हेलो, आज की इस पोस्ट में हम आपके साथ फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियाँ शेयर करने जा रहे है। आप इन कहानियाँ को पूरा पढ़े। आपको यह कहानियाँ बहुत पसंद आएगी। 

Phanishwar Nath Renu

Phanishwar Nath Renu Stories in Hindi List

कस्बे की लड़की

प्राणों में घुले हुए रंग

विघटन के क्षण

अक्ल और भैंस

पार्टी का भूत

रखवाला - फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी कहानियाँ

बीमारों की दुनिया में

रेखाएँ : वृत्तचक्र (एक)

वंडरफुल स्ट॒डियो

इतिहास, मजहब और आदमी

कस्बे की लड़की

“लल्लन काका! दादाजी कह गए हैं कि लल्लन काका से कहना कि ऱरोज फुआ के साथ... !”

लल्लन काका अर्थात्‌ प्रियव्रत ने अपनी भतीजी बन्दना उर्फ बून्दी को मद्धिम आवाज में डॉट बताई, “जा-जा! मालूम है जो कह गए हैं।”

बून्दी अप्रतिभ हुई किन्तु उसके होंठों पर वंकिम-दुष्टता अंकित रही और लल्लन काका की मद्धिम झिड़की की कोई परवाह किए बगैर अब दादाजी की आज्ञा सुनाने लगी, “दादीजी कहती हैं कि सरोज फुआ नहा रही हैं।

लल्लन काका से कहो, जल्दी तैयार होकर नाश्ता कर लें। सरोज फुआ को बहुत जगह जाना है। और रिक्शा वाला...।!

“जा-जा !” प्रेयव्रत पूर्ववत्‌ पाइप पीता रहा। बून्दी आँगन में लौटी तो उसने मुँह में पेन्सिल डालकर लललन काका की नकल करते हुए सुना दिया, दादी को-“जा-जा!”

दादी अचार-पापड़ के मर्तमानों को धूप में डाल रही थी। बड़बड़ाई, “सभी कामचोर हैं।” बून्दी ने सविनय-सदुलार-निवेदन के सुर मैं कहा, “दादी-ई-ई! एक हरे मिर्च का अनचा-र!”

“जा-जा, बड़ी पतली जीभ है तेरी।” बून्दी का मुँह लटक गया। दादी ने मर्तमान से एक हरी मिर्च निकालकर देते हुए कहा, “जा भगेलू से कह, सामनेवाली दुकान से...।” बून्दी दाँत से मिर्च को काटती सिसियाई, “सि-ई-ई! सारी सुबह मैं इधर-उधर करती रहूँगी तो स्कूल कब जाऊँगी? जिधर जाओ, उधर ही बल जा-जा!! सरोज फुआ बाथरूम से बाहर ही नहीं होतीं। मैं कब नहाऊँगी, कब खाऊँगी...यह लो, यह गई गाड़ी स्कूल की!”

प्रियव्रत सुबह से ही तनिक झुँझलाया हुआ है। रात-जैसी गर्मी हजारीबाग में कभी नहीं पड़ी। नींद नहीं आई रात-भर। हालाँकि परिवार के और लोग हल्की ऊनी चादर डालकर सोए थे। प्रियव्रत की माँ बारहों महीने रजाई ओढ़ती है। हल्की-फुल्की रजाई गर्मियों में और भारी सर्दियों में।

और उनींदी रात की प्रतिक्रिया दूसरे दिन सुबह बाथरूम से ही शुरू होती है। दाढ़ी कई स्थान पर कट गई है। कनपटी के पास

मीठा-मीठा दर्द है। वह सुन चुका है। बाबूजी का हुक्म, “लल्लन से कहना सरोज को जहाँ-जहाँ जाना है, ले जाए। बेचारी अकेली कहाँ-कहाँ जाएगी?” हूँह!

सरोजदी देहात से अकेली पन्द्रह-पन्द्रह स्टेशन रेलयात्रा करके यहाँ सकुशल आ सकती है तो शहर में ही कौन दिन-दहाड़े डाके पड़ते हैं कि सरोजदी के साथ एक सशस्त्र अर्दली जाए ?-पुरुष माने सशस्त्र!...और सरोजदी का रूप भी इतना मारात्मक नहीं!

प्रियव्रत सुबह से ही सरोजदी के सम्बन्ध में सोच रहा है। सरोजदी! बाबूजी के एक मुफसिनल के मुवैक्किल मित्र की बेटी!

एकदम देहातिन नहीं कह सकते सरोजदी को। मैट्रिक पास करके गाँव के स्कूल में पढ़ाती हैं। स्कूल के काम से ही आई हैं। इसके पहले भी बहुत बार आई हैं। मिडिल की परीक्षा देने आई थीं। सरोजदी के बाबूजी भी साथ आए थे।

मैट्रिक का इम्तहान देने आईं, अकेली। अकेली नहीं, दूर के एक चाचा पहुँचा गए थे। सरोजदी के पिता की मृत्यु उसी साल हुई थी। लेकिन सरोजदी के पिता ही क्‍यों, सरोजदी भी जब आईं, कभी खाली हाथ नहीं आईं। घी, शहद, महीन चावल, दही-पपीते-सब विशुद्ध! जब से देख रहा है प्रियव्रत, सरोजदी ऐसी ही हैं। सदा से...।

प्रियव्रत सोच रहा है, कैसा अन्याय है? एक ओर सरोजदी हैं जो इतनी चीजें, इतना प्यार से लेकर आती हैं और दूसरे ही दिन भाईजी और भाभीजी का मुँह लटक जाता है। तीसरे दिन माँ भी उखड़ी हुई बातें करने लगती हैं उनसे।

भाभी चुपके-चुपके मुँह बनाकर कहेंगी, “इतने ज़ोर से खुर्राटा लेती है सरोज। घंटों बाथरूम बन्द रखती है, सरोज...आज “उनके” प्राइवेट रूम में चली गई सरोज। वे अपने दोस्तों के साथ ड्रिंक कर रहे थे और यह भैयाजी-भैयाजी कहकर क्या-क्या रोने-गाने लगी।” भाभी बहुत स्वार्थी हैं। लेकिन, दूसरी शोर भाभी की आध दर्जन बहनें या भाईजी के साले की सहेलियाँ खाली हाथ आती हैं। बिना मक्खन के रोटी नहीं खाती हैं और भाईजी की गाड़ी का इंजन हमेशा गर्म रहता है उन दिनों-बोकरो, कोनार, तिलैया, रामगढ़, राँची...।

सरोजदी ने कभी नहीं कहा कि बिना कार के मैं एक कदम नहीं चल सकती। क्या सरोजदी के मन में भाईजी की गाड़ी पर चढ़ने की वासना नहीं हुई होगी? कौन जाने... !

सरोजदी साँवली नहीं, काली हैं। कद मँझोला है। मोटी नहीं, देह दुहरी है। सम्भवतः किसी ग्लैंड की गड़बड़ी के कारण उनकी बोली में तनिक गूँगेपन का सुर मिला हुआ है। चलते समय हर डग पर अस्वाभाविक ढंग से जोर देती हैं और प्रसन्‍न होकर हँसते समय मुँह से लार टपक पड़ती है, यदा-कदा। होंठ सदा भीगे रहते हैं।

प्रियव्रत को याद है, मैट्रिक की परीक्षा देने आई थीं सरोजदी। बाबूजी का मुहर्रिर इब्राहिम रोज टमटम पर साथ जाता था। फिर, चार बजे जाकर ले आता था।

उस बार भाभी ने झूठ-मूठ सरोजदी पर आरोप लगाया था। बून्दी के गले की सोने की 'सिकरी'” भाभी के बक्स से ही निकली थी!

सरोजदी बाथरूम से बाहर आ गईं, नहा-धोकर।...'“'लल्लन बाबू!” प्रियव्रत ने अब अपने से सीधा सवाल किया, “क्यों लल्लन बाबू, भाईजी की किसी साली या भाईजी के साले की किसी साली के साथ एक रिक्शे पर, शहर घूमने से तुमको कभी कोई ऐतराज होता ?”

अन्दर आँगन में बून्दी भाभी से कुछ कह रही है, “क्या भगेलू जाएगा सरोजदी के साथ?”

भाभी कहती हैं, “तो कया हुआ? रिक्शा के पायदान पर बैठेगा भगेलू।”

बाबूजी बाहर से आ गए।

साथ में हैं एक दूसरे वृद्ध-देवधर के अंजनी बाबू वकील, बाबूजी अब नियमानुसार अपने पुत्रों की निंदा से शुरू करेंगे, और हर बेटे की तारीफ़ तनिक तफशील से अन्त में करेंगे, “हाँ, बड़ा देवव्रत-मन्‍नन-इंटरनेशनल टुबाकों में है। बोला, सरकारी नौकरी नहीं करेंगे, चाहे सरकार अपनी हो या बिरानी,नहीं करोगे तो मत करो।

साली, सरकारी नौकरी में धरा ही क्या है, अब! मँझला लल्लन-प्रियव्रत-एम.ए. करके तीन साल से बैठा है। वह भी सरकारी नौकरी नहीं करेगा। हाँ, हाँ आपने ठीक पहचाना है, वही प्रियव्रत! कविता ही लिखता है और सबसे छोटा दहन-सत्यव्रत भागकर नेवी में चला गया। चिट्ठी आई तो मैंने भी कहा, 'डूबने दो कम्बख्त को। नेवी में जाए या एयरफोर्स में लिख दिया, 'मेरा लड़का सबकी राजी-खुशी से नेवी में भर्ती हो रहा है और क्या करें? इस साल ट्रेनिंग खत्म करके अफसर हो जाएगा।...भगेलू! कहाँ जा रहा है भगेलू? लल्लन कहाँ गया ?

सरोज के साथ भगेलू क्यों जाएगा? मैं जाऊँगा।”

प्रियव्रत धड़फड़ाकर उठा-अब एक सप्ताह घर की शान्ति गई। दिन-रात बड़बड़ाते रहेंगे।

ब्लडप्रेशर बढ़ेगा। डॉक्टर विनय आएँगे, फिर दोनों मिलकर घर-भर के लोगों की दुर्गत कर डालेंगे। अन्दर जाकर बोला, “किसने कहा कि मैं नहीं जा रहा

कमरे में कपड़े बदलती हुई सरोज ने कहा, “लल्लन को छुट्टी नहीं है तो भगेलू ही चले न!”

माँ बोली, “नहीं सरोज, लल्लन तैयार है।” $

सरोज कमरे से बाहर आई। चप्पलों को बेतरतीबी से खिसकाती हुई। भीगे होंठों पर मूकजनोचित मुस्कुराहट छाई हुई...गिलगिलाती मुस्कुराहट!

रिक्शावाले की दृष्टि और मन्द मुस्कुराहट को परखता है प्रियत्रत। वह रिक्शे में सिकुड़कर, एक किनारे जा बैठा। सरोज पास आकर बैठी। सरोजदी कोई सस्ता किन्तु चालू पाउडर लगाती है, शायद। केश में कोई आयुर्वेदिक तेल डालती है क्या? साड़ी

तो हैंडलूम की है। एक बार प्रियव्रत की भाभी कह रही थी-सरोज का ब्लाउज सर्दी के मौसम में भी बगल से भीग जाता है। अभी तो भीगा हुआ नहीं है? नहीं, भाभी अधिक नहीं, तनिक निष्ठुर भी है।

रिक्शाचालक ने पहला प्रश्न किया, “मेमसाहब राँची से आई हैं क्या?” प्रियव्रत उसे डॉटना चाहता शा, लेकिन इसके पहले ही सरोज बोल पड़ी, “नहीं भैया! मैं हँसुआ से आई हूँ। शिक्षक-संघ का दफ्तर देखा है?”

“कीचक संघ तो... ॥”

“मुझे मालूम है।” प्रियव्रत ने कहा, “चलो, मदनबाड़ी रोड।”

प्रियव्रत का घर शहर से तीन मील दूर है। तीन पहाड़ी के पास, इस गाँव में प्रियव्रत के पिता ने जब घर बनवाया था तो लोग हँसते थे-वकील साहब जंगल में बस रहे हैं। आज, इस गाँव में बसने के लिए शहर के लोग, जमीन की डाक बोलकर भी जमीन नहीं पा रहे हैं।

सरोज अपनी देह को भरसक सकुंचित करती हुई बोली, “लल्लनजी! ठीक से बैठो, आराम से... ”

गाड़ी कुछ दूर आगे बढ़ी तो सरोज ने यहाँ की सड़कों पर अपना मन्तव्य प्रकट किया, “हजारीबाग की सड़कों से मुझे बड़ी चिढ़ होती है। दस कदम पर चढ़ाई और दस कदम पर उतराई। हजारीबाग की सब चीजें मुझे अच्छी लगती हैं, इन सड़कों को छोड़कर।”

प्रियव्रत ने बात को मोड़ने के लिए पूछा, “कहाँ-कहाँ जाना है आपको?”

सरोज ने कहा, “पहले शिक्षक-संघ के दफ्तर में, फिर शिवयोगी बाबू के यहाँ होते हुए स्कूल इन्स्पेक्टर साहब के डेरे पर।”

प्रियव्रत ने पूछा, “यह शिवयोगी बाबू कौन हैं?”

प्रियव्रत ने लक्ष्य किया, सरोजदी हर बार बोलने के पहले एक अस्फुट हँसी हँसती हैं।

“हँहैं! शिवयोगी बाबू हैं हमारे हँसुआ रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर के दामाद। हर बार स्टेशन मास्टर साहब मेरे हाथ से कुछ-न-कुछ भेजते हैं। इस बार नाती के लिए “जन्तर” बनवाकर भेजा है।”

सामने चढ़ाई थी। यहाँ सभी रिक्शावाले रिक्शे से उतरकर गाड़ी खींचते हैं। लेकिन इस रिक्शावाले ने दोनों को उतर जाने के लिए कहा, “बिना उतरे ई-दु-दु मन, ढाई-ढाई मन का लहास?”

प्रियव्रत को अपना गुस्सा उतारने का मौका मिला पैसा चुकाते हुए बोला, * तुम जा सकते हो। लेकिन फिर कभी कोर्रागॉव की ओर कोई सवारी लेकर मत आना। समझे ?”

दोनों उतर पड़े। अभी तुरत दूसरा रिक्शा मिल जाएगा।

मंजरे हुए आम और जामुन के युग्म-पेड़ के नीचे वे जा खड़े हुए। यहाँ के लोग कहते हैं-जुड़मा गाद्द! झड़ती हुई मंजरियाँ के कई छींटे, जामुन के कुछ फूल सरोज के सिर पर झरें। कवि प्रियव्रत को पिछले साल रेडियो से सुने हुए एक लोकगीत की याद आई-जिसकी पंक्तियाँ याद नहीं, अर्थ है-“ओ गौरी! तू आज रात फिर किसी कारण-मंजरे हुए आम के तले जाकर खड़ी हुई थी-निश्चय ही। तेरे बालों के लट जटा गए हैं। मंजरी का मधु चू-चूकर तेरे सिर पर गिरा है। औ गोरी! तू आज रात फिर किसी महुए के तले जाकर खड़ी थी-तैरे बालों से महुए के दारू की बास आती है। मेरी आँखें झपक रही हैं-मतिया गई हैं-तेरा जुड़ा कैसे बाँधूँ?””

सरोज बोली, “हैँह, लल्लनजी! मैंने तुमको बेकार कष्ट दिया।”

रॉँची रोड पर एक बग्धीगाड़ी दिखाई पड़ी। प्रियव्रत ने पूछा, “धोड़ागाड़ी पर चढ़िएगा।” सरोज के कंठ से सिर्फ “हँह” निकला। प्रियत्रत ने बग्धीवाले को आवाज दी।

घोर श्यामवर्ण, मैँझोली, दुहरी सरोज सुफेद साड़ी और सुफेद ब्लाउज में सभी का ध्यान आकर्षित करती है। घड़ी की पट्टी भी सुफेद, चप्पल के फीतें भी। घोड़ागाड़ीवाले ने गौर से सरोज को ही देखा। प्रिय्रत को वह पहचानता है।

बग्घी पर आमने-सामने बैठने की जगह थी। किन्तु सरोज जिस तरह रिक्शे पर बैठी थी, उसी तरह प्रियव्रत से सटकर बैठी। इस तरह सटकर बैठने की कोई जरूरत नहीं थी। जगह काफी चौड़ी थी! सरोज बोली, “इस चढ़ाई-उतराई के समय मेरी जान निकल जाती है। लगता है, सब खाया-पिया निकल जाएगा। हँह!”

हर चढ़ाई-उतराई पर सरोज ने तमाशा किया। उतराई के समय प्रियत्रत की एक कलाई जोर से पकड़कर आँख मँँदे हँसती-खिलखिलाती रही। प्रियव्रत को लाज आई।

शिक्षक-संघ के दफ्तर में जिस अधिकारी से मिलना था, सरोज की उससे फाटक पर ही भेंट हो गई। काम भी हो गया-अगली मीटिंग के बारे में पूछना था। अधिकारी महोदय बार-बार प्रियव्रत की ओर देखते ही रहे। फिर बोले, “आप प्रियव्रतजी हैं न?” जी हाँ सुनकर भी अधिकारी महोदय का कौतूहल कम नहीं हुआ, शायद

“चलो सरोजदी ! शिक्षक-संघवाला काम तो शिक्षक-संघ के बाहर ही हो गया।” गाड़ी पर जान-बूझकर दूसरी ओर बैठते हुए प्रियव्रत बोला और सरोज पहले तो सामनेवाली गद्दी पर बैठी। फिर उठकर प्रियत्रत के पास जाकर, उससे सटकर बैठी। सरोज ने चलती हुई गाड़ी में प्रियव्रत से दबी हुई आवाज में कहा, “लल्लनजी, तुम साथ थे, इसलिए जल्दी छुटूटी मिल गई। नहीं तो, यह रामनिहोरा प्रसाद मुझे बेकार बैठाकर तरह-तरह की बातें करता। शादी-ब्याह की बात पूछनेवाला यह कौन

होता है, भला? बोलो तो? और बातें करते समय बातें करो-यह रह-रहकर पीठ पर थप्पड़ मारने की और बाल पकड़कर खींचने की जैसी भद्दी आदत? अपने काकाजी भी तो बाबूजी के दोस्त थे। कभी ऐसा नहीं करंते। बोलो तो लल्लनजी, क्या यह ठीक है?”

प्रियव्रत को हँसी आई। वह पूछना चाहता था, क्‍यों नहीं ठीक है सरोजदी? लेकिन वह कुछ बोला नहीं। हँसता रहा। सरोज कुछ क्षणं बाहर की ओर देखती रही। फिर, दबी आवाज में ही बोली, “अच्छु लललनजी, तुम नौकरी करोगे तो तुम भी गाड़ी रखोगे न?”

“यदि गाड़ी रखने लायक नौकरी मिली... |”

“हँँह, तुमको भला गाड़ी रखने लायकुं/नौकरी नहीं मिलेगी ?”

