझाव देते हुए कहा, 'महाराज, शेर का दूध पिने से आप हृष्ट-पुष्ट हो जाएँगे।'

समस्या यह थी की दूध आएगा कहाँ से ? दुष्ट दरवारियों ने राजा को सलाह देते हुए कहा, 'महाराज, यह व्यवस्था गोनू झा अपने हितैषियों के लिए करते हैं।'

गोनू झा को फौरन बुलाया गया। उनके आने पर राजा बोले, 'गोनू झा, जो काम आपनों के लिए करते हैं, उसे मेरे लिए भी करना होगा।'

गोनू झा चौंके और बोले, 'महाराज, ऎसा कौन काम है?

राजा ने काम बताया। उन्होंने स्थिति की गंभीरता भाँपकर सहर्ष स्वीकार लिया और कहा, 'महाराज, दरबारियों ने ठीक ही कहा है; यह काम मैं कर दूँगा।'

घर आकर उन्होंने पत्नी को अपनी चिंता से अवगत कराया। दंपति ने समस्या के समाधान की योजना बनाई।

मध्य रात्रि के करीब राजमहल के पास जोर-जोर से कपड़े धोने की आवाज आने लगी। सभी की नींद उचट गई। राजा ने धोबी को पकड़कर लाने के लिए आदमी दौड़ाया ।

वह गोनू झा की पत्नी थीं। राजा ने आधी रात में कपड़े धोने का कारण जानना चाहा।

ओझाइन ने सकुचाते हुए कहा, 'महाराज, उन्हें शाम से ही प्रसव-पीड़ा हो रही थी और अभी उन्होंने एक शिशु को जन्म दिया है। इसी कारण इस समय कपड़ा धोना पड़ रहा है।'

राजा ने विस्मय से कहा, बिलकुल असंभव! पुरुष ने कहीं बच्चा जना है?

ओझाइन ने क्षमा-याचना करते हुए कहा, महाराज, जब शेर को दूध हो सकता है, तब पुरुष क्यों नहीं शिशु जन सकता है?

महाराज को कटो तो खून नहीं। उसे अपनी अज्ञानता का बोध हो गया और सुबह गोनू झा के सामने उन दरबारियों को डाँट पिलाई।

गोनू झा और मीठा महाभोज

आज से लगभग पांच सौ पहले मिथिला राज्य में भरौरा नाम का एक गाँव था। इसी गावं में एक ब्राह्मण परिवार रहता था।

परिवार में विधवा ब्राह्मणी और उसके दो पुत्र थे। बड़े पुत्र का नाम गोनू और छोटे पुत्र का नाम भोनू था। गोनू बड़ा ही चतुर, हाजिरजवाब और प्रखर बुद्धि का युवक था।

सारे गाँव में उसकी अक्लमंदी की चर्चा रहती थी। उसने पिता की मृत्यु के बाद घर की सारी जिम्मेदारी संभाल रखी थी। थोड़ी-सी खेती में ही घर का ठीक प्रकार गुजरा हो जाता था।

वृद्धा माँ अपने बड़े बेटे की बुद्धि और परिश्रम से प्रसन्न रहती थी।

माँ को अपने छोटे बेटे की बड़ी फ़िक्र होती थी। उसे लगता था कि उसके बाद उसका भोनू जाने कैसे रहेगा। इस बारे में उसने एक दिन गोनू से बात की। बेटा गोनू, अब मेरी उम्र हो चुकी है। भगवान के घर से कभी भी बुलावा आ सकता है।

माँ ने उदास होते हुए कहा - बेटा मुझे तेरी फ़िक्र तो नहीं है। ईश्वर की दया से तेरे पास बुद्धिबल है जो किसी भी परिस्थिति में इंसान का साथ नहीं छोड़ती। मगर भोनू की फ़िक्र है। वह साधारण बुद्धि का लड़का है।

माँ तू बबुआ की फ़िक्र क्यों करती है। मैं हूँ ना। मेरा भरोसा कर। बबुआ को मेरे जीते जी कोई परेशानी नहीं होगी। गोनू ने कहा।

भगवान तुझे सदा खुश रखे बेटा ! अब मैं चैन से मर सकूंगी। वृद्धा की आँखों में संतोष के भाव आए। कुछ दिनों बाद गोनू का विवाह हो गया। उनकी पत्नी बड़ी ही सुशिल सुघड़ और पतिव्रता स्त्री थी।

स्वयं गोनू भी धार्मिक प्रवृत्ति के थे। वह काली माँ के उपासक थे और नित्य-प्रति पूजा करते थे। सारा गाँव कहता था कि गोनू झा को माँ काली की कृपा से ही इतना बुद्धि प्राप्त हुई है। अपनी छोटी-मोटी सभी समस्या लेकर गाँव गोनू झा के पास आते और गोनू झा चुटकी में उनकी समस्या का समाधान कर देते। जैसे कि अक्सर होता है कि धन और कीर्ति बढ़ जाने पर आदमी से कुछ ईर्ष्यालु लोग और भी ईर्ष्यालु हो जाते हैं।

ऐसे ही गोनू झा के साथ भी हुआ। गावं के कुछ लोग उनसे भी द्वेष रखने लगे। परन्तु गोनू झा को न किसी से भय था और न किसी से मतलब।

वह अपना काम सफल करने की विद्या जानते थे। उनकी बुद्धि के समक्ष उनके विरोध भी नतमस्तक हो जाते थे।

आवश्यकता पड़ने पर गोनू झा अपने बुद्धिबल से विरोधियों से भी अपना कार्य सहज में करा लेते थे।

यद्यपि गोनू झा बहुत धनी न थे पर उनके परिवार का गुजारा ठीक प्रकार से हो जाता था।

उनकी पत्नी एक कुशल गृहिणी थी और पीटीआई का बहुत सम्मान करती थी।

गोनू झा के विवाह के कुछ दिन पश्चात ही उनकी माता का देहांत हो गया। हिन्दू रीति-रिवाज से गोनू झा ने भली प्रकार माता का दाह-संस्कार किया। गांवों में भोज प्रथा का चलन होता है। कोई पैदा हो या मर जाए, दोनों ही स्थितियों में भोज करना होता है। गोनू झा भी विचार कर चुके थे कि वह भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपनी माता का भोज करेंगे।

परन्तु उनके विरोधी तो जैसे इसी अवसर की टाक में थे। विरोधियों ने मिलकर योजना बनाई कि किसी भी प्रकार गोनू झा को महाभोज के लिए उकसाया जाए। सब मिलकर उनके घर मातमपुर्सी करने पहुँचे। इधर-उधर की बातें हुई और फिर एक ने बात छेड़ दी।

झा जी, माता जी के भोज का क्या विचार है ?

विचार क्या भइया, अपनी सामर्थ्य के अनुसार तो करूंगा ही। गोनू झा ने कहा - अब प्रथा को तो मैं नहीं तोड़ सकता।

यह ठीक बात है - दूसरे ने कहा - वैसे भी आप ब्राह्मण हैं। आसपास के पच्चीस गांवों में आपका आना-जाना है। किसी भी गाँव में कैसा भी भोज हो आपको निमंत्रण आ ही है।

सो तो है, तीसरा बोला - भई, आपने गोनू झा की प्रसिद्धि भी तो दूर-दूर तक फैली है। सब तो इन्हीं से राय लेने आते हैं।

इस हिसाब से तो झा जी को पच्चीस गांवों का महाभोज करना चाहिए। वो तो करेंगे ही। माता जी की आत्मा की शांति के लिए और गोनू झा की चहुंओर फैली कीर्ति के लिए आवश्यक भी है।

सबका मुँह मीठा होना चाहिए। अरे माँ काली का दिया सब कुछ तो है इनके पास। माता जी स्वर्ग में बैठी आशीर्वाद देंगी और फूली न समाएंगी।

गोनू झा ख़ामोशी से उनकी बातें सुन रहे थे। वह समझ भी रहे थे कि वह लोग क्या षड्यंत्र रच रहे थे। पर फिलहाल उन्होंने खामोश रहना ही ठीक समझा। आवश्यक था कि पहले शत्रुपक्ष की सारी चालें चल जाएं। उनकी तो एक ही चाल उन पर भड़ी पड़ सकने में सक्षम थी।

भई गोनू झा तो कुछ बोल ही नहीं रहे। अब सब कुछ तो आपने बोल ही दिया है। गोनू झा ने कहा - चार पंचों की बात टालना भी तो उचित नहीं है।

इसका मतलब महाभोज होगा।

भई वाह, ऐसा सपूत बेटा भगवान हर किसी को दे।

चलो भाई गांव वालों को खुशखबरी सुनाते हैं कि अपने गोनू झा अपनी माता की आत्मा की शांति के लिए पच्चीस गांवों का मीठा भोज कर रहे हैं।

विरोधी दल ने खुश होकर कहा।

फिर विरोधी वहां से खुश होते चल दिए। आपस में कहते भी जा रहे थे कि क्या खूब फंसाया चतुर गोनू झा को।

अब सब आते-दाल का भाव मालूम हो जाएगा बच्चू को! बड़ा सयाना बना फिरता था। अरे, किसी को कुछ समझता ही न था। अब जब घर के बर्तन-भांडे भी बिक जाएंगे तो पता चलेगा।

मजा आ जाएगा। मीठे का महाभोज ऐसे ही हो जाता है क्या ?

मैं तो भई छककर खाऊंगा। एक ने हंसकर कहा।

और कौन तुमसे कम खाता है। देखना गोनू झा का दिवाला निकल देंगे।

सब ठठाकर हंस पड़े और सारे गावं में यह बात फैला दी। जो भी सुनता, हतप्रभ रह जाता। गोनू झा की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी और यह बात सभी जानते थे। लगता है कोई गड़ा खजाना मिल गया है, किसी ने कहा। हो सकता है, वैसे माँ-बाप के पास भी तो कुछ होगा।

जितने मुहं उतनी बातें! पर मीठे के भोज की ख़ुशी सबको थी। दस-बीस साल में कभी एक बार ऐसी दावत मिलती थी। उधर गोनू झा अपनी पत्नी के पास पहुंचे तो उनके चेहरे पर अजीब-सी मुस्कराहट थी। जबकि पत्नी के पर हवाइयां उड़ रही थी। यह क्या कर आए आप ? पच्चीस गांवों के मीठे भोज की हामी भर ली।

आसान काम समझ लिया क्या ? घर की स्थिति से अनजान हो क्या ? आरी भाग्यवान हामी मैंने नहीं भरी। गोनू झा मुस्कराए - यह तो उन लोगों की अपनी योजना है।

तो आपको विरोध करना चाहिए कि जैसे गीत वैसी ताल।

उन लोगों ने जो सोचा है, वैसा ही होगा पर कैसे होगा यह तो मैं करूंगा न !

लगता है आपने कुछ सोच लिया है। पत्नी मुस्कराई।

अब जब दुश्मन वार करे तो चुप नहीं बैठा जाता ।

तुम देखना कि कैसे मैं उन लोगों की मनमर्जी करता हूँ। पत्नी के माथे से चिंता की लकीरें हट गईं। अपने पति की अक्ल पर उसे पूरा विश्वास था।

उधर महाभोज की बात उस गांव से निकलकर और गांवों में पहुंच गई। लोग शोक व्यक्त करने आने लगे। भीड़ बढ़ने लगी। लोग गोनू झा की तारीफें करते न थकते थे। गोनू झा बस मुस्कराते रहते।

भोज का दिन करीब आ रहा था। गोनू झा बाजार से बैलगाड़ी भरकर पत्तल ले आए। अब तो कोई संशय ही बाकी न था। भोज के एक दिन पहले पच्चीस गांवों में निमंत्रण भेजा गया। गोनू झा ने भोज की व्यवस्था खेतों में की और अगर सबसे अपील की कि ग्यारह बजे तक सब आ जाएं।

अगले दिन प्रातः काल से ही भरौरा में भोज खाने वालों का आना शुरू हो गया। गोनू झा सबको कतार में बिठा रहे थे और उनके सामने पत्तल रख रहे थे। विरोधी परेशानी में थे कहीं कोई हलवाई और भट्टी तो नजर ही नहीं आ रही ! कैसा मीठा महाभोज था।

बारह-बजते-बजते पच्चीस गांवों के आदमी खेत में कतारों में बैठे थे और मीठे की प्रतीक्षा कर रहे थे।

तब गोनू झा के आदेश पर उनके मित्रवर्ग ने मीठा परोसना शुरू किया। यह क्या ? पत्तलों पर चार-चार इंच के गन्ने के टुकड़े परोसे जा रहे थे। खाने वाले हतप्रभ और विरोधी दल हक्का-बक्का।

तब कुछ बुजुर्गो ने क्रोध में भरकर गोनू झा को फटकारा। गोनू झा यह सब क्या है ?

एक बुजुर्ग लाल आँखे करके बोलै - क्या तुमने हम सबका अपमान करने के लिए यहां बुलाया था।

जब तुम्हारी औकात नहीं थी तो क्यों पच्चीस गांवों में निमंत्रण भेजा ?

काका आप अकारण क्रोधित हो रहे हैं।

गोनू झा मीठे नरम स्वर में बोले - मैंने क्या त्रुटि कर दी है। गन्ना ही तो सभी मिठाइयों का मूल है। क्या गन्ने के बिना किसी मिठाई की कल्पना की जा सकती है। आप सबका मुंह मीठा हो जाएगा और मेरी माता की आत्मा को शांति मिल जाएगी। क्या यह मीठा नहीं है।

बुजुर्ग नरम पड़ गए। गोनू झा की बात सही जो थी।

बेटा यह बात तो ठीक है। एक और बुजुर्ग ने कहा - मीठा तो यह सबसे अच्छा है पर तुम्हें इतना बखेड़ा फ़ैलाने की जरूरत क्या थी। अपनी माता की आत्मा की संतुष्टि के लिए तेरह ब्राह्मणों को भोज करा देना भी पर्याप्त था।

काका! गोनू झा ने हाथ जोड़कर कहा - मैंने कोई बखेड़ा नहीं फैलाया।

मैं तो अपने सामर्थ्य के अनुसार भोज करने वाला था। अपने गाँव और अपने खास मित्रों की जीमने की व्यवस्था तो मेरे पास थी। पर..... पर.....

गोनू झा ने खंजर की तरह ऊँगली विरोधी दाल की तरफ उठाई। ये मेरे गांव के गणमान्य लोग थे जिन्होंने मेरी हामी के बिना जबरदस्ती मेरे ऊपर मीठे के महाभोज का भार लादा।

इन लोगों का कहना था कि मुझे कैसे भी कर के यह महाभोज करना ही होगा।

साथ ही इन्होंने सारे गाँव और आसपास के गांवों में प्रचार भी कर दिया। अब बताइए कि मैं क्या करता ?

