हनुमान जी की कहानियाँ - दोस्तों, आज की इस पोस्ट में हम हनुमान जी की कहानियाँ लेकर आये है। दोस्तों इन कहानियाँ आपको बहुत हनुमान जी के जीवन के बारे में आपको बहुत जानकारी मिलेगी। उम्मीद है कि आपको यह कहानियाँ पसंद आयेगी।

हनुमान जी की कहानियाँ

Lord Hanuman ji Stories in Hindi List 

अर्जुन के रथ पर हनुमान की कहानी

हनुमान के कर्तव्य की कहानी

हनुमान को ब्रह्मा का आशीर्वाद

श्री राम को हनुमान का वचन

हनुमान के हृदय में श्री राम और सीता

जब हनुमान जी ने सूर्य को निगलने की कोशिश की थी

हनुमानजी की शक्तिया

भगवान श्री राम का वैकुंठ गमन और हनुमान का मन भटकना

सुग्रीव और हनुमान की मित्रता की कहानी

भगवान शनी और हनुमान की कहानी

हनुमान और भरत की मुलाकात

हनुमान जी बूटी लेने गए

हनुमान जी की परीक्षा

संगीत के शिक्षक हनुमान

भगवान शिव और हनुमान युद्ध की कहानी

हनुमानजी के जन्म की कहानी

सीता माता की खोज

हनुमान पर शाप की कथा

हनुमान पुत्र मकरध्वज कथा

भगवान हनुमान को लोग सिंदूर क्यों चढ़ते हैं?

हनुमान का भी भीम कहानी हिन्दी

अर्जुन के रथ पर हनुमान की कहानी

हनुमान और अर्जुन के बीच एक तर्क में, अर्जुन ने दावा किया कि वह भगवान श्रीराम के युद्ध में रावण के साथ अपनी तीरंदाजी कौशल का उपयोग करते हुए वानर सेना द्वारा निर्मित पुल का पुनर्निर्माण कर सकता है। हनुमान ने चुनौती रखी कि क्या अर्जुन एक पुल का निर्माण कर सकता है जो उसके वजन का सामना कर सकता है।

लेकिन अर्जुन का विफल होना तय किया गया था कि अर्जुन पिर में प्रवेश करके अपना जीवन छोड़ देगा, अर्जुन ने एक पल में एक पुल बनाया और जब हनुमान ने इस पर कदम रखा तब पूरा पुल टूट गया, अर्जुन ने बेहद निराश होकर अपना जीवन खत्म करने का फैसला किया। इस समय भगवान कृष्ण ने दर्शन दिया और अर्जुन से पुल का निर्माण करने के लिए कहा और बोले पुल श्री राम का नाम लेकर बनाओ अर्जुन ने पुल का निर्माण किया, और हनुमान को उस पर चलने को कहा।

अपने सर्वश्रेष्ठ प्रयासों के बावजूद हनुमान पुल को तोड़ नहीं सके; इस समय हनुमान को भगवान कृष्ण में श्रीराम दिखे और उन्होंने कहा कि अगर सेना उनको अकेला छोड़ दें, तो वह युद्ध में अर्जुन के रथ के ध्वज पर होगें । उन्होंने अर्जुन के रथ के झंडे पर होने से युद्ध में अर्जुन को सहायता देने का वादा किया, इस प्रकार वह स्थिर रहे और उन्हें महाभारत के युद्ध में सुरक्षित किया।

हनुमान के कर्तव्य की कहानी

श्रीलंका युद्ध के अंत में, अयोध्या के राजा के रूप में राम के राज्याभिषेक के बाद, अंत में, शांति राज्य में प्रबल हो गया। हनुमान राम से प्रेम करते थे, और उनकी प्रेम पूर्ण सेवा करते थे और उन्होंने सबकुछ छोड़ दिया, राम की सेवा करने के लिए उन्होंने व्यावहारिक रूप से सब कुछ त्याग दिया। सीता जी ने अक्सर इसके बारे में सोचती थी और एक दिन उन्होंने , इसके बारे में कुछ करने का फैसला किया और उन्होंने हनुमान को उनके कर्तव्यों से राहत देने के लिए राम से कहा।