प्रियव्रत चौंका,...तो सरोजदी का मुखड़ा भी कभी-कभी सुन्दर दीखता है? सरोजदी जब भाव-शून्य दृष्टि से उसको देखती है, सुन्दर लगती है। उसने पूछा, “क्यों सरोजदी?”।

सरोजदी इस बार मुस्कुराई नहीं। और भी दबीं आवाज़ में बोली, “तुम सुन्दर हो। जिसमें रूप और गुण दोनों हों, उसी को ऊँची नौंकरी मिलती है।”

प्रियव्रत का चेहरा लाल हो गया। उसने कहा, “यह किसने कहा है तुमसे?”

“रामभाई ने। रामभाई कंहते थे, व्यक्तित्व के बिना विद्धत्ता कुछ नहीं। यदि व्यक्तित्व होता तो रामभाई भी...।”

हजारीबाग चौक पर हमेशा. की तरह भीड़ थी। गाड़ीवान ने पूछा, “भैयाजी! मायाजी बोल रही थीं, चौक पर कुछ खरीदना है।” सरोज भूल गई थी कि उसे कुछ खरीदना है। स्कूल की लड़कियों ने कापी-किताब-पेन्सिल लाने के लिए पैसे दिए हैं। सरोज झोले से डायरी निकालकर पढ़ने लगी-यशोदा-तीन कापी रूल की हुई, दो बगैर रूल। जगमती-भारतवर्ष का भूगोल, साहित्यदर्पण, छोटी नीलू-एक दर्जन जलछवि!...

सरोज हमेशा जिस दुकान से सामान खरीदती है उसी दुकान में जाएगी। पास ही प्रियव्रत के मित्र, हिमांशु की दुकान थी। उसने कहा भी, “सरोजदी, इस दुकान में... ”” लेकिन सरोज ने उधर नजर उठाकर देखा भी नहीं।

दुकानदार-छोकरा राखालचन्द्र उर्फ याबला ने सरोज को देखकर एक विचित्र मुखमुद्रा बनाई और अभद्वतापूर्वक आँख नचाकर पूछा, “कहिए, कहिए। बहोत दिन बाद...।” प्रियव्रत पर दृष्टि पड़ते ही याबलाराम अवाक्‌ हो गया। तुरन्त भद्र हो गया उसका चेहरा। सरोज डायरी खोलकर धीमी आवाज में पढ़ती गई और प्रियब्रत जोर-जोर से दुहराता गया।

दुकान से बाहर निकलकर सरोज बोली, “इस बार तुम साथ थे, इसलिए उसने मुझे मीठी गोलियाँ नहीं दीं। नहीं तो जबर्दस्ती दर्जनों मीठी गोलियाँ झोले में डाल देता और जिद करके एक गोली दुकान में ही बैठकर चूसने को कहता। चाहे एक चीज लो या दस, एक घंटा अटकावेगा यह लड़का।. -बेईमान नहीं, लेकिन!”

सामने, “विवेकानन्द मिष्ठान भंडार' में बैठकर चाय पीते हुए लोगों ने आँखें फाड़-फाड़कर सरोज और प्रियव्रत की ओर देखना शुरू किया। सरोज बोली, “विवेकानन्द का कालोजाम नामी है। है न? हँहै!” सरोज के पैर लड़खड़ाए। प्रियव्रत ने पूछा, “कालाजाम खाओगी सरोजदी ?”

“हँह! तुम नहीं खाओगे?”

विवेकानन्द मिष्ठान भंडार में कई मिनटों तक “कालोजाम, कालोजाम' का गुंजन होता रहा! डी.वी.सी. के बंगाली कर्मचारियों के दल में कानाफूसी शुरू हुई, “कालाजामेर संगे चमचम?” एक ने ढाका की बोली में कहा, “ 'एबार द्याशे (अर्थात्‌ देशे) एड्डा काईनी ब्यार हुदद्वे-नामडा काकहोंसिनी!...कामहंसिनी! कालोजाम! ९”

प्रियव्रत ने सब समझा। अच्छा हुआ, सरोजदी ने कुछ नहीं समझा। स्वाद ले-लेकर कालाजाम का रस जब प्लेट में जीभ लगाकर चाटने लगी तो प्रियव्रत ने पूछा, “और मँगाऊँ कालाजाम ?”

“हँह! पेट फट जाएगा जो।”

सरोज के इस जवाब से प्रियव्रत को फिर लाज आई।

किन्तु, इस बार गाड़ी में वह प्रियव्रत के सामने बैठी, “चलो बटम बाजार।”

प्रियव्रत ने देखा, सरोजदी डकार लेते समय और भी असुन्दर हो जाती है, उसके गीले होंठ और भी गिलगिले हो जाते हैं। डकार लेने के बाद सरोज ने बताया, “रामभाई को भी कालाजाम पसन्द है बहुत।”

गाड़ी बटम बाजार की ओर मुड़ी।...फिर उतराई? सरोज उठ खड़ी हुई और टलमलाकर प्रियब्रत पर गिर पड़ी। “तुम भी गाड़ी से बाहर गिर पड़ते छिटककर... हेह।।!

हँह हठात्‌ सरोज ने फिर मद्धिम आवाज रे पूछा, “अच्छा लल्लनजी! मैं बहुत काली हूँ।” याने मुझसे भी ज्यादा काली होती हैं या नहीं...।

प्रियव्रत ने समझा, पूरे प्रश्न भी नहीं पूछ सकी सरोजदी। क्योंकि प्रियब्रत का चेहरा अचरज और लाज से अजीब-सा हो गया था। सरोज ने फिर पूछा, “मैं बहुत

हूँ? हँह!” नर पा को तुरन्त जवाब सूझा, “मोटी नहीं।...देहात में स्वास्थ्य जरा अच्छा है।"”

अर बोली, “रामभाई तो कहते हैं कि तुम्हारा तन काला है, पर मन काला नहीं-सादा है।”

प्रियव्र॒त ने इस बार सरोज के रामभाई पर विशेष ध्यान दिया...रामभाई ने कहा है, व्यक्तित्व के बिना...रामभाई को कालाजाम प्रिय है...रामभाई कहते हैं कि तुम्हारा तन...। प्रियव्रत ने रामभाई के बारे में कुछ नहीं पूछा, किन्तु...

शिवयोगी बाबू के घर पहली बार नहीं आई है सरोज। लेकिन कभी तो इतनी खातिरदारी नहीं हुई ?...हैंह ! सारे परिवार के लोगों ने मिलकर दोपहर के भोजन और विश्राम के लिए हार्दिक आग्रह किया तो सरोज प्रियत्रत का मुँह देखकर कुछ देर तक सिर्फ हँह-हैंह करती, हँसती रही। प्रियव्रत ने बग्घीवाले को विदा किया। साढ़े तीन बजे चाय पिलाकर, शिवयोगी बाबू के परिवारवालों ने छुट्टी दी। स्कूल इन्स्पेक्टर से प्रियव्रत के बड़े भाई साहब की मित्रता है। इसलिए तय हुआ कि

वहाँ का काम भाईजी करवा देंगे। सरोज मान गई। प्रियव्रत ने पूछा, “और कोई काम बाकी तो नहीं रहा?” सरोज उदास हो गई अचानक! बोली, “नहीं लल्लनजी।” “तो अब घर चलें?” “चलो |”

पुलिस-ट्रेनिंग-कॉलेज के पास एक सड़क, उत्तर की ओर केनाड़ी, पहाड़ी नेशनल पार्क जाने के लिए निकली है। सरोज ने साइन-बोर्ड पढ़कर दुहराया, “नेशनल पार्क जाने का रास्ता।...नेशनल! हँह!! नेशनल पार्क में क्या है लललनजी?” प्रियत्रत के मुँह से नेशनल पार्क का वर्णन सुनकर सरोज उत्तेजित हो गई। फिर तुरत उदास होकर बोली, “नहीं, लल्लनजी! अब मैं ज्यादा परेशान नहीं करूँगी

तुमको। तुम्हारा दिन का सोना खराब किया मैंने।” प्रियव्रत ने रिक्शावाले से नेशनल पार्क चलने को कहा। सरोज बोली, “तुम्हारी इच्छा नहीं तो घर लौट चलो लल्लनजी!!

“मैं रोज जाता हूँ, इसी समय।...वहाँ मेरी अपनी जगह है, सरोजदी।” प्रियव्रत हँसकर बोला।

मोड़ पर सरोज ने फिर डकार लिया। बहुत दूर तक उतराई है, कोना-कोठी के पास। रिक्शेवाले यहाँ पैडिल चलाना बन्द कर देते हैं। बहुत देर तक "फ्री व्हील' की करकराहट होती रहती है-“क्रिरि-रि- रि-रि-रि-रि... /” सरोज की सारी देह में मानो गुदगुदी लगा रही है यह किरकिरी... रि-रि-रि-रि। हँह! हँह!

केनाड़ी पहाड़ी करीब आती गई और सरोज अपने-आप हँसती रही। एक नील ., गाय भागी जा रही है। सरोज अचरज से मुँह बाकर देखने लगी। राल टपकी इस बार।...खरगोश फर्लागता हुआ झाड़ियों में गया-हँह! पहाड़ी नदी की पतली धारा पर

अस्तगामी सूर्य की रोशनी झिलमिलाई-हँह! पहाड़ी की चोटी के पास बादल का एक ढुकड़ा-हंह ! फूलों से लदा हुआ बन-तगर का पेड़ हँह! हँह

रिक्शा से उतरकर सरोज वोला, 'रामभाई भी कहते थे कि नेशनल पार्क एक चीज बनी है-देखने की”

वन में मोर बोला। सरोज डरी, “हाँ लल्लनजी, सुना है नेशनल पार्क में बाघ-सिंह भी हैं? हँह!”

प्रियव्रत हँसा, “लेकिन, सरोजदी! एक अजब वात है कि नेशनल पार्क में आकर कोई भी जंगली जानवर हिंस्र नहीं रहता और आदमी जानवर बन जाते हैं यहाँ आकर-इनक बहत प्रमाण मिल्रे हैं ?

“अच्छा!”

“अच्छा !”

पिकनिक करके लौटनेवाली मंडली का एक अशिष्ट लडका चिल्लाया, “भाग रे! बाइसन, वाइसूय...अरणा बैंस!”

मुखर्जी परिवार की सुन्दरियाँ, क॒मारियाँ “जमायबाव्‌ टाइप” के एक व्यक्ति के साथ आई ह आज! गाड़ी पर कलकत्ते का नम्बर है। सुन्दरियाँ बात-बात पर खिलाखला रही हैं। जमायबाबू निश्चय ही कोई गुदगुदानेवाली कहानी सुना रहे हैं...अमलतास की छाया में। एक सुन्दरी ने न जाने क्‍या देखा कि चीख पड़ी, “उ--ई-मूत!” बाकी लड़कियाँ खिलखिला पड़ीं। प्रियव्रत समझाता है चाखनव्राली का वह जानता है-अंजू-अंजना, सरोजदी को देखकर ही अंजना चीख घटी हे।

प्रियव्रत बोला, “पहाड़ की चोटी पर “टावर” है-वहाँ से सारा नेशनल पार्क दिखाई पड़ता हैं। चलोगी ऊपर ?”

नहीं लललनजी, मुझे डर लगता है।” “तो चलो, तुमको अपनी जगह दिखाऊँ।”

केनाड़ी पहाड़ी की तलहटी में बिखरा वनखंड केनाल और बड़ा-बड़ी चट॒टानों के इर्द-गिर्द पुट्स फूल की झाड़ियाँ। केनाल के किनारे कदम्ब के पेड़ पर-ठीक एक घंटे बाद छोटे-छोटे पंछियों का घनघोर कलरव शुरू होगा-घंटों होता रहगा! इन्हीं चटटानों

के उस पार प्रियव्रत रोज बैठता है। “यही है मेरी जगह। मैं इसी पत्थर पर बैठता हूँ, रोज #” *हूँह! बैठे-बैठे क्या करते हो?”

इस प्रश्न का कोई उत्तर देना आवश्यक नहीं समझा प्रियव्रत ने। “बैठो सरोजदी ! मैं तमको एक मजे का खेल दिखलाऊँँ

प्रियत्रत पुटुस की एक फूली डाली तोड़ लाया। फूल और पत्तों को नोंचकर एक छड़ी बनाई उसने, “इधर देखो सरोजदी!'

सरोज ने देखा-सामने की धरती पर लजौनी लता पसरी हुई है कुछ दूर तक। लगता है, एक गलीचा...हैंह...लज्यावती, लाजवन्ती, लजौनी, छुईमुई, “अरे-रे लल्लनजी ! यह क्या कर रहे हो? हँह!'!

प्रियव्रत रोज इसी तरह इन सजीव लताओं को छेड़ता है आकर। पुटुस की डाल की छड़ी से पहले एक क्रास बनाता है। छड़ी छुआता जाता है, पत्तियाँ मुँदती जाती हैं। अन्त में, अन्धाधुन्थ छड़ी चलाकर सबको सुला देता है।

सरोज प्रियव्रत के इस खिलवाड़ को अचरज से देखती रही। जब प्रिय्रत ने सभी पत्तियों को सुला दिया तो सरोज ने एक लम्बी साँस ली। बोली, ' “लल्लनजी, तुम ठीक कहते हो। यहाँ आकर आदमी जानवर हो जाता है, कभी-कभी हँह !”

प्रियव्रत हैसा। वह अपनी जगह पर जा बैठा। उत्तर आकाश का बादल क्रमशः काला होकर झुकता जा रहा है। हवा गुम है! भाभी ठीक ही कहती थीं। सरोज का ब्लाउज भीग गया है-बाँह के नीचे अर्द्धवृत्ताकार।

सरोज प्रियव्रत के पास आकर बैठ गई, “एक बात बताऊँ लल्लनजी ?”

बिजली चमकी। सरोज के गोल होंठों पर भी बिजली चमकी, मानो। प्रियव्रत अवाक्‌ होकर देखता रहा। सरोज को इस तरह लाज से गड़ते कभी नहीं देखा प्रियव्रत ने।

सरोज कुछ बोल रही थी, लेकिन राल टपक पड़ी तो चुप हो गई। फिर पुटुस के नन्‍हें फूलों को नाखून से खोंटकर दाँत से चबाने लगी।

क्षण-भर दोनों मौन रहे।

“किस सोच में पड़ गईं, सरोजदी?” प्रियव्रत ने सरोज की देह छूकर मानो जगाया, “सरोजदी, अब चलो लौटें। पानी बरसेगा।”

सरोज हँसी, “पानी बरसे-हैह-हम रुई नहीं हैं! लल्लनजी यह क्‍या कर रहे हो? लल्लन...पगला...बचपन की आदत...हँह...ठीक इसी तरह गोदी में सिर रखकर...इसी तरह मेरी छाती से सिर रगड़ते थे तुम...मैंने रामभाई से भी कहा है...हँह...हँह...तुम अभी भी पाँच साल के शिशु हो...लल्लनजी...तुम जानवर हो...जानवर...हैँह...हँह... कवि...एम.ए...सुन्दर-सुपुरुष तुम...इतने प्यारे...इतने प्यारे तुम...तुमको हँह...मैं जानवर नहीं बनने दूँगी...मैं ही जानवर हो गई हूँ...लल्लनजी मुझे माफ करो...इस कुरूपा बहन पर दया करो...! मुझे लजौनी लता की तरह मत रौंदो...!!”

प्रियव्रत ने ध्यानमग्ना नारीमूर्ति को फिर छूकर जगाया, “सरोजदी, तुम किस सोच में पड़ गई यहाँ आकर ?...चलो, घर चलें।”

सरोज मानो नींद से जगी, “हैँह !...नहीं लललनजी, यहाँ आकर आदमी कभी-कभी देवता भी हो जाता है! देवता भी... !”

प्रियव्रत को लगा, सरोजदी अचानक सर्वांग-सुन्दरी हो गई हैं। वह फिर अपनी जगह पर आ बैठा।

हवा का झोंका आया। मेघ बरसने लगा। दोनों दो चट्टानों पर बैठे, भीगते रहे। प्रियव्रत फिर उठा। सरोज के पास गया। हाथ पकड़कर उठाया, “चलो!”

दोनों भीगते हुए जंगल पार कर सड़क पर आए। सरोज बोली, “अब मेरा हाथ छोड़ दो, लल्लनजी !...अब मैं कभी हजारीबाग नहीं आऊँगी!...रामभाई मुझे नहीं आने देंगे, अब।”

सरोज सड़क पर लड़खड़ाई प्रियव्रत ने फिर हाथ पकड़ लिया। सरोज कुछ नहीं बोली। फिर दो बार हँह-हैंह करके चुप हो गई।

प्राणों में घुले हुए रंग

शैशव की सुनहली स्मृति, नील-गगन में उड़ते हुए रंग-बिरंगे पतंगों और मनमोहक रंगीन खिलौनों के आकर्षण को मैं जान-बूझकर छोड़े देता।

उन दिनों मैं स्वयं किन्ही की रंगीन आशाओं और कल्पनाओं का केन्द्र था!

मेडिकल कॉलेज में दाखिल होकर जिस दिन शरीर-विज्ञान का पहला 'लेक्चर' सुनकर लौटा था, मेरी आँखों के आगे सातों रंग नाचने लगे थे!

और जिस दिन एम.बी.बी.एस. की डिग्री मिल गई थी, 'सर्जिकल वार्ड” का हाउस-सर्जन बनकर अपने ड्यूटी-रूम में चार्ज लेने जा रहा था, फुदकती हुई मेरी परिचिता अनिंद्य सुन्दरी नर्स मिस चटर्जी ने आकर पहली बार सम्बोधित किया था-“हलो!

डॉक्टर... ! !” तो मैं अभ्यास और स्वभाववश उसकी एक मीठी चुटकी ले, ठठाकर हँसने की चेष्टा में भी गम्भीर हो गया था।

तब मैं एक लापरवाह स्टुडेंट नहीं रह गया था, डॉक्टर का उत्तरदायित्वपूर्ण स्थान जो मिल गया था!

मेरे होंठों पर गम्भीर मुस्क्राहट देखकर वह मेरे दिल की गहराई तक पहुँच गई थी और उसके बाद मैं उसके सदा प्रसन्‍न मुखमंडल पर कभी भी वह ताजगी, वह रंग नहीं देख पाया। धीरे-धीरे वह सूखती और काली पड़ती गई।

मैं सबकुछ याद कर, सबकुछ समझकर भी अपने को भुलाता रहा। हृदय-रोग से पीड़ित होकर वीमेन हास्पिटल के बेड नम्बर 2 पर पड़ी-पड़ी, नर्सो द्वारा बस एक बार” देख जाने का संवाद भेजती रही; किन्तु मैंने जाने की उत्सुकता भी कभी प्रकट नहीं की। मैं नहीं गया, किन्तु निराश होकर दम तोड़ने के समय उसके होंठों पर जो घृणा की रेखा खिंच आई होगी, उस घृणा-पूर्ण मुस्कुराहट की कल्पना मैं अवश्य कर लेता हूँ। जब-जब उसकी कल्पना करता हूँ, मेरे चेहरे पर आत्म-ग्लानि की काली तूलिका फिर जाती है।

“'हाउस-सर्जन” की अवधि समाप्त करके घर पहुँचते-पहुँचते मेरी पूज्य माता अपनी जीवन-यात्रा शेष कर चुकी थीं। उनके मुँह में दवा को कौन कहे, एक चुल्लू पानी भी नहीं टपका पाया था। पिताजी तो मुझे डेढ़ साल की उम्र में माँ की गोद में छोड़कर चल बसे थे। अगम, अगोचर भगवान को जिस श्रद्धा और भक्ति से पूजते हैं, उसी श्रद्धा और भक्ति से मैं उनकी पूजा किया करता था। किन्तु उनके लिए कभी गला फाड़कर रोया नहीं था। मातृहीन होने के बाद मुझे मालूम हुआ कि माँ के स्नेहांचल की ओट से सारी दुनिया रंगीन जान पड़ती थी और अब दूनिया का सारा रंग मरुभूमि की सफेदी में परिवर्तित हो गया है!

