हेलो, आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ नानी की कहानियाँ शेयर करने जा रहे है। इन कहानियाँ से आपको बहुत कुछ सिखने मिलेगा। यह कहानियाँ बहुत मजेदार है। आप इन कहानियाँ को पूरा पढ़े। आपको यह कहानियाँ बहुत पसंद आएगी। 

नानी की कहानियाँ

Nani ki Kahaniyan List

चींटी करती हरदम काम

घमंडी राजकुमारी नानी की हिंदी कहानी

चीकू खरगोश ने झूठ बोला

कछुए ने भरी उड़ान

कौआ और सांप की कहानी

कौआ और हंस

घमंड का अंत

बन्दर की कहानी

राख को रस्सी

रहस्यमय बाँसुरी-वादक

कौआ और लोमड़ी

नानी ने सुनाई राजकुमारी की कहानी

प्रिज्य से निकले सात रंग

ऐसे बना मनुष्य का पहला घर

चींटी करती हरदम काम

एक बडी-सी मक्खी आराम कर रही थी।

तभी उसे अपने पैरों में गुदगुदी महसूस हुई। मक्खी ने देखा कि एक छोटी-सी चींटी उसके पैरों के ऊपर से जा रही थी।

मक्खी को बहुत गुस्सा आया। वह जोर से चिल्लाई, 'ए चींटी, दिखाई नहीं देता। मैं आराम कर रही हूँ। तेरी यह हिम्मत कि मुझे आराम करते समय परेशान करने आ गई।'

चींटी ने कहा, 'माफ कीजिए, मैं आपको परेशान करना नहीं चाहती थी।

वो तो मैं खाना इकट्ठा करने निकली थी। गलती से आपके पैरों से टकरा गई।'

मक्खी को गुस्सा आया कि एक छोटी-सी चींटी उसे पलटकर जवाब दे रही है। वह बोली, 'चुप हो जा! तू इतनी छोटी है कि मैं पंख हिलाऊँ तो हवा से ही तू दूर जा गिरेगी।'

अब चींटी को भी गुस्सा आ गया। वह बोली, 'मक्खी, माना कि तुम बड़ी हो। लेकिन बुद्धि तुममें बिलकुल नहीं है। हम चींटियों को

देखो। हम घर बनाती हैं। फिर खाना इकट्ठा करती हैं। सबके साथ मिल-बाँटकर खाती हैं और तुम, तुम तो कभी कूड़े के ढेर पर बैठी रहती हो, कभी खाने के सामान पर।

सारी बीमारियाँ तुम ही फैलाती हो। कोई तुम्हें पसंद नहीं करता। जब देखो, खाली बैठी रहती हो।

तुमने हमें कभी खाली बैठे देखा है क्या ? हमसे कुछ सीखो। हममें कितनी एकता और प्रेम है। आकार में बड़ा होने से ही सब कुछ नहीं होता। समझी , बुद्धि भी बड़ी होनी चाहिए।

ऐसा कहकर चींटी चीनी के दाने को मुँह में दबाकर आगे चली गई और मकक्‍खी वापिस आराम से बैठ गई।

घमंडी राजकुमारी नानी की हिंदी कहानी

नानी कहती है। जीवन में कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए।

क्योकि जब हम घमंड करते है। हमारा जीवन अच्छा नहीं होता है।

उसमे बहुत अधिक अधिक परेशानी आती है।

इसलिए यह बात समझाने के लिए नानी बच्चो को एक कहानी सुनती है।

यह कहानी एक घमंडी राजकुमारी की है। वह बहुत सुन्दर थी।

मगर इस बात का घमंड उस राजकुमारी हो गया था।

वह घमंडी राजकुमारी अपने महल से बाहर शिकार करने गयी थी।

उस घमंडी राजकुमारी को एक साधु मिलता है। वह उससे कहती है। साधु क्या तुम बता सकते हो। मुझसे सुन्दर कोई और भी है। यह सुनकर साधु कहते है। सुंदरता चेहरे से नहीं बल्कि मन से होनी चाहिए। अगर तुम्हारा मन सुनदर है तो तुम बहुत सुंदर हो। अगर तुम्हारा मन सुंदर नहीं है। तो तुम सुंदर है हो। यह सुनकर घमंडी राजकुमारी को बहुत गुस्सा आता है। वह घमंडी राजकुमारी कहती है। तुमने हमारा अपमान किया है। तुम्हे इसकी सजा मिलनी चाहिए। वह सैनिक से कहती है। इस साधु को पकड़ लिया जाये।

उसके बाद घमंडी राजकुमारी उस साधु को सजा देनी चाहती है। वह उसे महल में लेकर आती है। सभी लोग उस साधु को देखते है। वह बहुत ज्ञानी साधु थे उन्हें महल में सजा देने के लिए लाया गया था। मगर उन्होंने क्या किया होगा। उस वक़्त राजा महल में नहीं थे। वह घमंडी राजकुमारी साधु को कहती है। अगर तुम हमारा अपमान नहीं करते। तो तुम्हे सजा नहीं मिलती है। मगर साधु जी कहते है। मेने सच ही कहा था। घमंडी राजकुमारी उस साधु को सजा देती है। अब वह महल से बाहर नहीं जा सकते है। उन्हें कारागार में डाल दिया जायेगा। सभी लोग यह सजा सुनते है।

लेकिन साधु जी कहते है। मेने कुछ नहीं किया है। वह घमंडी राजकुमारी से कहते है। तुम्हे अपने आप पर बहुत घमंड है। इसलिए अजा के बाद तुम सुंदर नहीं दिख सकती हो। घमंडी राजकुमारी का चेहरा काला हो जाता है। सभी लोग उस घमंडी राजकुमारी को देखते रहते है। अब उस घमंडी राजकुमारी को अहसास हो गया था। उसने बहुत बड़ी गलती की है। जब राजा आते है। वह सब कुछ देखते है। वह साधु जी अपने लड़की के लिए माफ़ी मांगते है। क्योकि वह अभी समझदार नहीं है। उसके बाद साधु जी कहते है। जब तक उसे खुद अहसास नहीं होगा। तब तक यह समस्या हल नहीं होगी।

चीकू खरगोश ने झूठ बोला

दो खरगोश थे। वे स्कूल जाने के लिए साथ-साथ घर से निकलते थे।

स्कूल का समय खत्म होने पर साथ-साथ ही घर वापिस आते थे। दोनों में खूब दोस्ती थी।

एक का नाम था-चीकू और दूसरे का नाम था मीकू।

एक दिन चीकू पहले घर से चल पड़ा। रास्ते में उसे जामुन का एक पेड़ दिखाई दिया।

पेड़ के नीचे बहुत सारी जामुन गिरी पडी थीं। चीकू को लालच आ गया।

उसने थोड़ी-सी जामुन उठाई और खाने लगा। एक बार खाना शुरू किया तो और भी खाने का मन हुआ। उसने सोचा- अभी मीकू तो आया नहीं है। उसका इंतजार करते-करते थोड़ी और खा लेता हैं !

