खुशवन्त सिंह (जन्म: 2 फ़रवरी 1915, मृत्यु: 20 मार्च 2014) भारत के एक प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक, उपन्यासकार और इतिहासकार थे। एक पत्रकार के रूप में उन्हें बहुत लोकप्रियता मिली। उन्होंने पारम्परिक तरीका छोड़ नये तरीके की पत्रकारिता शुरू की। भारत सरकार के विदेश मन्त्रालय में भी उन्होंने काम किया।

खुशवन्त सिंह जितने भारत में लोकप्रिय थे उतने ही पाकिस्तान में भी लोकप्रिय थे। उनकी किताब ट्रेन टू पाकिस्तान बेहद लोकप्रिय हुई। इस पर फिल्म भी बन चुकी है। उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन एक जिन्दादिल इंसान की तरह पूरी कर्मठता के साथ जिया।

दोस्तों, आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ खुशवंत सिंह की कहानियाँ शेयर करने जा रहे है। उम्मीद है कि आपको यह कहानियाँ बहुत पसंद आएगी। 

खुशवंत सिंह की कहानियाँ

Khushwant Singh Stories in Hindi

सिंह साहब और रगभेद

एक औरत की तस्वीर

लंदन की प्रेम-कथा

कर्म

ईश्वर की आवाज़

कुसुम

विष्णु का तिलक

सिंह साहब और रगभेद

अगर मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा कि हमारे मुल्क के लोग ही दोषी होते हैं मिस्टर सिंह ने अपनी चमकती दाढ़ी सहलाते हुए कहा,

'रंगभेद का जो भी मामला भीतर से देखो, गलती किसी न किसी हिन्दुस्तानी की ही होती है।'

सिंह साहब इस मुल्क में दो हफ़्ते पहले ही आये थे,

लेकिन उन्होंने यहाँ के लोगों के बारे में काफ़ी जानकारी हासिल कर ली थी और रंगभेद की समस्या का गहराई से विश्लेषण कर लिया था।

अब यह बोर्डिंग हाउसों की समस्या ही लो,' वे कहने लगे।

"मैंने कई देखे हैं जो काले लोगों को रखते ही नहीं।

मैंने उनकी मालकिनों ओर रगभेद से इस बारे में पूछा-उनसे परिचय कर लेने के बाद।

हमेशा इसकी वजह उनका गलत व्यवहार ही होता था।

हमारे लड़के स्त्रियों के खाना लेने से पहले ही अपने हाथ मेज़ पर फैला देते हैं।

हमेशा भर्र-भर्र डकारते रहते हैं। लेवेटरी पर उकड़ूँ बैठते हैं और सब गंदा कर देते हैं।

नहाते वक्‍त बाथरूम में टब में धीरे से लेटने की जगह लोटे से पानी चारों तरफ़ फैलाते हैं।

इन बातों से बदमज़गी होती है और बदमज़गी से पूर्वाग्रह पनपता है।

हमारे लोगों को मुल्क छोड़ने से पहले मैनर्स सिखाने चाहिये।

आप क्या कहते हैं ?

सब लोग सहमत थे, सिंह साहब से असहमत हुआ ही नहीं जा सकता था।

तय पाया गया कि यूरोपियन आचार-व्यवहार सिखाने के लिए बम्बई में स्कूल खोला जाना चाहिये, जहाँ बाहर जाने वाले हमारे लोगों को टेबिल और बाथरूम मैनर्स का कम से कम छह हफ्ते का कोर्स कराया जाये।

“ललेकिन,' एक आदमी जो सिंह साहब को जानता नहीं था, बीच में बोल उठा, 'शिक्षित नीगरो ये सब मैनर्स जानते हैं लेकिन उनसे भी भेदभाव बरता जाता है ?

'कुछ देशों में तो बलात्कार करने के लिए उन्हें अदालती कार्यवाही के बिना ही फाँसी पर लटका दिया जाता है या काटकर फेंक दिया जाता है,' किसी और ने इसमें जोड़ा।

सिंह साहब भभक उठे। 'कोई बलात्कार करता है, तो उसे फाँसी मिलनी ही चाहिये दस दफ़ा मिलनी चाहिये।' यह कहकर उन्होंने ऊँगली उठाई, "आप का क्या कहना है ?

हमने सोचा कि दस दफ़ा तो कुछ ज़्यादा ही है, पर फिर उनसे सहमति व्यक्त की।

फिर वे बोले, "तुमने समस्या की जड़ पकड़ ली है। यह सेक्स है।

हम मान गये कि दुनिया की समस्याओं के पीछे सेक्स होता है।

“यह लड़कियों का ही मामला होता है जिससे सब परेशानियाँ पैदा होती हैं उन्होंने ज़ोर देकर कहा। 'ये घटिया किस्म की लड़कियाँ, हाँ। इसीलिए कोई 'डीसेन्ट' फैमिली हमारे लड़कों से घुलती-मिलती नहीं है।

हमें अपने लिए अपने देश से ही लड़कियाँ ले आनी चाहिये।

“यह हँसने की बात नहीं है। मैं गम्भीरता से कह रहा हूँ। हमारे लड़के यहाँ आते हैं और लड़कियों पर भूखे कुत्तों की तरह नज़र डालते हैं। मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूँ जो गये तो पढ़ाई करने लेकिन सिर्फ़ एल.एल.डी. लेकर लौटे। यह एल.एल.डी. क्‍या है, जानते हो ?

जानते हैं, कहने का मतलब ही नहीं था। सिंह साहब यह मजाक़ दोबारा बतायेंगे। पुराने घिसे-पिटे मज़ाकों को बार-बार कहने में, जैसे वे उन्हीं ने गढ़े हों, उनका सानी नहीं था।

“नहीं जानते क्या होता है एल.एल.डी. ? उन्होंने जोश में भरकर कहा, “तो जान लो। बड़ी मज़ेदार बात है, बहुत ज़्यादा मज़ेदार।

उन्होंने अपनी तोंद से हाथ बाँध लिये और कुर्सी पर तनकर बैठ गये।

'एक बन्दे ने विदेशी यूनिवर्सिटी में पाँच साल बिताये लेकिन हासिल की सिर्फ़ बीवी। जब वे साहब घर लौटे तो वालिद साहब ने पूछा, क्या करके आये हो, तो उन्होंने जवाब दिया, एल.एल.डी.।'

'एल.एल.डी.? यह क्या बला है ?” वालिद साहब पूछते हैं, तो लड़का अपनी बीवी को सामने पेश कर देता है, “यह है मेरी एल.एल.डी.-माई लैंडलेडी'ज़ डॉटर। ही...ही...मज़ा आया न ?

यह कहकर सिंह साहब ने अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया जिसे सबने एक-एक करके झिंझोड़ा, यह दिखाने के लिए कि उनका मज़ाक बड़ा शानदार था। वे ख़ुद अपनी जाँघों पर हाथ मारकर तब तक हँसते रहे जब तक आँखों से आँस नहीं निकल आये।

सिंह साहब ने आँसू पोंछे और सहज हुए, “मज़ाक छोड़ो,' और हाथ हिलाकर जैसे हँसी को परे हटाकर बोले, 'इस बारे में हमें कुछ करना ज़रूर चाहिये।

इसके बाद अँगूठा ऊपर उठाकर इस तरह बोलने लगे जैसे भीड़ के सामने भाषण दे रहे हों।

'जैसा मैं उस दिन छात्रों के एक दल से कह रहा था, हम सब अपने देश के राजदूतों की तरह हैं। हमें राजदूतों की ही तरह व्यवहार भी करना चाहिये।

मैं मिसेज़ विल्किन्स से इसका ज़िक्र कर रहा था-ये वो लेडी हैं जिनके साथ मैं ठहरा हूँ। वे कहने लगीं, मिस्टर सिंह, सब हिन्दुस्तानी आप जैसे होने चाहिये...'

थे पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं हैं,' हमने कहा।

'हाँ, ठीक कहते हैं। तो आप मिसेज़ विल्किन्स को जानते हैं ?

“नहीं, हम मिसेज़ विल्किन्स को तो नहीं जानते, लेकिन मिसेज़ जोन्स और मिसेज़ हेनरी को ज़रूर जानते हैं।

ये सब एक जैसी हैं। आप ठीक कहते हैं। लेकिन इनमें से कुछ...सुनो, जैसे मिसेज़ मैकिन्तोष, जो उनसे बात नहीं करेंगी।

लेकिन मैं ध्यान नहीं देता...लड़की बाहर की हो तो...वो खुद ही आती है। पैसा हो या न हो।

“यही होना भी चाहिये,' सिंह साहब ने उत्साह से कहा। “लड़कियों को बोर्डिंग में रखना अच्छी बात नहीं है।

“लेकिन उन्हें ले भी कहाँ जायें ? पुलिस हर जगह तंग करती है।'

'पार्क में ” सिंह साहब चीखे। 'सबके सामने ! हरगिज़ नहीं। यह अच्छी बात नहीं है।

“सिंह साहब, आप अपनी सेक्स की समस्या कैसे सुलझोाते हैं ?”

“तुम लोगों के दिमाग़ में सेक्स ही भरा रहता है। इसके सिवाय तुम्हें और कुछ नहीं सूझता ! सिंह साहब हमला करते हुए बोले। 'अब मेरी तरफ़ देखो। मेरे लिए यह कोई समस्या नहीं है। और तुम लोग तो बीवियोंवाले भी हो...'

हमने सिंह साहब पर नज़र डाली : शानदार सिल्क की पगड़ी, चमकदार काली दाढ़ी नीचे ठोढ़ी पर बँधी, चमकती काली आँखें, पान से रँगे होंठ, हल्की सी तोंद जिसे सहलाये जाने का इन्तज़ार था।

शक्ल-सूरत के अलावा उनका नाम, जिसके साथ कई मानद उपाधियाँ उनके यहाँ आने के बाद जुड़ गई थीं।

ये मुख्यतः विदेशियों पर प्रभाव डालने के लिए थीं जिनसे उनको मिलना-जुलना होता था और जिनको वे अपनी पगड़ी में लगी सुनहरी पट्टी और कामदार भारतीय जूतों की महत्ता समझाते थे।

इसके अलावा वे हाथ की रेखाएँ देखना भी सीख गये थे। दरअसल पूरब के देशों की सब विशेषताओं के वे अच्छे जानकार बन गये थे, जिन्हें दूसरों के सामने प्रदर्शित करते थे।

'मैं अपनी बीवी को भी लाना चाहता था लेकिन ये एक्सचेंज वगैरह के नियम परेशानियाँ पैदा करते हैं। अब मैं जल्द से जल्द उसके पास लौट जाना चाहता हूँ।

हिन्दुस्तानी औरत दुनिया में बेमिसाल है, जानते हो ?

हमारी औरतें सब देवियाँ हैं और हम लोग राक्षस हैं।

हमें उनके योग्य बनने की कोशिश करनी चाहिये। हमारी शादी के वक्‍त पंडित ने जो कहा उसे मैं कभी नहीं भूलता, “आज से तुम पत्नी के अलावा और सब औरतों को अपनी माँ, बहन और बेटियाँ समझोगे।”

मैं इसे हमेशा दिमाग़ में रखता हूँ। आपको भी यही करना चाहिये। हमें उनकी उम्र के हिसाब से यही सब कहकर बुलाना चाहिये।

मैं अपनी उम्र की सब औरतों को बहन ही कहता हूँ। एक दफ़ा आप किसी औरत को बहन कह दें तो फिर आप उसके साथ कुछ गलत नहीं करेंगे, है न ?'

हम तो कर सकते हैं खैर !

क्या यह सोच एक प्रकार की “चैस्टिटी बैल्ट” (सतीत्व के लिए रक्षा-कवच) है ?

“यह क्‍या होती है, मैं नहीं जानता। लेकिन आप कोशिश करके तो देखो। नतीजा अच्छा ही होगा।

सिंह साहब अपने राजदूती मिशन का सन्देश देकर चले गये, जो जातिभेद, रंगभेद वगैरह सब तरह की दीवारों को तोड़-फोड़कर गिराने वाला था।

हमने सिंह साहब के, माँ, बहन, बेटी के टुकड़ों में बॉटकर व्यवहार करने का फैसला किया। हमने प्लीज़” और “बैंक यू” कहना भी शुरू कर दिया।

खाने की मेज़ पर पहले हाथ बढ़ाना बन्द कर दिया।

डकारना बन्द कर दिया।

लेवेटरी की सीटों पर आरामकर्सी की तरह बैठने लगे।

पानी की जगह टॉयलेट पेपर इस्तेमाल करने लगे। लम्बे टब में लेटकर, अपनी गन्दगी से घिरे, नहाने लगे। यह सब रंगभेद को खत्म करने के लिए था।

कुछ महीनों बाद ऐसा हुआ कि हम समुद्र के किनारे एक बड़े शानदार होटल में ठहरे।

यह अपने आप में एक पूरा शहर था, दर्जन भर लाउंज, डायनिंग रूम, ब्यूटी पार्लर, दवा की दुकानें, किताब घर और क्रोमियम तथा शीशे के चारों तरफ़

फैले वरांडे, छतें वगैरह। इसके अलावा बहुत सारी लिफ्ट थीं जो दिन-रात चलती रहती थीं। इन्हें लड़कों जैसे कपड़े पहने और पीतल के बटन ऊपर से नीचे तक लटकाये ढेरों लड़कियाँ चलाती थीं।

एक रात हम जश्न मनाने बाहर गये। चूँकि यहाँ पीने पर रोक नहीं थी, इसलिए हम लड़खड़ाते हुए वापस लौटे। किसी तरह हम होटल पहुँच गये और लिफ्ट भी तलाश ली। एक साँवली लड़की ने हमारा स्वागत किया। उसके कपड़े अलग थे, वह हिन्दुस्तानी लगती थी, लेकिन थी नहीं। वह कमर तक का कोट और पैरों से जैसे पूरी तरह लिपटी पैंट पहने थी जिससे उसके अंग साफ़ नज़र आते थे।

ग्यारहवीं फ़्लोर, सर ? उसने लिफ्ट का दरवाज़ा बन्द करते हुए पूछा।

“य...स...प्लीज़।

हम सामने लगी पट्टी पर संख्या बदलती देखते रहे। फिर लड़की पर नज़र डाली।

“जय हिन्द,” देवी ने कहा और भारतीय ढंग से हाथ जोड़कर नमस्ते की।

हमने कसकर अपनी आँखें बन्द कर लीं। खोलीं तो सामने लड़की का आकर्षक बदन और पीतल के बटन फिर दिखाई दिए। सिंह साहब करा बताया शब्द होंठों तक आया लेकिन मुँह से बाहर नहीं निकला।

“जय हिन्द,' देवी ने फिर कहा और मुस्कुराकर हाथ जोड़े।

“आप हमारे देश को जानती हैं ?

