हेलो, आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ शेख प्रेम कहानियाँ शेयर करने जा रहे है। यह कहानियाँ प्यार से भरी है। आप इन कहानियाँ को पूरा पढ़े। आपको यह कहानियाँ बहुत पसंद आएगी। 

Love Story

Love Stories in Hindi List

प्यार में बदला खुद को

वो प्यार नहीं था

हमसफर भी तुम ही हो कहते हैं

उम्र के इस मोड़ पर

प्यार कोई खेल नहीं है

उलझन

अमन-राधिका की अनोखा प्रेम कहानी

प्यार

प्यार का चसका

प्यार में बदला खुद को

पत्नी ने पति से कहा, "कितनी देर तक समाचार पत्र पढ़ते रहोगे ?

यहाँ आओ और अपनी प्यारी बेटी को खाना खिलाओ"

पति ने समाचार पत्र एक तरफ़ फेका और बेटी की ध्यान दिया,बेटी की आंखों में आँसू थे और सामने खाने की प्लेट...।

बेटी एक अच्छी लड़की है और अपनी उम्र के बच्चों से ज्यादा समझदार।

पति ने खाने की प्लेट को हाथ में लिया और बेटी से बोला,"बेटी खाना क्यों नहीं खा रही हो?

आओ बेटी मैं खिलाऊँ"।

बेटी जिसे खाना नहीं भा रहा था, सुबक सुबक कर रोने लगी और कहने लगी,"मैं पूरा खाना खा लूँगी पर एक वादा करना पड़ेगा आपको।"।

"वादा", पति ने बेटी को समझाते हुआ कहा, "इस प्रकार कोई महँगी चीज खरीदने के लिए जिद नहीं करते।"

"नहीं पापा, मैं कोई महँगी चीज के लिए जिद नहीं कर रही हूँ।" फिर बेटी ने धीरे धीरे खाना खाते हुये कहा,

"मैं अपने सभी बाल कटवाना चाहती हूँ"।

पति और पत्नी दोनों अचंभित रह गए और बेटी को बहुत समझाया कि लड़कियों के लिए सिर के सारे बाल कटवा कर गंजा होना अच्छा नहीं लगता है।

पर बेटी ने जवाब दिया, "पापा आपके कहने पर मैंने सड़ा खाना, जो कि मुझे अच्छा नहीं लग रहा था, खा लिया और अब

वादा पूरा करने की आपकी बारी है"।

अंततः बेटी की जिद के आगे पति पत्नी को उसकी बात माननी ही पड़ी।

अगले दिन पति बेटी को स्कूल छोड़ने गया।

बेटी गंजी बहुत ही अजीब लग रही थे। स्कूल में एक महिला ने पति से कहा, "आपकी बेटी ने एक बहुत ही बड़ा काम किया है।

मेरा बेटा कैंसर से पीड़ित है और इलाजमें उसके सारे बाल खत्म हो गए हैं।

वह् इस हालत में स्कूल नहीं आना चाहता था क्योंकि स्कूल में लड़के उसे चिढ़ाते हैं। पर आपकी बेटी ने कहा कि वह् भी गंजी होकर स्कूल आयेगी और वह् आ गई।

इस कारण देखिये मेरा बेटा भी स्कूल आ गया।

आप धन्य हैं कि आपके ऐसी बेटी है "।

पति को यह सब सुनकर रोना आ गया और उसने मन ही मन सोचा कि आज बेटी ने सीखा दिया कि प्यार क्या होता है।

इस पृथ्वी पर खुशहाल वह नहीं हैं जो अपनी शर्तों पर जीते हैं बल्कि खुशहाल वे हैं।

जो, जिन्हें वे प्यार करते हैं, उनके लिए बदल जाते है!

वो प्यार नहीं था

सच्चा प्यार इस से साबित नहीं होता कि आप कितने लंबे समय से एक साथ है, सच्चा प्यार तब पता चलता है जब परिस्थितियां खराब चल रही हो और फिर भी आप एक दूसरे के साथ रहे, एक दूसरे को सपोर्ट करे और ज़िन्दगी में साथ आगे बढ़े।

रूबी एक फैशन डिजाइनर थी, और नितिन एक कंपनी में सल्स मैनेजर का काम करता था।

रूबी और नितिन एक दूसरे को कॉलेज से जानते थे और एक दूसरे से प्यार करते थे।

उनके रिलेशन को लगभग 6 साल हो गए थे और अब रूबी नितिन से शादी करना चाहती थे।

पिछले महीने नितिन का प्रोमोशन हुआ था, तो इसी कारण उसे दूसरे शहर में शिफ्ट होना पड़ा था।

जाने से पहले वो रूबी से मिला था। रूबी बहुत उदास थी कि अब वो दोनो मिल नहीं पाएंगे, लेकिन रूबी ने नितिन को कभी माना नहीं किया जाने से वो चाहती थी नितिन अपने कैरियर में आगे बढ़े और यही सोच कर उसने खुशी खुशी नितिन को जाने दिया था।

वो दोनो एक दूसरे को रोज़ फोन करते थे और घंटो बाते करते थे, रूबी उस से उसके नए काम नई जगह के बारे पूछती रहती कि सब कैसा है उधर, वो समय पर खाना कहता है ना, काम में ध्यान लगता है ना, रूबी उसे उसका सब कुछ पूछती थी।

एक साल अच्छे से बित गए थे लेकिन फिर कुछ ऐसा होने लगा कि रूबी बहुत परेशान रहने लगी।

नितिन ना तो खुद रूबी को फोन करता था और जब रूबी फोन करती थी तो ये बोल कर फोन रख देता था कि वो काम में व्यस्त है।

रूबी को समझ नहीं आ रहा था कि नितिन ऐसा क्यों कर रहा है भले कितना भी काम हो पाच मिनट तो मुझसे बात कर ही सकता है।

एक महीना ऐसे ही चला गया, फिर रूबी थक कर नितिन को फोन करना छोड़ दी, और नितिन तो अब उसे खुद से फोन करता ही नहीं था।

कुछ दिन ऐसे ही बीत गए तो रूबी ने खुद फोन किया नितिन को, उसने फोन नहीं उठाया रूबी ने उसे 4,5 बार फोन किया फिर भी उसने फोन नहीं उठाया और ना ही उसने बाद में खुद रूबी को फोन किया।

रूबी बहुत परेशान हो गई वो सोचने लगी कि सच में नितिन काम में व्यस्त रहता है कि कुछ और बात है। कुछ दिनों बाद रूबी अपने काम से छुट्टी लेकर नितिन को बिना बताए उस से मिलने चली गई।

रूबी को नितिन का पूरा पता मालूम था कि वो कहा रहता है।

रूबी रात के समय नितिन के घर पहुंची थी, उसने देखा कि नितिन के घर पर ताला लगा हुआ था, उसने नितिन को फोन किया लेकिन हमेशा की तरह नितिन ने रूबी का फोन नहीं उठाया, फिर रूबी ने नितिन को मेसेज किया कि "मै तुम्हरे घर के बाहर खड़ी हूं तुम कहा हो?" थोड़ी देर बाद नितिन ने फोन किया और उसे बहुत डाटा की तुम बिना बताए क्यों आ गई इधर, किसने बोला था तुम्हें इधर आने के लिए,और फोन रख दिया।

उसने रूबी की कोई बात नहीं सुनी, रूबी उसके घर के बाहर ही बैठी रह गई कि शायद नितिन को ऑफिस में बहुत काम हो और मै बिना बताए आ गई इस लिए वो गुस्सा हो गया, और वो उसके घर के बाहर ही बैठ के उसका इंतज़ार कर रही थी। सफर में रूबी बहुत थक गई थी और उधर बैठे बैठे रूबी की आंख लग गई और वो सो गई।

सुबह उसकी आंख खुली तो उसने देखा कि नितिन अभी तक घर नहीं आया।

उसने फिर से नितिन को फोन किया, फोन उठाते ही नितिन बोला क्या है! तुम मुझे बार बार क्यों फोन कर रही हो, रूबी बोली तुम कहां हो रात भर तुम घर नहीं आए मै इधर तुम्हारे घर के बाहर कल रात से तुम्हारा इंतजार कर रही हूं। नितिन गुस्से में बोला तुम चली जाओ मैं नहीं आ सकता, रूबी की आंखो में असू आगए रूबी बोली क्यों कर रहे हो ऐसे, मेरी क्या गलती है ये तो बताओ।

नितिन बोला तुम जाओ मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी और फिर फोन रख दिया।

रूबी बहुत रोने लगी उसके पास वापस जाने के आलावा कोई रास्ता नहीं था, वो अनजान शहर में नितिन को कैसे और कहा ढूंढती।

फिर उसने सोचा कि नितिन के पड़ोसियों से एक बार पूछ ले कि नितिन यही रहता है ना कि कहीं और शिफ्ट हो गया है।

उसने पूछा तो उसे पता चला कि पिछले एक महीने से नितिन यहां रहता ही नहीं है। ये सुन कर उसे और बुरा लगा कि नितिन ने उसे कुछ नहीं बताया था कि वो कहीं और शिफ्ट हो गया है, पहले नहीं बताया था ठीक है लेकिन अब जब मै यहां आ गई हूं फिर भी उसने कुछ नहीं बताया और ना ही मिलने आया। वो वहा से अपने घर लौट गई। वो बहुत बेचैन हो रही थी नितिन ऐसा क्यों कर रहा है, वो नितिन को फोन और मेसेज करती थी लेकिन वो ना तो फोन उठता और ना ही मेसेजेस का रिप्लाइ करता था।

कुछ 15 दिनों बाद नितिन का फोन आया, रूबी अपने ऑफिस में थी, उसने तुरंत फोन उठाया और ऑफिस से बाहर निकली बात करने के लिए।

वो पूछने लगी कि नितिन तुम्हे क्या हो गया है तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हो मुझसे कोई गलती हुई है तो मुझे बताओ लेकिन मुझे ऐसे इग्नोर नहीं करो, मुझसे बात करो। उधर से नितिन बोला अब प्लीज़ तुम मुझे भूल जाओ मैं किसी और से प्यार करता हूं और उस से शादी करने वाला हूं, और पिछले एक महीने से उसके साथ ही रहता हूं इसली तुमसे मिलने नहीं आया था उस दिन, हो सके तो मुझे माफ़ कर देना, मै अपना फोन नंबर भी बदल रहा हूं।

इतना बोल कर नितिन ने फोन रख दिया।

रूबी ये सब सुन कर तो मानो जैसे उसके पैरो के नीचे से ज़मीन ही निकल गई, उसका दिल बहुत ही तेज़ी से धड़कने लगा, वो रोने लगी और सोचने लगी कैसे 6 साल का रिलेशन ऐसे कोई एक झटके में तोड़ सकता है।

वो उसी वक़्त ऑफिस से घर चली गई, वो बहुत रोई और फिर नितिन को फोन करने लगी कि नितिन ऐसे नहीं कर सकता वो मुझे छोड़ कर नहीं जा सकता, लेकिन जैसे नितिन ने कहा था कि वो अपना नंबर बदल रहा है, तो उसका फोन भी नहीं लगा।

रूबी डिप्रेशन में चली गई थी, वो 15 दिनों तक ऑफिस नहीं गई उस रोज़ ऑफिस से फोन आते थे, आखिर में उसके बॉस ने उसे बोल दिया कि ऐसे ही कुछ दिन और चला तो उसे अपनी नौकरी खोनी पड़ेगी।

फिर कुछ दिनों बाद रूबी ऑफिस जाने लगी लेकिन काम में उसका ध्यान नहीं रहता था। 5 मिहिने हो गए उस बात को अब रूबी धीरे धीरे धीरे संभल रही थी। नितिन ने फिर कभी रूबी को फोन नहीं किया ना रूबी ने फिर कभी उसे फोन किया।

हमसफर भी तुम ही हो कहते हैं

अविनाश सुबह समय पर उठा नहीं तो संस्कृति को चिंता हुई। उस ने अविनाश को उठाते हुए उस के माथे पर हाथ रखा। माथा तप रहा था। संस्कृति घबरा उठी। अविनाश को तेज बुखार था। 2 दिन से वह खांस भी रहा था।

संस्कृति ने कल इसी वजह से उसे औफिस जाने से मना कर दिया था। मगर आज तेज बुखार भी था। उस ने जल्दी से अविनाश को दवा खिला कर माथे पर ठंडे पानी की पट्टी रखी।

संस्कृति और अविनाश की शादी को अभी ज्यादा वक्त नहीं गुजरा था। 2 साल ही हुए थे। पिछले साल तक सासससुर साथ में रहते थे। मगर कोरोना में संस्कृति की जेठानी की मौत हो गई तो सासससुर बड़े बेटे के पास रहने चले गए। उस के बाद करोना का प्रकोप बढ़ता ही गया।

पिछले कुछ समय से टीवी चैनल्स पर दिल्ली के अस्पतालों में कोरोना से जूझने वालों की हालत देख कर वह वैसे भी परेशान थी। कहीं वैंटीलेटर नहीं, तो कहीं औक्सीजन नहीं। मरीजों को अस्पतालों में बैड तक नहीं मिल रहा था। ऐसे में अब उन का क्या होगा, यह सोच कर ही वह कांप उठी।

जल्दी से उस ने मां को फोन लगाया,”मां, अविनाश को सुबह से बहुत तेज बुखार है, क्या करूं?”

