हेलो, आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ खट्टर काका की कहानियॉं में शेयर करने जा रहे है। आप इन खट्टर काका की कहानियॉं को पूरा पढ़े। आपको यह कहानियॉं बहुत पसंद आएगी।

Khattar Kaka Ki Kahaniyan

गीता

आयुर्वेद

महाभारत

रामायण

सत्यनारायण

चंद्रग्रहण

गीता

खट्टर काका मेरे हाथ में 'गीता' देखकर बोले - क्या आजकल गीतापाठ करने लगे हो ? तब तो तुमसे दूर ही रहना चाहिए।

मैंने चकित होकर पूछा-सो क्यों, खट्टर काका ?

खट्टर काका बोले - देखो, पहले अर्जुन में मनुष्यता थी। 'ये भाई हैं, ये चाचा हैं, यह बाबा हैं, इन पर कैसे हाथ उठावें ? परंतु गीता का आसव पीकर वह इस तरह वाणवर्षा करने लगे कि वृद्धि पितामह तक की छाती छलनी कर दी। इसी से मुझे भी भय होता है कि कभी बात को लेकर तकरार हो जाय, और तुम भी अर्जुन की तरह निस्पृह योगी बनकर सोचने लगो-

नैंनं छिंदंति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः

खट्टर काका की आत्मा को तो शस्त्र काट ही नहीं सकता है, तो फिर क्यों न एक गडाँसा कसकर लगा दिया जाय ?

और काकी रोना-धोना शुरू करें, तो समझाने लगो कि-

वासांसि जीणार्नि यथा विहाय

नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा

न्यन्यानि संयाति नवानि देही

'काकाजी का चोला बदल गया है। नया शरीर मिल गया है। आप खुश होकर सोहर गायें। विलाप क्यों कर रही हैं ?

यदि गाँव के नवयुवक गीता के उपदेश पर चलने लगें, तो कितने चाचा मारे जायेंगे, कितनी चाचियाँ विधवा होंगी, इसका ठिकाना नहीं। इसीलिए मैं हाथ जोड़ता हूँ। पढना ही है तो गीतगोविंद पढो, मगर गीता का चसका मत लगाओ।

मैने कहा - खट्टर काका, लोग कहते हैं कि गीता अहिंसा-वैराग्य की शिक्षा देती है।

खट्टर काका बोले - अजी, मैं तो सीधी बात जानता हूँ। यदि अर्जुन गीता का उपदेश सुनने के बाद गांडीव फेंककर गेरुआ वस्त्र धारण करते, कवच उतारक कमंडल ग्रहण करते और कुरुक्षेत्र छोड़ा वाराहक्षेत्र का मार्ग पकड़ते, तब मैं मान लेता कि गीता में अहिंसा - वैराग्य भरा है। परंतु वह तो मत्स्यवेध की तरह भाई-बंधुओं का मस्तक- वेध करने लगे!

अजी, एक तो यों ही आजकल बर्छी-भाले निकलते रहते हैं, अगर उन पर गीता की शान चढ गयी, तो प्रत्येक गाँव कुरुक्षेत्र बन जायेगा। अतएव मैं हाथ जोड़ता हूँ, अभी गर्म खून में गीता मत पढो।

मैंने कहा - खट्टर काका, हो सकता है कि गीताकार का वास्तविक अभिप्राय कुछ और हो।

खट्टर काका बिगड़कर बोले - दूसरा अभिप्राय मैं कैसे समझूँ ? स्वयं गीताकार ही तो सारथी बनकर आगे बैठे थे। तब उन्होंने रथ मोड़ क्यों नहीं लिया? वह कहते - "ओ अर्जुन! मैंने तुम्हें इतना ज्ञान दिया है कि यह शरीर नश्वर है, संसार क्षणभंगुर है, हस्तिनापुर की क्या हस्ती? एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा। इस कारण तुम रक्त की धारा क्यों बहाओगे? सांसारिक सुख तुच्छ है। तुम राज्य की कामना छोड़ दो। क्या गद्दी की खातिर वृद्ध पितामह एवं पूज्य द्रोणाचार्य पर तीर छोड़ना तुम्हें शोभा देगा? यही ना होगा कि लोंग हँसेंगे कि क्षत्रिय होकर मैदान छोड़ दिया। परंतु जो यथार्थ ज्ञानी होते हैं, वे निंदा या प्रशंसा से विचलित नहीं होते। छोड़ो इस झमेले को, और चलो मेरे साथ हिमालय। लेकीन ये सब बातें तो उन्होंने कहींनही। उलटे, उन्होंने अर्जुन को लड़ने के लिए भड़का दिया। और तुम समझते हो कि गीता में अहिंसा और वैराग्य भरा है। हाय रे बुद्धि!

मैंने कहा - खट्टर काका, बड़े-बड़े लोग गीता के द्वारा विश्व शांति स्थापित करना चाहते हैं और आपको उसमें युद्ध का संदेश मिलता है.?

खट्टर काका ने मुस्कुराते हुए कहा-तुमने आल्हा सुना है ? किस प्रकार गाकर जोश बढाया जाता है-आखिर राम करै सो हो, एक दिन सबको मरना होगा। और, उसी बोल पर कितने कटकर मर जाते हैं। मुझे तो वहीं ललकार गीता में भी सुनायी पड़ती है-

अंतवंत इमे देहाः नित्यस्योक्ताः शरीरिणः

अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद युध्यस्व भारत (गीता2/18)

लेकिन 'कभी तो मरना ही है, इसलिए अभी मर जाओ' - यह तर्क तो मुझे नहीं जॅंचता।

मैंने कहा - खट्टर काका, भगवान का कहना है कि जीव का कभी नाश नहीं होता है।

खट्टर काका बोले-यदि जीव का कभी नाश नहीं होता है, तो खून की सजा फाँसी क्यों होती है ? श्रीकृष्ण अर्जुन को तो उपदेश देते हैं कि-

गतासूनगतासूंश्च नानुशोचंति पंडिताः (2/11)

परंतु जब अभिमन्यु का वध होता है, तो वह ज्ञान कहाँ विलीन हो जाता है? यदि वास्तव में यही बात सत्य है कि-

न जायते म्रियते वा कदाचित्

नायं भूत्वा भविता वा न भूयः

अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणः

न हन्यते हन्यमाने शरीरे। (गी० 2/20)

तब फिर जयद्रथ से बदला लेने के लिए इतना प्रपञ्च क्यों रचा गया ? उस समय यह वचन क्यों भूल गये कि -

दुःखेष्वनुद्विग्मनाः सुखेषु विगतस्पृहः

वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते।

अजी तुम अभी बच्चे हो। इन बातो को नही समझोगे। मैने कहा खट्टर कका, कहा जाता है -

सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनंदनः।

पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतंमहत ॥

समस्त उपनिषदों का मंथन कर कृष्ण भगवान ने गीता रूपी अमृत निकालकर अर्जुन रूपी बछड़े को पान कराया है।

खट्टर काका मुस्कुराते बोले - हाँ ! अर्जुन तो बछिया के ताउ थे ही। तभी तो श्रीकृष्ण ने उन्हे पुचकारकर लड़ाई मे जोत दिया। एक तरह देखा जाय तो अर्जुन को फुसलाने के लिए ही गीता की रचना हुई है। श्रीकृष्ण को लड़ाने की ईच्छा थी। अर्जुन की पीठ ठोंक दी, और स्वयं महाभारत का तमाशा देखते रहे। अर्जुन पर इस तरह श्याम-रंग चढ गया कि उन्होंने संपूर्ण वंश को मटियामेट कर दिया।

मैंने कहा -खट्टर काका, अर्जुन ने अनासक्त होकर युद्ध किया। राज्य के लोभ से नहीं।

खट्टर काका व्यंग्य करते हुए बोले-हाँ! हस्तिनापुर की गद्दी तुम्हारे ही नाम से वसीयत कर गये हैं! अजी, यदि अनासक्त रहते, तो सौ चचेरे भाइयों के शोणित से अपना राज्याभिषेक करते! हाय रे दिल्ली! तेरे चलते इतना रक्तपात हुआ कि आज तक किले का रंग लाल है।

मैंने कहा-धन्य हैं, खट्टर काका ! कहाँ से कहाँ शह चला देते है!

खट्टर काका अपनी धुन में कहने लगे-देखो, श्रीकृष्ण को लड़ाना था और अर्जुन को अपनी बुद्धि थी ही नहीं। इसी से जो-जो मन में आया, कृष्ण कहते गए- "शरीर नाशवान् है, इसलिए युद्ध करो। आत्मा अमर है, इसलिए युद्ध करो। क्षत्रिय हो, इसलिए युद्ध करो। नहीं लड़ने से निंदा होगी, इसलिए युद्ध करो।

खट्टर काका के होंठों पर मुस्कान आ गयी। बोले-श्री कृष्ण अर्जुन को तो यह उपदेश देते हैं कि क्षत्रिय के लिए रण छोड़कर भाग जाने से मरण अच्छा है। और, स्वयं जो रण छोड़कर भागे सो अभी तक रणछोड़ कहला रहे हैं। इसी को कहते हैं-परोपदेशे पांडित्यम। लेकिन अर्जुन को इतनी बुद्धि कहाँ कि जवाब दे सकते! गटगट सुनते गये। और, जब सबकुछ सुनकर भी अर्जुन के पल्ले कुछ नहीं पड़ा, तब कृष्ण ने अपना विकराल रूप दिखाकर अर्जुन को डरा दिया-'यदि उस तरह नहीं समझोगे, तो इस तरह समझो।

खट्टर काका को हँसी लग गयी। बोले-मुझे एक बात याद आती है। एक बार तुम्हारी चाची काशी स्नान करने जा रही थी। उनके साथ एक पाँच साल का बच्चा था। वह भी साथ जाने के लिए जिद करने लगा। मैंने उसे बहुत तरह से समझाया कि "नदी में तेज बहाव है, वहाँ बच्चे डूब जाते हैं। पानी में मगर रहते हैं, पकड़ लेते हैं। मत जाओ। जब वह किसी तरह नहीं माना, तब रामलीला वाले राक्षस का चेहरा लगाकर उसे डरा दिया। वह देखते हुए जो सीधा हुआ, सो फिर क्यों मचलेगा? ऎ भाई! मुझे तो उस बच्चे में और अर्जुन में कोई खास अंतर नही जान पड़ता है।

मैंने कहा - खट्टर काका, गीता में जो इतना ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग भरा है......

खट्टर काका बोले-सभी योगों का लक्ष्य यही है कि तस्मात युध्वस्व भारत। यानी "कौरवों को मारो"। अर्जुन किसी तरह लड़ने को तैयार हो, इसीलिए इतना सारा निष्काम कर्म और अनासक्ति योग का महाजाल रचा गया। उसमें अर्जुन की बुद्धि उलझ गयी और श्रीकृष्ण ने उन्हें जैसे नचाना चाहा, नचाया। परंतु जिसे समझने की शक्ति है, वह तो भगवान की चालाकी समझेगा ही।

मैने कहा - खट्टर काका, भगवान ने अर्जुन को कैसे फुसलाया? मेरी समझ में तो नहीं आता।

खट्टर काका बोले-तुम्हारी क्या बिसात ? बड़े-बड़े पंडितो की समझ में नहीं आता। परंतु मुझे तो बिल्कुल साफ नजर आता है। भगवान कहते हैं कि-

प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्

आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते (गीता 2/55)

अर्थात्, 'जो सारी इच्छाओं का त्याग कर देते हैं वे ही यर्थाथ ज्ञानी हैं। तब फिर राज्य और स्वर्ग का प्रलोभन क्यों देते हैं?

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् तस्मादुत्तिष्ठ कौंतेय युद्धाय कृतनिश्चयः (2/37)

'हे अर्जुन! यदि मरोगे, तो स्वर्ग मिलेगा। जीतोगे, तो राज्य मिलेगा। तुम्हारे दोनों हाथ लड्डू हैं। अतएव उठो और युद्ध करो।

खट्टर काका मुस्कुराते हुए बोले-अर्जुन ने तर्कशास्त्र नहीं पढा था, इसी कारण उभयतः पाश में बँध गये। यदि मैं रहता, तो कहता-'हे कृपानिधान! एक तृतीय कोटि भी तो हो सकती है कि वे अर्जुन को पकड़कर बंदी बना लें, तब तो माया मिली न राम! परंतु अर्जुन तो सीधे धनुर्धर थे। किसी पक्षधर से भगवान को भेंट होती, तब न! मैं तो पूछता -'ऎ महाराज! जब सारे मनोरथ व्यर्थ हैं, तब फिर आप यह रथ क्यों चला रहे हैं?

मैंने कहा - खट्टर काका, आप हर जगह अपना तर्कशास्त्र लगा देते हैं!

खट्टर काका बोले - कैसे न लगाउँ, जी? यही तो अपने देश की मुख्य विद्या है। खंडन में ऎसी सूझ्म दृष्टि और किसकी हो सकती है?

खट्टर काका सरौते से सुपारी काटते हुए बोले-देखो, एक स्थान पर तो श्रीकृष्ण उपदेश देते हैं कि-

समदुःखसुःख स्वस्थः समलोष्टाश्मकंचनः

तुल्यप्रियाप्रियोधीरः तुल्यनिंदात्मसंस्तुतिः(14/24)

अर्थात् 'निंदा-प्रशंसा, दोनों को एक समान समझना चाहिए। और, दूसरी जगह यह भी कहते हैं कि-

अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यंति तेऽव्ययाम्

संभावितस्य चाकीर्तिः मरणादतिरिच्यते (2/34)

अर्थात 'युद्ध नहीं करोगे तो तुम्हारी निंदा होगी, इससे तो मर जाना ही अच्छा है।' एक बार तो अनासक्त कर्म की शिक्षा देते हैं कि-

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ

ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि (2/38)

अर्थात 'हार-जीत दोनों को बराबर समझकर लड़ो।' और बाद में जीत का लोभ भी देते हैं कि-

तस्मात उत्तिष्ठ यशो लभस्व

जित्वा शत्रून् भुक्ष्व राज्यं समृद्धम(11/33)

'हे अर्जुन! उठो, यश प्राप्त करो और शत्रु को जीतकर राज्य भोगो। ' अब तुम्ही कहो कि जब सुख-दुःख, जय-पराजय, यश-अपयश, सब समान हैं, तब फिर भगवान विजय एवं यश का प्रलोभन क्यों देते हैं?

मुझे चुप देखकर खट्टर काका बोले-अजी, एक बात मैं पूछता हूँ। भगवान कहते हैं कि-

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति

भ्रामयन् सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया (18/61)

अर्थात ईश्वर ही अपनी माया के प्रभाव से सबको कठपुतली की तरह नचा रहे हैं। यदि यही बात सत्य है, तब फिर इतनी माथा-पच्ची की क्या जरूरत थी? सीधे अपना यंत्र घुमा देते। उनकी इच्छा के सामने अर्जुन की क्या चलती? तब फिर यह क्यों कहते हैं कि- यथेच्छसि तथा कुरु (18/63)

अर्थात 'तुम्हारी जैसी इच्छा हो, करो।' और यदि यही बात थी, तो इसी पर कायम रहते। फिर ऎसा क्यों कि-

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज

अहं त्वां सर्वपापेभ्यः मोक्षयिष्यामि मा शुचः (18/66)

'तुम सभी धर्म छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा।

अजी, ऎसा तो कोई पंडा, पुरोहित या पादरी बोले! भगवान् को क्या ऎसा कहना शोभा देता है ? और यदि अंत में यही बात कहनी थी, तो फिर सात सौ श्लोकों की क्या जरूरत थी ? एक ही श्लोकार्ध में कह देते-अहमाज्ञापयामि त्वां तस्मात युध्यस्व भारत (हे अर्जुन! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, इसलिए युद्ध करो। )

मैंने कहा - खट्टर काका, मैं तो समझता हूँ कि समस्त गीता का निष्कर्ष है - निष्काम कर्म।

खट्टर काका बोले - अजी, यही तो मेरी समझ में नही आता है। इच्छाकृत कर्म भी कहीं निष्काम होता है? जो भी कार्य किया जाता है, किसी-न-किसी कामना से प्रेरित होकर। सारी कामनाओं का त्याग कर दें-यह भी तो एक कामना ही हुई। निष्काम कर्म कहने में वदतो व्याघात दोष है।

मैंने कहा - खट्टर काका आपके तर्क में मैं कहाॅ तक टिक सकता हूँ ? परंतु जीवनमुक्त को तो कोई भी कामना नहीं रहती है।

खट्टर काका मुस्कुराते बोले-भई,मुझे तो आज तक कोई जीवनमुक्त नहीं मिले। यदि कोई मिल जाते तो एक सोंटा लगाकर देखता कि उनकी स्थितप्रज्ञता कहाँ तक कायम रहती है। अजी,ये सब कहने सुनने की बातें हैं।

मैंने गंभीर होकर कहा-तब क्या आपका खयाल है कि भगवान ने अर्जुन को लड़ाने के लिए गीता रची है?

खट्टर काका ठठाकर हँस पड़े। एक चुटकी सुपारी का कतरा मुँँह में डाल कर बोले- अजी तुम कहाँँ हो? ये सब कवि की कल्पनाएँँ हैं। कवि को तो कोई आधार चाहिए। अपने काव्य का चमत्कार दिखलाने के लिए किसी ने रामचन्द्रजी का प्रसंग लेकर रामगीता बना दी, किसी ने शिव का प्रसंग लेकर शिवगीता बना दी, किसी ने गोपी का प्रसंग लेकर गोपीगीता बना दी। इसी तरह किसी ने अपना ज्ञान बघारने के लिए कुरुक्षेत्र की पृष्टभूमि में भगवदगीता की रचना कर दी। तुम्हीं बताओ कि घमासान युद्ध के अट्ठारह अध्याय गीता कहने या सुनने की फुर्सत किसको थी? क्या उस बीच में अट्ठारह अक्षौहिणी सेना त्राटक मुद्रा लगाए कुंभ प्राणायाम साध रही थी? और,संजय की आँँख में टेलिविजन लगा हुआ था? कवि को किसी व्याज से सांख्ययोग एवं वेदांत की पंडिताई छाँँटनी थी, सो उन्होंने छाँँटी है।

मैंने कहा- खट्टर काका, तो आपकी दृष्टि में गीता से कोई लाभ नहीं?

खट्टर काका मुस्कुराते हुए बोले- लाभ क्यों नहीं? एक लाभ तो यही कि परिवार-नियोजन में सहायता पहुँँच सकती है।

मैंने पुछा-सो कैसे, खट्टर काका ?