“नहीं, लेकिन आपके एक देशवासी को जानती हूँ। वह यहीं ठहरा था। पगड़ी पहनता था और दाढ़ी भी थी। पगड़ी आपकी पगड़ी से भी अच्छी थी-पूरी सोने से जड़ी थी। वह खुद भी बहुत अच्छा था।'

उसकी याद में देवी ने अपनी आँखें बन्द कर लीं। “वह मुझे डांस के लिए ले जाता और इसके बाद हम उसके कमरे में शराब पीते।

वह भी ग्यारहवीं मंज़िल पर ठहरा था।

ग्यारहवीं मंज़िल आ गई।

“आप ड्रिंक के लिए आना चाहेंगी ?

देवी मुस्कुराई फिर धीरे से बोली, 'एक बजे तक मैं डूयूटी पर हूँ। उसके बाद आप चाहें तो आ जाऊँगी।

“ठीक है, सिस्टर।

एक औरत की तस्वीर

मेरी दादी-माँ, और सब दादियों की तरह, बूढ़ी थीं।

मैं बीस साल से उनकी ऐसी ही झुर्रियोंदार बूढ़ी काया देख रहा था।

लोग कहते थे कि वह कभी युवती और सुन्दर थीं और उनका पति भी था, पर इस पर विश्वास करना कठिन था। मेरे दादा का चित्र बाहर के बड़े कमरे में दीवार पर लगा था।

वे दीले-से कपड़े पहने थे और सिर पर बड़ी पगड़ी थी।

लम्बी सफ़ेद दाढ़ी सीने पर नीचे तक फैली थी और वे कम-से-कम सौ वर्ष के लगते थे।

वे ऐसे नहीं लगते थे जिनके एक पत्नी और कई बच्चे भी थे।

ऐसे लगते थे, जिनके ढेर सारे एक औरत पोते-पोतियाँ ही हो सकते थे और दादी के बारे में तो यह विचार, कि वह कभी सुन्दर और जवान भी रही होंगी, एकदम गलत लगता था।

वह की तस्वीर अक्सर हमें बताती थीं कि बचपन में वह क्‍या खेला करती थीं।

उनके ये विचार हमें बहुत बेहूदा और भौंडे लगते थे और हम ये बातें उनकी सुनाई देवी-देवताओं और मसीहों की कहानियों की तरह सुनकर भूल जाते थे।

उनका क़द हमेशा छोटा, शरीर मोटा और कमर झुकी-झुकी रहती थी।

उनके चेहरे पर एक-दूसरे को काटती बहुत सी झुर्रियाँ थीं जो हर जगह “ से निकलकर हर किसी जगह तक दौड़ती नज़र आती थीं।

हमारा मानना था कि वह हमेशा ऐसी ही थीं।

वह बूढ़ी थीं, बहुत ज़्यादा बूढ़ी, इतनी ज़्यादा कि और बूढ़ी हो ही नहीं सकती थीं और पिछले बीस साल से ऐसी ही बनी रही थीं।

वह सुन्दर तो हो ही नहीं सकती थीं, अच्छी ज़रूर लगती रही होंगी।

वह झक सफ़ेद कपड़े पहने घर भर में उचक-उचककर घूमती

रहती थीं, एक हाथ कमर पर रखे कि संतुलन बना रहे और दूसरे में सुमिरनी जिसे वह हमेशा जपती रहती थीं।

उनके चाँदी की तरह चमकते बाल पीले,

टेढ़े-मेढ़े चेहरे पर बेतरतीब फैले होते, और होंठों से भजन बुदबुदाती रहती थीं। हाँ, वह बहुत अच्छी लगती थीं।

वह पहाड़ों पर सर्दी के दृश्य की तरह थीं, चारों तरफ़ सफ़ेद बर्फ़ से ढँकी, जो शान्ति और संतोष की भावना जगाती है।

दादी माँ और मैं बहुत अच्छे मित्र थे।

मेरे माता-पिता जब शहर रहने गये तो मुझे उनके पास छोड़ गये थे और हम हमेशा साथ रहते थे।

वह सवेरे मुझे जगाती और स्कूल के लिए तैयार करती। मुझे नहलाते-धुलाते और कपड़े पहनाते समय वह मीठी आवाज़ में प्रार्थना इस तरह गुनगुनाती रहती, जिससे वह मुझे भी याद हो जाये।

मुझे उनकी आवाज़ अच्छी लगती थी इसलिए मैं सुनता तो रहता, लेकिन मैंने याद करने की ज़हमत नहीं मोल ली।

फिर वह मेरी लकड़ी की पड़ी लातीं, जिसे उसने पहले ही साफ़ करके और खड़िया से पोत कर रखा होता था, और सरकंडे की कलम और मिट्टी का बुद्का, सब एक थैले में रखकर मुझे पकड़ा देती।

इसके बाद हम शाम की रखी बासी रोटी पर ज़रा-सा घी और शक्कर चुपड़-कर नाश्ता करते और स्कूल के लिए चल पड़ते। वह कुछ और बासी रोटियाँ साथ रखतीं जिन्हें वह रास्ते के कुत्तों को खिलाती चलती थीं।

दादी माँ मेरे साथ हमेशा स्कूल इसलिए जाती थीं क्योंकि वह गुरुद्वारे का ही हिस्सा था। ग्रन्थी हमें वर्णमाला और सवेरे की प्रार्थना सिखाता था।

हम बच्चे वरांडे में दोनों तरफ़ कतार बनाकर बैठ जाते और गाने के स्वर में वर्णमाला या प्रार्थना दोहराते रहते और दादी माँ भीतर जाकर ग्रन्थ साहब का पाठ करतीं जब दोनों का काम पूरा हो जाता, हम एक साथ वापस घर लौटते इस दफ़ा गाँव के कुत्ते गुरुद्वारे के दरवाज़े पर हमें मिलते।

वे हमारे पीछे चलते, दादी माँ द्वारा फेंकी जाने-वाली रोटियों के लिए लड़ते-झगड़ते घर तक आते।

जब हमारे माता-पिता शहर में आराम से रहने लगे, तब उन्होंने हमें भी बुला भेजा।

अब हमारी घनिष्ठता खत्म हो गई; दादी माँ का मेरे साथ स्कूल आना बन्द हो गया। मैं बस से अंग्रेज़ी स्कूल जाने लगा।

यहाँ सड़कों पर कूत्ते नहीं होते थे, इसलिए दादी माँ ने घर के आँगन में पक्षियों को चुग्गा डालना शुरू कर दिया।

समय बीतने के साथ हमारा मिलना-जुलना भी कम होने लगा।

कुछ दिन तक तो वह मुझे सवेरे जगाकर स्कूल जाने के लिए तैयार करती रहीं।

जब मैं घर लौटता तो वह पूछतीं कि आज गुरुजी ने क्‍या सिखाया है ?

मैं उन्हें अंग्रेज़ी के शब्द बताता और पश्चिमी विज्ञान तथा शिक्षा की बातें, जैसे आकर्षण का सिद्धान्त, आर्किमिडीज़ का नियम, दुनिया गोल है, वगैरह, समझाकर बताता।

लेकिन यह उन्हें अच्छा नहीं लगता था। इसमें वह मेरी बिलकुल मदद नहीं कर सकती थीं।

अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ाई जानेवाली ये बातें उन्हें बेकार लगती थीं और उन्हें दुःख होता कि यहाँ भगवान और धर्म के बारे में कुछ क्‍यों नहीं बताया जाता।

एक दिन मैंने बताया कि अब हमें संगीत भी सिखाया जाने लगा हैं।

इससे उन्हें बड़ी परेशानी हुई। उनकी दृष्टि में संगीत का मतलब भोग-विलास था।

वह वेश्याओं और भिखारियों के लिए ही था और सभ्य लोग इससे दूर रहते थे। इसके बाद उन्होंने मुझसे बात करना बहुत कम कर दिया।

जब मैंने यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया, मुझे एक अलग कमरा दे दिया गया।

अब हमारा सम्बन्ध एकदम समाप्त हो गया।

दादी माँ ने चुपचाप यह अलगाव स्वीकार कर लिया।

अब वह हर वक्‍त चरखा चलाती रहतीं और किसी से बात नहीं करती थीं।

सवेरे से शाम तक वह सूत काततीं और भजन गाती रहती थीं।

सिर्फ़ शाम के वक्‍त वह थोड़ी देर के लिए उठतीं और चिड़ियों को खाना खिलातीं। वरांडे में आराम से बैठी वह रोटियों के छोटे-छोटे टुकड़े करतीं, उन्हें चिड़ियों को डालती रहतीं और चिड़ियों का झुंड उनके इधर-उधर-चूँ-चूँ करता खाता और उड़ता रहता।

कई चिड़ियाँ उनके कंधों पर, हाथ और पैरों पर और सिर पर भी बैठकर खातीं और चोंचे मारतीं, लेकिन वह उन्हें उड़ाती नहीं थीं बल्कि मुस्कुराकर रह जाती थीं। उनके लिए दिन का सबसे सुखी समय यही आधा घंटा होता था।

जब मैं उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने लगा, तब मैंने सोचा कि दादी माँ इससे बहुत दुखी होंगी।

मुझे पाँच साल बाहर रहना था और इस बीच पता नहीं क्या हो जाये।

लेकिन दादी माँ ज्यों की त्यों रहीं। उन्होंने कोई दुःख नहीं प्रकट किया।

वे स्टेशन मुझे छोड़ने आईं और धीरे-धीरे प्रार्थना करती रहीं। उनके हाथ में माला थी, जिसे वह चुपचाप जपती रहीं।

उन्होंने मेरा माथा चूमा और जब मैं चलने लगा तो मुझे लगा कि उनका यह चुंबन मेरे लिए कितना कीमती है।

लेकिन मैं जो सोचता था, वह नहीं हुआ।

पाँच साल बाद जब मैं वापस लौटा, तो वह मुझे लेने स्टेशन आईं।

वे उतनी ही बूढ़ी लग रही थीं, जितनी मेरे जाने के दिन थीं, उससे एक दिन भी ज़्यादा नहीं।

उन्होंने कुछ कहा नहीं और मुझे अपनी बाँहों में भर लिया-उनकी प्रार्थना मेरे कानों में पड़ रही थी।

लौटने के बाद पहले दिन भी मैंने देखा कि वह उसी तरह चिड़ियों को खाना खिलातीं उनसे हल्की-फुल्की बातें करती वैसी ही खुश हैं।

शाम को उनमें एक परिवर्तन दिखाई दिया।

आज उन्होंने प्रार्थना नहीं की।

अपने पड़ोस की औरतों को इकट्ठा किया, एक ढोलक ली और उसे बजा-बजाकर ज़ोर-ज़ोर से गाना शुरू किया।

कई घंटे वह इस पुरानी दोलक पर गाती-बजाती योद्धाओं की घर-वापसी के गीत गाती रहीं।

हमें उन्हें समझाकर रोकना पड़ा कि इससे उनका तनाव बढ़ेगा।

मैंने पहली बार देखा कि उन्होंने हमेशा की तरह प्रार्थना नहीं की।

दूसरे दिन सवेरे उन्हें बुखार चढ़ आया डॉक्टर बुलाया गया तो उसने देखकर कहा कि कोई खास बात नहीं है, बुखार उतर जायेगा।

लेकिन दादी माँ ने कुछ और ही कहा। कहने लगीं कि अब उनका अन्त निकट है।

उन्होंने कहा कि कई घंटे से प्रार्थना नहीं की है इसलिए अब वह किसी से बात नहीं करेंगी, बल्कि सारा समय प्रार्थना में ही बितायेंगी।

हमने इसका विरोध किया।

लेकिन हमारी बातों को नज़रंदाज़ करके वह शान्तिपूर्वक खाट पर लेटी चुपचाप सुमिरन फेरती प्रार्थना करती रहीं।

हमारी उम्मीद से पहले ही उनके होंठ अचानक बन्द हो गये, सुमिरनी हाथ से गिर पड़ी और आँखें बन्द हो गई।

उनका चेहरा हल्का पीला पड़ गया और हम समझ गये कि वह नहीं रही हैं।

हमने उन्हें बिस्तर से उठाया और जैसी प्रथा है, धरती पर रख दिया और उनके शरीर पर एक कपड़ा डाल दिया। कुछ घंटे शोक मनाने के बाद हम उनके दाह-संस्कार की तैयारी करने लगे।

शाम हुई तो हम लकड़ी की एक टिकटी लेकर उनके कमरे में गये।

सूरज डूब रहा था और उसकी सुनहरी रोशनी वरांडे तक फैली हुई थी।

हमने देखा कि पूरे वरांडे और कमरे में जहाँ उनका शव रखा था, हज़ारों चिड़ियाँ चारों तरफ़ बैठी हैं। वे सब एकदम चुप थीं।

मेरी माँ उनके लिए रोटियाँ लेकर आईं और जिस तरह दादी माँ उनके टुकड़े-टुकड़े करके उनके सामने डालती थीं, उसी तरह वह भी करने लगीं।

लेकिन चिड़ियों ने उन पर ध्यान नहीं दिया।

जब हम दादी माँ की अरथी उठाकर बाहर लाये, तब वे चुपचाप उड़ गईं।

दूसरे दिन सवेरे भंगी ने रोटी के वे टुकड़े इकट्ठा किये और कूड़ेदान में डाल . दिये।

लंदन की प्रेम-कथा

मे आय हैव योर एटेन्शन, प्लीज़ (कृपया ध्यान दें)। हम पन्द्रह मिनट में लंदन हवाई अड्डे पर उत्तर रहे हैं। मेहरबानी करके अपनी सीट-बैल्ट बाँध लीजिये और धूम्रपान मत कीजिए, धन्यवाद!