विरोधी दाल को मुँह छुपाने के लिए जगह भी नहीं मिल रही थी ओस उस पर गांवों के गणमान्य व्यक्ति उन्हें ही कोस रहे थे। आखिर विरोधियों को वहां से भागना ही पड़ा। भई मान गए गोनू झा को। पच्चीस गांवों का मुँह भी मीठा करा दिया और दावत का खर्च भी बचा लिया। और उनलोगों को भरी समाज में शर्मिन्दा भी कर दिया जो किसी कारण उनका दिवाला निकालने की सोच रहे थे।

सब गोनू झा की तारीफ करते अपने-अपने घर पहुंचे और उनकी पत्नी तो अपने पीटीआई के कारनामे पर फूली न समा रही थी। जरा से खर्च में महाभोज करने का चमत्कार गोनू झा अलावा और कौन कर सकता था।

लेने के देने

गोनू झा की उत्तरोत्तर सफलता से सहकर्मी जलते-भुनते थे, इसलिए अकसर उन्हें नीचा दिखाने की ताक में रहते।

एक दरबारी भूखन मिसर था। वह उनका ग्रामीण होने के कारण भी अधिक ईर्ष्या करता और साजिश में बढ-चढकर हिस्सा लेता; यहाँ तक कि गाँव में भी चैन से नहीं रहने देता था वह काना। प्रायः ऎसे ही लोगों को देखकर यह लोकोक्ति बनी:

'सौ मैं सूर हजार में काना,

सवा लाख में अइंचा ताना।

अइंचा ताना करे पुकार,

मैं माना कुइरे से हार।'

अस्तु! एक दिन भूखन मिसर ने भरे दरबार में शिकायत करते हुए कहा, 'महाराज, बारह वर्ष पूर्व गोनू झा की शादी होनेवाली थी। तब इन्होंने मुझसे एक आँख साल भर के लिए उधार ली और आज एक युग बीत गया। यह शायद भूल भी गए होंगे। अब मुझे इस आँख से कम सूझने लगा है, इसलिए मेरी आँख वापस दिलाई जाए।'

गोनू झा उसकी बेबुनियाद बातें सुनकर पहले तो क्षणभर अचंभित रहे, फिर महाराज ने जब आँखें गुरेरते हुए पूछा, 'गोनू झा, भूखन मिसर क्या कह रहे हैं? तो उन्होंने सॅंभलते हुए कहा, 'जी महाराज, मैं यह उपकार कैसे भूल सकता हूँ! इतना कृत्घन नहीं हूँ। दूसरी बात यह कि इसी के एवज में मैंने उन्हें सौ स्वर्ण-मुद्राऍं दी थीं और कहा था कि एक वर्ष बाद जब चाहें, मेरी पूरी रकम एकमुश्त वापस कर अपनी आँख लौटा लें। उन्होंने कभी ऎसा नहीं किया, इसलिए मैं भी निश्चिंत हो गया। उन्हीं से पूछ लिया जाए, यही शर्त थी कि नहीं!"

भूखन ने खुशी-खुशी हामी भर दी और कहा, 'मैं स्वर्ण-मुद्राऍं लौटाने को तैयार हूँ। मेरी आँख वापस करें।

गोनू झा ने सहज भाव से कहा, 'ठीक है, आठवें दिन एक हाथ से लेना और दूसरे से देना हो जाए।

शर्त सहर्ष मंजूर हुई। सभासद स्तब्ध।

इस नाम पर भूखन को मुद्राऍं एकत्र करने में देर न लगी; ईष्यालु दरबारियों ने आनन-फानन में पूरी राशि जमा कर दी और गोनू झा की एक आँख निकलने की प्रतीक्षा करने लगे- अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे!

इधर गोनू झा ने चुपचाप जानवरों, पक्षियों और मछलियों की बड़ी-बड़ी आँखें क्रमशः कसाइयों, बहेलियों एवं मल्लाहों से एकत्र कर लीं।

आठवें दिन स्वर्ण मंजूषा में आखों को सजाकर दरबार में उपस्थित हुए ।

दरबार ठसाठस भरा था। भूखन मिसर ने स्वर्ण-मुद्राऍं दिखाते हुए अपनी आँख माँगी।

गोनू झा ने कहा, 'महाराज, उनकी मुद्राऍं गिनकर अपने पास रखवा लें और मैं भी आँखे जमा कर रहा हूँ। वह अपनी आँख पहचानकर उठा लें।

गोनू झा ने मंजूषा खोलकर राजा के समक्ष रख दी। फिर भी भूखन और उसके समर्थक खुश नहीं दिख रहे थे कि गोनू झा की दोनों आँखें तो सुरक्षित ही हैं। अंततः भूखन ने झुँझलाते हुए कहा, 'महाराज, इनमें मेरी आँख नहीं है।'

गोनू झा ने सहजता से कहा, 'इसमें गुस्साने की क्या जरूरत है? महाराज, उनके पास एक आँख तो है; उसे ही निकालकर बराबर वजन की दूसरी ढूंढ लें। मैंने नुक्ती की व्यवस्था पहले से ही कर रखी है।'

यह सुनते ही भूखन भागने लगा, लेकिन राजा ने पकड़वा लिया।

अब वह गिड़गिड़ाने और माफी माँगने लगा। षड्यंत्र का परदाफाश हुआ। भूखन मिसर की स्वर्ण-मुद्राऍं तो गईं हीं, दरबार से निकाला गया सो अलग।

गोनू झा की चतुराई

मिथिला नरेश क‍ी सभा में उनके बचपन का मित्र परदेश आया था।

नरेश उन्हें अपने अतिथि कक्ष में ले गए।

उन्होंने अपने मित्र की खूब आवभगत की। अचानक मित्र की नजर दीवार पर लगे एक चित्र पर गई, चित्र खरबूजे का था।

मित्र बोला - कितने सुंदर खरबूजे हैं।

वर्षों से खरबूजे खाने को क्या, देखने को भी नहीं मिले। अगले दिन मित्र ने यही बात दरबार में दोहरा दी।

मिथिला नरेश ने दरबारियों की तरफ देखकर कहा- क्या अतिथि की यह मामूली-सी इच्छा भी पूरी नहीं की जा सकती?

सारे दरबारी, मंत्री, पुरोहित खरबूजे की खोज में लग गए।

बाजार का कोना-कोना छान मारा। गांवों में भी जा पहुंचे। गांव वाले उनकी बात सुनकर हंसते कि इस सर्दी के मौसम में खरबूजे कहां।

जब सब थक गए तो एक दरबारी ने व्यंग्य से कहा- महाराज, अतिथि की इच्छा गोनू झा ही पूरी कर सकते हैं।

सच है इनके खेतों में इन दिनों भी बहुत सारे रसीले खरबूजे लगे हैं।

मिथिला नरेश ने गोनू झा की तरफ देखा। नरेश की आज्ञा मानते हुए गोनू झा ने कुछ दिन का समय मांगा फिर कुछ उपाय सोचते हुए दरबार से चले गए।

कई दिन बीतने पर भी गोनू झा दरबार में नहीं आए। पुरोहित ने कहा- कहीं डरकर गोनू झा राज्य छोड़कर तो नहीं चले गए।

एक सुबह ‍जब मिथिला नरेश अपने मित्र के साथ बाग में टहल रहे थे तो गोनू झा कई सेवकों के साथ आए।सबने मिथिला नरेश को प्रणाम किया।

सेवकों के साथ लाए टोकने जमीन पर रख दिए। उसमें खरबूजे थे।

यह देख नरेश खुश हो उठे। उनके मित्र ने कहा कि आज वर्षों बाद इतने अच्छे खरबूजे देख रहा हूं।

मिथिला नरेश ने सेवकों से छुरी और थाली लाने को कहा तो गोनू झा बोले- क्षमा करें महाराज, हमारे अतिथि ने कहा था कि वर्षों से खरबूजे नहीं देखे इसलिए ये खरबूजे खाने के लिए नहीं, देखने के लिए हैं।

ये मिट्टी के बने हैं। नरेश सहित सभी दरबारी गोनू झा की चतुराई पर दंग रह गए।

गोनू झा की चतुराई पर मित्र भी जोर से हंसा- वाह गोनू झा, समझो हमने खरबूजे देखे ही नहीं, खा ‍भी लिए।

मि‍थिला नरेश ने गोनू झा को उसकी चतुराई के लिए ढेर सारा इनाम देते हुए उसको शाबाशी दी कि तुम सचमुच इस दरबार के अनमोल रत्न हो, तुम्हारी सूझबूझ से आज मेरे मित्र की इच्‍छा पूरी हो सकी।

गोनू झा की शिकारी बिल्ली

मिथिला के दरबार में गोनू झा की धाक तो जम ही चुकी थी। यद्यपि उनका विरोधी दल अभी भी अवसर की तलाश में रहता था। पर भूखन मिश्रा जी का हश्र देखकर सब कतराने लगे थे। सबने फंदेबाजी सोचना भी बंद कर दिया था। फिर भी वे सब दिन-रात यही कामना करते कि किसी दिन गोनू झा महाराज की कोपदृष्टि और राजदंड के भागी बनें और उन्हें खुशी हो।

एक बार मिथिला नगरी में चूहों की संख्या इतनी बढ गई कि किसान वर्ग ही नहीं साधारण गृहस्थ भी परेशान हो गए। चूहे फसल तो खा रहे थे साथ में कपड़ो को कुतरने में भी आलस नहीं कर रहे थे। यहां तक कि राज्य के खाद्य-भंडार में भी सेंध लग गई थी।

मिथिला नरेश को इस समस्या के बारे में पता चला तो वह चिंतित हो उठे। उन्होने आपातकालीन बैठक बुलाई और समस्या रखी।

"इस समस्या का कोई हल खोजिए।" महाराज ने कहा।

"चूहों से तो बिल्ली ही लड़ सकती है। बिल्ली ही चूहों की शत्रु है और कहते हैं कि जहां बिल्ली होती है, वहां दूर-दूर तक चूहे नहीं होते।' गोपलाल ने अपना सुझाव दिया-"एक बिल्ली हजार चूहों पर भारी है।'

"सुझाव तो उचित है ।" महाराज ने माना - "फिर तो यही आदेश जारी किया जाय कि प्रत्येक घर म्र बिल्ली पालना आवश्यक है ।"

"महाराज" गोनू झा बोले - "इतनी बिल्लियां कहाँ से आएंगी । सौ-पचास तो खैर प्रयास करने पर मिल भी जाएंगी ।"

"यह भी समस्या है । इसका भी हल सोचिए ।"

"महाराज, मेरे विचार से तो यह आदेश दरबारियों को दिया जाय । प्रत्येक दरबारी एक बिल्ली पाले और उसे प्रशिक्षित करे । फिर उसे अपने इलाके मे छोड़े । तब तो चूहों पर कुछ लगाम लग सकती है । प्रशिक्षण प्राप्त बिल्ली ही हमारे अभियान को सफल बना सकती है । साधारण बिल्ली तो अपना खाती है और सो जाती है ।"

"बिल्कुल उचित । ठीक है, सभी दरबारियों को हमारे ओर से यह आदेश दिया जाय कि वह एक-एक बिल्ली पालें और उसे निरन्तर शिकार के लिए प्रशिक्षित करें ।" महाराज ने कहा ।

"परंतु महाराज, ऎसी बिल्ली को पालने मे खर्च भी तो आएगा ।"

"उसे राजकोष वहन करेगा । क्या खर्च आएगा ।"

"खर्च क्या !" एक दरबारी बोला ।

"बिल्ली को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए दूध की आवश्यक्ता होगी ।"

"ठीक है । राज्य की तरफ से प्रत्येक बिल्ली पालने वाले दरबारी को एक गाय दी जाएगी ।" महाराज ने घोषणा की ।

गोनू झा मुस्कुरा उठे । इस बहाने दूध पीने को एक गाय मिल जाएगी । वैसे भी गोनू झा के घर इस समय कोई दुधारू गाय-भैंस नही थी ।

"हम एक माह बाद हम बिल्लीयों का स्वयं निरीक्षण करेंगे । जिसकी बिल्ली भी कमजोर या कार्य के अनुरूप न पाई गई, वह दंड पाएगा ।" महाराज ने कहा ।

और इस आदेश के बाद दरबार के सवा सौ दरबारियों को एक-एक बिल्ली और गाय दे दी गई । गोगू झा तो गाय और बिल्ली लेकर अपने घर भरौरा चले आए । अब एक माह बाद ही जाना था बशर्ते की कोई सरकारी बुलावा न आ जाए ।

उधर जितने भी दरबारी बिल्ली पाल रहे थे सब दंड के भय से बिल्ली को अपने बेटे-बेटी की तरह पालने लगे । सारा दिन गाय की टहल चाकरी और बिल्ली की देख-रेख मे व्यतीत करने लगे । गाय का सारा दूध बिल्ली को पिलाया जाता । बिल्ली चुस्त तो नही तंदरुस्त होती जा रही थी । दूध पी-पीकर बिल्लियाँ मुटिया गई थीं । दिन भर सुस्त पड़ी रहती । चूहा उसके सामने नाचता गुजर जाता ।

'कैसी है मौसी ! भूख तो नही लगी ।' चूहा पूछता ।

'चल भाग । मैं चूहे खाऊंगी । राजसी बिल्ली हूँ । दूध पीती हूँ दूध ।' बिल्ली जबाव देती - अब जा आराम करने दे । आलस आ रहा है ।'

उधर गोनू झा की बिल्ली का हाल सुनिए ।

गोनू झा ने युक्ति सोच ली थी । वह गाय उस मुई बिल्ली के लिए नहीं लाए थे बल्कि भोनू के लिए लाए थे जो खेती मे परिश्रम करता था । उन्होने पहले ही दिन एक कटोरा दूध खौलाकर बिल्ली को पुचकारा ।

दूध देखकर बिल्ली दौड़ी आई पर गर्म दूध का आभास होते ही 'म्याउं' 'म्याउ' करने लगी । बिल्ली गोनू झा से शायद अपनी भाषा मे कह रही थी कि 'अरे, हम बिल्लियाँ इतना गरम दूध नही पीतीं ।'