चीकू ने ढेर सारी जामुन खाईं। उसे बड़ा मजा आ रहा था।

तभी मीकू कूदता-फादता वहाँ पहुचा। चीकू उसे देखकर बोला, 'चलो मीकू स्कूल के लिए देर हो रही है।

' लेकिन जैसे ही रीक ने बोलने के लिए. मुँह खोला।

मीकू उसे देखकर जोर-जोर से हँसने लगा।

क्या हुआ ?' चीकू ने पूछा।

इधर आओ।' इतना कहकर मीकू उसे एक तालाब के पास ले गया। फिर बोला-

'जरा पानी में अपनी परछाईं देखो। अपना मुँह खोलो और फिर देखो। '

चीकू ने अपना मुँह खोला और पानी में देखा तो उसे रोना आने लगा। वह बोला, 'हे भगवान, ये क्‍या हो गया ? ये मेरे दाँत जामुनी कंसे हो गए ?

'अब में क्‍या करूँ मीकू ? ऐसे स्कूल जाऊँगा तो सब मेरी हँसी उड़ाएँगे।

इन्हें साफ करने बैदूँगा तो बहुत देर हो जाएगी और टीचर गुस्सा होंगी। अरे कुछ तो उपाय बताओ मीकू।' उसने ऊहा।

मीक्‌ ने एकदम जेम्स बॉण्ड के तरीके से सोचा और बोला, तुम आँखें बंद करो।'

चीक्‌ ने आँखें बंद कर लीं। मीकू झाड़ी से एक लंबा-सा पत्ता तोड़ लाया और उसे चीकू के मूँह पर बाँध दिया।

चीकू ने पूछना चाहा, 'ये ... क्या ?'

जब टीचर तुझे पूछेंगी कि 'क्या हुआ' तो कह देना, मेरा मतलब है लिखकर बता देना कि तेरे मुँह में चोट लगी है।

इसीलिए पट्टी बाँधी है।' मीकू ने समझाया।

चीकू को उपाय अच्छा लगा। दोनों स्कूल पहुँचे। टीचर को जब पता चला कि चीकू को चोट लगी है तो उन्होंने चीकू को प्यार किया और ठीक से बैठने को कहा।

उन्होंने बाकी बच्चों से भी कहा, ' तुम्हारे दोस्त को चोट लगी है।

उसे कोई परेशान न करे।'

टीचर पढ़ा रही थीं तभी एक मक्खी आई और चीक्‌ की नाक में घुस गई। चीकू को जोर से छींक आई- 'आ..छीं .. और उसको पद्टी खुल गई।

टीचर ने देखा उसे चोट नहीं लगी है।

'तुृमने झूठ बोला चीकू ? क्‍यों ?' वह गुस्से से बोलीं।

अब चीकू को सच में रोना आ गया। उसने सारी बात सच-सच टीचर को पता दी।

टीचर ने उसे समझाया, 'झूठ बोलना बहुत गलत बात है। अपने दोस्तों की बात माननी चाहिए, लेकिन केवल वही बात जो सही हो।

बिना सोच-विचार के गलत बातें मानने से मुश्किल हो जाएगी। समझे ?'

फिर उन्होंने दाँतों के डॉक्टर को फोन किया।

डाक्टर ने आकर चीकू के दाँत साफ कर दिए।

चीकू अब बहुत खुश था, क्योंकि उसे अब झूठ बोलने की कोई जरूरत नहीं थी।

कछुए ने भरी उड़ान

एक नदी में बहुत-सी मछलियाँ और एक कछुआ रहते थे।

कछुआ अक्सर पानी से बाहर आकर आकाश की ओर देखा करता था। उसे आकाश में उड़ने वाले पक्षी बहुत अच्छे लगते थे।

वह मछलियों से कहता था, “काश! में भी आकाश में दूर तक उड़ सकता।

इन पक्षियों की तरह कहीं भी आ-जा सकता।'

मछलियाँ हमेशा उसे समझाती थीं, 'कछुए भाई, ऐसी बात मत सोचो जो नहीं हो सकती।

' 'देखना, एक दिन मैं तुम्हें उड़कर जरूर दिखाऊँगा।' वह बडे विश्वास से कहता।

तब मछलियाँ उसे समझातीं, 'इस अजीब-सी इच्छा के कारण अपना नुकसान मत करा लेना।' लेकिन कछए को मछलियों की बातें समझ में नहीं आती थीं।

वह तो बस उड़ने के ही सपने देखा करता था।

एक दिन वह पानी से बाहर निकलकर रेत पर आराम कर रहा था।

तभी उसने दो बगुलों को वहाँ बैठे हुए देखा। वह उनके पास गया और बोला, 'नमस्ते, मैं कछआ हूँ, यहाँ पानी में रहता हूँ। नदी के किनारे आपका स्वागत है।'

बगुले बडे खुश हुए। बोले, 'हम बगुले हैं। दूर एक और नदी हे। उसके पास ही रहते हैं। मछलियाँ खाते हैं और आपकी इस नदी तक घूमने आए हैं।'

इस तरह कछुआ और बगुलों की जल्दी ही दोस्ती हो गई। उसके बाद वह अक्सर बगुलों से मिलने लगा। उनसे बात करना उसे अच्छा लगता था।

वे दूर-दूर तक घूमकर आए थे। उनके किस्से सुनकर कछए की उड़ने की इच्छा और भी तीब्र हो जाती थी।

एक दिन हिम्मत करके उसने अपने मन की बात बगुलों को बताईं। बगुले पहले तो हैरान हुए। फिर उन्हें लगा कि कछआ उनका दोस्त है। इसलिए उसकी मद॒द्‌ करनी चाहिए।