दरवाज़े के ऊपर लगी पट्टी पर लाल अक्षर, चमकने लगे : 'सीट-बैल्ट बाँध लीजिए, धूम्रपान मत कीजिए। कामिनी ने खिड़की से बाहर देखा। वे सफ़ेद रुई की तरह चारों ओर फैले बादलों के बीच उड़ रहे थे। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि कुछ ही मिनटों में वह इंग्लैंड पहुँच जायेगी।

वह इंग्लैंड जिसके बारे में उसने लंदन की किताबों में पढ़ा था, अपने परिचितों से सुना था और जिसके बहुत से चित्र भी देखे थे, परन्तु प्रेम-कथा यह कभी नहीं सोचा था कि वह खुद एक दिन वहाँ जा पहुँचेगी। उसे लगा कि चमत्कारों का युग अभी खत्म नहीं हुआ है।

महीने भर तक अपनी छात्रवृत्ति के फ़ैसले का बेसब्री से इन्तज़ार करके, फिर पासपोर्ट, वीज़ा और फॉरेन एक्सचेंज, इनकम टैक्स वगैरह की मुश्किलों से गुज़रकर तथा स्वास्थ्य संबंधी सर्टिफिकेट प्राप्त करके अब वह वास्तव में लंदन की भूमि पर पैर रखने जा रही थी।

“आपकी सीट-बैल्ट, मैडम,” एयर हॉस्टेस ने धीरे से कहा। अरे, हाँ, सॉरी,' कामिनी बुदबुदायी और बैल्ट कमर से बाँध ली। वह सोच रही थी कि यहाँ पता नहीं कैसी बीतेगी। उसने जो कुछ पढ़ा और सुना था, उसके अनुसार इंग्लैंड सुन्दर देश था। परन्तु यहाँ के लोगों के बारे में उसे सन्देह था।

इनके कारण उसके परिवार ने बहुत कुछ झेला था। सत्याग्रह के ज़माने में उसके पिता तथा भाइयों को जेलों में रहना पड़ा था और वहाँ उन्हें मारा-पीटा भी गया था।

उसे ख़ुद, जब वह यूनिवर्सिटी के पहले साल में ही थी, सात दिन के लिए जेल की हवा खानी पड़ी थी।

वह कभी किसी अंग्रेज़ से नहीं मिली थी, सिवाय उस मजिस्ट्रेट के, जिसने उसे सज़ा दी थी, रॉबर्ट स्मिथ नाम था उसका-परन्तु क्या इसे मुलाकात कहा भी जा सकता था ?

बह एक अद्भुत घटना थी।

सन्‌ 1942 के “भारत छोड़ो” आन्दोलन का ज़माना था।

कॉलेज की कुछ लड़कियों ने मिलकर सड़कों पर जुलूस निकाला था, देशभक्ति के गाने गाये थे और जब कभी कोई अंग्रेज़ दिखाई देता, 'भारत छोड़ो” के नारे लगाते।

पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। उसके अलावा सब लड़कियों ने माफ़ी माँग ली और उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया गया।

लेकिन उसे थाने में बन्द कर दिया और शाम को रॉबर्ट स्मिथ, आई.सी.एस., डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रे, के सामने पेश किया गया।

कामिनी को वह दृश्य अच्छी तरह याद है।

बरसातों के दिन थे।

कचहरी के कमरे में पसीने, कागज़ और स्याही की मिली-जुली बदबू बसी हुई थी।

चारों तरफ़ अँधेरा था, लेकिन मजिस्ट्रेट और क्लर्क की दो मेज़ों पर ऊपर लटके बल्बों से रोशनी के गोले दिखाई दे रहे थे; क्लर्क अपने सामने बिखरी, पीले रंग के कागज़ की फाइलों में उलझा हुआ था।

मजिस्ट्रेट युवा था और उसके बाल हलकी लाली लिये हुए थे। वह आधी बाँहों की सफ़ेद कमीज़ पहने था, जिस पर बीच तक ढीली की हुई टाई लटक रही थी।

वह कोई किताब पढ़ने में लीन था और पेश किये जा रहे लोगों की तरफ़ देखता भी नहीं था।

क्लर्क ने कामिनी का नाम बोला, उसके पिता का नाम बताया और उसने क्या अपराध किया है, यह भी बताया।

फिर क्लर्क ने ही प्रश्न किया, “अपराधी हैं या नहीं ?

“नहीं !

मजिस्ट्रेट ने सिर उठाये बिना ही अंग्रेज़ी में कहा, 'इनसे उम्र पूछिये

कामिनी ने अनुवाद की प्रतीक्षा किये बिना अंग्रेज़ी में ही जवाब दिया, 'सत्रह। इनसे कहिये कि इंग्लैंड वापस जायें और अपना काम-धाम करें !

अब मजिस्ट्रेट ने सिर उठाया और सामने देखा। उसकी भूरी आँखें, जिससे उसने कामिनी के काले बालों से चारों तरफ़ से ढके चेहरे पर नज़र दौड़ाई जो उसकी नफ़रत से सुलगती आँखों पर आकर टिक गई।

“अजब संयोग है,' वह बुदबुदाया।

'कैसा संयोग है ? नाम कया बताया ? उसने क्लर्क से फिर पूछा और नज़र सामने ही टिकाये रखी।

'कामिनी...कामिनी गर्वे

'मिस गर्वे, क्या आपको स्कूल में कविता भी पढ़ाते हैं ?'

'हाँ...नहीं, कामिनी हकलाकर बोली। 'लेकिन उसका इस मुक़दमे से क्‍या सम्बन्ध है ?” उसने तेज़ पड़ते हुए कहा। 'क्या आपको कचहरी में कहानी पढ़ने की तनख्वाह दी जाती है ?

'कहानी नहीं, यंग लेडी, कविता। मैं आपको भी यह किताब जेल में पढ़ने के लिए दूँगा। सात दिन की सज़ा, “ए” क्लास और अगर आपका व्यवहार यही - रहा, तो सात दिन और अदालत की अवमानना करने के लिये।

दूसरे दिन कामिनी को जेल में हिलेयर बेलॉक के काव्य-संकलन की जिल्द बन्द प्रति प्राप्त हुई, जिस पर लिखा था, "जेल में पढ़ने के लिए, शुभकामनाओं सहित-जिसने आप को जेल भेजा, उसके द्वारा किताब के एक पेज पर पर्ची लगी थी, जहाँ दो लाइनों के नीचे लाल रेखा खिंची थी-उसके बगल में छपा था-'के. जी कविता की पंक्तियाँ थीं-

(उसका चेहरा सम्राट के आदेश की तरह था- जब तलवारें सभी हाथों में खिंची हों।)

कामिनी ने फ़ैसला किया कि बाहर आने पर अखबारों को यह घटना बतायेगी कि अदालत में स्मिथ का उसके प्रति व्यवहार कैसा रहा। लेकिन सात दिन बीतने से पहले ही उसका विचार बदलने लगा। जब वह वापस घर आई तो उसे पता लगा कि स्मिथ ने इस्तीफा दे दिया था और इंग्लैंड वापस लौट गया था।

कामिनी को यह ठीक से समझ में नहीं आया था कि इन पंक्तियों का अर्थ क्या है। बस यह कि यह किसी रूप में उसके सौंदर्य की प्रशंसा थी और यह पहली दफ़ा था कि किसी ने उसके बारे में कुछ कहा था। इसके बाद जब भी वह शीशे में अपना मुँह देखती, ये शब्द उसे याद आ जाते और उसे स्मिथ का अपनी तरफ़ घूरकर देखना एक विशेष सिहरन पैदा कर देता, उसे अपना उभरता नारीत्व परेशान करने लगता इस घटना से अंग्रेज़ों के प्रति उसके मनोभाव में कोई परिवर्तन तो नहीं आया था, सिवाय, इसके कि उन्हें जितना संकोची समझा जाता है, उतने वे हैं नहीं।

हवाई जहाज़ के झटकों से कामिनी का दिवा स्वप्न भंग हुआ। विमान, बादलों से नीचे उतर आया था और लाल छत वाले घरों, सड़कों और चौराहों तथा चमकते जुगनुओं की तरह रेंग रही गाड़ियों के ऊपर से उड़ रहा था। कुछ मिनट बाद वह ज़मीन से आ लगा और कस्टम के कमरों की तरफ़ बढ़ने लगा।

होटल पहुँचकर कामिनी काफ़ी देर तक खिड़की से लगी, इंग्लैंड का अपना पहला नज़ारा देखती रही। शरद ऋतु की हल्की गरम शाम थी और सामने के पार्क में लोग घूम-फिर रहे थे।

घास उससे ज़्यादा हही और ताज़ी थी, जितनी उसने आज तक देखी थीं और किनारों पर ग्लैडियोली के फूलों की कतार झिलमिला रही थी। पार्क के प्रवेश द्वार पर एक बूढ़ा भिखारी हाथ में सितार-जैसा बाजा लिये एक पुरानी घुन बजा रहा था। वातावरण शान्त और मैत्रीपूर्ण था। कामिनी ने खुद निकलकर घूमने का फ़ैसला किया।

कामिनी सोचती थी कि लोग उसकी साड़ी के कारण उसे घूर कर देखेंगे, लेकिन किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया। उसने बच्चों को तालाब में नावें तैराते, स्त्रियों को कबूतरों को दाना चुगाते और लड़कों को दर्शकों के इर्द-गिर्द घर-घर्र करते खिलौने विमान दौड़ाते देखा।

लड़के-लड़कियाँ इधर-उधर आराम से लेटे दुनिया की चिन्ता से मुक्त गपशप कर रहे थे। कई जगह लोग छोटी-छोटी भीड़ों के सामने खड़े भाषण कर रहे थे और सवालों के जवाब दे रहे थे।

जब वह होटल वापस लौटने लगी तो उसे अचानक एक अकेलेपन ने आ घेरा।

उसे एहसास हुआ कि आज उसकी ज़िन्दगी का शायद यह पहला दिन था जब किसी ने उससे कोई बात नहीं की थी।

उसके अलावा हर कोई किसी-न-किसी से बात कर रहा था। वह खुद अपने से पूछने लगी कि ऐसे मित्रहीन देश में क्यों आ गई है ?

आने वाले दिनों में भी उसे अपने इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला।

बहुत जल्द उसकी ज़िन्दगी एक क्रम में बँध गई जिसमें एक-डेढ़ पैंस के टिकट पर बस-यात्रा करके अंडरग्राउंड स्टेशन पहुँचना, वहाँ से ठसाठस भरी ट्यूब ट्रेन में लटकन पकड़कर आधा घंटा सफ़र करके लेक्चर सुनना, कैफ़ेटेरिया में लंच लेना, फिर और लेक्चर सुनना और फिर एक बार लटकनें थामकर ट्यूब ट्रेन और बस से घर वापस आना-अगर होटल को घर कहा जा सके तो, जहाँ साधारण दुआ-सलाम के अलावा

कोई और बात नहीं की जाती, ज़रूरी बातें भी धीरे-धीरे और फुसफुसाकर की जाती हैं और जहाँ मरघट का सन्नाटा चारों ओर पसरा होता है, जिसे अखबारों की खड़क ही कभी-कभी भंग करती है।

भारत छोड़ने के समय से कामिनी के मन में यह उम्मीद थी कि हो सकता है कभी स्मिथ से कहीं वह टकरा जाये। हालाँकि वह जानती थी कि यह मूर्खता की बात है।

क्योंकि वह अफ्रीका या अमेरिका, कहीं भी रह सकता था।

अगर वह इंग्लैंड में भी होता, तो अस्सी लाख की आबादी वाले लंदन शहर में, जहाँ बड़ी-बड़ी भीड़ें हर जगह से गुज़रती रहती हैं, उससे मिलने की संभावना बहुत सही नहीं धी।

अगर वह मिल भी जाता, तो क्‍या वह उसे पहचान लेता ? वह उससे क्‍या कहती ? या वही क्‍या कहता ?

उसने टेलीफ़ोन की डायरेक्टरी में उसका नाम देखा, लेकिन स्मिथ नाम के लोगों से पन्‍ने-पर-पन्‍्ने भरे हुए थे। “आर” अक्षर लगे स्मिथ भी ढेर सारे थे।

अगर वह सही नाम पाकर फ़ोन करती, तो क्या बताती, कि उसने फ़ोन क्‍यों किया है।

लेकिन यह विचार जैसे उसके मन में जमकर बैठ गया। उसे विश्वास था कि यदि वह इच्छा करेगी तो किसी-न-किसी तरह, कहीं-न-कहीं वह उसे मिल ही जायेगा।

उसने कहीं पढ़ा था कि जो लोग एक ही वस्तु के प्रति आकृष्ट होते हैं, वे अक्सर मिल जाते हैं। उसने अपने दिमाग़ में इस भेंट की रूपरेखा भी खींच ली थी। वह अपना हैट हाथ में लेकर कहेगा, 'मिस गर्वे, क्या आप मुझे पहचान रही हैं ?