अपने गाँव को, अपने घर को छोड़ने की कल्पना करते ही मेरा हृदय फटने लगता था।

गाँव में ही जिन्दगी कट रही थी और मेरा 'मातृ-औषधालय' भी चल रहा था। मलेरिया और हैजे के समय में मरते हुए प्राणियों में से थोड़े व्यक्तियों को भी मौत के मुँह से बचाकर मैं अपनी शिक्षा को सफल समझता था।

गाँव के प्रतिष्ठित जमींदार श्री केदारनाथ ठाकुर मुझसे बहुत प्रसन्‍न रहते, उनकी गृहिणी मुझे अपने पुत्र घनश्याम से भी बढ़कर प्यार करने लगी थीं।

औषधालय का आकर्षण, जमींदार दम्पत्ति का स्नेह और गाँववालों का प्रेम पाकर मेरे हृदय के घाव भर रहे थे।

एक दिन, जमींदार दम्पत्ति ने मुझे बड़े लाड़-प्यार से खिला-पिलाकर, एकान्त कोठरी में अपने दिल की ख्वाहिश जाहिर की, तो मेरा सिर चक्कर खाकर रह गया। जमींदार साहब कह रहे थे कि मैं उनकी विधवा भाभी के एकमात्र प्यारे पुत्र भोलानाथ को जहर देकर मार डालूँ। उसे मामूली ज्वर हुआ है, यही मौका है। जमींदार साहब के छोटे भाई बद्रीनाथ ठाकुर थे, जिनकी मृत्यु का रहस्य भी उन्होंने कहा। 'माफ कीजिए, छी:-छीः मैं पागलों की तरह चीखकर उनकी कोठरी से भाग आया था। उस दिन से लगातार कई रातों को-रात-रात-भर जागकर-मैं जमींदार साहब के दुम॑जिले मकान की खिड़की के रंगीन काँचों को देखता रहा। उस कोठरी में रोशनी जलती रहती और मुझे लगता-“असहाय भोला की जिन्दगी का चिराग जल रहा है।' जिस दिन विधवा अपने प्यारे बीमार पुत्र को लेकर मायके चली गई, उस रात को मैं आनन्द-विभोर होकर सोया, किन्तु स्वप्न में भी उन रंगीन काँचों से छनकर आते हुए प्रकाश को देखता रहा।

जमींदार साहब मुझे और मेरे मातृ-औनषधालय को मिटाने के लिए कमर कस चुके थे।

गरीब रोगी भला कैसे औषधालय में आने की हिम्मत करते। रोगियों का आवागमन एकदम बन्द हो गया था। लेकिन रधिया की माँ जमींदार साहब की परवाह न करके, रधिया को सुई दिलवाने के लिए अवश्य पहुँच जाती थी। रधिया की माँ को मैं होश सँभालने के बाद से ही जानता था। इस रंगीन दुनिया में आकर, माँ की गोद के पहले उसी की गोद में मुझे आश्रय मिला था-वह सैकड़ों बार सुना चुकी थी। रधिया की माँ मेरे परिवार की महरी थी, पर मैं उसे चाची कहता था। कॉलेज में मुझे जब-जब घर की याद आती थी, आँखों के आगे दो मूर्तियाँ नाच जाती थीं, एक माँ की और दूसरी चाची (रधिया की माँ) की। वह दुखिया विधवा हो गई थी, उसकी एकमात्र पुत्री रधिया भी जवान होते-होते विधवा हो गई थी, लेकिन मेरे लिए तो वह वही चाची थी। रधिया को पिल्हा' हो गया था।

चिकित्सा से जब पूर्णरूपेण स्वस्थ हो गई, तो एक दिन उसकी माँ छाती पीटती हुई दौड़ी आई धी-''देखो लल्ला! ये सब पानी में आग लगा रहे हैं। बिरादरी और गाँवधालों की पंचायत बैठी थी, पंचायत ने रधिया पर दोषारोपण किया था कि तुम्हारे और रधिया की अनुचित सम्बन्ध के फलस्वरूप रधिया को गर्भ रह गया था और तुम सुई देकर गर्भपात...।" सुनकर मैं अवाक्‌ हो गया। रधिया मेरा भोजन बनाती थी, बर्तन-भौँडे मॉजती थीं, धर की चाबी भी उसी के पास रहती थी। मेरे खाने-पीने, सोने-बैठने की फिक्र मुझसे ज्यादा उसको रहती थी। मैं उसका भैया जो था। लेकिन...मैंने रधिया की माँ से गिड़गिड़ाकर कहा था-“चाची, तुम भी क्‍या इस बात को सच समझती हो?” वह रोती हुई बोली थी-“'तुम क्या कह रहे हो ललला! ऐसा भी भला हो सकता है? मैं सब जानती हूँ। बड़ी बहू (जमींदार साहब की भाभी) को मैंने मायक जाने के लिए कहा था, जमींदार साहब को यह बात मालूम हो गई। इसी से यह सब हुआ है।” वह रोती हुई चली गई थी।

दूसरे दिन प्रातःकाल बिछीने पर पड़े-पड़े ही मैंने सुना-रधिया की माँ रधिया को लेकर न जाने कहाँ भाग गई। पूर्व आकाश में ऊषा की लाली फैल रही थी और मुझे सारी दुनिया पीली दिखाई दे रही थी!

“मगहिया-डोम, एक खानाबदोश कौम | यह जाति औरत-मर्द-बच्चों के साथ जमात बाँधकर एक गाँव से दूसरे गाँव में डेरा डालती फिरती है। यह बड़ी निडर जाति होती है। मर्द दिन में जंगलों में जाकर गींदड़ों की बोली बोलकर उनका शिकार करते हैं और रात में चोरी; कभी-कभी दल बाँधकर डाका भी डालते हैं। औरतें और बच्चे गाँव में भीख माँगते हैं।

जवान औरतें बुरा पेशा भी करती हैं! बूढ़े और बुढ़ियाँ पड़ाव पर बैठकर गधों की रखवाली करती हैं।”

उपरदुक्ति रिपोर्ट मैंने एक मित्र-पुल्रित्त इस्पेक्टर की डायरी में पढ़ी थी।

फागुन का महीना। मगहिया डोमों की एक टुकड़ी ने गाँव से बाहर एक मैदान में डेरा डाला। दूसरे दिन गाँव में गन्दी घाघरीवाली औरतें भीख माँगती हुई दिखाई पड़ीं। भीख माँगंती हुई! कहना उपयुक्त नहीं होगा, क्योंकि वे जिस तरह भीख माँगती थीं, उसे “भीख माँगना' नहीं, खुराकीं वसूल करना कह सकते हैं। लोग चुपचाप भीख देते थे, उनसे बोलने में या तो लोग डरते थे अथवा अपनी हेठी समझते थे।

“ओय...य्‌...य्‌...य मोटकी मलकिनियाँ...याँ...याँ! बुढ़ारि में तोहे सिंगार से छुटूटी नाहिं मिलत...अ्‌...! हम्में भीख दय दो, चलि जायिं...।”

दूसरी उधर चिल्ला रही थी-““भीख देबा कि यहीं दरबज्जे पर पेशाब कय दीं?”

तीसरी किसी के घृणापूर्ण प्रश्न अथवा व्यंग्पपूर्ण कटाक्ष का उत्तर दे रही थी- बा हाँ, हाँ! गीदड़ खाती हैं हम सब तें.. हूँ खाले नन्हकी बहुरनियाँ...तों दिन-भर मैं ....

मैं अपनी कोठरी में लेटे-लेटे 'शोलोखोव” की 'क्वायट फ्लोज दी डान' पढ़ रहा था कि दरवाजे के पास आकर किसी ने हॉक लगाई-“अरी ओ...य्‌...य्‌...य मलकिनियाँ...याँ...।'

“अरे यहाँ कोई मालकिन-वालकिन नहीं है!” मैंने अन्दर से ही डॉटकर कहा। वह मेरे बरामदे पर-खुली किवाड़ी के सामने-आकर कुछ कहते-कहते रुक गई। मैंने देखा-बड़ी-बड़ी प्यारी आँखोंवाली, कानों में झुमके, गले में पीतल और काँसे के गहने पहने एक स्वस्थ किन्तु गन्दी, सुन्दर युवती, बगल में भीख की झोली लटकाए खड़ी है। मुझे गौर से देखकर नीची निगाह किए वह बोली-“मालकिन नहीं है त तैंहि दे दा!”

“क्या दे दूँ?”

“अरे मालिक के दरबार है, सोना-रूपा पहने लाग, रेशम मलमल ओड़े लाग, खाये लाग जूठा-कूठा...।” कहते वह मुस्कुराई।

मैं भी अपनी हँसी नहीं रोक सका। मैंने कहा-“यहाँ तो बोतलों में सिर्फ दवाइयाँ हैं। कहो तो दे दूँ?”

उसने एक बार मुझे गौर से देखा। मेरी आँखों में आँखें गड़ाती हुई वह बोली- “तूँ बैद हुआ?”

“हाँ।”

वह बैठते-बैठते स्वर को जरा कर्कश बनाकर बोली-“बज्जर गिरे तोरे दवायन पर, हम्में दवाय नाहिं चाहिय, एक मुट्ठी कुछ दे दो, चलि जायिं!”

मैं एकटक उसकी ओर देख रहा था। उसकी सूरत, उसकी आँखें और उसकी बोली कह रही थी कि वह सभ्य समाज की देन है। वह अपनी मीठी बोली को जबर्दस्ती कर्कश बनाने की चेष्टा करती, किन्तु असफल रहती थी। मुझे अपनी आँखें गड़ाकर देखते हुए बोली-“आँखि फारिके देखत का हुआ हम्में, बड़े-बड़े हाकिम-दरोगन के आँखि के लाली झारि देलि-हाँ!”

मैंने मनीबैग से एक अठननी निकालकर फेंक दी। अठन्नी को जमीन पर से उठाकर हँसती हुई बोली-“अरे रम्माँ! यह अठनियाँ बचे ना पायि, देखहि से मारिके जवनवा हमार काढ़ि लेयि, दारु पिये लाग। कुछो एक मुट्ठी खाये लाग दे दा राजा!”

उसने अन्तिम शब्दों में जो दर्द डाला, मुझे बड़ा स्वाभाविक-सा लगा। मैंने उठकर थोड़ा चावल ला दिया। जाते-जाते उसने मेरी ओर देखकर, किंचित मुस्कुराकर कहा- “अब त हम्म रोजो आब।”

वह चली गई तो मैं घंटों बैठकर उस असभ्य और बर्बर जाति की युवती के सम्बन्ध में सोचता रहा।

वह दूसरे दिन भी आई, तीसरे दिन भी आई और रोज आने लगी। एक दिन मैंने शा कहा-''तुम लोग इस तरह लोगों को डराकर, गालियाँ देकर क्यों भीख माँगती “तू काहे दवा में पानी मिला के लोगन के ठग्गत हुआ?” “दवा में पानी मिलाना ही पड़ता है, बिना पानी के दवा नहीं बनती।”

“त बेगर डॉटे-डपटे-गाली दिए कुछ नाहिं मिले-जान रखा।” वह हँस पड़ी थी। मैं स्वीकार करता हूँ, उसकी हंसी ने मुझे मोह लिया था। उसकी मुस्कुराहट में जादू था। एक दिन मैंने पूछ ही लिया-''तुम लोग जादू भी जानती हो?”

वह खिलखिलाकर हँस पड़ी थी-“अरे राजा! तोंहके कैसे मालूम?” “यों ही पूछता हूँ।'

वह हँसी रोकते हुए बोली थी-“हम्म नाहिं जानि जादू-बादू! वैसे बुढ़ियन सबके पाँछा देखत नॉहि, गाँव के सगरो जवनवा लागत रहत-ऐ बुढ़िया बताय दे, ऐ बुढ़िया बताय दे! चावल-दाल-आटा-तरकारी ढेर-के-ढेर पहुँचायि आवत।”

“सो क्‍यों?”

“मन उचाटनेवाला जादू सीखे लाग।” वह हँस रही थी।

मैंने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा-“क्या बुढ़िया सचमुच में वशीकरण मन्त्र जानती है?”

मुझे आश्चर्यित होते देखकर वह ठठाकर हँस पड़ी थी-“तेंहूँ सीख आवा बैद राजा!”

होली के दिन। गाँव-भर में हुरदंग मचा हुआ था। बूढ़े और बच्चों में भी जवानी की लहर आई हुई थी। अश्लील और श्लील गीतों के तराने मस्ती-भरी हवा के झकोरों पर हिलकोरे खाकर मेरी कोठरी में पहुँच जाते थे। मैं भी रह-रहकर होली के बहाने मर्सिया गुनगुना लेता था-“का के संग खेलूँ फाग!”

“अरे तूँ काहे ना खेलत होरी बैद राजा?” वह हठात्‌ आकर खड़ी हो गई थी। एक अलमुनियम की बड़ी कटोरी में मालपुए माँग लाई थी। एक मालपुए को वह दाँतों से काटकर खा रही थी।

मुझे आश्चर्य हुआ। होली के दिन, भले घर की औरतें बाहर पाँव रखने की हिम्मत नहीं करती हैं, और यह निडर होकर गाँव में फिर रही है!

उसने फिर पूछा-“तू काहे ना खेलत होरी ?” मेरे मुँह से मर्सिया की “भाषा-टीका' निकल पड़ी थी-“किसके साथ खेलूँ?'

मालपुए को दाँतों से काटते-काटते वह गम्भीर हो गई थी। मैंने फिर पूछा था- “तुम आज कैसे आईं?”

पुआ मांगे लाग !

“लोगों ने कुछ कहा नहीं?” अपने नथुने को गर्व से फुलाते हुए वह बोली थी- “केकर मजाल हुए कुछ कहे के। हूँ !”-वह बैठ गई थी।

“किसी ने रंग नहीं डाला?”

उसने खाते-खाते लापरवाही से कहा था-“तूँ डाल दा। डाल के देखा।”

“यदि डाल दूँ तो?”

“डाल दा!”

मैं 'रैड-इंक' दावात लेकर उठा, वह मुस्कुराकर घुटनों में ठुड्डी मिलाकर बोली थी-“पीठ पे डाल?”

मैंने उसकी पीठ पर दावात उडेल दी थी। उसकी गन्दी चोली पर लाल रोशनाई चमक उठी थी, उसकी मुस्कुराहट और भी रंगीन हो गई थी। वह मुस्कुराते हुए चली गई थी। मुझे याद है-मेरी आँखों में भी गुलाबी लाली दौड़ गई थी।

उसी दिन, पिछले पहर, वह दौड़ी आई थी। भर्राए स्वर में बोली थी-“बैद राजा! जरा चलके देख। हम्मर जवनवा के का हो गया! उलटी आर पेट चलत हुए! जड़ी-बूटी देत-देत हारि-कुछ काट नहीं मानत। चल बैद राजा!”

“क्या हुआ?” मैंने अचकचाकर पूछा था।

“हम्मर जवनवा के-उलटी आर पेट चलत हुए।” वह हॉफ रही थी।

“इमर्जेन्सी-बैग” लेकर मैं उसके साथ चल पड़ा, वह आगे-आगे भागी जा रही थी और देवी-देवताओं को रो-रोकर मनौतियाँ मना रही थी।

गाँव से बाहर मैदान में उन लोगों का पड़ाव था। जाकर देखा, एक बलिष्ठ नौजवान धरती पर पड़ा छटपंटा रहा है। मैंने परीक्षा की-“प्योर कालरा!

वह मेरे पास खड़ी थर-थर काँप रही थी। मैंने कहा-““इसे मेरे यहाँ ले चलो। वहीं सुई दूँगा।” सेलाइन देते ही ठीक हो जाएगा-मैंने मन-ही-मन कहा।

“सब त जात हैं?” वह करुण स्वर में बोली थी।

मैंने देखा-पड़ाव में खलबली मची हुई है। सब अपना डेरा तोड़ रहे हैं। गधों पर सामान बोझ रहे हैं।

“तो वे लोग तुम्हें छोड़कर चले जाएँगे?”

हूँ?”-वह रो पड़ी थी।

“तुम इसे ले चलो, अभी तुरन्त आराम आ जाएगा।”

पास में ही गधा चल रहा था, वह हाँक लाई। एक नौजवान ने आकर दूर से है, कुछ कहा। नौजवान ने एक बार मेरी ओर देखा और चला गया। गधे पर सामान लादकर उसने जोर लगाकर बीमार को उठाया और गधे पर बोझ दिया।

एक दुबले- पतले-काले बुड़ढे ने भी आकर कुछ कहा, पर वह मौन रही। रास्ते में मैंने पूछा-'“वह छोकड़ा क्या कह रहा था?”

“का कहि अरु! चल हम्मरे साथ, वहि के कौन भरोसा।” “और वह बुड्ढा...?”

“बुढ़वा एति के (बीमार नौजवान का) बाप रहल। कहत रहल चल हमरे साथ रानी बनाय के राखब।”

मैं उसे अपने बरामदे पर लिटाकर 'सेलाइन' देने जा ही रहा था कि जमींदार साहब, गाँव के कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों के साथ आ धमके। उन्होंने घृणा से मुँह विकृत करके दूर से ही कहा-“तुमने तो हद कर दिया। छीः छीः, जरा शर्म भी तो हो! एक भद्र परिवार की सन्‍्तान होकर इस नीच छोकड़ी पर मर रहे हो। तुम्हें अपनी इज्जत की परवाह न हो, लेकिन गाँववालों की इज्जत की भी तो फिक्र की होती! छीः छीः ...

“छी: छीः क्यों ?...इसे हैजा हो गया है, मैं डॉक्टर हूँ, दवा...” मेरी बात पूरी भी न होने पाई थी कि सबों ने एक साथ चिल्लाकर कहा-“क्या! हैजा?”