वे कछुए से बोले, 'एक उपाय है। लेकिन तुम्हें हमारी कुछ बातों का ध्यान रखना होगा।

कछुआ खुशी से उछल पड़ा। बोला, “ठीक है, मैं सब कुछ मानने को तैयार हूँ।

तब एक बगुला लकड़ी का एक छोटा-सा मजबूत डंडा ढूँढकर लाया। उसने कछुए को समझाया, 'तुम इस डंडे को अपने मुँह से पकड लेना।

हम दोनों एक-एक ओर से डंडे को अपनी चोंच में दबा लेंगे। तुम डंडे को मजबूती से पकड़े रहना। तब हम तुम्हें लेकर उड़ेंगे और एक चक्कर लगाकर वापिस आ जाएँगे।

अब दूसरा बगुला बोला, “दो बातों का विशेष ध्यान रखना। हिलना मत और बोलना मत। हिले तो हम तुम्हें सम्हाल नहीं पाएँगे और बोले तो लकड़ी तुम्हारे मुँह से छूट जाएगी और तुम गिर पड़ोगे।'

कछुआ तैयार हो गया।

बगुलों ने जो योजना बनाई थी उसी के अनुसार वे उडे। बगुलों ने बड़ा सा एक चक्‍कर लगाया। कछुआ बहुत खुश था।

जब वे नदी के ऊपर से गुजर रहे थे, कछुए ने नीचे देखा। उसकी दोस्त मछलियाँ आश्चर्य से कछुए को ऊपर आकाश में उड़ता हुआ देख रही थीं।

जब कछुए ने मछलियों को देखा तो वह भूल गया कि बगुलों ने उसे चुप रहने को कहा है।

वह चिल्लाकर बोला, 'देखो मेरा कमाल।' लेकिन ऐसा करने से डंडा उसके मुँह से छूट गया। वह तेजी से नीचे गिरने लगा। उसे डर लग रहा था। उसने डर के मारे आँखें बंद कर लीं।

तभी जोर से आवाज हुई- “छपाक्‌' और कछुआ पानी में गिरा। ह मछलियाँ बोलीं, 'देखा, आखिर इस पानी ने ही तुम्हारी जान बचाई।

अगर जमीन पर गिर जाते तो ?” कछआ भी समझ गया था कि उसे पानी में रहने के लिए ही बनाया गया है। उड़ने के लिए नहीं।

कौआ और सांप की कहानी

एक पेड़ पर कौआ अपनी पत्नी कौवी के साथ घौंसला बनाकर रहता था। उस पेड़ के नीचे तने में एक बिल था जिसमें एक बड़ा सा और दुष्ट सांप रहता था।

एक बार कौवे की पत्नी ने तीन अंडे दिए। इस बात से कौआ और कौवी दोनों बहुत खुश हुए। अगले दिन जब कौआ भोजन की तलाश में पेड़ से दूर चला गया तब दुष्ट सांप अपने बिल से बाहर निकला और पेड़ पर चढ़कर कौए के घोंसले तक जा पहुंचा।

वहां उसने अंडो के साथ कौवी को देखा तो उसने कहा कि वाह! आज तो तुमने मेरे खाने के लिए स्वादिष्ट भोजन का इंतजाम कर दिया हैं। अब जल्दी से दूर हटो और मुझे अंडों का स्वाद लेने दो।

यह सुनकर कौवी ने सांप से कहां – “दुष्ट सांप! यह मेरे बच्चे हैं। चला जा यहाँ से। मैं तुझे इन्हें नहीं खाने दूंगी।

तब सांप ने कहा – हम्म्म्म! क्या कर लोगी तुम मेरा? यहाँ आज दिन तक मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया हैं। तुम भी मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। यह कहकर सांप ने देखते ही देखते कौए के सभी अंडो को खा लिया।

शाम को कौआ जब अपने घर वापस आया तो कौवी ने रो रोकर सारी बात कौए को बताई। कौआ अब उस दुष्ट सांप को सबक सिखाने के लिए उपाय ढूंढ़ने लगा।

अगले दिन कौआ राजा के महल में जा पहुंचा। वहां उसने रानी के गले में बड़ा सा सोने का हार देखा। अब वो मौके का इन्तजार करने लगा। कुछ देर बाद रानी स्नान करने के लिए जाती हैं और अपना सोने का हार भी उतार देती हैं।

अब मौके का फायदा उठाकर कौआ उस सोने के हार को अपनी चौंच में उठाकर जाने लगा। यह नजारा जब रानी ने देखा तो वो जोर चिल्लाई। अरे कोई हैं?? चोर चोर, देखो एक कौआ मेरा सोने का हार चुराकर उड़ा जा रहा हैं पकड़ो उसे जल्दी से।

अब राजा के सैनिक उस कौए का पीछा करने लगे और जंगल में जा पहुंचे। थोड़ी देर बाद सैनिकों ने देखा कि कौए ने सोने का हार एक पेड़ के नीचे कहीं छिपा दिया हैं। सैनिक पीछा करते हुए उस पेड़ के पास गए और उन्होंने हार को खोजना शुरू किया किया। जहां उन्हें सांप का बिल दिखाई दिया।

सैनिकों ने सोचा – शायद उस कौए ने इसी बिल में सोने का हार छुपाया हैं। चलो इसी बिल को खोदते हैं।

जैसे ही उन्होंने बिल को खोदना शुरू किया वो दुष्ट सांप बाहर निकला और सैनिकों पर फुफकारने लगा। यह देखकर सभी सैनिक उस दुष्ट सांप पर टूट पड़े और सांप का वहीं पर काम तमाम कर डाला।

इस प्रकार उस दुष्ट सांप को अपने किये की सजा मिल चुकी थी। अब कौआ और कौवी दोनों ख़ुशी खुशी रहने लगे।

कौआ और हंस (Kauwa aur Hans ki Kahani)

एक समय की बात हैं तालाब के किनारे एक पेड़ था जिस पर एक कौआ रहता था। उस तालाब में दिनभर बहुत सारे हंस तैरते रहते थे।

एक दिन कौआ पेड़ पर बैठकर दूर से ही हँसो को तैरते देख रहा था तभी उसे मन में ख्याल आया कि यार ये हंस कितने सुंदर हैं एक दम सफेद झक। और एक मैं हु बिल्कुल काला कलूटा सा। काश! मैं भी इनके जैसा सफ़ेद रंग का होता!

यह सोचते हुए कौआ एक हंस के पास जाकर उससे कहने लगा। भाई तुम कितने खुशनसीब हो जो तुम्हें ये सफ़ेद रंग मिला हैं। तुम तो बहुत खुश रहते होंगे न !