खट्टर काका बोले- देखो, गीता कासंदेश है-

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता 2/47)

इस श्लोक में संतति-निरोध का मंत्र छिपा है।

मैंने चकित होकर पूछा- सो कैसे, खट्टर काका?

खट्टर काका बोले - "केवल कर्म करते जाओ, फल की कामना मत रखो।" यहाँ फल का अर्थ संतान समझो। अब मैं ज्यादा खोलकर कैसे कहूँ? चाचा जो हूँ!

मैंने कहा- खट्टर काका, आप तो हर बात में विनोद की पुट दे देते हैं। गीता का उपदेश है कि अनासक्त होकर कर्म करना चाहिए।

खट्टर काका बोले- हाँ जी। इस उपदेश पर अमल किया जाये तो देश में क्रांति नहीं होगी। कोल्हू के बैल को गुड़ की चेकी से क्या प्रयोजन? यदि इतना ज्ञान मजदूरों को जो हो जाय तो फिर कारखानों में हड़ताल क्यों होगी ? लेकिन आजकल तो देश में उलटी गीता चल पड़ी है-

फलेष्वेवाधिकारस्तु मा कर्मणि कदाचन

इस निष्कर्म भोगवान की लहर को रोकने के लिए एक नयी गीता देश को चाहिए, जो कर्म और फल दोनों को साथ लेकर चले। वह गीता अब कुरुक्षेत्र में नहीं, कृषिक्षेत्र में बनेगी। उस गीता से कुरु (वंश) का अंत हुआ था, इस गीता से कुरु मंत्र का उदय होगा। तभी तो सुजलाम, सुफ़लाम, शस्यश्यामलाम वाला राष्ट्र-गीत सार्थक हो सकेगा। आगे की पीढियाँ पूछेंगी-

कर्मक्षेत्रे कृषिक्षेत्रे समवेताश्चिकीर्षवः

मामकाः पूर्वजाश्चैव किमकुर्वत भारते?

आयुर्वेद

उस दिन मैं वैद्यनी के औषधालय में बैठा हुआ था।

तब तक पहुँच गये खट्टर काका।

वैद्यजी के हाथ में 'भावप्रकाश' देखकर बोले-अहा! क्या सुंदर काव्य है भावप्रकाश!

बैद्यजी विस्मित होते हुए बोले-'भावप्रकाश' आयुर्वेद का प्रामाणिक ग्रंथ है। इसे आप काव्य' कहते हैं!

खट्टर काका बोले-मैं तो पूरे आयुर्वेद को ही महाकाव्य मानता हूँ। कहिए तो, ज्वर की उत्पत्ति कैसे हुई है ?

वैद्यजी ने भावप्रकाश का उद्धरण देते हुए कहा -

दक्षापमान संक्रुद्धः रुद्रनिःश्वाससंभवः

अर्थात्‌ “जब दक्ष प्रजापति के यहाँ महादेवजी का अपमान हुआ, तब उन्होंने क्रुद्ध होकर फुफकार छोड़ी। उससे जो दाह उत्पन्न हुआ, वही ज्वर है।

खट्टर काका बोले--अब कहिए, वैद्यजी! दुनिया में किसी डाक्टर के दिमाग में ऐसी कल्पना आयी होगी? इसी कारण मैं 'आयुर्वेद' को काव्य' कहता हूँ।

वैद्य-परंतु आयुर्वेद में इतने द्रव्य-गुणों के जो विवेचन भरे हैं ?

खट्टर-उनमें भी वही अलंकार है। कहिए तो, पारा क्या है ?

वैद्यजी पुनः भावप्रकाश का श्लोक पढ़ते हुए बोले-

शिवाइगात्‌ प्रच्युतं रेत: पतितं धरणीतले

अर्थात्‌ “शिवजी की धातु पृथ्वी पर गिर गयी, वही पारा है।”

खट्टर काका व्यंग्यपूर्वक बोले--हाँ, इसी से सफेद! इसी से चिकना! इसी से रसराज! और गंधक क्या है, महाराज ?

वैद्यजी पुनः भावप्रकाश का श्लोक पढ़ने लगे -

श्वेतद्वीपे पुरा देव्या: क्रीडंत्या: रजसा प्लुतम्‌

डुकूल॑ तेन वस्त्रेण स्नाताया: क्षीरनीरधी

प्रसूतः तद्रजस्तस्माद्‌ गंधकः समुदीरितः

अर्थात्‌ “एक समय श्वेतद्वीप में क्रीड़ा करते-करते देवीजी स्खलित हो गयी। तब क्षीर-समुद्र में स्नान किया। उसमें कपड़े से धुलकर जो रज गिरा, वही गंधक है।” खट्टर काका मुस्कुराते हुए बोले-इसी से लाल! इसी से गंधपूर्ण! इसी से पारा शोधने की शक्ति से युक्त! क्यों वैद्यजी, ऐसी सरस कल्पना किसी 'साइंस” विज्ञानी में मिल सकती है ?

मैंने कहा-खट्टर काका, आयुर्वेद में इस तरह की बातें कैसे आ गर्यी ? खट्टर-अजी, इस देश की जलवायु के कण-कण में रसिकता भरी हुई है। जहाँ विज्ञान ने थोड़ा सिर उठाया कि तुरत कविता-कामिनी आकर छाती पर सवार हो जाती है। समझो तो अपने देश के विज्ञान को खा गया काव्य। 'काव्येन गिलितं शास्त्रम्‌'। आयुर्वेद को काव्य इस रूप से ग्रस्त किये हुए है कि “भावप्रकाश” और 'भामिनी-विलास' में विशेष अंतर नहीं।

इसी कारण वैद्य लोगों को 'कविराज” कहा जाता है। साधारण कवि नहीं, कविराज!

मैं - वाह! यह तो अनूठी कही।

खट्टर-मुझसे तो अनूठी ही सुनोगे। महादेव को वैद्यनाथ' क्यों कहते हैं, सो जानते हो ?

मैं-नहीं, खट्टर काका!

खट्टर-तो सुनो। महादेव के श्वास से ज्वर उत्पन्न हुआ, जिससे वैद्य लोगों की जीविका चलती है।

उन्हीं की धातु से पारा निकला, जिससे वैद्य लोग मकर॒ध्वज' बनाते हैं।

उन्हीं की बूटी (भंग) से वैद्यलोग मोदक बनाकर रुपये में तीन अठन्नियाँ बनाते हैं। तब यदि महादेव वैद्यगाथ न कहलाएँ तो कौन कहलाए! मैं--धन्य हैं, खट्टर काका! आप जो न सिद्ध कर दें!

ख़ट्टर काका बोले-अजी, समझो तो वैद्य भी एक प्रकार के महादेव ही होते हैं। उन्हीं की तरह भस्म के प्रेमी! बूटी के पीछे बेहाल!

वह त्रिशूल से रक्षा करते हैं, तो ये भी त्रिशूल (उदरशूल, हृदयशूल, मस्तकशूल) से रक्षा करते हैं। उन्होंने भस्मासुर का संहार किया, तो ये भी भस्मक रोग का संहार करते हैं।

उन्होंने त्रिपुए का अंत किया, ये न जानें कितने पुरों का अंत करते हैं! वैद्यजी ने रुष्ट होकर कहा-परंतु वैद्य रक्षा भी तो करते हैं ?

आयुर्वेद में एक-से-एक चमत्कारी रसायन भरे पड़े हैं।

खट्टर काका बोले--सबसे बढ़कर रसराज रस यानी श्रृंगार रस! मैंने चकित होकर पूछा-ऐं! आयुर्वेद में श्रृंगार रस!

खट्टर काका बोले-अजी, कुछ ऐसा-वैसा! देखो, लोलिम्बराज गर्मी का कैसा सरस उपचार बताते हैं!

हारावली.. चंदनशीतलानां

सुगंध... पुष्पांवरशोभितानाम्‌

नितम्बिनीनां सुपयोधराणाम्‌

आलिंगनान्याशु हरन्ति दाहम्‌

अर्थात्‌, “सुगंधित पुष्प-माला और चंदन से शीतल शरीरवाली पीन पयोधरा और पुष्टनितम्बिनी युवतियों के आलिंगन दाह को तुरत दूर कर देते हैं।”

जघनचक्रचलन्‌ मणिमेखला

सरसचंदनचंद्रविलेपना

वनलतेव तनु परिवेष्टयेत

प्रबलतापनिपीडित मंगना

अर्थात्‌, “चंदन-कपूर का लेप किये हुए रमणी मणिमेखलायुक्त जघन-चक्र चलाती हुई, संपूर्ण शरीर में वनलता की तरह लिपट जाय, तो प्रबल ताप को भी शांत कर देती है।” अब तुम्हीं बताओ, इसे रोगशास्त्र कहोगे या भोगशास्त्र ?

मैंने पूछा-वैद्यजी, आप कया कहते हैं ?

वैद्यजी कुछ झेंपते हुए बोले-हाँ, ये श्लोक तो हैं। लेकिन सिर्फ गर्मी के लिए ऐसे उपचार बताये गये हैं।

खट्टर काका ने कहा-महाराज! सर्दी की दवा भी कम रसीली नहीं है-

तं स्तनाम्यां सुपीनाम्यां पीवरोरुर्नितग्बिनी

युवती गाढमालिंगेत्‌ तेन शीत प्रशाभ्यति

अर्थात्‌ “मांसल जंघा और स्थूल नितंबवाली युवती अपने पीन स्तनों से गाढ़ालिंगन करे, तो सर्दी दूर हो जाती है!”

ऐसा नुसखा किसी डाक्टरी किताब में मिलेगा? जाड़े में भी युवती! गर्मी में भी युवती! युवती क्या हुई, चाय की प्याली हुई! महाराज, जब युवती भी आष्यर्या में है तो और-और दवाओं के साथ उसे भी आलमारी में क्यों नहीं रखते हैं ?

वैद्यनी कटकर रह गये। मैंने पूछा-खट्टर काका, ऐसी रसिकता आयुर्वेद में कैसे आ गयी ?

खट्टर काका बोले-अजी, बात यह है कि आयुर्वेद मुख्यतः वैसे विलासी राजाओं के लिए बना है, जिनका एकमात्र व्यायाम था नखक्षत !

मन को उत्तेजना देने पर कवि रहते थे, तन को उत्तेजना देने पर कविराज ! एक रस द्वारा, दूसरे रसायन द्वारा। काव्य और आयुर्वेद दोनों मौसेरे भाई, एक ही दरबार में पले हुए हैं।

इसी से जो रंग जगननाथराज पर है, वही रंग लोलिम्बराज पर | कालिदास का ऋतुसंहार पढ़ो या सुश्रुत की ऋतुचर्या, एक ही बात है। बैद्यजी ने पूछा--आप ऐसा क्‍यों कहते हैं ?

खट्टर काका ने भावप्रकाश आगे बढ़ाते हुए कहा देखिए

कस्तूरीवर कुंकुमागरुयुतामुष्णाग्बुशीच॑तथा

स्निग्धं स्त्रीपु सुखं गुरूष्णवसनं सेवेत हेमंतके

यह हेमंतचर्या किसके लिए है! जिसके केलि-कक्ष में केसर-कस्तूरी-कदंब कलित कामिनियाँ किलोल करती रहें! औरों के लिए तो अग्रहण शब्द ही सार्थक है।

आयुर्वेद राजा-महाराजों की वस्तु है। इसी से ऋतुचर्या का मुख्य अर्थ हो गया, किस समय कैसे भोग करना चाहिए।

वैद्य-इसका तात्पर्य था कि भोग को मर्यादा की सीमा में रखा जाय। खट्टर काका ग्रंथ के पृष्ठ उलटते हुए कहने लगे-देखिए, इसी सीमा को लेकर तो आचार्यों में झगड़ा है।

एक आचार्य का मत है

त्रिभिश्चिभिरहोभिरहिं रमयेत्‌ प्रमदां नरः

अर्थात्‌, तीन-तीन दिनों पर रमण करना चाहिए। दूसरे आचार्य को इतने से संतोष नहीं। वह कहते हैं

प्रकाम॑ तु निषेवेत मैथुनं शिश्चिरागमे

जाड़े के समय में कौन हिसाब-किताब? जितना मन हो, उतनी बार रमण कीजिए |

तीसरे आचार्य इनसे भी आगे टप जाते हैं-

नित्यं बाला सेव्यमाना नित्यं वर्धवते बलम्‌

जाड़ा क्या और गर्मी क्‍या? प्रतिदिन बाला का सेवन करना चाहिए।

चौथे आचार्य समय की तालिका भी बना देते हैं-

शीते रात्रौ दिवा भ्रीष्मे वसंते तु दिवानिशि

वर्षादु_वारिदध्वांते शरत्यु सरसस्मरः

“जाड़े की रात में, गर्मी के दिन में, बसंतऋतु में रात या दिन किसी समय, वर्षाऋतु में जभी मेघ का गर्जन हो, शरत्‌ऋतु में जभी काम का वेग हो, रमण करना चाहिए।”

पाँचवें आचार्य और भी गुरुघंटाल निकलते हैं-

निदाधशरदोर्बाला हिता विषयिणां मता

तरुणी शीतसमये प्रौढ़ा वर्षावसन्तयो:

गर्मी और शरद में बाला', जाड़े में 'तरुणी', और वर्षा तथा वसंत में श्रढ़ा' पथ्य होती है। जैसे, वे सेब, पपीता या कहू हों! अब इन तीनों का 'सेट' हर साल बना रहे, तब तो ऋतुचर्या का ठीक-ठीक पालन हो! लेकिन ऐसा तो उन्हीं के लिए संभव है, जिनके उद्यान में बारहों मास बदरीफल से लेकर श्रीफल तक विद्यमान रहें।

मैं-खट्टर काका, बात पूरी तरह समझ में नहीं आयी। बाला, तरुणी और प्रीढ़ा में क्या अंतर है ?

खट्टर-यह भी इसी ग्रंथ में देख लो।

बालेति गीयते नारी यावद्वर्षाणि षोडश

ततस्तु तरुणी ज्ञेया द्वात्रिंशत्‌ वत्सरावधि

तदूध्वमेव प्रौढा स्थात्‌ पंचाशद्वत्मरावधि

सोलह वर्ष तक बाला, बत्तीस तक तरुणी, पचास तक प्रौढ़ा होती है। अब तुम्हीं बताओ, यह ऋतुचर्या किसके लिए है ? जिसके रंगभवन में मुग्धाबाला से लेकर प्रौढ़ा हस्तिनी तक मौजूद रहें और मौसम के मुताबिक बारी-बारी से कामज्वर को शांत करती रहें। इसे चिकित्साशास्त्र कहा जाय या कोकशास्त्र ? मैंने पूछा-आयुर्वेद में कामशास्त्र की इतनी बातें क्‍यों भरी हैं ?

खट्टर काका बोले--अजी, आयुर्वेद का जन्म ही भोग के निमित्त हुआ है।

भार्गवश्च्यवनः कामी वृद्ध: सन्‌ विक्रृतिं गतः वीर्यवर्णस्वरोपेत: . कृतोउश्विभ्यां. पुनर्युवा

जब वृद्ध च्यवन भोग करने में असमर्थ हो गये, तो आदिवैद्य अश्विनी कुमार ने रसायन के जोर से उन्हें पुनः युवा बना दिया। जैसे आदिकवि को क्रींचपक्षी की मैथुनेच्छा से काव्य की प्रेरणा मिली, वैसे ही आदिवैद्य को वृद्ध मुनि की भोगतृष्णा से आयुर्वेद की प्रेरणा मिली। एक ने अनुष्टुप्‌ छंद का आविष्कार किया, दूसरे ने च्यवनप्राश का। तब से आयुर्वेद का विकास इसी दृष्टि से होने लगा कि रतिमल्लता के संग्राम में विजय-पताका फहराती रहे। राजा का ध्वजाभंग नहीं हो, यह देखने पर राजमंत्री थे; ध्वजभंग नहीं हो, यह देखने पर राजवैद्य थे।

मुझे चकित देखकर खट्टर काका बोल उठे-हँसी नहीं करता हूँ। राजा लोगों को जीवन में दो ही वस्तुओं से तो प्रयोजन था-पाचक और मोदक। भोजन-शक्ति को उद्दीप्त करने के लिए क्षुधाग्नि-संदीपन।

भोगशक्ति को उद्दीप्त करने के लिए कामाग्नि-संदीपन! राजा लोग रातदिन पड़े-पड़े दोनों अ्थों में कुमारिकासव पान किया करते थे। इतना ही तो काम था | रोज-रोज वही दिनचर्या! कहाँ तक सहते? इसी से बेचारे वैद्यगण रात-दिन वाजीकरण के पीछे बेहाल थे। एक-से-एक स्तंभन वटी, वानरी गुटिका, कामिनी-विद्रावण! इन्हीं बातों की रिसर्च में सारी बुद्धि खर्च होने लगी।

मैं - क्यों वैद्यनी, आप कुछ नहीं बोलते हैं!

खट्टर-बोलेंगे क्या ? इनको भी तो वही सब रटाया गया है। एक आचार्य ने ऐसी खीर बनायी कि-

अकत्वा हृष्यति जीर्णोतपि दशदारान्‌ ब्रजत्यपि

“वृद्ध भी खाय, तो दश प्रमदाओं का मान-मर्दन कर सके।” दूसरे आचार्य ऐसा चूर्ण बनाते हैं कि-

एतलमेत॑ मधुनावलीढं रामाशतं सेवयतीव पंढः

“नपुंसक भी वह चूर्ण मधु के साथ चाट जाय तो कंदर्प बनकर सौ कामिनियों का दर्प चूर्ण कर दे!”

कामिनियों का दर्प दलित होता था या नहीं, सो तो वे ही जानें। लेकिन वैद्यजी का भाग्य अवश्य फलित हो जाता था। सुंदरियों के यौवन की सुरक्षा का भार भी उन्होंने अपने हाथ में ले लिया। एक आचार्य ने गारंटी” दी-

प्रधम कुसुमकाले नस्ययोगेन पीतम्‌

सनियमममरास्यं.. तंडुलांभो. युवत्या

कुचयुगलसुपीनं क्वापि नो याति पातम्‌

कथित इति पुरैव चक्रदत्तेन योगः

“यदि प्रथम पुष्प के समय नवयौवना नस्ययोगपूर्वक चावल का माँड़ भी ले, तो उसका यौवन कभी ढलेगा ही नहीं।”

दूसरे आचार्य ने और भी जबर्दस्त दावा किया -

ओपर्णिकाया: रसवल्कसिद्धं तिलोद्भवंतैलवर॑ प्रदिष्टम्‌ तन्मर्दनेभ्यः... पतितस्तनीनां समुत्थिता: स्युः पतिता: पयोधराः

श्रीपर्णी के स्वरस में सिद्ध तिल का तेल मर्दन करने से विगलित यौवनाओं के ढले हुए यौवन भी ऊपर उठ जाते हैं!