“हे भगवान! यह तो अपने साथ गाँव-भर को ले डूबेगा। देख रहे हो न!” जमींदार साहब ने गाँववालों की ओर मुड़कर कहा। फिर क्या था, मुझ पर गालियों की बीछारें होने लगीं। मैं हतूबुद्धि-सा हाथ में सीरिंज लेकर खड़ा रहा। उस दिन युवती ने परिस्थिति ताड़ ली। उसने मेरी ओर एक बार देखा, फिर जोर लगाकर उस अर्द्धमृत युवक को उठाकर गधे पर बोझ दिया। उठाने के समय युवक ने मुँह बाकर पानी माँगा। असहाय युवती की आँखें बरस पड़ीं। उसने मेरी ओर जाते-जाते एक बार देखा और गधे को हॉँकने लगी।

“छी: छी:, बेहया! निर्लज्ज!! गाँव-भर का सत्यानाश करेगा।” कहकर गाँव के प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने भी प्रस्थान किया। मैं हाथ में सीर्रिंज लेकर चुपचाप देखता रहा-गोधूलि की बेला, दूर-बहुत दूर-उसकी जमात रंगीन धूल उड़ाती जा रही थी। गधे पर अपने प्रियतम को लादे, घाँघरी के छोर से आँसू पोंछते हुए वह भी उधर ही जा रही थी। ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ रही थी, उसकी पीठ पर लाल रोशनाई का रंग और भी गहरा दिखलाई पड़ रहा था। धीरे-धीरे वह लाली आग की लपट-सी मेरी धमनियों में समा गई और उसी दिन से मैं आग से खेलने लगा।

कठोर कारावास से मुक्त होकर-सौभाग्यवश-सेनेटोरियम में जगह मिल गई है। दीवार पर “टेम्परेचर चार्ट" लटक रहा है। चार्ट पर एक लम्बी लाल रेखा खिंची हुई है, उसके ऊपर-नीचे चढ़ने और उतरनेवाली बुखार की गति रोशनाई से अंकित की गई है। मैं चार्ट को देखता रहता हूँ, उसे देखकर तरह-तरह की कल्पनाएँ किया करता है-काशी की गंगा के किनारे-किनारे छोटे-बड़े मन्दिरों के गुम्बज...और नीचे...गंगा के निर्मल जल में उनकी प्रतिछाया...!!

दूसरे चार्ट पर मेरी हिस्ट्री लिखी हुई है। डेट ऑफ डेथ (मृत्यु की तिथि) के सामने अभी जगह खाली है। उस स्थान को भरते हुए मैं नहीं देख सकूगा!

बुखार! खाँसी!! रक्त -वमन!! उफ्‌?

मुँह पर सफेद नकाब डालकर डॉक्टर आते हैं, नर्सें आती हैं। मेरी हालत देखकर उन लोगों के चेहरों पर जो रंग चढ़ता-उतरता है-उसको भी लक्ष्य करता हूँ।

कोयल की कूक, मस्ती-भरी फागुन की हवा और वार्ड कुली के रंग दे चुनरी हमारी...” गीत को सुनकर मैं अन्दाजा लगाता हूँ-'होली आ रही है!

आँखों के आगे, प्राणों में घुले हुए सभी रंग एक-एक करके दौड़ जाते हैं- कला .....नीला .....पिल... हर... लाल... सफेद !

विघटन के क्षण

रानीडिह की ऊँची जमीन पर - लाल माटीवाले खेत में-अक्षत-सिन्दूर बिखरे हुए हैं -

हजारों गौरैया-मैना सूरज की पहली किरण फूटने के पहले ही खेत के बीच में 'कचर-पचर' कर रही हैं।

बीती हुई रात के तीसरे पहर तक, जहाँ सारे रानीडिह गाँव की कुमारी-कन्याएँ कचर-पचर नृत्य-गीत-अभिनय कर चुकी हैं।

रात में शामा-चकेवा “भँसाया” गया है...प्रतिमा-विसर्जन!

श्यामा, चकवा, खंजन, बटेर, चाहा, पनकौआ, हाँस, बनहाँस, अधँगा, लालसर, पनकौड़ी, जलपरेवा से लेकर कीट-पतंगों - में भुनगा, भेम्हा, अँखफोड़वा, गन्धी, गोबरैला तक की मिट्टी की छोटी-छोटी नन्‍हीं-नन्‍हीं मूर्तियाँ गढ़ीं गई थीं, रँंगी गई थीं।

दो रात-तक उन्हें ढेलेवाले खेतों में चराया गया अर्थात्‌ उनकी पूजा की गई।

रात बिरनाबन (वृन्दावन) जले हैं-सैकड़ों। हजारों चुंगलों के पुतले! पुतलों की शिखाएँ जली हैं - घर-घर में तू झगड़ा लगावे, बाप-बेटा से रगड़ा करावे; सब दिन पानी में आगि लगावे, बिनु कारन सब दिन छुछुवावे-तोर टिकी” में आगि लगायब रे

चुगला...छुछुन्दरमहें...मुँहझौंसा ..चुगले...हाहाहाहा!

सैकड़ों लड़कियाँ की खिलखिलाहट! तालियाँ!

तारे झरें, पायल झनके। हुंस्नहिना के गुच्छों ने लम्बी साँस ली। रात भीग गई...।

धरती पर बिखरे अक्षत -सिन्दूर। दूबों पर बिखरे मोती के दाने।...छोटे-छोटे इन्द्रधनुषों के टुकड़े!

अचानकं, एक चील ने डैना फड़फड़ाया। सभी चिरैयाँ एक साथ भड़ककर उड़ीं। गौरैयों की विशाल टोली सरसों के खेत में जा बैठी।

बहुत दिनों के बाद-कोई पाँच बरस के बाद-धूमधाम से 'शामाचकेवा” पर्व मनाया है रानीडिह की कुमारियों ने।

एक चदरी-भर सरदी पड़ गई। अगहनी धान के खेतों में अब हलकी लाली दौड़ गई है अर्थात्‌ अब दानों में दूध सूख रहा है। आलू के पौधों में पत्तियाँ लग गई हैं। सुबह-सुबह गोभी की सिंचाई कर रहे हैं, सभी।

“बिजैयादि! तू इतना सबेरे “कोबी' जो पटाती हो, सो बेकार ही ना? तू तो अब पटना में रहेगी...।”

“चुप हरजाई!” गंगापुरवाली दादी ने चिढ़कर चुरमुनियाँ को झिड़की दी, ''दिन-भर बेबात की बात बकबक करती रहती है यह रत्तीभर की छौंडी।”

चुरमुनियाँ, रत्ती-भर की छोकरी चुप नहीं रही।

आँखें नचाकर, होंठों को बिदकाकर बोली, “हूँह! तोरे तो मजा है।

कोबी रोपकर पटा रही है बिजैयादि और टोकरी भर-भरके फूल बेचेगी तू।

और जब हिसाब पूछेगी पटना से आकर मलकिन-काकी तो...तो...ई ऊँगली तोड़ना, ऊ उँगली मोड़ना मगर भूलल हिसाब कभी न जोड़ना... हिहिहिहि... !'

दादी ने इस बार एक गन्दी गाली दी।

गाली सुनकर चुसमुनियाँ ने विजया की ओर देखा। विजया शुरू से ही मुस्कुरा रही थी। इस काली-कलूटी लड़की की मीठी शैतानी को वह खूब समझती है।

जहर है यह छोकरी! लछमन की पोती !

गंगापुरवाली दादी को चुरमुनियाँ की बात लगी नहीं, किन्तु वह नकियाकर कुछ बोली। चुरमुनियाँ ने समझ लिया।

बोली, “क्यों दादी, मैं झूठ कहती हूँ ?

बेचारी गंगापुरवाली दादी, जो गंडा से आगे गिनती न जाने, उससे मलकिन-काकी पूछेगी, 'पाँच टके सैकड़ा के दर से डेड़ सौ बीजू आम का दाम ?

हे-हे-ए-हा-हा-हा बस; दादी को तो “आकाशी' लग गई-ही-ही-ही-ही !

विजया बोली, “जल्दी-जल्दी हौज भर दे।”

आठ-नौ साल की इस लड़की से पार पाना खेल नहीं। विजया को छोड़कर उससे और कोई काम नहीं ले सकता, उसकी माँ भी नहीं। बाप को तो वह बोलने ही नहीं देती कुछ।

जब से विजया रानीडिह आई है, चुरमुनियाँ दिन-रात “बड़घरिया” हवेली में ही रहती है।

कल चुरमुनियाँ कह रही थी, “बिजैयादि, तू आई है तो लगता है रानीडिह गाँव में कोई परब-त्योहार!...माने...ठीक देवी-दुर्गा के मेला के समय जैसा लगता है वैसा ही लगता है।

अब तो तुम भी ठीक खरगेंट' (खंजन) चिरैया की तरह साल में एक बार आओगी, जैसे मलकिन-काकी आती है।...अब तुम भी शहर में जाकर “चोंचवाली अँगिया” पहनोगी।

“लात खाएगी अब तू।” दादी ने साग खोंटते चेतावनी दी, “है तनिक भी बड़े-छोटे का लिहाज इस छिनाल को ?

दादी बीच-बीच में बाल पकड़कर घसीटती-पीटती भी है, और उस दिन सारे गाँव में कुहराम मच जाता है; चुरमुनियाँ किसी राख के घूरे में लोट-लोटकर एकदम “भूतनी” हो जाती है और उसके मुँह से छन्दबद्ध पंक्तियाँ - 'रुदनगीत” की-अनायास ही निकलती रहती हैं “री ई-ई बुढ़िया गंगपरनी, बड़घरिया की घरनी, हमरो सौतिनी ई-ई बिना रे करनवा हमरा मारलि गे-ए-बुढ़िया गंगपरनी - ई-ई” लड़की तो नहीं, एक “अवतार” है, समझो।

गंगापारवाली दादी की मुस्कुराहट पोपले मुँह पर देखने योग्य होती है।

हँसती हई था है, “जानती है बिजै, भागलपुरवाली को इस निगोड़ी ने कैसा 'बेपानी' किया थे गगापुरवाली दादी ने मद्धिम आवाज में कहा, “भागलपुरवाली उस बार आई भादों में।

एक दिन 'बक्कस' से कपड़ा निकालकर धूप में सुखाने को दिया।

कपड़ों को पसारते समय यह लौंगी-मिर्च-छौंड़ी' अचानक चिल्लाने लगी-ले ले लाला... जर्मनवाला, बड़वाला...गेंदवाला...चोंचवाला...।

मैंने ऑँककर देखा, बाँस की एक कमानी में भागलपुरवाली की “अँगिया” लटकाए चुरमुनियाँ नचा-नचाकर चिल्ला रही उधर, दरवाजे पर दरवाजा - भर पंचायत के लोग... भागलपुरवाली जलती “उकाठी! लेकर दौठी थी” लोग।

भागलपुरवाली जलती “उकाठी गंगापुरवाली दादी के साथ विजया भी हँसते-हँसते लोट-पोट हो गई। आठ बजेवाली गाड़ी आने से पहले ही गोभी की सिंचाई हो गई। बाल्टी-लोटा-डोरी लेकर चुरमुनियाँ के सांथ विजया भाजी कि बगिया से बाहर आई। इस बार चुरमुनियाँ अपने झबरे बालों में उँगली चलाते हुए बोली, “बिजैयादि, सचमुच कल ही चली जाओगी ?

धेत्त...मत जाओ बिजैयादि!”

इस बार विजया ने एक लम्बी साँस ली।

“बड़घरिया हवेली” पहले यही अकेली हवेली थी।

पहले सिर्फ 'बड़घरिया” कहने से ही लोग समझ लेते थे-रानीडिह का चौधरी-परिवार अब “हवेली” जोड़ना पड़ता है, क्योंकि रानीडिह में अब एक नहीं, कई “बंड़घरिया' हैं।

बड़घरिया हवेली के एकमात्र वंशधर श्री रामेश्वर चौधरी एम.एल.ए. पिछले कई वर्ष से/पटना में ही रहते हैं, सपरिवार।

दूर-रिश्ते की एक मौसी यानी गंगापारवाली दादी बड़घरिया हवेली का पहरा करती है। हलवाहा सीप्रसाद खेती-बारी देखता है। लोग उसे “'मनीजर” कहते हैं। मखौल में रखा हुआ नाम ही अब “चालू” हो गया है, सीप्रसाद का-“मनीजर'

'छिटपुट जमीन” यानी आधीदारी पर लगी हुई जमीनों की हर साल बिक्री करके रामेश्वर बाबू अब “निम्ंझट” हो गए हैं; ख़ुदकाश्त में थोड़ी-तसी जमीन है, पोखर और बाग-बगीचे हैं।

जिस दिन कोई बड़ा गाहक लग जाए, बेचकर छुट्टी। छुट्टी माने, इस रानीडिह गाँव से, अपनी 'जन्मभूमि” से कोई लगाव-किसी तरह का सम्बन्ध नहीं रखना चाहते रामेश्वर बाबू।

मजबूरी है! पिछले पन्द्रह साल से रामेश्वर बाबू पटना में रहते हैं-पटना के एम. एल. ए. क्वार्टर में। अब राजेन्द्रगगर में घर बनवा रहे हैं। इस बार सम्भव है, 'पार्टी-टिकट! नहीं मिले।

किन्तु, अब गाँव रानीडिह लौटकर नहीं आ सकते। किसी गाँव में अब नहीं रह सकते... !

स्वर्गीय बड़े भाई सिद्धेश्वर चौधरी की विधवा की हाल ही में मृत्यु हो गई।

बड़े भाई की एकमात्र संनातन विजया, जो अपनी माँ के साथ पिछले सात-आठ साल से मामा के घर थी, सोलहवाँ साल पार कर रही है।

विजया के बड़े मामा ने कड़ी चिट्ठी लिखी विजया के काका को इस बार - जिनके त्याग और बलिदान का मीठा फल आप खा रहे हैं उनकी स्त्री को तो झाड़ू मारकर ऐसा निकाला कि...।

खैर, वह मरी और दुख से उबरी। लेकिन, आपका 'सिरदर्द' दूर नहीं हुआ है।

अभी आपको थोड़ा और कष्ट भोगना बाकी है।

विजया अब ब्याहनें के योग्य हो गई।

यदि आप मेरे इस प्र पर ध्यान नहीं देंगे तो मुझे मजबूर होकर आंपकी पार्टी के प्रधान को लिखना पड़ेगा!

इस बार दुर्गपूजा की छुट्टी में रामेश्वर बाबू अपनी स्त्री (भागलपुरवाली) के साथ रानीडिह आए।

नारायणगंज आदमी भेजकर विजूसा को बुलवा लिया।

काली-पूजा के बाद जब पटना वापस आने लगे तो गंगापुरवाली ने कहा, “बिजै यहाँ दस दिन और रहकर 'साग-भाजी' लगा जाती। फिर भागलपुरवाली बहू तो धान कटाने के लिए एक महीना के बाद आवेगी ही।

उसी के साथ जाएगी!”. कर रामेश्वर बाबू को बात पसन्द आई। कहा, “ठीँकू है। “'नवान्ष्न' के बाद हीं विजया जाएगी, पटना।

लेकिन परसों चिटूठी आई है-धान कटाने के लिंए इस बार नहीं आ सकती। मकान बन रहा है।

दिन-रात मजदूरों के सिर पर सवार रहना पड़ता है। अगले सप्ताह “ढलैया” शुरू होगी। इसलिए “शामा-चकेवा” के बाद विजया अपने छोटे मामा के साथ चली आवे पटना...जरूर-से-जरूर...।

आज शाम तक विजया के छोटे मामा नारायणगंज से आ जाएँगे। कल गाड़ी से विजया पटना चली जाएगी।

के चुरमुनियाँ अपने घर का बस एक काम करती है।

साँझ को पूरब-टोले के साहू की दूकान से सौदा ला देती है-मकई, चना, नून, तेल, बीड़ी।

हिसाब जोड़ने में कभी एक पाई भी गलती नहीं करती। अपने दादा-दादी से ज्यादा हिसाब जानती है वह।

साहू की दूकान पर होनेवाली “गप! में चुरमुनियाँ “रस” डाल देती है-“अब बिजैयादि भी चली जाएंगी। कल ही जाएगी।”

“और गंगापुरवाली ?”

ऊ चली जाएंगी तो यहाँ कलमी आम का “बगान” कौन 'जोगेगी” रात-भर जगकर ?

चुरमुनियाँ की बात सुनकर सभी हँसे। रामफल की घरवाली ने पूछा, “और तुझे नहीं ले जा रही बिजैया ?”

“धेत्त! मैं क्यों जाऊँ ?”

सच्चिदा पाँच पैसें का कपूर लेने आया था। विजया के कल हीं जाने की खबर सुनकर स्तब्ध रह गया।

उज़ड़े हुए हिंगना-मठ पर खंजड़ी बजाकर सतगुरु का नाम लेनेवाला एकमात्र बाबाजी सूरतदास बैरागी कहता है, “सभी जाएँगे। एक-एक कर सभी जाएँगे...।'

गाँव की मशहूर झगड़ालू औरत बंठा की माँ बोली, “ई बाबाजी के मुँह में 'कुलच्छन” छोड़कर और कोई बात नहीं।

जब सुनो तब-सभी जाएँगे! जब से यह बानी बोलने लगा है बूढ़ा बाबाजी, गाँव के 'जवान-जहाज' लड़के गाँव छोड़कर भाग रहे हैं।

पता नहीं, शहर के पानी में क्या है जो एक बार एक घूँट भी पी लेता है फिर गाँव का पानी हजम नहीं होता। गोबिन गया, अपने साथ पंचकीड़िया और सुगवा को लेकर। उसके बाद, बाभन-टोले के दो बूढ़े अरजुन मिसर और गेंदा झा...।”

रामफल की बीवी ने बीच में ही बंठा की माँ को काट दिया, “अरजुन मिसर और गेंदा झा की बात कहती हो, मौसी ?

तो पूछती हूँ कि गाँव में वे दोनों करते ही क्या थे ?

'बिलल्ला' होकर इसके दरवाजे से उसके दरवाजे पर खैनी 'चुनियाते” और दाँत निपोड़कर भीख माँगते दिन काटते थे। अब श्वहर में जाकर 'होटिल' में भात राँधते हैं दोनों। पिछले महीने अरजुन मिसर आया था। अब बटुआ में पनडब्बा और सुर्ती रखता है। तोंद झिकल गया है।”

“तो तू भी रामफूल को क्‍यों नहीं भेज देती? तोंद निकल जाएगा।”

किसी ने कहा, “एह! सभी जाकर शहर में 'रिश्कागाड़ी' खींचते हैं। हे भगवान! अन्धेर है।”

जवाब मिला, “क्यों ?

रिक्शा खींचना बहुत बुरा काम है क्या? पाँच रुपए रोज की कमाई यहाँ किस काम मैं होगी, भला ?”

सभी ने देखा, कैवर्तटोलीका सच्चिदा, जो पाँच पैसे का कपूर लेने आया था, पूछ रहा'है, “बताइए ?

किसी ने कोई जवाब नहीं दिंया।

सच्चिदा चला गया तो चुरमुनियाँ ने होंठ बिदकाकर कहा, “इसके भी पंख फड़फड़ा रहे हैं।...ई भी किसी दिनठड़ेगा। फुर्र-र!”