"क्या म्याउं, म्याउं करती है । चल दूध पी ।" गोनू झा ने जबरन बिल्ली के मुँह को गर्म दूध से लगा दिया । बिल्ली छटपटाई और जरा सी ढील मिलते ही कूदकर दूर खड़ी हो गई । बितर-बितर दूध को देख रही थी । भूख से परेशान थी की एक चूहा निकलकर भागा । बिल्ली ने एक ही छलांग में दबोचा । 'अब तू भी पंजे से भागेगा ।' बिल्ली ने गुस्से से चूहे को उधेड़ डाला ।

गोनू झा का प्रयोग और प्रयोजन सफल हो गए और बिल्ली का प्रशिक्षण शुरु हो गया । गोनू झा ने चार-पाँच दिन यह प्रयोग किया । परिणाम यह हुआ कि बिल्ली को दूध देखते ही कंपकंपी छूटने लगती । अब वह दूध की तरफ झांकती भी नही थी । तमाम दिन चूहों को मारती रहती । चूहों की तो मानो शामत आ गैइ थी । ऎसी शीकारी बिल्ली उन्होने गाँव मे पहली वार देखी जो दूध रोटी आदि होने पर भी केवल चूहों को ही खाती थी।

'मौसी, तेरे मालिक के घर मे तो दूध भी है। खाने की कई चीजें हैं । एक दिन उसके पंजे मे फसे चूहे ने पूछा - 'फिर तू सिर्फ मेरे पीछे क्यों पड़ी है।"

'मैं दूध को तो हाथ कतई न लगाऊं ! दूध मुझे पसंद ही नहीं।'

इस प्रकार एक माह का समय बीत गया । गोनू झा की बिल्ली बहूत दुबली-पतली थी पर चूहा दिखते ही उसकी छलांग और चपलता बड़ी दर्शनीय थी । गोनू झा ने बिना एक बूंद दूध पिलाए उसे पाला था।

जब गोनू झा दरबार मे बिल्ली लेकर पहुंचे तो उसके बिल्ली के सेहत देखकर सारे दरबारी चकित हो उठे । उनकी अपनी बिल्लियाँ तो दस-दस किलो वजन की हो रही थी और उनकी गोद मे सो रही थी । विरोधी दल तो हर्षित हो उठा कि आज गोनू झा अपने आप फंस गए । उनकी बिल्ली की दयनीय स्थिति देखकर महाराज का क्रोध उन पर अवश्य टूटेगा और कोई दंड भी मिल जाए तो कोइ आश्चर्य की बात नहीं ।

"पंडित जी, लगता है सारा दूध खुद चट कर गए । बेचारी बिल्ली को तो दाल-भात ही खिलाते रहे लगते हैं ।" गोपलाल ने पूछा ।

"कुछ मत पूछिए गोपलाल जी ।" गोनू झा बोले - "इतना कुछ खाने-पीने के बाद भी यह ऎसी ही रही । शायद यह शिकारी वंश से है ।"

तभी महाराज ने दरबार में कदम रखा। सभी दरबारियों ने खड़े होकर सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया। महाराज सिंहासन पर बैठे कि उनकी दृष्टि गोनू झा की गोद में मचल रही बिल्ली पर पड़ी।

"अरे पंडित जी, आपकी बिल्ली क्या बीमारी है जो ऎसी दिख रही है। अन्य बिल्लियां तो जैसे भारी-भरकम चीते का बच्चा लग रही हैं।"

'महाराज, यह बीमारी नहीं है। बस शिकारी वंश से है।"

"क्षमा चाहूंगा महाराज।" गोपलाल ने अवसर ताड़ा- "यह गोनू झा का बहाना भर है। आपकी कृपा का अनुचित लाभ उठाने का प्रयास है। इन्होंने इस बेजुबान बिल्ली को दूध की बूंद भी नहीं दिखाई है। सारा दूध खुद ही पी गए हैं। अन्य सबकी बिल्लियां तो देखें। जैसे कोई छोटा-मोटा चीता होता है, ऎसी दिख रही हैं। इनकी बिल्ली बेचारी तो जैसे अंतिम सांस ले रही है। कैसे जीभ बाहर निकाले हांफ रही है।'

"गोनू झा हमें तुमसे ऎसी आशा नहीं थी।" महाराज क्रोधित हो उठे-"तुमने हमारे आदेश का उल्लंघन किया है। जब हमने बिल्ली के लिए दूध की व्यवस्था एक गाय देकर की थी तो आपने इसे दूध क्यों नही पिलाया।"

"महाराज, मेरी बिल्ली दूध पीती ही नहीं।"

सारे दरबारी ठठाकर हंस परे। उनकी समझ में यह संसार का सबसे बड़ा चुटकुला जो था कि बिल्ली दूध नहीं पीती।

"देखा महाराज, कौन इस अनर्गल बात पर विश्वास कर सकता है।" गोपलाल बोला-"संसार की कौन बिल्ली होगी जो दूध न पिएगी।"

"हाथ कंगन को आरसी क्या महाराज! आप दूध मंगाकर देखिए। अगर यह एक बूंद भी पी ले तो जो दंड आप दें वह स्वीकार होगा।" गोनू झा ने कहा।

तत्काल कटोरा भरकर दूध लाया गया। गोनू झा बिल्ली को दूध के पास धकेलने लगे और वह पीछे को यूं हटने लगी जैसे सामने दूध नहीं कोई खूंखार कुत्ता खड़ा था। गोनू झा ने बहुत प्रयास किया। और लोगों ने भी बहुत प्रयास किया पर बिल्ली ने दूध में मुंह नहीं मारा।

सारे दरबारी आश्चर्यचकित थे कि यह क्या गोरखधंधा था। आपने देखा महाराज कि मेरी कोई गलती नहीं है।" गोनू झा बोले।

'बड़े आश्वर्य का विषय है पंडित जी।'

"महाराज, बिल्लियों की कुछ प्रजाति सिर्फ मांसाहारी होती हैं। उन्हें शिकार ही पसंद होता है। घने जंगलों की बिल्ली कहां दूध पीती है। वह तो सिर्फ चूहों का भक्षण करती है। मेरी बिल्ली भी उसी प्रजाति की है।"

"यह तो खैर हम भी जानते हैं। क्योंकि हमारी मूल समस्या तो राज्य में बढते जा रहे चूहें हैं।' महाराज ने स्वीकार किया।

'महाराज, यद्यपि मैं कहना नहीं चाहता, फिर भी अवसर ऎसा आ पड़ा है कि मुझे कहना होगा। मेरी बिल्ली का एक अवगुण सबको मेरी नीयत पर संदेह करा रहा है। परंतु आपने जिस उद्देश्य से बिल्ली पालने का आदेश दिया, उसमें किसकी बिल्ली खरी उतरती है, यह देखने का विषय है। मेरी बिल्ली का यह गुण मेरे कर्त्तव्यनिष्ठ होने का प्रमाण होगा। यदि मैं दंड का अधिकारी था तो पुरस्कार भी मुझे ही मिलेगा।"

"अवश्य! हम आपका मंतव्य समझ गए। कल शाही मैदान में इन बिल्लियों का प्रशिक्षण होगा। सैनिकों, आज पिंजरो में जितने अधिक चूहे पकड़े जा सकें, पकड़कर शाही मैदान में पहुंचा दो।" महाराज ने आदेश दिया-" जो बिल्ली चूहों के शिकार में अच्छा प्रदर्शन करेगी, उसे हम पुरस्कार देंगे।"

सब दरबारी सोच में पड़ गए। आज तक उनकी बिल्लियों ने चूहे के बच्चे का भी शिकार न किया था। शिकार तो तब करतीं जब दूध के कटोरे से उनका मुंह हटता। अब तो सब यही प्रार्थना कर रहे थे कि अपनी जन्मजात आदत के कारण उसकी बिल्ली अपने प्रिय भोजन को ज्यादा से ज्यादा शिकार करे।

खैर सवेरा हुआ। सब अपनी बिल्लियों को लेकर मैदान में आ पहुंचे। सैनिको ने सैकड़ो चूहे पिंजरो में बंद कतारों में रखे थे।

मिथिला नरेश का आगमन हुआ और उनके आदेश पर चूहों के पिंजड़े खोल दिए गए। चूहे मैदान में दौड़ पड़े। सबने अपनी-अपनी बिल्लियां छोड़ दी। चीते की तरह दिखने वाली बिल्लियां चूहों की ओर निहार भी नही रही थी। कुछ चूहे तो बड़ी बहादुरी दिखाते हुए उन बिल्लियों को लांघकर चले जा रहे थे। और गोनू झा की बिल्ली तो साक्षात् काल रूप धरकर चूहों को चुन-चुनकर उधेड़ रही थी। उसकी फुर्ती जैसे बिजली को भी मात करती थी। जैसे कोई रबर की गेंद उछल रही थी। उस अकेली बिल्ली ने पचास-साठ चूहों की लाशें बिछा दी थीं और अब आराम से भोजन कर रही थी।

निर्णय हो गया। पुरस्कार गोनू झा ने जीता।

"इन लोगों ने तो हमारा अभिमान ही चौपट कर दिया।' महाराज चिंतित होकर बोले-"अब एक अकेली आपकी बिल्ली तो सारी मिथिला के चूहों को समाप्त नही कर सकेगी।'

'यदि अन्य बिल्लियों को दूध मिलना बंद हो जाए तो यह चार दिन में ऎसी ही खुंखार हो जाएंगी जैसी मेरी बिल्ली है।' गोनू झा ने सुझाव दिया।

महाराज ने तत्काल आदेश देकर सबकी गायें वापस ले लीं। गोनू झा की गाय अभी भी भोनू झा का स्वास्थ्य बना रही थी।

अंतिम उपदेश

गोनू झा बाजार करने गए। वहा एक सेठ को मजदूर की तलाश थी। उसे एक बड़ा बक्सा ढुलवाना था। वह मजदूरी में तीन कोसों के लिए उपदेश देने का वादा कर रहा था।

उसकी शर्त सुनकर मजदूर बिदककर भाग जाते थे। पेट के लिए उपदेश का क्या मोल! और जिसका पेट भरा हो, वह बेगार में बक्सा क्यों ढोए?

कोई मजदूर तैयार नहीं हुआ और सेठ भी अपनी शर्त से डिग नहीं रहा था। वह वैसे ही मजदूर की तलाश में बेफिक्र बना रहा।

गोनू झा को भी इस बात का पता चला। उन्होंने सोचा कि 'भूखे भजन न होई गोपाला, तो ठीक है, पर ईश्वर की कृपा से मेरे साथ यह नौबत नहीं है और धन कमाने के और भी कई तरीके हैं। फिर मजदूरी के बदले उपदेश देनेवाला संयोग से ही मिलेगा; इसलिए क्यों न आज वे दुर्लभ उपदेश ही जान लिए जाऍं!

गोनू झा सेठ के पास पहुँचकर बोले, 'सेठजी, इसमें क्या है?

गोनू झा ने प्रश्न को टालते हुए कहा, 'तुम्हें इससे क्या मतलब? सेठ ने भी सेठ के समक्ष एक शर्त रखते हुए कहा, 'सेठजी, हर कोस के मध्य में एक उपदेश देना होगा?

सेठ ने गंतव्य स्थान पहुँचने से पूर्व तीनों उपदेश कह देने की शर्त स्वीकार ली। गोनू झा ने ज्योंही असावधानी पूर्वक बक्सा उठाना चाहा सेठ ने टॊकते हुए कहा, 'अरे, रे, रे! यह क्या कर रहे हो? इसे सावधानी से उठाओ।'

एवमस्तु! आधा कोस पार कर लेने के बाद गोनू झा ने सेठ को उपदेश देने के लिए कहा। उसने पहली नसीहत दी, 'ऎसे व्यक्ति पर कभी विश्वास नहीं करो, जो यह कहे कि सिर्फ अपना पेट भरने से तो भूखा रहना अच्छा।'

गोनू झा को बात जॅंची। एक कोस जाने पर फिर दूसरा उपदेश देने को कहा।

सेठ प्रसन्नतापूर्वक दूसरा उपदेश बोला, 'ऎसे आदमी पर भी कभी विश्वास मत करना, जो यह कहे कि घुड़सवारी से बेहतर है पैदल चलना।'

गोनू झा को यह भी अच्छा लगा, क्योंकि जिसे घुड़सवारी की सुविधा होगी, वह पैदल क्यों चलेगा?

फिर एक कोस जाने पर गोनू झा ने तीसरे उपदेश की याद दिलाई। सेठ ने झुँझलाते हुए कहा, अभी हड़बड़ी क्या है! आधा कोस तो बाकी ही है।

गोनू झा चुप। फिर थोड़ी देर बाद स्मरण कराया। सेठ बात बदलकर रास्ते की दुरूहता बताकर रास्ता पार कर लेना चाहता था।

कम ही दूरी रह गई थी। गोनू झा ने धमकी के लहजे में कहा, 'सेठजी, प्रत्येक कोस के मध्य में उपदेश देने की शर्त आपने स्वीकार की थी और अब तो पाँच-सात फलांग का ही फासला है, इसलिए जल्दी कह दें।

सेठ ने विजयी मुस्कान बिखेरते हुए महान उपदेशक की भाँति कहा, 'ऎसे आदमी पर भी विश्वास मत करना, जो यह कहे कि संसार में तुमसे भी बड़ा कोई मूर्ख है।

गोनू झा ने तीसरे उपदेश पर गौर किया, किंतु शर्त के अनुसार मंजिल तक पहुँचना था, सो चुपचाप चलते रहे। बक्सा उतारने का जब समय आया तो आराम से रखने की बजाय उन्होंने जोर से नीचे पटक दिया।

सेठ 'हैं-हैं करता रहा, तब तक तो बक्सा पटका जा चुका था। सेठ माथे पर हाथ रखकर बैठ गया, क्योंकि उसमें क्राकरी का सामान था।

स्वर्ग से बुलावा

राजा अपने पिता की समाधि पर प्रतिदिन श्रद्धा निवेदित करने जाता था।

एक दिन उसे वहाँ एक पत्र मिला। उसमें लिखा था, 'चिरंजीवी पुत्र, मैं स्वर्ग में सकुशल ही हूँ। अगर कोई अभाव खटकता है तो सिर्फ गोनू झा का।

उनके बिना मेरा यहाँ मन नहीं लगता है, इसलिए यथाशीघ्र भेजने के लिए मेरी समाधि से दक्षिण स्थित टीले पर उन्हें चढाओ और दो टाल पुआल से ढककर आग लगवा दो। वह सदेह मेरे पास पहुँच जाऍंगे। अगर उनके बिना तुम्हारा भी काम नहीं चलता हो, तो कुछ ही महीने में उन्हें वापस भेज दूँगा।

राजा विस्मय में पड़ गया। उसने दरबारियों से पूछा। सभी एक स्वर से गोनू झा के भाग्य की सराहना करने लगे। कुछ दरबारी इस पुनीत कार्य के लिए स्वयं आगे बढे, परंतु गोपाल नाई ने टॊकते हुए कहा, 'महाराज, उचित तो यह होगा कि जिसका बुलावा आया है वही जाए, अन्यथा बड़े महाराज कहीं कुपित न हो जाऍं?