फिर भी, सीता, भरत और शत्रुघ्न ने सभी कर्तव्यों को अपने आप में विभाजित किया और सभी कामों से हनुमान को भारमुक्त किया। दुखी भावना से, हनुमान ने तर्क दिया कि एक महत्वपूर्ण कार्य अभी भी बचा है। जब राम विष्णु ज्योति के दिव्य अवतार जम्हाई लेते थे, फिर वह अपनी उंगलियों का प्रयोग करते थे इसतरह के काम के लिए एक जीवन काल भी छोटा था, उन्होंने पूरा दिन इसी तरह राम के पास बैठकर निकाल दिया।

अपने प्रमुख भक्त का सम्मान करने के लिए भगवान राम – बार-बार जंभाई लेते रहे। सीता इस दुविधा में उलझी थी, उन्होंने गुरु वशिष्ट की मदद मांगी, तब वशिष्ट सामने आये और हनुमान से आग्रह किया कि वह कभी न खत्म होने वाले इस कार्य को समाप्त का दें। ये विश्व राम के सामने नत्मश्तक है, पर राम आपके आभारी है।

हनुमान को ब्रह्मा का आशीर्वाद Blessing of Brahma to Hanuman

हनुमान की भक्ति और दृढ़ता ने ब्रह्मा को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने उन्हें कई वरदानों के साथ आशीर्वाद दिया। इसमें हथियारों से प्रतिरक्षा करने की क्षमता, इच्छा पर अपना रूप बदलने और आसानी से जहां वह चाहते थे वहां यात्रा करने में सक्षम होना शामिल था।

श्री राम को हनुमान का वचन

राम के साथ उनका आखिरी वादा यह था कि जब तक राम का नाम याद और पूजा की जाएगी, तब तक वह गुप्त रूप से पृथ्वी पर रहेंगे।

हनुमान के हृदय में श्री राम और सीता

अयोध्या लौटने के बाद, राम और सीता ने उन सभी का सम्मान करने का फैसला किया, जिन्होंने उनकी मदद की थी और जब यह हनुमान की बारी आई तो, सीताजी ने उनको अपना मोती का हार उपहार के रूप में दिया।

हनुमान के द्वारा हार प्राप्त करने पर उनके आँसू बहने लगते है और वह प्रत्येक मोती में सीता राम को खोजने लगे, जब उनसे पूछा गया कि क्यों वह कहते हैं कि हर मोती के अंदर भगवान राम और सीता हैं तो उन्होंने कहा कि राम-सीता के बिना इस हार का कोई मूल्य नहीं है।

उनके आसपास के लोग उनका मजाक उड़ाने लगे और कहने लगे कि भगवान राम और सीता के प्रति उनका संबंध उतना गहरा नहीं हो सकता जितना कि वे दावा कर रहे है तब उन्होंने अपने दिल में राम सीता को दिखाने के लिए अपना सीना खोल दिया और राम सीता सचमुच उनके ह्रदय में दिखने लगे थे।

जब हनुमान जी ने सूर्य को निगलने की कोशिश की थी

एक बार हनुमानजी को भूख लगी ,उनको आस पास कुछ नहीं दिखा तो हनुमानजी ने सूरज को देखा ,हनुमानजी बाला अवस्था में थे ,उनको लगा यह एक फल ही हे ,वह सूरज को निगलने को नज़दीक जा रहे थे ,जैसे जैसे नज़दीक जा रहे थे वैसे वैसे अपना आकर भी बड़ा कर रहे थे।

राहु का ध्यान पड़ा के कोई शक्ति सूरज के नज़दीक आ रही है। उन्होंने तुरंत इंद्र देव से सहायता मांगी ,तब इंद्र देव ने हनुमानजी को रुक ने को कहा ,हनुमानजी कहा मानने वाले थे ,तब इंद्र ने वज्र से हनुमानजी पर प्रहार कर दिया।

हनुमानजी मूर्छित हो कर निचे गिर गए। यह बात हनुमानजी के पिता पवन देव को पता चली ,पवन देव क्रोधित हो उठे। उन्होंने श्रुष्टि के वायु चक्र की गति को बंध दिया।

अचानक से हवा रुक गई और जीवो का दम घुटने लगा ,देवताओ को चिंता हुई की इस प्रकार वायु के थम जाने से तीनो लोको की गति रुक जाएगी।