हँहँहैहैँ! बहुत देर से रुकी हँसी छलुंक/पड़ी। लोग बहुत देर तक उसकी बात पर हँसते रहे। चुरमुनियाँ की दादी पुकारने लगी, “अरी ओ चुरमुनियाँ!”

रात में चुरमुनियाँ बड़घरिया-हवेली में ही सोती है, गंगापुरवाली दादी के साथ। दादी सुबह-शाम चाय पीती है और चुरमुनियाँ को चाय की आदत पड़ं गई है। आज रविवार है। आज रात में दो बार चाय पियेगी, गंगापुरवाली दादी।

लेकिन आज चाय पीने का जी नहीं होता। चुरमुनियाँ चुपचाप अपनी कथरी में सिमट-सिकुड़कर अँगीठी पर चढ़ी केतली में पानी की 'गनगनाहट” सुन रही है। दादी ने दिल्लगी के सुर में पूछा, “आज तुमको किसका “बिरह-बिजोग” सता रहा है जो इस तरह... ?”

चुरमनियाँ चिढ़ गई, “मुझे अच्छी नहीं लगती तुम्हारी यह बानी

'पो-है! अच्छी बानी की नानी रें। आखिर तुमको हुआ क्या है ?”

क्या जवाब दे चरमनियाँ!

सभी, एक-एक कर गाँव छोड़कर जा रहे हैं। सच्चिदा भी चला जाएगा तो गाँव की 'कबड्डी' में अकेले पाँच जन को मारकर दाँव अब कौन जीतेगा ?

आकाश छूनेवाले भुतहा-जामुन के पेड़ पर चढ़कर शहद का 'छत्ता” अब कौन काट सकेगा ? होली में जोगीड़ा और भड़ौआ गानेवाला-अखाड़े में ताल ठोकनेवाला...सच्चिदा भैया!

पिछले साल से होली का रंग फीका पड़ रहा है। आठ-नौ साल की चुरमुनियाँ की नन्ही-सी जान, न जाने किस संकट की छाया देखकर डर गई है। क्या रह जाएगा ?

चुरमुनियाँ गा-गाकर रोना चाहती है करुण सुर में-एक-एक पंक्ति को जोड़कर गाकर रोना जानती है, वह। धीमे सुर में उसने शुरू किया-'आ गे मइयो यो यो...

गंगापुरवाली दादी ने झिड़की दी, “ऐ-हे। ढँग देखो इस रत्ती-भर छिनाल का। नाक से रोने बैठी है भरी साँझ की बेला में। उठ, जाके देख बिजै काहे पुकार रही है।”

“गोलपारक क्या, भैया ?”

गाँव के नौजवानों के तन-मन में 'फुरहरी' लग रही है, फुलकन की शहरी-गप सुनकर। मजेदार गप! इस गप में एक खास किस्म की गन्ध है-फुलकनी के “बाबड़ी-केश' से जैसी गन्ध आती है, ठीक वैसी ही।

फुलकन फुलझड़ी उड़ा रहा है, “रजिन्नरनगर ?

अब उसके बारे में कुछ मत पूछो, भैयो! साला, ऐसा सहर कि लगता है कि धरती फोड़कर “गोबर छत्ते” की तरह रोज मकान उगते जा रहे हैं।

होगा नहीं भला ? वहाँ कोई भी काम हाथ से थोड़ो होता है ? सुर्खी कुटाई से लेकर सिमटी-सटाई और चुना-पुताई-सबकुछ “मिशिन” से। बाल कटाने जाओ तो नाई एक ऐसा “'मिशिन' लगा देगा कि चटपट हजामत खत्म।...दस कदम पर एक-एक गोलपारक...।”

“गोलपारक क्या, भैया ?”

“अब क्या बतावें कि गोलपारक क्‍या है और कैसा होता है ?

वह देखने पर ही समझोगे। मुँह की बोली में उतने किस्म का रंग कहाँ से लावेंगे ?

समझो कि 'सीकी' की एक बहुत बड़ी सतरंगी 'डलिया” धरती पर रखी हुई है।

जब साँझ को लम्बे-लम्बे 'मरकली' के डंडे छटाक-छटाक कर जल उठते हैं और सौँझ के झुटपुटे में ठंडी-ठंडी हवा खाती हुई अंधनंगी लड़कियाँ...लड़की तो नहीं, समझो कि

'फिलिंइस्टार'...।”

“फिलिं...क्या... ?”

| कप ! फिलिंइस्टार भी नहीं समझते? अरे, पिक्चर की लड़की रे, पिक्चर की !”

“पिक्चर ?”

“अब तुम लोगों को क्‍या समझावें!.. माने, सिनेमा की छापी की लड़की समझे ?'

पिक्चर की लड़की, छापी की लड़की ?” क्या-क्या बोलता है, फुलकन ? क्या था और क्‍या से क्‍या होकर लौटा है! गाँव के नौजवानों की देह कसमसाने लगतीं है। फुलकन पटना में, 'रिश्कागाड़ी' खींचता है।...खींचता नहीं है, 'डलेवरी” करता है। फुलकन रिश्का-डलेवर है।

“अच्छा! रिश्का - डलेवरी कितने दिनों में सीखा जा सकता है ?”

'सिखानेवाला उस्ताद हो और सीखनेवाला 'जेहन' का तेज हो तो तीन ही दिन में हैंडिल” थिर हो जा सकता है।...असल 'चीजवा' है 'हैंडिल'!”

“गाँव के लड़कों ने लक्ष्य किया, फुलकन खास-खास बात में 'वा' लगाकर बोलता है-टिकटिवा, कगजवा, बतवा, चीजवा।

फुलकन ने अब पॉकेट से छापियों' का लिफांफा निकाला, “और देखो देखनेवालो...”

“ऐ हे! बाप...!”

फिलिं की छापी की तसवीर की लड़की ?”

“अँय! राह-घाट में इसी तरह “कच्छा-लँगोट' पहनकर चलती है ? कोई कुछ कहता नहीं ?

सभी “लहेंगड़े-लौडों' के सिर पर छापियाँ नाचने लगीं। नाचती रहीं।...रात में, सपने में भी छापी की लड़कियाँ नाचती रहीं और एकाध को “भरमा” भी गईं।

विजया को अचरज होता है! गाँव खाली होने का, गाँव टूटने का जितना दुख-दर्द इस छोटी-सी चुरमुनियाँ को है, उतना और किसी को नहीं। विजया इस गाँव में सात-आठ साल के बाद आई है तो क्या? है तो इस गाँव की बेटी।

जब से पटना जाने की बात तय हुई है, अन्दर-ही-अन्दर वह फूट रही है...रजनीगन्धा के डंठलों की तरह। वह पटना नहीं जाना चाहती। वह इसी गाँव में रहना चाहती है।...बाबूजी की याद आती है, माँ की याद आती है। मिल-जुलकर आती है। कलेजा टूक-टूक होने लगता है तो इमली का ल्‍क बूढ़ा पेड़, बाग-बगीचे, पशु-पंछी सभी उसे ढाढ़स बँधाते हैं। एक अदृश्य आँचल सिर पर हमेशा छाया रहता है।

यहाँ आते ही लगता है, बाबूजी बाग में बैठे हैं, माँ रसोई-घर में भोजन बना रही है। इसीलिए, मामा का गाँव-धर कभी नहीं भाया उसे। अपने बाप के 'डिह” पर वह

टूटी मड़ैया में भी सुख से रहेगी। लेकिन...। “बिजैयादि !'

क्र 'चुर्मुनियाँ ने आज चोरी पकड़ ली, शायद! विजया जब से आई है, रोज रात में चुपचाप रोती है। रोज सुबह उठकर तकियै .का गिलाफ बदल देती है।

“बिजैयादि?” चुरमुनियाँ अब उठकर बैठ गई। गंगापुरवाली दादी करवट लेती हुई बड़बड़ाई, “क्यों गुल मचाकर जगा रही है, नाहक ?

विजया ने कनखी-नजर से देखा, चुरमुनियाँ सोई हुई गंगापुरवाली दादी का मुँह चिढ़ाती, होंठों को बिदकाकर।

इसका अर्थ होता है, 'तुमको क्या ? दो बार 'चाह' पी चुकी हो। यहाँ बिजैयादि कल से ही अन्न-पानी छोड़कर पड़ी हुई है।'

विजया ने देखा, चुरमुनियाँ उठकर बाहर गई। आकाश के तारों को देखा। फिर बड़बड़ाती अन्दर आई, “इह, अभी बहुत रात बाकी है”...

चुरमुनियाँ आकर विजया के पैताने में बैठ गई- और धीरे-धीरे उसके पैरों को सहलाने लगी।

“इस लड़की ने तो और भी जकड़ लिया है, माया की डोर से। उसने पैर समेटकर कहा, “खह क्या कर रही है ?

चुरमुनियाँ हँसी; “थीं तो जगी हुई ही। फिर जंवाब क्‍यों नहीं दिया ?”

“तुझे नींद नहीं आती ?”

चुरमुनियाँ ने गंगापुरवाली दादी की ओर दिखलाकर इशारे से कहा, “दादी की नाक इस तरह बोलती है मानो 'अरकसिया” आरा चला रहा हो"...

विजया को हँसी आई। उसने डॉट बताई, “क्यों झूठ बोलती है? दादी की नाक आज एक बार भी नहीं बोली है!” . . .।

“तुम जगी नहीं थीं तो तुमने जाना*कैसे?” चुरमुनियाँ जीत गई। “जानती है बिजैयादि ? लगता है, सच्चिदा भी अब सहर का रास्ता पकड़ेगा।...जाओ भाई, सभी जाओ। यहाँ गाँव में क्या है? सहर में बोयस्कोप है, सरकस, सलीमा है...।”

“सोने भी देगी?” विजया का जी हलका हुआ थोड़ा।

“नहीं।

“कल रात से तो और तुमको नहीं पाऊँगी। आज रात-भर सताऊँगी।”

कुछ देर तक चुप्पी छायी रही। दोनों ने लम्बी साँस ली।

“बिजैयांदि ?” चुरमुनियाँ सटकर सो गई।

“क्या है रे ?”

“सहर के दुल्हे से सादी मत करना। विजया ठठाकर हँसना चाहती थी। उसने बहुत मुश्किल से अपनी हँसी को जब्त

करके पूछा, “सो क्यों? शहर के लोगों ने तेरा क्या बिगाडा है ?”

“मेरा क्या बिगाड़ेगा कोई!

“तो, किसका बिगाड़ेगा ?”

'तुम्हारा...बिजैयादि ? तू सादी ही मत करना। वे लॉग तुमको कभी फिर इस

गाँव में नहीं आने देंगे।”

क्यों

“जब गाँव का आदमी ही गाँव छोड़कर सहर भाग रहा है तो सहर का आदमी अपनी “जनाना' 'को गाँव आने देगा भला ?”

“मुझे बाँध रखेंगे क्या ?”

“हाँ, बाँधकर रखेंगे। कमरे में बन्द करके।”

गंगापुरवाली दादी उठकर बैठ गई और 'जाप! करने लगी। दोनों चुप हो गईं।

गंगापुरवाली दादी बाहर गई। विजया ने देखा, चुस्मुनियाँ सो गई है। वह धीरे-धीरे उसके झबरे बालों पर हाथ फेरने लगी।

सुबह उठकर बाहर निकलते ही चुरमुनियाँ चिल्लाई, “देख-देख बिजैयादि, 'लीलकंठ” देख लो!”

गोढ़ी-टोले से एक जिन्दा मछली ले आई चुरमुनियाँ और मिट्टी के बर्तन में पानी डालकर सामने रख दिया। फिर गाँव से उत्तर, बाबा जीन-पीर के थान की मिट्टी लाने गई। सुबह से ही वह काम में मगन है, चुपचाप | विजया के मामा ने कई बार छेड़कर चिढ़ाने- की चेष्टा की।

विजया ने भी कई बार चुटकीं ली। मगंर वह चुप रही। आज वह गंगापुरवाली दादी की गालियों का न जवाबःदेती है और न होंठों को बिदकाकर मुँह चिढ़ाती है।...कल कह रही थी, “जानती है बिजैयादि, “तुम चली जाओगी तो कल से दादी गाली भी नहीं देगी। दिन-रात्र मुँह फुलाकर बैठी रहेगी या आँख मूँदकर जाप क़रेगी।”

दोपहर को जब विजया के मामा भोजन करने बैठे तो चुरमुनियाँ ने मुँह खोला, “मामा, बिजैयादि को .भी अपने सामने बैठकर खाने को कहिए। कल से ही मुँह में...कुछ नहीं।

लगा, बालू का बाँध अरराकर टूट गया है। फफककर फूँटकर रो पड़ी चुरमुनियाँ, बिजैयादि यहाँ से...भूखी-प्यासी...जाएगी ई-ई-ई!

चुरमुनियाँ की बरसती हुई, लाल-लाल आँखों में विजया ने कुछ देखा और वह सिहर पड़ी।...रोते-रोते मर जाएगी यह लड़की।

उसने रुँधे हुए गले से चुरमुनियाँ को समझाना शुरू किया; “चल! पहले उठकर नहा ले! मैं तुम्हेरे साथ ही बैठकर खाऊँगी। उठ!

विजया के मामा को अचरज हुआ। आज तक विजया ने किसी बच्चे-बच्ची को इस तरह दुलार-भरे सुर में नहीं पुचकारा। वे जल्दी-जल्दी भोजन करके बाहर दालान पर चले गए।

विजया ने चुरमुनियाँ को नहलाया-धुलाया। गंगापुरवाली दादी ने बाहर निकलकर कई भदूदी गालियाँ दीं। किन्तु आज उसकी गाली सुनकर भी चुरमुनियाँ रोती है।... कल से दादी गाली देना भी बन्द कर देगी।

खाने के समय विजया' ने टोका, “पेट भरकर खा।”

चुरमुनियाँ बोली, “मैं भी वही कह रही थी तुमसे।”

फिर दोनों हँस पड़ीं। हँसते-हँसते रोने लगीं।

बाहर मामा ने सूचना देने के लहजे में कहा, “तीन बज रहे हैं।” अर्थात्‌, अब दो घंटे और। साढ़े छह बजे की गाड़ी पकड़ने के लिए पाँच बजे ही घर से निकल पड़ना होगा।

चुरमुनियाँ बोली, “जमराज!”

विजया हँसते-हँसते लोट-पोट हो: गई।...मन की बात कही है चुरमुनियाँ ने।

देखते-ही-देखते सूरज ढल गया। अब, एक घंटा और!

सामान वगैरह बाहर दालान में भेजकर विजया ने चुरघुनियाँ को 'पूजा-घर' में पुकारा। गंगापुरवाली दादी रसोईघर में पकवान छान रही थी। चुरमुनियाँ अन्दर गई।

“देख चुरमुन, इधर आ। इस घर,में रोज झाड़-लेपन, साँझ-धूप बाती देना मत भूलना।”

“तुमको कहना नहीं होगा। मैं घर के 'देवता-पित्तर' से लेकर गाँव के देवता-बाबा जीन-पीर के थान में रोज झाड़ू-बुहारी दूँगी-यह मनौती मैंने की है कि हे मैया गौरा पारबती !...कि हे बाबा जीन-पीर...हमारी बिजैयादि को कोई सहर में बाँधकर नहीं रखे।...जिस दिन तू लौटकर आएगी; मैं देवी के” गहवर' में नाचूँगी...सिर पर फूल की डलिया लेकरं। तू लौट आवेगी तो सब कोई लौटकर आवेंगें। भूले-भटकें, भागे-पराए- सभी आवेंगे। तू नहीं आएगी तो इस गाँव में अब धरा ही क्‍या हैं? जो भी है, वह भी एक दिन नहीं रहेगा। सिर्फ गाँव की निसानी, घरों के डिहं...” ..

“नहीं चुरमुन, ऐसी बात मत बोल”

“तो, सत्त करो। मेरी देह छूकर कहो...।”

चुरमुनियाँ अपलक नेत्रों से विजया को देखती रही। विजया भी उसकी आँखों में डूब गई, “चुरमुन, मैं शहर में नहीं रह सकूँगी। मैं लौट आऊँगी। यहीं जीऊँगी यहीं मरूँगी।...।'”

“नः नः, 'जातरा” के समय कुलच्छन-भरी बात मत निकालो मुँह से।...जानती है बिजैयादि, मुझे कैसा लगता है, कहूँ?...लगतां है, तू मेरी बेटी है और मैं तुम्हारी माँ। तू मुझे...माने...अपनी माँ को हमेसा के लिए छोड़कर जा रही है।”

विजय चौंकी, तनिक। उसने चुरमुनियाँ के चेहरे पर.उमड़ने-घुमड़नेवाली घटाओं को देखा। वह बोली, “हाँ, तू मेरी माँ है।...तू ही मेरी माँ है।

चुरमुनियाँ आनन्द-विभोर हो गई, “बिजैयादि, जी छोटा मत करों। रोओं मत!...कलेजा मजबूत करो।...'कहल-सुनल' माफ करना।...अच्छा तो, पाँव लागों।”

बैलगाड़ियाँ चल पड़ीं। दालान के पास, गंगापुरवाली दादी के साथ चुरमुन टुकुर-टुकुर देखती रही...।

विजया उँगलियों पर जोड़ती है-ग्यारह महीने! ग्यारह-तीसे, तीन सौ तीस...?

चुह्मुनियाँ ने गैक ही कहा था। सच्चिदा भी शहर आ गया है और एक प्रायवेट कम्पनी में दरबानी करता है। गाँव से जो भी आता है, विजया सबसे पहले चुरमुनियाँ के बारे में पूछती है; फिर पूछती है, “गाँव छोड़कर क्यों आए?” सच्चिदा ने बताया, “चुर्मुनियाँ तो पूरी 'भगतिन' बन गई है। रोज भोर में नहाकर सिव मन्दिर जाती है।...लोग कहते हैं कि लड़की पर कोई “देव” ने सवारी की है।”

जिस दिन विवाह की बात पक्की हुई, विजया का कलेजा धड़का था। उसे चुरमुनियाँ की बात याद आई थी। शादी के समय भी चुरमुनियाँ की बात मन में गूँज गई थी।

उसने ठीक ही कहा था। चुरमुनियाँ पर सचमुच कोई 'देव” की सवारी हुई है। विवाह के बाद, पाँच महीने भी नहीं बीते सुख-चैन से! विजया फिर उँगलियों पर कुछ जोड़ती है।

“अब .उसके पति इस बात को अच्छी तरह प्रमाणित करने पर तुले हुए हैं कि विजया को गाँव के किसी लड़के से प्रेम था और उसी के विरह में वह विवाह के बाद ही अर्ध-विक्षिप्त हो गई है...।

विजया के काका को वकील का नोटिस देकर पूछा गया कि इस धोखेबाजी के लिए उस पर मुकदमा क्‍यों नहीं चलाया जाए ?