इस प्रकार, पुरुष के विंदुपात” और रानी के 'कुच-पात' पर वैद्यों ने अपना 'ब्रेक' लगा दिया। उनके मुष्टियोग कहाँ तक सफल होते थे, सो तो पता नहीं। लेकिन उनकी मुट्ठियाँ तो गर्म होती ही थीं।

वैद्यजी ने सगर्व कहा-हमारे सभी मुष्टियोग अनुभूत और परीक्षित हैं। खट्टर काका बोले-अगर ये योग सचमुच कसौटी पर खरे उतर सकें, तो करोड़ों डालर विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है।

लेकिन वे फेल कर गये, तो फिर आपकी मुख-मुद्रा कैसी हो जायेगी ?

वैद्यनी बोले-अपने यहाँ के निधंटु' में सूक्ष्म विवेचन देखिए। खट्टर काका बोले-निधंटु' में भी तो वैसी ही बातें भरी पड़ी हैं। देखिए, अभ्रक (अबरख) के विषय में क्या कहा गया है-

तारुण्याढ्यं रमयति शर्त योषितां नित्यमेव

अर्थात्‌, “इसके जोर से नित्य सौ स्त्रियों से संभोग किया जा सकता है।” जैसे अधिक-से-अधिक स्त्रियों का भोग करना ही जीवन का चरम लक्ष्य हो! जो व्यक्ति नित्य सौ बार भोग करेगा, वह दूसरे काम किस समय करेगा ? वह टिकेगा कितने दिन? इसी से राजा लोगों को शीघ्र हीं क्षय रोग पकड़ लेता था, और वैद्य लोग उसे कहते थे-राजयोग! अब आप ही कहिए, ऐसे शास्त्र को आयुर्वेद कहा जाय या आयुर्भेद ?

वैद्य-परंतु दूसरे-दूसरे रोगों के निदान और उपचार भी तो आयुर्वेद में हैं। खट्टर-हैं | लेकिन उनमें भी ऐसे-ऐसे मनगढ़ंत नुस्खे भरे हैं, कि चिकित्सा में विचिकित्सा (शंका) हो जाती है; आयुर्वेद से निर्वेद (वैराग्य) हो जाता है। वैद्य-जैसे ? कोई उदाहरण दीजिए।

खट्टर काका पुनः ग्रंथ खोलकर देखने लगे। बोले-यही बंध्या-रोग की चिकित्सा लीजिए-

पष्योद्घृतं लक्ष्मणाया: मूल॑ दुग्धेन कन्यया पिष्टं पीत्वा ऋतुस्नाता गर्भ धत्तेन संशयः

“ऋतुस्नाता स्त्री पुष्य नक्षत्र में उखाड़ी हुई लक्ष्मणा की जड़ को कुमारी कन्या से दूध में पिसवाकर पी ले, तो गर्भ धारण करे, इसमें संदेह नहीं।” आचार्य को संदेह नहीं है, परंतु मुझे तो अवश्य है।

पहला प्रश्न तो यह उठता है कि गर्भ धारण कराने की शक्ति किसमें है ? लक्ष्मणा की जड़ में अथवा पुष्य नक्षत्र में अथवा कुमारी कन्या के हाथ में? अथवा तीनों के संयोग में? इस प्रयोग को वैद्यम कहा जाय अथवा ज्योतिष अथवा तंत्र, या तीनों की खिचड़ी ?

वैद्य-परंतु ऐसे-ऐसे उपचार भी तो हैं, जिनमें नक्षत्र का बंधन नहीं है। खट्टर-हाँ, हैं।

जैसे-

पत्रमेक॑ पलाशस्य पिष्ट्वा दुग्धेन गर्भिणी पीत्वा पुत्र॒मवाप्नोतिवीर्यवन्तं न संशयः

“पलाश का एक पत्ता दूध में पीसकर पी लेने के बाद गर्भिणी को निश्चय पुत्र हो। वह भी साधारण नहीं, वीर्यवान्‌!”

अजी साहब, मैं कहता हूँ, यदि बलवान्‌ पुत्र की प्राप्ति इतना सुगम है, तो डंका पीटकर प्रचार कीजिए कि यह भारतवर्ष का मौलिक आविष्कार है। इसे संपूर्ण संसार में खिराकर देश का मस्तक ऊँचा कीजिए। और यदि यह झूठ है, तो आज ही इस वचन को काटकर फेंकिए! ऐसी-ऐसी झूठमूठ की बातें आयुर्वेद में रहेंगी, तो शास्त्र का क्या मूल्य रह जायेगा ?

वैद्यजी को निरुत्तर देखकर खट्टर काका मुझसे कहने लगे-देखो, इस देश में जहाँ कोई शास्त्र बना कि तुरंत क्षेपकों की भरमार होने लग जाती है। जिसके मन में आता है, एक श्लोक जोड़कर घुसेड़ देता है। और वही कालक्रम से प्रमाण बन जाता है!

आयुर्वेद में भी वही बात हुई है। तभी तो ऐसे-ऐसे श्लोक भी उसमें पाये जाते हैं-

कृष्णवर्णश्वपुच्छस्य सप्तकेशेन वेणिका

तां बध्वा च गले दंतकड़मर्डी हन्ति मानव:

“काले रंग के घोड़े की पूँछ में से सात बालों की लट बनाकर शिशु की गर्दन में बाँध दो, तो दाँतों का कटकटाना दूर हो जाय!” यह बात यदि कोई डाक्टर सुने तो क्या कहेगा? परंतु अभी तक आयुर्वेद के आचार्य ये सब श्लोक पढ़ाते हैं और इन्हें विद्यार्थी रट जाते हैं! इससे बढ़कर उपहासास्पद बात और क्या हो सकती है!

वैद्यजी को कुछ उत्तर देते नहीं बना।

खट्टर काका कहने लगे-दूसरे देशों में चिकित्सा का विकास वैज्ञानिक प्रणाली से हुआ है; परंतु इस देश में तो बाबा वाक्यं प्रमाणम्‌ चलता है। इसलिए जहाँ डाक्टरी विद्या आज उन्नति के शिखर पर पहुँच गयी है, वहाँ आयुर्वेद अभी तक प्रदरान्तक रस में डूबा हुआ है।

जहाँ आधुनिक 'सर्जन' शल्य-चिकित्सा से कृत्रिम अंग का सर्जन कर रोग का विसर्जन कर देता है, वहाँ वैद्य लोग केवल धन्वंतरि के नाम का गर्जन करके रह जाते हैं। जब ये एक कटी नाक तक नहीं जोड़ सकते, तो फिर किस मर्ज की दवा हैं ? इसीलिए रजः प्रवर्तिनी बटी से आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

मैंने पूछा--आयुर्वेद के आचार्य नवीन अनुसंधान क्यों नहीं करते ?

खट्टर काका मुस्कुराते बोले-गद नाम रोग का है। उसका हनन करनेवाले कुछ लोग गदहा पद को सार्थक करते हैं। वे केवल प्रखर रूप से शास्त्र का भार ढोना जानते हैं!

खरो यथा चंदनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चंदनस्य!

ऐसे ही शास्त्रभारवाहकों के लिए कहा गया है-

मिथ्यौषधैर्हन्त मृषा कपाये: असह्यलेह्येरयथार्थ तैलेः

वैद्या इमे वंचितरुग्णवर्गा: पिचंडभांड॑. परिपूरयन्ति

वे अपना उदर-भांड भरने के लिए झूठमूठ फॉट, कषाय और आसव के भांड प्रस्तुत करते रहते हैं। अरिष्ट बनाकर केवल अपना अरिष्ट (अनिष्ट योग) दूर करते हैं!

खट्टर काका ने वैद्यजी को अप्रतिभ देखकर कहा--वैद्यजी! मैं आपको नहीं कह रहा हूँ। उन सबों को कह रहा हूँ जो कुएँ का खारा पानी भी-यह समझकर पी रहे हैं कि बाबा का खुदाया हुआ कुआँ है।

तातस्य कृपोज्यमिति ब्रुवाणा: क्षारं जल॑ कापुरुषा: पिबन्ति! मैंने कहा-खड्टर काका, आज आप वैद्यों पर लग पड़े। परंतु बेचारे को राजकीय आश्रय नहीं प्राप्त है। क्‍या करें ?

खट्टर काका ब्यंग्यपूर्वक बोले-हाँ, एक बार राजकीय आश्रय मिला, तो हजार वर्ष तक मदनानंद मोदक बनाते रह गये। अब फिर राजकीय सहायता मिले, तो गर्भ-कुठार-रस तैयार करने लग जायेंगे !

एकाएक खट्टर काका का ध्यान पाचक पर चला गया। बोले-अजी, और जो कहो, वैद्य लोग पाचक काफी चटपटा बनाते हैं।

लवणभास्कर! हिंग्वष्टक! दाडिमाष्टक! एक-से-एक स्वादिष्ट! ऐसी जायकेदार चीजें डाक्टरी में कहाँ मिलेंगी! जब खट्ट-मीठा हाजमे का चूर्ण खाकर पानी पीता हूँ, तो मजा आ जाता है!

और दूसरी दवाओं की तो मुझे जरूरत ही नहीं पड़ती। जब वैद्यनाथ ही बूटी ही साध रखी है, तो फिर वैद्य की क्या खुशामद!

खट्टर काका ने वैद्यजी से विनयपूर्वक कहा--बुरा न मानिएगा। मैंने अपने मन का भावप्रकाश कर दिया। अब आप अपना भाव-प्रकाश रखिए। मैं जाता हूँ।

महाभारत

मैं प्रातःश्लोक पढ रहा था - पुण्यश्लोको नलोराजा पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः

तब तक पहुँच गये खट्टर काका। बोले-क्या सबेरे-सबेरे कापुरुषों के नाम ले रहे हो!

मैंने कहा - खट्टर काका, धर्मराज जैसे महापुरुष को आप ऎसा कहते है?

खट्टर काका बोले - धर्मराज नहीं, मूर्खराज। जो जुए के पीछे अपना राज-पाट गॅंवाकर स्त्रीपर्यन्त को हार जाय और जंगलों मे मारा-मारा फिरे, उसे और क्या कहेंगे? उनका एक ही जोड़ा है-राजा नल। वह भी जुए के पीछे अपना सर्वस्व गॅंवाकर जंगलों की खाक छानने गये और वहाँ अपनी सोयी हुई पत्नी को छोड़कर चुपके से भाग गये। नल और युधिष्ठिर दोनों एक ही जुए में जोतने योग्य हैं। जिसने यह श्लोक बनाया है, उसने खूब जोड़ा मिलाया है।

मैं - खट्टर काका, युद्धिष्ठिर महाभारत के आदर्श पात्र हैं, जिनसे शिक्षा मिलती है।

खट्टर कका - हाँ, सबसे बड़ी शिक्षा तो यह मिलती है कि खानदान में एक भी नालायक पैदा होने से संपूर्ण वंश का नाश हो जाता है। यदि युधिष्ठिर जुआरी नहीं निकलते, तो महाभारत का संहारकारी युद्ध क्यों छिड़ता?

मैं - खट्टर काका, लोग कहते हैं कि कौरवों के अन्याय से महाभारत का युद्ध हुआ और आप उलटे युधिष्ठिर के मत्थे दोष मढते हैं।

खट्टर काका-तुम स्वयं सोचकर देखो। यदि युधिष्ठिर महाराज जुआ खेलने नही जाते तो इतना होता क्यों? जोश पर पासा फेंकते गये। पत्नी तक को दाँव पर चढा दिया। अजी, बेवकूफ को तो लोग भड़काते ही हैं। इनकी अपनी अक्ल कहाँ चरने गयी थी! और जब हार ही गये तो इसमें दूसरों का क्या दोष? चुप लगा जाते। यह क्या कि हार भी जाएँगे और गद्दी भी चाहेंगे!

मैं - खट्टर काका, द्रोपदी पर उतना अत्याचार हुआ, सो आप नहीं देखते?

खट्टर काका बोले-तुम द्रोपदी का दोष क्यों नहीं देखते? दुर्योधन महल देखने आये थे। उन्हें नया संगमर्मर देखकर जल का भ्रम हो गया। उस पर द्रोपदी खिलखिलाकर बोल उठी-'अंधे का बेटा अंधा ही होता है।' अब तुम्हीं कहो, यह कितनी बड़ी बदतमीजी हुई! क्या कोई भी सलज्ज कुलवधू श्वसुर-भैंसुर के प्रति ऎसे शब्द का व्यवहार कर सकती है? लेकिन रुपगर्विता द्रौपदी को तो कभी जेठ-छोटे का लेहाज नहीं रहा। पाँचों पांडवों को एक ही लाठी से हाँकती थी। बल्कि, युधिष्ठिर पर और भी ज्यादा धौंस जमाती थी। मगर कौरव तो वैसे गावदी नहीं थे जो चुपचाप अपमान की घूँट पीकर रह जाते। वे अपने पिता के असली पुत्र थे। उन्होंने कसकर बदला लिया।

मैं - परन्तुधर्मराज युद्धिष्ठिर तो साक्षात धर्मपुत्र....

खट्टर काका - बीच में ही काटते बोले- धर्मपुत्र नहीं, अधर्मपुत्र कहो। और बराबर "धर्म-राज' की रट क्या लगाये जा रहे हो! जो युद्धिष्ठिर अपने छोटे भाई अर्जुन की स्वयंवर-परिणीता पत्नी, अनुजवधू द्रौपदी को गर्भवती करने में नहीं हिचके, उन्हें तुम धर्मराज कहते हो? ऎसे को तो अधर्मराज कहना चाहिए।

मैं - परंतु यह तो माता कुंती की आज्ञा थी कि 'पाँचों भाई बराबर-बराबर बाँट लो। '

खट्टर काका उत्तेजित होकर बोले- अजी, पांचाली क्या पंचामृत प्रसाद थी, जो इस तरह वितरण किया गया? यह तो गनीमत समझो कि पांचाली के पाँच अंगों का बँटवारा नहीं किया गया। नहीं तो बेचारी की और गत बन जाती। फिर भी क्या कम दुर्दशा हुई? पाँच पुरुषों के बीच एक स्त्री! उस पर सब का हक! जैसे, वह नारी नहीं हो, साझे की गुड़गुड़ी हो! बारी-बारी से पी लो! क्या भले आदमियों का यही तरीका है? सच पूछो तो पांडव लोग पतित थे। उन्होंने कुल को डुबो दिया। इसी से तो एक बार कर्ण ने भरी सभा में कहा था कि पांचाली धर्मपत्नी नहीं पाँचों की रखेली है।

एको भर्त्ता स्त्रियाः देवै र्विहितः कुरुनंदन

इयं त्वनेकवशगा बंधकीति विनिश्चिता (महाभारत: सभापर्व)

मैं - खट्टर काका, कौरवों ने उतना अन्याय किया। दुःशासन भरी सभा में द्रौपदी की साड़ी तक खोलने लगा। अब इससे बढकर अपमान क्या होगा?

खट्टर काका बोले - विचारकर देखो तो द्रौपदी का अपमान स्वयं युद्धिष्ठिर ने किया, जिन्होने पत्नी की देह का खुला विज्ञापन करते हुए उसे दाँव पर चढा दिया।

नौव ह्रस्वा न महती न कुशा नातिरोहिणी

नीलकुंचितकेशी सा तया दीव्याम्यहं त्वया (महाभारत: सभापर्व)

'मेरी पत्नी न नाटी है, न बहुत लंबी है, न दुबली-पतली है, न बहुत मोटी है (अर्थात मध्यमांगी है), उसके काले-काले घुँघराले बाल हैं। मैं उसी को पासे पर चढा रहा हूँ। इस तरह तो वह बोले जो स्त्री का दलाल हो!

और जब वह हार गये, तो दुःशासन को बदला साधने का मौका मिल गया। उस सुकेशी को केश पकड़कर खींच लाया।

जग्राह केशेषु नरेन्द्र पत्नीम्

आनीय कृष्णामति दीर्घकेशाम् (महाभारत: सभापर्व)

जानते हो, द्रौपदी ने उस समय युधिष्ठिर की कैसी भर्त्सना की थी!

मूढो राजा द्यूतमदेन मत्तः को हि दीव्येत भार्यया राजपुत्रः! (महाभारतः सभापर्व)

'ऎसा मूर्ख राजा कौन होगा जो जुए के नशे में होश गॅंवाकर अपनी स्त्री को दाँव पर चढा दे?

जब दुःशासन द्रौपदी को पकड़कर सभा में ले जाने लगा, तब वह बोली-मैं अभी रजस्वला हूँ। एक ही कपड़े में हूँ। उतने लोगों के बीच कैसे ले जाओगे?

सा कृष्यमाणा नमितांगयष्टिः

शनैरुवाचाथ रजस्वलास्मि

एकं च वासो मम मंदबुद्धे

सभां नेतुं नार्हसि मामनार्य। (महाभारत: सभापर्व)

इस पर दुःशासन ने जवाब दिया-

रजस्वला वा भव याज्ञासेनि

एकांवरा वाऽप्यथवा विवस्त्रा

द्यूते जिता चासि कृतासि दासी

दासीषु वासश्च यथोपजोषम्

(महाभारत: सभापर्व)

तुम रजस्वला रहो, एकवस्त्रा रहो या विवस्त्रा रहो, हमने तुम्हें जुए में जीत लिया है। अब तुम हमारी दासी हो। जो मन में आवेगा, करेंगे।' तदनंतर खींचातानी होने लगी-

प्रकीर्णकेशी पतितार्धवस्त्रा

दुःशासनेन व्यवधूयमाना (महाभारत:सभापर्व)

द्रौपदी के केश छितरा गये, आधी साड़ी नीचे गिर गयी।

मा मा विवस्त्रां कुरु मां विकार्षीः

(मुझे बिल्कुल नग्न मत करो)

तथा ब्रुबंती करुणं सुमध्यमा

भर्तृन् कटाक्षैः कुपिता ह्यपश्यत्

इस तरह करुण प्रार्थना करती हुई उसने कुपित दृष्टि से अपने पतियों की ओर देखा। लेकिन तथापि

ततो दुःशासनो राजन् द्रौपद्याः बसनं बलात्

सभामध्ये समाक्षिप्य व्यपाक्रष्टुं प्रचक्रमे (महाभारत: सभापर्व)

दुःशासन जबर्दस्ती उसकी साड़ी खींचने लगा।

उधर द्रौपदी की लाज लूटी जा रही थी, इधर पांडव लोग चुपचाप सभा में बैठे रहे! पत्नी पर अत्याचार होते हुए देखकर भी वे स्थितप्रज्ञ की तरह निर्विकार देखते रहे। उनकी आँखों का पानी गिर चुका था।

मैने कहा - खट्टर काका, उस समय मौका नही था।

खट्टर काका डाँटते हुए बोले-अब उससे बढकर कैसा मौका होता जी? जरा भी आन रहती तो वहीं जान दे देते। दुःशासन पर टूट पड़ते। मर मिटते। अर्जुन भीम की गांडीव-गदा किस दिन के लिए थी?