राजा को बात जॅंची। गोनू झा को बुलाकर पूछा गया।

एक पल के लिए तो वह भौचक्के रह गए, किंतु तुरंत ही प्रसन्नता का स्वाँग भरते हुए सॅंभल गए और विश्वासपूर्वक कहा, 'महाराज, मुझे बड़ॆ महाराज के पास जाने में कोई आपत्ति नहीं है, यह तो मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।

परंतु मेरी कुछ विवशताऍं हैं, अगर उन्होंने मुझे वहीं रोक लिया, तो मेरे परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा? इसलिए पहले मुझे एक हजार स्वर्ण मुद्राऍं दी जाऍं, ताकि मैं अपना घर दुरुस्त कर लूँ।

दूसरी बात यह कि जब तक न लौटूँ, तब तक मेरे परिवार को प्रतिमाह सौ स्वर्ण मुद्राऍं भिजवाने की व्यवस्था कर दी जाए और अंतिम बात यह कि परिवार को सुव्यवस्थित करने के लिए मुझे तीन मास की मोहलत मिले।

राजा ने सभी शर्तों को मान लिया। तीन महीने बाद पत्र में वर्णित तरीके और गाजे-बाजे के साथ गोनू झा को स्वर्ग भेज दिया गया।

इधर राजा को अपनी भूल का एहसास हो गया कि गोनू झा से छुटकारा पाने के लिए दरबारियों ने प्रपंच रचा था। वह उदास और दरबारी खुश रहने लगे, लेकिन अब किया ही क्या जा सकता था!

एक दिन राजा अपनी उदासी का कारण बता ही रहा था कि तभी सूचना मिली, गोनू झा दरबार में हाजिर होना चाहते हैं। राजा के आश्चर्य और खुशी का ठिकाना न रहा, किंतु गोपाल नाई सहित दरबारियों के होश उड़ने लगे।

हष्ट-पुष्ट होकर आए गोनू झा ने प्रसन्न मुद्रा में दरबार में प्रवेश किया। राजा ने अपने पूज्यवाद पिता का समाचार पूछा। उन्होंने गदगद स्वर में कहा, 'महाराज, वह तो बहुत प्रसन्न हैं पर वहाँ नाई नहीं रहने के कारण महाराज को हजामत बनाने में बड़ी कठिनाई होती है और वह कोई ऋषि-मुनि तो हैं नहीं कि जटाजूट और मूछ-दाढी बढाते जाऍं। मैं इस काम में बिलकुल अनाड़ी हूँ। एक दिन प्रयास भी किया तो वह लहूलुहान हो गए, इसलिए गोपाल नाई को शीघ्र भेज देने के लिए कहा है।

यह सुनते ही गोपाल नाई का चेहरा फीका हो गया; वह दरबार से भागने लगा, लेकिन सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया। राजा ने क्रोध से कहा, 'गोपाल, तुम्हें डरने की जरूरत नहीं है। उस दिन तो तुम लोग स्वर्ग जाना सौभाग्य की बात समझते थे। दूसरी बात कि गोनू झा अभी वहाँ से भले-चंगे लौट आए हैं।

अब गोपाल नाई ने सच्चाई उगलते और गिड़गिड़ाते हुए कहा, 'महाराज, क्षमा करें। आपको बड़े महाराज की समाधि पर मिला पत्र मैंने ही लिखा था। हम लोगों ने ईर्ष्यावश गोनू झा को यहाँ से हटाने की चाल चली थी। यह तो जादू से बच गए, परंतु मैं टोना-टोटका नहीं जानता इसलिए मारा जाऊँगा। मुझे माफ करें।

राजा गोनू झा की ओर मुखातिब हुआ। गोनू झा ने सहजता से कहा, 'महाराज, यह ठीक कहता है। मैं तो उसी समय जान गया था कि यह गोपाल और दरबारियों का षड्यंत्र है। फिर भी छानबीन कर पता लगा लिया और उन तीन महीने में घर से टीले तक सुरंग बनवा दी। आग लगते ही सुरंग द्वारा सकुशल घर पहुँच गया, लेकिन यह तो सचमुच मारा जाएगा।

गोपाल नाई गोनू झा के पाँवों पर गिर पड़ा। राजा ने गोनू झा की बुद्धिमता का लोहा माना और उन्हें उपहार प्रदान किए। उधर गोपाल नाई सहित कई दरबारियों को कारागार में डाल दिया।

इनाम का साझीदार

राजदरबार से सम्मानित होने के कई दिन बाद गोनू झा ने विचार किया कि अब दरबार में भी जाना चाहिए। राजा ने उन्हें अपना प्रमुख सलाहकार नियुक्त किया था। यद्यपि राजा ने प्रसन्न होकर उन्हें यह छूट दे दी थी कि गोनू झा जितने दिन चाहें अपने घर रहें और जब चाहें दरबार में आ जाएं। परंतु साथ ही यह भी कहा था कि राजकीय आवश्यकता पड़ने पर उन्हें अवश्य उपस्थित होना पड़ेगा

गोनू झा ने दरबार जाने का विचार बना लिया और सज-धजकर चल पड़े। उन्हें इतनी प्रसिद्धि तो मिल चुकी थी कि मार्ग में जो भी मिलता वही उन्हें सम्मान देता। सबसे मिलते हुए गोनू झा राजमहल पहुंचे।

राजमहल के फाटक पर द्वारपाल खड़ा था।

"आइए पंडित जी, आपने तो सारे मिथिला में धूम मचा दी है।" "सब मां काली का आशीर्वाद है भाई।" "दरबार जा रहे हैं?"

"हां भई, महाराज के दर्शन करने की इच्छा है" "अच्छी बात है। पर पंडित जी, हमारी भी इच्छा सुन लेते।" "सुनाओ।"

"बात यह है कि मैं यहां चौबीस घंटे पहरेदारी करता हूं। मुश्किल बात है फिर भी करता हूं। मेरा कुनबा इतना बड़ा है कि वेतन से गुजारा नहीं हो पाता। इसके लिए मैं आप जैसे सज्जनों का आश्रय लेता हूं। मैं जानता हूं कि आप दरबार से लौटेंगे तो कुछ न कुछ पुरस्कार लेकर ही लौटेंगे। तो अंदर जाने से पूर्व आप वायदा करें कि जो भी पुरस्कार मिले उसमें से कुछ भाग आप मुझे भी दें।"

"भाई, यह तो दरबार में जाने की घूस हुई।" गोनू झा मुस्कुराए।

"जो भी आप समझें। मेरा कुनबा बड़ा है।"

"तो राजा साहब से कहकर वेतन बढवाओ। महाराज बहुत दयालु हैं। वह अपने कर्मचारी का कष्ट सुनकर जरूर द्रवित होंगे।"

"उसकी क्या आवश्यकता है प्रभो। मेरा काम तो दरबारियों से चल रहा है। सब अपने पुरस्कार का एक भाग खुशी-खुशी दे जाते हैं।"

"और जो तुम्हारा हिस्सा न दे तब क्या करते हो?"

"हालांकि ऎसा कभी हुआ नहीं है। हमारे दरबार में ऎसा कोई भी कंजूस नहीं जो इस गरीब की सहायता न करे। फिर भी ऎसा कोई अवसर आया तो मैं भी द्वारपाल हूं। ढेर सारे हथकंडे जानता हूं।"

"बात तो तुम्हारी ठीक है भाई। फिर तो तुमसे बनाकर रखनी पड़ेगी। तुम्हें नाराज करने का अर्थ है अपना अहित करना।" गोनू झा ने कहा।

"आप तो समझदार हैं। मैं साधारण द्वारपाल भले हूं पर मेरी भी कुछ औकात है महाराज के यहां।"

"और भई, घूसखोर तो वैसे भी फंदेबाज होते हैं। "

"आप जानते ही हैं।" द्वारपाल हंसा।

ठीक है। मुझे यदि दरबार में पुरस्कार मिलता है तो (आज का सारा पुरस्कार) मैं तुम्हें दूंगा। मैं वचन देता हूं। "

"जाइए अब। दरबार में इस समय मगध का एक पंडित बैठा है। उससे शास्त्रार्थ कीजिए और ढेर सारा इनाम पाइए।"

गोनू झा दरबार में पहुंचे तो सारे दरबारी हर्ष से खड़े हो गए।

गोनू झा आ गए। गोनू झा आ गए।"

मिथिला नरेश भी हर्षित होकर सिंहासन से उठ खड़े हुए। गोनू झा ने महाराज का अभिवादन किया।

"आओ गोनू झा, उचित समय पर आए हो। हम अभी सोच रहे थे कि आज आपकी उपस्थिति अनिवार्य थी। खैर, आसन ग्रहण करें।"

गोनू झा ने अपना आसन ग्रहण किया।

फिर शास्त्रार्थ शुरू हो गया। मगध का पंडित और मिथिला का एक विद्वान आमने-सामने बैठे थे।

"महोदय, जो बिन पैरों के चलता हो, बिन वाणी के बोलता हो, ऎसा पंडित कौन है?"

मगध के पंडित ने प्रश्न किया तो मिथिला का पंडित सोच में पड़ गया। ऎसा तो भगवान ही है। पर शंकित थे तो उत्तर न दिया।

"निर्धन जो दूध पीता है, वह किस रंग का होता है।"

मिथिला का विद्वान चकराया। दूध का तो एक ही रंग होता है।

"अंतिम प्रश्न, काजल से भी काला क्या?"

विद्वान ने सिर झुका लिया। मगध का पंडित अकड़ गया।

"क्या कोई और विद्वान इस दरबार में नहीं है।" वह सगर्व बोला।

महाराज ने गोनू झा की तरफ देखा तो वह उठकर मगध के पंडित के सामने जा बैठे। मगध के पंडित ने गोनू झा पर दृष्टिपात किया। वेश-भूषा निपट देहाती थी। सोचा कि यह क्या जानता होगा?

"किसान! मगध पंडित ने मुस्कुराकर कहा- "अभी मेरे तीन प्रश्न तुमने सुने ही होंगे। मैं उन्हें पुनः दोहराता हूं। उनके उत्तर दे दो।"

प्रश्न दोहराए गए। गोनू झा मुस्कराए।

"महोदय! आपका पहला प्रश्न अति सरल है। बिना पैरों के दूर-दूर तक गमन करने वाला और बिना वाणी के भी सब कुछ कह देने वाला पत्र होता है।" गोनू झा ने बताया-"दूसरा प्रश्न भी कठिन नहीं है, गरीब का दूध तो पानी होता है। संसार में कितने ही गरीब हैं जो पानी पीकर भी पहलवानों को पटक देते हैं। उनके दूध का रंग नहीं होता बल्कि उनके दूध में भाव होता है।"

दरबार में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।

"महोदय।" गोनू झा ने आगे कहा-"आपका अंतिम प्रश्न है कि काजल से भी कला क्या होता है। महाराज, काजल से भी काला होता है कलंक। यह ऎसी कालिख है जो मरने के बाद भी इंसान के चरित्र से छूट नहीं सकती। मैंने ठीक कहा न पंडित जी।"

मगध का पंडित हतप्रभ रह गया। देहाती ने बाजी मार ली थी।

"महोदय, अब मैं एकमात्र प्रश्न पूछूंगा।" गोनू झा ने कहा।

"पू....पूछिए।"

आप इस समय कौन हैं?

"मैं....मैं....मैं मगध का ब्राह्मण हूं। मेरा नाम भोजराज...."

"श्रीमंत, क्षमा चाहूंगा। यह मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं है।" गोनू झा विनीत स्वर में बोले-"आप इस समय मिथिला के दरबार में पराजित विद्वान हैं और आज के दिन आपका यही परिचय है।"

पंडित को मानना पड़ा कि देहाती उचित ही कह रहा था।

"वाह। वाह गोनू झा, वाह!" मिथिला नरेश ने कहा-" तुम विद्वानों के विद्वान हो। समय का जैसा विश्लेषण तुम करते हो, वह किसी परम विद्वान द्वारा ही सम्भव है। हम बहुत प्रसन्न हुए। आज हम पुरस्कार में तुम्हें वह वस्तु देंगे जो तुम्हारी इच्छा होगी। मांग लो। आज भले ही मिथिला का सिंहासन मांग लो। हमें जरा भी संकोच नहीं होगा।"

गोनू झा ने हाथ जोड़कर राजा का अभिनंदन किया।

"मांगो गोनू झा क्या मांगना है?" मिथिला नरेश ने कहा।

"महाराज, आपकी दया के अतिरिक्त और क्या मांगू। आपने मुझे इतना सम्मान दिया है कि मैं धन्य हो गया।" गोनू झा बोले।

"सम्मान व्यक्ति को उसकी योग्यता और उसका उचित प्रदर्शन दिलाता है। आप विद्वान हैं और निश्चित ही सम्मान के योग्य है। पुरस्कार तो सम्मान का निमित्त है, साधन है। अतः आप हमें यह अवसर प्रदान करें।"

"महाराज, आज मैं पुरस्कार में एक विचित्र चीज मांगना चाहता हूं।"

"निश्चिंत होकर मांगो । हम वचन देते हैं कि यदि वह विचित्र चीज मिथिला राज्य के किसी भी कोने में है तो हम वह चीज आपको देंगे।"

"ठीक है महाराज। मैं आज पुरस्कार में सौ कोड़े चाहता हूं।" सारा दरबार भौंचक्का रह गया।

"पंडितजी, यह कैसा पुरस्कार मांग बैठे!" राजा हैरानी से बोला।

"मैंने कहा था कि मैं आज विचित्र चीज मांगने जा रहा हूं। अतः अपने वचन के अनुसार मुझे यह पुरस्कार दें महाराज।"

महाराज ने विवशता से गर्दन हिलाई और दंडनायक को आदेश दिया कि गोनू झा को सौ कोड़े लगाए। सारा दरबार गोनू झा के इस विचित्र कौतुक पर हत् प्रभ था। क्या मूर्खता दिखाई गोनू झा ने।

