जंगल की कहानियाँ - दोस्तों, आज की इस पोस्ट में हम जंगल की कहानियाँ लेकर आये है। दोस्तों इन कहानियाँ आपको बहुत कुछ सिखने को मिलेगा। उम्मीद है कि आपको यह कहानियाँ पसंद आयेगी। 

जंगल की कहानियाँ

Jungle ki kahaniyan List

चूहा और साधु

कुत्ता और मुर्गा

दो कुत्ते

बैल औऱ मेंढक

भेड़िया और पेड़

चालाक बिल्ली और समझदार मुर्गियाँ

अंगूठी की खोज

उल्लू और समुद्री चिड़िया

दो बहनें

शेर और लड़का

कबूतर और मधुमक्खी

अच्छाई का फल

समझदार भेड़

बहादुर राजकुमार अमर सिंह

चतुर अंगूठा

स्वार्थी मित्र

चार मित्र

चूहा और साधु

एक घना जंगल था। जंगल के बीचोबीच एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर था, जिस मन्दिर में एक साधु रहता था। वह साधु उस मंदिर में, बहुत समय से रहता आ रहा था ,

और मन्दिर में आए लोगों की सहायता और सेवा किया करता था। भिक्षा मांगकर जो कुछ भी उसे मिलता वह उसे उन लोगों को दान कर देता जो दूर से आकर उस मंदिर साफ़ करने में उसका सहयोग करते थे।

​​उस मंदिर में एक चूहा भी रहता था। वह चूहा अक्सर उस साधु का रखा हुआ अन्न खा जाता था। साधु ने चूहे को कई बार भगाने की कोशिश की लेकिन वह चकमा देकर छिप जाता।

​उसने अपना बिल मन्दिर के ही एक कोने में बनाया हुआ था। साधु ने उस चूहे को पकड़ने के लिए बहुत प्रयास किये । लेकिन वह हरबार असफल रहे।

साधु एक दिन परेशान होकर, जंगल से बाहर गांव में अपने एक मित्र के पास गए।

​​साधु के मित्र ने उसे एक योजना बताई कि चूहे ने मंदिर में अपना कहीं बिल बना रखा होगा और वह वहां अपना सारा खाना जमा करता होगा।

अगर उसके बिल तक पहुंचकर सारा खाना निकाल लिया जाये तो चूहा खुद ही कमजोर होकर मर जायेगा। ​साधु ने अपने मित्र की बात मान ली। वह अपने मित्र को भी जंगल के बीच मे स्थित मनसिर में ले आया।

अब साधु और उसके मित्र ने जहाँ तहाँ बिल खोजना शुरू कर दिया। अंततः उनको बिल मिल ही गया जिसमें चूहे ने खूब सारा अन्न चुराकर इकठ्ठा कर रखा था।

बिल खोदकर सारा अन्न बाहर निकाल दिया गया। ​अब चूहे को खाना नहीं मिला तो वह कमजोर हो गया और साधु ने अपनी छड़ी से कमजोर चूहे पर हमला किया।

अब चूहा डर कर भाग खड़ा हुआ और जंगल मे ही कहीं चला गया। वह लौटकर कभी भी वापस मन्दिर नहीं आया।

शिक्षा: “चतुराई करने वाले का भी एक न एक दिन अंत हो ही जाता है। “

कुत्ता और मुर्गा

एक बार एक मुर्गा जंगल में जा रहा था। रास्ते में उसे एक कुत्ता मिला। वे दोनों अच्छे दोस्त बन गए। दोनों ने एक साथ यात्रा करने का फैसला किया। वे लगातार रात होने तक चलते रहे।

रात में मुर्गा पेड़ के ऊपर और कुत्ता पेड़ के नीचे सो गया। मुर्गा सुबह उठकर बाँग देने लगा। एक लोमड़ी ने उसकी बाँग सुनी तो वह वहाँ आ गई और बोली-“प्यारे मुर्गे! तुम तो बहुत अच्छा गाते हो।

नीचे आओ, मैं तुम्हें बधाई देना चाहती हूँ।” मुर्गे ने कहा-” मुझे माफ करो, मैं नहीं आ सकता। इस होटल का दरबान सो रहा है। जब तक वह नहीं उठेगा, मैं नीचे नहीं आ सकता।”

दुष्ट लोमड़ी ने कहा- “मैं उसे अभी जगा देती हूँ।” तभी कुत्ता जाग गया और लोमड़ी को वहाँ पर देखकर ज़ोर-ज़ोर से उस पर भौंकने लगा। यह देखकर लोमड़ी डरकर वहाँ से भाग गई। कुत्ते और मुर्गे ने फिर से अपनी यात्रा शुरू की और वहाँ से चल दिये।id=""id=""

दो कुत्ते

एक आदमी के पास दो कुत्ते थे। एक कुत्ते को उसने शिकार करना और दूसरे कुत्ते को घर की रखवाली करना सिखाया, परंतु एक अजीब बात थी। जब भी शिकारी कुत्ता किसी खास जानवर का शिकार करता,

तो उसका मांस रखवाली करने वाले कुत्ते को ही दिया जाता। धीरे-धीरे, शिकारी कुत्ता उसे जलने लगा। एक दिन जब मालिक घर पर नहीं था, तब शिकारी कुत्ता रखवाली करने वाले कुत्ते पर गुर्राया और बोला,