खट्टर काका थोड़ी देर क्षुब्ध रहे। फिर कहने लगे-तभी तो द्रौपदी ने एक बार खीझ कर कहा था- नैव मे पतयः संति

'मेरे ये पति नहीं हैं।'

यह कहकर वह हाथ से मुँह ढककर रोने लगी थी। - इत्युक्त्वा प्रारुदत् कृष्णा मुखं प्राच्छाद्य पाणिना (महाभारतः सभापर्व)

उस करुण क्रंदन में अश्रुओं की इतनी वर्षा हुई कि-

स्तनावपतितौ पीनौ सुजातौ शुभलक्षणौ

अभ्यवर्षत पांचाली दुःखजैरश्रु विंदुभिः (महाभारतः सभापर्व)

पांचाली की छातियां भींगकर सराबोर हो गयीं। लेकिन तो भी पतियों की छाती में जोश का उफान नहीं आया! वे नामर्द की तरह उन्हें ताकते रह गये। तभी तो एक बार उर्वशी ने अर्जुन को धिक्कारते हुए कहाथा कि 'तुम पुरुष नहीं, नपुंसक हो; स्त्रियों के बीच जाकर नाचों। '

तस्मात् त्वं नर्तनः पार्थ स्त्रीमध्ये मानवर्जितः

अपुमानिति विख्यातः षंडवद् विचरिष्यसि (महाभारतः सभापर्व)

मैने कहा - खट्टर काका, पांडव तो वीरता के लिए प्रख्यात थे। विशेषतः अर्जुन।

खट्टर काका सुपारी कतरते हुए कहने लगे- अजी, अपनी आँखों के सामने अपनी पत्नी को विराट राज के महल में दासी का काम करते देखकर भी जिनके गले में कौर नहीं अटकता था, उन पांडवों को मैं वीर कैसे मान लूँँ?अर्जुन में पुरुषार्थ रहता तो जनखे की तरह दाढी-मूँँछ मुड़ाकर, लहँँगा-चोली पहनकर, बृहन्नला के वेष में राजकन्या को नाच सिखलाने पर रहते! और, भीम तो भोजन भट्ट ही ठहरे। भोनू भव न जाने, पेट भरे से काम! जब बड़ों का ही यह हाल, तो नकुल-सहदेव की क्या गिनती!

मैने कहा - खट्टर काका, उस समय पांडव लोग अज्ञातवास में थे।

खट्टर काका बोले- सच पूछो तो वे लोग मुँँह दिखाने लायक थे भी नहीं। जिस कृष्ण ने अर्जुन की खातिर उतना किया, कृष्णा की लाज बचायी, उन्हीं कृष्ण की बहन सुभद्रा को भगाकर ले गये। इतना भी विचार नहीं किया कि मामा की बेटी, ममेरी बहन है! अर्जुन अपनी ममेरी बहन को भगा लाये। भीम अपनी मौसेरी (शिशुपाल की बहन) को। इन लोगों ने सब धर्म-कर्म भ्रष्ट कर दिया।

मुझे क्षुब्ध देखकर खट्टर काकाकहने लगे - सोचकर देखो तो पांडवों का मूल ही भ्रष्ट है। पांडवाः जारजाताः।

पाडंवों के पिता पांडु स्वयं अपनी पत्नियों (कुंती,माद्री) से पुत्र उत्पन्न करने में असमर्थ थे। अतएव पाँँच देवताओं को आवाहन कर पंचपांडवों की उत्पत्ति करायी गयी। अजी, इससे तो पांडु निःसंतान ही मर जाते, सो अच्छा था। जिसे सौ भतीजे हों, उसे वंश बढाने की इतनी लालसा क्यों? और सो भी दुसरो के भरोसे! यदि पांडु भी भीष्म की तरह संतोष कर लेते, तो राजगद्दी के लिए झगड़ा ही नहीं उठता। धृतराष्ट्र के पुत्र राष्ट्र को धारण किये रह जाते। लेकिन पांडु की आँँखों पर तो पीलिया छाया हुआ था। उनके जारज पुत्रों ने कुल को भसा दिया।

मैंने देखा कि खट्टर काका पांडवों पर लगे हुए हैं। मैं उनके साथ क्या बहस करता? पुनः स्तोत्र पढने लगा-

अहल्या द्रौपदी तारा कुंती मंदोदरी तथा

पंचकन्याः स्मरेन्नित्यं महापातकनाशनम

खट्टर काका फिर टोक बैठे - अहल्या, द्रौपदी, तारा, कुंती, मंदोदरी- ये पाँँचों तो शादीशुदा थीं। तब पंचकन्या क्यों कहते हो? और उन्हें प्रातःस्मरणीया क्यों समझते हो?

मैंने कहा-वे प्रतिव्रता थीं।

खट्टर काका बोले - इनमें कौन पतिव्रता थी? अहल्या ने ऎसा कर्म किया कि पाषाणी हो गयी। तारा और मंदोदरी अपने देवरों की अंकशायिनी बनीं। और कुंती- द्रौपदी की तो बात ही निराली है।

पंचभिः कामिता कुंती पंचभिः द्रौपदी तथा

सतीति कथ्यते लोके यशो भाग्येन लभ्यते। (सुभाषित)

सास ने पाँँच का तोष रखा तो फिर बहू क्यों पीछे रहती ? यह भी पाँँच की दुलारी बनकर रही।

अजी, द्रौपदी निरंतर पतियो को ताश की पत्ती की तरह बदलती रही। स्वयं लालपान की बीबी बनकर पतियों को गुलाम बनाए रही। वह पति के कंधे पर चढकर चलनेवाली पत्नी थी। एक बार वन मे चलते-चलते गिर गयी तो युधिष्ठिर रोने लग गये -

किमिदं द्यूतकामेन मया कृतमबुद्धिना

आदाय कृष्णां चरता वने मृगगणायुते

शेते निपतिता भूमौ पापस्य मम कर्मभिः।

(म० व०)

"छिः ! मैं कैसा मुर्ख निकला कि जुए के फेर मे पड़कर आज ऎसी सुकुमारी राजकन्या को लेकर जंगली जानवरों के बीच वन मे भटक रहा हूँँ। मेरे ही पाप के फल से बेचारी भूमि पर पड़ी हुई है।"

भीम,नकुल उसे गोद मे उठाकर ले चलने को तैयार हो गये। एक पत्नी होकर रहती तो ऎसी खाति होती ? पंच-पत्नी ने प्रत्येक पति से एक-एक पुत्र प्राप्त किया।

मैने पूछा - क्या महाभारत काल मे स्त्रियों को इतनी अधिक स्वच्छन्दता थी ?

खट्टर कका बोले - इसमे क्या संदेह ? देखो -

सुषवे पितृगेहस्ता पश्चात पांडुपरिग्रहः

जनितश्च सुतः पूर्वं पांडुना सा विवाहिता। (देवी भागवत)

कुंती जब क्वाँँरी थी, तभी पुत्र-प्रसविनी हो चुकी थी। उनकी बहू पांचाली स्वयंवर में एक का वरण करने पर भी पंचपत्नी बनकर रही। कुंती की पौत्रवधू उत्तरा ने विवाह से सातवें महीने में ही पुत्र (परिक्षित) को जन्म दिया। अजी, बड़े घर की बड़ी बातें होती हैं। उन दिनों एक से एक प्रौढा राजकन्याऍं होती थीं, जो जानबूझकर अपना अपहरण करवाती थीं। अंबा, अंबिका, अंबालिका, तीनों परिपक्व कुमारियाँँ थीं। पूर्णयौवना सुभद्रा रैवतक पर्वत पर मेले से भगा ली गयी। शकुंतला और दमयंती का हाल जानते ही हो। शर्मिष्ठा और देवयानी छेड़खानियाँँ करने में आधुनिक युग का भी कान काट गयी हैं। वाणासुर की कन्या उषा ऎसी प्रबला निकली कि सोये हुए अनिरुद्ध को जबर्दस्ती अपने शयनागार में मँँगवाकर ......

अजी, कहाँँ तक गिनाऊँँ? इन्हीं लोगों के उपाख्यानों से तो महाभारत भरा हुआ है। काव्य-पुराण में सामान्य गृहणियों का वर्णन थोड़े ही रहता है?

मैंने पूछा - खट्टर काका, महाभारत से क्या शिक्षा मिलती है?

खट्टर काका बोले-एक शिक्षा तो यही मिलती है कि-

स्त्रीषु दुस्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः

कुलक्षये प्रणश्यंति कुलधर्माः सनातनाः (गीता 1/40-41)

जब कुल की स्त्रियाँँ दूषित हो जाती हैं, तो वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं, और वे कुल का नाश कर देते हैं। जैसे पांडु के पुत्रों ने किया।

खट्टर काका बोले-उन्हें स्वयं पति ने भ्रष्ट किया। आजकल तो नियोजन का फैशन है। लेकिन उन दिनों नियोग की प्रथा थी। अर्थात, पुत्र-प्राप्ति के लिए पर-पुरुष से समागम करने का विधान था। क्योंकि उस समय सतीत्व-रक्षा से अधिक वंश-रक्षा का महत्त्व था। अपुत्रस्य गतिर्नास्ति। इसीलिए पांडु ने स्वयं अपनी पत्नियों को आज्ञा दी, बल्कि खुशामद की, कि किसी से पुत्र उत्पन्न करवाओ। देखो, वह कुंती को कैसे समझाते हैं!

पत्या नियुक्ता या चैव पत्नी पुत्रार्थमेव च

न करिष्यति तस्याश्च भविता पातकं भुवि (महाभारत आदि पर्व)

अर्थात्,'पति के कहने पर जो भी स्त्री पुत्र-प्राप्ति के निमित्त पर-पुरुष से सिंचन नहीं करवाती, वह पाप की भागिनी होती है।' इतना ही नहीं, वह कई नजीरें भी पेश करते हैं-

उद्दालकस्य पुत्रेण धर्म्या वै श्वेतकेतुना

सौदासेन च रंभोरुः नियुक्ता पुत्रजन्मनि

एवं कृतवती साऽपि भर्त्तुंः प्रियचिकीर्षया

अस्माकमपि ते जन्म विदितं कमलेक्षणे। (महाभारत आदि पर्व)

और तो और, वह अपनी ही माता (अंबालिका) का हवाला देते हुए कहते हैं, कि 'मेरा (पाण्डु का) जन्म भी तो नियोग से ही हुआ है, सो तुम जानती ही हो!

अब ऎसी हालत में बेचारी कुंती या माद्री क्या करतीं? वे अपने पति की आज्ञा शिरोधार्य कर अपनी सास के चरण-चिन्हों पर चलीं।

मैंने पूछा-खट्टर काका, पांडु की माता ने ऎसा क्यों किया था?

खट्टर काका बोले-उन्होंने अपनी सास सत्यवती की आज्ञा से ऎसा किया था। देखो, सत्यवती अपनी पुत्रवधू को कैसी शिक्षा दे रही हैं!

नष्टं च भारतं वर्षं पुनरेव समुद्धर

पुत्रं जनय सुश्रोणि, देवराजसमप्रभम् (महाभारत आदिपर्व)

अर्थात, 'हे सुंदरी! भारतवर्ष नष्ट हो रहा है। उसका उद्धार तुम्हारे ही हाथों में है। किसी से इंद्र के समान तेजस्वी पुत्र जनमाओ।'

इतना ही नहीं, इस पुण्य कार्य के लिए एक सुयोग्य व्यक्ति (व्यास) की सिफारिश भी करती हैं। सो भी भीष्म से, जो अंबालिका के भसुर थे!

जब भीष्म कुंठित होने लगे, तब सत्यवती ने कुछ लजाते हुए विहँसकर कहा- तुम्हें एक रहस्य बता रही हूँ। जब मैं यौवन काल में मत्स्यगंधा नाम से विख्यात थी, तब एक बार पराशर मुनि मेरी नाव में आये थे। यमुना पार करने के लिए। मै भी उसी नाव पर थी। वह मुझे देखकर मोहित हो गये। लेकिन दिन के प्रकाश में लोगों के सामने अपनी इच्छा कैसे पूरी करते? तब उन्होंने योगबल से घना कुहासा उत्पन्न कर भोग किया, जिससे मुझे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पुत्र व्यास के नाम से प्रसिद्ध है। तुम उन्हीं व्यास को बुलाकर ले आओ।

तव ह्यनुमते भीष्म नियतं स महातपाः

विचित्रवीर्यक्षेत्रेषु पुत्रानुत्पादयिष्यति (महाभारत आदि पर्व)

"वही व्यास विचित्रवीर्य की विधवा पत्नियों (अंबिका, अंबालिका) के गर्भ से पुत्र उत्पन्न कर देंगे।"

मुझे मुँह ताकते देखकर खट्टर काका बोले- तब व्यास बुलाये गये। उन्हीं के वीर्य से पांडु और धृतराष्ट्र का जन्म हुआ। नियोग के समय अंबिका ने आँखें मूँद ली थीं, इसलिए उन्हें जन्मांध पुत्र हुआ। अंबालिका ने चंदन लेप कर लिया था, पांडु पुत्र हुआ। व्यास अंबालिका से अधिक संतुष्ट हुए। इसीलिए उन्होंने उसके वंशधरों (पांडवों) का इतना पक्ष लिया है।

मैंने पूछा - खट्टर काका, उतने बड़े ज्ञानी होकर भी व्यास व्यभिचार कर्म में कैसे प्रवृत्त हुए?

खट्टर काका बोले - देखो, आत्मा वैजायते पुत्रः। व्यास के पिता पराशर मुनि ने भी तो वही किया था!

मत्स्यगंधां प्रजग्राह मुनिः कामातुरः तदा (देवी भागवत)

कामातुर होकर मत्स्यगंधा को पकड़ लिया था। और, जब बेचारी मछुआइन कन्या डरते-डरते बोली-

पितरं किं व्रवीम्यद्य सगर्भा चेद् भवाम्यहम्

त्वं गमिष्यसि भुक्त्वा मां किं करोमि वदस्व तत्

'आप तो भोग करकेर चले जाइएगा और मुझे गर्भ रह गया तो अपने पिता से क्या कहूँगी? तब पराशर ने आशीर्वाद दिया था-

पुराणकर्ता पुत्रस्ते भविष्यति वरानने

वेदविद् भागकर्त्ता च ख्यातश्च भुवनत्रये (देवी भागवत)

अर्थात, 'तुम्हारे गर्भ से जो पुत्र होगा वह वेदों में पारंगत और पुराणॊं का कर्त्ता होगा।' वही पुत्र व्यास हुए। उनका जन्म द्वीप में हुआ था इसलिए द्वैपायन कहलाए। द्वैपायन व्यास अपना पैतृक संस्कार कैसे छोड़ते? जब रनिवास की काम-कला प्रवीणा दासी ने उन्हें पूर्णतया संतुष्ट किया तो इन्होंने भी आशीर्वाद दिया कि "तुम्हारे गर्भ से धर्मात्मा पुत्र (विदुर) उत्पन्न होगा। "

संतोषितस्तया व्यासो दास्या कामकलाविदा

विदुरस्तु समुत्पन्नो धर्मांशः सत्यवान शुचिः (देवी भागवत)

इसलिए, देखते नहीं हो, महाभारत में व्यस ने विदुर की कितनी बड़ाई की है! खट्टर काका ने एक चुटकी सुपारी का कतरा मुँह में रखा। बोले- देखो जी, व्यभिचार का परिणाम अच्छा नहीं होता। व्यास को भी तो पीछे जाकर पश्चात्ताप हुआ है।

व्यभिचारोदभवाः कि मे सुखदाः स्युः सुताः किल (देवी भागवत)

क्या मेरे ये व्यभिचारजात पुत्र कल्याणकारी होंगे?" अर्जुन के मन में भी तो आत्मग्लानि उत्पन्न हुई थी!

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः

उत्सद्यंते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः (गीता 1/43)

अजी एक बार कुल में दाग लग जाने पर जल्द नहीं मिटता। उसे धोने के लिए बहुत दिनों तक प्रायश्चित्त करना पड़ता है।

खट्टर काका फिर बोले- देखो जी, गतानुगतिको लोकः!

सत्यवती से अंबालिका ने सीखा, अंबालिका से कुंती ने सीखा, कुंती से दौपदी ने सीखा। इसी प्रकार विचित्रवीर्य के कुल में विचित्र परंपरा चल पड़ी और कुलवधुएँ दूषित होती गयीं। उनके वर्णसंकर पुत्रों ने जो कुलध्वंस किया, वह तो विदित ही है। महाभारत मनन करने की वस्तु है। उसमें क्या नहीं है? यन्न भारते तन्न भारते!

मैंने कहा - परंतु महाभारत के असली सूत्रधार तो श्रीकृष्ण थे।

खट्टर काका बोले- हाँ, उन्हीं के बल पर तो अर्जुन कूदते थे। जैसे, खूँटे के जोर पर बछड़ा कूदता है। धर्मयुद्ध होता तो पांडव लोग कभी नहीं जीतते। लेकिन छलिया कृष्ण ने वैसा नहीं होने दिया। महाभारत में आदि से अंत तक अधर्मयुद्ध हुआ है। कर्ण, द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, सबका वध तो अन्याय से ही किया गया है। फिर भी गीताकार कहते हैं-धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे! मुझे तो यह सरासर व्यंग जैसा मालूम होता है। व्यास ने कहा है-यतो धर्मस्ततो जयः। लेकिन महाभारत में यतो अधर्मस्ततो जयः हुआ। इसीलिए तो वह जय भी क्षय के रूप में परिणत हो गयी!