“बेटा, यह समय ही बुरा चल रहा है। राजू भी कोरोना पौजिटिव है वरना उसे भेज देती। हम खुद उस की देखभाल में लगे हुए हैं। तू ऐसा कर, जल्दी से डाक्टर को बुला और दवाएं शुरू कर।”

“हां मां, वह तो करना ही होगा। मेरी सास की भी तबीयत भी सही नहीं चल रही है। वरना जेठजी को ही बुला लेती।”

“घबरा नहीं, बेटी। धैर्य से काम ले। सब ठीक हो जाएगा,” मां ने समझाने का प्रयास किया।

संस्कृति ने पति का कोरोना टेस्ट कराया। तब तक फैमिली डाक्टर से पूछ कर दवाएं भी देती रही। इस बीच अविनाश की हालत ज्यादा खराब होने लगी तो वह उसे ले कर अस्पताल भागी।

2 अस्पतालों से निराश लौटने के बाद तीसरे में मुश्किल से बैड का इंतजाम हो सका। सासससुर और जेठ भी दूसरे शहर में थे सो मदद के लिए आ नहीं सके। वैसे भी दिल्ली में लौकडाउन लगा हुआ था। रिश्तेदार चाह कर भी उस की मदद करने नहीं आ सकते थे।

आसपड़ोस वालों ने कोरोना के डर से दरवाजे बंद कर लिए। तब संस्कृति ने अपने दोस्तों को फोन लगाया पर सब ने बहाने बना दिए। अकेली संस्कृति पति की सेवा में लगी हुई थी।

अस्पताल में मरीजों की लंबी कतारों और मौत के तांडव के बीच किसी तरह संस्कृति खुद को बचाते हुए पति के लिए दौड़भाग करने में लग गई। कभी दवा की परची ले कर भागती तो कभी खाना ले कर। कभी डाक्टर से गिड़गिड़ाती तो कभी थकहार कर बैठ जाती।

उसे कोरोना वार्ड में जाने की इजाजत नहीं थी। बाहर रिसैप्शन में बैठ कर ही पति के ठीक होने की कामना करती रहती। उस पर पति की तबीयत अच्छी होने के बजाय बिगड़ती जा रही थी।

उस दिन भी डाक्टर ने परची में कई दवाएं जोड़ कर लिखीं। वह दवाएं लेने गई मगर जो सब से जरूरी दवा थी वही नहीं मिली। अस्पताल में उस का स्टौक खत्म हो चुका था। अब वह क्या करेगी? बदहवास सी वह अस्पताल के बैंच पर बैठ गई। बगल में ही परेशान सा एक युवक भी बैठा हुआ था।

संस्कृति ने उस की तरफ मुखातिब हो कर पूछा,”आप बता सकते हैं यह दवा मुझे कहां मिलेगी?”

“मैं खुद यह दवा ढूंढ़ रहा हूं। आसपास तो मिली नहीं। मेरे दोस्त ने बताया है कि नोएडा में उस की शौप है। उस ने कुछ दवाएं स्टौक कर के रखी हैं, सो वह मुझे दे देगा। अभी जाने की ही सोच रहा था। परची लाइए, मैं अपने साथ आप के लिए भी दवा ले आता हूं।”

“बहुत मेहरबानी होगी। सुबह से इस के लिए परेशान हो रही थी,”पसीना पोंछते हुए संस्कृति ने कृतज्ञ स्वर में कहा।

“मेहरबानी की कोई बात नहीं। इंसान ही इंसान के काम आता है। बस इतना शुक्र मनाइए कि दवा वहां मिल जाए,” कह कर वह चला गया।

करीब 2-3 घंटे बाद लौटा तो उस के चेहरे पर परेशानी की लकीरों के बावजूद खुशी थी।

“यह लीजिए, बड़ी मुश्किल से मिली, मगर मिल गई यही बहुत है।”

“बहुतबहुत शुक्रिया। कितने की है?” संस्कृति का चेहरा भी खिल उठा था।

“अरे नहीं, पैसे की जरूरत नहीं। आप पहले यह दवा खिलाइए मरीज को।

उस दिन के बाद से दोनों में बातचीत होने लगी। वह अपने भाई की देखभाल में लगा था और संस्कृति पति के लिए दौड़भाग कर रही थी। दोनों का दर्द एकसा ही था।

संस्कृति जब भी व्यथित होती तो उस के कंधों पर सिर रख कर रो लेती। कोई चीज लानी होती तो प्रतीक ले कर आता। संस्कृति को घर छोड़ कर आता।

धीरेधीरे तकलीफ के इन दिनों में 2 अजनबी एक बंधन में बंधते जा रहे थे। उन के बीच एक अजीब सा आकर्षण भी था, जो दोनों के इस बंधन को और मजबूत बना रहा था।

एक दिन अविनाश का औक्सीजन लेवल काफी घट गया। अस्पताल में औक्सीजन सिलैंडर नहीं था। तब प्रतीक ने यह जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। पूरे दिन कड़ी धूप और गरमी में लाइन में लग कर आखिर वह औक्सीजन सिलैंडर ले कर ही लौटा था।

उस दिन संस्कृति ने पूछा था,”आप मेरे लिए इतना कुछ कर रहे हैं, इतना खयाल रखते हैं मगर क्यों? मैं तो आप की कुछ भी नहीं लगती। फिर बताओ न ऐसा क्यों कर रहे हो?”

“पहली बात, हर क्यों का जवाब नहीं होता और दूसरी बात, हम दोनों हमसफर नहीं हैं तो क्या हुआ हमदर्द तो हैं ना। आप के दर्द को मैं बहुत अच्छे से महसूस कर सकता हूं। आप की तकलीफ देख कर मुझे दुख होता है। बस, किसी भी तरह आप की मदद करना चाहता हूं।”

एक अनकहा सा मगर मजबूत साथ महसूस कर वह गमों के बीच भी मुसकरा उठी थी।

धीरेधीरे अविनाश की तबीयत और भी बिगड़ गई और उस को वैंटिलेटर पर रखना पड़ा। अस्पताल में वैंटीलेटर्स की भी कमी थी। कई वैंटिलेटर्स खराब हो गए।

बदहवास सी संस्कृति ने प्रतीक को फोन लगाया तो पता चला कि उस के भाई को भी कहीं और शिफ्ट करने की नौबत आ गई है।

“आप चिंता न करो संस्कृतिजी, मैं अपने भाई को जिस अस्पताल में ले कर जा रहा हूं, आप के पति को भी वहीं ले कर चलता हूं। वहां वैंटिलेटर की सुविधा है और डाक्टर्स भी अच्छे हैं,” प्रतीक ने उसे ढांढ़स बंधाया और फिर जल्दी ही शिफ्टिंग की सारी व्यवस्था करा दी।

शाम में सब निबट गया तो प्रतीक का हाथ पकड़ कर रुंधे गले से संस्कृति इतना ही कह सकी,”आप नहीं होते तो पता नहीं क्या होता।”

“मैं नहीं होता तो कोई और होता। अच्छे लोगों की मदद के लिए कोई ना कोई आ ही जाता है।”

“ऐसा नहीं है प्रतीकजी। मैं ने अपने दोस्तों, पड़ोसियों और परिचितों सब को देख लिया। इस कठिन समय में कोई भी मेरे साथ खड़ा नहीं। केवल आप हैं जिसे 4-6 दिन पहले तक मैं जानती भी नहीं थी। आज लगता है ऐसे आप के बिना रह ही नहीं सकती।”

उस की बात सुन कर प्रतीक ने एक अलग ही नजर नजर से संस्कृति की तरफ देखा और फिर मुसकरा कर चला गया।

संस्कृति के दिल में अजीब सी बेचैनी होने लगी। वह सोचने लगी कि प्रतीक का साथ इस परेशानी के समय में भी कितना सुकून दे जाता है। अस्पताल में मरीजों के रिश्तेदारों की भागदौड़ और परेशानियों के बीच भी चंद लम्हे वह केवल प्रतीक के बारे में सोचती रह गई।

इसी तरह 2-3 दिन और गुजरे। अविनाश की हालत काफी गंभीर थी। फिर एक दिन सुबहसुबह संस्कृति को सूचना मिली कि उस के पति की मृत्यु हो गई है। एक पल में संस्कृति को लगा जैसे वह अधूरी रह गई। उस का सबकुछ छिन गया है। प्रतीक ने जितना हो सका उसे धैर्य बंधाया। कोरोना की वजह से वह पति के शव को घर भी नहीं ला सकती थी। लौकडाउन लगा हुआ था। घर वालों का आना भी कठिन था। ऐसे में उसे समझ नहीं आ रहा था कि पति को अंतिम विदाई कैसे दे?

इस वक्त भी प्रतीक ही उस के काम आया। मुश्किल की इस घड़ी में सब से पहले उस ने संस्कृति को शांत कराया फिर उस के पति को शमशान तक ले जाने का सही से इंतजाम कराया। संस्कृति के साथ वह शमशान तक गया। फिर संस्कृति को उस के घर छोड़ने आया। संस्कृति लगातार रो रही थी। उस के हाथपैर कांप रहे थे।

प्रतीक समझ रहा था कि उस की तबीयत खराब है। वह अकेली है सो अपने खानेपीने को ले कर लापरवाह रहेगी तो और तबीयत खराब होगी।

तब प्रतीक ने हाथपैर धो कर और कपड़े बदल कर उस की रसोई में प्रवेश किया और सब से पहले चाय बनाई। संस्कृति के साथ खुद भी बैठ कर उस ने चाय पी। फिर संस्कृति को नहाने भेज कर खुद दालचावल बनाने लगा। संस्कृति को खाना खिला कर उस के लिए सब्जी, फल, दूध आदि का इंतजाम कर और सांत्वना दे कर वह वापस लौट गया।

2-3 दिनों बाद जब संस्कृति थोड़ी सामान्य हुई और पति की मौत के सदमे से उबरी तो उसे प्रतीक की याद आई। प्रतीक उस के लिए अपनों से बढ़ कर बन चुका था। मगर उसे पता नहीं था कि वह कहां रहता है, क्या जौब करता है? बस एक फोन नंबर था। उस ने फोन मिलाया तो नंबर बंद आ रहा था। संस्कृति घबरा उठी। वह प्रतीक से से संपर्क करना चाहती थी मगर ऐसा हो ना सका। 2-3 घंटे वह लगातार फोन ट्राई करती रही मगर फोन बंद ही आ रहा था।

अब उस से रहा नहीं गया। कुछ सोच कर वह उसी अस्पताल में पहुंची जहां उस के पति और प्रतीक का भाई ऐडमिट थे। वह रिसैप्शन एरिया में घूमघूम कर प्रतीक को खोजने लगी क्योंकि अकसर दोनों वहीं बैठे होते थे। फिर वह उसे खोजती हुई कैंटीन में भी गई। हर तरफ चक्कर लगा लिया मगर प्रतीक कहीं नजर नहीं आ रहा था। थक कर वह वापस रिसैप्शन में आ कर बैठ गई और सोचने लगी अब क्या करे।

तभी उसे वह नर्स नजर आई जिस से संस्कृति की जानपहचान हो गई थी। संस्कृति के पति की देखभाल वही नर्स करती थी। संस्कृति उसे अकसर अम्मां कह कर पुकारा करती। नर्स ने प्रतीक को भी उस के साथ कई बार देखा हुआ था। संस्कृति दौड़ कर नर्स के पास गई।

दुखी स्वर में नर्स ने कहा,”सौरी बेबी, तुम्हारे पति को हम बचा नहीं पाए।”

“जो लिखा था वह हो गया पर यह बताओ, अम्मां आप को प्रतीक याद है, जो अकसर मेरे साथ होता था? उस के भाई का इलाज चल रहा था।”

“हां बेबी, उस के भाई की भी तो मृत्यु हो गई। वह खुद भी ऐडमिट है। उसे भी कोरोना है और जानती हो, बेबी वह तेरे पति वाले बैड पर ही है। बैड नंबर 125।”

“सच अम्मां, आप उसे पहचानती हो ना?”

“हां बेबी, पहचानती हूं। तेरी बहुत हैल्प करता था। पर अब उस की हैल्प करने वाला कोई नहीं। अकेला है वह।”

“मैं हूं न अम्मां। अब उस के लिए किसी भी चीज की जरूरत पड़े तो मुझे बताना। मैं उस के अटेंडैंट के रूप में अपना नाम लिखवा देती हूं।”

“ठीक है, बेबी मैं बताती हूं तुझे।”

इस के बाद संस्कृति पूरे मन से प्रतीक की सेवा में लग गई। उस के लिए घर का खाना, फल, दवाएं वगैरह ले कर आना, उस की हर जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना, डाक्टरों से उस की तबियत की हर वक्त जानकारी लेते रहना जैसे काम वह पूरे उत्साह से कर रही थी। इस बीच प्रतीक की हालत बिगड़ी और उसे आईसीयू ले जाने की जरूरत पड़ गई।

इस के लिए अस्पताल के क्लर्क ने उस के आगे एक फौर्म बढ़ाया। उस में मरीज के साथ क्या संबंध है, यह लिख कर हस्ताक्षर करना था।

संस्कृति कुछ पलों के लिए सोचती रही कि वह क्या लिखे। फिर उस ने उस खाली जगह पर ‘पत्नी’ लिख कर साइन कर दिया। क्लर्क को कागज थमा कर वह खुद में ही मुसकरा उठी।

2-3 दिन आईसीयू में रह कर प्रतीक की हालत में सुधार शुरू हुआ और उसे कोविड वार्ड में वापस शिफ्ट कर दिया गया।

7-8 दिनों तक लगातार सुधार होने और रिपोर्ट नैगेटिव आने के बाद उसे डिस्चार्ज भी कर दिया गया। इतने दिनों तक संस्कृति ने भी अपना खानापीना और नींद भूल कर दिनरात प्रतीक की सेवा की थी।

डिस्चार्ज वाले दिन वह बहुत खुश थी। उस ने सीधा अपने घर के लिए कैब बुक किया और प्रतीक को अपने घर ले आई।

प्रतीक ने टोका तो संस्कृति ने थोड़े शरारती अंदाज में जवाब दिया,” मैं ने फौर्म में एक जगह यह लिख कर साइन किया है कि मैं तुम्हारी पत्नी हूं और इसलिए अब मेरा और तुम्हारा घर अलगअलग नहीं, बल्कि एक ही होगा।”

“मगर संस्कृति लोग क्या कहेंगे?”

“लोगों का क्या है प्रतीक, जब मुझे जरूरत थी तो क्या लोग मेरी मदद के लिए आगे आए थे? नहीं न… उस वक्त तुम ने मेरा साथ दिया। अब मेरी बारी है। इस में गलत क्या है? तुम थोड़े ठीक हो जाओ फिर सोचेंगे कि क्या करना है,” संस्कृति ने अपना फैसला सुना दिया।

करीब 10 दिन संस्कृति ने जीभर कर प्रतीक का खयाल रखा। हर तरह से उस की सेहत पहले की तरह बनाने और खुश रखने का प्रयास करती रही।

संस्कृति एक संयुक्त परिवार से संबंध रखती थी। ससुराल में धनसंपत्ति की कमी नहीं थी। यह घर भी पति के बाद उस के नाम हो चुका था। पति ने उस के लिए काफी संपत्ति और गहने भी छोड़े थे। बस एक हमसफर की कमी थी, जिसे प्रतीक पूरा कर सकता था।

उस दिन शाम में संस्कृति ने प्रतीक के हाथों को थाम कर कहा,”जो बात मैं ने अनजाने ही उस फौर्म में लिखा, क्या हम उसे हकीकत का रूप नहीं दे सकते? क्या मैं तुम्हें अपने हमदर्द के साथसाथ एक हमसफर के रूप में भी स्वीकार हूं?”