“मालिक मेरे साथ भेदभाव करते हैं। मैं सारा दिन मेहनत करता हूँ और तुम्हें बैठे-बैठे स्वादिष्ट भोजन मिलता है, यह तो ठीक नहीं है।” इस पर रखवाली करने वाले कुत्ते ने कहा-“यह तो मालिक की मर्जी है।”

मैं घर की रखवाली करता हूँ, इसलिए मैं मालिक के लिए खास हूँ। तुम तो सिर्फ शिकार करने ही जाते हो, लेकिन जब यहाँ कोई नहीं होता तब मैं ही घर की रखवाली करता हूँ। यह सुनकर शिकार करने वाला कुत्ता चुप हो गया और अपनी जगह पर जाकर बैठ गया।

बैल औऱ मेंढक

जंगल के किनारे एक तालाब था। तालाब में बहुत से मेंढक रहते थे। जिनमें से कुछ मेंढक बुजुर्ग थे और कुछ बच्चे। बच्चे मेंढक अक्सर खेलते खेलते तालाब से बाहर निकल जाया करते थे।

उन्हें बाहर की दुनिया के बारे में पता नहीं था।

उनके बुजुर्ग मेंढकों ने उन्हें बाहर की दुनिया के बारे में चेताया था कि बाहर बहुत ही भयंकर और बड़े बड़े जानवर घूमते हैं जो कि, हमे हानि पहुंचा सकते हैं। उनसे सदा दूर ही रहना।

एक दिन ऐसे ही बच्चे मेंढक तालाब से बाहर आए और खेलने लग गए। खेलते खेलते उन्हें पता ही नहीं लगा कि कब वे तालाब से दूर आ चुके हैं।

तभी एक बैल तालाब की ओर पानी पीने के उद्देश्य से चलता हुआ आया। मेंढक बच्चों ने, उस बैल को देख लिया। बैल उस ही दिशा में चला आ रहा था , जिस दिशा में बच्चे मेंढक खेल रहे थे।

जैसे ही मेंढकों ने बैल को देखा, उनकी तो सिट्टी पिट्टी ही गुम हो गयी। उन्होंने इतना विशालकाय जानवर इससे पहले कभी भी नहीं देखा था।

क्योंकि वह तालाब की ओर ही जा रहा था तो, बच्चे जल्दी से कूद कूदकर तालाब की ओर ही चल पड़े, सबको इस विनाशकारी जानवर के बारे में बताने के लिए। उन्हें तालाब में जाते ही उनकी मां दिखी।

एक बच्चे ने बोला, “मां बाहर बहुत बड़ा और डरावना जानवर आया है। वह हमारे तालाब को नष्ट करने के लिए ईधर ही चला आ रहा है।”

सभी बच्चे डरे हुए थे। तब उनकी मां ने अपना पेट फुलाया और कहा, ” देखो बच्चो क्या वह मुझसे भी बड़ा जानवर था?”

बच्चे बोले, ” नही मां वह आपसे भी बहुत बड़ा था।”

फिर से मेंढकी ने अपना हाथ पैर और शरीर और अधिक फुलाया और बच्चों से पूछा, ” अब बताओ ! क्या वह इससे भी बड़ा था?”

मेंढक बच्चे एक स्वर में बोले, ” हां मां आपसे भी बड़ा।”

इस प्रकार मेंढकी अपना शरीर फुलाते गयी और अपनी तुलना बैल से करने लगी। अपनी तुलना करते करते, उसने अपना शरीर बहुत अधिक फुला दिया।

एक स्थिति ऐसी आई कि उसका पेट ही फट गया। वह तड़प तड़प कर मर गयी। बच्चे मेंढक, सबको उस बड़े जानवर से बचाने के लिए आए और वहां अपनी मां को ही उन्होंने खो दिया।

शिक्षा: “झूठी शान और झूठा अभिमान हमेशा ही विनाश का कारण बनता है ।”

भेड़िया और पेड़

एक लड़का अपनी भेड़ – बकरियों को लेकर चराने के लिए रोज जंगल लेकर जाया करता था। उसका कोई साथी नहीं था। इसलिए वह अकेले ही जंगल मे जाता था, अपने मवेशियों को चराने।

वह सुबह अकेला जाता, मवेशियों को चरने के लिए छोड़कर बहुत बोर हो जाता था। उसके पास कोई काम नहीं होता था इसलिए वह वहीं पर सो जाता था।

शाम को फिर सभी भेड़ बकरियों को इकट्ठा कर के वह फिर से अपने घर लौट जाता था। वह जंगल के अधिक भीतर नहीं जाता था इसलिए जंगली जानवरों का खतरा कम ही होता था।

जिसके कारण वह निश्चिंत होकर दिन में सो जाता था।

एक दिन जब वह जंगल मे बकरी चराने के लिए गया तब, उसने रोज की ही तरह जंगल में अपने जानवरों को चरने के लिए स्वतंत्र छोड़ दिया और खुद एक अच्छी छांव वाली जगह देखकर सोने लगा।

उस दिन उसे नींद ही नहीं आ रही थी। अब कोई काम नहीं होने के कारण वह बहुत परेशान हुआ।

id=""जंगल आने से पहले बहुत से खेत रास्ते में पड़ते थे। जिन पर दिन में गांव के किसान आकर खेती करते थे। तो उस दिन उस लड़के के मन मे शैतानी सूझी और वह उस ही समय जोर जोर से चिल्लाने लगा,

“बचाओ…! बचाओ…! भेड़िया आया, बचाओ..!”