हनुमानजी की शक्तिया

संकट के समाधान के लिए सारे देवता जाकर पवन देव से इंद्र की किये की क्षमा मांगने लगे। उनको शांत कर ने के लिए सभी देवताओ ने अपनी अपनी शक्तिया और वरदान देने लगे।

जैसे ब्रह्मा ने अमरता का वरदान दिया और और कहा वे अपनी इच्छा से अपनी उपस्थिति बदल सकेंगे। सूर्यदेव ने कहा कि वह अपनी ऊर्जा और चमक का एक हिस्सा देंगे और जब चाहें उन्हें वेद का ज्ञान भी सिखाएंगे।

वरुण ने कहा की वह लंबी उम्र के बावजूत वह पानी के प्रभाव से अप्रभावित रहेंगे। यम देवता ने कहा की उन्हें कभी यमयातना से डरना नहीं पड़ेगा।

विश्वकर्मा ने उन्हें वरदान दिया के उनके द्वारा बनाये गए किसी भी शस्त्र से उन्हें कभी कोई आहत नहीं होगी। कुबेर ने उनकी गदा प्रदान की और युद्ध में विजय बने रहने का आशीर्वाद दिया। इस प्रकार देवताओ द्वारा दी गई शक्तिओ से हनुमाजी धन्य धन्य हुवे।

भगवान श्री राम का वैकुंठ गमन और हनुमान का मन भटकना

मृत्यु के देवता यम, हनुमान से डरते थे, हनुमान जी राम के महल के दरवाजे की रक्षा करते थे और स्पष्ट था कि कोई भी राम को उनसे दूर नहीं ले जा सकता है। यम को प्रवेश करवाने के लिए हनुमान का मन भटकाना ज़रूरी था।

तो राम ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श में एक दरार में गिरा दिया और अनुरोध किया कि हनुमान इसे लाने के लिए जाएँ, बाद में, हनुमान को एहसास हो गया कि नाग-लोक में प्रवेश और अंगूठी के साथ यह समय कोई दुर्घटना नहीं थी।

यह राम के यह कहने का तरीका था कि वह आने वाली मृत्यु को नहीं रोक सकते थे। इस प्रकार श्री राम ने अपने मानवीय शरीर का त्याग किया और वैकुंठ चले गए।

सुग्रीव और हनुमान की मित्रता की कहानी

हनुमान ने भगवान सूर्य को अपने अध्यापक के रूप में चुना और उनसे ग्रंथों को पढ़ाने के लिए अनुरोध किया। सूर्य सहमत हो गये और हनुमान को अपना शिष्य बना लिया। हनुमान की एकाग्रता ने उन्हें 60 घंटे में शास्त्रीय गुरु बना दिया। तब सूर्य ने कहा कि इस उपलब्धि के लिए शुल्क देनी होगी। भगवान सूर्य ने हनुमान से अपने बेटे सुग्रीव को उनके मंत्री और साथी के रूप में सहायता करने के लिए कहा।

भगवान शनी और हनुमान की कहानी

ब्रह्मा के कानून के अनुसार भगवान हनुमान माँ सीता की तलाश में लंका पहुंचने तक भगवान शनि, रावण की कारावास में थे। जब हनुमान जी की पूंछ पर आग लगा दी गई तो उन्होंने अपनी पूंछ की मदद से लंका को आग लगा दी। तब उन्होंने भगवान शनी को रावण के महल के तहखाने में पाया। भगवान शनि के विनम्र अनुरोध पर, श्री हनुमान जी ने उन्हें कारावास से मुक्त कर दिया ।

लंकाओं को राख में मिला दिया गया और श्री हनुमान ने लंका को बर्बाद करने के प्रयास में भगवान शनि की मदद प्राप्त की। चूंकि भगवान शनि हनुमान से प्रसन्न हुए थे इसलिए उन्होंने सेवा के लिए उससे पूछा इस पर, श्री हनुमान से भगवान शनि से वादा किया गया था कि वे उन लोगों को परेशान नहीं करेंगें जो भगवान हनुमान के भक्त हैं।