“मुझे लगता है संस्कृति कि अब यह बात कहना फुजूल है।”

“मतलब?”

“मतलब यह कि तुम औलरेडी मेरी हमदर्द और हमसफर बन चुकी हो। हम हमेशा साथ रहेंगे। तुम से बढ़ कर कोई और मेरा खयाल नहीं रख सकता,” कह कर प्रतीक ने संस्कृति को गले से लगा लिया।

उम्र के इस मोड़ पर

आज रविवार है। पूरा दिन बारिश होती रही है। अभी थोड़ी देर पहले ही बरसना बंद हुआ था। लेकिन तेज हवा की सरसराहट अब भी सुनाई पड़ रही थी। गीली सड़क पर लाइट फीकीफीकी सी लग रही थी। सुषमा बंद खिड़की के सामने खोईखोई खड़ी थी और शीशे से बाहर देखते हुए राहुल के बारे में सोच रही थी, पता नहीं वह इस मौसम में कहां है। बड़ा खामोश, बड़ा दिलकश माहौल था। एक ताजगी थी मौसम में, लेकिन मौसम की सारी सुंदरता, आसपास की सारी रंगीनियां दिल के मौसम से बंधी होती हैं और उस समय सुषमा के दिल का मौसम ठीक नहीं था।

विशाल टीवी पर कभी गाने सुन रहा था, तो कभी न्यूज। वह आराम के मूड में था। छुट्टी थी, निश्चिंत था। उस ने आवाज दी, ‘‘सुषमा, क्या सोच रही हो खड़ेखड़े?’’

‘‘कुछ नहीं, ऐसे ही बाहर देख रही हूं, अच्छा लग रहा है।’’

‘‘यश और समृद्धि कब तक आएंगे?’’

‘‘बस, आने ही वाले हैं। मैं उन के लिए कुछ बना लेती हूं,’’ कह कर सुषमा किचन में चली गई।

सुषमा जानबूझ कर किचन में आ गई थी। विशाल की नजरों का सामना करने

की उस में इस समय हिम्मत नहीं थी। उस की नजरों में इस समय बस राहुल के इंतजार की बेचैनी थी।

सुषमा और विशाल के विवाह को 20 वर्ष हो गए थे। युवा बच्चे यश और समृद्धि अपनीअपनी पढ़ाई और दोस्तों में व्यस्त हुए तो सुषमा को जीवन में एक रिक्तता खलने लगी। वह विशाल से अपने अकेलेपन की चर्चा करती, ‘‘विशाल, आप भी काफी व्यस्त रहने लगे हैं, बच्चे भी बिजी हैं, आजकल कहीं मन नहीं लगता, शरीर घरबाहर के सारे कर्त्तव्य तो निभाता चलता है, लेकिन मन में एक अजीब वीराना सा भरता जा रहा है। क्या करूं?’’

विशाल समझाता, ‘‘समझ रहा हूं तुम्हारी बात, लेकिन पद के साथसाथ जिम्मेदारियां भी बढ़ती जा रही हैं। तुम भी किसी शौक में अपना मन लगाओ न’’

‘‘मुझे बहुत अकेलापन महसूस होता है। मन करता है कोई मेरी बात सुने, मेरे साथ कुछ समय बिताए। तुम तीनों तो अपनी दुनिया में ही खोए रहते हो।’’

‘‘सुषमा, इस में अकेलेपन की क्या बात है। यह तो तुम्हारे हाथ में है। तुम अपनी सोच को जैसे मरजी जिधर ले जाओ। अकेलापन देखो तो कहां नहीं है। आजकल फर्क बस इतना ही है कि कोई बूढ़ा हो कर अकेला हो जाता है, कोई थोड़ा पहले। इस सचाई को मन से स्वीकारो तो कोई तकलीफ नहीं होती और हां, तुम्हें तो पढ़नेलिखने का इतना शौक था न। तुम तो कालेज में लिखती भी थी। अब समय मिलता है तो कुछ लिखना शुरू करो।’’ मगर सुषमा को अपने अकेलेपन से इतनी आसानी से मुक्त होना मुश्किल लगता।

इस बीच विशाल ने रुड़की से दिल्ली एमबीए करने आए अपने प्रिय दोस्त के छोटे भाई राहुल को घर आने के लिए कहा तो सुषमा राहुल से मिलने के बाद खिल ही उठी।

होस्टल में रहने का प्रबंध नहीं हो पाया तो विजय ने विशाल से फोन पर कहा, ‘‘यार, उसे कहीं अपने आसपास ही कोई कमरा दिलवा दे, घर में भी सब लोगों की चिंता कम हो जाएगी।’’

विशाल के खूबसूरत से घर में पहली मंजिल पर 2 कमरे थे। एक कमरा यश और समृद्धि का स्टडीरूम था, दूसरा एक तरह से गैस्टरूम था, रहते सब नीचे ही थे। जब कुछ समझ नहीं आया तो विशाल ने सुषमा से विचारविमर्श किया, ‘‘क्यों न राहुल को ऊपर का कमरा दे दें। अकेला ही तो है। दिन भर तो कालेज में ही रहेगा।’’

सुषमा को कोई आपत्ति नहीं थी। अत: विशाल ने विजय को अपना विचार बताया और कहा, ‘‘घर की ही बात है, खाना भी यहीं खा लिया करेगा, यहीं आराम से रह लेगा।’’

विजय ने आभार व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘ठीक है, उसे पेइंगगैस्ट की तरह रख ले।’’

विशाल हंसा, ‘‘क्या बात कर रहा है। जैसे तेरा भाई वैसे मेरा भाई।’’

राहुल अपना बैग ले आया। अपने हंसमुख स्वभाव से जल्दी सब से हिलमिल गया। सुषमा को अपनी बातों से इतना हंसाता कि सुषमा तो जैसे फिर से जी उठी। नियमित व्यायाम और संतुलित खानपान के कारण सुषमा संतुलित देहयष्टि की स्वामिनी थी। राहुल उस से कहता, ‘‘कौन कहेगा आप यश और समृद्धि की मां हैं। बड़ी बहन लगती हैं उन की।’’

राहुल सुषमा के बनाए खाने की, उस के स्वभाव की, उस की सुंदरता की दिल खोल कर तारीफ करता और सुषमा अपनी उम्र के 40वें साल में एक नवयुवक से अपनी प्रशंसा सुन कर जैसे नए उत्साह से भर गई।

कई दिनों से विशाल अपने पद की बढ़ती जिम्मेदारियों में व्यस्त होता चला गया था। अब तो बस नाश्ते के समय विशाल हांहूं करता हुआ जल्दीजल्दी पेपर पर नजर डालता और जाने के लिए बैग उठाता और चला जाता। रात को आता तो कभी न्यूज, कभी लैपटौप, तो कभी फोन पर व्यस्त रहता। सुषमा उस के आगेपीछे घूमती रहती, इंतजार करती रहती कि कब विशाल कुछ रिलैक्स हो कर उस की बात सुनेगा। वह अपने मन की कई बातें उस के साथ बांटना चाहती, लेकिन सुषमा को लगता विशाल की जिम्मेदारियों का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। उसे लगता एक चतुर अधिकारी के मुखौटे के पीछे उस का प्रियतम कहीं छिप सा गया है।

बच्चों का अपना रूटीन था। वे घर में होते तो भी अपने मोबाइल पर या टीवी में लगे रहते या फिर पढ़ाई में। वह बच्चों से बात करना भी चाहती तो अकसर दोनों बच्चों का ध्यान अपने फोन पर रहता। सुषमा उपेक्षित सी उठ कर अपने काम में लग जाती।

और अब अकेले में वह राहुल के संदर्भ में सोचने लगी। लेकिन कौन, कब, बिना कारण, बिना चेतावनी दिए इंसान के भीतर जगह पा जाता है, इस का आभास उस घटना के बाद ही होता है। सुषमा के साथ भी ऐसा ही हुआ। राहुल आया तो दिनबदिन विशाल और बच्चों की बढ़ती व्यस्तता से मन के एक खाली कोने के भरे जाने की सी अनुभूति होने लगी।

विशाल टूर पर रहता तो राहुल कालेज से आते ही कहता, ‘‘भैया गए हुए हैं। आप बोर हो रही होंगी। आप चाहें तो बाहर घूमने चल सकते हैं। यश और समृद्धि को भी ले चलिए।’’

सुषमा कहती, ‘‘वे तो कोचिंग क्लास में हैं। देर

से आएंगे। चलो, हम दोनों ही चलते हैं। मैं गाड़ी निकालती हूं।’’

दोनों जाते, घूमफिर कर खाना खा कर ही आते, सुषमा राहुल को अपना पर्स कहीं निकालने नहीं देती। राहुल उस के जीवन में एक ताजा हवा का झोंका बन कर आया था। दोनों की दोस्ती का दायरा बढ़ता गया। वह अकेलेपन की खाई से निकल कर नई दोस्ती की अनुभूति के सागर में गोते लगाने लगी। अपनी उम्र को भूल कर किशोरियों की तरह दोगुने उत्साह से हर काम करने लगी। राहुल की हर बात, हर अदा उसे अच्छी लगती।

कई दिनों से अकेलेपन के एहसास से चाहेअनचाहे अपने भीतर का खाली कोना गहराई से महसूस करती आ रही थी। अब उस जगह को राहुल के साथ ने भर दिया था। कोई भी काम करती, राहुल का ध्यान आता रहता। उस का इंतजार रहता। वह लाख दिल को समझाती कि अब किसी और का खयाल गुनाह है, लेकिन दिल क्या बातें समझ लेता है? नहीं, यह तो सिर्फ अपनी ही जबान समझता है, अपनी ही बोली जानता है। उस में जो समा जाए वह जरा मुश्किल ही से निकलता है।

अब तो न चाहते हुए भी विशाल के साथ अंतरंग पलों में भी वह राहुल की चहकती आवाज से घिरने लगती। मन का 2 दिशाओं में

पूरे वेग से खिंचना उसे तोड़ जाता। मन में उथलपुथल होने लगती, वह सोचती यह बैठेबैठाए कौन सा रोग लगा बैठी। यह किशोरियों जैसी बेचैनी, हर आहट पर चौंकना, कभी वह शीशे के सामने खड़ी हो कर अपनी मनोदशा पर खुद ही हंस पड़ती।

अचानक एक दिन राहुल कालेज से मुंह लटकाए आया। सुषमा ने खाने

के लिए पूछा तो उस ने मना कर दिया। वह चुपचाप ड्राइंगरूम में ही गुमसुम बैठा रहा। सुषमा ने बारबार पूछा तो उस ने बताया, ‘‘आज कालेज में मेरा मोबाइल खो गया है। यहां आते समय विजय भैया ने इतना महंगा मोबाइल ले कर दिया था। भैया अब बहुत गुस्सा होंगे।’’

सुषमा चुपचाप सुनती रही। कुछ बोली नहीं। लेकिन अगले ही दिन उस ने अपनी जमापूंजी से क्व15 हजार निकाल कर राहुल के हाथ पर जबरदस्ती रख दिए। राहुल मना करने लगा, लेकिन सुषमा के जोर देने पर रुपए रख लिए।

कुछ महीने और बीत गए। विशाल भी फुरसत मिलते ही राहुल के हालचाल पूछता, वैसे उस के पास समय ही नहीं रहता था। सुषमा पर घरगृहस्थी पूरी तरह से सौंप कर अपने काम में लगा रहता था। सुषमा मन ही मन पूरी तरह राहुल की दोस्ती के रंग में डूबी हुई थी। पहले उसे विशाल में एक दोस्त नजर आता था, अब उसे विशाल में एक दोस्त की झलक भी नहीं दिखती।

यह क्या उसी की गलती थी। विशाल को अब उस की कोमल भावनाएं छू कर भी नहीं जाती थीं। राहुल में उसे एक दोस्त नजर आता है। वह उस की बातों में रुचि लेता है, उस के शौक ध्यान में रखता है, उस की पसंदनापसंद पर चर्चा करता है। उसे बस एक दोस्त की ही तो तलाश थी। वह उसे राहुल के रूप में मिल गया है। उसे और कुछ नहीं चाहिए।

एक दिन विशाल टूर पर था। यश और समृद्धि किसी बर्थडे पार्टी में गए थे। अंधेरा हो चला था। राहुल भी अभी तक नहीं आया था। सुषमा लौन में टहल रही थी। राहुल आया, नीचे सिर किए हुए मुंह लटकाए ऊपर अपने कमरे में चला गया। सुषमा को देख कर भी रुका नहीं तो सुषमा को उस की फिक्र हुई। वह उस के पीछेपीछे ऊपर गई। जब से राहुल आया था वह कभी उस के रूम में नहीं जाती थी। मेड ही सुबह सफाई कर आती थी। उस ने जा कर देखा राहुल आंखों पर हाथ रख कर लेटा है।

सुषमा ने पूछा, ‘‘क्या हो गया, तबीयत तो ठीक है?’’

राहुल उठ कर बैठ गया। फिर धीमे स्वर में बोला, ‘‘मैं ठीक हूं।’’

‘‘तो रोनी सूरत क्यों बनाई हुई है?’’

‘‘भैया ने बाइक के पैसे भेजे थे, मेरे दोस्त उमेश की बहन की शादी है, उसे जरूरत पड़ी तो मैं ने उसे सारे रुपए दे दिए। अब भैया बाइक के बारे में पूछेंगे तो क्या कहूंगा, कुछ समझ नहीं आ रहा है। वही उमेश याद है न आप को। यहां एक बार आया था और मैं ने उसे आप से भी मिलवाया था।’’

‘‘हांहां याद आया,’’ सुषमा को वह लड़का याद आ गया जो उसे पहली नजर में ही कुछ जंचा नहीं था। बोली, ‘‘अब क्या करोगे?’’