लड़के की आवाज, खेतो तक जा रही थी। किसान लड़के की आवाज सुनकर फौरन अपना काम-धंधा छोड़कर उसके पास आए। उनमें से एक किसान बोला, “बच्चे डरो नहीं बताओं, कहाँ है भेड़िया?”

तब लड़का हंसने लगा और बोला, ” हा हा हा..! भेड़िया तो नहीं है यहाँ कहीं। मैं तो मजाक कर रहा था।”

किसानों ने उसे इस बात पर बहुत डाँटा और वहां से चले गए। कुछ दिनों के बाद भी लड़के ने यही नाटक रचा और उसको उस दिन भी किसानों ने बहुत डाँठ लगाई।

उस दिन लड़के की समझ मे आया कि मुझे इस प्रकार किसी को परेशान नहीं करना चाहिए।

अब उसके ही अगले दिन उस जंगल मे सचमुच एक भेड़िया आ गया।लड़का पेड़ पर चढ़ गया और खूब जोर से चिल्लाने लगा। ” बचाओ….! बचाओ…!”

उस दिन किसानों ने सोचा कि वह लड़का आज भी नाटक कर रहा है। सब अपने अपने काम मे ही लगे रहे।

वहां भेड़िये ने 2-3 भेड़ों को मार डाला और एक बकरी का बच्चा अपने साथ लेकर चल दिया। उस दिन लड़के को अपनी की गई भूल पर बहुत दुख हुआ।

शिक्षा: “झूठे व्यक्ति की सही और सच्चाई भरी बातों का भी कोई विश्वास नहीं करता। ”

चालाक बिल्ली और समझदार मुर्गियाँ

एक समय की बात है, एक आदमी के पास बहुत सारी मुर्गियाँ थीं। वह उनका बहुत ख्याल रखता था। मुर्गियों की सुरक्षा के लिए वह उनको दड़बे में रखता था। दुर्भाग्य से कुछ मुर्गियाँ बीमार हो गई।

मुर्गियों को बीमार देख वह आदमी डॉक्टर को लेने चला गया। एक बिल्ली थी, जो हमेशा से उन मुर्गियों को खाना चाहती थी उसने आदमी को मुर्गियों के लिए डॉक्टर का पता करते हुए सुना तो मौके का फायदा उठाने की सोची।

बिल्ली ने डॉक्टर जैसे कपड़े पहने और मुर्गियों के दड़बे का दरवाज़ा खटखटाने लगी। वह बड़ी ही मीठी आवाज़ में बोली-“प्यारी मुर्गियों! तुम सब कैसी हो? दरवाज़ा खोलो, मैं तुम्हारा इलाज करने आई हूँ।”

लेकिन मुर्गियाँ जान गई कि वह डॉक्टर नहीं, बल्कि एक बिल्ली थी। इसलिए मुर्गियों ने एक साथ जवाब दिया-“आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! हम अब ठीक हैं,

आप यहाँ से चले जाओ तो हम और अच्छे हो जाएंगे।” किसी ने ठीक कहा है “बुद्धि, ताकत से बड़ी होती है।”id=""id=""

अंगूठी की खोज

एक बार एक राजा था, जिसके पास एक जादुई अंगूठी थी। दुर्भाग्य से वह अंगूठी खो गई। राजा ने घोषणा की-“जो भी उस अंगूठी को ढूंढकर लाएगा, उसके साथ मैं अपनी बेटी की शादी करूंगा।”

बहुत लोगों ने कोशिश की परंतु कोई भी सफल नहीं हुआ। तब एक युवक आया जिसके तीन अजीब दोस्त थे। उनमें से एक था तीव्रनेत्र जिसकी आँखें बहुत तेज़ थीं। दूसरा था भीमकाय जो पहाड़ जैसा दिखता था।

तीसरा था लम्बूदीन जो बहुत लंबा था और लेटे-लेटे कई किलोमीटर तक फैल सकता था। उन तीनों दोस्तों ने उसकी मदद करने का वादा किया था। तीव्रनेत्र ने अंगूठी समुद्र के तल में पड़ी हुई देखी।

भीमकाय ने समुद्र में गोता लगाया और अंगूठी को पानी के ऊपर ले आया। तब लम्बूदीन समुद्र में कूदा और भीमकाय के ऊपर खड़ा हो गया और अपनी पैरों की उंगलियों की मदद से अंगूठी को पकड़कर बाहर ले आया। इस तरह राजा को अंगूठी और युवक को राजकुमारी मिल गई।

उल्लू और समुद्री चिड़िया

बहुत समय पहले, एक उल्लू और एक समुद्री चिड़िया एक टापू में रहते थे। दोनों ने साथ मिल कर व्यापार करने का विचार किया। व्यापार के लिए पैसों की ज़रूरत थी।

इसलिए, उल्लू अपने मित्रों से पैसे उधार मांग कर लाया और समुद्री चिड़िया अपने कीमती गहने ले कर आई। व्यापार करने के लिए दोनों ने एक दूर का टापू चुना था। इसलिए दोनों एक जहाज में बैठकर, दूर के उस टाप की ओर चल पड़े।

लेकिन, बदकिस्मती से उनका जहाज डूब गया। उल्लू और समुद्री चिड़िया की जान तो बच गई, लेकिन उनके सब पैसे और जेवर समुद्र में डूब गए। उस दिन से, उल्लू केवल रात में ही बाहर निकलता है,