दंड्नायक अपना कोड़ा लेकर गोनू झा के समीप आ गया।

"महाराज, कृपा करके राजमहल के फाटक पर खड़े द्वारपाल को बुलाया जाए।

क्योंकि मैं उसे वचन देकर आया हूं कि दरबार में आज जो भी पुरस्कार मुझे प्राप्त होगा वह सारा मैं उसे दूंगा। आज मेरे द्वारा प्राप्त सौ कोड़ो के पुरस्कार का वही अधिकारी है। मेरे पुरस्कार में साझीदार है।"

हम....हम समझे नहीं गोनू झा।'महाराज ने पूछा।

"महाराज किसी भी राज्य की उन्नति को निष्कंटक और सुचारु रखने में राज्य के सुरक्षा कर्मियो का योगदान अधिक होता है। यदि सुरक्षा तंत्र भ्रष्ट हो जाता है तो प्रगति प्रभावित होती है। हमारे राजमहल का प्रहरी इसी मार्ग का राही हैं। वह प्रत्येक दरबारी को भय दिखाकर दरबार में प्राप्त पुरस्कार का कुछ हिस्सा ले लेता है।" गोनू झा ने बताया।

महाराज क्रोध में भर उठे।

"क्या यह सत्य है?" राजा ने दरबारियों से पूछा।

कई दरबारियों के सिर सहमति में हिले।

'उस द्वारपाल को तत्काल दरबार में बुलाया जाए।" महाराज ने आदेश दिया।

"महाराज, मैं चाहता हूं कि पहले मेरे वचन के अनुसार मेरे पुरस्कार को उसे दे दिया जाए। एक प्रकार से यह उसका दंड भी होगा।"

तब तक द्वारपाल भी दरबार में आ गया।

"आओ प्रहरी, आज गोनू झा ने मगध के विद्वान को शास्त्रार्थ में पराजित करके जो पुरस्कार पाया है, वह तुम्हारा है। आओ अपना पुरस्कार प्राप्त करो।"

द्वारपाल थर-थर कांप उठा। उसने कातर दृष्टि से गोनू झा को देखा।

"भाई, इस प्रकार क्या देखते हो। आज पुरस्कार में मुझे सौ कोड़े मिले हैं। वचन के अनुसार सारा पुरस्कार तुम्हारा है।" गोनू झा बोले।

द्वारपाल दौड़कर गोनू झा के पैरों में गिर पड़ा।

"क्षमा पंडित जी, क्षमा! मैं मूर्ख भूल गया था कि मैं किससे पंगा ले रहा हूं। भविष्य में मैं कभी ऎसा अपराध न करूंगा।'

"भाई, यहां क्षमा और दंड का अधिकार महाराज को है। मैंने तो जो वचन दिया था मात्र उसे निभा रहा हूं। " गोनू झा ने कहा।

द्वारपाल रो-रोकर महाराज से क्षमा मांगने लगा।

"प्रहरी, तुम्हारा अपराध क्षमा योग्य नहीं है। तुम हमारे राज्य में भ्रष्टाचार का बीज बोने का कुचक्र रच रहे थे। दंड्नायक, इस अपराधी को इसका पुरस्कार देकर राज्य से बाहर कर दिया जाए..."

"और इसके परिवार के भरण-पोषण का भार राजकोष उठाए।" गोनू झा ने तत्काल जोड़ा, जिसे मिथिला नरेश ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

द्वारपाल को उसके किए का दंड मिल गया।

"गोनू झा, वास्तव में ही तुम बुद्धिमान और कर्त्तव्यनिष्ठ हो। तुमने अपने पद के अनुसार अपना कर्त्तव्य निभाया है। राज्य को एक आगामी संकट से बचाया है। तुम्हारे पास बुद्धि, कर्त्तव्य और दया जैसे सभी गुण हैं। हमें गर्व है कि तुम हमारे प्रमुख सलाहकारों में से एक हो।"

इस प्रकार गोनू झा ने दरबार में पहले ही दिन अपनी धाक जमा ली। बड़े ही विनोदपूर्ण तरीके से उन्होंने एक भ्रष्ट द्वारपाल को दंडित कराकर यह संदेश दे दिया था कि वह मात्र विनोदपूर्ण ही नहीं थे बल्कि गम्भीर सलाहकार भी थे। महाराज ने उस दिन भी गोनू झा को ढेर सारा पुरस्कार दिया।

पंडित, नाई और गोनू झा

गोनू झा के गाँव में फेरन मिश्र नाम के एक धनाढ्य ब्राह्मण रहते थे। मिश्रा जी के पास धन की कोई कमी नहीं थी। गोनू झा से उनके अच्छे संबंध थे।

एक बार मिश्रा जी को किसी बाहर गाँव में कथा बांचने जाना था। कथा एक सेठ के घर थी जहां से भारी दक्षिण मिलती थी। मिश्रा जी साल में चार बार तो जरूर ही सेठ के यहां कथा, कीर्तन कर देते थे और दक्षिणा में काफी माल बटोर लाते थे। मिश्रा जी अभी अधेड़ उम्र के ही थे।

उनका स्वभाव रंगीला था। सज-धजकर रहना उनका शौक था।

मिसराइन से इसी बात को लेकर तू-तू मैं-मैं भी होती रहती थी। मिसराइन को सदैव संदेह रहता था कि सज-धजकर बाहर जाने वाले मिश्रा जी कहीं कोई गुल तो नहीं खिला रहे।

खैर उस दिन कथा में जाने पहले मिश्रा जी ने चहरे पर आ रही। दाढ़ी-मूछों को हटाने के इरादे से जोरावर नाई को बुला भेजा।

जोरावर नाई था तो बड़ा काइयाँ पर यह भी जानता था कि मिश्रा जी उसे कुछ नहीं देंगे। हमेशा मुफ्त में दाढ़ी बनवाने वाले मिश्रा जी उसे क्या देने लगे।

वह अनमना-सा अपने औजार लेकर मिश्रा जी के यहां पहुंचा।

आ जा जोरावर, मिश्रा जी चहककर बोले - तेरे पास एक घंटे का टैम है। आज ऐसी दाढ़ी बना, ऐसी दाढ़ी बना कि पंडित जी दमक उठे।

कहीं ख़ास ठौर जाना लगता है महराज। जोरावर ने पूछा।

यही समझ ले। समझ कि मैं दर्पण देखकर खुश हुआ तो तुझे भी खुश करके भेजूंगा, मिश्रा जी ने कहा।

जोरावर जानता था कि वह मिश्रा जी का अचूक नुस्खा है। कह देने भर से ही खुश कर देने वाले आदमी थे।

बाहर चबूतरे पर बैठकर जोरावर मिश्रा जी की दाढ़ी गीली करने लगा। दो-चार लोग और बह आ बैठे।

बढ़िया-सी कारीगिरी दिखाना बेटा। खुश हुआ तो इनाम दूंगा। आसपास बैठे लोग होंठ दबाकर हंस पड़े।

महाराज, क्यों गरीब को सपने दिखाते हो ? जोरावर बोला - आजतक तो आपकी जेब से दमड़ी मिली नहीं। आज ही क्या जरूरत है।

पंडित जी ने घूरकर जोरावर को देखा।

अबे नाई, आज देखना। आज अगर तूने मेरी पसंद का काम कर दिखाया तो मैं तुझे कुछ जरूर दूंगा। मिश्रा जी ने अकड़कर कहा।

कुछ! पक्की बात ? जोरावर की भवन तन गई।

पक्का। पांच पंचों के बीच की बात है। कुछ तो तुझे मिलेगी ही।

जोरावर कुटिलता से मुस्कराया। कहते हैं कि नाई में छत्तीस अक्ल होती है। आज मिश्रा जी को भड़ी पड़ने वाला था। जोरावर ने अपना पूरा तजुरबा लगाकर मिश्रा जी की दाढ़ी, मूछों को साफ़ किया और दर्पण मंगाकर मिश्रा जी के सामने किया।

मिश्रा जी प्रसन्न हुए। आज तो वह अपनी उम्र से दस बरस कम लगने लगे थे।

प्रसन्न भए महराज ? जोरावर ने पूछा।

हाँ भई। काम वाकई अच्छा किया तूने। मांग ले कुछ। कुछ ही दे दो महराज।

अरे मांग तो सही। 'कुछ' मांग लिया न महराज।

'कुछ' का क्या मतलब ? मिश्रा जी सकपकाए। ये तो आप जानें। आपने ही कहा था की 'कुछ' मिलेगा। अब 'कुछ' के सिवा मुझे तो कोई चीज चाहिए नहीं। आप वादा कर चुके हैं। पंचों के सामने 'कुछ' जरूर दूंगा कहा है आपने। मुकर तो नहीं सकते।

अबे क्या अंट-शंट बक रहा है। कुछ का कोई मतलब तो बता। रुपया, पांच रुपया, दस- पांच सेर धान। कुछ तो बक।

पांच सौ रुपया। क्या बक रहा है ? मिश्रा जी भड़के।

या तो कुछ दीजिये या पांच सौ रुपया दीजिये। या फिर पंचायत में चलकर मुकर जाइए महाराज। शाम तक सोच लीजिए। जोरावर ने अपनी पेटी समेटी और चलता बना।

आज पहली बार मिश्रा जी फंसे थे। मिश्रा जी काठ का उल्लू बने रह गए। कैसा फंदा डाला कमीने नाई ने! कुछ मांगता है या कुछ का पांच सौ रुपया मांगता है। दोनों ही चीजें देना असम्भव था। मिश्रा जी पसीने-पसीने हो चले। फिर नहा-धोकर धंधे पर चल पड़े। पर सारे रास्ते चैन न मिला। बार-बार नाई की बात दिमाग से टकरा रही थी। क्या भरोसा उस नाई का। कहीं पंचायत ही न बिठा दे। सब किरकिरी हो जाएगी पर पांच सौ रूपये देना तो बड़ा मुश्किल काम था।

मिश्रा जी जैसे-तैसे कथा में तो पहुंचे पर आज उनकी वाणी में न तो पहले जैसा ओज था और न सरसता। परिणाम यह हुआ की चढ़ाव कम रहा और दक्षिणा में भी कटौती हो गई। रोते-कलपते, नाई को कोसते घर की तरफ लौटे। अभी गाँव के पास ही पहुंचे थे कि पलटन झा मिल गए।

प्रणाम महराज! ई का झाड़ पाल लिया ? पलटन झा ने पूछा।

क्या। ....क्या हुआ ? पंडित जी का दिल पसलियों से टकराया। ऊ ससुरा नउआ सारे गाँव में कहत फिरत है कि आप पर पंचायत करेगा।

शिव शिव! झा जी, इस छत्तीसे ने तो मुझे फंदे में डाल दिया। हुआ क्या ?

मिश्रा जी ने सारी बात बताई। झाड़ तो ससुरा कंटीला है मिश्रा जी। नउआ चालाक है। आप तो दुई तरफ से फंसे हो।

पलटन झा ने गम्भीर मुद्रा से कहा। अब मैं क्या करूं ? पंचायत में तो मिट्टी खराब हप जाएगी। पांच सौ रुपया देने होंगे।

अरे, इतना रुपया मेरे पास कहां रखा है। मिश्रा जी कलप उठे।

नहीं रखा तो भुगत लीजिए, पलटन झा हंसकर चले गए।

अब तो मिश्रा जी और भी परेशान हो उठे। गाँव की तरफ पैर न उठते थे। कहीं कोई राह न सूझ रही थी। घर की तरफ चल पड़े। रास्ते में जो भी मिलता अजीब तरह से प्रणाम करता।

मिश्रा जी मन-ही-मन कलप जाते। क्या विघ्न आ गया था उनकी अच्छी-खासी कुंडली में। आज घर जाकर अपनी कुंडली पढ़ेंगे।

आज तक तो कभी पढ़ी न थी। औरों की कुंडली बांचकर अपनी पोटली बांध लेते थे। एक छोटी जाती का नाई आज जैसे कालसर्प योग बनकर कुंडली में आ बैठा था।

और मजे की बात यह थी कि उसका कोई निवारण भी नहीं सूझ रहा था।

डर यह भी था कि घर पर मिसराइन की चख-चख सुनने को मिलेगी। वह ऐसा सुंदर मौका कहाँ छोड़ने वाली थी।

यह सोचकर तो मिश्रा जी का दिमाग और भी भन्ना गया। मिसराइन के व्यंग्य-बाणों की एक झड़ी तो उनकी आँखों के सामने तैर गई। अब क्या करे।

अचानक गोनू झा का नाम दिमाग में कौंधा। अहा! एक वही आदमी ऐसा है जो उन्हें इस विपत्ति से बचा सकता है। उसकी बुद्धि के तरकश में अवश्य ही कोई तीर ऐसा होगा जो उस नाई को चित्त कर देगा। बस फिर क्या था। मिश्रा जी ने फौरन गोनू झा के घर का रास्ता पकड़ा।

अब एक मात्र व्ही सहायक नज़र आ रहे थे। लोगों की तरह-तरह बातें सुनते-सुनते मिश्रा जी गोनू झा के घर पहुंच गए। संयोग की बात कि उसी समय गोनू झा खेत से लौटे थे।

प्रणाम मिश्रा जी आइए ! मैं आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। गोनू झा बोले।

मेरी प्रतीक्षा ! भैया तुम्हें पता था कि मैं आऊंगा ?