हनुमान और भरत की मुलाकात

जब हनुमान जी अपने हाथों में पर्वत लेकर अयोध्या को पार कर रहा थे तब वे घायल हो गए थे। जैसा कि वह अयोध्या पार कर रहा थे तब राम के छोटे भाई भरत ने उन्हें देखा और मान लिया कि कुछ रक्षियाँ इस पर्वत से अयोध्या पर हमला करने जा रही है। भरत ने तब राम का नाम लेकर एक तीर चलाया जो राम के नाम से उत्कीर्ण किया गया था।

हनुमान ने इस तीर को नहीं रोका क्योंकि उस पर राम के नाम पर लिखा गया था और वह तीर उनके पैर को घायल करता हुआ निकल गया । हनुमान उतरे और उन्होंने भरत को समझाया कि वह उनके भाई लक्ष्मण को बचाने के लिए पहाड़ को ले जा रहे है।

भरत ने बहुत अफसोस प्रकट करते हुए, हनुमान को एक आग के तीर पेशकश किया, जो हनुमान युद्ध क्षेत्र तक पहुंचने के लिए सवारी के रूप में उपयोग कर सकते थे? लेकिन हनुमान ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, और उडान भरी, और उन्होंने अपने घायल पैर के साथ अपनी यात्रा जारी रखी।

हनुमान जी बूटी लेने गए 

श्री राम की इच्छानुसार सागर के उस पार एक सेतु बनाया गया था और राम और रावण के बीच भयंकर युद्ध हुआ था। लड़ाई के दौरान लक्ष्मण मूर्छित हो गए। लक्ष्मण के इलाज के लिए आवश्यक एक विशिष्ट जड़ी बूटी (संजीवनी जदीबुती) लाने के लिए एक बार फिर हनुमान ने द्रोणाचल पर्वत की ओर उड़ान भरी। पहाड़ पर पहुंचने पर जब हनुमान को विशिष्ट जड़ी-बूटी नहीं मिल पाई तो उन्होंने पूरा पर्वत उठा लिया और वापस राम के लिए उड़ान भरी। रास्ते में श्री राम के भाई भरत को लगा के कोई आकाश मार्ग से विशाल काय दैत्य जा रहा है तो उन्होंने हनुमानजी पर बाण का प्रहार किया। लेकिन जब भरत को अपनी गलती का एहसास हुआ तो उन्होंने हनुमानजी से क्षमा मांगी और तुरंत जड़ीबूटी लेकर वापस भेज दिया। जहा हनुमानजी ने लक्ष्मण का सफल इलाज करने वाले वैद्य सुशाइन को जड़ी-बूटी पहुंचा दी।

हनुमान जी की परीक्षा

युद्ध खत्म होने के बाद राम वापस अयोध्या चले गए और राजयभार सँभालने लगे ,जंगल में रहने के दौरान उनकी मदद करने वाले हर व्यक्ति को उपयुक्त रूप से पुरस्कारित किया गया, लेकिन श्री राम ने जानबूझकर हनुमानजी को पुरस्कारित नहीं किया। इसके बाद माता सीता ने अपनी कीमती पत्थरो से जुडी माला हनुमानजी को भेट की ,हनुमानजी ने उसे ख़ुशी ख़ुशी भेट स्वीकार कर ली। जिन्होंने बड़ी कृतज्ञता के साथ स्वीकार किया। लेकिन कुछ समय बाद दरबारियों ने देखा कि हनुमानजी एक-एक करके अमूल्य पत्थरों को तोड़ रहे थे, दरबारियों ने यह हास्यास्पत कार्य का कारन पूछा। हनुमानजी ने कहा जिसमे राम नहीं हे ,वह चीज़ मेरे लिए बेकार है। (हालांकि यह इस भौतिकवादी दुनिया में अमूल्य हो सकता है।)। उनके इस जवाब से चिढ़कर दरबारियों ने उनसे पूछा कि क्या राम उनके दिल में रहते हैं? जब उन्हें सकारात्मक रूप से जवाब मिला तो उन्होंने हनुमान को इसे साबित करने के लिए कहा। हनुमान तुरंत अपने हाथों के नाखूनों से अपनी छाती चिर कर दिखाई और वहां दरबारियों ने प्रभु श्रीराम ,माता सीता और अन्य भाइयों के साथ अपने दिल में बैठे दिखाया। दरबारी इस कार्य को देखकर हैरान रह गए।