क्योंकि दिन में उसे अपने लेनदारों से डर लगता है। दूसरी तरफ उस दिन से ही समुद्री चिड़िया, समुद्र के ऊपर उड़ती रहती है, और समुद्र में खोए हुए अपने गहने ढूंढती है।

दो बहनें

एक बार, दो बहुत सुंदर और दयालु बहनें थीं। एक दिन, एक भालू उनके घर आया और बोला-“डरो नहीं! मुझे थोड़ी देर आग के पास बैठने दो।” उन्हें भालू पर दया आ गई। अब भालू रोज़ उनके घर आने लगा।

एक दिन भालू ने उनसे कहा-“मैं बौनों से अपना खज़ाना वापस लेने जा रहा हूँ।” कई दिन बीत गए लेकिन भालू लौटकर नहीं आया। दोनों बहनें उसे ढूंढने निकलीं। भालू को ढूंढते हुए वे एक गुफा में आ गई, जिसमें खज़ाना छुपा हुआ था।

अचानक एक बौना आया और उसने दोनों बहनों पर जादुई छड़ी से हमला किया। तभी, उनके बीच में भालू आ गया और एक सुंदर राजकुमार में बदल गया। उसने बौने को मार भगाया।

राजकुमार ने बताया-“इसी बौने ने मुझे भालू बना दिया था और हमारा खज़ाना चुरा लिया था। मेरा एक छोटा भाई भी है।” अंत में राजकुमार और उसके भाई ने उन दोनों बहनों से विवाह कर लिया।

शेर और लड़का

बच्चो, शेर तो शायद तुमने न देखा हो, लेकिन उसका नाम तो सुना ही होगा। शायद उसकी तस्वीर देखी हो और उसका हाल भी पढ़ा हो। शेर अकसर जंगलों और कछारों में रहता है। कभी-कभी वह उन जंगलों के आस-पास के गाँवों में आ जाता है और आदमी और जानवरों को उठा ले जाता है। कभी-कभी उन जानवरों को मारकर खा जाता है जो जंगलों में चरने जाया करते हैं। थोड़े दिनों की बात है कि एक गड़रिये का लड़का गाय-बैलों को लेकर जंगल में गया और उन्हें जंगल में छोड़कर आप एक झरने के किनारे मछलियों का शिकार खेलने लगा। जब शाम होने को आई तो उसने अपने जानवरों को इकट्ठा किया, मगर एक गाय का पता न था। उसने इधर-उधर दौड़-धूप की, मगर गाय का पता न चला। बेचारा बहुत घबराया। मालिक अब मुझे जीता न छोड़ेंगे। उस वक्त ढूंढने का मौका न था, क्योंकि जानवर फिर इधर-उधर चले जाते; इसलिए वह उन्हें लेकर घर लौटा और उन्हें बाड़े में बाँधकर, बिना किसी से कुछ कहे हुए गाय की तलाश में निकल पड़ा। उस छोटे लड़के की यह हिम्मत देखो; अँधेरा हो रहा है, चारों तरफ सन्नाटा छाया हुआ है, जंगल भाँय-भाँय कर रहा है. गीदड़ों का हौवाना सुनाई दे रहा है, पर वह बेखौफ जंगल में बढ़ा चला जाता है।

कुछ देर तक तो वह गाय को ढूंढता रहा, लेकिन जब और अँधेरा हो गया तो उसे डर मालूम होने लगा। जंगल में अच्छे-अच्छे आदमी डर जाते हैं, उस छोटे-से बच्चे का कहना ही क्या। मगर जाए कहाँ? जब कुछ न सूझी तो एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गया और उसी पर रात काटने की ठान ली। उसने पक्का इरादा कर लिया था कि बगैर गाय को लिए घर न लौटूंगा। दिन भर का थका-माँदा तो था, उसे जल्दी नींद आ गई। नींद चारपाई और बिछावन नहीं ढूँढती।

अचानक पेड़ इतनी जोर से हिलने लगा कि उसकी नींद खुल गई। वह गिरते-गिरते बच गया। सोचने लगा, पेड़ कौन हिला रहा है? आँखें मलकर नीचे की तरफ देखा तो उसके रोएँ खड़े हो गये। एक शेर पेड़ के नीचे खड़ा उसकी तरफ ललचाई हुई आँखों से ताक रहा था। उसकी जान सूख गई। वह दोनों हाथों से डाल से चिमट गया। नींद भाग गई।

कई घण्टे गुजर गये, पर शेर वहाँ से ज़रा भी न हिला । वह बार-बार गुर्राता और उछल-उछलकर लड़के को पकड़ने की कोशिश करता। कभी-कभी तो वह इतने नज़दीक आ जाता कि लड़का जोर से चिल्ला उठता।