“विजया के पति पाँच हजार रुपए बतौर, हर्जाना के वसूल करना चाहते हैं, उसके काका से!...विजया कुछ भी नहीं जानती। कुछ भी नहीं समझती। कुछ समझने की चेष्टा भी नहीं करती। सिर्फ उँगलियों पर कुछ जोड़ती है। जोड़ती ही रहती है।

हिंगना-मठ के सूरतदास बाबाजी से एक पोस्टकार्ड लिखवाकर भेजा है, चुरमुनियाँ ने। कई डाकघरों में घूमती-भटकती हुई चिटूठी विजया के पति को कल मिली है, “बिजैयादि कब आओगी? अब नहीं ही आओगी।” इसके बाद सूरतदास बाबाजी ने अपनी ओर से लिखा है, “चुरमुन एक महीने से बिछावन पर लबेजान है और दिन-रात तुम्हारा नाम...।”

विजया अपने पति को कुछ भी नहीं समझा सकी कि यह चुरमुन कौन है, जिसकी बीमारी की खबर पाकर वह इस तरह बेचैन हो गई। विजया की बस एक

ही जिद-“मैं आज ही जाऊँगी। अभी...”

तब, हमेशा की तरह उसे घर में बन्द करके कुंडी चढ़ा दी गई। किन्तु इस बार विजया न रोई, न चीखी; न चिल्लाई, न दरवाजा पीटा, न बर्तन-बासन तोड़ा। करुण-कंठ से गिड़गिड़ाने लगी, “मैं आपके पैर पड़ती हूँ। आप जो भी कहिएगा, मानूँगी।

मुझे एक बार अपने साथ ही गाँव ले चलिए। मैं खड़ी-खड़ी उस निगोड़ी को देख लूँगी। मरे या जीए। मैं उलटे-पाँव वापस चली आऊँगी-आप ही के साथ।”

“यह चुरमुनियाँ आखिर है कौन ?”

“मेरे गाँव की...एक...पड़ोसी की लड़की।”

“लेकिन, लगता है तुम्हारी कोख की बेटी हो।”

“हाँ, वह मेरी माँ है। माँ है...”

“मुझे देहाती-उल्लू मत समझना।”

हर दिन की तरह, विजया अचानक चुप हो गई और आँख मूँदकर अपने गाँव-मैके रानीडिह भाग गई।

अब उसे कोई मारे, पीटे या काटे-घंटों अपने गाँव में पड़ी रहेगी।

वह...दूर से ही दिखलाई पड़ता है, गाँव का बूढ़ा इमली का पेड़। वह रहा बाबा जीन-पीर का थान।...वह रही चुरमुनियाँ।...रानीडिह की ऊँची जमीन पर...लाल माटीवाले खेत में...अक्षत-सिन्दूर बिखेरे हुए. हैं। हजारों गौरिया-मैना सूरज की पहली किरण फूटने के पहले ही खेत के बीच में कचर-पचर कर रही हैं।

चुरमुनियाँ सचमुच पखेरू हो गई ? उड़कर आई है, खंजन की तरह!...विजया की तलहथी पर एक नन्‍हीं-सी जानवाली चिड़िया आकर बैठ,बई।...चुरमुन रे! माँ...!

“डॉक्टर ने सूई गड़ाई या किसी' ने छुरा भोंक दिया?-कोई मारे या काटे, विजया अपने गाँव से नहीं लौंटेगी, अभी!

अक्ल और भैंस

जब अखबारों में हरी क्रान्ति की सफलता और चमत्कार की कहानियाँ बार-बार विस्तारपूर्वक प्रकाशित होने लगीं, तो एक दिन श्री अगमलाल 'अगम' ने भी शहर का मोह त्यागकर, खेती करने का फैसला कर लिया।

गाँव में, उनके चार-पाँच बीघे जमीन थी जिसे बटाईदारी पर उठाकर, अगमलालजी 'अगम' आज से सात साल पहले ही गाँव छोड़कर जिला के सदर शहर में आ बसे थे।

चूँकि उनके नाम के साथ उनका “उपनाम” भी लगा हुआ था, इसलिए शहर के लोगों को यह जानने में देरी नहीं लगी कि “अगमजी” एक साहित्यिक प्राणी हैं।

एक मित्र से किसी वकील की मुहर्रिरी करने की पैरवी करवाई तो वकील साहब ने उनके उपनामयुक्त नाम पर ही एतराज किया- “एक ही साथ दो नाम रहना गैर-कानूनी है।

और जिसका नाम ही गैरकानूनी हो वह कानूनी कारबार कैसे कर सकता है ?

एक सेठजी के घर बच्चों को पढ़ाने का “टप्पस” लगाया तो सेठजी भी उनके नाम और उपनाम से भड़के। पूछा-क्यों जी ?

गाणा-वाणा तो नहीं बजाते हो ?

नहीं जी, हमें ऐसा मास्टर नहीं चाहिए।

चारों ओर से हारकर आखिर एक दिन 'अगमजी'” अपने नाम की कुर्बानी करने को तैयार हो गए। अपने नाम के अतिरिक्त-अंश को कतरकर अलग करना चाहते थे कि नौकरी दिलानेवाले देवता अचानक प्रसन्‍न हो गए, मानो।

एक पुराने प्रेस में 'प्रूफ' देखने की नौकरी मिल गई और तब से अगमलालजी “अगम” अपने अखंड नाम के साथ ही, प्रफ देखते हुए साहित्य-सेवा में संलग्न थे।

किन्तु इस ही क्रान्ति! की हवा ने “अगमजी'” के हृदय को ऐसा हरा बना दिया कि उन्हें चारों ओर हरी-हरी ही सूझने लगी। और अन्ततः एक दिन शहर छोड़कर बोरिया-बिस्तर समेत गाँव वापस आ गए।

गाँव के लोगों ने जब “अगम'जी के ग्राम-प्रत्यागमन का समाचार कारण सहित सुना, तो उन्हें खुशी नहीं, अचरज हुआ। कई निकट के सम्बन्धियों और शुभचिन्तकों ने उन्हें नेक से नेक सलाह देकर शहर वापस भेजना चाहा। किन्तु “अगम'जी की आँखों के आगे सदैव “उन्नत किस्म' के गेहूँ की बालियाँ झूमती रहतीं, 'शंकर मकई' के भूरे-भूरे बाल लहराते रहते।

और जब आँखों में नींद आती, तो अपने साथ नए किस्म के उन्‍नत सपने ले आती-आलू की ढेरी, ऊख के अम्बार और हरे चने और मटर की मखमली खेतीवाले सपने! सो 'अगम” पर किसी की सलाह का कोई असर

नहीं हुआ और वे उत्साहपूर्वक अपने जीवन की 'प्रूफ रीडिंग' यानी भूलों को सुधारने में लग गए।

खेती करने के लिए सबसे पहले हल, बैल और हलवाहे की आवश्यकता होती है।

हल और बैल तो खरीद लिए गए। किन्तु हलवाहा की समस्या जटिल प्रतीत हुई। अव्वल तो आजकल गाँव का सबसे निकम्मा आदमी ही हलवाही करता है। निकम्मा अर्थात्‌ जिसे 'घर-घरहट' 'छौनी-छप्पर' और “कोड़-मकान' का कोई 'लूर” नहीं, जो गाड़ी-बैल भी नहीं हाँक सकता-ऐसे "फूहड़' आदमी के लिए गाँव में हलवाही के सिवा और कोई धन्धा नहीं।

ऐसे लोग, किसी भी गाँव में, आजकल बहुत कम ही मिलते हैं।

एकाध हुए भी तो ऐसे लोगों को गाँव के बड़े-बड़े किसान बहुत पहले से ही चारा-पानी खिलाकर यानी “अग्रिम पारिश्रमिक' (कर्ज नहीं) देकर अनुबन्धित कर लेते हैं, सो बहुत खोज-ढूँढ़ करने के बाद, गाँव का सबसे अपाहिज और काहिल पुरुष बिल्लू दास-'अगम'जी की किस्मत में आकर जुटा।

बहुत 'खुशामद-दरामद” और प्रलोभन के बाद-नित्य सुबह-शाम एक गिलास गर्म चाय पिलाने की शर्त पर बिल्लू महाराज राजी हुए। अगमजी ने सबसे पहले उनके नाम को 'प्रूफ रीडिंग” करके सुधारा - बिल्लूदास नहीं, बिलोमंगल! बिलोमंगलजी गाँव के सर्वश्रेष्ठ आलसी माने जाते थे।

किन्तु “मुहरत” के दिन ही 'अगम'जी ने उनको एक गिलास “औरेंज पिकोदार्जिलिंग' चाय पिलाकर उनकी सारी सुस्ती इस तरह दूर कर दी कि वे तत्काल ही इतने चुस्त हो गए कि उनके अंग-अंग फिल्‍मी गीतों पर डोलने लगे।

हल जोतते समय जब गाँव के अन्य हलवाहे-मजदूर “बिरहा-बारहमासा” गाते तो बिलोमंगलजी के पैर “मस्तानी महबूबा” के तर्ज पर थिरकते रहते।

इसी प्रक्रिया में एक दिन दाहिने बैल के पिछले पैर में '"फाल” लग गया। “अगम'जी को यह नहीं मालूम था कि हल का फाल भी इतना खतरनाक हो सकता है कि जरा-सा लग जाने पर महीनों तक बैल लँंगड़ा होकर बैठा रहे!

खैर, शुभचिन्तकों और सम्बन्धियों से बैल और मैंस मैँगनी करके, 'अगम'जी ने किसी तरह खेतों को तैयार करवाया।

कस्बे से रासायनिक खाद खरीद लाए और “बीज-वपन” के लिए शुभ दिन देखकर-गेहूँ की '“बोवाई” हो गई।

“बोवाई” के बाद दोनों-अगम और बिलोमंगल-इतने प्रसन्‍न हुए कि रात-भर मिल-जुलकर-डुएट-भाव से-मिट्टी में सोना” उपजानेवाले गीत गाते रहे।

उसी दिन 'अगम'जी ने अपने शहरी साहित्यिक मित्रों को कई लम्बी-लम्बी चिट्ठयाँ लिखीं, जिनमें 'नई खेती” के 'नए अनुभवों! के आधार पर उन्होंने घोषित किया कि खेती करने में, कविता और चित्रकारी करने का आनन्द, एक ही साथ प्राप्त होता है।

कई दिनों तक स्वामी-सेवक “बोआई” के आनन्द में मग्न रहे कि एक दिन सूर्योदय के एक घंटा पहले ही एक शुभचिन्तक ने आकर दरवाजा पीटना शुरू कर दिया। सुबह के सुनहले सपने को खोकर 'अगम'जी अत्यन्त अप्रसन्‍न हुए।

शुभचिन्तकजी को भला-बुरा कहना चाहते थे किन्तु, इसके पहले ही शुभचिन्तकजी ने सूचना दी- तुम सोए हो ?

जाकर देखो, तुम्हारे खेत में गेहूँ का एक भी दाना बचा भी है या अगमजी समझ गए, सुबह-सुबह दिल्लगी करके चाय पीने आया है।

वे बोले- “क्यों ? गेहूँ के दाने कहाँ चले जाएँगे ?” "आया है। वे बोले शुभचिन्तक बोले- “अरे, जाकर देखो ना, हजारों-हजार कौआ, मैना और दुनिया-भर की चिड़ियों का झुंड तुम्हारे ही खेतों में पड़े हैं। गेहूँ के दाने चुग रहे हैं।'”

“क्या सुबह-सुबह दिललगी करने आ गए ?” अगमजी ने कहा।

“मैं दिल्लगी करने नहीं आया, तुमको 'चेताने” आया हूँ।”

अगमजी ने तकिए के नीचे से “गेहूँ की सफल खेती' नामक पुस्तिका शुभचिन्तक के सामने फेंकते हुए कहा-“मुझे इतना उल्लू मत समझना।

मैंने गेहूँ की सफल खेती के बारे में एक-एक शब्द पढ़ लिया है और जहाँ-जहाँ 'प्रफ' की गलतियाँ थीं उन्हें शुद्ध भी कर दिया है।

समझे ? इस किताब को खोलकर कहीं भी किसी अध्याय की किसी भी पंक्ति में खोजकर निकाल दो कि गेहूँ की 'बोआई' के बाद चिड़ियाँ - उड़ाई' भी आवश्यक...।”

शुभचिन्तकजी ने अप्रसन्‍न होकर जवाब दिया-“तुम्हारी इस किताब में क्‍या लिखा है और क्या नहीं लिखा है-यह मैं नहीं जानता।

सामने तुम्हारे खेत हैं। जाकर खुद देखते क्‍यों नहीं कि खेतों में चिड़ियों के कितने अध्याय और कितनी पंक्तियाँ है...।

'बोआई' के बाद सभी किसानों के हलवाहे-रखवाले, सूर्योदय के बहुत पहले ही खेतों पर चले जाते हैं। दुनिया-भर की चिड़ियों की टोलियाँ...कचर-पचर करती हुई खेतों में उतरना चाहती हैं।

किन्तु वे पटाखे छोड़कर तथा फटे कनस्तरों को पीट-पीटकर उन्हें उड़ाते रहते हैं-हा, हा-ए!

अगमलालजी “अगम' ने गाँव से बाहर जाकर देखा-सचमुच अद्भुत व्यापार !...जो बात किताब के किसी पृष्ठ पर नहीं, वह खेत पर लिखी हुई है...आधुनिक कविता की पंक्तियों की तरह।

और जिस तेजी से उन पखेरुओं के चोंच चल रहे थे, उतनी तेजी से किसी प्रेस में “ऑटोमेटिक कम्पोजिंग” भी नहीं होती होगी। एक ही घंटा में सब गेहूँ चुनकर खत्म कर देंगे!...“अगमी'जी के अन्तर से पूरी शक्ति के साथ बस एक ही शब्द अनायास निकल पड़ा... हा-हाय !'

किन्तु उनके 'हाय” का कोई खास असर नहीं हुआ और हाथ की तालियों से जब पंछियों के एक पंख भी नहीं फड़के, तो उन्होंने एक ढेला उठाकर फेंका।

ढेला खेत में गिरा, तो इधर चरती हुई चिड़ियाँ उड़कर उधर जा बैठीं और चुगने लगीं। अगमजी दौड़कर उस मेंड़ पर गए, तो पंछियों के दल उड़कर दूसरी तरफ बैठ गए। तब तक बिलोमंगलजी भी सहायता के लिए पहुँच गए थे। अगमजी को राहत मिली।

पटाखे या कनस्तर तो थे नहीं इसलिए दोनों बहुत देर तक इस मेंड़ से उस मेंड़ पर दौड़-दौड़कर 'ढेलेबाजी' करते रहे।

सूरज बाँस-भर चढ़ गया और पूस की सुबह का कुहासा तनिक छँटा और चिड़ियों के पेट भर तो गए वे स्वयं ही उड़कर बाँसों तथा पेड़ों की फुनगियों पर जा बैठे।

उस दिन लौटकर “अगम'जी ने “गेहूँ” की सफल खेती' नामक पुस्तिका के अन्तिम पृष्ठ पर नोट लिखा-“बीज की 'बोआई' के बाद ही... चिड़ियाँ-उड़ाई! पर विस्तारपूर्वक एक अध्याय लिखकर पुस्तिका के अगले संस्करण में जोड़ दिया जाए।”

“नोट' लिखने के बाद अगमजी ने बिलोमंगल से कहा-“कल सूरज से दो घड़ी पहले ही खेत पर एक फूटा कनस्तर लेकर पहुँच जाना।”

“फूटा कनस्तर कहाँ से लावेंगे ?” - बिलोमंगल का सवाल था।

“कनस्तर ?...तुमको कहीं फूटा हुआ कनस्तर भी नहीं मिलेगी ?”

जवाब मिला-““जी हमारी नजर में तो कोई फूटा कनस्तर नहीं पड़ा।

आपने कहीं देखा हो तो कहिए, ले आता हूँ।...हाँ, सहुआइन की दुकान में साबुत कनस्तर जरूर मिल सकता बिलोमंगल लौटकर एक रुपया में एक कनस्तर उधार ले. आए।

कनस्तर को अगमजी के कान के पास पीटकर परीक्षा देते हुए कहा-“देखिए, एकदम साबूत है।” कनस्तर की समस्या हल करने के बाद ही बिलोमंगल ने दूसरा सवाल पैदा कर दिया - “लेकिन हमसे यह काम नहीं होगा।”

“क्यों ?” बिलोमंगल ने सर्वप्रथम कारण बतलाया, “...बात यह है कि बाबूसाहेब कि हम ठहरे बैस्नव आदमी भोरे-भोरे इतने 'प्राणी” के मुँह का आहार छीनने का काम हमसे मत करवाइए।

अगमलालजी को अचरज हुआ...क्या कहता है यह आदमी! झुँझलाए, “...तो क्या चिड़िया उड़ाने के लिए दूसरा आदमी रखना होगा ?”

बिलोमंगल ने भी झुँझलाकर जवाब दिया, “...एक तो जाड़े का मौसम तिस पर सूरज उगने के दो घड़ी पहले ही उठना।

इसके बाद, खेत पर पॉव-पैदल जाना। आजकल सुबह-सुबह ऐसी कनकनीवाली पछिया हवा चलती है कि देह क्या जीभ भी सुन्‍न हो जाता है अन्ततः सम्मानपूर्ण शर्तिया समझौता हुआ-कल से सूरज उगने के दो घंटा पहले नहीं, एक घंटा पहले, बिलोमंगल अगमजी का ऊनी ओवरकोट और “कनझतप्पा टोपी!

पहनकर, पैरों में काबुली चप्पल डालकर एक गिलास गरम चाय पीने के बाद-एक बीड़ी सुलगाकर दूसरी जेब में रखते हुए-कनस्तर लेकर खेत पर पहुँचेगा। वह चिड़ियों को उड़ाएगा नहीं, सिर्फ “चल उड़ जा रे पंछी' गीत गाता हुआ, ताल पर 'चिड़ियाँ-उड़ाई' के बाद जब खेत में गेहूँ की पीके फूटे और धीरे-धीरे तब अगमजी को मालूम हुआ कि बिलोमंगल की दाहिनी आँख जन्म से ही दृष्टिहीन है।

जिस स्थान पर बैठकर वह नित्य कनस्तर पर टेका बजाया करता था, उसके दाहिनी ओर के खेतों में बहुत कम पौधे उगे।

अस्तु पौधे बढ़ने लगे। हरियाली गहरी होती गई और अगमजी दूर होते गए और बिलोमंगलजी “हरियाली और रास्ता” के गीत गाते रहे। किन्तु सिंचाई करने का समय आया तो बिलोमंगलजी फिर अकड़ गए-“हम हलवाही करने के लिए बहाल हुए हैं, पानी पटाने के लिए नहीं।”

धींचने इस बार भी सम्मानपूर्ण समझौता हुआ-बिलोमंगल जलपान करके खेत में जल सींचने के लिए खाली हाथ जाएगा, किन्तु गाँव के किसी किसान से “झगड़ा-कनिया' नहीं करेगा। कोई जोर-जबरर्दस्ती करे, तब भी नहीं।

पहली सिंचाई के अन्तिम दिनों में भी जब अगमजी ने अपने खेतों में धूल उड़ते देखा, तो उनका माथा ठनका।

खेतों में जाकर देखा-एक चुल्लू पानी भी किसी दिन नहीं पड़ा है।

कारण पूछने पर बिलोमंगलजी के सम्मान को चोट लगी। उन्होंने समझौते की शर्तों का स्मरण दिलाते हुए कहा-“बाबू साहेब! यहाँ तो कहावत चालू हो गया कि “जो दिखावे मर्दानी-वह पावे पानी” हम ठहरे हलवाहा आदमी।

उधर गाँव के बड़े-बड़े बाबू किसान खुद पानी के लिए आते हैं। उनसे “बतकुटी” करके मार खाने कौन जाए ? आप खुद क्‍यों नहीं जाते ?”