मैंने कहा - खट्टर काका, महाभारत का मूल कारण हुआ दुःशासन द्वारा चीरहरण।

खट्टर काका बोले-हाँ, दुःशासन ने एक चीरहरण किया, उस पर तो महाभारत मच गया, और कृष्ण ने उतना चीरहरण किया सो शुद्ध भागवत बनकर एह गया! परंतु कर्म का फल एक न एक दिन भोगना ही पड़ता है। जिन्होंने गोपियों के साथ उतना रास रचाया, उनकी स्त्रियों को भी अंत में अहीर लोग लूट कर ले गये। देखो-

कृष्णपत्न्यः तदा मार्गे चौराभीरैश्च लुंटिताः

धनं सर्वं गृहीतं च निस्तेजाश्चार्जुनोऽभवत् (देवी भागवत 2/7)

जब कृष्ण की पत्नियाँ द्वारका छोड़कर हस्तिनापुर जा रही थीं तो रास्ते में लूट ली गयीं और उनके संरक्षक अर्जुन मुँह ताकते ही रह गये! उस समय धनुर्धर का तेज कहाँ गया? अजी, काल गर्वप्रहारी होता है। किसी का घमंड रहने नहीं पाता।

खट्टर काका ने गहरी साँस ली। फिर बोले-नियति की अद्भुत लीला है। जिन्होंने जीवन भर उतने असुरों का वध किया, वह श्रीकृष्ण अंत में एक बहेलिये के तीर के शिकार हुए! हरि र्क पेड़ के नीचे हरिण के धोखे में मारे गये और उनकी राज-महिषियाँ मवेशी की तरह लूट ली गयीं! इसे विधि-विडंबना कहा जाय या कर्मविपाक?

श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र में भाई-भाई को, सगे-संबंधियों को, आपस में लड़ाकर कुरुवंश का संहार करा दिया।

कुरुपांडवयुद्धं च कारयामास भेदतः

भुवोभारावतरणं चकार यदुनंदनः! (ब्रम्हवैवर्त)

लेकिन यदुनंदन को उसका फल क्या मिला? उनका अपना यदुवंश भी उसी तरह नष्ट हो गया। कुरुक्षेत्र का बदला प्रभासक्षेत्र में मिल गया।

पुत्राः अयुध्यन् पितृभिः म्रातृभिश्च

मित्राणि मित्रैः सुहृदः सुहृद्भिः (भागवत पुराण)

भाई-भाई, बाप-बेटा, सब इस तरह आपस में लड़कर मर मिटे कि वृष्णिवंश का विनाश हो गया। रहा न कोउ कुल रोवनहारा! अजी, विष-वृक्ष का फल विष ही होता है, अमृत नहीं।

खट्टर काका नस लेते हुए बोले-जो अन्याय करता है, सो अंत में गल ही जाता है। तभी तो पांडव लोग हिमालय में गल गये। युधिष्ठिर के साथ राजपाट तो गया नहीं, गया एक कुत्ता! भ्रातृ-विरोध से, नर-संहार से, क्या फल मिला? लेकिन तो भी तो हम लोगों की आँखें नहीं खुलती है।

भगवान् न करें कि भारत को फिर कभी उस तरह का महाभारत देखना पड़े!

रामायण

खट्टर काका रामनवमी के फलाहार के लिए किशमिश चुन रहे थे।

मैंने कहा- खट्टर काका, आज रात मैदान में रामलीला है। चलिएगा ?

खट्टर काका ने पुछा-कौन-सी लीला होगी?

मैं- सीता-वनवास।

खट्टर काका .- तब नहीं जाऊँगा।

मैं- सो क्यों, खट्टर काका ? मर्यादा पुरुषोत्तम एक से एक आदर्श दिखा गये हैं।

खट्टर काका बोले- हाँ, सो तो दिखा ही गये हैं। अबला को कैसे दुःख देना चाहिए! सती-साध्वी पत्नी को कैसे घर से निकाल देना चाहिए! किसी स्त्री की नाक कटवा लो। किसी स्त्री पर तीर छोड़ दो। समझो तो नारी को रुलाने से ही उनकी वीरता शुरू होती है, और उसी से समाप्त भी।

मैं - खट्टर काका, भगवान ने मनुष्य का अवतार लेकर ये सब लीलाएँ की हैं।

खट्टर काका बोले- क्या बिना निष्ठुरता के लीला नहीं हो सकती थी?

लेकिन असल में उनका उतना दोष नहीं है। उन्हें आदि में ही विश्वामित्र जैसे गुरू मिल गये, जिन्होंने तारकावध से ही विद्यारंभ कराया। नहीं तो राम का प्रथम वाण कहीं स्त्री पर छुटता?

लेकिन विश्वामित्र की तो उलटी खोपड़ी थी। उन्होंने अपने नाम में अमित्र शब्द को मित्र सिद्ध करने के लिए व्याकरण का नियम उलट दिया, राजर्षि से ब्रह्मर्षि बनने के लिए वर्णव्यवस्था का नियम पलट दिया, वशिष्ट के साथ प्रतिस्पर्धा करने में नीति- मर्यादा को कर्मनाशा में भसा दिया।

फिर राम को क्या शिक्षा देते ? स्वयमसिद्धः कथं परान् साधयति!

मैंने कहा - खट्टर काका, रामचंद्रजी न्याय का आदर्श दिखा गये हैं। न्याय की खातिर सीता जैसी पत्नी को भी वनवास देने में कुंठित नहीं हुए।

खट्टर काका बोले-नहीं जी। इनके कुल की रीति ही ऎसी थी। बाप ने इनको वनवास दिया। इन्होंने स्त्री को वनवास दिया। तुम न्याय की दुहाई देते हो। न्याय क्या यही है कि किसी के कहने पर किसी को फाँसी पर चढा दिया जाय?

न्याय ही करना था तो वादी-प्रतिवादी, दोनों को राजसभा में बुलाते। दोनों पक्षों के वक्तव्य सुनकर न्याय-सभा में जो निष्पक्ष निर्णय होता, सो करते। परंतु सो सब तो किया नहीं। चुपचाप सीताजी को वन में भेज दिया। यह कौन आदर्श हुआ? एक साधारण प्रजा को जितना अधिकार मिलना चाहिए, उतना भी सीता महारानी को नहीं मिला।

मैं- परंतु रामजी को तो प्रजा-रंजन का आदर्श दिखलाना था......

खट्टर काका-गलत बात।

अयोध्या की प्रजा यह कभी नहीं चाहती थी। इसीलिए रातोरात चुपके से रथ हाँका गया। और, लक्ष्मण तो सबमें हाजिर। शूर्पणखा की नाक काटो, तो चाकू लेकर तैयार! सीता को जंगल में छोड़ आऒ, तो रथ लेकर तैयार!

सुबह होते ही प्रजा को खबर हुई तो संपूर्ण अयोध्या में हाहाकार मच गया। परंतु राजा राम ने अपने हठ के आगे प्रजा की प्रार्थना सुनी ही कब?

अपने वनवास में प्रजा की कौन-सी बात रखी कि सीता-वनवास में रखते!

मैंने कहा - खट्टर काका, वह तो पिता का वचन पालन करने के लिए वनवास गए थे।

खट्टर काका बोले - जरा तर्कशास्त्र लगाओ। वनवास का क्या अर्थ?

सर्वेषु वनेषु वासः (सभी वनों में वास) अथवा कस्मिश्चिद वने वासः (किसी वन में वास)?

यदि पहला अर्थ लो, तो सो उन्होंने किया नहीं। संभव भी नहीं था। और, यदि दूसरा अर्थ लो, तो फिर अयोध्या के निकट ही किसी वन में रह जाते। चित्रकूट में ही चौदह वर्ष बिता देते।

तो भी पिता की आज्ञा का पालन हो जाता। फिर, हजारों मिल दूर भटकने की क्या जरूरत थी! सो भी पैदल, सुकुमारी सीता को साथ लेकर! यही बात मिथिला के नैयायिक (गौतम) ने पूछी, तो राम कुछ उत्तर नहीं दे सके।

खीझकर कह दिया-

 यः पठैत् गौतमी विद्यां श्रृगालीयोनिमाप्नुयात्!

(जो गौतम की विद्या पढे, सो गीदड़ होकर जन्म ले। )

भला, यह भी कोई जवाब हुआ! क्या शास्त्रार्थ करना भूँकना है? वह मिथिला का न्याय पढे रहते, तो अन्याय नहीं करते।

खट्टर काका गरी काटते हुए बोले-मान लो, यदि जनता एक स्वर से यही कहती कि सीता को राज्य से निर्वासित कर दीजिए, तथापि राम का अपना कर्त्तव्य क्या था?

जब वह जानते थे कि महारानी निर्दोष हैं, अग्निपरीक्षा में उत्तीर्ण हो चुकी हैं, तब संसार के कहने से ही क्या?

वह अपने न्याय पर अटल रहते। यदि प्रजा-विद्रोह की आशंका होती, तो पुनः भरत को गद्दी पर बैठाकर दोनों जने जंगल की राह पकड़ते तब आदर्श-पालन कहलाता।

परंतु राजा राम ने केवल राज्य ही समझा, प्रेम नहीं। महारानी सीता तो अपने पत्नीधर्म के आगे संसार का साम्राज्य ठुकरा देतीं, लेकिन राम राजा अपने पतिधर्म के आगे अयोध्या की गद्दी नहीं छोड़ सके। सती-शिरोमणि सीता के लिए वह उतना भी त्याग नहीं कर सके, जितना विलायत के एक बादशाह (अष्टम एडवर्ड) ने अपनी एक चहेती के लिए किया!

मैं - खट्टर काका, जान पड़ता है सीता-वनवास से आपको गहरा क्षोभ है।

खट्टर काका .- क्यों न हो?

सीता का जीवन दुःख में ही गया। बेचारी को कभी सुख नसीब नहीं हुआ। जंगलो में कहाँ-कहाँ स्वामी के साथ भटकती फिरी और जब महल में रहने का समय आया, तो निकाल दी गयी। वन में तो हाय सीता!

हाय सीता!

उनके लिए आकाश-पाताल एक कर दिया गया। समुद्र पर पुल बाँधा गया। और वही सीता जब लौटकर आयी, तो घर में रहने भी नहीं पायी। इसी से तो मिथिला के लोग कहते हैं कि पश्चिम की तरफ बेटी नहीं ब्याहनी चाहिए!

खट्टर काका की आखों में पानी भर आया। वह थोड़ी देर क्षुब्ध रहे। फिर कहने लगे-सीता के समान देवी के प्रति ऎसी निर्दयता!

वह तन, मन, वचन से राम की सेवा में लीन रही। उनके चरणों के पीछे-पीछे चली। किन-किन दुर्गम अरण्यों में घूमी! उन्हीं के तोष के लिए आग तक में कूद पड़ी!

अग्नि-प्रवेश के समय सीताजी ने कहा था -

 जौ मन वच क्रम मम उर माहीं

तजि रघुवीर आन गति नाहीं

तौ कृसानु सब कै गति जाना

मों कहॅं होउ श्रीखंड समाना

और अग्नि की ज्वाला चंदन के समान शीतल बन गयी! श्रीखंड सम पावक प्रवेश किया सुमिरि प्रभु मैथिली

वह तपाए हुए सोने की तरह चमकती हुई बाहर निकल आयी। परंतु उस सर्वश्रेष्ठ सती के साथ कैसा हृदयहीन व्यवहार हुआ!

आठवें महीने में घर से निकाल दी गयी। निष्ठुरता की बलिहारी है! सीता मिथिला की कन्या थी, 'सी' अक्षर बॊलने वाली नही। तभी तो! और जगह की होती तो दिखा देती। अजी, मैं पूछता हूँ, यदि संबंध ही तोड़ना था तो सीताजी को पिता के घर जनकपुर भेज देते। वैसे घोर जंगल में कैसे भेजा गया! बेचारी सीता को इस पृथ्वी पर न्याय की आशा नहीं रही, तो पाताल में प्रवेश कर गयी। जिस मिट्टी की कोख से निकली थी, फिर उसी में विलिन हो गयी। विश्व की सर्वश्रेष्ठ सती का ऎसा करुण अंत! तभी तो पृथ्वी फट गयी!

मैंने सांत्वना देने के निमित्त कहा- खट्टर काका, फसाद की जड़ हुई वह धोबिन।

खट्टर काका की आँखें लाल हो गयीं। बोले- मैं तुमसे पूछता हूँ कि कोई धोबी रूठकर गधे की पीठ पर से गिर जाय, तो क्या मैं तुम्हारी काकी को घर से निकाल दूँगा?

परंतु रामचंद्र को तो वैसे ही लोगॊं का ज्यादा साथ रहा। निषाद, केवट, भिल्लिनी, गीध, भालू, बंदर-इन्हीं सबके बीच तो रहे।

बाप ने मूर्खा दासी की बात पर बेटे को वनवास दिया, इन्होंने मूर्ख धोबी की बात पर स्त्री को वनवास दिया। उनके दरबार में छोटों की ही चलती थी। घर में मंथरा, बाहर में दुर्मुख।

मैं - खट्टर कका, वह नीति के पालनार्थ.....

खट्टर काका बोले-नीति नहीं, अनीति कहो। यदि नीति का ही आदर्श दिखलाना था, तो फिर बालि को उस पेड़ की आड़ से छिपकर क्यों मारा? आमने-सामने लड़कर मारते। उस समय कालहुँ डरै न रन रघुवंशी वाला वचन कहाँ गया! इसीलिए बालि ने चुटकी ली थी -

 धरम हेतु अवतरेउ गोसाईं

मारेहु मोहि ब्याध की नाईं 

यदि मर्यादा की रक्षा करनी थी, तो वही अनीति करने के कारण सुग्रीव को भी क्यों नहीं दंड दिया? विभीषण को क्यों नहीं मारा? रामायण कार को भी स्वीकार करना पड़ा है-

 जेहि अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली

फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली

सोइ करतूत विभीषण केरी

सपनेहु सो न राम हिय हेरी 

प्राणदंड दिया किसको तो बेचारे शंबूक को, जो चुपचाप सात्त्विक वृत्ति से तपस्या कर रहा था।

मैं- परंतु मर्यादा पुरुषोत्तम......

खट्टर काका .- तुम मर्यादा पुरुषोत्तम कहो, परंतु मुझे तो उनमें उतावली ही दिखलायी पड़ती है। बच्चे की तरह सुनहले मृग के पीछे क्यों दौड़ गये! सीता के वियोग में पे को पकड़- पकड़कर क्यों प्रलाप करने लगे?

कहाँ तो सुग्रीव से इतनी गाढ दोस्ती, और जहाँ बेचारे को सीता की खोज में कुछ देर हुई कि तुरंत धनुषवाण लेकर तैयार! न तो समुद्र की पूजा करते देर और न उस पर प्रत्यंचा कसते देर! और, जब लक्ष्मण को शक्तिवाण लगा तो रणभूमि में विलाप करने लगे। ऎसी अधीरता कहीं वीरों को शोभा देती है!

खट्टर काका बादाम काटते हुए बोले - असल मे समझो तो राम का दोष नहीं है। उनके पिता दशरथ ही जल्दबाज थे। शिकार खेलने गये। घाट पर शब्द सुना। चट तीर छोड़ दिया। यह नहीं सोचा कि कोई आदमी भी तो वहाँ हो सकता है।

बेचारे श्रवणकुमार को बेध दिया। अंधा पिता पुत्रवियोग में मर गया। उसका फल मिला कि वह स्वयं भी पुत्रवियोग में मरे। अजी, दो पटरानियाँ थी ही, तो बुढापे में तीसरी शादी करने का शौक क्यों चर्राया? और, वृद्धस्य तरुणी भार्या प्राणेभ्योपि गरीयसी।

कैकेयी में ऎसे लिप्त ही गये कि युद्धक्षेत्र में भी बिना उन्हें बगल में बैठाये रथ पर नहीं चलते थे। और, रथ भी कैसा था कि असली मौके पर ही टूट गया। नाम तो दशरथ! और, एक रथ भी काम का नहीं! नहीं तो कैकेयी को पहिए में अपनी कलाई क्यों लगानी पड़ती? और, बलिहारी है उस कलाई की भी जो धुरी में पड़कर भी नहीं लचकी। तभी तो रानी का कलेजा भी वैसा ही कठोर था! किसी तरह पत्नी के प्रताप से वृद्ध राजा के प्राण बच गये। स्त्री को आँख मूँदकर वचन दिया-तुम जो माँगोगी, वह दूँगा।

इतनी बुद्धि नहीं कि यदि आकाश का तारा माँग बैठी, तब क्या करूँगा! और, जब राम का वनवास माँगा तो राजा छपटाने लगे। कैकेयी ने तो बहुत पत रखी। यदि कहीं कलेजा माँग बैठती तो सत्यपालक दशरथ महाराज क्या करते? और, जब एक बार वचन दे ही दिया तो पीछे छाती क्यों पीटने लगे? चौदह वर्ष के बाद तो बेटे का राज होता ही।

तब तक धैर्य से प्रतीक्षा करते। यदि बहुत अधिक पुत्रस्नेह था तो खुद भी साथ लग जाते। सो सब तो किया नहीं। हा राम! हा राम! करते हुए प्राण त्याग दिया। क्षत्रिय का हृदय कहीं ऎसा कमजोर हो!

मैने देखा कि खट्टर काका जिस पर लगते उसका बंटाधार ही कर देते हैं। अभी दशरथ जी पर लगे हुए हैं। प्रकाश्यतः कहा- खट्टर काका, और लोग रामायण के चरित्र से शिक्षा ग्रहण करते हैं.......

खट्टर काका - शिक्षा तो मैं भी ग्रहण करता हूँ। बिना देखे तीर नहीं चलाना चाहिए। बिना विचारे वचन नहीं देना चाहिए। वचन दे देने पर छाती नहीं पीटना चाहिए।

मैं - खट्टर काका, आप केवल दोष ही देखते हैं?

खट्टर काका - तो गुण तुम्ही दिखलाओ।

मैं- देखिए, महाराज दशरथ कैसे सत्यनिष्ठ थे....

खट्टर काका .- कि नकली श्रवण कुमार बनकर अंधे माता-पिता को फुसलाने गये!

मैं - रामचंद्र कैसे पितृभक्त थे....

खट्टर काका - कि पिता के मृत्यु का समाचार पाकर भी ना लौटे! ज्येष्ठ पुत्र होकर भी पिता का श्राद्ध तक नहीं किया! सीधे दक्षिण की ओर बढते चले गये।

मैं - लक्ष्मण कैसे भ्रातृभक्त थे....

खट्टर काका - कि एक भाई( राम ) की ओर से, दूसरे भाई (भरत) पर धनुष-वाण लेकर तैयार हो गये।

मै-भरत कैसे त्यागी थे....

खट्टर काका - कि चौदह वर्ष तक भाई की खोज खबर नहीं ली! राजधानी से फुर्सत मिलती, तब तो जंगल में जाकर पता लगाते! अजी, यदि वह अयोध्या से सेना सजाकर ले जाते तो राम को बंदरों का सहारा क्यों लेना पड़ता?