‘‘क्या कर सकता हूं? भैया को तो यही लगेगा कि मैं यहां आवारागर्दी कर रहा हूं, वे तो यही कहेंगे कि सब छोड़ कर वापस आ जाओ, यहीं पढ़ो।’’

राहुल के जाने का खयाल ही सुषमा को सिहरा गया। फिर वही अकेलापन होगा, वही बोरियत अत: बोली, ‘‘मैं तुम्हें रुपए दे दूंगी।’’

‘‘अरे नहींनहीं, यह कोई छोटी रकम नहीं है।’’

‘‘कोई बात नहीं, मेरे पास बच्चों की कोचिंग की फीस रखी है। मैं तुम्हें दे दूंगी।’’

‘‘लेकिन मैं ये रुपए आप को जल्दी लौटा दूंगा।’’

‘‘हांहां, ठीक है। मुझ से कल रुपए ले लेना। अब नीचे आ कर खाना खा लो।’’

सुषमा नीचे आ गई। अपनी अलमारी खोली। सामने ही रुपए रखे थे। सोचा अभी राहुल को दे देती हूं। उसे ज्यादा जरूरत है इस समय। बेचारा कितना दुखी हो रहा है। अभी जा कर पकड़ा देती हूं। खुश हो जाएगा। वह रुपए ले कर वापस ऊपर गई। राहुल के कमरे के दरवाजे के बाहर ही उस के कदम ठिठक गए।

वह फोन पर किसी से धीरेधीरे बात कर रहा था। न चाहते हुए भी सुषमा ने कान उस की आवाज की तरफ लगा दिए। वह कह रहा था, ‘‘यार उमेश, मोबाइल और बाइक का इंतजाम तो हो गया। सोच रहा हूं अब क्या मांगूगा। अमीर औरतों से दोस्ती करने का यही तो फायदा है, उन्हें अपनी बोरियत दूर करने के लिए कोई तो चाहिए और मेरे जैसे लड़कों को अपना शौक पूरा करने के लिए कोई चाहिए।’’

‘‘मुझे तो यह भी लगता है कि थोड़ी सब्र से काम लूंगा तो वह मेरे साथ सो भी जाएगी। बेवकूफ तो है ही… सबकुछ होते हुए भटकती घूमती है। मुझे क्या, मेरा तो फायदा ही है उस की बेवकूफी में।’’

सुषमा भारी कदमों से नीचे आ कर कटे पेड़ सी बैड पर पड़ गई। लगा कभीकभी इंसान को परखने में मात खा जाती है नजरें। ऐसे जैसे कोई पारखी जौहरी कांच को हीरा समझ बैठे।

तीखी कचोट के साथ उसे स्वयं पर शर्म आई। इतने दिनों से वह राहुल जैसे चालाक इंसान के लिए बेचैन रहती थी, सही कह रहा था राहुल। वही बेवकूफी कर रही थी। अकेलेपन के एहसास से उस के कदम जिस राह पर बढ़ चले थे, अगर कभी विशाल और बच्चों को उस के मन की थाह मिल जाती तो क्या इज्जत रह जाती उस की उन की नजरों में।

तभी विशाल की आवाज कानों में गूंजी, ‘‘अकेलेपन से हमेशा दुखी रहने और नियति को कोसने से तो अच्छा है कि हम चीजों को उसी रूप में स्वीकार कर लें जैसी वे हैं। तुम ऐसा करोगी तभी खुल कर सांस ले पाओगी।’’

इस बात का ध्यान आते ही सुषमा को कुछ शांति सी मिली। उस ने कुदरत को धन्यवाद दिया, उम्र के इस मोड़ पर अभी इतनी देर नहीं हुई थी कि वह स्थिति को संभाल न सके। वह कल ही राहुल को यहां से जाने के लिए कह देगी और यह भी बता देगी वह इतनी बेवकूफ नहीं कि अपने पति की कमाई दूसरों की भावनाओं से खेलने वाले लड़के पर लुटा दे।

वह अपने जीवन की पुस्तक के इस दुखांत अध्याय को सदा के लिए बंद कर रही है ताकि वह अपने जीवन की नई शुरुआत कर सके। कुछ सार्थक करते हुए जीवन का शुभारंभ करने का प्रयत्न तो वह कर ही सकती है। अब वह नहीं भटकेगी। क्रोध, घृणा, अपमान और पछतावे के मिलेजुले आंसू उस की आंखों से बह निकले लेकिन अब सुषमा के मन में कोई दुविधा नहीं थी। अब वह जीएगी अपने स्वयं के सजाएसंवरे लमहे, अपनी खुद की नई पहचान के साथ अचानक मन की सारी गांठें खुल गई थीं। यही विकल्प था दीवाने मन का।

उस ने फोन उठा लिया, राहुल के भाई को फोन कर दिए गए पैसों की सूचना देने के लिए और उन्हें वापस मांगने के लिए।

प्यार कोई खेल नहीं है

कहते है प्यार की कोई उम्र नहीं होती, कोई उम्र देख कर प्यार नहीं करता है। लेकिन कभी कभी उम्र के वजह से विचारो में बहुत अंतर हो जाते है और एक दूसरे को समझना मुश्किल हो जाता है।

अनन्या अपने दोस्तो के साथ पिकनिक मनाने के लिए गई थी।

उस पिकनिक स्पॉट पर और भी बहुत लोग थे।

कोई अपने फैमिली के साथ था थो कोई अपने दोस्तो के साथ। वहा अनन्या की नजर एक लड़के पर गई, वो भी अपने दोस्तो के साथ पिकनिक मनाने के लिए आया हुआ था।

अनन्या को वो लड़का बहुत अच्छा लगा, वो उसे देखे जा रही थी, उसकी नजर उस से हट ही नहीं रही थी, वो अपने दोस्तो के साथ थ्रो बॉल खेल रहा था।

जब शाम हुई घर जाने का वक्त हुआ तो अनन्या ने जाते जाते उसके एक दोस्त से उसके बारे में थोड़ा पूछताछ किया फिर अनन्या को पता चला कि उसका नाम राहुल है।

अनन्या घर जा कर उसे सोशल मीडिया पर ढूंडने लगी।

राहुल उसे फेसबुक पर मिला उसने तुरंत राहुल को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दिया और इंतजार कर रही थी कब वो उसका रिक्वेस्ट एक्सेप्ट करेगा।

अगले दिन जब सुबह अनन्या सो कर उठी तो सबसे पहले वो अपने फेसबुक अकाउंट पर गई देखने के लिए कि राहुल ने उसका रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किया है कि नहीं, लेकिन वो उदास हो गई क्युकी अभी तक उसका रिक्वेस्ट एक्सेप्ट नहीं हुआ था।

फिर वो अपने बाकी काम में लग गई , दोपहर मे उसने देखा तो राहुल ने उसका फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर लिया था। वो तुरंत राहुल के प्रोफ़ाइल पर गई और उसके पहले के सब पोस्ट, उसके फोटो देखने लगी उसने राहुल के जन्मदिन की तारीख देखी कुछ दिनों पहले ही उसका जन्मदिन था, अनन्या ने ये भी देखा की राहुल उस से उमर में छोटा है, लेकिन अनन्या को इस से कोई फर्क नहीं पड़।

उसने राहुल को मेसेज भी कर दिया।

फिर वो राहुल से रोज बात करती थी। वो राहुल से उसके बारे में पूछती थी, उसकी पसंद ना पसंद सब। राहुल मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था। अनन्या की ग्रेजुएशन हो गई थी।

एक दिन अनन्या राहुल के कॉलेज चली गई उसे देखने के लिए।

वो कॉलेज के बाहर ही खड़ी थी, वो राहुल का इंतजार कर रही थी।

राहुल अपने दोस्तो के साथ कॉलेज से बाहर निकला, उसके साथ 3 लड़कियां और 1 लड़का था, अनन्य राहुल को लड़कियों के साथ देख कर बहुत बुरा लगा, अनन्या उसके पास नहीं गई बस दूर से ही देखी। अनन्या ने घर आ कर राहुल को मेसेज किया की आज मैंने तुम्हे देखा। राहुल उस वक़्त ऑनलाइन ही था, उसने पूछा कहा, अनन्या ने कहा आज मै तुम्हरे कॉलेज आई थी, राहुल ने बोला आई थी तो मिली क्यों नहीं मुझसे, अनन्या बोली तुम अपने दोस्तो के साथ जा रहे थे और तुम्हारे साथ कुछ लड़कियां भी थी, एक बात पूछूं?

राहुल ने बोला हां पूछो।

अनन्या बोली क्या तुम्हारी गर्लफ्रेंड है।

उस वक़्त राहुल ने उसका मेसेज नहीं देखा, अनन्या इंतजार करती रही कि अब आयेगा राहुल का रिप्लाइ, लेकिन बहुत देर हो गई थी, राहुल ने रिप्लाइ नहीं किया था।

अगले दिन सुबह राहुल का रिप्लाइ आया कि नहीं है उसकी कोई गर्लफ्रेड, ये मेसेज देख कर अनन्या खुश हो गई। राहुल ने ये भी पूछा था कि क्यों पूछ रही हो ये। अनन्या बोली कुछ नहीं बस ऐसेही जानना था।अनन्या की बातो से राहुल को लगा कि शायद अनन्या उस से प्यार करती है, उसे भी अनन्या अच्छी लगती थी, ये जानते हुए भी अनन्या उस से उमर में बड़ी है फिर भी उसने कुछ दिनों बाद अनन्या को प्रपोज कर दिया।

अनन्या तो मानो सातवे आसमान पे थी, उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि वो जिस से प्यार करती है उसने सामने से खुद उसे प्रपोज किया है, वो खुद को दुनिया की सबसे खुशिस्मत लड़की मान ने लगी, वो नाच रही थी, खुशी मना रही थी।

मानो की अनन्या पागल सी हो गई थी। उसने राहुल को हा बोल दिया। वो दोनो रोज़ बाते करते,राहुल के कॉलेज के बाद मिलते थे साथ घूमने जाते थे।

उनके रिलेशन को लगभग 1 साल हो गए थे।

राहुल का तीसरा साल था मेडिकल में।

अनन्या अब जॉब करती थी, जॉब के वजह से वो पहले की तरह रोज़ राहुल से नहीं मिल पाती थी।

वो दिन भर जॉब में व्यस्त रहती थी और रात को फोन पर ही ज्यदा टाइम एक दूसरे से बात करते थे, और रविवार के दिन दोनों मिलते थे। जैसे जैसे समय बीतता गया दोनों के बीच झगड़े होने लगे।

राहुल उसे अब इग्नोर करने लगा था, वो अनन्या को दिन भर कुछ मेसेज नहीं करता था कि वो कहा है कैसी है, उसने खाना खाया की नहीं।

अनन्या रात में जॉब से आकर राहुल को फोन करती थी, लेकिन उस वक़्त भी बाते काम और झगड़े ज्यदा होते थे।

अनन्या को ये बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था, वो चाहती थी कि राहुल उसे समझे की वो अब जॉब भी करती है तो पूरा टाइम उसे नहीं दे सकती, उसे भी अपना एक्रीर बनाना है, अनन्या राहुल को छोड़ भी नहीं सकती थी बहुत प्यार जो करती थीं उस से। फिर अनन्या ने सोचा कि अब वो ऑफिस से हाफ डे की छुट्टी ले कर राहुल से कभी कभी मिलने आजाया करेगी, इस से शायद झगड़े काम हो उनके बीच और वो दोनों एक दूसरे को टाइम दे सके।

फिर अगले ही दिन वो हाफ डे की छुट्टी ले कर राहुल से मिलने उसके कॉलेज गई।

उधर उसने देखा कि राहुल कॉलेज के बाहर एक लड़की के साथ था, उसी समय अनन्या ने राहुल को फोन किया, राहुल ने फोन देखा की अनन्या का कॉल आरहा है लेकिन उसने फोन नहीं उठाया, उसने फिर फोन किया राहुल ने इस बार भी फोन नही उठाया।

फिर अनन्या गुस्से में घर चली गई, शाम को राहुल ने उसे फोन किया, अनन्या ने पूछा कहा थे तुम मैंने तुम्हे दोपहर में कॉल किया था, राहुल ने कहा कॉलेज में था इस लिए फोन नहीं उठाया था, ये सुन कर अनन्या को और गुस्सा आ गया कि राहुल झूठ बोल रहा है, इसका मतलब राहुल ज़रूर मुझसे कुछ छुपा रहा है।

दो दिन बाद फिर अनन्या उसके कॉलेज गई, वहा उसे वो लड़की दिखी जिसे अनन्या ने राहुल के साथ तब देखा था जब वो पहली बार राहुल से मिलने कॉलेज गई थी।

अनन्या ने उस से बात किया, उसने पूछा तुम राहुल को जानती हो?

वो इसी कॉलेज में पढ़ता है, वो बोली हां जानती हूं वो मेरा दोस्त है।

फिर अनन्या ने उस से पूछा अभी क्या वो अपने क्लास में है, वो लड़की बोली नहीं वो अपनी गर्लफ्रंड के साथ आज घूमने गया है।

ये सुनते ही अनन्या को जैसे दिल का दौरा ही पड़ गया, उसने खुद को संभाला और पूछा उसकी गर्लफ्रेंड है? वो बोली हां है ना पिछले साल उनका ब्रेकअप हो गया था लेकिन अब फिर कुछ दिनों से दोनों साथ है, अनन्या ने उस से राहुल की गर्लफ्रेंड का नाम भी पूछा उसने बोला प्रिया।

ये सब कुछ सुन कर अनन्या को बहुत गुस्सा आरहा था।

वो सीधा अपने घर गई, वो बहुत रोई की मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ क्या गलती थी मेरी अगर वो किसी और से प्यार करता था तो मुझे क्यों प्रपोज किया?