अन्ततोगत्वा, अगमजी स्वयं ही सिंचाई के लिए पानी लाने के लिए खेत पर गए।

वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा-हर नहर, आहर, छहर और पैन पर गाँव के बड़े-बड़े किसान लाठी और लठैतों के साथ जमे हुए हैं।

अगमजी ने जब देखा कि बगैर लाठी और लठैती के पानी पाना असम्भव है, तो उन्हें “सत्याग्रह” की याद आई। उन्होंने ऐलान करके कहा-“सभी लोग सुन लें। कल से अगर मुझे पानी नहीं लेने दिया गया तो मैं यहीं इसी 'साइफन” पर बैठकर “आमरण-अनशन' शुरू कर दूँगा।'

लेकिन नहर-विभाग में 'पार्ट-टाइम” करनेवाले, गाँव के एक किसान नौजवान ने उनकी आमरण-अनशन-घोषणा को एक ही बात से निस्तेज कर दिया-“आपने तो पानी के लिए “सट्टा” ही नहीं करवाया है तो पानी कैसे मिलेगा ?”

“सट्टा? यह 'सटूटा-पटूटा” क्या होता है ?” अगमजी ने पूछा।

“जी, 'सटूटा' माने 'एग्रिमेन्ट'। जिन्होंने सटूटा करवाया है, पानी उन्हें ही मिलेगा। “अनअथाराइज्ड” पानी लेने पर तुरत मुकदमा दायर हो जाता है।”

अगमजी की सिट्टी-पिटूटी गुम हो गई। वे चुपचाप मुँह बाए अपने सहायक बिलोमंगल की ओर देखते रहे। बिलोमंगल ने उनको फिसफिसाकर बताया-“बाबू साहेब! यहाँ हर बात में 'पाटीपोलटिस” होता है।”

“पाटीपोलटिस”-अगमजी मुँह बाए ही रहे।

“जी! गाँव 'दोपाटी' है। 'पुआरी-टोल' पाटी और 'पचियारी-टोल' पाटी। आपका घर दोनों टोले के बीच 'सीवान' पर पड़ता है। आपको लोग न इस टोल की पाटी में समझते हैं, न उस टोल की पाटी में...।”

अगमजी गम खाकर गुमसुम लौट आए। रात-भर उनको अपनी निर्बलता पर, उनके अपने ही हृदय में ग्लानि और क्षोभ के बादल घुमड़ते रहे! और अन्त में निर्बल के बल रामजी को उन पर ऐसी दया आई कि आसमान में घने काले बादल उमड़ आए और घनघोर वृष्टि शुरू हुई। अपने सहायक को 'बरसात' का गीत गाने के लिए उन्होंने पुरस्कार दिया प्रसन्‍न होकर। सुबह जाकर देखा कि बगैर 'सटूटा-पट्‌टा” के ही उनके खेत में पानी छलमला रहा है : ...पानी रह गया उनका!

पौधे एक बालिस्त-भर और बढ़े तो अगम का हौंसला भी डेढ़ हाथ बढ़ा। बढ़ता ही जा रहा था कि सुबह को बिलोमंगलजी आकर कोई आवश्यक सूचना देते हुए तुतलाने लगे। बार-बार? भैंस-भैंस सुनकर अगमजी ने समझा कि आज दूधवाले ने दूध नहीं दिया। किन्तु बात दूसरी ही थी और थी भीषण-मारात्मक! रात में गाँव के भैंसवारों ने उनके तीनों खेतों की फसल को चराकर साफ कर दिया।

अगमजी दौड़कर खेत पर गए। वे रोना चाहते थे किन्तु रो भी नहीं सके। गाँववालों को कोई अचरज नहीं हुआ। और न किसी ने इस अन्याय के लिए किसी से कुछ कहा। बल्कि, ठहरानेवालों ने अगमजी को इसके लिए 'दोषी” ठहराया।

खेत में फलल लगाकर-बेसुध होकर घर में सोने से खेती चरेगी ही।

अगमजी ने अपने सहायक की ओर देखा। बिलोमंगल ने कहा-' बाबू साहेब! असल में बात यह है कि 'जिसका काम उसी को साजे, और करे तो डंडा बाजे / आप ठहरे “कागद-कलम'वाले आदमी।

अगर खेती करना हो तो यहाँ के लोग जैसा करते हैं, जो करते हैं, वह आपको भी करना होगा।...यहाँ 'अकल' से बढ़कर भैंस है। और, क्यों न हो ?

भैंस का दूध मीठा है। बहुत ताकत होता है। और जब ताकत होगा, तो लाठी भी मजबूत होगी। जब लाठी मजबूत होगी, तब दूसरे का भैंस भी आप हॉककर अपने बथान पर ला सकते हैं।...और, भैंस तो 'जीप' गाड़ी से भी बढ़कर होती है। रात-बेरात जब जी में आवे, इस पर सवार होकर आप 'बिजूबन-बीजूखंड' में भी जा सकते हैं। न साँप-बिच्छू का डर, न भूत-पिशाच का कोई भय और न बाघ-भालू।

कीचड़, पानी, कादों ओसे, पल्‍ली-सबसे बचाकर, खेत की हर मेंड़ पर ले आएगी और कोई सवारी ? सोचिए जरा।”

अगमलालजी ने सोचकर देखा-और बिलोमंगल को मान गए। इसलिए गाँव के कई तथाकथित शुभचिन्तकों ने एकान्त में आकर अब अमुक-अमुक व्यक्तियों के चरवाहों पर मुकदमा कर देने की गुप्त सलाह दी, तो उन्होंने इन्कार कर दिया-कौन देगा उसकी गवाही ? चश्मदीद गवाह कहाँ मिलेंगे ? नहीं-नहीं।

उन्होंने जो करना है, उसका फैसला कर लिया है।

अगमलालजी ने विचार कर देखा-अभी 'मेला-तमाशा' शुरू होनेवाला है। तीन महीने तक 'प्रेस' में खूब 'ओवरटाइम' काम रहता है।

उसके बाद ही शुरू हो जाएगा एलेक्शन का काम।

वोटर-लिस्ट छपाई के दिनों दस-पन्‍्द्रह रुपए रोज 'ऊपरी - आमदनी' हो जाती है...फिर खेती के नए अनुभवों के आधार पर वह "गेहूँ की सफल खेती' से भी अच्छी पुस्तिका लिख ले सकता है।

इन पैसों को जमा करके अगमजी सबसे पहले एक गुजराती भैंस खरीदेंगे-धर्मगंज के मेले में। इसके बाद, गंगाजी के मेले से बनबाँस की मज़बूत लाठी खरीद लावेंगे। तब कलम को छोड़कर लाठी गहेंगे और भैंस चरावेंगे, दूध पीएँगे, डंड पेलेंगे..लाठी को तेल नहीं...धी पिलाकर लाल बना लेंगे और तब खेती करने के लिए खेत पर उतरेंगे!...अभी शहर लौट जाना ही श्रेयस्कर है।

गाँव छोड़कर पुनः शहर की ओर आने के दिन बिलोमंगलजी ने उनकी यात्रा को 'शुभ' करने के लिए कहा-“बाबू साहेब! आपने हमको साल-भर के लिए बहाल किया था।

अब आप बीच में ही हमको छोड़कर जा रहे हैं! क्या यही 'इंसाफ' हैः... खैर, आपकी जो मर्जी मगर मेरी एक अरजी है कि आप हमको भी अपने साथ ले चलिए। वहाँ जब आपको काम मिल गया है, तो मेरा भी कहीं-न-कहीं 'डौल' लग जाएगा।

और कुछ नहीं तो आपके दुश्मनों की “यात्रा' तो रोज खराब कर ही सकता हूँ। कहावत है कि काना आदमी सेवक रहे तो मालिक की यात्रा को शुभ और मालिक के दुश्मनों की यात्रा अशुभ करता है। वैसे आपकी मर्जी!”

अगमजी बिलोमंगलजी के साथ आज ही सुबह की गाड़ी से शहर वापस चले गए।

पार्टी का भूत

यारों की शक्ल से अजी डरता हूँ इसलिए किस पारटी के आप हैं? वह पूछ न बैठे।

सूखकर काँटा हो गया हूँ। आँखें धँस गई हैं, बाल बढ़ गए हैं। पाजामा फट गया है।

चप्पल टूट गई है। आशिकों की-सी सूरत हो गई है। दिन में चैन नहीं, रात में नींद

नहीं आती। आती भी है तो बुरे सपने देखकर जग पड़ता हूँ। जी नहीं, आप जो

सोचते हैं-वह बीमारी नहीं। यदि वह रहती तो कम-से-कम बेकारी और इन्तजारी में मजे तो लूटता। यह तो 'राँची' का टिकट कटानेवाला रोग है। चूँकि यह दिन दूर नहीं, इसलिए अपनी बीमारी का इतिहास प्रकाशित कर देना, मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ।

क्योंकि इसके बाद 'न जाने मैं कहाँ और तू कहाँ, की दशा में यह सम्भव नहीं। बात यह है कि मेरे सिर पर 'पार्टी का भूत' सवार है। इसने मुझे कहीं का न रखा। बहुत कम उम्र से ही इसने मुझे अपना शिकार बना लिया है।

पाठशाला से ही प्रारम्भ करता हूँ।

एक दिन पिताजी के पास बैठकर 'आमोद-पाठ' पढ़ रहा था। गाँव की पाठशाला के गुरुजी आए।

बहुत देर तक इधर-उधर की बातें करने के बाद गुरुजी ने नम्रतापूर्वक दाँत निपोरते हुए पिताजी से कहा- "लड़ाई-झगड़ा जो कुछ भी है, आप लोगों में है। मेरा क्या कसूर है।

आप लोग बड़े आदमी ठहरे। जिस प्रकार एक जंगल में दो सिंह, उसी प्रकार एक गाँव में दो...हें ...हें ...यह तो भगवान का नियम है।

लेकिन पाठशाला तो कुछ उनकी (विरोधी पार्टी के नेता की) नहीं है।

पाठशाला में तो मैं हूँ, मेरे लिए जैसे आपके बच्चे..." "आप नहीं समझते पंडितजी," पिताजी ने बात काटते हुए कहा-"पाठशाला उसी पार्टी की है। अपने लड़के की बात छोड़िए, गाँव के लड़कों को भी मैं उसमें नहीं भेज सका तो इसमें हमारी पार्टी की बेइज्जती है।"

गुरुजी ने पुनः दाँत निपोरते हुए कहा-"सो तो है, सो तो है।

मैं तो... आप

विश्वास कीजिए...में तो आपकी सेवा करना चाहता हूँ।" गुरुजी बलपूर्वक खाँसकर, इधर-उधर देखकर पिताजी से निम्न स्वर में कुछ तथ्य की बातें करने लगे। फল यह हुआ कि मुझे और मेरे गाँव के लड़कों को पाठशाला. में पढ़ने जाने की आज्ञा मिल गई।

दूसरे दिन मैं अपने साथियों के साथ पाठशाला में दाखिल हुआ।

गाँव-समाज,

पास-पड़ोस, टोले-मुहल्ले, जाति-बिरादरी में, यहाँ तक कि कचहरी की 'बार लाइब्रेरी" में भी यह खबर बिजली की तरह फैल गई। तरह-तरह के प्रश्न पूछे जाने लगे।

"तो क्या अब गाँव में एकता हो गई?" गाँव के गवाही पेशा करनेवालों ने माथा ठोंक लिया।

"अब खान-पान, शादी-ब्याह भी चलेगा ?"-बिरादरी के कर्णधारों के पेट में चूहे कूदने लगे।

"यह जो फौजदारी चल रही है, इसको उठा लिया जाएगा-क्या?" बकीलों ने लम्बी साँस ली।

किन्तु हुआ कुछ भी नहीं। पार्टियाँ बनी रहीं और पाठशाला में पार्टी कायम हुई।

छुट्टी के बाद ढेलेबाजियाँ, छोटी-मोटी लड़ाइयाँ, मार-पीट होने लगी।

गुरुजी की छड़ी, जहाँ तक कर सकती, शान्ति स्थापित करती।

लड़ाई-झगड़े में मैं सक्रिय रूप से न तो भाग ही लेता था और न मुझ पर गुरुजी की छड़ी ही पड़ती थी, पर इसमें सन्देह नहीं कि मैं अपनी पार्टी की विजय चाहता था। मन्त्रणा दिया करता था। इसलिए मेरे लड़ाके, मुझे अपना 'हीरो' समझते थे।

इन लड़ाई-झगड़ों के बीच, एक दिन पाठशाला में दाखिल हुई 'चन्दू', विरोधी पार्टी की एकमात्र कन्या उस दिन छुट्टी के बाद मैंने अपनी पार्टी के लड़कों को समझा दिया कि लड़ाई-झगड़े से कोई फायदा नहीं, उसी दिन से लड़ाई-भिड़ाई बन्द हो गई। उसी पार्टी की ओर से एक आध बार इसकी चेष्टा हुई भी, पर इस पार्टी की लापरवाही देखकर वे हतोत्साहित होकर चुप रह गए।

आज 'यौन विज्ञान' की कुछ पुस्तकों को पढ़कर अच्छी तरह समझ गया हूँ कि उन दिनों 'चन्दू' की ओर मैं इतना आकर्षित क्यों हुआ था। 'लैला मजनूँ' की कहानी तो पाठ्य-पुस्तकों में नहीं थी, पर इतिहास कथामाला में 'पृथ्वीराज-संयुक्ता' की कहानी मैंने अवश्य पढ़ी थी।

मैं पृथ्वीराज की तरह 'चन्दू' को प्राप्त करना चाहता था। एकान्त में एक दिन मौका पाकर, मैंने चन्दू से कहा - "चन्दू! पृथ्वीराज और संयुक्ता की कहानी...

"मुझसे मत बोलो! तुम उस पार्टी के हो। हटो।" -उसने डाँट बताई। "नहीं, नहीं-मैं उस पार्टी का नहीं हूँ।" मैंने गिड़गिड़ाकर कहा। "तब?"-वह जाते-जाते रुक गई।

"मैं तुम्हारी पार्टी का हूँ।"-मैंने कह दिया। "सच?"-वह मैरे पास चली आई। मैंने उसका हाथ पकड़कर कहा-"सच।

फूल की झाड़ी में, मेरी पार्टी का हटूटा-कटूटा लड़ाकू रजना छिपा हुआ बैठा था। उसने प्रकट होकर, दाँत पीसते हुए भेरी ओर देखकर कहा- "धोखेबाज!"

मेरी संयुक्ता और पृथ्वीराज की कहानी अधूरी रह गई। चन्दू हाथ छुड़ाकर चली गई।

पृथ्वीराज के बदले, इतिहास में सिर्फ रामकथा पढनेवाले भी, मुझे जयचन्द कहने लगे।

हा.ई. स्कूल।

पाठशाला की पढ़ाई समाप्त करके शहर के हा.ई. स्कूल में पहुँचा।

सौभाग्यवश

या दुर्भाग्यवश मेरे पिताजी के वकील एक बंगाली सज्जन थे।

अपने मुवक्किल के पुत्र को आपने सहर्ष अपने परिवार में सम्मिलित कर लिया।

बंगालियों से घनिष्ठता तो हुई ही, साथ ही बंगला भाषा और बंगला-संगीत की ओर भी मैं झुका। दो-तीन बर्षों के बाद तो स्वयं मुझे सन्देह होने लगा कि मैं अ-बंगाली हूँ! कुछ दिन के बाद ही 'बंगाली-अबंगाली' की लड़ाई छिड़ी। दोनों ओर से खुलकर गालियाँ दी जाने लगीं।

अबंगाली कहते-"बंगाली जाति डरपोक! नीच!"

बंगाली प्रत्युत्त्र में कहता-"छातूखोर, खोट्टा। "

क्रोधित अ-बंगाली सीमा का उल्लंघन कर जाते।

गालियाँ सुनकर मैं सिहर पड़ता।

छीः रवीन्द्र, जगदीश वसु, शरतू और सुभाष भी तो बंगाली हैं!!

बंगाली भी ईंट का जवाब पत्थर से देता। मेरे अन्दर का अ-बंगाली बंगाली को डाँट देता।

बंगाली मित्रों ने मेरे सम्बन्ध में राय दी-"जाइ होक, हिन्दुस्तानी शेषे हिन्दुस्तानी ई!"

अ-बंगाली दोस्तों ने मेरी पीठ कोंचते हुए कहा, कहो-"देख लिया न इनकी दोस्ती! कमीना कौन..." चुप भी रहो।-झल्लाकर इनका भी मुँह बन्द कर दिया।

"यह बात है?"-कहकर अ-बंगालियों ने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास कर ही दिया-"बंगालियों की गाली की हम परवाह नहीं करते क्योंकि वे जो कुछ कहते या प्रान्तीयता के नाम पर।

किन्तु, अ-बंगाली होकर भी जो बंगालियों का पक्ष लेते हैं, वे दगाबाज हैं, मक्कार हैं, मीरजाफर हैं। हमें वैसे व्यक्तियों से कोई सम्बन्ध नहीं रखना चाहिए।"

कॉलेज की कहानी जरा लम्बी है, मगर है दिलचस्प।

स्कूल से इन विशेषणों से विभूषित होकर कॉलेज में पदार्पण किया।

प्रान्तीयता के फेर में न पड़ने की प्रतिज्ञा मैंने पहले ही कर ली थी।

'फर्स्ट-ईयर' तो देखते-सुनते बीत गया। सेकंड-ईयर में पहुँचकर मैंने चोला बदलने की सोची। विशेष कोई परिवर्तन नहीं, सिर्फ धोती छोड़कर पाजामे में आ गया और डेढ़ इंच गले की पट्टीवाला लम्बा कुर्ता बनवा लिया। एक शुभ दिन को वेश बदलकर सिनेमा-हाउस की यात्रा मैंने की। ताँगे पर बैठे हुए मेरे सहयात्री सज्जन ने।

मेरा नाम, इयर, कम्बीनेशन, होस्टल और रूम नम्बर पूछने के बाद जब पूछा कि आप किस पार्टी को 'बिलोंग' करते हैं!" तो मैं घबरा गया।

"सी.पी. (कम्यूनिस्ट पार्टी)?" उन्होंने मुस्कुराकर पूछा।

"जी हाँ।" मैंने पाँच मिनट का मामला समझकर कह दिया।

"आई-सी"-कहकर हँसते हुए उन्होंने बेरहमी से एक धौल जमा दिया। मैं चौंक पड़ा।

"वी आर कामरेड्स, डरो मत।"-वे, मेरे कन्धे पर हाथ रखकर प्यार-भरे शब्दों में, बोले।

उस दिन 'काश्मीर-केबिन' का बिल तो उन्होंने चुकाया, सिनेमा के फर्स्ट-क्लास का टिकट भी खरीद दिया।

दूसरे दिन ज्यों ही क्लास में पहुँचा, मेरे अन्तरंग मित्र विनोद ने आकर मुस्कुराते हुए कहा-"वाह! पक्के सोशलिस्ट मालूम पड़ते हो?"