हंस बोला- नहीं, मुझे तो ऐसा नहीं लगता। क्यूंकि तोता तो मुझसे भी ज्यादा सुंदर हैं।

इसके बाद कौआ तोते के पास गया और उससे बोला- तोते भाई तुम हंस से भी ज्यादा सुंदर लगते हो। क्यूंकि तुम्हारे पास दो रंग हैं। इसलिए तुम तो बहुत खुश रहते होंगे न?

तोता बोला- नहीं भाई, ऐसा बिल्कुल नहीं हैं। मैं कहां सबसे सुन्दर हूँ। मुझसे भी सुन्दर तो मोर हैं जिसके पास अनगिनत रंग हैं। इसलिए शायद वो ही सबसे खुश होगा।

इसके बाद कौआ चिड़ियाघर में गया जहां पर एक पिंजरे में बहुत सारे मोर बंद थे। जिन्हें देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ लगी हुई थी। जब भीड़ बिल्कुल कम हुई तब कौआ मोर के पास गया और उससे बोला –

“मोर भाई जैसा मैंने सुना हैं आज अपनी आँखों से देख भी लिया हैं। सच में तुम कितने सुंदर हो। देखो तुम्हें देखने के लिए हर रोज कितने लोगों की भीड़ लगी रहती हैं। और एक मैं हूं जिसे कोई देखना तक पसंद नहीं करता।

तब मोर ने कहा – नहीं भाई! जिसे तुम सुंदरता कह रहे हो। असल में इसी के कारण तो मैं इस कैदखाने में बंद हूं। आखिर कौन इस तरह पिंजरे में बंद होकर रहना चाहता हैं।

मैं भी तुम्हारी तरह आजाद घूमना चाहता हूं लेकिन मैं चाहकर भी ऐसा नहीं कर सकता। असल में तुम ही सबसे खुशनसीब हो जो बिना डर के अपना जीवन जी सकते हो।

कौआ अब समझ चुका था कि सुंदरता ही इस दुनिया में सबकुछ नहीं हैं। इसके बिना भी दुनियाँ ख़ुशी से जी जा सकती हैं।

घमंड का अंत

एक जंगल में एक विशाल पर्वत था। एक दिन उस विशाल पर्वत ने जानवरों को देखा, जंगल को देखा और फिर खुद को देखा। उसे अपने आकार पर बहुत घमंड हुआ उसने कहा मैं सबसे शक्तिशाली हूं, मैं ही तुम्हारा ईश्वर हूँ। पर्वत की यह बातें सुनकर सभी जानवरों को बहुत गुस्सा आया।

घोड़े ने आगे बढ़कर कहा – ओ घमंडी पर्वत अपने आप पर इतना घमंड मत कर, एक क्षण में तुम्हें दौड़ कर पार कर सकता हूं, पर पर्वत पर थोड़ी ऊपर चढने के घोड़ा लड़घड़ा कर गिर गया।

पर्वत दिल खोलकर हंसा, इसी तरह हाथी, ऊँट,जिराफ सभी ने कोशिश की पर वे पहाड़ का कुछ बिगाड़ नहीं पाए अब सभी जानवरों को अपना दोस्त चूहा याद आया।

चूहा पर्वत के पास आया और उसने पर्वत को चुनौती दी, पर्वत ने चूहे का खूब मजाक उड़ाया। चूहे ने मुस्कुराते हुवे पर्वत में छेद बनाना प्रारंभ किया। अन्य चूहों ने भी पर्वत में छेद करना चालू कर दिया। पर्वत घबरा गया उसने सभी जानवरों से माफी मांगी। इस तरह पर्वत के घमंड को एक छोटे से चूहे ने तोड़ दिया।

शिक्षा:- जीवन में हमे कभी भी घमंड नही करना चाहिए, क्युकी जो घमंड करते है एकदिन निश्चित ही उनके घमंड का अंत भी होता है, इसलिए हमे लोगो के साथ घमंड के बजाय विनम्र का स्वाभाव रखना चाहिए।

बन्दर की कहानी

एक समय की बात है एक शरीफ आदमी था। उसके पास एक बंदर था, वह बंदर के जरिए अपनी आजीविका कमाता था। बंदर कई तरह के करतब लोगों को दिखाता था। लोग उस पर पैसे फेंकते थे, जिसे बंदर इकट्ठा करके अपने मालिक को दे देता था। एक दिन मालिक बंदर को चिड़ियाघर लेकर गया, बंदर ने वहां पिंजरे में एक और बंदर देखा। लोग उसे देख – देख कर खुश हो रहे थे तथा उसे खाने को फल बिस्किट इत्यादि दे रहे थे। बंदर ने सोचा कि पिंजरे में रहकर भी यह बंदर कितना भाग्यवान है, बिना किसी परिश्रम के ही इसे खाना-पीना मिल जाता है।

उस रात वह बंदर भी भाग कर चिड़ियाघर में रहने पहुंच गया, उसे मुफ्त का खाना और आराम बहुत अच्छा लगा। पर कुछ दिनों में ही बंदर का मन भर गया। उसे अपनी स्वतंत्रता की याद आने लगी, अपनी आजादी वापस चाहता था। वह फिर चिड़ियाघर से भाग कर अपने मालिक के पास पहुंच गया। उसे मालूम हो गया की रोटी कमाना कठिन होता है, किंतु आश्रित होकर पिंजरे में कैद रहना उससे भी कठिन है।

शिक्षा:- इस कहानी से हमे यही शिक्षा मिलती है की जब स्थिति में होते है वह स्थिति उतनी अच्छी नही लगती है जबकि दुसरो का जीवन और अधिक अच्छा लगता है, लेकिन वास्तव में वैसा नही होता है सभी लोग अपने जीवन में कुछ न कुछ परेशानिया झेलते रहते है इसलिए हमे दुसरो के देखने के बजाय अपने सुख में संतोष करना चाहिए।

राख को रस्सी

यह उस समय की बात है, जब भारत में राजाओं का राज्य था।

एक साहसी राजा थे दीपेंद्रसिंहश। उनकी महारानी शोभना भी बहुत बुद्धिमान थीं।

राजा दीपेंद्र ने अपने दरबार में सोच-समझकर ऐसे दरबारी नियुक्त किए थे, जो राजा को सही परामर्श दे सकें। विशेष रूप से उनके मंत्री विक्रमसिंह।