रात ज्यों-त्यों करके कटी, सबेरा हुआ। लड़के को कुछ भरोसा हुमा कि शायद शेर उसे छोड़कर चला जाए । मगर शेर ने हिलने का नाम तक न लिया। सारे दिन वह उसी पेड़ के नीचे बैठा रहा। शिकार सामने देखकर वह कहाँ जाता। पेड़ पर बैठे-बैठे लड़के की देह अकड़ गई थी, भूख के मारे बुरा हाल था, मगर शेर था कि वहाँ से जौ भर भी न हटता था। उस जगह से थोड़ी दूर पर एक छोटा-सा झरना था। शेर कभी-कभी उस तरफ ताकने लगता था। लड़के ने सोचा कि शेर प्यासा है। उसे कुछ आस बंधी कि ज्यों ही वह पानी पीने जाएगा, मैं भी यहाँ से खिसक चलूँगा। आखिर शेर उधर चला। लड़का पेड़ पर से उतरने की फिक्र कर ही रहा था कि शेर पानी पीकर लौट आया। शायद उसने भी लड़के का मतलब समझ लिया था। वह आते ही इतने जोर से चिल्लाया और ऐसा उछला कि लड़के के हाथ-पाँव ढीले पड़ गये, जैसे वह नीचे गिरा जा रहा हो। मालूम होता था, हाथ-पाँव पेट में घुसे जा रहे हैं। ज्यों-त्यों करके वह दिन भी बीत गया। ज्यों-ज्यों रात होती जाती थी, शेर की भूख भी तेज़ होती जाती थी। शायद उसे यह सोच-सोचकर गुस्सा आ रहा था कि खाने की चीज़ सामने रखी है और मैं दो दिन से भूखा बैठा हूँ। क्या आज भी एकादशी रहेगी? वह रात भी उसे ताकते ही बीत गई।

तीसरा दिन भी निकल आया। मारे भूख के उसकी आँखों में तितलियाँ-सी उड़ने लगीं। डाल पर बैठना भी उसे मुश्किल मालूम होता था। कभी-कभी तो उसके जी में आता कि शेर मुझे पकड़ ले और खा जाए। उसने हाथ जोड़कर ईश्वर से विनय की, भगवान, क्या तुम मुझ गरीब पर दया न करोगे?

शेर को भी थकावट मालूम हो रही थी। बैठे-बैठे उसका जी ऊब गया । वह चाहता था किसी तरह जल्दी से शिकार मिल जाए। लड़के ने इधर-उधर बहुत निगाह दौड़ाई कि कोई नज़र आ जाए, मगर कोई नजर न आया। तब वह चिल्ला-चिल्लाकर रोने लगा। मगर वहाँ उसका रोना कौन सुनता था।

आखिर उसे एक तदबीर सूझी। वह पेड़ की फुनगी पर चढ़ गया और अपनी धोती खोलकर उसे हवा में उड़ाने लगा कि शायद किसी शिकारी की नजर पड़ जाए। एकाएक वह खुशी से उछल पड़ा। उसकी सारी भूख, सारी कमजोरी गायब हो गई। कई आदमी झरने के पास खड़े उस उड़ती हुई झण्डी को देख रहे थे। शायद उन्हें अचम्भा हो रहा था कि जंगल के इस पेड़ पर झण्डी कहाँ से आई। लड़के ने उन आदमियों को गिना एक, दो, तीन, चार।

जिस पेड़ पर लड़का बैठा था, वहाँ की जमीन कुछ नीची थी। उसे ख्याल आया कि अगर वे लोग मुझे देख भी लें तो उनको यह कैसे मालूम होगा कि इसके नीचे तीन दिन का भूखा शेर बैठा हुआ है। अगर मैं उन्हें होशियार न कर दूँ तो यह दुष्ट किसी-न-किसी को जरूर चट कर जाएगा। यह सोचकर वह पूरी ताकत से चिल्लाने लगा। उसकी आवाज सुनते ही वे लोग रुक गये और अपनी-अपनी बन्दूकें सम्हालकर उसकी तरफ ताकने लगे।

लड़के ने चिल्ला कर कहा-होशियार रहो! होशियार रहो! इस पेड़ के नीचे एक शेर बैठा हुआ है!

शेर का नाम सुनते ही वे लोग सँभल गये, चटपट बन्दूकों में गोलियाँ भरी और चौकन्ने होकर आगे बढ़ने लगे।

शेर को क्या ख़बर कि नीचे क्या हो रहा है। वह तो अपने शिकार की ताक में घात लगाये बैठा था। यकायक पैरों की आहट पाते ही वह चौंक उठा और उन चारों आदमियों को एक टोले की आड़ में देखा। फिर क्या कहना था। उसे मुँह माँगी मुराद मिली। भूख में सब्र कहाँ। वह इतने ज़ोर से गरजा कि सारा जंगल हिल गया और उन आदमियों की तरफ़ ज़ोर से जस्त मारी। मगर वे लोग पहिले ही से तैयार थे। चारों ने एक साथ गोली चलाई। दन! दन! इन! दन! आवाज़ हुई। चिड़ियाँ पेड़ों से उड़-उड़कर भागने लगीं । लड़के ने नीचे देखा, शेर ज़मीन पर गिर पड़ा था। वह एक बार फिर उछला और फिर गिर पड़ा। फिर वह हिला तक नहीं।

लड़के की खुशी का क्या पूछना। भूख-प्यास का नाम तक न था। चटपट पेड़ से उतरा तो देखा सामने उसका मालिक खड़ा है। वह रोता हुआ उसके पैरों पर गिर पड़ा। मालिक ने उसे उठाकर छाती से लगा लिया। और बोला--क्या तू तीन दिन से इसी पेड़ पर था?