'मेरा खयाल है, आप मिस्टर स्मिथ हैं? अरे हाँ, एक दफ़ा मिले ज़रूर थे-हालाँकि वह मुलाक़ात सही नहीं धी। खैर, कैसे हैं आप, मिस्टर स्मिथ” और इस तरह बात आगे बढ़ती।

पॉलिटेक्निक का कोर्स खत्म होने को आया और न कामिनी की इच्छा शक्ति ने और न संयोग ने दोनों को मिलने का अवसर दिया।

एक दिन हमेशा की तरह उसने ट्यूब स्टेशन के लिए बस पकड़ी।

जब वह दूसरे सिरे पर अंडरग्राउंड से बाहर निकली और दूसरी बस पकड़ने के लिए आगे बढ़ी, तो उसने देखा कि चारों तरफ़ बड़ी भीड़ है और यातायात रोक दिया गया है।

थोड़ी दूर से उसे बैग पाइपों और बड़े-बड़े ड्रमों की सैनिक धुन सुनाई देने लगी।

हाथ में लिया अखबार खोलकर देखा, तो पता चला कि किसी अतिथि के साथ महारानी वहाँ से गुज़रने वाली हैं। वह भी लेक्चर छोड़कर भीड़ में शामिल हो गई।

बाजे बजाते सैनिक उसके सामने से गुज़रने लगे।

उनके पीछे गार्डों के दल बहुत धीरे-धीरे शाही शान से आगे बढ़ते नज़र आये।

विभिन्‍न वेशभूषाओं में चमकते-दमकते कोट पहने और हाथों में रायफिलें लिए और भाले आसमान में उठाये, सैनिकों की कतारों ने जैसे एक नया समाँ बाँध दिया गार्ड उसी के सामने आकर रुक गये और सड़क के दोनों ओर लाइन लगाकर खड़े हो गये।

इनके पीछे महारानी का सोने का रथ सामने आया जिसे एक दर्जन काले रंग के घोड़े खींच रहे थे।

महारानी अपने शाही अतिथि के साथ भीड़ की तरफ़ हाथ हिलाते आगे बढ़ गईं।

जुलूस समाप्त होते ही लोग इधर-उधर भागने लगे।

लेकिन कामिनी मन्त्रमुग्ध की तरह अपनी जगह पर खड़ी रही। दफ़्तर जा रहे लोग उसे धक्का देते आगे बढ़े जा रहे थे।

सिर्फ़ कामिनी के पीछे खड़ी औरत वहाँ से नहीं हिली; वह आँखों पर हाथ लगाये सुबक-सुबककर रो रही थी।

कामिनी ने मुड़कर उसकी ओर नज़र डाली तो देखा कि वह अपने हैंड बैग से रूमाल निकालकर आँखें पोंछ रही है। कामिनी को देखकर वह झिझकी और बोली, 'जब इस तरह सैनिक और जुलूस निकलते हैं, तब मैं बरदाश्त नहीं कर पाती, एकदम भावुक हो उठती हूँ।' “आप ठीक कहती हैं।

मैं भी द्रवित हो उठती हूँ। इस तरह के सैनिक कितने अच्छे लगते हैं ?

“आपका यह कहना आश्चर्यजनक है! मेरा मित्र कहता था कि सुन्दर स्त्री तलवार उठाये हज़ारों सैनिकों की तरह लगती है। दरअसल वह यह बात अक्सर कहता था। वह इंडिया में रहा था और उसे चाहता भी था।'

कामिनी को लगा, जैसे उसके पैर अपनी जगह पर जकड़ गये हैं। वह औरत फिर रूमाल से आँसू पोंछ रही थी।

“आपके मित्र अब कहाँ हैं ? वह जानती थी कि इस तरह किसी अजनबी से यह सवाल पूछना सही नहीं है, लेकिन वह अपने को रोक नहीं सकी।

औरत ने आँसुओं से भरा चेहरा उठाकर कहा, वह युद्ध में मारा गया।'

कर्म

सर मोहन लाल ने रेलवे स्टेशन के फर्स्ट-क्लास वेटिंग रूम में लगे शीशे में अपना चेहरा देखा।

शीशा भारत में ही बना लगता था।

उसके पीछे लगे लाल ऑक्साइड की परत जगह-जगह उखड़ गयी थी और सामने लम्बी-लम्बी लकीरें पड़ी थीं।

सर मोहन लाल ने शीशे की तरफ़ दया की एक मुस्कान फेंकी।

'तुम भी इस देश की हर और चीज़ की तरह हो, गंदे, अकुशल और उदासीन, वह धीरे-से बोला।

शीशा उनकी तरफ़ देखकर जैसे मुस्कुराया।

'और तुम ठीक-ठीक ही हो, प्यारे भाई,' शीशे ने जैसे जवाब-सा दिया, 'प्रतिष्ठित, कुशल और स्मार्ट भी।

ये तराशी हुई मूँछें, लंदन का सिला सूट, जिसमें सुन्दर फूल टैंका है, 'यू डी कोलोन टेलकम पाउडर और खुशबूदार साबुन की मिली-जुली तुम्हारे चारों ओर फैल रही खुशबू।

सब कुछ ठीक-ठाक ही है।

सर मोहन लाल ने अपना सीना फुलाया, गर्दन से लटकती बैलियोल टाई पर एक बार फिर हाथ फेरा, और शीशे की ओर हाथ हिलाकर विदाई ली। फिर घड़ी पर नज़र डाली। एक छोटा पैग लेने का समय अभी था। 'कोई है ?

सफ़ेद कपड़े पहने जालीदार दरवाज़े से एक बैरा प्रकट हुआ।

“एक छोटा, सर मोहन लाल ने आदेश दिया और बेंत की बड़ी-सी कुर्सी पर पीने और सोचने बैठ गये।

वेटिंग रूम के बाहर सर मोहन लाल का सामान दीवार के सहारे एक दूसरे के ऊपर लदा रखा था।

एक छोटे-से लोहे के ट्रंक पर लक्ष्मी, यानी लेडी मोहन लाल, पान चबाती और अखबार से हवा करती बैठी थीं।

छोटा कद बदन भारी और अधेड़ उम्र, चालीस से कुछ ज़्यादा।

वह एक गंदी-सी साड़ी पहने जिसमें लाल रंग का बॉर्डर लगा था।

नाक में एक तरफ़ हीरे की नथ जगमगा रही थी और हाथों में कई सोने की चूड़ियाँ चमक रही थीं।

सर मोहन लाल के भीतर बुलाने तक वह बैरे से बातें कर रही थीं।

जैसे ही बैरा भीतर गया, उन्होंने एक कूली को आवाज़ दी और पूछा, 'यह ज़नाना डिब्बा कहाँ रुकता है ?

'प्लेटफ़ार्म के एकदम आखिर में कुली ने अपनी पगड़ी सिर पर जमाई, लोहे का ट्रंक उस पर रखा और प्लेटफ़ार्म पर आगे बढ़ा।

लेडी लाल ने पीतल का टिफ़िन कैरियर हाथ में लटकाया और उसके पीछे चलीं।

रास्ते में वह एक पानवाले की दुकान पर रुकीं, चाँदी का पान का डिब्बा भरवाया और फिर कुली के पीछे हो लीं।

कुली ने एक जगह बक्सा नीचे रख दिया। उस पर वह बैठ गईं और कुली से बतियाने लगीं। 'इन लाइनों पर क्‍या गाड़ियाँ बहुत भरी चलती हैं ?

आजकल तो सब गाड़ियाँ भरी ही चलती हैं, लेकिन आपको ज़नाने डिब्बे में जगह मिल जायेगी।'

'तो फिर मैं खाने का झमेला अभी ही निबटा लूँ यह कहकर उन्होंने टिफ़िन का डिब्बा खोला और उसमें से रोटियाँ निकालकर आम के अचार से खाने लगीं।

कुली थोड़ी दूर पर उनके सामने बैठा ज़मीन पर अपनी उँगलियों से कुछ लकीरें खींचने लगा।

“बहनजी, आप अकेली सफ़र कर रही हैं ?

“नहीं भैया, पति भी साथ हैं। वेटिंग रूम में हैं। फ़र्स्ट-क्लास में सफ़र करते हैं। बड़े बैरिस्टर हैं, बड़े-बड़े अफ़सरों और अंग्रेजों से मिलना-जुलना है और मैं ठहरी सीधी-सादी गाँव की औरत। न अंग्रेज़ी समझती हूँ न इनके तौर-तरीके। इसलिए मैं ज़नाना इन्टर क्लास में ही सफ़र करती हूँ।'

लक्ष्मी मज़े से गपशप करती रही। उसे बातें करना अच्छा लगता था।

घर पर तो कोई होता नहीं था।

पति को भी उनसे मिलने का ज़्यादा समय नहीं मिलता धा।

वह मकान की ऊपरी म॑ज़िल पर रहती थीं और पति नीचे वाली पर, उन्हें पत्नी के गरीब, अशिक्षित रिश्तेदारों का बँगले में आना-जाना पसन्द नहीं था, इसलिए वे आते भी नहीं थे।

कभी-कभी सर मोहन लाल रात को कुछ मिनट के लिए पत्नी से मिलते और फिर नीचे लौट आते थे।

वह अंग्रेज़ी मिली-जुली हिन्दी में पतली को आदेश देते और वह चुपचाप उनका पालन करती रहती थी।

लेकिन रात की उन मुलाकातों का कोई नतीजा नहीं निकला था।

सिग्नल नीचे गिरा और घंटियाँ बजने लगीं कि गाड़ी आ रही है।

लेडी लाल ने जल्दी से खाना खत्म किया, वह अचार की गुठली चूसती उठीं और दूसरी तरफ़ लगे नल से हाथ-मुँह धोने के साथ-साथ ज़ोर से डकार मारी।

मुँह धोकर साड़ी के पल्लू से पोंछा, और अपने ट्रंक की तरफ़ तेज़ी से बढ़ने लगीं, मन ही मन भगवान को भरपेट खाने के लिए धन्यवाद करती हुईं।

रेलगाड़ी धक-धक करती प्लेटफ़ार्म पर आई।

लक्ष्मी के लगभग सामने ही, गार्ड के डिब्बे के बगल में इन्टर क्लास का लगभग खाली ज़नाना डिब्बा आकर रुका।

बाकी गाड़ी ठसाठस भरी थी।

उन्होंने अपना भारी-भरकम शरीर हॉँफते हुए दरवाज़े से भीतर धकेला और खिड़की के बगल की एक सीट पर धम से बैठ गईं।

फिर साड़ी के कोने की गाँठ खोलकर दुअन्नी निकाली और कुली को विदा किया।

फिर अपना पान का डिब्बा खोला, उसमें से पत्ता निकाल कर चूना, कत्था लगाया और सुपारी रखकर उसे मुँह में भर लिया जिससे उनके दोनों गाल गेंद की तरह फूल गये।

फिर दोनों हाथों पर अपनी ठोड़ी टिका ली और आराम से प्लेटफ़ार्म का नज़ारा देखने लगीं।

गाड़ी के आने से सर मोहन लाल की मुद्रा में कोई फ़र्क नहीं पड़ा।

उन्होंने स्कॉच पीते हुए बैरे से कहा कि जब सामान फ़र्स्ट-क्लास के डिब्बे में रख दे, तब उन्हें बताये।

उत्तेजना, शोर-शराबा और जल्दबाज़ी बुरे पालन-पोषण के लक्षण होते हैं, और उनका पालन-पोषण बहुत ऊँचे स्तर पर हुआ था।

उन्हें हर काम चुस्त-दुरुस्त और शालीन ढंग से करना पसन्द था।

उन्होंने पाँच वर्ष विदेश में बिताये थे, जहाँ वह उच्च वर्ग के आचार-व्यवहार और नियमों को भली-भाँति सीख-समझ गये थे।

वह हिन्दी बहुत कम बोलते थे।

जब बोलते थे तब बहुत कम शब्दों का इस्तेमाल करते थे और वह भी अंग्रेज़ी का मुलम्मा चढ़ाकर।

उन्हें तो अंग्रेज़ी पसन्द थी, जो उन्होंने ऑक्सफोर्ड जैसे सर्वोत्तम विश्वविद्यालय में पढ़ी थी।

उन्हें बातचीत करना पसन्द था, और सुसंस्कृत अंग्रेजों की तरह किसी भी विषय पर बात कर सकते थे-किताबें, राजनीति, समाज, सभी पर।

वह अक्सर लोगों को अपने बारे में यह कहते सुनते थे-बिलकुल अंग्रेज़ों की तरह अंग्रेज़ी बोलते हैं।

सर मोहन लाल सोच रहे थे कि क्‍या वह सफ़र में अकेले होंगे ?