क्या मै उसके लिए बस एक खिलौना हूं।

शाम को अनन्या ने राहुल को फोन किया, उसने पूछा कहा थे तुम पूरा दिन सुबह से ना एक मेसेज ना एक कॉल, राहुल बोला मैं कॉलेज में ही था, पढ़ाई का टेंशन है थोड़ा।

उस वक़्त तो अनन्या चीड़ गई और गुस्से में बोली ये प्रिया कौन है।

राहुल कुछ सेकंड रुक गया फिर बोला कौन प्रिया, अनन्या बोली अच्छा तुम किसी प्रिया को नहीं जानते, वो बोला नहीं। फिर अनन्या बोली मै उसी प्रिया के बारे में बात कर रही हूं जिसके साथ आज तुम घूमने गए थे। ये सुनते ही राहुल ने कॉल कट कर दिया। अनन्या उसे फोन करती रही लेकिन वो फोन नहीं उठाया। अनन्या ने उसे मेसेज किया की राहुल फोन उठाओ मुझे बस मेरे कुछ सवालों के जवाब चाहिए, उसके बाद भी राहुल ने फोन नहीं उठाया।

अनन्या ने उसे मेसेज किया कि कल मै तुम्हारे कॉलेज आरही हूं मुझे मिलना है।

इसपर राहुल ने तुरंत रिप्लाइ किया कॉलेज में नहीं तुम मुझे कॉलेज से पहले एक गार्डन आता है वहा मिलो, वो नहीं चाहता था कि कॉलेज में उसका नाम खराब हो और उसकी गर्लफ्रेंड को कुछ पता चले।

अगले दिन अनन्या उस से मिलने गई, उसने पूछा क्यों किया तुमने ऐसा, क्या गलती थी मेरी, तुमने मुझे खुद प्रपोज किया था, अगर तुम्हारी पहले से ही गर्लफ्रेंड थी तुम उस से प्यार करते थे तो मुझसे प्यार का नाटक क्यू।

फिर राहुल बोला जब मैंने तुम्हे प्रपोज किया था तब प्रिया मेरे साथ नहीं थी, लेकिन तुम अब अपने जॉब में व्यस्त हो गई थी, प्रिया मुझे रोज़ कॉल मेसेजेस करती थी और हमारे बीच की गलत फेमी अब दूर हो गई है जो पहले हुई थी और हम अलग हो गए थे, मै उसे प्यार करता हूं।

फिर अनन्या बहुत गुस्से में बोली प्यार क्या कोई खेल है क्या आज इसके साथ कल उसके साथ, क्या समझते हो तुम खुद को।

राहुल ने कहा जो कुछ भी हुआ उसके लिए मुझे माफ करदो लेकिन मै तुम्हारे साथ नहीं रह सकता, मै प्रिया से प्यार करता हूं। अनन्या बिना कुछ कहे वहा से चली गई।

उलझन

शिखा के जन्मदिन पर कपिल उसे शादी का प्रस्ताव देने का मन बना चुका था, मगर उस से पहले ही शिखा की मैडिकल फाइल उसे पढ़ने को मिली और उस का विचार बदल गया। आखिर क्या लिखा था उस फाइल में।

जैसे जैसे शिखा के जन्मदिन की पार्टी में जाने का समय नजदीक आ रहा है, मेरे मन की बेचैनी बढ़ती ही जा रही है। मैं उस के घर जाने के लिए पूरी तरह से तैयार हूं पर अपने फ्लैट से कदम निकालने की हिम्मत नहीं हो रही है।

मैं करीब 2 महीने पहले शिखा से पहली बार अपने कालेज के दोस्त समीर के घर मिला था। उसी मौके पर मेरा समीर की पत्नी अंजलि, उस के दोस्त मनीष और उस की प्रेमिका नेहा से भी परिचय हुआ था।

शिखा के सुंदर चेहरे से मेरी नजरें हट ही नहीं रही थीं। वह जब छोटीछोटी बातों पर दिल खोल कर हंसती तो सामने वाला खुदबखुद मुसकराने लगता था।

मैं ने मौका पा कर समीर से अकेले में पूछा, ‘‘क्या शिखा का कोई बौयफ्रैंड है?’’

‘‘नहीं,’’ उस ने मेरे चेहरे को ध्यान से पढ़ते हुए जवाब दिया।

‘‘गुड,’’ उस का जवाब सुन मेरा मन खुशी से उछल पड़ा, ‘‘तू उस से मेरी दोस्ती करा दे, यार।’’

‘‘कपिल, मैं उस के साथ तेरी दोस्ती नहीं सिर्फ परिचय करा सकता था और वह मैं ने करा दिया।’’

‘‘मुझे शिखा से पहली नजर में ही प्यार हो गया है।’’

मेरे मुंह से ये शब्द सुन कर वह हंसा, ‘‘तू ज्यादा बदला नहीं है। कालेज में भी आए दिन तुझे पहली नजर में प्यार कराने वाला कीड़ा काटता रहता था।’’

‘‘पुरानी बातें भूल जा, मेरे दोस्त अब मैं अपना घर बसाना चाहता हूं। मुझे लगता है कि शिखा ही मेरे सपनों की राजकुमारी है,’’ मैं ने उसे विश्वास दिलाने की कोशिश करी कि मैं प्यार के इस ताजा मामले में एकदम सीरियस हूं।

पहली मुलाकात में ही शिखा ने मेरे दिलोदिमाग पर जबरदस्त जादू कर दिया था। उसे अपना बनाने की चाह ने मेरी रातों की नींद और दिन का चैन छीन लिया।

उस मुलाकात के तीसरे दिन शाम को ही मैं शिखा से उस के औफिस के बाहर मिला। वह मुझे देख कर खुश हुई। फिर हम कौफी पीने के लिए एक रेस्तरां में जा बैठे।

हमारे बीच उस शाम ढेर सारी बातें हुईं। हंसीखुशी से बातें करते हुए कब घंटाभर बीत गया, हम दोनों को ही पता नहीं चला।

बाद में उसे उस के घर तक कार से छोड़ने गया। मैं खुद उस के मम्मीपापा से मिलना चाहता था, क्योंकि मेरे लिए उन दोनों का दिल जीतना जरूरी था।

शिखा अपने मातापिता के साथ 3 कमरों के फ्लैट में रह रही थी। उस की मम्मी के कमर दर्द और पापा के बागबानी के शौक के बारे में मैं ने पूरी दिलचस्पी के साथ ढेर सारी बातें कर के दोनों के दिल में अपनी जगह बना ली। मेरे अच्छे व्यवहार का जादू उन दोनों के सिर चढ़ कर बोला और फिर उन्होंने मुझे रात का खाना खिला कर ही बिदा किया।

शहर के जिन नामी हड्डियों के डाक्टर से 2 दिन बाद मैं ने शिखा की मम्मी का इलाज शुरू कराया उन की दवा से उन्हें बहुत फायदा हुआ।

अगले संडे की शाम को मुझ से बागबानी पर एक पुस्तक की भेंट पा कर शिखा के पिता ने मुझे बड़े अपनेपन के साथ छाती से लगाया तो मुझे अपनी मंजिल मिल जाने का विश्वास हो चला।

मेरे आग्रह पर शिखा कुछ दिनों के बाद मेरे साथ बाहर घूमने चली आई। मैं उस का दिल जीतने का वह मौका नहीं चूका। जब मैं ने अचानक उसे गुलाब के फूलों का गुलदस्ता भेंट किया तो वह खुशी से फूली नहीं समाई।

धीरेधीरे हमारे बीच मिलनाजुलना बढ़ता गया। उसे अपने साथ खूब खुश देख कर मेरा दिल कहता कि वह मुझ से शादी करने को जल्दी राजी हो जाएगी।

‘‘तुम्हारे जैसा सुंदर, सुशील, स्मार्ट व कमाऊ लड़का अभी तक बिना

गर्लफ्रैंड के कैसे है?’’ कुछ दिनों बाद मेरे साथ एक दिन पार्क में घूमते हुए शिखा ने अचानक यह सवाल पूछा तो मैं मन ही मन बहुत बेचैन हो उठा।

मैं ने अपने मन की उथलपुथल को काबू में रख सहज आवाज में जवाब दिया, ‘‘शिखा, मेरी जानपहचान तो बहुत सारी लड़कियों से है पर कभीकभी मुझे भी यह सोच कर बहुत हैरानी होती है कि मेरी जिंदगी में आज तक मेरे सपनों की राजकुमारी क्यों नहीं आई।’’

‘‘सपनों की राजकुमारी या राजकुमार कम ही मिलते हैं, कपिल।’’

‘‘मुझे क्या मेरे सपनों की राजकुमारी मिलेगी?’’ मैं ने प्यार से उस की आंखों में झांकते हुए पूछा।

‘‘मुझे क्या पता?’’ कह उस का शरमा जाना मेरे मन को गुदगुदा गया।

मैं अगले दिन औफिस बहुत खुश मूड में पहुंचा। मेरी सहयोगी रितु मेरे चैंबर में आई और बोली, ‘‘शनिवार और इतवार को कहां गायब रहे, कपिल?’’

‘‘तबीयत ठीक नहीं थी,’’ उस की नाराजगी दूर करने के लिए मैं ने उस के गाल पर छोटा सा चुंबन अंकित करा।

‘‘इस शनिवार को मेरे साथ रहोगे या मैं कोई और प्रोग्राम बना लूं?’’

‘‘पक्का तुम्हारे साथ रहूंगा,’’ उस के गाल पर शरारती अंदाज में चिकोटी काट कर मैं काम में लग गया।

शिखा से मैं ने पिछले दिन झूठ बोला था। अब तक बहुत सारी लड़कियां मेरी प्रेमिकाएं रह चुकी थीं पर शिखा उन सब से बहुत बेहतर थी। अच्छी पत्नी बनने के सारे गुण उस में मौजूद हैं। मैं ने मन ही मन उस के साथ शादी करने का पक्का फैसला कर लिया।

शनिवार की रात मैं ने रितु के साथ डिनर किया और फिर रात उस की बांहों में उस के फ्लैट में गुजारी। सचाई यही है कि मुझे ऐसा करते हुए कैसी भी ग्लानि महसूस नहीं हुई, क्योंकि तब तक मैं ने शिखा से शादी का कोई वादा तो किया नहीं था।

वैसे 2 हफ्ते बाद आए रविवार को शिखा के सामने शादी का प्रस्ताव रख मैं ने इस कमी को पूरा कर दिया था।

‘‘तुम्हारे बिना मुझे अपनी जिंदगी अधूरी सी लगने लगी है, शिखा। तुम हमेशा के लिए मेरी हो जाओ, मेरे सपनों की राजकुमारी,’’ मैं ने उस की आंखों में प्यार से झांकते हुए कहा तो उस के गोरे गाल गुलाबी हो उठे।

‘‘जिंदगी की राहों में तुम्हारी हमसफर बन कर मुझे बहुत खुशी होगी, कपिल।’’

इन शब्दों में उस की ‘हां’ सुन कर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

फिर हमारे बीच यह फैसला हुआ कि 3 दिन बाद शिखा के जन्मदिन के अवसर पर हम शादी करने के अपने फैसले से सब दोस्तों, रिश्तेदारों व परिवार के सदस्यों को अवगत करा कर सरप्राइज देंगे।

अगली रात 9 बजे के करीब बिना सूचना दिए समीर, अंजलि, मनीष और नेहा मुझ से मिलने मेरे फ्लैट पर आए।

मेरी तरफ नीले कवर वाली एक फाइल बढ़ाते हुए मनीष बहुत गंभीर लहजे में बोला, ‘‘कपिल, इस फाइल को पढ़ो।’’

पढ़ कर मुझे मालूम पड़ा कि वह शिखा की मैडिकल फाइल थी। उस ने करीब 10 महीने पहले नींद की गोलियां खा कर आत्महत्या करने की कोशिश करी थी।

‘‘इस फोटो में शिखा के साथ उस का प्रेमी राजीव खड़ा था। इसी के हाथों प्यार में धोखा खा कर शिखा ने आत्महत्या करने की कोशिश करी थी,’’ अंजलि ने अपने पर्स से निकाल कर एक पोस्टकार्ड साइज का फोटो मेरे हाथ में पकड़ा दिया।

मनीष ने दांत पीसते हुए बताया, ‘‘यह धोखेबाज इंसान एक तरफ तो शिखा से शादी करने का दम भरता था और दूसरी तरफ शिमला में अपनी पुरानी प्रेमिका के साथ होटल में गुलछर्रे उड़ा रहा था। यह खबर शिखा को अपनी जानपहचान की लड़की से मिली तो उसे इतना गहरा सदमा पहुंची कि उस ने आत्महत्या करने की कोशिश करी।’’

‘‘तुम मेरी इस टेढ़ी उंगली को देखो। मुझे राजीव एक बार किसी पार्टी में मिला था। मैं ने गुस्से से पागल हो कर उस के ऊपर इतने घूंसे बरसाए कि मेरी इस उंगली में फ्रैक्चर हो गया। नेहा ने रोक लिया नहीं तो मैं उसे उस दिन जान से ही मार देता।’’

समीर ने गुस्से से लाल हो रहे मनीष को शांत करने के बाद मुझ से कहा, ‘‘शिखा के अंदर वैसा दूसरा सदमा सहने की ताकत नहीं है, कपिल। अगर तुम्हें लगता है कि तुम उस के प्रति जिंदगीभर वफादार नहीं रह पाओगे तो कल उस के जन्मदिन की पार्टी में मत आना। उसे दुख तो बहुत होगा पर हम उसे संभाल लेंगे।’’

अंजलि ने मुझ से भावुक लहजे में प्रार्थना करी, ‘‘फैसला सोचसमझ कर

करना, कपिल। अगर शिखा के हित के खिलाफ जाने वाला कोई रिश्ता आज भी तुम्हारी जिंदगी में बना हुआ है तो उसे आज रात जड़ से नष्ट कर देना। हमेशा उस के प्रति वफादार रहने का प्रण कर ही कल की पार्टी में आना, प्लीज।’’

इस के बाद सभी बारीबारी से मुझे गले लगा कर चले गए। मैं रातभर ठीक से नहीं सो सका। अगले दिन औफिस भी नहीं जा सका। सारा दिन गहन सोचविचार करने के बावजूद किसी फैसले पर पहुंचना संभव नहीं हुआ।

मैं शिखा से शादी करना चाहता हूं पर अपने मन की कमजोरी का भी मुझे एहसास है। किसी एक स्त्री का हो कर रहना मेरी फितरत में नहीं है।

मुझे फैसला सोचसमझ कर ही करना था, क्योंकि मैं ने अब तक जिन लड़कियों के साथ प्यार का खेल खेला था, उन सब के ऐसे खतरनाक शुभचिंतक दोस्त नहीं थे।

फिर धीरेधीरे जबरदस्त टैंशन का शिकार बने मेरे मन में यह बात जड़ें जमाने लगीं कि मैं न शिखा के लायक हूं और न ही उस के शुभचिंतकों की दोस्ती या दुश्मनी के।

ऐसा सोच कर मैं ने शिखा की जिंदगी से निकलने का कठिन और दिल दुखाने वाला फैसला आखिरकार कर ही लिया।

मैं जूते खोल कर वापस पलंग पर लेट गया। मेरे बहुत रोकने के बावजूद आंखों में बारबार आंसू भर आते थे।

8 बजे के करीब मेरे मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी तो मैं ने फोन को स्विच्ड औफ कर दिया।