तब प्रभु श्री राम उसी वक्त अपने सिंहासन से खड़े हो गए और हनुमानजी को अपने ह्रिदय से लगा लिया। वहा बैठे सारे दरबारियों ने हनुमानजी की निस्वार्थ प्रेम और भक्ति की लोग सराहना करने लगे।

कहा जाता है की जब तक लोगो के होठो पर ‘राम’ का नाम रहेगा तब तक हनुमानजी पृथ्वी पर जीवित रहेंगे और यह भी कहा जाता है की जहा जहा कलयुग में राम कथा होती है वहा स्वयं हनुमानजी बिराजमान रहते है।

संगीत के शिक्षक हनुमान

हनुमान कथा के अनुसार, हनुमान चार लोगों में से एक है जिन्होंने कृष्ण से भगवद गीता को सुना है और विश्वरूप को देखा है अन्य बाकी तीनों में अर्जुन, संजय और घटोत्कच के पुत्र बरबरिका हैं। नारद पुराण हनुमान को मुखर संगीत के स्वामी के रूप में और शिव और विष्णु की संयुक्त शक्ति के रूप में वर्णित करता है।

भगवान शिव और हनुमान युद्ध की कहानी

अयोध्या लौटने के बाद राम ने अश्वमेध यज्ञ करने का विचार किया, भरत के बेटे पुष्कल के साथ शत्रुधन को घोड़े की सुरक्षा का कार्य दिया गया था। घोड़े जब देवपुर पहुंचे, वीर मुनी और उनके पुत्र वहां के मालिक थे- जो भगवान शिव के भक्त थे।

अंगद ने घोड़े को बांध दिये और उन्होंने सोचा कोई उनके पिता को कोई हरा नहीं सकता है। युद्ध में, पुष्कल ने वीर मुनी को मार डाला और भगवान शिव ने पुष्कल और शत्रुधन का सामना करने के लिए वीरभद्र को भेज दिया और उन्हें हरा दिया।

जब यह हनुमान ने सुना तो भगवान शिव ने आक्रमण किया और कहा कि भले ही आप आज रात राम के भक्त हैं, पर आप मेरे दुश्मन हैं और वह शिव से लड़ते रहे। शिव हनुमान की इस उपलब्धि से प्रभावित हुए और बाद में पुष्कल और शत्रुधन की देखभाल करने में मदद की, जबकि हनुमान उन्हें पुनर्जीवित करने के लिए हिमालय से संजीवनी ले आये थे।

हनुमानजी के जन्म की कहानी

कहा जाता है की राजा दशरथ ने अपने पुत्रो की प्राप्ति के लिए यग्न का आयोजन किया। और फिर यग्न मेसे एक फल निकला उस फल को खाने से पुत्र की प्राप्ति होती ,तब तीनो रानियों ने उसमेसे फल खाया और बाकि बचा हुवा फल एक पक्षी छीन के ले गया तब अंजना एक पर्वत पे टहलने निकली और पुत्र प्राप्ति की लालसा कर रही थी।

तब वह पक्षी उस पर्वत पर फल फेक के चला गया। तब वायु देव ने उस फल को उठाकर अंजना को देदिया और फिर शिवजी प्रगट हुवे और उन्होंने अंजना को निर्देश दिया के वह इस फल का उपभोग करे।

ऐसा करके उन्होंने हनुमान की कल्पना की। वही बचा हुवा फल कैकई के हाथ से पक्षी ने छिना था। अंजना ने वही फल का उपभोग करके हनुमानजी का जन्म हुवा था ,इसीलिए श्री राम हनुमानजी को भरत के समान भाई कहते थे।

सीता माता की खोज

जब श्री राम अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वन में थे, तो अपने पिता राजा दशरथ को अपनी सबसे छोटी रानी कैकेयी को दिए गए वरदान का पालन करने के लिए, तब सीता का अपहरण लंका के राक्षस-राजा रावण ने किया था। जरूरत के इस समय में हनुमानजी ने श्री राम और लक्ष्मण से मुलाकात की और उन्हें किष्किंधा के निर्वासित राजा सुग्रीव के पास ले गए । श्री राम की मदद से सुग्रीव ने अपने बड़े भाई बाली को मार डाला और किशकिंधा की गद्दी फिर से हासिल कर ली । इसके बदले में सुग्रीव ने श्री राम को सीता को खोजने में मदद का वचन दिया।