यह छावनी का इलाक़ा था और गाड़ी में कुछ अंग्रेज़ अफ़सर भी हो सकते हैं।

उन्हें खुशी हुई कि उनसे बात करने का अवसर मिलेगा वह दूसरे हिन्दुस्तानियों की तरह अंग्रेज़ों से बात करने की उतावली नहीं दिखाते थे।

न वह उनकी तरह ज़ोर से और आक्रामक ढंग से बोलते थे, न अपनी राय ज़ाहिर करते थे।

वह बिना कोई भाव व्यक्त किये अपना काम करते रहने के कायल थे।

वह कोने की सीट पर बैठ जाते और टाइम्स अखवार निकाल कर पढ़ना शुरू कर देते।

वह उसे इस ढंग से मोड़ते थे कि उसका शुरू कर देते खाई पड़ता रहता था।

वक्‍त काटने के लिए वह क्रॉसवर्ड पज़ल भरना टाइम्स नाम हमेशा दूसरों को आकृष्ट करता था।

जब वह उसे देखकर कुछ इस तरह रख देते कि अब मुझे ज़रूरत नहीं है, तो दूसरा उनसे उसे माँग सकता था। शायद कोई उनकी बैलियोल टाई भी पहचान सकता था, जिसे वह यात्रा करते कक कप पहने रहते थे।

इससे फिर बातचीत का एक सिलसिला शुरू हो जाता, जिसमें ऑक्सफोर्ड के कॉलेजों, मास्टरों, ट्यूटरों, नाव की दौड़ों, सबका विस्तार से ज़िक्र होता।

अगर टाइम्स और टाई दोनों का कोई असर न होता, तो वह 'कोई है ?” की आवाज़ लगाकर स्कॉच खुलवाते।

अंग्रेज़ों पर छिस्की का असर अवश्य होता था। इसके बाद सर मोहन लाल अपना सोने का डिब्बा निकालते जिसमें इंग्लिश सिगरेट भरी होती थीं। भारत में इंग्लिश सिगरेट ?

ये उन्हें कैसे मिलती हैं ? क्या वह सिगरेट औरों के साथ बाँट सकेंगे ?

परंतु क्या वह इस अंग्रेज़ व्यक्ति के माध्यम से अपने प्रिय पुराने इंग्लैंड से सम्पर्क कर सकेंगे ?

ऑक्सफोर्ड में बिताये पाँच वर्ष स्पोर्ट्स ब्लेज़र और मिक्स्ड डबल्स के सुनहरी दिन, 'इन्स ऑफ़ कोर्ट' में लिये गये डिनर और पिकेडिली की वेश्याओं के साथ बिताई गई रातें। सब मिलाकर पाँच गौरवशाली वर्ष!

यहाँ बिताये पूरे पैंतालीस वर्षों से कहीं ज़्यादा शानदार-इस गंदे मुल्क भारत में, जहाँ सफलता प्राप्त करने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता, जहाँ उन्हें अपनी मोटी पत्नी लक्ष्मी से, जिससे पसीने और कच्चे प्याज़ की बू आती है, कुछ ही मिनट में सहवास पूरा करके अलग होना पड़ता है।

सर मोहन लाल के विचारों में कुली के आने से बाधा पड़ी, जिसने घोषणा की कि उनका सामान इंजन के पास वाले फ़र्स्ट-क्लास डिब्बे में रख दिया गया है। सर मोहन लाल चहलकदमी करते हुए डिब्बे तक गये।

उन्हें आश्चर्य हुआ कि डिब्बा एकदम खाली था। ठंडी साँस लेकर वह खिड़की के बगल में बैठ गये और टाइम्स खोलकर, जिसे वह न जाने कितनी बार पढ़ चुके थे, अपने सामने कर लिया।

फिर उन्होंने खिड़की से बाहर प्लेटफ़ार्म पर झाँका। उनका चेहरा यह देखकर खिल उठा कि दो अंग्रेज़ सैनिक जगह की तलाश में डिब्बों में झाँकते इधर ही आ रहे हैं। उनके कन्धों पर यैले लदे थे और वे लड़खड़ाते हुए चल रहे थे। सर मोहन लाल ने उनका स्वागत करने का फ़ैसला किया, यद्यपि अपनी स्थिति के हिसाब से वे दूसरी श्रेणी में ही सफ़र कर सकते थे।

एक सैनिक उनके आखिरी डिब्बे तक आया और खिड़की में मुँह डालकर भीतर देखा। उसे खाली सीट दिखाई दी।

बिल.' उसने आवाज़ दी, "एक सीट है।' उसका साथी वहाँ आया, भीतर देखा, और सर मोहन लाल पर नज़र डाली।

इसे निकालो,' वह अपने साथी से बोला।

उन्होंने दरवाज़ा खोला और सर मोहन लाल की तरफ़ बढ़ें।

'रिज़र्व्दश' बिल चीखा।

'रिज़र्व्ड! आर्मी-फ़ौज।' जिम ने अपनी खाक़ी शर्ट की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।

"एकदम जाओ-गेट आउट।

"सुनो! सुनो! मेरी बात सुनो" सर मोहन लाल ने अपने ऑक्सफोर्ड के लहज़े में अंग्रेज़ी में विरोध करते हुए कहा।

सैनिक रुके। अंग्रेज़ी तो वह अंग्रेजों की तरह बोल रहा था...। इंजन ने सीटी दी और गार्ड ने हरी झंडी दिखाई।

उन्होंने सर मोहन लाल का सूटकेस उठाया और प्लेटफ़ार्म पर फेंक दिया। और साथ ही थरमस फ्लास्क, ब्रीफकेस, बिस्तर और टाइस्स भी फेंक दिये। सर मोहन लाल क्रोध से आग-बबूला हो उठे।

“यह क्‍या कर रहे हो ? क्‍या कर रहे हो ? वह गुस्से में आकर चिल्लाये ? 'मैं तुम्हें अरेस्ट करा दूँगा ? गार्ड, गार्ड...”

बिल और जिम फिर ठिठके। यह आदमी देखने में तो अंग्रेज़ नहीं था, बोल चाहे कैसे भी रहा हो।

“बकवास बन्द करो,' यह कह कर जिम ने उनके मुँह पर थप्पड़ रसीद किया।

गाड़ी ने एक और सीटी दी और पहिये आगे बढ़ने लगे। सैनिकों ने दोनों हाथों से उन्हें पकड़ा और गाड़ी से बाहर धकेल दिया। वह बिस्तर से टकराये और सूटकेस पर जा गिरे।

सर मोहन लाल के पैर जैसे ज़मीन से चिपक गये हों और उनकी ज़बान- बन्द हो गई। वह अपने सामने से धीरे-धीरे गुज़रती खिड़कियों की रोशनी देखते रहे। आखिरी डिब्बे में गार्ड हरी बत्ती हाथ में उठाये खड़ा था।

इन्टर क्लास के ज़नाने डिब्बे में लक्ष्मी आराम से मुँह फुलाये पान चबा रही थी...उसकी नाक में हीरे की नथ चमक रही थी।

उसके मुँह में पान से भरा थूक जमा था जिसे वह मौका मिलते ही बाहर फेंकने की तैयारी कर रही थी।

गाड़ी प्लेटफ़ार्म से आगे बढ़ी। उसने अपने मुँह से पिच्च से लाल पीक को फुहारे की तरह बाहर फेंका।

ईश्वर की आवाज़

भम्बा कलौं और भम्बा खुर्द दो छोटे से गाँव हैं, जिनके बीच आधे मील से ज़्यादा की दूरी नहीं है और सच्चाई यह भी है कि दोनों के बीच बिखरी हुई घास-फूस और मिट्टी की झोपड़ियाँ,

सैयद बुल्ले शाह की मज़ार और मिशन स्कूल एक-दूसरे को इस तरह जोड़ भी देते हैं कि दोनों गाँवों को भम्बा ही कहा जाने लगा है।

गाँव में ज्यादातर सिख किसान ही बसते हैं जो सारी ज़मीन के मालिक भी हैं।

मुसलमान लोग इन सिख मालिकों की ज़मीन जोतते हैं, या कुम्हार और बुनकर के रूप में रोज़ी-रोटी कमाते हैं।

कुछ ईसाई भी हैं जो गाँव के सिरे पर टूटी-फूटी ईश्वर की झोंपड़ियों में रहते हैं और सफ़ाई वगैरह के काम करते हैं।

इनके अलावा हिन्दू दुकानदार हैं-जो आवाज़ तेल, साबुन, नमक, मसाले, कपड़े, कैंची, शीशे और जापानी खिलौने बेचते हैं।

भम्बा में कोई महत्त्वपूर्ण बात कभी नहीं होती।

साल में एक बार सैयद बुल्ले शाह की मज़ार पर मेला लगता है-जिसमें पड़ोसी गाँवों के लोग-मुसलमान, हिन्दू और सिख सब-बड़ी तादाद में आते हैं।

उनकी औरतें मज़ार पर चीज़ें चढ़ाकर मन्नत माँगती हैं कि उनकी कोख में बच्चा आये।

साल में एक दफ़ा यहाँ के सिख कंधे पर लम्बी तलवार बाँधकर अमृतसर जाते हैं।

इनके अलावा कभी-कभी गाँव में पुलिस आती है, जिससे लोगों में उत्तेजना पैदा होती है।

किसी ने शराब के नशे में दूसरे की गर्दन उड़ा दी; कोई किसी की औरत या बेटी को लेकर भाग गया, या किसी ने गैर-कानूनी ढंग से शराब बनाई-तो पुलिस का चक्कर लगता है।

लेकिन कभी-कभी किसी ने कुछ नहीं किया, तो भी पुलिस अवैध शराब पीने और अंडा-मुर्गी खाने आ जाती है।

जो लोग उनका स्वागत-सत्कार नहीं करते, उनके घरों से पुलिस हथियार, शराब या अफ़ीम बरामद करके उन्हें जेल में डाल देती है-इस तरह वे स्वागत करना सीख जाते हैं।

इन बातों के अलावा भम्बा में कभी कोई परिवर्तन नज़र नहीं आता।

सवेरे घरों के मर्द खेतों पर काम करने चले जाते हैं, लड़के पशुओं को चराने ले जाते हैं और औरतें धान कूटती, खाना पकाती या सूत कातती हैं।

दोपहर के बाद सब आराम करते हैं।

आटे की मिल चलने लगती है। इसमें डीज़ल का इंजन लगा है, जिसका धुआँ छत पर खड़े पाइप से आसमान में निकलता है।

पाइप के सिरे पर एक मिट्टी का घड़ा लगा है जिससे धुआँ निकलते समय धक-धक की तेज़ आवाज़ें होती हैं-जो मीलों दूर तक सुनाई पड़ती हैं।

इस पार्श्व संगीत के साये में लोग आराम और गप-शप करते हैं।

बसंत की एक शाम भम्बा के लोग सूरज की हल्की गर्मी में छोटे-छोटे दल बनाये बेमतलब की बातें करने में लगे थे।

ज़मीन पर उकड़ँ बैठे, मिट्टी की दीवारों को निहारते वे मिल की धक-धक भी सुनने में लगे थे।

उनसे कुछ दूर औरतें अपनी खाटों पर बैठीं एक-दूसरे की खोपड़ियों में घी की मालिश करने में लगी थीं। फ़तल बहुत अच्छी होने जा रही थी और दूर-दूर तक फैले हरी-पीली सरसों के खेत शान्ति और समृद्धि का सन्देश दे रहे थे।

अचानक सारा गाँव हरकत में आ गया। बच्चे गलियों में शोर मचाते दौड़ने लगे।

एक मोटरगाड़ी धूल उड़ाती रास्ते पर आई और गाँव के बीचोंबीच आकर रुक गई।

यह भूरे रंग की स्टेशन वैगन थी और उसमें पाँच-छह लोग बैठे थे।

गाड़ी ज़ोर-ज़ोर से भोंपू बजाती आई जो बच्चों को बहुत अच्छा लग रहा था।

वे उसके पीछे दौड़े और पीछे के बंपर पर चढ़ने लगे। गाँव भर के कुत्ते भी इकट्ठे हो गये और गाड़ी के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते भूकने लगे।

गाड़ी जब बड़ी चौपाल पर पहुँचकर रुकी, तब इतनी धूल उड़ी कि सारा आसमान उससे भर गया।

थोड़ी देर बाद जब धूल थमी तब गाड़ी में बैठे लोग नाक पर रूमाल लगाये बाहर निकले।

सबसे आगे था अंग्रेज़ डिप्टी कमिश्नर मिस्टर फोर्साइथ, छोटे क़द का मोटा-सा आदमी जिसके सिर पर सोला टोप लगा था-उसकी पट्टी साहब की ठोड़ी से कसकर बँधी थी।

उसके साथ थे दो सिपाही, गाड़ी का ड्राइवर और सरदार गंडा सिंह, ऑनरेरी मजिस्ट्रेट, जो बड़ा ज़मींदार भी था और बगल के गाँव गंडा सिंह वाला का मालिक था।

इन्हें देखकर गाँव के ज़ैलदार और तीनों लम्बरदार भीड़ से निकलकर बाहर आये और अंग्रेज़ अफ़सर के सामने लम्बे-लम्बे सलाम बजाने लगे।

साहब भम्बा में पहले कभी नहीं आया था। क्या वजह थी कि यह ग़रीब परवर, शाहों का शहंशाह, दयानतदार अंग्रेज आज यहाँ आया था ?