लड़के ने कहा--हाँ, उतरता कैसे ? शेर तो नीचे बैठा हुआ था।

मालिक--हमने तो समझा था कि किसी शेर ने तुझे मार कर खा लिया। हम चारों आदमी तीन दिन से तुझे ढूंढ रहे हैं। तूने हमसे कहा तक नहीं और निकल खड़ा हुआ।

लड़का- मैं डरता था, गाय जो खोई थी।

मालिक--अरे पागल, गाय तो उसी दिन आप ही आप चली आई थी।

भूख-प्यास से शक्ति तक न रहने पर भी लड़का हँस पड़ा।

कबूतर और मधुमक्खी

एक बार एक मधुमक्खी सुबह सुबह उड़कर अपने लिए फूलों से रस के रूप में भोजन लेने के लिए जा रही थी। उसका छत्ता जंगल की नदी के किनारे वाले पेड़ पर था।

उस ही पेड़ पर एक कबूतर भी रहा करता था। लेकिन दोनो में से कोई भी एक दूसरे को नहीं जानते थे।

उस दिन जब वह मधुमक्खी उड़कर जा रही थी तो वह नदी के ऊपर से होती हुई जा रही थी। अचानक तभी एक हवा का तेज झोंका आया और वह मधुमक्खी जाकर नदी के पानी मे गिर गयी।

जिस वजह से उसके पूरे पंख गीले हो गए।

वह अब उड़ नहीं सकती थी। मधुमक्खी को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। मधुमक्खी के पंख गीले होना अर्थात उसकी मृत्यु निश्चित होती है। वह बहुत डर गई।

पेड़ पर कबूतर बैठा हुआ था। उसकी नजर जब नदी में पड़ी तो उसने देखा कि उसके ही पेड़ पर एक छत्ते में रहने वाली मधुमक्खी संकट में पड़ गयी है।

उसने कुछ सोचा और फिर पेड़ से एक पत्ता अपनी चोंच से तोड़कर उसने मधुमक्खी की ओर फेंक दिया।

डूबते को तिनके का सहारा मिला।

किसी तरह मधुमक्खी पत्ते के ऊपर आई। थोड़ी देर के बाद उसके पंख सूख गए। अब वह उड़ सकती थी। मधुमक्खी उड़कर वापस पेड़ पर आई और उसने कबूतर का धन्यवाद भी दिया। फिर वह अपने लिए फूल का रस लेने के लिए चले गई।

बहुत दिन बीत गए। फिर एक दिन कबूतर यूं ही गुनगुनाते हुए पेड़ की एक डाली पर सोया हुआ था। तभी कुछ शरारती बच्चे उस पेड़ के नीचे आ गए।

बच्चों के पास गुलेल थी वह बहुत देर से किसी पक्षी को गुकेल का शिकार बनाने की तलाश में थे और वे बच्चे किसी पक्षी का शिकार करना चाहते थे।

अब मधुमक्खी उस ही समय अपना खाना ढूंढने से लौटी थी, मधुमक्खी ने उन बच्चों को देख लिया। और उनकी गुलेल को भी। बच्चे ने कबूतर की ओर गुलेल करके निशाना साधा।

अब मधुमक्खी को बच्चे की करनी के बारे मे पता लग गया। इससे पहले की बच्चा कबूतर पर गुलेल चला पाता, मधुमक्खी ने जाकर बच्चे के हाथ मे डंक मार दिया। गुलेल नीचे गिर गयी और बच्चा जोर जोर से रोने लगे गया।

बच्चे की चिल्लाने की आवाज सुनकर कबूतर जग गया। उसने सब देखा और सारी बात उसे समझ मे आ गयी। बच्चा रोते रोते अपने घर चल दिया और कबूतर ने भी मधुमक्खी का धन्यवाद दिया।

और आपस मे अच्छे मित्र भी बन गए।

शिक्षा: “हमे हमेशा कठिनाई में फंसे हुए लोगों की सहायता करनी चाहिए।”

अच्छाई का फल

बहुत समय पहले की बात है, एक लक्कड़हारा एक जंगल से गुजर रहा था। अचानक, उसकी नज़र एक पेड़ के नीचे, एक पिंजरे पर पड़ी। पास जाने पर उसे उस पिंजरे में एक चील दिखाई दी।

लक्कड़हारे को चील पर बहुत दया आई और उसने वह पिंजरा खोल कर उसे आजाद कर दिया। चील दूर आकाश में उड़ गई। कुछ दिन बाद वही लक्कड़हारा एक ऊँची पहाड़ी पर, एक चट्टान पर बैठकर अपना खाना खा रहा था।

उसी वक्त आकाश से एक चील आई और उसकी टोपी लेकर उड़ गई। हैरान लक्कड़हारा, उस चट्टान से नीचे उतर कर उसके पीछे भागा। जैसे ही वह पहाड़ी से नीचे उतरा,

उसे पहाड़ी से चट्टान के नीचे गिरने की बहुत तेज़ आवाज़ सुनाई दी। यह वही चट्टान था जिस पर वह बैठकर खाना खा रहा था। चील ने लक्कड़हारे की जान बचाकर उसे धन्यवाद दिया था।id=""id=""

समझदार भेड़

एक बार, एक जंगल में एक भेड़िया रहता था। वह बहुत बूढ़ा हो गया था और बीमार भी था। बुढ़ापे और बीमारी के कारण वह कई दिनों से शिकार पर नहीं जा पाया था। उसकी हालत बहुत खराब थी।