उनकी बुद्धि पर तो राजा को बेहद विश्वास था। किसी भी मुसीबत के समय विक्रमसिंह घबराते नहीं थे। बल्कि समझदारी से मुश्किलों का हल निकाल लेते थे।

एक बार राजा दीपेंद्र अपने पड़ोसी राज्य में गए। वहाँ के राजा महाराज दीपेंद्र के मित्र थे।

राजा दीपेंद्र कई दिनों तक अपने राज्य में वापिस नहीं आए। सभी को चिता होने लगी।

तब दस दिनों के बाद विक्रमसिंह को एक संदेश मिला।

उस पर लिखा था आपके महाराज को बंदी बना लिया गया है। यदि आप अपने

महाराज को यहाँ से ले जाना चाहते हैं तो राख की एक रस्सी बनाएँ।

उस रस्सी से बाँधकर ही आपके महाराज को कारागार से बाहर लाया जाएगा।

यदि ऐसा न हो सका तो महाराज को हमेशा के लिए कारागार में ही रहना पडेगा।'

'राख की रस्सी!' विक्रमसिंह को आश्चर्य हुआ। 'यह कैसी अजीब शर्त हे ?'

वे दो दिनों तक सोचते रहे। आखिर उनकी बुद्धि ने एक उपाय सोच ही लिया और वे पड़ोसी राज्य में पहुँच गए।

पडोसी राज्य के दरबार में पहुँचकर विक्रमसिंह ने कहा-

'राख की रस्सी बनाने के लिए मैं तैयार हूँ। लेकिन उसका उपयोग केसे करना है, यह आपको तय करना होमा।'

'ठीक है, आप पहले राख की रस्सी बनाएँ तो सही।' वहाँ के महाराज बोले।

तब विक्रमसिंह ने कुछ चीजों की माँग की। ये चीजें थीं-थोडा सा जूट, दियासलाई और एक ऐसा कमरा, जिसमें कोई खिड़की या हवा आने का कोई रास्ता न हो।

जूट और दियासलाई लेकर विक्रमसिंह कमरे में चले गए और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। तीन-चार घंटों के बाद वे बाहर आए। उन्होंने वहाँ के राजा से कहा, “महाराज रस्सी तैयार है।'

राजा उत्सुकता से अंदर गए तो देैरेंबां जमीन पर एक लंबी राख की रस्सी रखी थी। उन्होंने ध्यान से देखा तो समझ में आ गया कि यह रस्सी कैसे बनाई गई थी।

असल में विक्रमसिंह ने पहले जूट से एक रस्सी बनाई।

फिर उसे जमीन पर लंबा करके फैला दिया। अंत में उन्होंने रस्सी के एक सिरे पर आग लगा दी। धीरे-धीरे रस्सी को जलाती हुई आग आगे बढी।

जहाँ-जहाँ जूट जलता जाता था, वहाँ जूट की जगह

उसकी राख बनती जाती थी। लेकिन रस्सी को काफी मजबूती से बुना गया था, इसलिए उसकी राख उसी आकार में रुकी हुई थी।

इस तरह जब पूरी रस्सी ज॑ल गई तब भी उसका आकार वैसा ही बना रहा।

विक्रमसिंह बोले, 'महाराज, रस्सी तैयार है। अब आप अपने सैनिकों से कहें कि इस रस्सी को लपेटें और महाराज को बाहर ले आएँ।'

राजा विक्रमसिंह को बुद्धिमानी देखकर महाराज बहुत प्रसन्न हुए। तभी महाराज दीपेंद्र उस कक्ष में आए और बोले, 'इसीलिए आपने एक हवारहित कक्ष माँगा था, जिससे कि हवा से रस्सी का आकार न बिगड़े।

वाह विक्रमसिंह, आप सचमुच बुद्धिमान हैं। हम तो बस यूँ ही आपकी परीक्षा ले रहे थे। आपने एक बार फिर अपनी बुद्धिमानी सिद्ध कर दी।

ऐसा कहकर महाराज दीपेंद्र ने विक्रमसिंह को गले से लगा लिया।

राजा और राजकुमारी की वार्ता हिंदी कहानी

राजकुमारी अपने कमरे में बैठी थी। तभी राजा उन्हें बुलाते है वह राजा के पास जाती है। राजा कहते है की आज के बाद तुम्हे राज्य की सभी समस्या पर ध्यान देना होगा। क्योकि मुझे लगता है की आज तुम यह सब करती हो तो इससे आने वाले समय में तुम अपने काम को अच्छे से कर सकती हो। राजकुमारी ने अपने पिता की बात सुन ली थी। अब उन्हें लगता है। शायद राज्य की समस्या पर ध्यान देना जरुरी है।

यह सभी काम राजा सेनापति से करवा सकते थे। मगर वह चाहते थे राजकुमारी इन सभी काम को अच्छे से सीख सकती है। उसके बाद उन्हें काम में मदद की जरूरत है होगी। राजकुमारी अपने काम को बहुत अच्छे से करती है। कुछ समय बाद राजा को पता चल गया था। राज्य की कुछ समस्या को राजकुमारी कम कर चुकी है। यह बहुत अच्छी बात है। वह अपने राज्य के काम को अच्छे से समझ सकती है। उन्हें अब बहुत अच्छा लग रहा था। आगे राजकुमारी सब कुछ अच्छा कर सकती है। राजकुमारी राजा के पास आती है।

उसके बाद राजकुमारी राजा से कहती है। सब कुछ ठीक हो गया है। मेने आपके बताये काम को अच्छे से कर लिया है। राजा राजकुमारी से कहते है। मुझे पता था। तुम अपना काम बहुत अच्छे से कर सकती हो। इसलिए मेने तुम्हे यह काम दिया था। उसके बाद नानी ने सभी बच्चो से पूछा था। राजकुमारी को राजा ने काम क्यों बताया था। जबकि यह काम सेनापति कर सकता था। मगर कोई भी जवाब नहीं मिलता है। नानी कहती है। जो काम हम अपने हाथो से करते है। वह हमेशा अच्छा ही होता है। अगर किसी की मदद से काम किया जाता है। तो तुम्हे वह काम नहीं आएगा।