मैं-हनुमानजी कैसे स्वामिभक्त थे....

खट्टर काका - कि अपने स्वामी सुग्रीव को छोड़कर दुसरे की सेवा में चले गये।

मैं-विभीषण कैसे आदर्श थे ....

खट्टर काका - कि घर का भेदिया लंका डाह करा दिया। ऎसे विभीषण से भगवान देश को बचावें।

मैं- तो आपके जानते रामायण में एक भी पात्र आदर्श नहीं है?

खट्टर काका - है क्यों नहीं! मुझे समूची रामायण में एक ही पात्र आदर्श जान पड़ता है!

मैं - वह कौन है?

खट्टर काका मुस्कुराते हुए बोले- रावाण।

मैं- आपको तो हमेशा मजाक ही सूझता है।

खट्टर काका - हॅंसी नही करता हूँ। तुम रावण में एक भी दोष दिखलाओ।

मैं-धन्य हैं खट्टर काका! और लोगों को रावण में दोष होई दोष दीखते हैं, और आपको एक भी नहीं?

खट्टर काका - तो तुम्हीं बतलाओ।

मैं-वह सीता को हरकर ले गया....

खट्टर काका - सो तो मर्यादा पुरुषोत्तम को शिक्षा देने के लिए कि किसी की बहन का नाक-कान नहीं काटना चाहिए। परदेश में रहकर किसी से वैर नहीं मोल लेना चाहिए।

मृगमरीचिका के पीछे नहीं दौड़ना चाहिए। किसी स्त्री का अपमान नहीं करना चाहिए। देखो, लंका ले जाकर भी रावण ने सीता का अपमान नहीं किया। रनिवास में नहीं ले गया, अशोकवाटिका में रखा। लोग राक्षस कहें, परंतु उसका व्यवहार जैसा सभ्यतापूर्ण हुआ है, वैसा विरले ही मनुष्यों का होता है।

मै.-खट्टर काका, आप तो उल्टी गंगा बहा देते हैं। रावण जैसे अन्यायी का पक्ष ग्रहण करके सीतापति सुंदर राम को....

खट्टर काका - सीतापति निष्ठुर श्याम कहो। विदेह की कन्या अयोध्या गयी, इसका फल हुआ कि फिर लौटकर मायके का मुँह नहीं देख सकी। इसी से तो हम लोग पश्चिम से भड़कते हैं।

मैं - खट्टर काका, आपको सीता के ससुरालवालों से शिकायत है। यदि रामचंद्रजी से आपकी भेंट होती तो क्या कहते? प्रणाम भी करते कि नहीं?

खट्टर काका चिलगोजे छुड़ाते हुए बोले-प्रणाम कैसे करता? मैं ब्राम्हण, वह क्षत्रिय। हाँ, आशीर्वाद अवश्य देता कि "सुबुद्धि हो। अब आगे राम राज हो, तो ऎसा मत कीजिएगा, जिससे लोग छिः छिः राम राम करें! किसी मेरे जैसे ब्राह्मण को मंत्री बनाइएगा।

मैंने कहा-खट्टर काका, रामराज तो आदर्श माना जाता है।

खट्टर काका बोले-हाँ। गुसाईंजी लिखते हैं-

 नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना मैं रहता तो जोड़ देता- केवल सीता भाग्य विहीना! 

कहीं राम राज की तरह ग्रामराज भी चलने लगे, तो न जानें कितनीसीताएँ मिट्टी में मिल जाऍंगी।

मैं-खट्टर काका, आप राम-नवमी का व्रत रखते हैं। मन में तो भक्ति रखते ही होंगे।

खट्टर काका - सो सीतादेवी के कारण। नहीं तो, वह सीधे रघुपति राघव राजा राम रहते। पतितपावन सीताराम नहीं कहलाते। जो-जो काम उन्होंने किए हैं, वे सब तो क्षत्रिय राजा करते ही हैं।

केवल एक ही बात को लेकर उनकी श्रेष्ठता है कि दूसरी पत्नी उन्होंने नहीं की। जानकीजी की स्वर्ण-प्रतिमा बनाकर शेष जीवन बिताया। इसी बात पर मैं उनके सारे अपराध माफ कर देता हूँ। सीता को लेकर ही राम का महत्व है। इसी से पहले सीता, तब राम।

गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं-

 सियाराम मय सब जग जानी

करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी 

महर्षि वाल्मीकि भी कहते हैं -

सीतायाः पतये नमः

मैं - खट्टर काका, आपको सीताजी में इतनी श्रद्धा है तो फिर रामजी को ऎसा क्यों कहते है? उनके पिता तक को आपने नहीं छोड़ा।

खट्टर काका हॅंस पड़े। बोले-अजी, तुम इतना भी नहीं समझते हो!

मैं उनकी ससुराल का आदमी हूँ न! ससुराल का नाई भी गालियाँ देता है, तो मीठी लगती हैं। और, मैं तो ब्राह्मण ठहरा।

दूसरा ऎसा कहेगा सो मजाल है? परंतु मिथिलावासी तो कहेंगे ही। मैथिल का मुँह बंद कर दें, सो सामर्थ्य भगवान में भी नहीं है।

सत्यनारायण

खट्टर काका लस्सी का आनंद ले रहे थे।

मैंने कहा-खट्टर काका, आज मेरे यहा सत्यनारायण भगवान की पूजा है।

खट्टर काका बोले-सचमुच? लेकिन कहीं ऎसा न हो कि सत्य के नाम पर असत्य की .........

मैंने कान पर हाथ रखते हुए कहा- खट्टर काका, भगवान के साथ हँसी नहीं करनी चाहिए।

खट्टर काका मुस्कुराते हुए बोले-भगवान के साथ हँसी-खेल तो तुम लोग करते हो।

मै-सो कैसे?

खट्टर काका ने कहा-तब पुजा की पद्धत देखो। भगवान की षोडशोपचार पुजा कैसे होती है?

आसनं स्वागतम पाद्यमर्ह्यमाचमनीयकम

मधुपर्काचमनी स्नानं वसनं भरणानि च

गंधपुष्पधूपदीपनैवेद्यानि विसर्जनम्।

पहले भगवान् का आवाहन कर उन्हें आसन दिया जाता है। स्वागत किया जाता है। इहाऽगच्छ, इह तिष्ठ, इदमासनं गृहाण। (यहाँ आया जाय, बैठा जाय, आसन ग्रहण किया जाय।) तब पाद्यार्घः (यानी पाँव धोने का जल)। मुख प्रक्षालन के निमित्त आचमनीयम्। मधुपर्क (यानी हलका जलपान)। स्नान के लिए स्नानीयं जलम्। नव वस्त्राच्छादन। फूल, माला, चंदन, धूप, कपूर आदि सुगंधित द्रव्यों का अर्पण। तदनंतर भाँति-भाँति के नैवेद्य।

घृतपक्वं हविष्यान्नं पायसं च सशर्करम्

नानाविधं च नैवेद्यं विष्णो मे प्रतिगृह्यताम्।

भगवान् को निवेदन किया जात है कि "घी में बने हुए ये पकवान और पायस वगैरह मधुर पदार्थ आप भोग लगावें।"

सचमुच भोग लगानेवाले तो दूसरे ही भाग्यवान होते हैं। लेकिन फिर भी मखौल की तरह भगवान् के सामने पान-सुपारी भी पेश कर दी जाती है!

लवंगकर्पूरयुतं तांबूलं सुरपूजितम्

प्रीत्या गृहाण देवेश मम सौख्यं विवर्धय।

"लौंग कपूर से सुवासित खुशबूदार पान हाजिर है। शौक फरमाइए।"

और अंत मे खड़े होकर आरती दिखाकर जाने की घंटी बजा देते है। पूजितोऽसि प्रसीद। स्वस्थानं गच्छ। अपराधं क्षमस्व।

"आपकी पूजा हो चुकी। अब खुश होइए। अपने घर जाइए। जो कुछ भुल-चुक हो गई हो उसे माफ कीजिए।"

अजी, यह सब दिल्लगी नही, तो और क्या है ? और इतनी सारी आवभगत किसकी होती है ? कुछ छोटे से चिकने पत्थरों की, जो घिस-पिटकर जो गुलाब-जामुन या काला जामुन के आकार के बन गए हैं !

मैने कहा- खट्टर काका, नर्मदेश्वर और शालग्राम तो साक्षात शिव और विष्णु के प्रतीक हैं ?

खट्टर काका हॅंसते हुए बोले - अजी, नर्मदेश्वर का अर्थ ही होता है नर्म परिहासं ददाति इति नर्मदः तत्प्रकारकः ईश्वरः ! यानी हास-परिहासवाले भगवान। शालग्राम की बदौलत इस विशाल ग्राम में इतने लोगो के मनोविनोद का प्रोग्राम बन जाता है और कई कीलोग्राम लड्डू भी बट जाते हैं। यह सिनेमा से सस्ता पड़ता है, क्योकि इसमें टिकट नही लगता और अन्त मे प्रसाद भी मिल जाता है। इसमे वच्चों के खेल से अधीक गंभीरता रहती है। क्योकि इसमे बड़े-बूढे भी शामिल रहते हैं और एहसास नहीं होता कि यह सब स्वांग हो रहा है। लड़कियाँ गुड़िया को दुलहिन की तरह सजाकर खेलती है; तुम लोग भगवान को मेहमान बनाकए खेलते हो। जैसे शालग्राम तुम्हारे समधी हों !

मैं- सो कैसे, खट्टर काका ?

खट्टर काका बोले - देखो बारात मे समधी के आने पर जो सब खातिरदारी की जाती है, वही सब तो भगवान की पूजा मे भी होती है। आसन, पानी, स्नान, जलपान, फूल-माला, खुशबू, मिष्टान्न-भोजन, पान-सुपारी, धोती और अन्त मे क्षमाप्रार्थना कि भुलचुक माफ करेंगे। तब फर्क यही है कि शालग्राम को चुल्लू भर पानी में स्नान-आचमन करा दिया जाता है और भोग जो लगाया जाता है सो सब ज्यों म्का त्यों रखा रह जाता है। वस्त्र के नाम पर सूत से भी काम चल जाता है। घंटे भर मे घंटी बजाकर विदा कर देते हैं - स्वस्थानं गच्छ। असली समधी देवता को ऎसा कहा जाय तो अनर्थ ही हो जाय ! परन्तु भगवान तो किसी के समधी हैं नहीं। समधी का अर्थ होता है "समान बुद्धिवाला।" यदि भगवान मे भी उतनी ही बुद्धि हो, जितनी यजमान में, तब तो ईश्वर ही बचायें !

मै- लेकिन पूजा के साथ कथा भी तो होती है ?

खट्टर काका बोले - हाँ, पूजा है नाटक; कथा है उपन्यास। इस तरह दृश्य और श्रव्य दोनो का मजा दर्शकों को मिल जाता है।

मै- खट्टर काका, कथाओं मे तो बहुत गूढ तत्व भरे होंगे ?

खट्टर काका ने आलमारी से सत्यनारायण व्रत-कथा निकालते हुए कहा - तब यह भी सुन लो। पंडितजी रात मे शंख बजा-बजाकर जो कथा बाँचेंगे, उसका निचोड़ मैं अभी बता देता हूँ। एक बार नैमिषारण्य मे लोक हित की दृष्टि से एक विचार गोष्ठी आयोजित की गई। उद्देश्य यह था कि मानवों के दुख दूर करने के लिए कोई ऎसा सुगम मार्ग ढूंँढा जाय कि कम समय में, कम खर्च में कम परिश्रम में, अधिक-से-अधिक फल प्राप्त हो सके।

स्वल्पश्रमैः स्वल्पवित्तैः स्वल्पकालैश्च सत्तम

यथा भवेत् महापुण्यं तथा कथय सूत नः।

'कनफरेंस' के अध्यक्ष सूतजी ने कहा- 'एक बार बैकुंठ लोक मे नारदजी यही प्रश्न भगवान से पूछते भये थे -'

मर्त्यलोके जनाः सर्वे नानाक्लेशसमन्विताः

तत्कथं शमयेन्नाथ लघुपायेन तद्वद।

(मर्त्यलोक मे नाना प्रकार के क्लेशों से पीड़ित हैं। कोई ऎसी आसान तरकीब बताइए कि उनका उद्धार हो जाय।)

तब परम कृपालु भगवान यह उपाय बतावतो भये थे"-

सत्यनारायणस्यैतद व्रतं सम्यग विधानतः

कृत्वा हि सर्वदुःखेभ्यो मुक्तो भवति मानवः।

(सत्यनारण की पूजा विधिपूर्वक करने से मनुष्य सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है। )

इतना ही नहीं, भगवान ने पूजा की विधि यानी प्रसाद का नुसखा भी बता दिया!

रंभाफलं घृतं क्षीरं गोधूमस्य च चूर्णकम

अभावे शालिचूर्णं वा शर्करा च गुडं तथा।

"पके हुए केले, दूध, घृत, गुड़-शक्कर और गेहूँ का आँटा- सब एक साथ मिला कर प्रसाद बना लो। "भगवान इतने दयालु हैं कि वे विकल्प बताना भी नहीं भूले! "यदि गेहूँँ का आँटा नहीं मिला तो चौरेठा लेकर भी काम चला सकते हो।"

बुद्धदेव ने दुःख की समस्या को हल करने में अपना पूरा जीवन लगा दिया और ऎसा अष्टांग मार्ग बताया, जिसे कष्टांग मार्ग ही समझना चाहिए। लेकिन भगवान ने इस समस्या का चुटकियों मे समाधान कर दिया और ऎसा मिष्टांग मार्ग बता दिया, जो सबके लिए सुलभ है।

प्रसादं भक्षयेद् भक्त्या नृत्यगीतादिकं चरेत्

ततश्च बंधुभिः सार्धं विप्रांश्च प्रति भोजयेत्।

"लोग प्रेमपूर्वक प्रसाद पावें, पवाऎं। कुछ नाच-गान का भी शगल रहे। भाई-बन्धुओं के साथ-साथ ब्राह्मणों को भोजन कराया जाय।"

तत्कृत्वा सर्वदुःखेभ्यो मुक्तो भवति मानवः।

'ऎसा करने पर मनुष्य़ सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।' अब इससे बढकर आसान तरीका और क्या हो सकता है ?

मैने कहा - लेकिन .....

खट्टर काका बोले - इसी 'लेकिन' के लिए चार प्रमाण पेश किए गये हैं, जिनसे भक्तों के मन मे आस्था जमे और पूजा करने कि प्रेरणा मिले।

खट्टर काका ने सत्यनारायण कथा के पृष्ट उलटते हुए कहा - देखो। पहली कथा काशी के एक दरिद्र ब्राह्मण की है। भगवान तो दयार्द्रचित्त हैं। उन्होने ब्राह्मण को भीख माँगते हुए देखकर उपदेश दिया -

सत्यनारायणो विष्णुः वांछितार्थफलप्रदः

तस्य त्वं पूजनं विप्र कुरुष्व व्रतमुत्तमम्।

"सत्यनारायण भगवान की पूजा करो, जो सभी मनोरथो को पूरा करनेवाले हैं।" उसी दिन ब्राह्मण को बहुत पैसे मिल गए। उसने पूजा की। नफा देखकर हर महिना पूजा करने लगा।

सर्वदुःखविनिर्मुक्तः सर्वसंपत समन्वितः

सर्वपापविनिर्मुक्तः दुर्लभं मोक्षमाप्तवान्।

"वह सब दुःखों से, सब पापों से, मुक्त होकर, सभी सुख-साधनो से सम्पन्न हो गया और अन्त मे मोक्ष भी पा गया, जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है !"

मुझे मुँह ताकते देखकर खट्टर काका बोले - काशी रोज ढेर के ढेर भिक्षुक ब्राह्मण घूमते हैं। पता नहीं, भगवान एक उसी पर क्यों ढुल पड़े। और उसे सलाह भी दी तो उद्यम करने कि नहीं, पूजा करने की ! खैर, जब रास्ता मालूम हो ही गया है, तब अभी तक वहाँ रोज भिखमंगों का मेला क्यों लगा रहता है ? अभागों को इतनी अक्ल क्यों नहीं होती कि किसी से कर्ज लेकर एक बार घी-शक्कर वगैरह सामान जुटा लें। फिर तो उनके मूँह में हमेशा घी-शक्कर रहेगा।

मैने कहा- खट्टर काका, क्या सभी कथाएंँ ऎसी ही है ?

खट्टर काका बोले- हाँ जी। मैं इन्हे इतिहास नहीं, इश्तिहार समझता हूँ। एक लकड़हारे ने पूजा की। उसे लकड़ी का दूना दाम मिल गया।

तद्दिने काष्ठमूल्यं च द्विगुणं प्राप्तवानसौ। और, उसी पूजा की बदौलत उसे दौलत, बेटा, स्वर्ग सबकुछ मिल गया इसी तरह एक राजा (अंगध्वज) ने पूजा की और उसे भी सब कुछ मिल गया।

तद्व्रतस्य प्रभावेण धनपुत्रान्वितोऽभवत्

इहलोके सुखं भुक्त्वा चांते सत्यपुरं ययौ।

अजी, ये सब विज्ञापन नही, तो और क्या है ? लगता है, जैसे कोई दलाल बोल रहा हो बीमा-एजेंट की तरह।

मैं- लेकिन ये सब तो बच्चों की कहानियाँ जैसे लगती है।

ख० - सो तो है ही। हाँ एक कहानी अलबत्ता रसीली है। उसमें सत्यनारायण भगवान के चरित्र की कुछ झाँकी भी मिल जाती है।

मैने पूछा - क्या लीलावती-कलावती वाली कथा ?

खट्टर काका बोले - हाँ, वह तो जानते ही होगे ?