सीता को खोजने में श्री राम की सहायता करने के लिए सुग्रीव ने भालुओं और बंदरों की फौज उठाई। जब जटायु से पता चला कि रावण ने सीता का अपहरण कर लिया है, जिसका राज्य सागर के पार था तो सवाल उठ रहा था कि कौन सागर पार कर सकता है और सीता के समाचार और ठिकाने लेकर वापस आ सकता है। तब जाम्बावन, भालुओं के राजा ने हनुमान को अपनी विभिन्न शक्तियों की याद दिलाई, जिसे वह ऋषियों के श्राप के कारण भूल गए थे। तब हनुमानजी ने सागर के पार उड़ान भरी, लंका में सीता से मुलाकात की, राम की अंगूठी उन्हें दी और आश्वासन दिया कि राम अपने सैनिकों के साथ आएंगे और रावण को हराने के बाद उसे वापस ले जाएंगे । श्री राम को सीता माता का पता और हाल सुनाने वापस चल दिए।

हनुमान पर शाप की कथा

अपने बचपन में हनुमान शरारती थे, और कभी-कभी जंगलों में ध्यान करते हुए साधुओं को छेड़ते थे। उनकी हरक असहनीय होती थी, लेकिन यह जानकर कि हनुमान एक बच्चे है, ऋषि ने उस पर हल्का अभिशाप रखा था जिसके कारण उन्होंने अपने शक्ति को याद करने की क्षमता को खो दिया था।

जब तक कि कोई अन्य व्यक्ति उन्हें याद न दिलाये वह अपनी शक्तियों को भूल चुके थे। यह अभिशाप किशकिन्दा कांड और सुंदरकांड में उजागर किया गया था, जब जामबंत ने हनुमान को उनकी शक्तियों को स्मरण कराया और सीता को लाने और उन्हें खोजने के लिए प्रोत्साहित किया।

हनुमान पुत्र मकरध्वज कथा

हालांकि उन्होंने कभी शादी नहीं की थी, लेकिन भगवान हनुमान ने लंका को जलाने के बाद समुद्र में डुबकी लगाई तो उनके पसीने की एक बूंद एक मशहूर मछली के मुंह में गिर गई, जिससे मकरध्वज का जन्म हुआ था। मकरध्वज को पाताल लोक का रक्षक बनाया गया था वहीं हनुमान और मकरध्वज की मुलाकात हुई थी।

भगवान हनुमान को लोग सिंदूर क्यों चढ़ते हैं?

एक दिन निर्वासन के बाद, जब सीता और राम अयोध्या में वापस आये, तो हनुमान ने माता सीता को सिंदूर लगाये देखा और पूछा कि यह क्या दर्शाता है? माता सीता ने उत्तर दिया कि यह परंपरागत विवाहित महिलायें अपने पति के जीवन की दीर्घकालिकता के लिए सिंदूर लगाती है।

तो हनुमान गये और उन्होंने अपने पूरे शरीर के ऊपर सिंदूर से लेप कर लिया, जिससे राम प्रभावित हुए और हनुमान से कहा कि जो कोई भी आपको सिंदूर को प्रदान करेगा, उनकी सभी बाधाएं उनके जीवन से हटा दी जाएंगी।

हनुमान का भी भीम कहानी हिन्दी

हनुमान को भीम का भाई माना जाता है क्योंकि उनके पिता भी पवनदेव थे। पांडवों के वनवास के दौरान, हनुमान भीम के सामने एक कमजोर और वृद्ध बंदर के रूप में भेस बदल कर गए ताकि वह उनके अहंकार को कम कर सकें। हनुमान ने अपनी पूंछ को भीम के रास्ते को रोक दिया था। भीम ने अपनी पहचान बताते हुए उनसे रास्ते से हटने को कहा।

हनुमान, ने हटने से इन्कार कर दिया। जब भीम ने दोबारा कहा तो उन्होंने कहा मेरी पूंछ हटाकर निकल जाओ तब भीम ने उनकी पूंछ को हटाने की कोशिश की लेकिन वह अपनी महान ताकत के बावजूद असमर्थ थे, तब भीम को महसूस हुआ कि वह कोई साधारण बंदर नहीं है, तब भीम ने हार मान लिया और उनका अहंकार दूर हुआ ।

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