डिप्टी कमिश्नर मुस्कुराया और जैलदार के घर की तरफ़ चला वहाँ पहुँचकर वह बेंत की बनी एक खुली हुई कुर्सी पर बैठा, और उसका साथी, सरदार गंडा सिंह, उसी के बगल में रखी एक लोहे की कुर्सी पर जमकर बैठ गया। गाँववाले चारों तरफ़ आकर खड़े हो गये और उनके आने पर खुशी ज़ाहिर करने लगें।

फो्सइथ ने सोला टोप उतारा जिसके नीचे उसकी गंजी गुलाबी खोपड़ी चमकने लगी।

फिर उसने रूमाल निकालकर माथे का पसीना पोंछा और हाव-भाव से यह ज़ाहिर किया कि वह कुछ कहना चाहता है।

शान्ति छा गई। लेकिन वह पसीना पोंछने में ही लगा रहा, जिससे लोगों की उत्सुकता बढ़ने लगी। फिर उसने गंडा सिंह का ज़ोरदार शब्दों में परिचय दिया।

दरअसल गंडा सिंह को परिचय की ज़रूरत ही नहीं थी।

जिले का हर आदमी उसे जानता था। वह अंग्रेज़ सरकार की मदद करता था जिसके बदले में उसे ज़मीनें, उपाधियाँ और मजिस्ट्रेसी प्राप्त हुई थी।

वह ठगों का जाना-माना सरदार था। उसके लोग निडर होकर डाके मारते और लूटी हुई रकम से पुलिस को हिस्सा देते थे।

उसकी शराब बनाने की मशीनें खुलेआम काम करतीं और आबकारी के कर्मचारी भी गोबर के बड़े-बड़े ढेलों में सड़ाकर और भपकों में पकाकर बनाई जाने वाली तरह-तरह की शराब का मुफ्त स्वाद लेते। गंडा सिंह इस मामले में कंजूसी नहीं करता था।

शराबों के साथ खाना भी होता था। कुछ खास लोगों को वह लड़कियाँ भी देता था जो इस तरह कुमारी और अजान बनाकर पेश की जातीं, जिनसे वासना एकदम जाग उठती थी।

गंडा सिंह से जिले का हर आदमी नफ़रत करता था और वह यह जानता भी था।

वह जहाँ भी जाता, दो हथियारबन्द सिपाही उसके साथ रहते।

उसके गले में काले चमड़ें की एक पट्टी नीचे कमर तक लटकी रहती थी जिसमें कारतूस खुसे होते थे और नीचे जुड़ी एक थैली में गोलियों से भरा रिवॉल्वर बन्द रहता था। ज़िले का हर आदमी उसे जानता था।

उसकी तुर्रेदार पगड़ी का एक सिरा उसके सिर के ऊपर चिड़िया की कलगी की तरह खड़ा होता और दूसरा गर्दन के पीछे लटकता नज़र आता था।

उसकी आँखों में सुर्मां चमकता होता, करीने से कतरी और तेल से चुपड़ी काली दाढ़ी उसकी वासना की स्पष्ट सूचना देती थीं। वह खासा लम्बा और मोटा था।

वह सफ़ेद रंग की लम्बी कमीज़ पहने था जिसके नीचे बड़ा-सा पंजाबी पाजामा और उसमें बँधा नीलीं सिल्क का नाड़ा बाहर से साफ़ दिखाई देता

था। पैरों में काले रंग के पंप शू थे जों चलने पर चर्र-चर्र की आवाज़ करते थे।

फोसईइथ ने गंडा सिंह की प्रशंसा की और कहा कि ज़िला उस पर गर्व करता है।

उसे यह जानकर अच्छा लगा कि गंडा सिंह पंजाब एसेम्बली के लिए चुनाव लड़ना चाहता है। उसने कहा कि सिख नेताओं ने उसे इस पद के उपयुक्त माना है और सरकार भी उसका समर्थन करती हैं।

यह सुनते ही लोगों की आपस में खुसर-फुसर शुरू हो गई, लेकिन फोसईइिथ ने कोई ध्यान नहीं दिया। उसने भीड़ को जैसे एक तरफ़ करके जैलदार और लम्बरदारों के साथ लगान वगैरह की बात शुरू कर दी।

फोर्साइथ एक लम्बरदार से बातें करने में लगा था, तब गंडा सिंह दो लम्बरदारों को कन्धे पर हाथ डालकर अलग ले गया।

उसने कहा कि साहब उस पर बहुत मेहरबान हैं और लम्बरदार जो भी चाहेंगे, उनके लिए करेंगे। एक लम्बरदार को बन्दूक का लायसेंस चाहिये था। दूसरे का नाम, सेशन्स कोर्ट में अहलकारी के लिए भेजा गया था, जो उसे दे दिया जाता।

तीसरे का भतीजा आबकारी कानून के तहत पकड़ा गया था और उस पर मुक़दमा चल रहा था।

कया साहब मजिस्ट्रेट को यह इशारा कर देंगे कि यह उनका अपना आदमी है। गंडा सिंह ने ये सब बातें अपनी डायरी में नोट कर लीं और उनसे वादा लिया कि उसके पक्ष में सौ फ़ीसदी मतदान होना चाहिये।

उसने कहा कि यह सिख किसानों की इज़्ज़त का सवाल है। इसके अलावा उसकी अपनी उपजाति वही है जो यहाँ के और सिखों की है।

उसका विरोधी उम्मीदवार, जो राष्ट्रवादी है, वह किसान भी नहीं है। वह शहर में रहता है और पेशे से वकील है।

किसान दल का उम्मीदवार भी उन्हीं का है पर उसका कोई धर्म ही नहीं है। इसके अलावा सरकार हमेशा उसके खिलाफ़ रही है और सुरक्षा कारणों से कई दफ़ा उसे जेल भी भेज चुकी है।

फोर्साइथ और गंडा सिंह का दल शाम को वापस लौट गया।

उनकी भम्बा गाँव की यात्रा यहाँ के शान्त जल में पत्थर फेंकने की तरह थी जिसकी लहरें कई दिन तक उठती-गिरती रहीं। भम्बा की शान्ति काफ़ी समय के लिए भंग हो गई थी।

दूसरे दिन गाँववाले फिर उसी तरह चौपालों में बैठे मिल के इंजन की कू-कू सुनते हुए फोर्साइथ साहब की बातें कर रहे थे, उन्हें बच्चों का शोर और कुत्तों _ के भृंकने की आवाज़ें सुनाई देने लगीं। इस दफ़ा एक पीले रंग की लॉरी प्रकट हुई जिसकी छत पर लाउडस्पीकर लगा था। नीचे मडगार्ड के दोनों तरफ़ मोटे-मोटे बाँस लगे थे। जिन पर नेशनलिस्ट पार्टी के झण्डे लहरा रहे थे।

लॉरी गाँव के बीचोंबीच आकर खड़ी हो गई। चारों तरफ़ उड़ती धूल धीरे-धीरे धरमी और भीतर बैठे लोग बाहर निकलने लगे, तभी लाउडस्पीकर में आवाज़ आनी शुरू हो गई। एक आदमी ने खासकर कहना शुरू कियां-

'भम्बा के लोगो, आपको पता है कि एसेम्बली के चुनाव होने वाले हैं? चुनावों में आपका कर्तव्य क्या है, यह आपको पता है? अपना वोट नेशनलिस्ट उम्मीदवार एडवोकेट करतार सिंह को दीजिए।'

इसके बाद वह कुछ देर के लिए रुका। फिर उसने ज़ोर से करतार सिंह का नाम लिया और दर्जन भर आवाज़ों ने नारा लगाया-'ज़िन्दाबाद।' ये नारे कई दफ़ा इतने ज़ोर-शोर से लगाये गये कि कुत्ते अपनी पूँछें पैरों के बीच दबाकर वहाँ से खिसक गये।

अब करतार सिंह सामने की सीट से उठकर बाहर आया।

पीछे की सीटों पर बैठे दर्जन भर लड़के सफ़ेद गाँधी टोपियाँ और खादी के कुर्ते-धोतियाँ पहने बाहर निकले। उनके हाथों में पोस्टरों के बंडल थे।

करतार सिंह भम्बा गाँव पहली दफ़ा आया था लेकिन कुछ गाँववाले उसे जानते थे। उन्होंने ज़बर्दस्त फीसें देकर उससे अपने फ़ौजदारी मुकदमों की पैरवी कराई थी। लेकिन उनके लिए भी इस समय उसे पहचान पाना मुश्किल हो रहा था।

उन्होंने उसे पहले काले कोट और को पैंट में देखा था, लेकिन अब वह लम्बी कमीज़ और सलवार पहने था।

करतार सिंह और उसका एक काला, मोटा-सा, उसी जैसे कपड़े पहने साथी तेज़ी से ज़ैलदार के घर की तरफ़ चले और दूसरे लोगों ने गाँव में पोस्टर लगाने शुरू कर दिये। ज़ैलदार के घर का दरवाज़ा बन्द था और वह कहीं भी नज़र नहीं आ रहा था।

गाँववालों ने कहा कि जब लॉरी यहाँ आई, तब वह यहीं था और शायद मेहमानों की ख़ातिर की तैयारी करने गया होगा।

तभी घर के भीतर से ज़ैलदार का छोटा बेटा निकलकर आया और कहने लगा कि उसके पिता शौच को गये हैं।

गाँववाले यह सुनकर मुस्कुराये और लॉरी के इर्द-गिर्द आकर खड़े हो गये करतार सिंह और उसका साथी लॉरी की छत पर चढ़ गये और माइक्रोफ़ोन उन्हें पकड़ा दिया गया।

करतार सिंह ने अपने साथी का परिचय कराया कि उनका नाम सेठ सुखटनकर है।

वे नेशनलिस्ट पार्टी के मशहूर नेता हैं और पंजाब एसेम्बली में निर्विरोध चुनकर आये थे। बड़े पैसेवाले और करोड़पति हैं। कई कपड़ा मिलों के मालिक हैं। इन्होंने विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के दिनों में यह सम्पत्ति अर्जित की। लड़ाई के पाँच

सालों में इनकी दौलत में बेहद बढ़त हुई है।

इनकों सरकार से कोई सहानुभूति नहीं थी इसलिए इन्होंने खुले मन से काला-बाज़ारी का लेन-देन किया।

लोग भूखों मर रहे थे और उनके बदन पर कपड़ा नहीं था, लेकिन आपने गल्ले के बोरों पर बोरे गोदामों में छिपा लिये

फिर ये सब भारी दामों पर बेचे | आप अंग्रेज़ों के ज़बर्दस्त विरोधी हैं। आप चाहते हैं कि सब हिन्दुस्तानी एक हो जायें। करतार सिंह के भाषण का खास मुद्दा यह था कि अगर चालीस करोड़ हिन्दुस्तानी थूक भी दें, तो उससे ही इतना बड़ा तालाब बन जायेगा जिसमें यहाँ रह रहे सारे अंग्रेज़ डूबकर मर जायेंगे।

लेकिन पता नहीं क्‍यों, यह करने की स्थिति बन नहीं पा रही। सेठ साहब समाजवाद के भी घोर विरोधी हैं। समाजवादी देशद्रोही हैं। उन्होंने इनकी मिलों में हड़तालें करवाई, और वह भी उस वक्त जब ये सारी विदेशी चीज़ों को भारत से निकालकर उनकी जगह सस्ती, देसी चीज़ों से भर देते | ये लोग विदेशियों के एजेंट हैं।

इसके बाद करतार सिंह ने अपने बारे में बोलना शुरू किया।

वे गंडा सिंह को अच्छी तरह जानते हैं।

जो आदमी शराब पीता है और अपनी दाढ़ी कतरता है, उसे किसी को वोट नहीं देना चाहिये

उसने किसान पार्टी के खिलाफ़ भी प्रचार किया और कहा कि जिन लोगों का कोई धर्म और नियम नहीं है और जो सबकी दौलत में हिस्सा बँटाना चाहते हैं, जिसमें औरतें बाँटना भी शामिल है, उनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।

सेठ सुखटनकर की पार्टी जैसे आई थी, उसी तरह धूल के बादल उड़ाती और करतार सिंह के लिए “ज़िन्दाबाद' के नारे लगाती वापस चली गई।

अब हर रोज़ भम्बा में लोग भाषण देने के लिए आने लगे। गंडा सिंह की प्राइवेट ज़िन्दगी अब प्राइवेट नहीं रही। 'लेकिन इससे क्‍या हुआ, गंडा सिंह के समर्थक कहते “वह किसान है और कौन किसान नहीं पीता

वह शहर में वकील था और हिन्दू व्यापारी उसके पीछे थे। सेठ सुखटनकर ने भी तो लम्बरदारों से यही कहा है कि अगर वे उनकी पार्टी का समर्थन करेंगे, तो उन्हें पैसा दिया जायेगा। यह लॉरी, पोस्टर और लाउड-स्पीकर का पैसा आखिर कहाँ से आता है? करतार सिंह को तो वकालत से ज़्यादा मिलता ही नहीं है।

इन दोनों की आपसी तूूतू मैं-मैं के बावजूद गाँववालों ने तय किया कि किसान पार्टी को वोट नहीं दिया जायेगा। लेकिन किसान दल का कोई नेता अभी तक भम्बा प्रचार करने आया ही नहीं था और गाँववाले भगवान को ना मानने वाले और अनैतिक देशद्रोहियों को देखने का बेसब्री से इन्तज़ार कर रहे थे।

फिर बसंत की एक शाम को, इस मौसम की और दूसरी शामों की तरह गाँववाले बेमतलब की बातें करते हुए धूप खा रहे थे, किसान नेता भी आ गया।

गाँव के लड़कों ने या कुत्तों ने शोर मचाकर और भौंककर उसका स्वागत नहीं किया, क्योंकि किसी ने उसे देखा ही नहीं। वह सफ़ेद कपड़े पहने उसी तरह सफ़ेद टटटूटू पर सवार वहाँ आ पहुँचा, उसकी लम्बी दाठी नीचे सीने तक लटक रही थी। उसका नाम था बाबा राम सिंह। भम्बा के हर आदमी ने उसके बारे में सुना था। किसान आन्दोलनों में उसे कई बार गिरफ़्तार किया गया था और कई दफ़ा उसने जेल भी काटी थी।

उसकी सब सम्पत्ति ज़ब्त कर ली गई थी और अब उसके पास अपना घर भी नहीं था, हालाँकि किसानों के सारे घर उसके लिए हमेशा खुले रहते थे।

वह जहाँ भी जाता, लोग उसके पैर छूते और औरतें बच्चों को लातीं जिन्हें वह आशीर्वाद देता था।

उसकी उम्र और दया के कारण लोग उसे 'बाबाजी' कहते थे गाँववाले राम सिंह के इर्द-गिर्द आकर इकट्ठे हो गये और उसके धूल भरे जूतों को चूमने लगे। बाबाजी आज भम्बा क्यों आये हैं ?