मैने कहा - नही, खट्टर काका। आपके मुँह से सुनने मे मजा आयेगा।

खट्टर काका बोले - तब सुनो। एक महाजन ने पूजा की, और

एकस्मिन् दिवसे तस्य भार्या लीलावती सती

गर्भिणी साऽभवत् तस्य भार्या सत्यप्रसादतः।

उसकी स्त्री लीलावती को गर्भ रह गया। सत्यनारायण के प्रसाद से। एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम पड़ा 'कलावती'। महाजन ने संकल्प किया कि इसकी शादी के वक्त फिर पूजा करुँगा। लेकिन बदकिस्मती के मारे बेचारा भूल गया। नतीजा यह हुआ कि भगवान नाराज हो गये और शाप दे बैठे।

विवाह समये तस्याः तेन रुष्टोऽभवत प्रभुः

भ्रष्टप्रतिज्ञमालोक्य शापं तस्मै प्रदत्तवान

दारुणं कठिनं चास्य महददुःखं भविष्यति।

("अच्छा बच्चू! तुमने वादाखिलाफी की है! अब लो मजा चखो।")

अब आगे का हाल सुनो। महाजन अपने जमाता के साथ वाणिज्य के सिलसिले में बाहर गया। वहाँ राजा (चंद्रकेतु) के यहाँ चोरी हुई। भगवान की प्रेरणा से चोर वहीं माल छोड़कर भागा, जहाँ ये दोनों(ससुर-दामाद) ठहरे हुए थे। राजा के सिपाहियों ने वहाँ से माल बरामद किया और दोनों को पकड़कर ले गये। उनकी सारी संपत्ति जब्त कर ली गयी और वे कारागार में बन्द कर दिए गये। वे बहुत रोये-कलपे, लेकिन

मायया सत्यदेवस्य न श्रुतं कैस्तयोर्वचः।

सत्यनारायण की माया से किसी ने उनकी बातों की सुनवाई नहीं की।

मैने कहा - खट्टर काका, इससे तो भगवान के चरित्र पर बट्टा लगता है।

खट्टर काका बोले - भगवान पर भले ही बट्टा लगे, भक्तों का अपना बट्टा तो प्रसाद से भर जाता है। अगर वे भगवान को इस रूप मे अंकित नहीं करेंगे, तो लोग डरेंगे कैसे ? और डरेंगे नहीं तो पूजा कैसे चढायेंगे ? सत्यनारायण को मामूली देवता मत समझो। वह दारोगा से कम नहीं हैं। रोकर हो, गाकर हो, उन्हे दो। नहीं तो ऎसा फँसा देंगे, कि जेल में सड़ते रह जाओगे।

मै - ऎसे भगवान से किसी को प्रीति कैसे हो सकती है ?

ख० - अजी, बिनु भय होंहि न प्रीति।' सामान्य जनता प्रीति से उतना नही डरती, जितना भीति से। अगर लोगों को विश्वास हो जाय कि शालग्राम से कुछ बनने- बिगड़ने का नहीं, तो उन्हें सीधे शालग्रामी नदी में विसर्जन कर देंगे। दुनिया में शुद्धं-बुद्धं बनने से काम नहीं चलता। इसलिए नारायण को प्रतिशोध-परायण बना दिया गया है।

मैंने पूछा- तब ससुर-दामाद छूटे कैसे?

खट्टर काका ने कहा- आगे का हाल और दिलचस्प है। माँ-बेटी घर पर थीं। उन्हें क्या पता कि दोनों के पति हवालात की हवा खा रहे हैं। एक रात कलावती देर से घर लौटी। माँ डाँटने लगी- "तू इतनी रात तक कहाँ थी?" कलावती ने कहा कि सत्यनारायण की पूजा देख रही थी। यह सुनते ही लीलावती को अपनी प्रतिज्ञा याद आ गयी। उसने भी लगे हाथ पूजा कर ली और भगवान से प्रार्थना की-

अपराधं च मे भर्तुः जामातुः क्षन्तु मर्हसि

"मेरे पति और दामाद का अपराध क्षमा करें। "

व्रतेनानेन संतुष्टः सत्यनारायणः प्रभुः।

भगवान गदगद हो गये और राजा (चंद्रकेतु) को स्वप्न दिया-

देयं धनं च तत्सर्वं गृहीतं यत त्वयाऽधुना नो चेत नाशयिष्यामि सराज्यधनपुत्रकम।

"महाजनों का सारा धन लौटाकर उन्हें तुरंत छोड़ दो, नहीं तो राज-पाट समेत तुम्हारा नाश कर दूँगा।"

अजी, भगवान क्या हुए? शनैश्चर हुए! जिस पर लग जाएँगे, उसे समूल नष्ट कर देंगे। बेचारा चंद्रकेतु क्या करता? महाजनों का जितना माल था, उसका दूना देकर उन्हें विदा कर दिया।

पुरानीतं तु यद द्रव्यं द्विगुणीकृत्य दत्तवान

प्रोवाच तौ ततो राजा गच्छ साधो निजाश्रमम।

कहा- "महाराज! जाइए अपने घर, और मेरी जान बख्शिए!"

मैंने पूछा- खट्टर काका, बेचारे चंद्रकेतु का क्या कसूर था, जो भगवान उस पर बिड़ग गये?

खट्टर काका बोले- भगवान को एकाएक स्मरण हो आया होगा कि कलावती का यौवन विरह के ताप से कुम्हला रहा है और उसके पति को वह दुष्ट राजा बंद किये हुए है। वह भूल गये होंगे कि उन्हीं की माया से ऎसा हुआ। अजी, सामर्थ्यवान और गिरगिट को रंग बदलते कितनी देर लगती है!

खट्टर काका को हँसी आ गयी। बोले-देखो, एक थे उग्रदेव शास्त्री। उन्हें एक बार भोजन में जरा देर हो गयी तो स्त्री का गला काटने दौड़े। और जब आगे गरम-गरम कचौड़ियाँ परोसी गयीं, तो इतने खुश हुए कि स्त्री के गले में चंद्रहार लाकर डाल दिया। दूसरे दिन दाल में कुछ ज्यादा नमक पड़ गया; चंद्रहार छीनकर ले गये। मुझे तो सत्यदेव भी उग्रदेव ही जैसॆ लगते हैं। क्षणे रुष्टः क्षणे तुष्टः। न खींझते देर, न रीझते देर! गुस्से मे महाजन को बँधवा भी दिया और जब उसकी बेटी कलावती की कला पर मुग्ध हो गये, तो उसे छुड़वा भी दिया। भगवान क्या हुए, रियासत के जमींदार हो गये!

खट्टर काका ने नस ली। फिर बोले-अभी किस्सा खतम नहीं हुआ है। जब महाजन नाव पर सामान लादकर चला, तो फिर नारायण एक साधु के वेष में पहुँचे और पूछा कि नाव में क्या है? महाजन को शक हुआ कि एक अपरिचित क्यों ऎसा पूछ रहा है। उसने यह्कहकर टाल दिया कि

लतापत्रादिकं चैव वर्त्तते तरणौ मम

"नाव में घास -फूस वगैरह है।" भगवान तो ऎसे ही मौके की ताक में थे। फिर एक चरण लगा दिया-सत्यं भवतु त्वद्वचः। बस, जितना माल-मता था, बस लत्ता-पत्ता बन गया। अब तो बेचारा बनियाँ लगा सर पीटने। भगवान खुश हो रहे थे-कैसा मजा चखाया? चले थे बच्चू मुझसे चालबाजी करने! अब छल करने का दंड भोगो।'

अजी, भगवान स्वयं अपना रूप छिपाकर छद्मवेष में वहाँ गये सो तो छल नहीं हुआ, और बेचारे बनियाँ ने आत्मरक्षा की दृष्टि से अजनबी को माल का हाल नहीं बताया, तो वह छल हो गया! यही भगवान का इंसाफ है! खैर, बेचारे महाजन ने वादा किया-

प्रसीद पूजयिष्यामि यथा विभवविस्तरैंः

'जितना हो सकेगा सो लेकर जरूर आपकी पूजा करूँगा।' तब जाकर भगवान् संतुष्ट हुए और उसका माल लौटा दिया। चुंगीवाले अफसर का भी कान भगवान ने काट लिया!

मैं-खैर, किसी तरह बेचारा सकुशल घर लौट आया।

खट्टर काका-अभी और है जी। उधर घर पर खबर पहुँची तो कलावती उतावली होकर पति हो देखने के लिए नदी की ओर दौड़ी। हड़बड़ी में भगवान् का प्रसाद लेना भूल गयी।

प्रसादं च परित्यज्य गता सापि पतिं प्रति

बस, भगवान ने फिर थानेदारवाला विकराल रूप धारण किया।

तेन रुष्टः सत्यदेवो भत्तर्रि तरणिं तथा

संहृत्य च धनैः सार्धं जले तत्रावमज्जयत्

उनका क्रोध ऎसा भड़का कि पूरी नाव को ही उलट बैठे। यह देखते ही कलावती बेहोश गिर पड़ी। उसके माँ-बाप रोने-पीटने लगे। तब भगवान ने फिर फब्तियाँ कसी-'बड़ी चली थी पति से मिलने! मेरा प्रसाद छोड़कर, मेरा अपमान कर स्वामी के पास दौड़ गयी। अब कहो! जब तक घर जाकर मेरा प्रसाद नहीं खायेगी, तब तक पति देवता गोते लगाते रहेंगे।' मरता क्या न करता! कलावती दौड़ी घर गयी, प्रसाद खा आई। किसी तरह रूठे हुए भगवान को मनाया!

खट्टर काका सुपारी का कतरा करते हुए कहने लगे- अजी, मैं पूछता हूँ, वह नवयुवती उमंग में अपने पति से मिलने को दौड़ी तो भगवान् के दिल में इतनी ईर्ष्या क्यों धधक उठी? इस तरह की प्रतिस्पर्धा तो सिनेमा के खलनायक में होती है। भगवान् कहीं ऎसा करें? इनको तो और खुश होना चाहिए था कि कलावती अपने पति-देवता को भगवान से भी बढकर मानती है। लेकिन यह तो प्रतिद्वंद्विता पर उतर आये! अंत में तो कलावती इनके सत्यलोक में गयी ही। चांते सत्यपुरं ययौ। पता नहीं वहाँ इनके साथ उसकी कैसी निभी होगी? मुझे तो सत्यनारायण के नाम से ही भय लगता है!

मैंने पूछा-खट्टर काका, सत्यनारायण-कथा में चार-चार कहानियाँ क्यों दी गयी है? क्या एक से काम नहीं चल सकता था?

खट्टर काका बोले - देखो ! ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र चारों से एक-एक प्रतिनिधि लिए गए है, जिससे जनता का प्रत्येक वर्ग पूजा करने के लिए प्रोत्साहित हो।

'एक ब्राह्मण गरीब से धनी हो गया। एक राजा को बेटा हुआ। एक बनियाँ को बेटी हुई। एक लकड़हारे को ज्यादा नफा हुआ।' यही न चारों कथाओं का सारंश है ? अजी, ए सब बातें तो होती ही रहती है। लोग पूजा करे या न करें। लीलावती गर्भवती हो गई, तो कौन सी अनोखी बात हो गयी ? यहीं अब्दुल्ला मियाँ ने कब पूजा की कि उसके एक दर्जन-भर वच्चे हैं ? और चौधरानीजी हर महिना कथा बचवाने पर भी गर्भिनी नहीं हुई। अजी, मासिक पूजा से कहीं मासिक धर्म बन्द होता है ? बेचारे त्रिवेदी जी जीवन भर शंख फूँकते रह गए, कभी घर पर खपड़ा नही चढ़ा और तिनकौड़ी लाल ने चोर बाजार की बदौलत तिमंजिला मकान उठा लिया। तुम्हारे सत्यनारायण ने उसको दंड देकर तीनकौड़ी का क्यों नहीं बना दिया ?

मैं - तो क्या सत्यनारायण की कथा असत्य है ?

तुम स्वयं सोचकर देख लो। आदि से अन्त तक इस कथा को देखने से यहीं लगता है, जैसे नारायण हद दर्जे के लोभी, स्वार्थी, क्षुद्र और दुष्ट हों। नारायण को नर से भी नीचे गिरा दिया गया है। बल्कि एक वानर जैसा चित्रण किया गया है, जो बात-बात मे बंदर-घुड़की दिखाकर, हाथ का फल छीनकर ले भागे और फिर खुश होकर दे दे ! ऎसे चरित्र से मन मे भक्ति क्या होगी, उलटे अभक्ति हो जाती है।

मैं - लेकिन पूजा का फल कितना बताया गया है ?

ख० - हाँ - 'सौभाग्यसंततिकरं सर्वत्र विजयप्रदम्'। जो पूजा करेगा, उसकी सर्वत्र जीत होगी।' मैं पूछता हूँ, अगर मुद्दई-मुद्दालह, दोनो एक साथ पूजा करे, तो किसकी जीत होगी ?

कथाकार लिखते हैं - 'एतत् कृते मनुष्याणां बांछासिधि र्भवेद् ध्रुवम् '।

यजमान की बांछा सिद्ध हो या नहीं, पर पुरोहित की बांछा तो तत्काल सिद्ध हो जाती है। क्योकि कथाकार यह लिखना नहीं भूले हैं -

'विप्राय दक्षिणां दद्यात् कथां श्रुत्वा जनैः सह' अगर दक्षिणा नहीं मिले तो विधाता भी वाम हो जायँ।

मैं - तो क्या यजमानों से प्रसाद और दक्षिणा ऎंठने के लिए ही यह कथा गढी गयी है ?

ख० - और क्या ! यजमानों को उसी तरह फुसलाया गया है, जैसे वच्चों को फुसलाया जाता है - "कान छेदबा लो, तो गुड़ मिलेगा।" इसी तरह यजमानों को लालच दिया गया है - दूध, गुड़-केला घोलकर बाँटों, तो बेटा मिलेगा।" बस भोले भाले यजमान सस्ता सौदा खरीदने के लिए टूट पड़ते हैं। जैसे, बच्चे दस पैसे की नकली घड़ी के पीछे दौड़ते हैं!उन्हें कहाँ तक कोई समझाए कि नकली माल के फेर में मत पड़ो! क्या रोकने से भी वे मानेंगे? इसी तरह एक हाँड़ी दूध, केला, गुड़ घोलकर जो उसके बदले में बेटा-बेटी या स्वर्ग पाना चाहते हैं, उन्हें क्या कहा जाय? इस देश में तो भेड़ियाधसान है। तभी तो नकली माल के दलाल मालामाल हो जाते हैं और सत्य की राह पर चलनेबाले पामाल होते रहते हैं।

मैं- खट्टर काका, तब क्या करना चाहिए?

खट्टर काका बोले- अगर शक्ति है, तो असली सत्यदेव की पूजा करो। जहाँँ-जहाँँ असत्य हो, अन्याय हो, धोखाधड़ी हो, जुआ जोरी हो, घूसखोरी हो, काला-बाजार हो, सत्य पर पर्दा डालने की साजिश हो, वहाँँ जाकर शंख फूँँको, जनता में जागृति करो, समाज को सत्य के पथ पर लाओ। वही असली सत्यनारायण की पूजा होगी। और जब वैसी पूजा होने लगेगी, तो सचमुच पृथ्वी पर स्वर्ग उतर आयेगा। कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा।

"न किंचित विद्यते लोके यन्न स्यात सत्यपूजनात!"

चंद्रग्रहण

उस रात चद्रग्रहण लगा था। गाँव के लोग नदी में स्नान कर रहे थे। उधर खट्टर काका अपने दालान में बैठकर आग ताप रहे थे। मैंने जाकर पूछा-खट्टर काका, ग्रहण-स्नान नहीं कीजिएगा?

खट्टर काका बोले-अजी, यह जाड़े का महीना! पाला पड़ रहा है। उस पर आधी रात को मैं नहाने जाऊँ! सो क्या कुत्ते ने काटा है?

मैंने कहा-देखिए न! घाट पर कैसा जमघट लगा हुआ है!

खट्टर काका सिहरते हुए बोले-हे भगवान! यह सनसनाती हुई हवा! यह ठंडा पानी! जरा छू जाय तो वर्फ बन जायँ! उस पर सहस्त्रों स्त्री-पुरुष छाती भर पानी में खड़े हैं। बच्चे ठिठूर रहे हैं। मर्द सर्द हो रहे हैं। कोमलांगियाँ काँप रही हैं। पुरबैया की लहरें भींगे अंचलों में तीर की तरह प्रवेश कर छातियाँ छेद रही हैं। फिर भी पुण्य के लोभ में भेड़ियाधसान मची हुई है!

मैंने पूछा-खट्टर काका, आप नहीं ही नहायेंगे?

खट्टर काका बोले-अजी, चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ रही है। कुछ देर में स्वतः हट जाएगी। इसलिए मैं पानी में क्यों डूबने जाऊँ? क्या सारे गाँव के साथ मैं भी पागल हो जाऊँ?

मैंने कहा-उधर पंडितजी को देखिए, किस तरह आखें मूँदकर जप कर रहे हैं! उन्हें इस बार ग्रहण देखना मना है, इसलिए ऊपर नहीं ताकते।

खट्टर काका-ताकेंगे तो क्या होगा?

मैं-मृत्यु।

खट्टर काका-मृत्यु तो एक दिन होगी ही। वह क्या आँख मूँदने से या ओम् सों सोमाप नमः जपने से टल जाएगी?

मैं-इस बार उन्हें मृत्युयोग है।

खट्टर काका-अजी, मैं तो बचपन से अभी तक न जाने कितने मृत्युयोग पार कर चुका हूँ। कभी ओम् जूं सः नहीं जपा। परंतु मारकेश एक केश भी टेढ़ा नहीं कर सके। अगर ग्रहशांति नहीं करने से सचमुच मृत्यु हो जाती, तो इंगलिस्तान, तुर्किस्तान, अफगानिस्तान, बलुचिस्तान आदि समस्त देश कब न कब्रिस्तान बन गये रहते! केवल पंडितजी जैसे कुछ बुद्धिनिधान जंबूद्वीप के इस भारतखंड की शोभा बढाते रहते।

मै-तब राशिफल और ग्रहशांति मनगढंत बातें हैं?

खट्टर काका-तुम्हीं सोचकर देखो। इस बार तुम्हारी काकी का राशिफल निकलता है 'स्त्रीनाश'! राशिफल बनानेवाले को इतना भी खयाल नहीं रहा कि औरतों, बच्चों और अविवाहितों पर यह फल कैसे लागू होगा? अधिकांश राशियों के फल जान-बूझकर खराब ही रखे गये हैं। व्यथा, चिंता, घात, माननाश! अगर ऎसा नहीं लिखते, तो अनिष्ट-परिहार के नाम पर अपनी इष्ट-पूर्त्ति कैसे करते? समझो तो यह ग्रहण चंद्रमा को नहीं लगकर हम लोगों को लगता है।

मैं-सो कैसे, खट्टर काका?

खट्टर काका-देखो, ग्रहण लगते ही हम लोगों को अशौच लग जाता है। जैसे जन्माशौच, मरणाशौच, वैसे ही ग्रहणाशौच! एक घंटा पहले ही से रसोई-पानी बंद। मिट्टी के बर्त्तनों को बाहर फेंकिए। स्नान कीजिए, जप कीजिए, शांति कराइए। पुरोहितों को दान-दक्षिणा दीजिए। धूर्तों ने ग्रहण को भी ग्रहण (लेने) का साधन बना लिया है!