एक दिन, उसने पास के तालाब में पानी पीती हुई एक छोटी भेड़ देखी। उसे देखकर भेड़िये के मुँह में पानी आ गया। भेड़िया उस छोटी भेड़ से बोला-“बेटी! मुझ पर एक उपकार करो।

मेरे लिए तालाब से थोड़ा पानी ला दो। तुम देख ही रहे हो मेरी तबीयत कितनी खराब है। अगर तुम मुझे थोड़ा पानी ला दो तो, मुझे थोड़ी ताकत मिल जाएगी और मैं अपना भोजन ढूंढ लूंगा।” छोटी भेड़ समझदार थी।

उसने जवाब दिया-“अगर मैं तुम्हारे लिए पानी लेकर तुम्हारे पास आयी तो तुम्हें भोजन ढूंढने की क्या ज़रूरत होगी।” ऐसा कह कर वह छोटी भेड़ वहाँ से भाग गयी।

बहादुर राजकुमार अमर सिंह

बहुत पहले की बात है, एक राजा का अमर सिंह नामक एक बहादुर बेटा था। एक दिन राजा को विदेश जाना पड़ा। जाने से पहले उसने अपने बेटे को चाबियों का एक गुच्छा देते हुए कहा-“बेटे, जो दरवाज़ा सुनहरी चाबियों से मिलता है,

उसे मत खोलना।” उत्सुक राजकुमार ने वह दरवाज़ा खोल दिया और उसके अंदर चला गया। वहाँ खिड़की से उसने एक किले के ऊपर, एक सुंदर राजकुमारी को देखा और वह उसे पसन्द करने लगा।

जब राजा को यह पता चला तो उसने राजकुमार को चेतावनी देते हुए कहा-“वहाँ जाने में बहुत ख़तरा है।” लेकिन अमरसिंह खतरों से नहीं डरता था। वह उनका सामना करने को तैयार था। यह देख राजा ने उसे एक जादुई अंगूठी दी।

जादुई अंगूठी की मदद से अमर सिंह ने सभी ख़तरों का सामना किया और राजकुमारी के पास पहुँच गया। जब राजकुमारी ने उसे देखा तो वह भी उसे पसन्द करने लगी।

दोनों ने मिलकर हर मुश्किल का सामना किया और सुरक्षित किले से बाहर आ गए। राजा दोनों को देखकर खुश हुआ और उनका विवाह कर दिया।id=""id=""

चतुर अंगूठा

एक बार, एक गरीब लकड़हारा अपनी पत्नी के साथ रहता था। उनकी कोई औलाद नहीं थी। एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा-“काश! हमारा एक बेटा होता। चाहे वह एक अंगूठे जितना ही लम्बा होता।”

भगवान ने उसकी सुन ली। उसका एक बेटा हुआ परंतु वह अंगूठे के बराबर ही था। उन्होंने उसका नाम अंगूठा ही रख दिया। अंगूठा बड़ा होकर एक चतुर लड़का बना परंतु उसकी लम्बाई नहीं बढ़ी।

उसके पिता एक घोड़ा गाड़ी भी चलाते थे। अंगूठा घोड़े के कान के पास बैठकर उसे रास्ता बताता था। एक सर्कस के मालिक ने अंगूठे को देखा तो वह उसे खरीदने के लिए आया।

खुद को बेचने के लिए, अंगूठे ने अपने माता-पिता को राजी कर लिया। वह जानता था उन्हें पैसे की ज़रूरत थी। उसने कहा-“आप घबराओ नहीं, मैं जल्द ही वापस आ जाऊँगा।”

आख़िरकार उसे बेच दिया गया। एक दिन मौका पाते ही वह सर्कस से भाग निकला। छोटा होने के कारण वह पकड़ा नहीं जा सका और अपने घर पहुँच गया।

स्वार्थी मित्र

एक जंगल मे एक खरगोश रहा करता था। खरगोश बहुत ही अच्छा और परोपकारी था। वह आवश्यकता पड़ने पर सभी की मदद किया करता था।

अतः उसे सभी अच्छा मानते थे और उसको अपना मित्र भी समझते थे। खरगोश भी सबको अपना मित्र ही समझता था।

मगर एक दिन संकट में सबकी सहायता करने वाला खरगोश स्वंय ही संकट में पड़ गया। खरगोश के पीछे जंगल के कुछ शिकारी कुत्ते पड़ गए। वह अपनी जान बचाकर भागने लगा।

वह भागता रहा। थोड़ी देर भागते भागते वह थक गया । और अब उसको दौड़ने की भी सामर्थ्य नहीं थी। उसने मन ही मन सोचा, ” यदि कोई जल्द ही मेरी सहायता के लिए नहीं आया तो मैं इन शिकारियों द्वारा मारा जाऊँगा।

हे ईश्वर! कृपया कर मेरी सहायता करें। और मेरे किसी मित्र को मेरी सहायता के लिए इधर भेज दें।”

तब उसे सामने से घोड़ा आते हुए दिखा। वह झटपट घोड़े के पास गया और उससे बोला, ” घोड़े भाई ! मुझे तुम्हारी सहायता चाहिए, मेरे प्राण संकट में हैं।

कृपया कर मेरी सहायता कर दो। मुझे आप अपनी पीठ पर बैठाकर कहीं और ले जाओ।”

तब घोड़ा बोला, ” भाई खरगोश मैं तुम्हारी सहायता तो कर देता लेकिन, मुझे अभी किसी कार्यवश कहीं जाना है अतिशीघ्र! वह देखो तुम्हारा मित्र बैल इधर आ रहा है।