रहस्यमय बाँसुरी-वादक

दो पड़ोसी राज्यों के राजाओं में आपस में शत्रुता थी।

एक राज्य का नाम था चंद्रलोक। दूसरे का नाम था सूर्यनगरी।

चंद्रलोक के राजा का नाम था चंद्रसेन और सूर्यनगरी के राजा का नाम था सूर्यकुमार।

एक बार चंद्रलोक के राजा को सूर्यनगरी के राजा ने बंदी बना लिया।

राजा को छोड़ने के बदले में बहुत सारे धन की माँग की गई। चंद्रसेन ने अपनी रानी को संदेश भेजा कि राज्यकोष से धन निकालकर भेज दिया जाए।

लेकिन उसकी पत्नी की ओर से कोई उत्तर नहीं आया।

कुछ दिनों के बाद राजा सूर्यकुमार के दरबार में एक बाँसुरी-वादक आया। उसने इतनी मधुर बाँसुरी बजाई कि राजा मुग्ध हो गए।

उन्होंने बाँसुरी-वादक से आग्रह किया कि वह कुछ दिन अतिथि बनकर महल में रुके। बाँसुरी-वादक ने राजा की इच्छा को पूरा किया और महल में रुक गया।

पाँच दिन बाद जब वह अपने देश वापिस जा रहा था, तब राजा सूर्यकुमार ने उससे कहा, 'हम आपको अपनी ओर से कोई उपहार देना चाहते हैं। आप अपनी इच्छा हमें बताएँ।'

बाँसुरी-वादक ने कहा, 'महाराज, मेरा देश बहुत दूर है। रास्ता लंबा है। मैं चाहता हूँ कि आप मुझे सेवा करने के लिए एक गुलाम दे दें।' उसने गुलाम के रूप में चंद्रसेन को माँग लिया।

राजा ने ऐसा ही किया। बाँसुरी-वादक चंद्रसेन को लेकर चल दिया। जल्दी ही वे सूर्यनगरी से बाहर निकल गए।

चंद्रलोक की राजधानी के पास पहुँचकर अचानक बाँसुरी-वादक गायब हो गया।

चंद्रसेन ने उसे काफी ढूंढा। जब कुछ पता नहीं चला तो वे अपनी राजधानी वापिस पहुंच गए। महाराज को यूँ अचानक वापिस पाकर सारे दरबारी अत्यधिक प्रसन्‍न हो गए।

चंद्रसेन भी खुश थे। लेकिन वे अपनी रानी से बहुत नाराज थे। घातक कि वे रानी से नहीं मिलना चाहते।

हमारा संदेश मिलने पर भी उन्होंने हमें छुड़ाने के लिए कुछ नहीं किया। यहाँ तक कि हमारे संदेश का कोई भी उत्तर नहीं दिया।

जे जॉले वे दरबार में यह घोषणा करने ही वाले थे कि वे अपनी रानी से हमेशा के लिए अलग हो रहे हैं, तभी बाँसुरी की मधुर आवाज सुनाई दी।

अचानक वही बाँसुरी-वादक वहाँ आ पहुँचा; अब राजा चंद्रसेन ने बाँसुरी-वादक को ध्यान से देखा।

वह और कोई नहीं, स्वयं महारानी थीं।

“महारानी आप ? तो आपने हमें छुड़ाया है ? आपकी चतुराई के कारण हमें अपने राज्यकोष से धन भी नहीं निकालना पड़ा।

आप सचमुच बुद्धिमान हैं।'

इस तरह रानी ने राजा चंद्रसेन के हृदय में और भी गहरा स्थान बना लिया।

कौआ और लोमड़ी

एक लोमड़ी थी दिन भर वह भोजन की तलास में भटक रही थी लेकिन उसे जंगल में खाने को कही भी कुछ न मिला, फिर वह लोमड़ी थक हारकर एक पेड़ के नीचे बैठ गयी, इतने में उस पेड़ में एक कौआ उड़ते हुए आकर बैठ गया जिसके चोच में रोटी का टुकड़ा था, जिसे देखकर लोमड़ी में मुह में पानी आ गया, फिर वह उस रोटी के टुकड़े को पाने के लिए तरकीब सोचने लगी,

फिर कुछ देर सोचने के बाद वह कौए से बोली “ अरे कौआ भाई आप तो बहुत ही अच्छा गाता है आपके गानों को सुनना हमे बहुत ही अच्छा लगता है हमे भी अपना गाना तो सुनाओ”

इतनि तारीफ सुनकर कौआ बहुत ही प्रसन्न हो गया और फिर कांव कांव करने लगा, जिससे उसके चोंच की रोटी नीचे गिर गयी, और लोमड़ी तुरन्त उस रोटी के टुकड़े को लेकर अपनी भूख मिटाने वहा से भाग गयी, इस तरह कौआ देखता ही रह गया।

शिक्षा:- इस कहानी से हमे यही शिक्षा मिलती है कभी भी हमे दुसरो की बातो में नही आना चाहिए, जो भी करना चाहिए अपने दिमाग से सोच समझकर ही कोई कदम उठाना चाहिए।

नानी ने सुनाई राजकुमारी की कहानी

यह कहानी एक राजकुमारी की है जो किसी राजकुमार से शादी नहीं करना चाहती थी बल्कि किसी मेहनती इंसान से शादी करना चाहती थी राजकुमारी यही सोचती थी की जो भी जीवन में मेहनत करता है उसे हमेशा अच्छा फल मिलता है इसलिए वह मेहनती इंसान से शादी करना चाहती थी।

मगर राजा को यह बात मंजूर नहीं थी क्योकि वह अपनी बेटी का विवाह ऐसे आदमी से नहीं करना चाहता था जो मेहनती तो हो, मगर उसके पास धन न हो, क्योकि अगर धन नहीं होगा तो मेरी बेटी का जीवन अच्छा नहीं होगा हर रोज यही बाते सामने आती थी क्योकि राजा हर रोज ऐसा करता था की वह अपनी बेटी को समझाया करता था मगर वह समझने को तैयार नहीं थी, राजा ने रानी से कहा की मुझे कुछ दिन के लिए नगर से बाहर जाना होगा क्योकि मुझे दूसरे राजा से मुलाक़ात करनी है जब तक में आता नहीं हु तब तक राजकुमारी का ध्यान रखना यह कहकर राजा चले जाते है।