इतने ही में ग्रहणदान का शोर मचा।

खट्टर काका बोले-देखो, राहु के भाई-बंधु 'कर' वसूलने के लिए कैसे चिल्ल-पों मचा रहे हैं! जब रिश्वत मिल जायगी, तब राहु से सिफारिश कर चंद्रमा को छुड़वा देंगे। तब तक वह दैत्य चंद्रमा पर दाँत गड़ाये रहेगा। देखतो हो, कितने पैसे बरस रहे हैं! हाय रे बुद्धि!

मैं- खट्टर काका, आपके विचार से यह सब अंधविश्वास है?

खट्टर काका- इसमें भी तुम्हें संदेह ही है? आज संपूर्ण देश में मेले लगे होंगे। काशी-प्रयाग आदि में नरमुंडों का समुद्र लहराता होगा। उसमें कितने बच्चे खोयेंगे, वृद्धाएँ कुचल जाएँगी, कितनी युवतियाँ मर्दित होंगे! इसका कोई ठिकाना है? ऎसा धर्म-धकेल और कहीं होता है? जहाँ और देशों में इस मद में एक छदाम भी खर्च नहीं होगा, वहाँ हमारे देश में आज करोड़ों रुपये आज पानी में चले जायेंगे। इतने रुपय यदि ठोस पृथ्वी में लगाते, तो बाहर से अनाज नहीं माँगाना पड़ता। परंतु हम पृथ्वी की छाया के पीछे पैसे लुटाते हैं! पेट में अन्न नहीं, गाँंठ में पैसे नहीं, फिर भी धर्म के नाम पर गोते लगाने में, सबसे आगे! इसी धर्मांधता के कारण गंगास्नान में कितनों को गंगालाभ भी हो जाता है।

मैंने पूछा- खट्टर काका, ऎसी मूर्खता क्यों है?

इस देश में मूर्खता के प्रधान कारण हैं पंडित लोग।

मैंने कहा- खट्टर काका, आप तो पहेली बुझा रहे हैं। पंडित कैसे मूर्खता के कारण होंगे?

खट्टर काका बोले- देखो, पंडितों को एक विद्या हाथ लग गयी। ग्रहण का ज्ञान! आज तो विज्ञान का साधारण छात्र भी गणित की सहायता से इतना जान सकता है। परंतु उस युग में यही विद्या कामधेनु बन गयी। सूर्य-चंद्रमा उनके लिए सोना-चाँदी बन गये। जन-मानस में अंधविश्वास जम गया। "जब ये पंडित आकाश का हाल जान लेते हैं, तो पृथ्वी का क्यों नहीं जानेंगे?" पंडित लोग भी सर्वज्ञता का ढोंग रचने लगे। 'चंद्रग्रहण' के साथ-साथ 'पाणिग्रहण' का भी समय बताने लगे। धीरे-धीरे वे सभी ग्रहों के ठेकेदार बन गये और उनके नाम पर द्रव्यग्रहण करने लग गये। जादू वह जो सिर पर चढकर बोले! देखो, किस नाटकीय ढंग से दान लेते हैं। चंद्रमा के नाम पर सफेद रंग के पदार्थ! चाँदी,मोती,शंख,चावल,दही,घी,कपूर,चंदन,श्वेतवस्त्र और उजला बैल! शनि के नाम पर काले रंग की चीजें लेते हैं। जैसे, नीलमणि, नीला वस्त्र, लोहा, तिल, उड़द, कुलथी, भैंस, और काली गाय। सूर्य के नाम पर लाल रंग के पदार्थ। जैसे सोना, ताँबा, मणि,मूँगा,गेहूँ, गुड़, केसर, लाल वस्त्र, और लाल रंग का बछड़ा! क्या कविता है! यजमानों के लिए भले ही महँगी पड़ी हो, लेकिन रचयिताओं के लिए तो अर्थकरी सिद्ध हुईं। इसी प्रकार सभी ग्रहों के बही-खाते खुले हुए हैं। इन्हीं नवग्रहों के प्रसाद से पंडितों की अँगुलियों में अष्टधातु की अँगूठियाँ पड़ने लगीं। उनकी स्त्रियों की बाँह में 'नवग्रही' (आभूषण) चमकने लगी। ज्योतिष का फल औरों के लिए फलित हो या नहीं स्वयं उनके लिए तो अवश्य फलित हुआ।

मैंने कहा-खट्टर काका, देखिए। उधर चौधरानीजी घी का घड़ा दान कर रही हैं।

खट्टर काका बोले-यों तो सीधी अँगुली से छँटाक भर घी भी नहीं निकालती। लेकिन यारों ने ऎसा प्रपंच रचा है कि इनका पूरा घड़ा ही हथिया रहे हैं। देखो, क्या वचन बना दिया है!

घृतकुंभोपरिनिहितं शंखं नवनीतपूरितं दद्यात्

नाड्यादिदोषशांत्यै द्विजाय दोषाकरग्रहणे (कृत्यमंजरी)

अर्थात् 'नाड़ीदोष की शांति करने के लिए चंद्रग्रहण के अवसर पर घी के घडे़ पर मक्खन से भरा हुआ शंख रखकर ब्राह्मण को दान करना चाहिए।

पंडितों ने इस तरह यजमानों की 'नाड़ी' पकड़ी कि उन्हें निपट 'अनाड़ी' बना दिया। केवल 'नाड़ी' ही नहीं, उनकी 'नारी' भी पंडितों की मुट्ठी में आ गयी।

मैं-खट्टर काका, आप तो अलंकार ही बोलते हैं!

खट्टर काका-अलंकार ही नहीं। यथार्थ कहता हूँ। इन पंडितों ने यजमानिनी का केश पर्यंत अपने हाथ में कर लिया।

मुझे विस्मित देखकर खट्टर काका ताखे से मिथिला देशीय पंचांग निकालकर बोले- देख लो।

स्त्रीणां केशबंधन मुहूर्त्ताः

अश्विनी, आर्द्रा, पुष्य, पुनर्वसु नक्षत्रेषु

मैं पूछता हूँ, 'भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा नक्षत्रेषु' क्यों नहीं? यदि कोई मृगनयनी नक्षत्र में जूड़ा बाँध ले, तो इससे ज्योतिषी को कौन-सा जूड़ी-बुखार चढ़ जाएगा? जब वे अपनी चुटिया पत्रा देखकर नहीं बाँधते, तो स्त्रियाँ अपनी चोटी पत्रा देखकर क्यॊं बाँधेगी।

मैं-खट्टर काका, मुझे नहीं मालूम था कि पंचांग मे इस तरह की बातें भी लिखी हैं। खट्टर काका पंचांग मेरी ओर बढाते हुए बोले-तो देख लो। कितने मोटे अक्षरों में शीर्षक दिये हुए हैं!

नववध्वाः पाकारंभः!

प्रसूतीनां नखच्छेदनम्!

स्त्रीणां लाक्षाभरणधारणम्!

शिशुमुखे स्तनदानम्!

'नई बहू कब चौके में जाय? प्रसूतिका कब नाखून कटावे? स्त्रियाँ कब लाह की चूड़ियाँ पहनें? कब बच्चे के मूँह में स्तन लगावें? सभी के मुहूर्त्त दिये हुए हैं। और बडे़-बडे़ महामहोपाध्याय इस पंचांग के अनुमोदनकर्त्ता हैं। देखो, कैसे-कैसे लब्धप्रतिष्ठ पंडितों के नाम इस पर छपे हैं!

मैंने कहा-खट्टर काका, बडे़-बडे़ पंडित लोग ऎसी छिछली बातों में क्यों पड़ते हैं ? उन्हें तो महत्वपूर्ण विषयों में अपनी बुद्धि लगानी चाहिए।

खट्टर काका बोले-अगर अपने देश के पंडित वैसे होते तो फिर रोना ही क्या था? मगर ये लोग तो स्त्रीणाम अंगस्फुरणफलम जैसी बातों में अपना पांडित्य प्रदर्शन करते हैं। "स्त्री की जाँघ फड़के, तो दुलार मिलेगा। कमर फड़के, तो नीचे से प्रेम होगा। नाभि फड़के, तो पति का नाश होगा। " इन लोगों ने ऎसा पंचांग बनाकर रख दिया है, कि स्त्रियों के पाँचों अंगों को मुट्ठी में जड़क लिया है।

मैं- परंतु पंचांग में महत्त्व की बातें भी तो हैं? जैसे वृष्टियोग, वर्षफल।

खट्टर काका पत्रा खोलते हुए बोले- सो भी देख लो।

इसबार पराभव नामक संवत्सर हैं, जिसका फल लिखा है-

पंडिताश्च प्रजाः सर्वे भयभीताः पराभवे।

अर्थात प्रजापीड़ित रहे, सभी भयभीत रहें।"

मैं- तब तो वर्ष फल बुरा है।

खट्टर काका-परंतु वर्षेश बृहस्पति है, जिसका फल लिखा है-

विप्रा यज्ञरता भवन्ति तपसा शस्यैः क्षितिर्व्यापिता

राजा मंत्रियुतो गणैश्च महिषैर्देशः समृद्धालयः,

रोगं ध्नन्ति सुवृष्टयः प्रतिदिनं क्रूरा विनश्यन्ति वै

चौरव्याघ्र भुजंगमाश्च बहुधा नश्यन्ति जीवेऽब्दपे।।

भावार्थ यह कि "अन्न-पानी, गाय-भैंस से देश समृद्धिशाली हो, खूब वर्षा हो, रोग का नाश हो, राजा और ब्राह्मण अपने काम में संलग्न रहें; चोर, बाघ,साँप आदि के उपद्रव दूर हों।"

मैं- तब तो वर्ष फल अच्छा है। प्रजा को कष्ट नहीं होगा।

खट्टर काका- जरा रुको। इस बार संवाहक नाम के सूर्य हैं। उसका फल लिखा है-

आदित्ये बहुवित्तनाशनपरा लोका ज्वरव्याकुलाः

मेघानां जलहानिरेव महती शस्यस्य नाशो ध्रुवम।

अर्थात, 'इस वर्ष धन का नाश होगा। लोग रोगग्रस्त रहेंगे। मेघ नही बरसेगा और अन्न नही होगा।'

मै - तब तो अकाल से लोग तबाह हो जायेंगे।

खट्टर काका - ठहरो। इस बार संवर्त्तक नाम का मेघ है, जिसका फल लिखा है -

संवर्त्तके महावृष्टिः शस्यवृद्धिकरी शुभा।

जलपूर्णां मही नित्यं जलदैर्वेष्टितं नभः ॥

अर्थात, इस वर्ष अत्यन्त वृष्टि होगी, खूब अन्न उपजेगा, पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी और आकाश मे सदा बादल छाए रहेंगे।

मैं - खट्टर काका, पंचांग मे ऎसी परस्पर विरोधी बातें क्यों लिखी है ?

खट्टर काका - यही तो चालाकी है। ऎसा जाल बुना गया है कि फल कभी पंचांग के विरुद्ध जा ही नही सकता। अगर वर्षा हुई तो संवर्त्तक नाम के मेघ का फल है, अनावृष्टि हुई तो संबाहक नाम के सूर्य का फल है। यदि कहीं अतिवृष्टि और कहीं अनावृष्टि हो, तो दोनो के फल है। अजी, इन लोगों से पार पाना कठिन है।

मैने पूछा - खट्टरकका, साप्ताहिक या मासिक राशिफल जो छपते हैं, उनमे भी क्या उसी तरह की चालाकियाँ रहती है ?

खट्टर काका बोले - बिल्कुल ! देखो, आय-व्यय, लाभ-हानि, हर्ष-चिन्ता, सुख-दुःख, ये सब तो रोजमर्रा की बातें हैं। रात-दिन होती ही रहती है। चाहे मेष राशि हो, या वृष। इन्ही बातों को मिलाजुलाकर, फेंट-फाँट कर, धूर्त्त लोग भविष्यवाणी के नाम पर पेशा चलाते हैं, और भोले-भाले लोगों को मुर्ख बनाते हैं। ठगनेवालों को मकर और ठगे जाने वाले को वृष समझ लो।

मुझे मुँह ताकते देख खट्टर काका बोले - देखो, मेरा जन्म सिंह राशि में है। उसके अनुसार इस सप्ताह मे एक फल होता है - सुभोजन ! अब तुम्ही सोचो। मेरे घर मे जो भोजन बना, वह सबने खाया। उसमे कुंभ और मिथुन वालियाँ भी थी। फिर उनके लिए सुभोजन क्यो नहीं लिखा ? दुनिया में सिंह राशि वाले करोड़ों आदमी होगे, उनमे कितने भिखमंगे होंगे, जिन्हे कुभोजन भी मुश्किल से मिला होगा। कितने रोगी होंगे, जिन्होने भोजन भी नहीं किया होगा। लेकिन फल लिखनेवालों को उनका क्या फिक्र ? उन्हे सुभोजन मिले या न मिले, ज्योतिषीजी अपने सुभोजन का प्रबन्ध कर लेते है।

मैं - तो भविष्यवाणी अटकलपच्चू मात्र है ?

खट्टर काका - और क्या ? मेरे सामने कोई भविष्यवक्ता आ जायँ, तो एक मिनट में उनकी कलई खोल दूँ!

मैं-सो कैसे, खट्टर काका?

खट्टर काका-एक महज छोटा-सा सवाल पूछूँगा-मेरे हाथ में यह इलायची है, इसे मैं मुँह में डालूँगा या नहीं? इसी में तो उनकी सारी अकल हवा हो जाएगी। इसी डर से तो सिद्ध लोग मेरे सामने नहीं आते कि उनका पर्दा फाश हो जाएगा।

मैंने कहा-मगर पंचांग में कितनी ऎसी भी बातें तो हैं, जिन्हें देखकर पाश्चात्य विज्ञान भी चकित रह जाय!

खट्टर काका मुस्कुराते हुए बोले-इसमें क्या शक? ऎसी-ऎसी बातें हैं, जिन्हें देखकर दुनिया के सभी वैज्ञानिकों के दिमाग चकरा जायँ! जैसे, पृथ्वी किस समय शयन करती है? कब जगी रहती है? अग्नि कब आकाश में रहती है, कब पाताल में? किस वर्ष दुर्गाजी हाथी पर चढ़कर आती हैं, किस वर्ष पालकी में बैठकर? शिवजी कब नंदी पर सवार रहते हैं! कब पार्वती के साथ विहार करते हैं? देखो, श्रावण कृष्ण चतुर्दशी को लिखा है-कामविद्धो हरः पूज्यः! अर्थात उस दिन काम के बाण से विद्ध शिवजी की पूजा करनी चाहिए! अब तुम्ही बताओ, और किसी देश के कलेंडर में ऎसी बातें मिलेंगी?

मैंने कहा-खट्टर काका, आप तो ऎसी-ऎसी बातें दिखा देते हैं कि कुछ जवाब ही नहीं सूझता।

खट्टर काका बोले-अजी, यहाँ के ज्योतिषी प्रणम्य देवता हैं। कहा जाता है- जमाता दशमो ग्रहः। परंतु मैं कहता हूँ-ज्योतिषी दशमों ग्रहः! जहाँ और-और देशों के ज्योतिर्विद दूरवीक्षण यंत्र के द्वारा ग्रह-नक्षत्रों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म निरीक्षण करते हैं, वहाँ अपने देश के ज्योतिषी घर बैठे-बैठे नफा-नुकसान का हिसाब लगाते रहते हैं-

सम्मुखे चार्थलाभश्च वामे चंद्र धनक्षयः।

चंद्रमा सम्मुख होंगे तो आमदनी होगी और वाम होंगे तो घाटा लगेगा! इसी कारण जहाँ अमेरिका के लोग चंद्रलोक पहुँचकर वहाँ से चाँद का टुकड़ा तक ले आये, वहाँ हम लोग अभी तक चतुर्थी चंद्राय नमः करते हुए यहीं से चंद्रमा को केले दिखला रहे हैं!

मैंने कहा-खट्टर काका, यह तो वस्तुतः लज्जित होने की बात है।

खट्टर काका बोले-अजी, हम लोगों ने चंद्रमा को चंद्रकांता उपन्यास का तिलिस्म बनाकर रख दिया था! 'मैया, चाँद खिलौना लीहौं! पंछी बावरा, चाँद से प्रीति लगाए! चाँद को छूना! यह असंभव कल्पना थी। आज विज्ञान ने उसे संभव कर दिखाया है! अब बच्चे को चाँद का खिलौना दिया जा सकता है। चकोर को चाँद से मिलाया जा सकता है! अब सुंदरियाँ चंद्रमुखी नहीं, चंद्राभिमुखी बनेंगी। वे मुहाविरे को झुठलाकर चाँद पर थूक सकेंगी!

मैं-खट्टर काका, आप चंद्रग्रहण में ऎसी बातें कह रहे हैं?

खट्टर काका-सत्य कह रहा हूँ। आज विदेशी विद्वान चंद्रमा पर जाकर वहाँ के उबड़-खाबड़ धरातल का नक्शा बना रहे हैं। और अपने यहाँ के पंडित अभी तक 'शशांक' और 'मृगलांछन' शब्दों से स्तुति किये जा रहे हैं! उन्हें चंद्रलोक ले जाया जाय, तो वहाँ भी ज्वालामुखी पहाड़ो में खरगोश और हरिण खोजने लग जायेंगे! इन लोगों ने न जानें कितने लांछन चंद्रमा पर लागाये हैं! वे चंद्रमा के लांछन नहीं हमारे लिए लांछन की बातें हैं। हम अपनी ही छाया को दैत्य समझकर डरते आये हैं! इससे बढ़कर मूर्खता की बात और क्या हो सकती है?

मैंने कहा-खट्टर काका, चंद्रमा का सर्वग्रास हो गया था, अब मोक्ष हो रहा है।

खट्टर काका बोले-हाँ। लेकिन हम लोगों को जो मूर्खतारूपी राहु ग्रस्त किये हुए है, उससे उद्धार हो जाय, तब न असली मोक्ष होगा!

भारतं चंद्रवत् ग्रस्तं मौर्ख्यरूपेण राहुणा।

न जाने केन यत्नेन कदा मोक्षो भविष्यति ॥

तब तक घाट पर शहनाई बजने लग गयी। खट्टर काका ने कहा-इस नक्कारखाने में तूती की आवाज कौन सुनेगा? जाओ, तुम भी इस पुण्य की लूट में एक डुबकी लगा आओ। नहीं तो पीछे मुझे ही दोष देने लगोगे!

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