पता था, जैसी समस्या आपके सामने है, उसमे आपको आना ही था।

फिर तो यह भी बता दो भैया की इस समस्या का कोई हल है या नहीं। महाराज, आप तो विद्वान हैं, शास्त्र पढ़े है आपने। इतना ज्ञान तो आपको होगा ही कि बिना समाधान के समस्या नहीं होती। जिस समस्या का कोई समाधान न हो तो वह समस्या नहीं बल्कि प्रभु का प्रकोप होता है।

यह तो ठीक कहते हो गोनू झा, मैं तुम्हारा बड़ा एहसान मानूंगा यदि तुम मुझे इस मुसीबत से छुटकारा दिला दो। मिश्रा जी गिड़गिड़ा उठे। मिश्रा जी, बेफिक्र रहिए। कल पंचायत बैठने दीजिये। मैं उस अक्लमंद नाई को ऐसा सबक दूंगा की साड़ी होशियारी भूल जाएगा। आप जरा भी चिंतित न हो।

आराम से घर जाएं, भोजन करें और आराम करें। आप बस इतना करे........ गोनू झा ने समझाया। मिश्रा जी के दिल से जैसे बड़ा बोझ उत्तर गया। सुबह से पहली बार उन्होंने चैन की साँस ली थी। उन्होंने गोनू झा को धन्यवाद किया और चल पड़े। रास्ते में नाई मिल ही गया। मिश्रा जी मुस्कराए। हाँ महराज, क्या विचार बनाया आपने ? नाई ने पूछा।

विचार क्या। वादा किया है पंचों के सामने तो निभाना पड़ेगा। तुझे कुछ तो जरूर ही मिलेगा बेटा। तू भी क्या याद करेगा।

गोनू झा के घर से आ रहे हैं महराज ! पर मेरे फंदे से वह भी आपको न निकाल सकेंगे। जोरावर चुनौती देने वाले भाव में बोला।

बेटा, पंचों के सामने वादा किया था और पंचायत में फैसला होगा। मिश्रा जी मुस्कुराकर अपने घर की तरफ चले गए।

जोरावर सोच में पद गया कि गोनू झा ने क्या सीखा दिया जो मिश्रा जी इतना निर्भय हो गए। सुबह तो वह उनके तोता उड़ाकर लौटा था।

कुछ समझ नहीं आ रहा था। अब रात भर जोरावर न सोया। उसने बहुत दिमाग लगाया कि उसके फंदे का तोड़ क्या हो सकता है। खुद उसे तो कुछ सूझ नहीं रहा था। आखिर सुबह पंचायत बैठ गयी।

सर्वसम्मति से गोनू झा को सरपंच बनाया गया। पंचो ने मामला सुना। गवाह ने पुष्टि की कि मिश्रा और नाई के बीच वही बाते हुई थी।

अब या तो मुझे मेरा 'कुछ' दिलाया जाए या मिश्रा जी को दंड के रूप में पांच सौ रुपया देने का आदेश दिया जाए, जरोवर बोला।

बात सौ फिसदी सच है मिश्रा जी। खैर जोरावर, जरा एक गिलास पानी तो ला। बड़ी प्यास लगी है, गोनू झा बोल।

जोरावर शंकित तो था पर कुंए से एक गिलास पानी लाकर गोनू झा को थमाया। गोनू झा ने एक घूंट पानी पिया और वापस गिलास नाइ को थमाया। अभी पकड़, फिर पिता हूँ। गोनू झा बोले - हाँ तो मिश्रा जी आपने इसे 'कुछ' देने का वायदा किया था जो की आप नहीं दे पा रहे।

सरपंच जी, ऐसा नहीं है।

मिश्रा जी ने कहा - जब मैंने वादा किया था वादा किया था तो क्यों व्यवस्था न करता। मैंने 'कुछ'की व्यवस्था कल ही कर ली थी। पर आज सुबह वह मेरी जेब से कहीं गम हो गया। अब दूसरे 'कुछ' के इंतजाम में समय तो लगेगा ही।

कितना समय लगेगा ?

लगभग एक माह।

क्यों भाई जरोवर, क्या तुम एक माह प्रतीक्षा कर सकता है ?

सरपंच जी, हम रिआया हैं। आज के काम की कीमत महीने भर बाद मिली तो हमारे बच्चे कैसे पलेंगे। जोरावर बोला।

बात तेरी भी ठीक है। मिश्रा जी, आपने अपना 'कुछ' कहाँ गुम कर दिया।

क्या पता सुबह कुँए पर स्नान करने आया था और दिशा मैदान गया था।

फिर तो मिश्रा जी। ........ गोनू झा ने कहा - ला जोरावर पानी दे। जोरावर ने हाथ में थमा गिलास गोनू झा की तरफ बढ़ाया कि ठिठक गया। गिलास के पानी में कुछ गिर गया था। पानी पीने लायक न रहा था।

झा जी, इसमें तो कुछ गिरा गया है और भरकर लता हूँ , वह बोला।

अबे क्या गिर गया ?

पता नहीं, कुछ अजीब सा ......

अरे 'कुछ' गिरा है तो मेरा होगा। मिश्रा जी चीख पड़े। सुबह कुँए पर स्नान करने आया था। शायद तब कुँए में गिर पड़ा होगा।

जोरावर सन्न रह गया।

निकाल ले भाई जोरावर। गोनू झा मुस्कुराकर बोले - तेरा कुछ मिल गया है। पंचों को भी फारिंग कर।

मगर-मगर जोरावर ने कुछ कहना चाहा।

अब अगर-मगर क्यों करता है। तूने 'कुछ' ही तो माँगा था और अभी पंचायत के सामने तूने खुद कहा है कि पानी की गिलास में कुछ गिरा है। यह 'कुछ' कुँए के अंदर से ही आया है। मिश्रा जी ने बताया ही था कि उनका 'कुछ' जो तुझे देना था गम हो गया है।

जोरावर चुप! वह फंस तो गया ही था। अब उसे समझ आया की गोनू झा साधारण बुद्धिमान न थे बल्कि किसी भी प्रकार की समस्या का समाधान खोजने में प्रवीण थे।

उसे उन पर क्रोध आ रहा था जो उन्होंने बड़ी मुश्किल से फंसे शिकार को उसके हाथ से निकल दिया था। पर वह क्या कर सकता था। जाती का नाई ही तो था। उसने बात से ही पंडित को फंसाया और बात से ही पंडित निकल गया था।

पंचायत अपने घर चली गई और सब गोनू झा की तारीफ की पुल बाँध रहे थे।

गोनू झा का शास्त्रार्थ

मिथिला के राजदरबार में एक दिन कशी से पढ़कर एक विद्वान आया।

मिथिला नरेश ने उसका समुचित स्वागत किया और उसे आसन दिया। विप्रश्रेष्ठ ! राजा ने कहा - आप जैसे विद्वान के चरण हमारे राज्य में पड़े यह हमारे लिए बड़े ही सैभाग्य की बात है।

अब हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि कुछ दिन हमारे आतिथ्य स्वीकार करें और अपने ज्ञान से हमे और हमारी प्रजा को लाभान्वित करें।

राजन विद्वान ब्राह्मण बोला- मैं काशी के प्रसिद्ध गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त हूँ। समस्त वेद, शास्त्र और पुराण मुझे कंठस्थ हैं। इस समय मैं एक विशेष प्रयोजन से यात्रा पर हूँ।

यात्रा विद्वानों के ज्ञान प्रसार का माध्यम होता है शास्त्री जी परन्तु प्रत्येक यात्रा पड़ाव भी चाहती है। आप कुछ दिन हमें भी सेवा का अवसर दें।

इससे पूर्व आप मेरा प्रयोजन जान लें महाराज।

बताइए विप्रश्रेष्ठ।

मैं काशी से पूर्ण शिक्षित होकर निकला तो मुझे मार्ग में एक कथावाचक विद्वान, सभा के बीच रामचर्चा करते मिले। मैंने उनसे तीन प्रश्न कर डाले।

उनसे एक का भी जवाब न दिया गया। ज्ञान तो उनका सीमित था ही, क्रोध उनसे एक का ही जवाब न दिया गया।

ज्ञान तो उनका सीमित था ही, क्रोध उनसे असीमित था।

वह लज्जित होकर भरी सभा में क्रोधित हो उठे और बोले - हे विद्वान, मैंने माना कि आपके पास ज्ञान का प्रचुर भंडार है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि आप सृष्टि के सर्वश्रेठ विद्वान हैं।

इस पृथ्वी पर एक से बढ़कर एक विद्वान हैं। जिस दिन आपको स्वयं से उत्तम मिलेगा उस दिन आपका ज्ञान बगलें झांकता नजर आएगा। शास्त्री ने बताया।

विप्रवर उस कथावाचक की यह बात तो सत्य है कि संसार में एक से एक उच्चकोटि का विद्वान है। राजा ने कहा।

परन्तु मेरा ऐसा मानना नहीं है। मैंने समस्त शिक्षाएँ पूर्ण की हैं और मैं पूर्ण विद्वान हूँ। मेरे समकक्ष विद्वान हो सकते हैं परन्तु मुझसे अधिक विद्वान कोई नहीं मिलेगा। शास्त्री अहंकार से बोला- और मेरी यह यात्रा उसी विद्वान की खोज में हैं।

मैं घोषणा करता हूँ कि जो विद्वान मुझे शास्त्रार्थ में पराजित कर देगा, मैं उसका शिष्य हो जाऊंगा अन्यथा उसे मेरा शिष्यत्व स्वीकार करना होगा।

आप कैसे विद्वान का शिष्य बनना भी सौभाग्य होगा।

राजन्, मैं समस्त मिथिला राज्य के विद्वानों को शास्त्रार्थ के लिए ललकार रहा हूँ। यदि मैं पराजित हो जाऊ तो मिथिला नरेश का दास बनकर रहूंगा और यदि मैं विजयी रहा तो मिथिला का सर्वोच्च सम्मान मुझे मिलेगा।

विप्रवर, आप ज्ञान के अहंकार में हैं। अहंकार विद्वानों को शोभा नहीं देता।

ज्ञान का प्रदर्शन ही विद्वान की शोभा है। क्या मिथिला राज्य विद्वानों से विहीन है। क्या मेरी चुनौती स्वीकार करने की सामर्थ्य नहीं है।

अब तो मिथिला नरेश भी क्रोधित हो उठे। उन्हें अपने राज्य के विद्वानों पर विश्वास था। चुनौती स्वीकार कर ली गई।

शास्त्रार्थ शुरू हो गया। दरबार में उपस्थित विद्वान बारी-बारी से शास्त्री से भिड़े। पर शास्त्री के ज्ञान के समक्ष कोई न टिका।

अब तो महाराज को भी चिंता सताने लगी कि वास्तव में मिथिला में कोई ऐसा विद्वान नहीं जो उस गर्वीले शास्त्री को पराजित कर सके।

और दूसरे दिन भी शास्त्री को कोई पराजित न कर पाया। फिर तो महाराज ने सारे राज्य में घोषणा करा दी कि जो भी उस शास्त्री को पराजित करेगा उसे भरपूर पुरस्कार सहित दरबार में विशिष्ठ पर प्राप्त होगा।

बात गोनू झा के गाँव में भी पहुंच गई।

भई, हमारे गाँव के विद्वान तो गोनू झा हैं। इन पर मां काली की विशेष कृपा है। यही उस शास्त्री को हराकर मिथिला का सम्मान बचा सकते हैं। ऐसा अवसर बार-बार नहीं आता। गाँव के एक वृद्ध ने कहा।

अरे हाँ, गोनू झा ने कभी विद्यालय का मुंह नहीं देखा। दूसरे ने कहा - और वह शास्त्री काशी से पढ़कर आया है। दाल नहीं गलेगी।

कैसी बात करते हो। गोनू झा का ज्ञान किताबी नहीं हैं। वह तो माँ काली की कृपा से जन्मजात विद्वान हैं। देख लेना, गोनू झा यदि शास्त्री से भिड़े तो शास्त्री की बोलती बंद हो जाएगी।

भेज दो उसे।

फिर सारा गाँव मिलकर गोनू झा के घर पहुंचा।

काका, कहाँ काशी का विद्वान और कहाँ मैं। गोनू झा ने कहा।

गोनू बेटा, हमारा विश्वास कहता है कि तुम अवश्य ही जीत जाओगे। और वैसे भी मिथिला का सम्मान संकट में है। तुम्हे आगे बढ़कर प्रयास करना चाहिए।

माँ भगवती की कृपा से यह तुम्हारे लिए सुनहरा अवसर है।

ठीक है काका। यदि आप ऐसा कहते हैं तो ऐसा ही होगा। मैं आज ही मिथिला जा रहा हूँ। गोनू झा ने कहा और तैयारी शुरू कर दी।

फिर वह मिथिला चल पड़े। दो दिन के सफर के बाद मिथिला जा पहुंचे और राजमहल के सामने जा डटे। उन्होंने पहरेदार को अपने पधारने का प्रयोजन बताया।

भैया! पहरेदार निराश से बोला - वह शास्त्री बड़ा विद्वान है और लगता है कि मिथिला का सम्मान नहीं बचेगा। ऐसे-ऐसे प्रश्न पूछता है कि विद्वानों की बोलती बंद हो जाती है।

ऐसी बात मत सोचो मिथिला भाई। मिथिला ज्ञान की भूमि है। वह शास्त्री यहां से पराजित होकर ही लौटेगा। माँ धरती पे विश्वास रखो।

भाई हमारे महाराज इन दिनों बड़ी चिंता में हैं।

महाराज से जाकर कहो कि मुझे शास्त्रार्थ की आज्ञा दें।

पहरेदार ने उसे वहीं रोका और दरबार में सूचना भेजी। गोनू झा को अंदर भेजा गया। अभी-अभी शास्त्री ने एक विद्वान को पराजित किया था और अपनी जीत पर बड़े ही मोहक ढंग से मुस्करा रहा था।

गोनू झा अभी-अभी पहुंचे थे।

महाराज की जय हो। मेरा नाम गोनू झा है। मैं आपकी प्रजा का एक हिस्सा हूँ। आपकी कृपा से मुझे भी थोड़ा-बहुत ज्ञान है और उसी ज्ञान के विश्वास पर मैं इन परमविद्वान ब्राह्मण से शास्त्रार्थ करने की आज्ञा चाहता हूँ।

राजा ने साधारण वेशभूषा वाले देहाती को देखा और धीरे से स्वीकृति दे दी। उन्हें नहीं लगता था कि यह साधारण देहाती भी कुछ कर पाएगा।

गोनू झा, शास्त्री के सामने वाले आसन पर जमकर बैठ गए।

शास्त्री महाराज मुस्कराए। उनकी मुस्कान में उपहास का भाव था जैसे कह रहे हों की - यह मुंह और मसूर की दाल।

तो शास्त्री जी आप है वो प्रकांड विद्वान जो मिथिला को शस्त्रों से नहीं शास्त्रों से पराजित करने का दुस्साहस कर रहे हैं।

गोनू झा बोले।

शास्त्री जी हड़बड़ाए। अभी तक किसी ने एक प्रकार की भेदभरी बात उनसे कही जो न थी।

स्वयं मिथिला नरेश भी सचेत हो गए और एक हल्की-सी आशा की किरण उनके मुख पर चमकी।

शास्त्रार्थ के लिए तैयार हो जाओ जवान। शास्त्री तिलमिलाया।

मैं तो तैयार हूँ भगवन! गोनू झा मुस्कराए।

तो फिर मैं प्रश्न करूं ?