उसने बताया कि वह एसेम्बली के चुनाव में खड़ा हो रहा है।

लोगों ने इस पर प्रसन्नता ज़ाहिर की। फिर एक गाँववाले ने उससे पूछा-राष्ट्रवादी दो उम्मीदवार तो खड़े नहीं कर सकते ? करतार सिंह वकील ने उन्हें बताया है कि इस पार्टी का वह उम्मीदवार है। बाबा का जवाब सुनकर सब दंग रह गये। उसने कहा, मैं किसान पार्टी से हूँ।

किसान ?

लेकिन वह तो भगवान का भक्त था। जिसने अपनी सारी ज़िन्दगी किसानों की सेवा में बिताई थी। और देशद्रोही ? यह कैसे, क्योंकि सरकार ने उसे बीस बरस जेल में रखा था और उसका घरबार सब ज़ब्त कर लिया था। अनैतिक ? यह भी कैसे, क्‍यों वह तो सिख गुरु जैसा था। न वह शराब पीता था, न दाढ़ी काटता था।

बाबा राम सिंह ज़्यादा देर नहीं रुका। वह वोट इसलिए चाहता था क्योंकि वह विदेशियों को इस देश से भगायेगा और ज़मीदारों से उनकी रक्षा करेगा।

वह पुलिस के अत्याचारों और भ्रष्ट शासन के खिलाफ़ लड़ेगा।

उसने अपने विरोधी उम्मीदवारों का नाम तक नहीं लिया।

के उसके बाद कोई और किसान भम्बा नहीं आया। बाबा भी दोबारा नहीं आया। वह अकेला ही गाँव-गाँव घूमता था और उसकी शान्तिपूर्ण यात्राओं के सामने फोसइथ सरकार के गुर्गे और सेठ सुखटनकर का पैसा आँधी में रुई के टुकड़ों की तरह उड़ जाते थे।

चुनाव के लिए वोट पड़ने के एक दिन पहले उसे भड़काऊ भाषण देने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया।

और पड़ोसी गाँवों की तरह भम्बा में भी मतदान हुआ | सेठ सुखटनकर की लॉरियों में से गंदे-शंदे कपड़े पहने और गंडा सिंह की शराब पीकर लड़खड़ाते सिख बाहर निकले। वे जानते थे कि उन्हें किसे वोट डालना है। हज़ारों आदमी भीतर गये और अशिक्षित होने के कारण अपने उम्मीदवार का नाम बताकर पैदल घर चले आये, क्‍योंकि अब न सेठ की लॉरियाँ उन्हें वापस ले जाने के लिए कहीं थीं और न गंडा सिंह की शराब और ज़्यादा मौज-मस्ती के लिए।

दस दिन बाद फोरसइथ के दफ़्तर में वोटों की गिनती की गई। उसके सामने गंडा सिंह और करतार सिंह के समर्थक भीड़ लगाये नारेबाज़ी कर रहे थे। बाबा राम सिंह का कोई नाम भी नहीं ले रहा था।। बजे फोसईइिथ की तगड़ी शक्ल सीढ़ियों पर नमूदार हुई। वह मुस्कुरा रहा था। उसने नतीजे की घोषणा की।

1. सरदार गंडा सिंह, ऑनरेरी मजिस्ट्रेट - 11,560 वोट

2. सरदार करतार सिंह, एडवोकेट - 8,340 वोट

3. बाबा राम सिंह - 760 वोट

आखिरी उम्मीदवार की ज़मानत ज़ब्त हो गई। जनता ने फैसला कर दिया धा। जनता की आवाज़ ईश्वर की आवाज़ कही जाती है।

कुसुम

कुसुम कुमारी बहुत अच्छी लड़की थी-बहुत ही अच्छी। उसे अच्छा बनने की कोशिश नहीं करनी पड़ती थी। दरअसल, अच्छा होना उसके लिए ज़रूरी था।

उसकी उम्र अट्टारह वर्ष थी, पर लगती वह अट्टाईस की थी और उसका व्यवहार चालीस साल की औरत जैसा था।

कद छोटा और कुछ मोटी भी। काला, लम्बोतरा चेहरा, जिस पर चारों तरफ़ चेचक के दाग थे।

मोटी, नीचे बैठी नाक पर सुनहरी कमानी का चश्मा, जिसके भारी शीशों के भीतर से उसकी आँखें बेतहाशा फैली दिखाई देती थीं।

सिर पर बाल काफ़ी कम, कई चकत्तों में इधर-उधर ह बिखरे।

इनमें वह इतना ज़्यादा तेल चुपड़ती कि बाल खोपड़ी से चिपके रहते थे।

पीछे बालों की कसी कुसुम हुई पट्टियाँ, माथे पर उतरकर आँखों की भौंहों को घेर लेती थीं।

जहाँ तक उसकी काया का सवाल है, वह इतनी भरी-पूरी लगती थी कि पेट, छातियाँ और पीठ कुछ भी अलग नज़र नहीं आता था।

कुल मिलाकर उसका शरीर काफ़ी चौड़ा-चकला था, जिसे वह सफ़ेद साड़ी से ढके रहती थी।

इन सब कमियों की पूर्ति कुसुम अच्छा और कुशल बनकर करती थी। वह डटकर मेहनत करती और हर परीक्षा में सबसे आगे रहती थी।

उसका चश्मा और शरीर इस बात का गवाह था कि किताबों में वह कितना समय बिताती है।

उसे अनेक विषयों में प्रथम श्रेणी प्राप्त हुई थी। उसके माता-पिता को कभी उससे कोई शिकायत नहीं हुई। सवेरे वक्‍त पर उठती और साइकिल से कॉलेज जाती। शाम को समय से घर लौट आती। कहीं और नहीं जाती थी।

वह किसी को परेशान नहीं करती थी, न कोई और उसे परेशान करता था।

कुसुम के लिए आधुनिक फैशन बेकार थे और न उसे लड़कों के प्रति कोई आकर्षण था।

सेक्स से उसका कोई वास्ता नहीं था।

न उसे पाउडर-बिन्दी और मेकअप में कोई रुचि थी।

वह मानती थी कि ईश्वर ने जिसे जो रूप-रंग दिया है, उससे उसे सन्तुष्ट रहना चाहिये, भले ही चेहरे पर चेचक के दाग़ भर दिये हों।

दया-धर्म में उसका गहरा विश्वास था।

हरेक को काम करना चाहिये और नियमों का पालन करना चाहिये।

वह मानती थी कि स्त्री का स्थान रसोईधर में है।

लड़कियों को कभी अपना सिर खोलकर (उघाड़कर) नहीं चलना चाहिये। बूढ़े स्त्री-पुरुष उसे पसन्द करते थे, युवक उस पर ध्यान नहीं देते थे।

निर्दय प्रकृति ने उस पर जो ज़्यादतियाँ की थीं, उन्हें उसने स्वीकार कर लिया था।

कुसुम की उनन्‍नीसवीं सालगिरह पर कुछ लड़कियों ने उसे लिपस्टिक और रूज़ का डिब्बा भेंट में दिया।

उसे लगा कि यह उसका अपमान किया गया है। उसने उन्हें दराज़ के एक कोने में छिपाकर रख दिया और सबसे कहा कि उसने इन्हें फेंक दिया है।

उसने अपना शीशा भी दीवार की तरफ़ पलट दिया और फैसला किया कि अब वह कभी अपना मुँह नहीं देखेगी।

कुसुम शायद ही कभी हँसती हो।

उन्‍नीसवीं सालगिरह के बाद उसने मुस्कुराना भी बन्द कर दिया।

उसने गम्भीरता अख्तियार कर ली, एकदम कठोर किस्म की गम्भीरता।

वह जानती थी कि इससे वह और भी ज़्यादा बदसूरत लगेगी, लेकिन उसके लिए यही ठीक था।

फिर चूँकि कोई भी पुरुष उसकी तरफ़ कभी ध्यान नहीं देता था इसलिए सुन्दर दिखने का कोई अर्थ भी नहीं था और चूँकि वह बदसूरत लगती थी इसलिए कोई उस पर ध्यान देना ज़रूरी नहीं समझता था।

अप्रैल के अन्त में डिग्री लेने के बाद कुसुम का यूनिवर्सिटी जीवन समाप्त हो गया।

दूसरी लड़कियाँ आज़ाद होकर मौज-मस्ती करने में लग गईं।

कोई उससे बात करने नहीं आई और कुसुम भी अपनी साइकिल लेकर घर आ गई और रोज़मर्रा के काम-काज में लग गई। दूसरी लड़कियों के सामने शादी की हलचलें तेज़ होने लगीं।

लेकिन कुसुम के सामने ऐसा कुछ नहीं था-सिवाय उसकी मेज़ के जिस पर कोर्स की किताबें रखी थीं और बगल में शीशा रखा था।

कुसुम साइकिल पर सवार घर लौट रही थी।

उसका दिमाग़ एकदम खाली था।

सारी सड़क पर वह अकेली थी और कुछ सोचना उसके लिए ज़रूरी भी नहीं था।

वह गलत दिशा से सड़क पार करने लगी और सँभलने की कोशिश करते-करते एक फेरीवाले से टकरा गई।

यह लड़का-सा था और सिर पर रखे संतरे बेच रहा था। कुसुम पहले उसके ऊपर गिरी, फिर सड़क पर आगे लुढ़क गई। उसका चश्मा चकनाचूर हो गया था। साइकिल एक किनारे गिर गई।

फेरीवाला ज़रा-सा हिलकर रह गया लेकिन उसे चोट नहीं लगी।

उसकी संतरों की डलिया भी सही-सलामत धी।

वह कुसुम की तरफ़ देखकर मुस्क॒राया।

“मिस साब, आपको सड़क पर सही तरफ़ से चलना चाहिये।

कुसुम को गुस्सा आ रहा था, अब फेरीवाले के रुख ने उसे और क्रोधित कर दिया। उसने चीखकर कहा-'तुम अंधे हो क्या ? किधर जा रहे हो, यह दिखाई नहीं देता ?'

फेरीवाले ने चारों तरफ़ नज़र डाली। कहीं कोई नहीं था। उसकी मुस्कुराहट शैतानियत में बदलने लगी।

"नहीं, मिस साब, मैं अंधा नहीं हूँ। हाँ, आँख एक ही है।'

यह कहकर उसने एक आँख बन्द करके दूसरी से उसे ध्यान से देखा और चुम्मा लेने की ज़ोरदार आवाज़ मारी।

कुसुम का चेहरा लाल पड़ गया। गुस्से से वह भभकने लगी। उसने साइकिल सँभालकर उठाई और उस पर तेज़ी से चढ़ी फेरीवाले की तरफ़ मुँह करके बोली, 'सुअर...गधे।'

फेरीवाले ने इसका बुरा नहीं माना। वह इसका मज़ा ले रहा था।

“गधा ? उसने सवाल किया और उसकी तरफ़ देखकर दूसरी आँख मारी। “आपने गधा देखा है ?

यह कहकर उसने अपना दायाँ हाथ उठाया और बायें हाथ से उसे पकड़कर तेज़ी से घुमाने लगा। कुसुम भयभीत हो उठी-उसका ऐसे किसी आदमी से अभी तक साबिका नहीं पड़ा था। वह तेज़ी से घपर आई और अपने कमरे में घुसकर तकिये के नीचे सिर दबाकर लेट गई।

इस तरह कई घंटे वहीं पड़े-पड़े बहुत कुछ सोचती रही। उसका गुस्सा तो काफ़ूर हो गया, लेकिन फेरीवाले के हाव-भाव और मुस्कुराकर आँख मारना उसके दिमाग में जमकर बैठ गया। उसके साथ आज तक किसी ने ऐसा कुछ कभी नहीं किया था। क्‍या इस लड़के को वह आकर्षक लगी ?

सूरज डूब गया, चाँद निकल आया और उसकी हल्की पीली रोशनी कमरे में भीतर आकर उसकी चारपाई पर पड़ने लगी। वह उस फेरीवाले के बारे में ही सोचे जा रही थी-अब उसका भाव कोमल था और उसमें हल्का पछतावा भी था। “यही बात है”, उसने अपने से कहा, “यही बात है।'

अब वह उठी और मेज़ की दराज़ खोलकर उसके कोने में छिपाकर रखी लिपस्टिक और रूज़ का डिब्बा निकाला। डिब्बा खोलकर रूज़ अपने गालों पर धीरे-धीरे लगाई।

फिर शीशे को अपनी तरफ़ मोड़ा और लिपस्टिक लगाने के लिए अपने होंठ दबाकर आगे किये। अपने बाल खोले और झटका देकर उन्हें ढीला करने की कोशिश की।

बाल उसके कंधों पर इधर-उधर बिखर गये। गमले में से एक फूल निकाला और जूड़े में लगा लिया। फिर एक कदम पीछे हटकर शीशे में अपना मुआयना करने लगी।

'शीशे, मेरे शीशे, मुझे देखो और बताओ,

हम दोनों में से कौन ज़्यादा खूबसूरत है ?'

शीशे में देखते हुए बालों में फूल लगाये काली आँखों वाली एक सुन्दर सी लड़की उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रही थी-'मैं ही हूँ-और कौन ?