उधर जब राजकुमारी को पता चलता है की पिताजी चले गए है तो वह अपनी माता से कहती है की मुझे कुछ दिन के लिए नगर से बाहर जाने दो क्योकि में बहुत समय से कही भी बाहर नहीं गयी हु मगर माता ने बहुत मना किया था क्योकि राजा इस बात मना कर गए थे की राजकुमारी कही भी बाहर नहीं जायेगी, मगर राजकुमारी नहीं मानी थी वह अपनी माता से बहुत बार कहकर आखिर अपने मामा के यहां पर चली गयी थी मामा एक छोटे से गांव में रहते थे उन्हें पता था की आज राजकुमारी आ रही है क्योकि उन्हें बता दिया गया था।

अब मामा को इस बात का ध्यान रखना था की कोई भी उन्हें पहचान न पाए क्योकि अगर कोई उन्हें पहचान गया तो सभी लोग यही पर हर रोज आ जायँगे कुछ देर बाद राजकुमारी आ गयी थी मामा ने बताया था की यहां पर कुछ बातो का ध्यान रखना होगा जिससे तुम्हे यह पर कोई पहचान न पाए राजकुमारी ने कहा कि आप चिंता न करे कोई मुझे नहीं पहचान पायेगा कुछ देर बाद मामा ने कहा की मुझे कुछ देर के लिए जाना होगा।

तुम अपना ध्यान यह पर रखना, में जल्दी ही आ जाऊंगा, कुछ देर बाद मामा चला गया था उनके जाने के बाद एक आदमी आता है वह बहुत ही गरीब लग रहा था वह उनके मामा के बार में पूछता है मगर वह अभी नहीं है यह बात वह राजकुमारी कहती है वह कहता है की कोई बात नहीं है में यह अपर हर रोज आता हु क्योकि मुझे उनका कुछ काम करना पड़ता है इसलिए आप चिंता न करे में वह काम कर लेता हु कुछ देर बाद ही वह आदमी लकडिया तोड़ने लग जाता है।

राजकुमारी उसे देखती रहती है क्योकि वह बहुत मेहनत से काम कर रहा था उसे काम करते हुए देख राजकुमारी को यही लग रह था की अगर मेरी शादी इससे हो जाए तो बहुत अच्छा होगा क्योकि यह बहुत मेहनती भी है और बहुत गरीब लग रहा है राजकुमारी को अब यही लग रहा था की उनकी तलाश अभी यही पर पूरी हो जाती है, क्योकि जिसकी तलाश उन्हें थी वह मिल गया था वह आदमी अपने काम में लगा हुआ था उसका ध्यान अपने कमा पर था मामा अभी नहीं आये थे।

नानी ने अपनी कहानी बीच में रोक दी थी सभी ने कहा की उसके बाद नानी क्या हुआ था।

नानी ने कहा कि अब तुम मुझे बताओ की क्या राजकुमारी को उससे शादी करनी चाहिए या नहीं।

सभी ने एक बात कही थी की राजकुमारी को उससे शादी नहीं करनी चाहिए।

क्योकि वह बहुत अमीर है मगर वह आदमी बहुत गरीब है इसलिए शादी नहीं करनी चाहिए।

तभी नानी कहती है की ठीक है अब कहानी सुनते है की आगे क्या होता है।

नानी फिर से कहानी कहती है अभी मामा कुछ देर बाद आ गए थे।

वह आदमी काम कर रहा था।

कुछ देर बाद काम पूरा हो गया था, अब वह आदमी जाने लगा था उस आदमी के जाने के बाद राजकुमारी ने उस आदमी के बारे में सब कुछ पता कर लिया था, वह किस जगह पर रहता है और उसके घर में कौन है जब सब कुछ पता लग गया तो राजकुमारी उसके पास जाती है वह राजकुमारी को आता हुआ देख डर जाता है क्योकि उसने उसे वेआ पर देखा था जिस जगह पर वह काम करता था राजकुमारी उसे सब कुछ बता देती है वह मना करता है मगर राजकुमारी नहीं मानती है और शादी कर लेती है शादी करके वह मामा के पास आती है।

मामा यह देख डर जाता है वह कहता है की यह सब कुछ इस आदमी ने किया है मगर राजकुमारी कहती है की यह इसने नहीं किया है बल्कि यह मेरी मर्जी है मामा उसे महल की और ले जाता है क्योकि उसने वह किया है जो उसे नहीं करना चाहिए था जब वह महल में चला जाता है तो रानी को भी यह पता चल जाता है अब रानी को डर लगता है क्योकि राजा को जब यह पता चलेगा तो बहुत गुस्सा करेंगे यह बता सोच ही रहे थे की राजा भी आ जाते है।

राजा देखते है की यह क्या हो रहा है वह राजकुमारी से कहने लगते है की तुमने वही किया है जो मेने मना किया था मगर अब क्या किया जा सकता है, जो गया था वह अब बदला नहीं जा सकता था राजा के राज्य पर हमला हो जाता है वह आदमी कुछ भी नहीं सोचता है और राजा की मदद करने चला जाता है।

राजा को जब यह पता चलता है की वह मदद कर रहा है तो राजा को भी लगता है की शायद उसकी लड़की ठीक ही कर रही थी क्योकि उस आदमी ने राजा के साथ मिलकर युद्ध किया था और जीत भी गए थे।

प्रिज्य से निकले सात रंग

समुद्र के बीचोंबीच एक छोटा-सा द्वीप था। वह रंगहीन द्वीप के नाम से जाना जाता था।

यह नाम उसे इसलिए मिला, क्योंकि उस द्वीप पर कोई रंग नहीं था। हर वस्तु बस काली और सफेद थी। वहाँ सिर्फ काले और सफेद फूल खिलते थे।

धूप का रंग सुनहरा नहीं बल्कि सफेद था। टमाटर लाल नहीं काले उगते थे वहाँ। उस द्वीप पर रहने वाले लोग काला-सफेद खाना खाते थे।

यहाँ तक कि उनके सपनों में भी यही दो रंग होते थे।

कोई रंग न होने के कारण वहाँ के लोग खुद भी एकदम रंगहीन थे। न ज्यादा हँसते थे, न ज्यादा खुश रहते थे।

वहाँ के राजा-रानी ने सुना था कि दुनिया में बहुत सारे रंग है।

वे चाहते थे कि उनके द्वीप पर भी बहुत से रंग आ जाएँ।

समुद्र में और भी कई सारे द्वीप थे। ऐसे ही एक दूर देश में एक बूढ़ा जादूगर रहता था।

एक समय था, जब वह एक शक्तिशाली जादूगर था। लेकिन अब कई वर्षों से उसने कोई जादूगरी नहीं दिखाई थी। वह धीरे-धीरे जादू के मंत्र भूलता जा रहा था।