तुम उस से कहो वह तुम्हारी सहायता जरूर करेगा।” इतना कहकर घोड़ा दौड़ता हुआ चला गया।

अब खरगोश बैल के पास गया और बोला, ” बैल मित्र कृप्या मेरी सहायता कर दो। मेरे पीछे शिकारी कुत्ते पड़े हुए हैं। वह मेरे प्राण हरना चाहते हैं। कृपया कर मुझे बचा लो।”

बैल बोला, ” मैं तुम्हारी सहयता तो कर देता लेकिन मुझे अपने अन्य बैल मित्रों से मिलने जाना है। वह मेरा इंतजार कर रहे होंगे। तुम्हारा दोस्त बकरा भी इसी ओर आ रहा है मैं ने उसे देखा है रास्ते मे, तुम उससे मदद मांग लो। वह तुम्हारी सहायता जरूर करेगा।”

खरगोश दौड़ा दौड़ा आगे गया और, बकरे के पास पहुंच गया। खरगोश बोला, ” भाई मेरी सहायता कर दो। मेरे पीछे शिकारी कुत्ते पड़े हुए हैं। जो कि मेरी जान लेना चाहते हैं।”

बकरा बोला, ” भाई सुनकर बहुत दुख हुआ। मैं तुम्हारी सहायता तो कर देता लेकिन देखो मेरी पीठ कितनी खुरदरी है। तुम इसमें बैठोगे तो तुम्हें बहुत तकलीफ होगी। वह देखो तुम्हारी मित्र भेड़ भी इसी तरफ आ रही है। वह तुम्हें आरामदायक पीठ पर बैठाकर बचा लेगी। तुम उसके ही पास जाओ।”

खरगोश अब भेड़ के पास गया और उसने भेड़ से भी मदद मांगी लेकिन भेड़ ने भी कुछ बहाना बनाकर उसकी सहायता करने से साफ इनकार कर दिया।

अब खरगोश बहुत हताश हो चुका था। वह मन मे सोच रहा था कि मैं ने मुसीबत पड़ने पर सबकी सहायता की। लेकिन अभी मैं संकट में हु तो मेरी सहायता कोई भी नहीं कर रहा।

यहाँ सब अपने स्वार्थ के लिए ही मित्रता करते हैं।

अब उसने सब ईश्वर के भरोसे छोड़ दिया और जाकर एक बिल में छिप गया। कुत्ते आए और फिर जब खरगोश नहीं मिला तो वे वहां से चले गए। खरगोश बहुत दुखी हो गया था।

वह फिर अपनी जान बचाकर उस जंगल से हमेशा हमेशा के लिए चला गया।

शिक्षा: “स्वार्थी मित्रों का होना न होना एक ही बराबर है क्योंकि वे अपना काम तो निकलवा लेते हैं परन्तु आवश्यकता पड़ने पर कभी सहायता नहीं करते।”

चार मित्र

एक जंगल मे हिरन, कछुआ, कौआ और चूहा रहते थे। उन चारों में बहुत ही गाढ़ी मित्रता थी। चारों एक दुसरे से बहुत प्रेम किया करते थे।

सभी दोस्त सुख में तो एक साथ रहते थे ही, साथ ही कठिनाई आने पर ढाल बनकर एक दुसरे की सहायता करते थे और एक-दूसरे को संकट से भी बचाते थे।

​एक बार जंगल में एक शिकारी आ गया। वह जंगल मे किसी अच्छे एयर महंगे जानवर को फंसाने के लिए आया था ताकि वह उस जानवर को बाजार में बेच कर उससे अच्छे खासे रुपये कमा सके। शिकारी ने अपना जाल बिछा दिया। और शिकारी के उस जाल में उन दोस्तों में से एक हिरन उस जाल में फंस गया।

​​अब बेचारा हिरन असहाय सा जाल में फंसा था उसे लगा कि आज मेरी मृत्यु निश्चित है। इस डर से वह घबराने लगा। तभी उसके मित्र कौए ने ये सब देखा और उसने कछुआ और चूहे को भी हिरन की सहायता के लिए बुला लिया।

​कौए ने जाल में फंसे हिरन पर इस तरह चोंच मारना शुरू कर दिया जैसे कौये किसी मृत जानवर की लाश को नोंचकर खाते हैं। अब शिकारी को लगा कि कहीं यह हिरन मर तो नहीं गया।

तभी कछुआ उसके आगे से गुजरा। शिकारी ने सोचा हिरन तो मर गया इस कछुए को ही पकड़ लेता हूँ,

इसको बेचकर बीबी मैं बहुत से रुपये कमा सकता हूँ।

यही सोचकर वह कछुए के पीछे पीछे चल दिया। ​इधर मौका पाते ही चूहे ने अपने नुकीले दांतों की सहायता से हिरन का सारा जाल काट डाला और उसे आजाद कर दिया।

​​शिकारी कछुए के पीछे- पीछे जा ही रहा था कि तभी कौआ उड़ता हुआ आया और कछुए को अपनी चौंच में दबाकर उड़ाकर ले गया।

इस तरह सभी मित्रों ने मिलकर एक दूसरे की जान बचायी। शिकारी वहां देखता ही रह गया और निराश होकर वहां से चला गया।

शिक्षा: “एकता की शक्ति से बड़ी कोई भी शक्ति नहीं होती। “

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