फिर 9 बजे के करीब बाहर से किसी ने घंटी बजाई तो मैं चौंक कर उठ बैठा। दरवाजा खोला तो सामने शिखा को देख मेरा दिल बैठ गया।

‘‘मुझे विश नहीं करोगे?’’ उस ने सहज भाव से मेरे हाथ अपने हाथों में ले लिए।

‘‘हैप्पी बर्थडे,’’ मैं ने जबरदस्ती मुसकराते हुए उसे शुभकामनाएं दीं।

‘‘ऐसे नहीं, जरा प्यार से विश करो,’’ कह वह मेरे गले लग गई।

‘‘हैप्पी बर्थडे, माई लव,’’ पता नहीं कैसे ये शब्द मेरे मुंह से खुद ही निकल कर मुझे हैरान कर गए।

‘‘मुझे मेरे दोस्तों ने कल रात तुम से हुई मुलाकात के बारे में सब बता दिया है, कपिल,’’ वह सहज भाव से मुसकरा रही थी।

‘‘मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं, शिखा बाद में तुम्हारा दिल तोड़ूं उस से अच्छा यह होगा कि हम अभी अलग…’’

उस ने मेरे मुंह पर हाथ रख कर मुझे खामोश कर कहा, ‘‘अब मैं पहले जितनी कमजोर और भावुक नहीं रही हूं। मुझे भी पहली नजर में तुम से प्यार हो गया था और अब इतनी आसानी से तुम्हें नहीं खोऊंगी… तुम्हें मेरा प्यार जरूर बदल डालेगा।’’

‘‘मुझे डर है कि मैं तुम्हारे इस विश्वास पर खरा नहीं उतर सकूंगा।’’

‘‘मेरे इस विश्वास के कारण को समझ लोगे तो ऐसा नहीं कहोगे। आज मेरी बर्थडे पार्टी में न आ कर तुम ने जिस ईमानदारी का सुबूत दिया है उस का मेरी नजरों में बहुत महत्त्व है। यही ईमानदारी तुम्हारे अंदर भावी बदलाव का बीज बनेगी।’’

‘‘यह कदम तो मैं ने तुम्हारे शुभचिंतकों की धमकी से डर कर उठाया था,’’ मेरे होंठों पर उदास सी मुसकान उभरी।

‘‘वे मुझे बहुत प्यार करते हैं पर तुम्हें धमकाने का उन्हें कोई अधिकार नहीं था। मैं सचमुच तुम से दूर नहीं होना चाहती हूं,’’ कह वह मेरी छाती से आ लगी।

‘‘मैं भी,’’ मैं ने उसे बहुत मजबूती से अपनी बांहों के घेरे में कैद कर लिया।

उस पल मेरे दिलोदिमाग में कोई उलझन या अनिश्चितता बाकी नहीं बची थी। उस की आंखों में लहरा रहे प्यार के सागर को देख कर मुझे विश्वास हो चला था कि भविष्य में कोई रितु मुझे कभी ललचा कर शिखा के प्रति बेवफाई करने को मजबूर नहीं कर सकेगी।

अमन-राधिका की अनोखा प्रेम कहानी

नाम सुन के क्या लगता हैं आपको? प्यार का एहसास क्या होता हैं। तो चलिए आज हम आपको बताते हैं प्यार का एहसास का मतलब क्या होता हैं।

ये कहानी एक रईस परिवार की लड़की जिसका नाम राधिका है और दूसरी और एक मध्यम परिवार का लड़का जिसका नाम अमन हैं। दोनों एक दूसरे से बहुत अलग हैं लेकिन क्या उन्हें एक दूसरे से प्यार हो पायेगा चलिए जान लीजिये आप खुद ही।

राधिका बचपन से एक आलिशान घर, गाडी, और रहन-सहन में पली बड़ी है।

वही अमन बचपन से अपने परिवार को संघर्ष करता देख बड़े होते होते उससे अपने जिम्मेदारी का एहसास होने लगा।

ज्यादा पैसे न होने के कारन से वो ज्यादा पढ़-लिख ना सका , वही दूसरी और सब कुछ होने के बाद भी राधिका को पढ़ने - लिखने का मन ना होने के कारन पढ़ ना सकी। वक़्त के साथ साथ दोनों बड़े हुए अपने अपने रहन-सहन से।

एक और अमन एक छोटे से कार कंपनी में काम करने लगा। वही दूसरी और राधिका अपने जिंदगी घूमने मस्ती में बिताने लगी। एक दिन आया जब दोनों का एक दूसरे से सामना हुआ, वो कुछ इस तरह हुआ की एक दिन अमन एक कार को टेस्टिंग करने निकला था, वही राधिका अपने दोस्तों के साथ कार में घूमने निकली थी। थोड़ी दूर जा के राधिका की गाडी ख़राब हो गयी और उसी वक़्त अमन ने देखा की कोई वहा लिफ्ट मांगते हाथ दिखा रहा हैं।

अमन गाडी साइड में कर उतर के राधिका की और गया फिर क्या राधिका उससे देख पूछने लगी - "क्या आप हमे थोड़ी दूर तक छोड़ सकते हैं ? " अमन उसकी बातों को सुन के चुप चाप गाडी की और गया और गाडी चेक करने लगा।

ये देख राधिका को अच्छा नहीं लगा की वो किसी से पूछ रही है और अमन जवाब नहीं दे रहा। अमन कुछ देर बाद बिना किसी से कुछ कहे चले जाता है। ये देख राधिका को कुछ समझ नहीं आया तभी पीछे से आवाज आते हुए - " राधिका गाडी चालू हो गयी अंदर आजा " ये सुन राधिका उससे सुक्रिया करने जाती तब तक अमन निकल चूका था। राधिका फिर गाडी में बैठ चले गयी।

एक दिन आया जब राधिका का जन्मदिन था वो हर साल की तरह अपने परिवार के साथ मंदिर गयी वहा उसने अमन को फिरसे देखा वो देखते ही उसके पास गयी उससे उस दिन के लिए सुक्रिया कहने, ये सुन अमन ने उससे देख मुस्कुरा दिया। ये देख राधिका ने अमन से पुछा - " क्या तुम बोल नहीं सकते ? उस दिन भी मैंने पुछा था तब भी कुछ नहीं बोले आज भी जब मैं खुद आयी तुम्हारे पास तुम्हे सुक्रिया कहने तोह आज भी बस मुस्कुरा दिए और कुछ कहा नहीं।

फिर अमन ने कहा की मुझे देर हो रही थी लेकिन मैंने वहां तुम्हे देखा की तुम लिफ्ट मांग रहे थे इसीलिए मैंने गाडी रोक के तुम्हारी गाडी ठीक करने चले आया।

फिर दोनों के बीच बाते चलने लगी फिर अमन को देर हो रही थी तो अमन ने कहा की अब मुझे जाना होगा मुझे ऑफिस के लिए लेट हो रहा है। जाते जाते अमन ने उससे दोस्ती की हाथ बढ़ाया कहा की क्या हम दोस्त बन सकते है ये सुन राधिका ने कहा - " मुझसे दोस्ती ? में हर किसी से दोस्ती नहीं करती। ये सुन अमन ने हस्ते हुए कहा - " चलो ठीक है कोई नहीं वक़्त बताएगा की दोस्ती करते हो या नहीं आप।

ये बोल के वो चल दिया और वहा राधिका भी अपने घर की और निकल पड़ी।

कुछ दिनों बाद राधिका और अमन एक मॉल में मिलते है, अमन देख राधिका से पुछा - " तुम यहां कैसे ? राधिका देखते हुए -" बस युही घूमने के लिए आयी हु तुम्हारा आज ऑफिस नहीं है जो यहां आये हुए हो ? अमन ने कहा आज बस जल्दी काम खत्म हो गया था तो सोचा थोड़ा घूम लू। फिर दोनों एक कैफ़े में गए और बाते करने लगे।

राधिका ने अमन से कहा - " अपने बारे में बताओगे कुछ ?

अमन हस्ते हुए कहने लगा - " में क्या बताऊ अपने बारे में मेरा तो बस एक साधा जिंदगी है जहाँ रोज सुबह ऑफिस जाता हूँ और शाम को घर जा के घर का कुछ काम कर लेता हूँ बस फिर खा के सो जाना फिर वही सुबह फिरसे।

फिर अमन ने पुछा आप क्या करते हो ये सुन राधिका हसने लगी और कहा -" मुझे कुछ करने की जरुरत ही नहीं पड़ती सब बिना कुछ किये ही मिल जाता हैं तो क्यों करुँगी में कुछ।

फिर अमन ने कहा अच्छा हैं फिर तो हम बहुत अलग हुए।

ये सुन राधिका ने कहा हां अलग तो हुए हम फिर भी तुम्हारे साथ बैठी हूँ यहां। फिर अमन ने कहा बैठी हु मतलब हम अलग है तोह सिर्फ रहन-सहन से बाकी हम दोनों एक ही है। अगर तुम दिल से किसी के बारे में सोचोगे तोह तुम्हे कोई अलग नजर नहीं आएगा। ये सुन राधिका ने कहा ये दिल कुछ नहीं होता हैं। अमन सुन के मुस्कुराने लगा और कहा ठीक है जैसा तुम बोलो। फिर हर कुछ दिनों में दोनों मिलते रहते बाते करते और अपने घर चले जाते।

धीरे-धीरे दोनों में बाते बढ़ने लगी और दोनों रोज मिलने लगे।

अमन ऑफिस से निकल के मॉल चले जाता और वहां राधिका उसका इंतिज़ार करती रहती। फिर एक दिन राधिका ने कहा की मुझे एक पूरा दिन तुम्हारे साथ रहना है देखना है की क्या करते हो तुम पूरा दिन। फिर एक दिन अमन का छुट्टी था ऑफिस का तोह उसने राधिका को मिलने के लिए बुला लिया।

फिर अमन हमेसा कीतरह पहले मंदिर गया फिर वहा से आने के बाद मैदान गया जहां छोटे-छोटे बच्चे खेल रहे थे वहां अमन उनके साथ खेलने लगा फिर कुछ देर बाद अमन वहां से आश्रम गया जहां वो हमेसा लोगो को खाना खिलता उनका कुछ देर देख भाल करता फिर चले आता फिर वहा से निकलने के बाद अपने घर आया और अपने माँ को बिठा के घर का बचा हुआ काम खत्म किया फिर रात हो गयी और

उसने राधिका को घर छोड़ आया और कहा - " ये रहता है मेरा छुट्टी का दिन और यही है मेरी आम जिंदगी जहां जितना हो पता है उतना में करने की कोशिश करता हु।

ये सुन राधिका बिना कुछ कहे चले गयी और पूरी रात सोचते रही ऐसे भी लोग होते है जहां अपना छोड़ दूसरे के बारे में इतना सोचते है और एक में हु जो आज तक अपने माँ-पापा की मदत तो दूर आज तक पुछा भी नहीं की वो कैसे हैं ? वो करते क्या है ? ये सब सोच राधिका भावुक हो गई और अपने माँ के पास चले गयी उसने देखा माँ उसकी काम कर रही होती है जैसे ही वो माँ पुकारती है माँ वहां से - " क्या हुआ कुछ चाहिए तुम्हे बोलो ? "

ये सुन राधिका और भावुक हो गयी और माँ को कहते हुए नहीं कुछ नहीं बस युही आयी थी और वहां से चले गयी।

बस वो एक पल था जब राधिका को एहसास हुआ की सच में दिल से सोचने वाले लोग होते हैं। फिर क्या मानो राधिका की दुनिया ही बदल गयी अगली सुबह वो पापा के पास गयी और कहने लगी आज से में भी आपके साथ ऑफिस जाउंगी मुझे भी आपके काम का बोज उठाना है ये सुन पापा सोच में रह गए की क्या हो गया मेरी बेटी को आज इतने सालो बाद अचानक से ये ख्याल कैसे आया और अंदर ही अंदर खुश भी हो रहे थे की उनकी बेटी अब बड़ी हो रही है, अपने जिम्मेदारी समझने की काबिल बन गयी है।

बस फिर शाम को हमेसा की तरह वो अमन से मिलने चले गयी बस फर्क इतना था आज की हमेसा वो घर से आती थी आज वो ऑफिस से आयी है।

ये देख अमन को खुसी हुए और उसने राधिका से पुछा - तो दिलो होता है न ?