विद्वान महोदय। गोनू झा बोले - आप तो चार दिन से प्रश्न ही कर रहे है विद्वान केवल प्रश्न ही नहीं करते बल्कि उत्तर भी देते हैं।

इस बार तो शास्त्री और भी हड़बड़ा गए। मिथिला नरेश अनायास ही ताली बजा उठे।

उस देहाती ने शास्त्री को विचलित कर दिया था।

तुम्हारा क्या अभिप्राय है ? शास्त्री ने पूछा।

महोदय, मैं आपसे प्रश्न करने की आज्ञा चाहता हूँ। इसमें आज्ञा कैसी ! महाराज ने बीच में कहा - शास्त्रार्थ में प्रश्न और उत्तर ही तो होते हैं।

तुम अपने प्रश्न करो। शास्त्री जी प्रकांड विद्वान है इन्होने समस्त वेद और शास्त्र पढ़े हैं।

अब शास्त्री जी शंकित हो उठे। अभी तक उन्होंने प्रश्न ही किए थे .आज पहली बार उनके सामने प्रश्नकर्ता आया था।

जाने कैसे प्रश्न करेगा ?

है तो महोदय, मेरा पहला प्रश्न है की बुद्धि का प्रकाट्य कहाँ है ? साधारण और बचकाना प्रश्न है। मस्तिष्क से बुद्धि प्रकट होती है। शास्त्री से आराम से कहा।

नहीं महाराज बुद्धि का प्रकाट्य होंठों से होता है। गोनू झा बोले- यदि होंठ न खुले तो बुद्धि का प्रकटन कैसे होगा।

दरबार में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। शास्त्री जी का मुंह उत्तर गया।

देहाती का प्रश्न और उत्तर दोनों ही सटीक थे। महाराज ने गर्व से गोनू झा की ओर देखा।

महोदय, मेरा दूसरा प्रश्न है कि बुद्धि का आहार क्या है ?

शास्त्री जी चकरा गए, बुद्धि कब से खाने लगी। यह क्या बेतुका प्रश्न है। बुद्धि के पेट ही कहाँ होता है। शास्त्री झल्लाया।

नहीं महोदय, फिर भी बुद्धि समय को खाती है। समय ही बुद्धि का आहार होता है। आप चार दिन से बुद्धि का प्रयोग कर रहे हैं तो क्या बुद्धि ने चार दिन का समय नहीं खाया। गोनू झा बोले।

सभा एक बार फिर करतल ध्वनि कर उठी। शास्त्री का मुंह देखने लायक था। प्रश्नकर्ता साधारण दीखता था, प्रश्न असाधारण थे।

अब मेरा अंतिम प्रश्न है कि मेरी बुद्धि का मूल्य क्या है ?

गोनू झा अंतिम प्रश्न कर दिए।

शास्त्री जी चकराकर अपना सर खुजलाने लगे। इससे स्पष्ट था कि उस प्रश्न का भी कोई उत्तर उनके पास नहीं था। बुद्धि ला कोई मूल्य कैसे आंक सकता है और वह भी किसी और की बुद्धि का।

महाराज, आज्ञा हो तो मैं अपने इस प्रश्न का उत्तर दरबार के साधारण से दरबारी से दिलवाऊं ताकि शास्त्री जी को यह भ्रम न रहे की मिथिला राज्य में विद्वता की कोई कमी है।

अति उत्तम! राजा प्रसन्न हो उठे - आज्ञा है। गोनू झा ने वही प्रश्न एक साधारण दरबारी से किया।

महाराज, इनकी बुद्धि का मूल्य तो आज बच्चा-बच्चा जानता है। दरबारी ने कहा - इन्होने अपनी बुद्धि से शास्त्री जी का यह भ्रम तोड़ दिया कि इनसे बड़ा विद्वान कोई नहीं है।

अब यह विजेता हैं और विजय का मूल्य ढेर सारे पुरस्कार और दरबार में विशिष्ट पद के रूप में इन्हें प्राप्त होगा।

अवश्य, अवश्य! वाह युवक, तुम वाकई विद्वान ही नहीं चतुर भी हो। हम आस से तुम्हें अपना प्रधान सलाहकार नियुक्त करते हैं।

और जो भी पुरस्कार बहुत प्रसन्न हुए। राजा ने कहा। उधर शास्त्री जी उठकर अपना पोथी-पत्रा समेटकर चलने को हुए तो गोनू झा

ने हाथ जोड़कर मार्ग रोका।

शास्त्री जी, आप परमविद्वान हैं। मुझे यह स्वीकारने में कोई संकोच नहीं कि मैंने ज्ञान से नहीं, तुक्के से आपको पराजित किया है। अतः आप मन में ग्लानि न रखे। आप हमारे पूज्य हैं। शास्त्री जी की आँखे खुल गई। गोनू झा विद्वान भी थे और सज्जन हृदय भी।

उनका गर्व चूर-चूर हो गया।

गोनू झा मिथिला दरबार के सम्मानित पद पर आसीन हुए। उन्हें महाराज ने यह भी सुविधा प्रदान की कि वह जब चाहें दरबार आ सकते हैं। और ढेर सारा पुरस्कार लेकर गोनू झा वापस अपने गाँव आ गए।

ग्रह-दोष निवारण

गोनू झा राजदरबार में नियुक्त हो गए थे।

सारा गाँव गोनू झा पर गर्व कर रहा था।

उन्होंने उस गाँव का नाम रोशन जो किया था। सबने गोनू झा को बधाई दी।

उन्होंने उस गांव का नाम रोशन जो किया था। सबने गोनू झा को बधाई दी। तब गोनू झा ने भी विचार किया कि गाँव वालों की इस ख़ुशी में एक भोज-समारोह का आयोजन किया जाए। धन की तो अब कोई कमी नहीं थी। पुरस्कार में ढेर सारा धन मिला था।

अगले ही दिन माँ भगवती के जागरण का आयोजन किया गया और आसपास के गांवों से भी भोज में आए। गोनू झा सबका स्वागत कर रहे थे।

बड़ी ही चहल-पहल हो रही थी।

शाम ढल गई थी। बाहर गाँवों से आने वाले और नाते-रिश्तेदार विदा करते-करते रात हो गई।

फिर भी कोई लोग अभी जाने वाले थे। उधर घुरिया और उसकी चोरमंडली गाँव से बाहर एक खंडहर में बैठी विचार-विमर्श कर रही थी।

देखा गोनू झा को। कैसे दिमाग के दम पर ही धन भी कमा लाया और राजदरबार में भी नियुक्त हो गया .घुरिया आह भरकर बोला।

गुरु भूल गया लगता है। दिमाग के ही दम पर उसे चतुर सुजान आदमी ने हमलोगों से अपना खेत खुदवा लिया था जबकि मजदूर ढूंढे नहीं मिल रहे थे। हमने मुक्त में मजदूरी की। एक साथी बोला।

उस दिन को याद करके तो मेरा खून खौल उठता है। कैसे उल्लू बनाया उस गोनू झा ने। हम उसे घर में कुदाल चलाता देखकर धोखा खा गए।

जबकि उसने एक मामूली गड्ढा खोदा था और उसी में कुदाल चलाता रहा। हम समझे कि उसने सारा घर खोद फेंका।

और गुरु मजे की बात तो यह कि उसे पता है कि उसके जाल में फंसने वाले निरे बुद्धू तो हम ही थे।

मेरा वश चले तो उसे ऐसा सबक सिखाऊं कि सारी चतुराई भूल जाए। पर क्या करूं। चोरी के आलावा तो हम कुछ नहीं कर सकते।

तो चोरी ही करते हैं .अब तो उसके घर पर माल भी खूब है।

खूब ही है। देखा नहीं, सारे गाँव की कैसी दावत की है।

गुरु, आज मौका भी है। गोनू झा कल सारी रात का जागा है और आज सारा दिन भी भागदौड़ में रहा है। बुरी तरह थक गया होगा।

बात तो पते की है। मौका अच्छा है। नींद के मारे बेहाल होंगे दोनों पति-पत्नी। घोड़े बेचकर सोएंगे। जरा-सी सावधानी से हम अपना काम कर सकते हैं। घुरिया ने कहा। तो फिर चलते हैं।

देखते है कि हमारा शिकार सोया कि नहीं।

चल तो रहे हो भाई लोगों। एक और साथी बोला - पर याद रहे कि हम बहुत चतुर आदमी से पंगा ले रहे हैं। वह आदमी एक भी क्षण गफलत नहीं करता।

अरे, उसे क्या सपना आया है कि आज रात हम उसके यहां उसके यहां चोरी करने पहुंच रहे हैं। वह तो नींद के हवाले हो चुका होगा।

आखिर सब वहां से चल पड़े। गाँव में घुसे तो सारा गाँव सोया पड़ा था पर गोनू झा के घर लालटेन अभी जल रही थी।

यह तो अभी जाग रहा लगता है। घुरिया चिंतित हुआ।

थोड़ी-बहुत देर में सो जाएगा।

तब तक क्या यूँ ही खड़े रहे। किसी ने देख लिया तो मारे जाएगें।

ऐसा करते हैं, चलकर गोनू झा की फुलवारी में छुप जाते हैं। वहां से उसके घर की आवाजें भी सुनाई पड़ती हैं . सब जने उस फुलवारी में जा छुपे। फूलों की घनी क्यारी थी।

सब वहीं छुपकर बैठ गए।

गोनू झा के घर से अभी भी बातचीत करने की आवाज आ रही थी।

अब आप भी आराम कीजिए झा जी। एक आवाज आई - हम लोग भी चलते हैं। आप दो दिन से थके हुए है।

आप भी यहीं आराम करें मास्टर जी। गोनू झा की आवाज आई - हमलोग भी चलते हैं। आप दो दिन से थके हुए हैं। आप भी यहीं आराम करें मास्टर जी। गोनू झा की आवाज आई।

अरे नहीं। जरा दूर तो जाना है। अच्छा, अब आज्ञा दें।

फिर गोनू झा और एक और व्यक्ति घर से बाहर निकले। उस व्यक्ति को घुरिया और उसके साथी पहचानते थे। वह पड़ोस के गांव का मास्टर गणेश झा था। गोनू झा का परममित्र था।

गोनू झा ने कुछ दूर तक जाकर अपने मित्र को विदा किया और घर की तरफ लौटे। अचानक वह ठिठक गए। उन्होंने फुलवारी में हलचल महसूस कर ली थी। फिर वह दरवाजे पर पहुंचे।

अजी सुनती हो। वह उच्च स्वर में बोले।

क्या है जी ? अंदर से पत्नी की आवाज आई।

अब सब चले गए हैं। पंडित जी कहकर गए हैं ग्रहदोष निवारण तभी करना जब घर में हम पति-पत्नी और भोनू ही हो। वह बोले।

कैसा ग्रहदोष ? कैसा निवारण ? पत्नी अचकचाई।

अरी भागवान! बड़ी जल्दी भूलती हो। लगता है दो दिन की थकान ने तुम्हें भुलक्क़ड बना दिया है। जल्दी करो। एक दिन से कमर सीधी नहीं की और तुम्हें मजाक सूझ रहा है।

यह मजाक नहीं है। हमारे ग्रह में कुछ दोष आ गया है। मिश्रा जी ने मुझे बताया है। अब उनकी बात तो झूठी नहीं हो सकती।

थकी-हारी पत्नी भुनभुनाकर अंदर गोबर लीपने वाली मिटटी का ढेर था। उसने बहुत से ढेले पल्लू में लिए और गोनू झा के पास दाल दिए। गोनू झा ढेले उठा-उठाकर फुलवारी में फेंकने लगे, साथ ही साथ वह अपना मन्त्र भी पढ़ रहे थे।

चाँद चांदनी चंद्र चकोर।

बढ़ा हर लेऊ माखन चोर।

अंतिम शब्द चोर को वह बहुत उच्च स्वर में बोलते थे। उधर घुरिया और उसकी चोर मण्डली मुसीबत में थी। बेचारे बिना हिले-डुले ढेलों का शिकार बन रहे थे। अपनी सिरों को घुटनों में दबाकर अपनी पीठ पर उस प्रकोप को सह रहे थे।

अब बीएस भी करो। पंडिताइन झल्लाकर बोली।

क्यों ? अभी तो पचास भी पूरे नहीं हुए। जाकर ढेले लाओ। गोबू झा निर्विकार भाव से बोले।

दया करो पंडित जी। मेरी सारी देह दुःख रही है। लगता है चक्कर आ जायेंगे। अब मुझे सोने दो।

सोने दो ? अरे तुम्हारा दिमाग खराब है। घर पर ग्रहों की वकवृष्टि है और तुम्हें सोने की सूझ रही है।

कैसी वकवृष्टि! सब तरह तो चैन है।

तुम ढेले लाती हो या नहीं।

नहीं लाती। तुम्हारी सनक के लिए मैं अपनी जान नहीं दूंगी। मुझे ही पता है कि कैसे खड़ी हूँ।

देखो, मेरा दिमाग खराब मत करो। मुझे गुस्सा आ गया तो मेरा हाथ उठ जाएगा और यह तुम्हारी सेहत के लिए अच्छा नहीं होगा। गोनू झा ने गुस्सा से कहा।

हाथ उठाओगे। पंडिताइन बिफर गई - आज हाथ ही उठाओ। तभी कुछ काम होगा। मैं भी तो देखूं कि आपकी बुद्धि कितनी बिगड़ी गई है।

जरा राजदरबार में वाह-वाह क्या हुई तुम तो पगला गए।

मुझे पागल कहती हो। अभी ठहरो।

फिर तो गोनू झा और उनकी पत्नी में रात ठन गई। दोनों जोर-जोर से झगड़ने लगे। इतनी तेज आवाजें हुई कि गाँव भर में जाग हो गई। लोग दौड़-दौड़कर उनके घर की और आए।

क्या हुआ झा जी ? इतनी रात गए क्या झगड़ा है ?

झगड़ा ? पंडिताइन बोल पड़ी - इनका दिमाग फिर गया है।

भाई लोगो, गलती सरासर इसकी ही है। गोनू झा बोले।

मेरी ? हाय राम! कैसा झूठ बोल रहे हो हैं ?

