जादुई मुर्गी

जादुई मुर्गी और सोने का अंडा

एक गाँव में एक बेहद गरीब पुजारी रहता था। उस पुजारी के दो बेटा था। पंडित गाँव के मंदिर में रहने के कारन उसे अच्छे खासे पैसे नहीं मिल पाते थे, जिससे वह पेट भरके अपने परिवार का पालन-पोषण कर सके। “हे भगवान, मैं आपकी हर दिन पूजा करता हूँ और शुरू से ही आपका सेवा करता आ रहा हूँ पर आज तक आपने कोई फल नहीं दिया, यहाँ तक की मैं अपने बच्चों का पेट तक नहीं भर पाता हूँ।” इतना बोलकर वह मंदिर से उदास होता हुआ अपने घर चला जाता है।

जब पंडित घर आया तो उसके बच्चे उससे पूछने लगे, “पापा, क्या लाए हो?” पंडित ने कहा, “यह लो बेटा, प्रसादी।” उसके बच्चे यह देखकर कहते है, “क्या पापा, आप रोज-रोज प्रसादी लाते हो, कभी खिलोने नहीं लाते।” यह कहकर दोनों बेटे उदास होकर कमरे में चले जाते है।

अंदर से पंडित जी की पत्नी खाना लाती है और फिर पंडित जी खाना खा कर सोने चले जाते है। पंडित अपने मन में ही कहने लगता है, “हे प्रभु, कोई तो रास्ता होगा, कही तो नौकरी लगा दो जिससे ज्यादा पैसे मिल सके। मुझे पूजा करना छोड़कर खेतों में काम कर लेना चाहिए इससे ज्यादा पैसे आ जाएंगे।” यह सोचकर पंडित जी अगले दिन सुबह उठते है और आखरी बार मंदिर जाते हैं।

पंडित जी रोते-रोते मंदिर से काम माँगने के लिए गाँव के सेठ के पास आ जाते है। पंडित जी सेठ के पास गया। सेठ ने कहा, “प्रणाम पंडित जी, बताइए हम आपके लिए क्या सेवा कर सकते हैं।” पंडित जी ने कहा, “ज्यादा कुछ नहीं सेठ जी, हम बस कुछ काम ढूंढ रहे हैं जिससे हमारा घर-द्वार अच्छे से चल सके, क्यूंकि पूजा करके उतने पैसे हो नहीं पा रहे।” सेठ जी बोला, “अरे पंडित जी, अब आपको क्या बताएँ, हमें पाँचो लोगों की जरुरत थी और आज ही हमने पाँचो लोगों को काम पर रख लिया। अब उन्हें हटा तो सकते नहीं।” फिर पंडित जी उदास मन से वहाँ से चले जाते हैं और मंदिर में आकर रोने लगते है।

मंदिर में आकर पंडित जी ने भगवान के मूर्ति के सामने गुस्से में आकर कह दिया की वह अब उनकी पूजा नहीं करेगा। तभी मूर्ति में से भगवान की आवाज आती है, “हे भक्त, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ और तुमने मेरी बहुत सेवा की है। मैं तुम्हे वरदान में यह मुर्गी आशीर्वाद के रूप में दे रहा हूँ।” यह कहकर भगवान फिर गायब हो जाते है।

“यह मुर्गी हमारा दुख कैसे दूर करेगी?” यह सोचते हुए पंडित जी घर की ओर निकल जाते है। घर पहुँचते ही उनके दोनों बेटे उंनसे कहने लगते है ,”पापा क्या लाए हो आज?” पंडित ने कहा, “बेटा, आज मुझे भगवान ने दर्शन दिए है और भगवान ने यह मुर्गी मुझे आशीर्वाद में दिया है।” उनके बेटे कहते है, “पर पापा इस मुर्गी का क्या करेंगे हम? भगवान ने दिया भी तो यह मुर्गी! हमें पैसे दे देते, उससे गरीबी भी दूर हो जाती।” यह बोलकर दोनों बेटे गुस्से में अंदर चले जाते हैं और पंडित जी मुर्गी को एक कमरे में रख देते हैं।

दूसरे दिन मुर्गी एक अंडा देता है, जो की सोने का होता है। गौर से देखने पर पंडित देखता है कि वह अंडा असली सोने का है। यह देख घर के सभी खुश हो जाते है और सोने का अंडा पाकर नाचने लगते है। पंडित जल्दी से बाजार गया और स्वर्णकार के पास उस अंडे को बेचकर आया। अंडा बेचकर पंडित को बहुत सारे पैसे मिले और उन पैसो से पंडित ने बहुत सारे सामान खरीदे अपने बीवी और बच्चों के लिए।

अगले दिन, पंडित ने देखा कि मुर्गी ने फिरसे एक सोने का अंडा दिया है। अब मुर्गी रोज एक सोने का अंडा देती और उसे बेचकर पंडित ने ढेर सारे पैसे जमा कर लिए और वह देखते ही देखते गाँव के सबसे अमीर आदमी बन गए और एक नया बड़ा सा घर बना लिया। धीरे-धीरे पंडित जी भगवान की पूजा ही करना भूल गए और मंदिर भी जाना छोड़ दिया।

एक दिन उन्हें रास्ता में जाता देख सेठ ने बोला, “क्या पंडित जी क्या हुआ अब तो आप मंदिर भी नहीं जाते।” पंडित जी ने जवाब दिया, “मुझे अब मंदिर जाने की क्या जरुरत है, मैं अब सबसे अमीर हूँ, मुझे किसी चीज की जरुरत नहीं है।” इतना बोलकर पंडित जी वहाँ से निकल जाते हैं। घर आते ही उसके दोनों बेटों ने पंडित जी से कहा, “पापा, यह मुर्गी रोज एक सोने का अंडा देती है, फिर इस मुर्गी के अंदर कितने सोने के अंडे होंगे! क्यों न हम इस मुर्गी को मारकर सारे सोने के अंडे एक ही बार में निकाल ले।”

पंडित जी ने कहा, “सही कहा बेटे, मैं अभी इस मुर्गी को मारकर सारे अंडे निकाल लेता हूँ।” और वह पंडित जी मुर्गी को चाकू से मार देते हैं पर मुर्गी के पेट में एक अंडा तक नहीं था और सभी रोने लगते है।

सीख - हमें लालच कभी नहीं करना चाहिए और हम कितने भी बड़े आदमी क्यों न हो जाए भगवान को कभी नहीं भूलना चाहिए।

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