ये सुन राधिका हसने लगी और उससे माफ़ी मांगते हुए उससे फिरसे सुक्रिया कहा की उसके वजह से आज वो अपने आप को पहचान पायी की उसकी जिंदगी जिंदगी क्या थी और वो किसे समझ बैठी थी।

तो अब आगे क्या बताऊ आपको, आगे का तो आपको समझ आ गया होगा क्या हुआ रहेगा।

हर कहानी की तरह दोनों को अंत में एक दूसरे से प्यार हो गया और दोनों एक दूसरे के साथ रहने लगे। अमन को एक साथी की जरुरत थी जो उसे समझे, प्यार करे और राधिका को सचाई की, एक जिम्मेदारी की जरुरत थी जो उससे अमन ने दिखा दिया।

जाते जाते में आपको एक बात बताना ही भूल गया, दोनों एक दूसरे से मिले, बाते किये, घूमने, रहे एक दूसरे एक साथ लेकिन अभी तक दोनों ने एक दूसरे से अपना नाम नहीं पुछा। ना अमन ने कभी पुछा की आपका नाम क्या हैं और नाही राधिका ने अमन से कभी उसका नाम पुछा।

प्यार

‘‘अरे संजय… चल यार, आज मजा करेंगे,’’ बार से बाहर निकलते समय उमेश संजय से बोला। दिनेश भी उन के साथ था।

संजय ने कहा, ‘‘मैं ने पहले ही बहुत ज्यादा शराब पी ली है और अब मैं इस हालत में नहीं हूं कि कहीं जा सकूं।’’

उमेश और दिनेश ने संजय की बात नहीं सुनी और उसे पकड़ कर जबरदस्ती कार में बिठाया और एक होटल में जा पहुंचे।

वहां पहुंच कर उमेश और दिनेश ने एक कमरा ले लिया। उन दोनों ने पहले ही फोन पर इंतजाम कर लिया था, तो होटल का एक मुलाजिम उन के कमरे में एक लड़की को लाया।

उमेश ने उस मुलाजिम को पैसे दिए। वह लड़की को वहीं छोड़ कर चला गया।

वह एक साधारण लड़की थी। लगता था कि वह पहली बार इस तरह का काम कर रही थी, क्योंकि उस के चेहरे पर घबराहट के भाव थे। उस के कपड़े भी साधारण थे और कई जगह से फटे हुए थे।

संजय उस लड़की के चेहरे को एकटक देख रहा था। उसे उस में मासूमियत और घबराहट के मिलेजुले भाव नजर आ रहे थे, जबकि उमेश और दिनेश उस को केवल हवस की नजर से देखे जा रहे थे।

तभी उमेश लड़खड़ाता हुआ उठा और उस ने दिनेश व संजय को बाहर जाने के लिए कहा। वे दोनों बाहर आ गए।

अब कमरे में केवल वह लड़की और उमेश थे। उमेश ने अंदर से कमरा बंद कर लिया। संजय को यह सब बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन उमेश और दिनेश ने इतनी ज्यादा शराब पी ली थी कि उन्हें होश ही न था कि वे क्या कर रहे हैं।

काफी देर हो गई, तो संजय ने दिनेश को कमरे में जा कर देखने को कहा।

दिनेश शराब के नशे में चूर था। लड़खड़ाता हुआ कमरे के दरवाजे पर पहुंच कर उसे खटखटाने लगा। काफी देर बाद लड़की ने दरवाजा खोला।

उस लड़की ने दिनेश से कहा कि उस का दोस्त सो गया है, उसे उठा लो। नशे की हालत में चूर दिनेश उस लड़की की बात सुनने के बजाय पकड़ कर उसे अंदर ले गया और दरवाजा बंद कर लिया।

संजय दूर बरामदे में बैठा यह सब देख रहा था। दिनेश को भी कमरे में गए काफी देर हो गई, तो संजय ने दरवाजा खड़काया।

इस बार भी उसी लड़की ने दरवाजा खोला। वह अब परेशान दिख रही थी। उस ने संजय की तरफ देखा और कहा, ‘‘ बाबू, ये लोग कुछ कर भी नहीं कर रहे और मेरा पैसा भी नहीं दे रहे हैं।

मुझे पैसे की जरूरत है और जल्दी घर भी जाना है,’’ कहते हुए उस लड़की का गला बैठ सा गया।

संजय ने लड़की को अंदर चलने को कहा और थोड़ी देर में उसे उसी होटल के दूसरे कमरे में ले गया। उस ने जाते हुए देखा कि उमेश और दिनेश शराब में चूर बिस्तर पर पड़े थे।

संजय ने दूसरे कमरे में उस लड़की को बैठने को कहा। लड़की घबराते हुए बैठ गई। वह थोड़ा जल्दी में लग रही थी। संजय ने उसे पास रखा पानी पीने को दिया, जिसे वह एक सांस में ही पी गई।

पानी पीने के बाद वह लड़की खड़ी हुई और संजय से बोली, ‘‘बाबू, अब जो करना है जल्दी करो, मुझे पैसे ले कर जल्दी घर पहुंचना है।’’

संजय को उस की मासूम बातों पर हंसी आ रही थी। उस ने उसे पैसे दे दिए तो उस ने पैसे रख लिए और संजय को पकड़ कर बिस्तर पर ले गई और अपने कपड़े उतारने लगी।

संजय ने उस का हाथ पकड़ा और कपड़े खोलने को मना किया। लड़की बोली, ‘‘नहीं बाबू, कस्तूरी ऐसी लड़की नहीं है, जो बिना काम के किसी से भी पैसे ले ले। मैं गरीब जरूर हूं, लेकिन भीख नहीं लूंगी।’’

संजय अब बोल नहीं पा रहा था। तभी कस्तूरी ने संजय का हाथ पकड़ा और उसे बिस्तर पर ले गई, यह सब इतना जल्दी में हुआ कि संजय कुछ कर नहीं पाया।

कस्तूरी ने जल्दी से अपने कपड़े उतारे और संजय के भी कपड़े उतारने लगी। अब कस्तूरी संजय के इतने नजदीक थी कि उस के मासूम चेहरे को वह बड़े प्यार से देख रहा था। वह कस्तूरी की किसी बात का विरोध नहीं कर पा रहा था। उस के मासूम हावभाव व चेहरे से संजय की नजर हटती, तब तक कस्तूरी वह सब कर चुकी थी, जो पतिपत्नी करते हैं।

कस्तूरी ने जल्दी से कपड़े पहने और होटल के कमरे से बाहर निकल गई। संजय अभी भी कस्तूरी के खयालों में खोया हुआ था।

समय बीतता गया, लेकिन संजय के दिमाग से कस्तूरी निकल नहीं पा रही थी।

एक दिन संजय बाजार में सामान खरीद रहा था। उस ने देखा कि कस्तूरी भी उस के पास की ही एक दुकान से सामान खरीद रही थी।

संजय उस को देख कर खुश हुआ। उस ने कस्तूरी को आवाज दी तो कस्तूरी ने मुड़ कर देखा और फिर दुकानदार से सामान लेने में जुट गई।

संजय उस के पास पहुंचा। कस्तूरी ने संजय की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया। कस्तूरी ने सामान खरीदा और दुकान से बाहर निकल गई।

संजय उसे पीछे से आवाज देता रहा, लेकिन उस ने अनसुना कर दिया।

कुछ दिन बाद संजय को कस्तूरी फिर दिखाई दी। उस दिन संजय ने कस्तूरी का हाथ पकड़ा और उसे भीड़ से दूर खींच कर ले गया और उस से उस की पिछली बार की हरकत के बारे में पूछना चाहा, तो संजय के पैरों की जमीन खिसक गई। उस ने देखा, कस्तूरी का चेहरा पीला पड़ चुका था और वह बहुत कमजोर हो गई थी। उस ने अपनी फटी चुनरी से अपना पेट छिपा रखा था, जो कुछ बाहर दिख रहा था।

कस्तूरी वहां से जाने के लिए संजय से जोरआजमाइश कर रही थी। संजय ने किसी तरह उसे शांत किया और भीड़ से दूर एक चाय की दुकान पर बिठाया।

संजय ने गौर से कस्तूरी के चेहरे की तरफ देखा, तो उस का दिल बैठ गया। कस्तूरी सचमुच बहुत कमजोर थी। संजय ने कस्तूरी से उस की इस हालत के बारे में पूछा, तो पहले तो कुछ नहीं बोली, लेकिन संजय ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा तो वह रोने लगी।

संजय कुछ समझ नहीं पा रहा था। कस्तूरी ने अपने आंसू पोंछे और बोली, ‘‘बाबू, मेरी यह हालत उसी दिन से है, जिस दिन आप और आप के दोस्त मुझे होटल में मिले थे।’’

संजय ने उस की तरफ सवालिया नजरों से देखा, तो वह फिर बोली, ‘‘बाबू, मैं कोई धंधेवाली नहीं हूं। मैं उस गंदे नाले के पास वाली कच्ची झोंपड़पट्टी में रहती हूं। उस दिन पुलिस मेरे भाई को पकड़ कर ले गई थी, क्योंकि वह गली में चरसगांजा बेच रहा था। उसे जमानत पर छुड़ाना था और मेरे मांबाप के पास पैसा नहीं था। अब मुझे ही कुछ करना था।

‘‘मैं ने अपने पड़ोस में सब से पैसा मांगा, लेकिन किसी ने नहीं दिया। थकहार कर मैं बैठ गई तो मेरी एक मौसी बोली कि इस बेरहम जमाने में कोई मुफ्त में पैसा नहीं देता।

‘‘मौसी की यह बात मेरी समझ में आई और मैं आप और आप के दोस्तों तक पहुंच गई।’’

कस्तूरी चुप हुई, तो संजय ने अपने चेहरे के दर्द को छिपाते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?’’

कस्तूरी ने कहा, ‘‘बाबू, यह जान कर आप क्या करोगे? यह तो मेरी किस्मत है।’’

संजय ने फिर जोर दिया, तो कस्तूरी बोली, ‘‘बाबू, उस दिन आप के दिए गए पैसे से मैं अपने भाई को हवालात से छुड़ा लाई, तो भाई ने पूछा कि पैसे कहां से आए। मैं ने झूठ बोल दिया कि किसी से उधार लिए हैं।’’

थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह फिर बोली, ‘‘बाबू, सब ने पैसा देखा, लेकिन मैं ने जो जिस्म बेच कर एक जान को अपने शरीर में आने दिया, तो उसे सब नाजायज कहने लगे और जिस भाई को मैं ने बचाया था, वह मुझे धंधेवाली कहने लगा और मुझे मारने लगा। वह मुझे रोज ही मारता है।’’

यह सुन कर संजय के कलेजे का खून सूख गया। इस सब के लिए वह खुद को भी कुसूरवार मानने लगा। उस की आंखों में भी आंसू छलक आए थे।

कस्तूरी ने यह देखा तो वह बोली, ‘‘बाबू, इस में आप का कोई कुसूर नहीं है। अगर मैं उस रात आप को जिस्म नहीं बेचती तो किसी और को बेचती। लेकिन बाबू, उस दिन के बाद से मैं ने अपना जिस्म किसी को नहीं बेचा,’’ यह कहते हुए वह चुप हुई और कुछ सोच कर बोली, ‘‘बाबू, उस रात आप के अच्छे बरताव को देख कर मैं ने फैसला किया था कि मैं आप की इस प्यार की निशानी को दुनिया में लाऊंगी और उसी के सहारे जिंदगी गुजार दूंगी, क्योंकि हम जैसी गरीब लड़कियों को कहां कोई प्यार करने वाला जीवनसाथी मिलता है।’’

इतना कह कर कस्तूरी का गला भर आया। वह आगे बोली, ‘‘बाबू, यह आप की निशानी है और मैं इसे दुनिया में लाऊंगी, चाहे इस के लिए मुझे मरना ही क्यों न पड़े,’’ इतना कह कर वह तेजी से उठी और अपने घर की तरफ चल दी।

यह सुन कर संजय जैसे जम गया था। वह कह कर भी कुछ नहीं कह पाया। उस ने फैसला किया कि कल वह कस्तूरी के घर जा कर उस से शादी की बात करेगा।

वह रात संजय को लंबी लग रही थी। सुबह संजय जल्दी उठा और बदहवास सा कस्तूरी के घर की तरफ चल दिया। वह उस के महल्ले के पास पहुंचा तो एक जगह बहुत भीड़ जमा थी। वह किसी अनहोनी के डर को दिल में लिए भीड़ को चीर कर पहुंचा, तो उस ने जो देखा तो जैसे उस का दिल बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो।

कस्तूरी जमीन पर पड़ी थी। उस की आंखें खुली थीं और चेहरे पर वही मासूम मुसकराहट थी।

संजय ने जल्दी से पूछा कि क्या हुआ है तो किसी ने बताया कि कस्तूरी के भाई ने उसे चाकू से मार दिया है, क्योंकि सब कस्तूरी के पेट में पल रहे बच्चे की वजह से उसे बेइज्जत करते थे।

संजय पीछे हटने लगा, अब उसे लगने लगा था कि वह गिर जाएगा। तभी पुलिस का सायरन बजने लगा तो भीड़ छंटने लगी।

संजय पीछे हटते हुए कस्तूरी को देख रहा था। उस का एक हाथ अपने पेट पर था और शायद वह अपने प्यार को मरते हुए भी बचाना चाहती थी। उस के चेहरे पर मुसकराहट ऐसी थी, जैसे उन खुली आंखों से संजय को कहना चाहती हो, ‘बाबू, यह तुम्हारे प्यार की निशानी है, पर इस में तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है।’

संजय पीछे मुड़ा और अपने घर पहुंच कर रोने लगा। वह अपनेआप को माफ नहीं कर पा रहा था, क्योंकि अगर वह कल ही उस से शादी की बात कर लेता तो शायद कस्तूरी जिंदा होती।

बारिश होने लगी थी। बादल जोर से गरज रहे थे। वे भी कस्तूरी के प्यार के लिए रो रहे थे।

अधूरे प्यार की एक अधूरी कहानी

शाम का समय था। मैं अपने दोस्त का इंतजार कर रहा था। स्टेशन के बाहर।

हमलोग का बाहर कही घूमने जाने का प्लान था और मैं जल्दी पहुँच गया था।

कुछ समझ नही आ रहा था की मैं क्या करूँ। मैं स्टेशन के पास जा के बैठ गया, तभी कुछ ऐसा हुआ कि मेरी जिन्दगी एक अलग मोड़ लेने वाली थी।

स्टेशन की तरफ मैं देख रहा था की मेरा दोस्त आया की नहीं तभी अचानक से मेरी नज़र एक लड़की पर पड़ी।

वो जो वक़्त था मैं पूरी तरह कुछ देर के लिए थम सा गया था। मैं सब भूल गया था की मैं कहा हूँ क्यों हूँ ?

बस मेरी आँखे उस लड़की की तरफ से हट ही नहीं रही थी और इस तरह से मैं उसे देखता ही जा रहा था।

उसकी मासूम चेहरा, उसकी छोटी-छोटी आंखी, उसके मासूम सा चेहरे पे वो मासूम सी उसकी हंसी जैसे मानो कोई परी हो वो..उसे देख पहली नज़र मे मानो दिल को कुछ होने लगा था।

क्या वो प्यार था?

मुझे नहीं पता बस दिल बोल रहा था कि मेरा दोस्त कुछ देर बाद आये या ये वक़्त रुक जाए।

मुझे उसका नाम जानना था। उसके बारे में बहुत कुछ पता करने को दिल कर रहा था लेकिन कैसे करूँ ये समझ ही नहीं आ रहा था।

जब कुछ समझ नहीं आया तब मैंने बस भगवान से प्रार्थना किया की मुझे ये लड़की मेरी जिन्दगी में चाहिए।

वो जा रही थी। मेरी आँखों से दूर मुझे रोकना था उसे। उससे बातें करना था। उससे दोस्ती करनी थी और उसे अपने दिल की बात बतानी थी।

लेकिन कैसे ???