सुनो भाइयो। गोनू झा ने कहा - मैं ग्रहदोष के लिए पंडित जी के बताए अनुसार एक सौ आठ ढेले चन्द्रमा की ओर उछाल रहा हूँ। ये बेचारी अंदर से ढेले ला रही थी। अभी पचास ढेले भी नहीं लाई कि थक गई। कहती है मेरे बस में नहीं।

अब कोई इससे पूछे कि यह मात्र एक सौ आठ ढेले लाने में थक गई और मेरे प्यारे भाईलोग फुलवारी मैं बैठे सारे ढेले अपनी पीठों पर झेलने को बैठा हैं और उफ़ तक नहीं कर रहे हैं।

घुरिया और उसके साथी सन्न रह गए।

और यदि मैं झूठ बोलता हूँ तो फुलवारी में बैठे उन लोगों से पूछिए जो कितनी हिम्मत से ढेलों की मार सह रहे हैं।

घुरिया आदि भागे पर गाँव वालों ने घर दबोचा और इतनी मार लगाई कि सबको नानी याद आ गई। अगले ही दिन उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया।

तब पंडिताइन ने जाना कि उसके पति कोई भी हरकत अकारण नहीं करते थे। उन्हें अपने पति पर गर्व था।

उन्होंने अपने व्यवहार के लिए गोनू झा से क्षमा मांगी तो गोनू झा हंसकर रह गए।

गोनू झा और पड़ोसी का बछड़ा

गोनू झा का एक पड़ोसी था। उसका नाम गोनउरा था। गोनउरा एक सीधा-सादा युवक था। वह बहुत गरीब था जो मजदूरी करके अपना पेट पालता था। उसके माता-पिता का देहांत हो चुका था। कुछ दिनों बाद गोनउरा का विवाह हो गया। उसकी पत्नी सोनावती एक सुंदर और सुशील स्त्री थी। गरीब गोनउरा अपनी सुंदर पत्नी को सभी सुख-सुविधाएं देना चाहता था। पर घोर निर्धनता उसे कुछ नहीं करने देती थी। वह इसी सोच में दुबला होता जाता था।

"आप हर समय किस सोच में डूबे रहते हैं।" एक दिन सोनावती ने पूछा।

"सोना!" गोनउरा ने उदासी से कहा-मैं हमेशा तुम्हारे बारे में सोचता हूं। मैं तुम्हें कोई सुख नहीं दे पा रहा। मैं तुम्हारी सुंदरता को गहनों से, वस्त्रों से नहीं सजा पा रहा। तुम्हारा सौंदर्य जिन आभूषण और प्रसाधनों का अधिकारी है, वह मैं तुम्हें नहीं दे पा रहा।"

"नाथ, यह आप क्या सोच रहे है ।" सोनावती ने प्रेम से कहा - "स्त्री का आभूषण तो उसकी मांग का सिन्दूर होता है । उसका सुख तो उसके स्वामी के होंठों के हंसी मे होता है । आप अकारण स्वयं को दुखी करके मुझे भी दुखी कर रहे हैं । मैं आपके साथ बहुत प्रशन्न हूं और संसार के सब सुख मुझे आपके प्रेम के रूप मे प्राप्त हैं।"

गोनोउरा अपनी पत्नी की बातो से जरा संतुष्ट तो हुआ पर उसके अन्दर यह कसक अभी भी थी पर वह क्या कर सकता था । खाने-पीने का गुजारा ही मुश्किल से हो पाता था । अंदर ही अंदर कुढता गोनउरा अपने जीवन की गाड़ी खींच रहा था। दिन भर मजदूरी करता और शाम को थाका-हारा आता। सोनावती को देखता तो मुरझा जाता और जाने क्या-क्या सोचने लगता।

एक बार करवाचौथ का त्योहार आने वाला था। गोनउरा अपने साथिंयो के साथ एक महाजन के खेत में मगदूरी कर रहा था। दोपहर को सब पेड़ के नीचे बैठे थे।

"यार, ये करवाचौथ भी ना, भाई जेब ढीली करने आता है।" गणेश ने कहा-"मेरी बीवी इस बार जरी की साड़ी मांग रही है।"

"बीवी तो मेरी भी साड़ी मांग रही है।" मोहन बोला -मैंने तो चार महीने से पैसे इकट्ठे करके रखे हैं। अब साड़ी लेने जाऊंगा ।"

भैई, बीबी को साल मे इस दिन ही साड़ी मिलती है । साधुराम ने कहा ।

गोनउरा चुपचाप वहाँ से खड़ा हो गया और फावड़े से जा लगा । उसके दिमाग मे अभी भी सोनावती की तस्वीर घूम रही थी । इस करबाचौथ पर सबकी बीवियाँ नई साड़ी पहनेगी । गणेश की काली-कलूटी बीवी जब नई साड़ी पहन कर निकलेगी तो उसकी हूर-सी बीवी फटी-पुरानी साड़ी मे कैसा महसूस करेगी । गोनउरा की आँखो मे आँसू आ गए ।

अचानक गोनउरा को एक उपाय सूझ गया । उसके पास एक सुन्दर सा तन्दरुस्त बछड़ा था । अगर उसे पैंठ मे बेच दे तो निश्चय ही एक अच्छी साड़ी की कीमत मे बिक जाएगा । फिर वह भी अपनी सुन्दर पत्नी को करवाचौथ पर नई साड़ी मे देख सकेगा । यह विचार आते ही उसने उसी दिन महाजन से अगले दिन की छुट्टी ले ली।

अगले दिन सुबह सवेरे वह बछड़े को लेकर चल पड़ा ।

"कहाँ जा रहे ?" सोनावती ने पूछा ।

"इस बछड़े को बेचने जा रहा हूँ ।"

"क्यों ? ऎसी क्या जरुरत आ पड़ी ?" वह चौंकी ।

"है कोई जरुरत । आकर बताता हूँ ।"

सोनावती ने ज्यादा कुछ न पूछा । वह रात से ही देख रही थी कि उसका पति किसी उलझन में है। गोनउरा चाहता था कि वह साड़ी लाकर पत्नी को देगा तो वह कितनी खुश होगी । उसका वही खुशी भरा चेहरा तो वह देखना चाहता था । वह चल पड़ा ।

रास्ते में उसे एक बकरी चराने वाला मिला जो अपनी तीन-चार बकरियों को चरा रहा था । उस गडरिए ने गोनउरा को देखा ।

"अरे भई, इस बकरे को कहां ले जा रहे हो?" गडरिया बोला ।

"तुम्हारी आंखों में कोई खराबी लगती है।" गोनउरा ने गोनउरा ने हंसकर कहा-"इतना सुंदर और तंदुरुस्त बछड़ा तुम्हें बकरा नजर आ रहा है ।"

"खराबी मेरी आंखों में नहीं, तुम्हारे दिमाग में लगती है । साफ दिख रहा है कि यह बकरा है । तुम कहीं भांग तो नहीं पी आए ।"

गोनउरा उलझन में पड़ गया । उसने बछड़े को देखा ।

"लगता है तुम्हें मेरी बात झूठ लग रही है ।" गड़रिया बोला-"अच्छा, ऎसा करते हैं कि किसी और से पूछ लेते हैं । फिर तो तुम्हें तसल्ली हो जाएगी ।"

"हं... हां ।" गोनउरा धीरे से बोला । उसे खुद शंका हो रही थी ।

गड़रिया और गोनउरा बछड़े को लेकर आगे चल दिए । कुछ दूर चलने पर उन्हें एक बूढा आदमी हुक्का गुड़गुड़ाता मिला।

"अरे भई, इस बकरे को कहां ले जा रहे हो।" बूढा बोला।

अब गोनउरा को कोई शक न रहा कि उसका बछड़ा किसी भूत-प्रेत के साए में आ गया था और बकरा बन गया था।

"इस बकरे को बेचते हो?" गड़रिए ने पूछा-"मेरे पास चार बकरियां हैं । एक बकरा भी होना चाहिए न। तुम दे जाओ। अब यह तो तुम जान ही चुके हो कि यह बछड़ा नहीं बकरा है। यह बूढा आदमी झूठ थोड़े ही बोलेगा।"

"ठीक कह रहे हो।" गोनउरा उदास हो गया।

"तो बेचोगे?"

"बेच दूंगा। बेचने ही ले जा रहा था।"

ठीक है। क्या मांगते हो?"

"साठ रुपया दे दो।"

"ठीक है। क्यों बाबा, क्या कहते हो?"

साठ रुपया। हां भई ठीक ही मांग रहा है। पर शून्य का तो कोई अर्थ ही नहीं होता। साठ में से शून्य तो निकालनी पड़ेगी।" बूढा बोला।

"फिर तो बचा छह रुपया। यह लो भई।"

"यह....यह क्या?" गोनउरा हक्का-बक्का रह गया।

"अब रख भी लो भई।" बूढा बोला-"सौदा तो हो ही गया है। अब बात से पीछे हटना तो मर्द का काम नहीं।"

गोनउरा छह रुपए लेकर दुखी मन से चल पड़ा घर की ओर। वह क्या जानता था कि उसे दो ठगों ने बड़ी चतुराई से ठग लिया था।

वह बुरी तरह टूट गया था। बस जोर से रोने का दिल कर रहा था। घर पहुंचा और पस्त होकर बैठ गया।

"क्या...क्या हुआ? इतना थके-थके क्यों हो?" सोनावती घबरा गई। और गोनउरा के धैर्य का बांध टूट गया। वह बच्चों की तरह बिलख-बिलखकर रो परा। सोनावती ने उसे बच्चे की तरह भुजाओं में भर लिया।

"क्या हुआ? तुम कुछ बताते क्यों नहीं?" वह घबराकर पूछने लगी।

तब गोनउरा ने सारी बात बता दी। सोनावती अपने पति के प्रेम पर बलिहारी हो गई और भोलेपन पर मुस्कराई। उसके पति को ठगों ने ठग लिया था। अब उसे गोनू झा से ही मदद मांगनी चाहिए।

आप फिक्र क्यों करते हैं।'सोनावती बोली-"आपको सीधा और भोला जानकर उन ठगों ने आपको ठग लिया है। पर उन्हें यह नहीं पता कि दुनिया में उनसे भी शातिर लोग हैं। आप गोनू झा के पास चलें। वही हमें बताएंगे कि अब हमें क्या करना चाहिए।"

गोनउरा की आंखो में उम्मीद की किरण चमकी। फिर दोनों जने गोनू झा के पास पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई।

हूं। इस दुनिया में ऎसे लोग बहुत हैं जो दूसरों को मूर्ख बनाने की कला जानते हैं और भोले-भाले लोगों को हानि पहुंचाते हैं। तुम चिंता मत करो गोनउरा। कल मेरे साथ चलना।" गोनू झा ने कहा।

अगले दिन सवेरे ही दोनों चल परे। गोनउरा ने रास्ते में वह जगह दिखाई जहां गड़रिया बकरी चरा रहा था। फिर वह जगह भी, वहां बूढा पंच मिला था। आज वहां कोई नहीं था।

"यहां तो कोई नहीं है।" गोनउरा उदास हो गया।

"यहां कौन होता। यहां उनका घर थोड़े हि है। आओ, हम मेले में चलते हैं। वहां शायद दोनों ठग मिल जाएं।'

दोनों मेले में पहुंचे। सैकड़ोॱ पशु मेले में थे। लोग मोल-भाव कर रहे थे। पशुओं को जांच परख रहे थे। वे दोनों भी घूमने लगे।

"पंडित जी, वह रहा मेरा बछरा।' एकाएक गोनउरा उत्साह से बोला-"और वे दोनों भी वहीं हैं।"

"अच्छा! तुम यहीं ठहरो। जब मैं इशारा करूं तो आ जाना। "

गोनू झा उन ठगों के पास पहुंचे और बछड़े को इधर-उधर से देखने लगे। दोनों ठगों ने उन्हें ग्राहक जाना।

"बड़ा प्यारा खरगोश है भाई। कहां से पकड़ लाए?" गोनू झा बोले।

"खरगोश!" बुड्ढा भड़क गया-"इतना लम्बा चौड़ा बछड़ा तुम्हें खरगोश दिखाई देता है। मति मारी गई है तुम्हारी या भांग-धतूरा खा गए।"

"बछड़ा। यह बछड़ा है? लगता तो नहीं।"

"अरे पागल आदमी, आगे बढ।"

"क्यों भई! इस खरगोश को बेच नहीं रहे?"

"अरे, देखो तो सही। कैसा अजीब आदमी है। चल भाग।" बूढा चीखा।

बूढे की चीख सुनकर आसपास कई लोग जमा हो गए।

"क्या बात है भई?"

"भाई, मैं इस बछड़े को खरीदना चाहता हूं पर यह बाबा गुस्सा कर रहे हैं। अरे जब बेचना ही नहीं था तो बाजार में क्यों लाए।" गोनू झा बोले।

"यह हमारे बछड़े को खरगोश बता रहा था।" युवा ठग बोला।

"भई वाह, तुम भी कमाल करते हो। तुम इसे बकरा बता सकते हो और मैं खरगोश भी नहीं कह सकता। कीमत बोलो इसकी।"

"हां, हां, बोलो।" कई और लोगों ने कहा।

ठगों को खतरे की गंध आने लगी थी।

"दो सौ रुपया है इसकी कीमत।' बूढा जल्दी से बोला।

"अच्छी बात है। अब गणित में शून्य का तो कोई अर्थ होता ही नहीं। ऎसा तुम्हीं ने कहा था। तो दो सौ में से दोनों शून्य निकालो। बचा दो रुपया। लो और बछड़ा मेरे हवाले करो।" गोनू झा ने दो रुपए निकाले।

"अरे, यह क्या कह रहा है लोगों। ये हमें ठगना चाहता है।"

"और तुम जो किसी को ठगकर लाए हो। आओ गोनउरा। आकर सबको बताओ कि इन दोनों ने तुम्हारे साथ क्या किया था।'

गोनउरा दौड़कर आया। दोनों ठग घबरा गए। अब उनकी पोल खुलने वाली थी। दोनों भागने को हुए तो भीड़ ने पकड़ लिया।

"बताओ, क्या बात है?" एक पहलवान ने पूछा।

दोनों ठगों ने अपना अपराध कबूल कर लिया। फिर तो भीड़ ने दोनों में इतनी मार लगाई कि उन्हें नानी याद आ गई। कोई वहां सैनिकों को बुला लाया। सैनिकों को सारी बात बताई गई तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

गोनउरा को उसका बछड़ा मिल गया जिसे उसी समय गोनू झा ने एक व्यापारी को दो सौ रुपए में बेच दिया। गोनउरा की आंखें छलक उठीं। उसने कृतज्ञता से गोनू झा के चरण पकड़ लिए।

फिर वे दोनों गांव की तरफ वापस चल पड़े। गोनउरा बहुत खुश था। अब वह अपनी पत्नी के लिए अच्छी-सी साड़ी भी खरीद सकता था और अन्य सौंदर्य प्रसाधन भी। सोनावती ने जब जाना कि गोनू झा की कृपा से उसका बछड़ा मिल भी गया और अच्छे दामों में बिक भी गया तो वह बहुत खुश हुई।

वह गोनू झा की प्रशंसा सारे गांव में करती फिर रही थी।

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