रंगहीन द्वीप के राजा ने भी इस जादूगर के बारे में सुना था। उसने अपने दूत को भेजा, जादूगर को बुला लाने के लिए। बूढ़ा जादूगर चकित था कि अचानक राजा को उसकी क्‍या जरूरत पड़ गई।

उसने एक कोने में से अपना थेला उठाया। उस पर ढेरों धूल जमा थी। उसमें जादूगर का वह सामान था, जो वह पहले प्रयोग में लाता था। थैले को झाड़कर उसने कंधे पर डाला और दूत के साथ चल दिया।

चार दिन तक वे लोग नाव में चलते रहे। तब कहीं जाकर रंगहीन द्वीप पहुँचे।

राजा ने जादूगर का खूब स्वागत किया। आदर से उन्हें बैठाया और फिर सैनिकों को आदेश दिया-

'जाओ, बाबा को उनके कक्ष में आराम करने के लिए ले जाओ।'

जादूगर वाकई बहुत थक गया था, वह थोडी देर सोना चाहता था।

शाम को राजा खुद जादूगर से मिलने उसके कक्ष में आया।

उसने जादूगर को प्रणाम किया। फिर अपनी समस्या उन्हें बताई। बाबा, हमारे देश में कोई भी रंग नहीं है। देखिए, यहाँ आकर आपके रंग भी सफेद और काले हो गए हैं।

हम चाहते हें कि हमारे लोग भी खुश रहें। उनके जीवन में भी तरह-तरह के सुंदर रंग हों। आप हमारी मदद कीजिए।

जादूगर भूल चुका था कि रंग कैसे बनाए जा सकते हैं। उसने अपना थैले का समान उलट दिया।

तरह-तरह के अजीबोगरीब सामान के साथ-साथ एक प्रिज्म भी नीचे गिरा। उत्सुकता में जादूगर ने जा प्रिज्म हाथ में उठा लिया और खिड़की के पास जाकर देखने लगा।

जैसे ही प्रिज्म पर रोशनी की किरण पड़ी, उसके दूसरे छोर से एक इद्रधनुत महल की खिड़की से निकलकर आसमान तक फैल गया।

फिर एक-एक करके सात रंग नीचे उतरने लगे।

सबसे पहले लाल रंग नीचे गिरा। देखते ही देखते खेतों में टमाटर, सेब, सड़कों पर पोस्ट-बॉक्स, आग बुझाने वाली गाड़ी, सब लाल रंग के हो गए।

फिर उतरा नारंगी रंग, फिर पीला, फिर हरा, फिर नीला, फिर गहरा नीला और अंत में बैंगनी।

सारी धरती सात सुंदर रंगों में रंग गई। राजा-रानी बहुत खुश थे। उन्होंने जादूगर को धन्यवाद दिया और बहुत से उपहार दिए।

इंद्रधनुष के ये रंग समुद्र के पानी के अंदर तक चले गए। इसीलिए समुद्र के अंदर की दुनिया भी बहुत सुंदर और रंग-बिरंगी हो गई।

और फिर रंगहीन द्वीप का नाम बदलकर रंगीला द्वीप रख दिया गया। रंगीला द्वीप एक ऐसा द्वीप है, जिस पर आज भी ढेरों रंग हैं खुशियाँ हैं और वहाँ के लोग जी भरकर हँसते हैं।

जितना ज्यादा वे हँसते हैं, धरती उतनी ही सुंदर होती जाती हेै।

ऐसे बना मनुष्य का पहला घर

यह उस समय की कहानी है जब मनुष्य को घर बनाना नहीं आता था।

उसे बाहर खुले आकाश के नीचे सोना पड़ता था।

ठंड हो, बारिश हो या ज्यादा गर्मी हो, हर मौसम में बहुत मुश्किलें होती थीं उसे।

तब उसने अपना अलग घर बनाने की बात सोची। उसने खरगोशों को मिट्टी के ढेर के अंदर घर बनाते हुए देखा था।

उसने अपने लिए भी ऐसा ही घर बनाया। लेकिन मुश्किल यह थी कि इस घर की छत बार-बार उसके सिर पर गिर पड़ती थी। मिट॒टी का यह घर मजबूत नहीं था।

तब उसने एक ऐसा घर बनाने का तरीका ढूँढ़ा, जिसकी छत बार-बार न गिरे।

इसीलिए उसने एक पेड की शाखाओं को थोड़ा-थोड़ा काटकर, पूरे पेड़ को एक छतरी का आकार दिया।

उस पेड़ की छतरी के नीचे वह आराम से सो सकता था।

लेकिन इस घर में भी वह ठंड, बारिश और गर्मी से पूरी तरह नहीं बच पाता था।

उसे एक ऐसा घर चाहिए था, जो कि मजबूत भी हो और चारों ओर से बंद भी हो।

लेकिन ऐसा घर बनाना तो उसे आता ही नहीं था।

एक दिन वह जंगल के पास वाली नदी के किनारे पर घूम रहा था।

वहाँ कुछ गीली मिट्टी थी। मिट्टी में कुछ छोटे-बडे पत्थर पडे हुए थे। उसे औजार बनाने के लिए पत्थरों की जरूरत थी।

उसने गीली मिट्टी में पड़े हुए एक पत्थर को उठाना चाहा।

लेकिन वह नहीं उठा सका, क्योंकि पत्थर गीली मिट्टी में आधा घँसा हुआ था और चिपक गया था। पत्थर को मिट्टी से निकालने के लिए मनुष्य को काफी मेहनत करनी पड़ी।

लेकिन इस घटना से उसने एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात सीख ली। उसने सोचा, “यदि पत्थर को मिट्टी में डाल दिया जाए तो वह मजबूती से चिपक जाता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि यदि दो पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर चिपकाना हो तो बीच में गीली मिट्टी लगा देनी चाहिए।

मनुष्य ने यह प्रयोग करके देखा और उसका प्रयोग सफल भी हुआ।

बस, फिर तो उसने एक के ऊपर एक पत्थर लगाए और ऊँची दीवार बना दी। इस तरह से उसने दीवारें बनाना सीखा।

फिर उसने तीन ओर दीवारें बनाकर एक कमरा बनाया और छत बनाने के लिए पेड की टहनियाँ और पत्ते डाल दिए।

और इस तरह बनकर तैयार हुआ मनुष्य का पहला घर।

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