यही सवाल बस बार-बार मेरे मन में आ रहा था और मुझे बैचैन किये जा रहा था।

मैंने फिर सोच लिया कि मेरी आँखों से दूर होने से पहले मुझे इसका नाम पता चल जाये तो मैं इससे अपना बनूँगा और शायद भगवान् ने ही उसे भेजा होगा मेरे लिए ये मैं समझूंगा तभी भगवन ने चमत्कार कर दिया..पीछे से आवाज आया प्रिया मैं यहां हूँ।

फिर वो पीछे देखि तो मैंने देखा वहां से एक लड़की आवाज दी और वो उस क पास चली गयी..तभी मैं समझा उस लड़की का नाम प्रिया था।

मैं खुश हो गया और उस लड़की को मन किया जा के धन्यवाद बोल दू क्योंकि उसी के वजह से मुझे उस का नाम पता चला।

बस तभी मैंने ठान ली अब उसे अपना बनाना है, उसे अपनी जिन्दगी में लाना है।

फिर तभी मै उसके पिछे जाने लगा कि अचानक ही पीछे से एक हाथ आया।

पीछे देखा तो दोस्त आ गया था। अब मैं क्या करूँ समझ नहीं आ रहा था..मैं क्या बोलूँ उससे..कैसे मना करूँ उससे?..कैसे जाऊ मैं उस के पीछे ?

मैं इसी सोच में लगा रहा रहा तब तक वो मेरी आँखों से दूर जा चुकी थी दिल मानो रोने लगा था और तभी मानो ऐसा लगा कि जैसे सब कुछ एक सपना सा था बस और आँखे खुल गया तो सपना टूट गया।

मैं वहा से चला तो गया अपने दोस्त के साथ लेकिन पूरी रास्ते बस उसी के बारे में सोचता रहा।

मानो मेरा दिल अब उसके ख्याल से निकलने को तैयार ही नहीं था।

दूसरे दिन मैं कॉलेज लिए तैयार हो गया और मैं कॉलेज पंहुचा।

और बेंच पे जा क बैठ गया..तभी दोस्त ने बुलाया और कहा देख अपने कॉलेज में एक नई लड़की आयी है।

मेरा मन अभी भी बस उसी के ख्यालों मे डूबा हुआ था। आँखों से उस का चेहरा मनो हट ही नही रहा था...वो बार बार मुझे आवाज दिये जा रही था।

तभी मुझे गुस्सा आया और पीछे उससे बोलने जा ही रहा था कि मैं रुक सा गया।

मेरी नजर मानो फिर से एक बार सपनों मे चला गया। मैंने देखा की वही थी।

मानो जैसे मेरी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा मैं खुद को रोक ही नहीं पा रहा था और मेरे समझ में ही नहीं आ रहा था की मैं क्या करू ?

क्या बोलता मैं, बस जा के अपने दोस्त के गले लग गया..और हंसने लगा...तभी पता चला वही वह नई लड़की थी जो कॉलेज में आज पहला दिन आयी थी।

मैं तो मानो हवा मे उड़ने लगा..फिर मैंने एक दिन अपने दोस्त को बताया की ऐसा ऐसा है..उसने कहा जा के बोल दे उसे अपने दिल की बात..

लेकिन मैं डरता था। कि वो क्या कहेगी..क्या लगेगा उसे..यही सोच के मैं हमेशा रुक जाता था।

मैं सोचने लगता था कि कही वो मेरी बातें सुन के मुझसे दूर न हो जाए।

मैं उससे दूर नहीं होना चाहता था।

मुझे ये एहसास हो गया था कि शायद वो भी मुझे पसंद करती थी। लेकिन वो कभी कुछ नहीं कहती थी। उससे लगता कि मेरे मन

मै उस क लिए कुछ नहीं है। लेकिन वो क्या जाने कि उसे पहली नजर में देख के ही मैंने उसे अपना दिल दे चुका था।

दिन बीतते गए हमलोग एक अच्छे दोस्त की तरह साथ रहते और बाते करते थे..लेकिन न कभी मुझे हिम्मत हुआ उससे कुछ भी कहने का ना और ही उसे ...।वक़्त बीत गया और इस तरह हमलोग की पढ़ाई पूरी हो गयी।

लेकिन मेरे दिल मे उसके के लिए अभी भी पहला और आखरी प्यार था और शायद उस के लिए भी। और इस तरह से

हमे सबको अलग अलग कंपनी मे जॉब लग गई थी तभी बस एक दिन मैंने सोच लिया कि अब बस.. मैं उससे कल जा के दिल की बात बता।

दूंगा...। मैं अगले दिन सुबह उठा और मैंने उसे फ़ोन किया और उससे कहा की मुझे मिलना है उससे ..उसने मिलने क लिए हां कर दिया और इस बात से मुझे बहुत ख़ुशी मिला।

हमलोग ने एक समय निर्धारित किया था और मैं समय से पहले वहां उसका इंतजार कर रहा था ...।तभी मेरी नजर उस पे पड़ी.. वही कपडे..वही बैग..

वही छोटी-छोटी आँखे और चेहरे पे वही प्यारी से मुस्कान, मानो ऐसा लग रहा था..की वही पहला दिन हो..जब मैंने उसे पहली बार देखा था..वो धीरे धीरे आ रही थी।

मैं तो बस उसे देखता ही जा रहा था..फिर वो पास आती है..फिर वो मेरे सामने बैठ जाती है..तभी बस..मैंने उससे कहा की मुझे कुछ कहना है उससे।

फिर तभी उसने भी कह दिया की मुझे भी कुछ कहना है तुम्हें ...मैं खुश हो गया.. मुझे लगा की आज वो भी अपने दिल की बात बोल देगी...फिर मैंने उससे कहा

दिया कि तुम पहले बोल दो...उसने तो पहले मना किया पहले बोलने से..लेकिन मैंने ही जिद कर दिया... कि पहले तुम बोले और वो बोलने जा रही थी।

मानो मेरी सांस रुक गए थे..उसकी बाते सुनने क लिये...सब कुछ थम सा गया...बस ऐसा लगा मैं और वो..और कुछ नही है आस-पास...फिर

उसने अपने बैग से एक कार्ड निकाला..और दिया मुझे...वो जो पल था।

वही पहला पल..जब मुझे लगा कि मेरा सपना था..और सपना टूट

गया...उस कार्ड मैं उसकी शादी का आमंत्रण था...बस..फिर क्या..सब कुछ वहीं रुक गया...। शायद मैंने बहुत देर कर दी उससे अपनी दिल की बात बताने मे..श्याद बहोत-बहोत देर... फिर उसने मुझसे पूछा.. कि तुम क्या कहना चाहते थे ?

मैं क्या कहता तब..बात बदल दी..और वो चली गयी...और मैं वही बैठे रह गया...।मुझे उसे अपना बनाने का बस एक सपना ही था शायद...जो एक समय पे आ क टूट गया...।वो आज का दिन और

पहला दिन...मानो क्यों आया था मेरी जिन्दगी मैं अब तक ये बात समझ नही आया...।

पहला दिन भी एक सपने की तरह आई और कुछ देर बाद टूट गयी...और ये आज का पल..जो फिर से एक सपना बनकर पल मै टूट गया...

प्यार का चसका

शहर के कालेज में पढ़ने वाला अमित छुट्टियों में अपने गांव आया, तो उस की मां बोली, ‘‘मेरी सहेली चंदा आई थी।

वह और उस की बेटी रंभा तुझे बहुत याद कर रही थीं। वह कह गई है कि तू जब गांव आए तो उन से मिलने उन के गांव आ जाए, क्योंकि रंभा अब तेरे साथ रह कर अपनी पढ़ाई करेगी।

यह सुन कर दूसरे दिन ही अमित अपनी मां की सहेली चंदा से मिलने उन के गांव चला गया था।

जब अमित वहां पहुंचा, तो चंदा और उन के घर के सभी लोग खेतों पर गए हुए थे। घर पर रंभा अकेली थी। अमित को देख कर वह बहुत खुश हुई थी।

रंभा बेहद खूबसूरत थी। उस ने जब शहर में रह कर अपनी पढ़ाई करने की बात कही, तो अमित उस से बोला, ‘‘तुम मेरे साथ रह कर शहर में पढ़ाई करोगी, तो वहां पर तुम्हें शहरी लड़कियों जैसे कपड़े पहनने होंगे

वहां पर यह चुन्नीवुन्नी का फैशन नहीं है,’’ कह कर अमित ने उस की चुन्नी हटाई, तो उस के हाथ रंभा के सुडौल उभारों से टकरा गए

उस की छुअन से अमित के बदन में बिजली के करंट जैसा झटका लगा था।

ऐसा ही झटका रंभा ने भी महसूस किया था।

वह हैरान हो कर उस की ओर देखने लगी, तो अमित उस से बोला, ‘‘यह लंबीचौड़ी सलवार भी नहीं चलेगी।

वहां पर तुम्हें शहर की लड़की की तरह रहना होगा।

उन की तरह लड़कों से दोस्ती करनी होगी।

उन के साथ वह सबकुछ करना होगा, जो तुम गांव की लड़कियां शादी के बाद अपने पतियों के साथ करती हो,’’ कह कर वह उस की ओर देखने लगा, तो वह शरमाते हुए बोली, ‘‘यह सब पाप होता है।’’।

‘‘अगर तुम इस पापपुण्य के चक्कर में फंस कर यह सब नहीं कर सकोगी, तो अपने इस गांव में ही चौकाचूल्हे के कामों को करते हुए अपनी जिंदगी बिता दोगी,’’ कह कर वह उस की ओर देखते हुए बोला, ‘‘तुम खूबसूरत हो, शहर में पढ़ाई कर के जिंदगी के मजे लेना’।

इस के बाद अमित उस के नाजुक अंगों को बारबार छूने लगा।

उस के हाथों की छुअन से रंभा के तनबदन में बिजली का करंट सा लग रहा था। वह जोश में आने लगी थी।

रंभा के मांबाप खेतों से शाम को ही घर आते थे, इसलिए उन्हें किसी के आने का डर भी नहीं था।

यह सोच कर रंभा धीरे से उस से बोली, ‘‘चलो, अंदर पीछे वाले कमरे में चलते हैं।’’ यह सुन कर अमित उसे अपनी बांहों में उठा कर पीछे वाले कमरे में ले गया।

कुछ ही देर में उन दोनों ने वह सब कर लिया, जो नहीं करना चाहिए था

जब उन दोनों का मन भर गया, तो रंभा ने उसे देशी घी का गरमागरम हलवा बना कर खिलाया।

हलवा खाने के बाद अमित आराम करने के लिए सोने लगा।

उसे सोते हुए देख कर फिर रंभा का दिल उसके साथ सोने के लिए मचल उठा।

वह उस के ऊपर लेट कर उसे चूमने लगी, तो वह उस से बोला, ‘‘तुम्हारा दिल दोबारा मचल उठा है क्या?’’

‘‘तुम ने मुझे प्यार का चसका जो लगा दिया है,’’ रंभा ने अमित के कपड़ों को उतारते हुए कहा

इस बार वे कुछ ही देर में प्यार का खेल खेल कर पस्त हो चुके थे, क्योंकि कई बार के प्यार से वे दोनों इतना थक चुके थे कि उन्हें गहरी नींद आने लगी थी।

शाम को जब रंभा के मांबाप अपने खेतों से घर लौटे, तो अमित को देख कर खुश हुए।

रंभा भी उस की तारीफ करते नहीं थक रही थी। वह अपने मांबाप से बोली, ‘‘अब मैं अमित के साथ रह कर ही शहर में अपनी पढ़ाई पूरी करूंगी। ’’

यह सुन कर उस के पिताजी बोले, ‘‘तुम कल ही इस के साथ शहर चली जाओ। वहां पर खूब दिल लगा कर पढ़ाई करो। जब तुम कुछ पढ़लिख जाओगी, तो तुम्हें कोई अच्छी सी नौकरी मिल जाएगी। तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी। ’’

‘‘फिर किसी अच्छे घर में इस की शादी कर देंगे। आजकल अच्छे घरों के लड़के पढ़ीलिखी बहू चाहते हैं,’’ रंभा की मां ने कहा, तो अमित बोला, ‘‘मैं दिनरात इसे पढ़ा कर इतना ज्यादा होशियार बना दूंगा कि फिर यह अच्छेअच्छे पढ़ेलिखों पर भारी पड़ जाएगी। ’’

रंभा की मां ने अमित के लिए खाने को अच्छेअच्छे पकवान बनाए। खाना खाने के बाद बातें करते हुए उन्हें जब रात के 10 बज गए, तब उस के सोने का इंतजाम उन्होंने ऊपर के कमरे में कर दिया।

जब अमित सोने के लिए कमरे में जाने लगा, तो चंदा रंभा से बोली, ‘‘कमरे में 2 पलंग हैं। तुम भी वहीं सो जाना। वहां पर अमित से बातें कर के शहर के रहनसहन और अपनी पढ़ाईलिखाई के बारे में अच्छी तरह पूछ लेना। ’’

यह सुन कर रंभा मुसकराते हुए बोली, ‘‘जब से अमित घर पर आया है, तब से मैं उस से खूब जानकारी ले चुकी हूं।

पहले मैं एकदम अनाड़ी थी, लेकिन अब मुझे इतना होशियार कर दिया है कि मैं अब सबकुछ जान चुकी हूं कि असली जिंदगी क्या होती है?’’

यह सुन कर चंदा खुशी से मुसकरा उठी। वे दोनों ऊपर वाले कमरे में सोने चले गए थे।

कमरे में जाते ही वे दोनों एकदूसरे पर टूट पड़े। शहर में आ कर अमित ने रंभा के लिए नएनए फैशन के कपड़े खरीद दिए, जिन्हें पहन कर वह एकदम फिल्म हीरोइन जैसी फैशनेबल हो गई थी।

अमित ने एक कालेज में उस का एडमिशन भी करा दिया था।

जब उन के कालेज खुले, तो अमित ने अपने कई अमीर दोस्तों से उस की दोस्ती करा दी, तो रंभा ने भी अपनी कई सहेलियों से अमित की दोस्ती करा दी।

गांव की सीधीसादी रंभा शहर की जिंदगी में ऐसी रम गई थी कि दिन में अपनी पढ़ाई और रात में अमित और उस के दोस्तों के साथ खूब मौजमस्ती करती थी।

जब रंभा शहर से दूसरी लड़कियों की तरह बनसंवर कर अपने गांव जाती, तब सभी लोग उसे देख कर हैरान रह जाते थे।

उसे देख कर उस की दूसरी सहेलियां भी अपने मांबाप से उस की तरह शहर में पढ़ने की जिद कर के शहर में ही पढ़ने लगी थीं।

अब अमित उस की गांव की सहेलियों के साथ भी मौजमस्ती करने लगा था। उस ने रंभा की तरह उन को भी प्यार का चसका जो लगा दिया था।

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