विष्णु का तिलक

यहः काले नाग के लिए है,' गंगा राम ने कटोरी में दूध डालते हुए कहा। 'हर रात मैं यहाँ इस छेद के पास इसे रख जाता हूँ और सवेरे यह खत्म हुआ मिलता है।

बिल्ली पी जाती होगी,” बच्चों ने कहा।

“बिल्ली! गंगा राम ने चिढ़ते हुए कहा।

“बिल्ली तो इस छेद के पास आती ही नहीं।

यहाँ काले नाग की बाँबी है।

जब तक मैं उसे दूध पिलाता हूँ, वह घर में किसी को काटेगा नहीं।

तुम लोग नंगे पैर कहीं भी आ-जा सकते हो या खेल-कूद सकते हो।'

लेकिन हमें गंगा राम की यह बात समझ क नहीं बई।

विष्णु का 'तुम तो बेवकूफ ब्राह्मण हो,' मैं बोला।

जानते नहीं कि साँप दूध नहीं पीते ? और भर तिलक कटोरा दूध तो कोई पी भी नहीं सकता।

टीचर ; ने हमें बताया था कि साँप कई दिन में सिर्फ़ एक बार खाता है।

हमने एक साँप घास में देखा था जो एक मेंढक खा रहा था।

वह उसके गले में गुब्बारे की तरह फूल रहा था और उसे पूरी तरह खाने में उसे कई दिन लगे थे।

हमारी लैब में स्पिरिट में बन्द ऐसे दर्जनों साँप हैं और पिछले महीने हमारे टीचर ने एक सपेरे से ऐसा साँप खरीदा था जिसके दो सिर थे और जो दोनों तरफ़ दौड़ सकता था।

दूसरा सिर पूँछ से लगा था, जिसमें दो आँखें भी थीं और जब उसे जार में रखा गया, तब तो तमाशा देखने लायक था।

लैब में कोई खाली जार नहीं था, इसलिए टीचर ने उसे उस जार में रख दिया जिसमें पहले से एक साँप बन्द था।

उसने चिमटी से कस कर साँप को पकड़ा और जार में डालकर उसका ढकक्‍कन एकदम बन्द कर दिया।

फिर तो उसमें तूफ़ान ही आ गया और साँप घूम-घूमकर पहले वाले साँप को मारता और उसे तब तक खाता रहा, जब तक वह पूरी तरह खत्म नहीं हो गया।

यह सुनकर गंगा राम ने डर कर आँखें बन्द कर लीं और बड़बड़ान लगा तुम्हें इसका दंड भुगतना पड़ेगा, किसी-न-किसी दिन ज़रूर

गंगा राम से बहस करना बेमानी था।

सब धर्म को मानने वाले हिन्दुओं की तरह वह भी ब्रह्मा, विष्णु और महेश नामक तीन देवताओं को मानता धा-पहला जनक, दूसरा पालक और तीसरा विनाशक।

इन तीनों में से भी वह विष्णु का सबसे ज़्यादा भक्त था।

हर सवेरे वह देवता के सम्मान में अपने माथे पर चंदन से खड़े आकार का तिलक लगाता।

ब्राह्मण होते हुए भी वह निरक्षर था और अंधविश्वासों को सच मानता था।

उसके लिए सब प्राणी पवित्र थे, फिर भले ही वह साँप हो या बिच्छू।

जब भी कोई दिखाई देता, वह उसे हटा देता, जिससे उसकी हत्या न हो जाये।

हमारे बैडमिंटन के रेकट से जो भी कीड़े-मकोड़े चोट खाकर इधर-उधर गिरते, उन्हें वह सावधानी से उठाकर उनको ठीक करने की कोशिश करता।

कई दफ़ा ये उसे काट भी लेते।

लेकिन उसके विश्वास में कमी नहीं आती थी।

जानवर जितना ज़्यादा खतरनाक होता, उतना ही ज़्यादा वह उस पर ध्यान देता।

इसीलिए झ साँपों की सबसे ज़्यादा इज़्ज़त करता था, विशेषकर कोबरा, यानी काले नाग।

हमें तुम्हारा काला नाग फिर दिखाई दिया तो हम उसे मार डालेंगे।

मैं तुम्हें यह करने नहीं दूँगा।

इसने सौ अंडे दिये हैं और इसे मार डालोगे तो ये सब अंडे कोबरे बन जायेंगे और घर भर में फैल जायेंगे। तब फिर तुम क्या करोगे ?

“हम उन सबको पकड़ लेंगे और बंबई भेज देंगे। वहाँ इनका दूध निकालते हैं और उससे ज़हर मारने की दवा बनाते हैं। एक कोबरे के दो रुपए देते हैं। पूरे दो सौ रुपए बन जायेंगे।'

"तुम्हारे डॉक्टरों के थन होते होंगे, इन साँपों के नहीं होते और इसे छेड़ना मत-यह फनिया है, बड़े फन वाला।

मैंने देखा है। तीन हाथ लम्बा है और झूमता कैसे है...” यह कहकर गंगा राम ने अपनी हथेलियों का फन बनाया और सिर घुमाना शुरू कर दिया।

“कभी देखना, सूरज की रोशनी में जब यह आराम करता है “अब तुम्हारा झूठ पकड़ा गया।

फनिया साँप मर्द होता है और मर्द अंडे नहीं देता। ये अंडे खुद तुमने ही दिये होंगे।'

सब लोग यह सुनकर हँस पड़े।

'ज़रूर ये अंडे गंगा राम के दिये हैं।

अब सौ गंगा राम पैदा हो जायेंगे गंगा राम हार गया।

घर के नौकरों की यहीं इज़्ज़ञत होती है कि हमेशा उनका मज़ाक उड़ाया जाता है।

लेकिन घर के इतने छोटे बच्चे इस तरह चिढ़ायें तों यह गंगा राम की सहनशक्ति के बाहर था।

ये सब इसी तरह अपने नये-नये विचारों से हमेशा उसकी खिल्ली उड़ाया करते थे।

इन्होंने कोई धर्मग्रन्थ नहीं पढ़ा था। न महात्मा गाँधी के अहिंसा के बारे में विचार सुने थे।

ये सिर्फ़ गुलेल से चिड़ियाँ मारते-फिरते थे या स्प्रिट में रखे साँपों के बारे में जानते थे।

लेकिन गंगा राम तो जीवन की पवित्रता पर ही विश्वास रखता था और साॉँपों की इसीलिए रक्षा करता था, क्‍योंकि वे ईश्वर की इस धरती पर बनाई कृतियों में सबसे ज़्यादा खतरनाक हैं।

आप उन्हें मारने की जगह उनकी रक्षा करें, तो इससे ही आपका विचार सिद्ध होता है।

लेकिन वह विचार क्या था जो गंगा राम सिद्ध करना चाहता था, इसके बारे में गंगा राम खुद ज़्यादा स्पष्ट नहीं था।

वह यही जानता था कि शाम को वह यहाँ कटोराभर दूध रख जाता है, और सवेरे उसे कटोरा खाली मिलता है-इससे सब कुछ सिद्ध हो जाता था।

एक दिन हमें काला नाग दिखाई दिया।

बरसातें ज़ोर-शोर से शुरू हो गई थीं और सारी रात पानी झमाझम बरसता रहा था।

पिछले दिनों की सख्त गर्मी में जो धरती सूखकर पपड़ी बन गई थी, वह अब पानी पीकर जीवित हो उठी और कई जगह गड़ढों में मेंढकों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं।

सारी ज़मीन कीचड़ बन गई और उसमें तरह-तरह के कीड़े-मकोड़े पनपने लगे।

घास भी निकलने लगी और केले के पत्ते चिकने होकर चमकने लगे।

काले नाग की बाँबी में पानी भर गया। वह बाहर निकलकर खुली घास में आ बैठा।

उसका काला बड़ा फन सूरज की रोशनी में चमक रहा था-करीब छह फीट लम्बा और हमारी बाँह की तरह मोटा और माँसदार।

“किंग कोबरा लगता है। चलो, पकड़ें।

काले नाग के लिए बचना आसान नहीं था। ज़मीन चिकनी थी और हर जगह गड़ढे बन गये थे जिनमें पानी भरा था। गंगा राम भी घर पर नहीं था, जो उसकी मदद करता।

हम सब लम्बे-लम्बे बॉस लेकर उसके चारों तरफ़ खड़े हो गये-वह हमले के लिए तैयार भी नहीं हो पाया था।

जब उसने हमें देखा तो उसकी आँखें आग की तरह जल उठीं और वह घूम-घूमकर फुंकारें मारता आगे बढ़ने लगा।

पाँच गज़ चला होगा कि एक लाठी उसके बीचोंबीच पड़ी जिससे उसकी पीठ टूट गई।

डंडे बरसते रहे और उसका सारा शरीर टूट-फूटकर जेली की तरह बिखरने लगा और सारी कीचड़ उसके खून से लथपथ हो उठी।

लेकिन उसका सिर सही-सलामत था।

हमने एक लम्बा बाँस उसके पेट में जमाकर उसे ऊपर उठाया और बड़ी सावधानी से उसे एक बड़े बिस्कुट के डिब्बे में डालकर ऊपर से ढक्कन बन्द कर दिया और फिर मोटी सुतली से डिब्बा कसकर बाँध दिया। फिर वह डिब्बा अपने पलँँग के नीचे छिपाकर रख दिया।

रात होने लगी तो मैंने गंगा राम के चक्कर लगाना शुरू किया कि वह कटोरे में दूध लेकर बाँबी के पास जाये। “आज तुम काले नाग के लिए दूध नहीं रखोगे ?'

हाँ, क्यों नहीं रखूँगा, तुम जाकर सोओ,' उसने चिड़चिड़ाकर कहा।

वह इस बारे में ज़्यादा बात नहीं करना चाहता था।

“अब उसे दूध की ज़रूरत नहीं पड़ेगी

गंगा राम यह सुनकर ठिठका, 'क्यों ?

अरे, कुछ नहीं। वहाँ बहुत से मेंढक भी हैं।

उनका स्वाद ज़्यादा अच्छा है। तुम दूध में चीनी तो डालते ही नहीं दूसरे दिन सुबह गंगा राम दूध से उसी तरह भरा कटोरा लेकर लौट आया। उसे कुछ शक होने लगा था।

मैंने कहा था न कि साँपों को दूध से ज़्यादा मेंढक पसन्द आते हैं

हमने कपड़े बदले और नाश्ता किया, तो गंगा राम हमारे आगे-पीछे ही लगा रहा।

स्कूल की बस आई तो हम डिब्बा लेकर उसमें चढ़ गये। बस चली तो हमने डिब्बा गंगा राम को दिखाया।

“इसमें है तुम्हारा काला नाग। बक्से में आराम कर रहा है। हम इसे स्प्रिट _ में रखने जा रहे हैं।

हम उसे भौंचक्‍्का खड़ा देखते हुए स्कूल चले गये। स्कूल में एकदम शोर मच गया। हम चार भाई अपनी कड़ाई के लिए.मशहूर थे। एक बार फिर हमने यह सिद्ध कर दिया था।

“किंग कोबरा।

“छह फीट लम्बा।

फनिया।

वह डिब्बा हमने साइंस के टीचर को भेंट कर दिया।

वह मेज़ पर सामने रखा था और हम्र इन्तज़ार करने लगे कि वह इसे खोलें और हमारे काम की तारीफ़ करें।

लेकिन टीचर ने ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई और हमें नये सवाल हल करने के लिए दे दिये।

फिर वह अपनी चिमटी लाया और एक जार खोलकर उसमें कुंडली मारकर पड़े एक साँप को देखने लगा।

फिर उसने धीरे-धीरे डिब्बे का ठक्कन खोलना शुरू किया।

उसके ऊपर बँधी सुतली जैसे ही ढीली पड़ी, ठक्कन एकदम खुलकर टीचर की नाक से टकराने को हुआ।

उसके भीतर से काला नाग फन उठाकर बाहर निकला और फुंकारने लगा।

उसकी आँखें लाल थीं और वह टीचर के मुँह की तरफ़ लपका। टीचर ने उसे पीछे धकेला और कुर्सी के पीछे लुढ़क गया। डर के मारे उसकी घिग्गी बँध गई और वह साँप को घूरने लगा। सब लड़के कुर्सियाँ छोड़कर उठे और चीखने-चिल्लाने लगे।

काले नाग ने सिर उठाकर चारों तरफ़ का मुआयना किया और जीभ बाहर निकालकर चलानी शुरू की।

फिर उसने ज़मीन पर थूका और आज़ाद होने के लिए भाग चला।

डिब्बे में से वह ज़ोर से ज़मीन पर गिरा। उसकी पीठ पर जगह-जगह घाव थे, लगता था, उसे भी बड़ा कष्ट हो रहा है, लेकिन किसी तरह वह दरवाज़े तक जा पहुँचा।

यहाँ आकर वह रुका और फिर से अपना फन फैलाया, जैसे अगले खतरे की तैयारी कर रहा हो।

कक्षा के बाहर गंगा राम हाथ में दूध का कटोरा और जग पकड़े खड़ा था। उसने काले नाग को अपनी तरफ़ आते देखा तो वह घुटनों के बल बैठ गया और कटोरे में दूध डालकर उसके सामने रखने लगा। फिर दोनों हाथ जोड़कर उसके सामने खड़े होकर जैसे क्षमा माँगने लगा। काला नाग क्रोध में था और उसने लपक-लपककर गंगा राम पर चारों तरफ़ से फन मारना शुरू कर दिया। इसके बाद वह धीरे-धीरे दरवाज़े से बाहर निकलकर नाली में घुस गया।

गंगा राम दोनों हाथों से मुँह पकड़े ज़मीन पर ढेर हो गया।

वह कष्ट से तड़प रहा था।

ज़हर ने उसे एकदम अंधा कर दिया।

कुछ ही मिनट में उसका शरीर नीला पड़ने लगा और मुँह से झाग निकलने लगे।

माथे पर खून की बूँदें झलक रही थीं।

टीचर ने रूमाल से उसे पोंछा, तो नीचे विष्णु का तिलक दिखाई दिया जिस पर काले नाग ने बार-बार फन मारे थे।

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