मैंने कहा-जो भी कह डालो?" विनोद बोला-"जो भी कह डालो नहीं, होना होगा"

"क्या होना होगा?"- मैंने आश्चर्यित होकर पूछा।

"मेम्बर! और क्या? मैं तो समझता था कि तुम किसी पार्टी-पालटिक्स से दिलचस्पी नहीं रखते।

लेकिन देखता हूँ तुम कोरे नहीं हो वह मुस्कुराने लगा।

मैं आज भी नहीं समझ पाया हूँ कि विनोद ने मुझमें किन गुणों को देखकर पार्टी से दिलचस्पी रखनेवाला पक्का व्यक्ति समझा।

जो भी हो, जिस दिन मेरा नाम स्टूडेंट फेडरेशन (कम्यूनिस्ट-्रुप) के रजिस्टर में दर्ज हुआ उसी दिन मेरे पास यह भी सूचना आ गई कि मैं स्टूडेंड फेडरेशन (सोशलिस्ट-प्रुप) की वकिंग कमिटी में ले लिया गया हूँ।

सिर्फ दो ही पार्टियों की बात रहती तो कोई बात नहीं थी, एक दिन तीसरी पार्टी के भी चक्कर में पड़ गया।

"क्यालक्याटा-क्याफे (साइनबोर्ड के अनुसार) में बैठकर चाय पी रहा था।

मेरे हाथ में बंगला की एक मासिक पत्रिका थी। मेरी बगल में मेरी ही उम्र के एक सज्जन चाय पी रहे थे। उन्होंने कई बार मुझे और मेरी हाथ की पत्रिका को घूरकर देखा और अन्त में पूछ ही लिया-"आपनी बांगाली?" छातुखोर की उपाधि से बचने के लिए मैंने कह दिया-"आग्ये हाँ।"

ओ! एखाने पोड़ेन? की पोड़ेन:?"

सेकेंड इयर आर्ट्स।"

"भालो" कहकर उन्होंने काफे के एक कोने में बैठकर बहस करते हुए युवकों को पुकारकर कहा-"उहे! हाबू, भोला, कालू नीलू, फेला! तोमरा से दिन बलले जे सेकेंड इयर आर्ट्स से कोनों मेम्बर नाय। एइजे इनी..."

"ताइना की ताइना की"-कहते हुए ये सबके सब बहस छोड़कर दौड़ आए और मुझे घेरकर बैठ गए। फिर चाय का आर्डर हुआ, बातें हुई, मिलने-मिलाने के वादे हुए। आ्गेनाइज करने पर जोर दिया गया सबसे मजे की बात तो यह रही कि मैं उन लोगों की पार्टी का नाम जाने बिना भी, हाँ-हाँ, करता गया।

उसमें से एक युवक ने बढ़कर मैनेजर से कुछ कहा फिर मेरे पास आकर धीरे-से बोला-आज धेके कनसेशन। बुझलेन! पार्टीर काफे तो! एरा जानतो ना जे आपनी ब्लाकेर मेम्बर। उस दिन से फारवर्ड ब्लाक के नाम पर 'क्यालक्याटा क्याफे में मैं कनसेशन रेट पर 'चाय कटलेट' पाने लगा।

रविवार को आराम से लेटकर 'गोदान' पढ़ रहा था कि विनोद ने, धड़धड़ाते हुए, आकर कहा-"अजी ओ वर्किंग कमिटी के मेम्बर साहब! कुछ पता भी है? कामरेड रामप्रताप आ रहे हैं।

आज कमिटी की अर्जेंट मीटिंग है, चार बजे। समझे! और कल पार्क में सभा होगी।..अरे! यह क्या पढ़ रहे हो, गोदान? सिली!" *क्यों? मैंने महान आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा।

"इट्स ए रिएक्शनरी बुक!...अच्छा चार बजे आते हो तो?" - कहकर वह जैसे आया था वैसे ही चला गया और मैं डिक्शनरी उठाकर 'रिएक्शनरी" का अर्थ ढूँढ़ने गया। ठीक साढ़े तीन बजे मैं सज-धजकर निकला।

फाटक पर एक प्रियदर्शिनी अप-टु-डेट' युवती माली से पूछताछ कर रही थी। मैंने अपनी चप्पल से लेकर पंजाबी तक पर सरसरी निगाह डाल ली।

माली ने मुझे देखते ही मेरी ओर दिखाकर कहा-"वही हैं।" बह मुस्कुराती हुई बढ़ी, मेरे पास आकर एक 'कामरेडी अभिवादन करके मेरे हाथ में एक पत्र देकर बोली, "अरजेंट लेटर"।

मैंने पत्र खोलकर पढ़ा- .सोशलिस्ट लीडर रामप्रताप आ रहे हैं।

अपनी पार्टी ने उसे चार स्टेशन बढ़कर

काला झंडा दिखाने का प्रस्ताव पास किया है। आप मिस रोस्सा के साथ अभी चले जाइए। कल सुबह से ही वहाँ के मेम्बरों को लेकर प्लेटफार्म पर तैयार रहिएगा। पंजाब मेल के आते ही 'रामप्रताप मुर्दाबाद' आदि पार्टी के नारों के साथ काला झंडा दिखा दीजिएगा।

सेक्रेटरी।" पत्र समाप्त करके मैंने प्रतिवाद के लिए, आँखें जो उठाईं, तो सारा शरीर पुलकित होकर रह गया। मैंने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी कि मिस रोस्सा जैसी सुन्दरी, मेरी ओर कभी उस मोहक दृष्टि से देखेंगी। नेपोलियन एक आला दिमाग का आदमी था, मानना पड़ा। मैंने फिर एक बार आँखें उठाईं। वह मुस्कुराती हुई, मिश्री से भी मधुर स्वर में बोली- "चल रहे हैं न?"

"चलिए। मैंने मस्ती में झूमते हुए कहा। ताँगे पर बैठकर हम लोग स्टेशन की ओर चल पड़े। कुछ क्षण के लिए मानों मुझे। होश हुआ-यह मैं क्या करने जा रहा हूँ। जिनके लिए मेरे हृदय में अगाध श्रद्धा है। उन्हीं का अपमान...? वह भी बेमतलब का। नहीं-नहीं, यह मुझसे नहीं होने का। "आप सिगरेट नहीं पीते?"

"... ... ... " "जी?...जी नहीं।-मेरा ध्यान भंग हुआ। "क्या सोच रहे थे कामरेड?"-उसने मेरी-ऑँखों में आँखें डाल दीं। "सोच रहा था कि...जी मैं कुछ नहीं सोच रहा था।" मेरी आँखें बरबस झजक गई। "जाइए, मैं नहीं विश्वास करती। आप सोच तो कुछ जरूर रहे थे। मुझसे मन। की बात क्यों छिपाते हैं? खैर, आप जो भी सच रहे हो।...क्या आप सिगरेट...एकदस

नहीं पीते?"

"जी" एकदम माने...एकदम नहीं।

पीने का आदी यानी 'हैविच्युएटेड' नहीं हैं।

"तो पीजिए न!"-उसने अनुनय-भरे स्वर में कहा।

ताँगेवाले ने उतरकर सिगरेट का टीन ला दिया। टीन काटकर अदा से मेरी ओर सिगरेट बढ़ाने और माचिस जलाने तक की क्रिया उन्होंने ही की। सिगरेट सुलगाकर मैंने पूछा-"और आप?"

मैं नहीं पीती। किसी खास सिनेमा स्टार की तरह उसने बड़े अन्दाज से गरदन हिलाई। मैं मुँह बाये देखता रहा।

"आपके आश्चर्यित होने का कारण मैं समझ रही हैँ। बात यह है कि कई चीजों के सम्बन्ध में मेरी खास राय है।"-पूछिए तो कहूँ की मुद्रा बनाकर वह मुस्कुराती रही।

"जैसे?"- मैंने, सिगरेट का धुआँ बाहर की ओर फेंकते हुए, पूछा। "धुआँ उधर क्यों फेंक रहे हैं?"-उसने उलाहना दिया। "तो किधर फेंकू?"

"नहीं। मेरी ओर फेंकिए!-बच्चों की भाँति वह मचलकर बोली। "आपकी ओर?" ति।

"जी हाँ। मैंने अभी कहा न कि कुछ चीजों के सम्बन्ध में मैं खास राय रखता हूँ।

सिगरेट को ही लीजिए न। मैं तो बिना सिगरेट के धुएँ की सुगन्ध के, पुरुषा के साथ की आशा भी नहीं कर सकती।

सिगरेट पुरुषों के पीने की चीज है और उसका सुगन्ध स्त्रियों के उपभोग की चीज है।" अपनी राय नम्बर एक को वह दड़ग गम्भीरतापूर्वक सुना गई। मैं सिगरेट की फिलासफी में इबकियाँ लेने लगा। दुनिया को भूल गया। वह फिर बोली-"और दूसरी राय मैं नहीं बताती। मैं रूठ गई, मनाओ साजन' की मुद्रा उसने बनाई।

"बतलाइए न!" मेरी बोली में भी रंग उतर आया।

"पहले आप बतलाइए कि आप उस समय क्या सोच रहे थे?"

मैं सोच रहा था...

"हाँ-हाँ, कहिए।"

"क्या बताऊँ?"-मैंने उसकी ओर देखकर मुस्कुरा दिया।

"आप बड़े वो हैं। ऐसी बातें करते हैं, मानो नए और कोरे मेम्बर हों।" मैं सोच रहा था कि मैं...आप..."

"बस, मैं समझ गई।"-वह खिलखिला पड़ी। इतनी देर के बाद मुझे दुनिया, सड़क, राही, दुकान और ताँगेवाले की याद आई। अप्रतिभ होकर इधर-उधर देखने लगा।

"बगल क्या झाँक रहे हैं। आप बताना तो खूब जानते हैं।

बड़े आए हैं दुनिया की ओर इशारा करके मेरी परीक्षा लेने। सुनिए, मेरी दूसरी राय पुरुषों की दाढ़ी के सम्बन्ध में है। मैं 'डेली शेव' (दैनिक हजामत) के पक्ष में नहीं।

एक दिन के बाद एक दिन की बनी हुई दाढ़ी...।"

'सिगरेट-धुआँ-फिलासफी' से बह 'दाढ़ी-फिलासफी' जरा कम गहरी थी। मैं गड़ाप से जमीन तक पहुँच गया। मेरे मुँह से निकल ही पड़ा- "माई गॉड..." फिर तुरन्त स्मरण हुआ कि हम कम्युनिस्ट हैं और भगवान की लीला देखिए कि आप ही आप शब्द पूरा हो गया ...रेज' पर जाकर। माइ-गाडरेज! मतलब?"- वह पूछ बैठी।

"गाडरेज! गाडरेज नम्बर एक, चाबी ट्रेड मार्क, स्वदेशी याने 'गाडरेज शेविंग-स्टीक' - मैंने अपनी हाजिर-जबाबी के लिए मन-ही -मन भगवान को धन्यवाद दिया। "ओ! दाढ़ी बनाने की बात सुनकर आपको शेविंग-स्टीक की बात याद आ गई। क्या आप गाडरेज यूज करते हैं?"

"जी।-मैंने थककर संक्षिप्त उत्तर दिया। "लेकिन..." ताँगा स्टेशन पर पहुँच चुका था। ताँगेवाले ने टोका-हुजूर, गाड़ी प्लेटफारम पर लग गई। ट्रेन में बैठकर, कुली को पैसे देने के पहले उन्होंने सिगरेट का टीन मेरी ओर बढ़ाया। गाड़ी ने सीटी दी और मैंने 'भक्क' से खिड़की के बाहर धुआँ फेंका तथा अपनी गलती के लिए आँखों से ही क्षमा माँगकर, लगातार चार-पाँच बार उनके चेहरे पर धुएँ का गुब्बारा फेंक दिया। उसकी आँखें धुएँ के मीठे अत्याचार को सहती हुई, झिप गई, पर उसकी लम्बी नुकीली नाक, पुलकित होकर सिगरेट-सौरभ उपभोग करती रही।

दूसरे दिन प्रातःकाल।

गाड़ी आकर प्लेटफार्म पर लगी। और मैंने, अपनी पार्टी के दो दर्जन मेम्बरों (जिनमें अधिकांश किशोर और किशोरियाँ थी) के साथ नारा लगा ही दिया "रामप्रताप मुर्दाबाद।" काले झंडों से प्लेटफार्म भर गया।

रामप्रताप, कांग्रेस का पुछल्ला!"-यह नारा मिस रोस्सा ने लगाया। "रामप्रताप, कांग्रेस का दुम!" मैंने इसका हिन्दुस्तानी अनुवाद कर दिया। यह तो नारा लगाने और झंडा दिखाने की बात थी, मिस रोस्सा के इशारे पर जो मैं किसी की गर्दन तक मरोड़ सकता था। एक-से-एक वजनी नारे लग रहे थे कि पक कम्पार्टमेंट का दरवाजा खुला।

भव्य ललाट और प्रभावोत्पादक व्यक्तित्व लिए एर व्यक्ति दरवाजे के पास आकर खड़ा हो गया तथा मन्द-मन्द मुस्काने लगा। उस मुस्कान को पवित्र मुस्कान कह सकते हैं। "यही है, यही है।" रोस्सा बोली। "हूँ...।"

"रामप्रताप मुर्दाबाद। रोस्सा ने नारा लगाया। "....." मैंने क्या दुहराया, यह मेरी समझ में नहीं आया। गाड़ी चल पड़ी। वह व्यक्ति, उसी तरह मुस्काता, खड़ा रहा। "लेकिन चेहरे पर जरा भी शिकन...।" मैं कह ही रहा था कि रोस्सा बात काटकर बोली-"अरे गांधी का चेला है न! सब पोपबाजी गांधी से इन लोगों ने सीखी है। जूते खाकर मुस्कुराना। हिस्! रंगे सियार!! बड़े चले हैं समाजवादी बनने! क्रान्ति करेंगे। ढोंगी।"

होस्टल पहुँचने के बाद मैं दो बातों की आशंका कर रहा था। प्रथम , विनोद से मैत्री-विच्छेद की, दूसरे इस पार्टी की ओर से अपने नाम 'रटी-स्टाई', 'छपी-छपाई' गालियों की। कुछ हो जाता तो कम-से-कम पिंड छूटने की उम्मीद थी। पर हुआ कुछ भी नहीं। विनोद ने आकर अनुपस्थिति के लिए उलाहना-भर दिया और घंटों सभा की सफलता की बातें करता रहा।

एक-दो महीने तक यही रवैया जारी रहा। कभी-कभी तो पढ़ाई-लिखाई छोड़कर भाग जाने की इच्छा होती। एक ही साथ तीन-तीन पार्टियों का मेम्बर होकर आखिर कब तक कोई अपनी इज्जत को सलामत रख सकता है।

'कलकटा काफे' के कनसेशन और क्रेडिट के आगे सभी पार्टियों को कुबान करने जाता, तो मिस रोस्सा की रसभरी आँखें राह रोककर खड़ी हो जातीं। एक दिन 'ब्लाक के एक मेम्बर ने मुझे एकान्त में ले जाकर एक बंगला हैंड बिल' दिया और उसका हिन्दी अनुवाद करने का भार सौंप दिया। मैंने अनुवाद कर दिया। रात-भर में ही उसकी छपाई-सफाई भी हो गई। दूसरे दिन सुबह-सुबह मैं चौक से वापस आ रहा या। ताँगा रोककर हँड बिल' का दो गट्ठर मुझे चुपचाप सुपुर्द कर दिया गया। बँटवाना भी पड़ेगा।

बाँटनेवाले न मिलें, तो खुद बाँटना भी पड़ेगा, यह था पार्टी का आदेश।

एक जमाना था, जबकि माता-पिता के आदेश को विशेष महत्त्व दिया जाता था, माता-पिता के आदेश पर लोग जंगल की खाक तक छानते थे।

पर इस वैज्ञानिक युग में पार्टी के आदेश को ही विशेष महत्त्व दिया गया है। माता-पिता की आज्ञा का उल्लंघन करना तो क्रान्तिकारियों का धर्म ही है। सो इन परचों में गर्मागर्म बातें हों या 'एटम-बम' हों, बाँटना या बँटवाना पड़ेगा ही। ताँगा दूसरे चौराहे के पास भी नहीं पहुँचा था कि किसी की मीठी पुकार सुनाई पड़ी-'कामरेड।"

मिस रोस्सा! वह अपने ताँगे पर से उतरकर मेरे ताँगे पर आ गई। मानो मेरे ही लिए जोगन-सी वन-वन भटक रही थी। हम लोग सिलसिले से बात करने का पोज बना ही रहे थे कि दस कदम पर फिर ताँगा रोका गया। इस बार की रुकावट आखिरी रुकावट थी। सी.आई.डी. इंस्पेक्टर महोदय थे। हम दोनों को साथ पाकर आपने बेहद खुशी जाहिर की।

उन्होंने आवश्यकता से अधिक नम्र होकर फर्माया-"माफ कीजिए, आप लोगों की तलाशी लूँगा।" पास ही कोतवाली का एक छोटा दफ्तर था। हम लोग वहीं ले जाए गए। बाजाप्ता तलाशी होने लगी। मिस रोस्सा के हैंड बेग से कुछ सुगन्धित चिट्ठियाँ मय लिफाफे के निकलीं। मैंने आँखें बचाकर एक पत्र को देखा। शीर्षक था 'मेरी रानी'। कलेजा तो धड़क रहा था ही, आँखों की रोशनी भी गायब हो गई। जब गट्ठरों की बारी आई तो मैं धम्म से एक टूटी कुर्सी पर बैठ गया। गट्ठर खुलने लगे। पुलिसवालों की बाँछे खिल गईं-"हियर यू आर।" “कहिए साहब, इन गट्ठरों में शृंगार की सामग्रियाँ और साड़ियाँ थीं न? ये पर्चे कहाँ से आ गए"-इंस्पेक्टर साहब ने मुस्कुराते हुए चुटकी ली। मैं चुप रहा। रोस्सा पीली पड़ गई, उसके मुँह से एक हल्की-सी चीख निकल पड़ी-“मेन्सेविख!!"

हम लोग स्थानीय जेल में पहुँचा दिए गए। 'लेडिज-वार्ड' की ओर जाती हुई क्रान्ति की मूर्ति मिस रोस्सा फूट-फूटकर रो पड़ी। जेल में पहुँचकर मैंने राहत की साँस ली। दूसरे दिन एक पत्र में निकला-“स्टुडेंट-फेडरेशन (कम्यु. ग्रुप) के सदस्य कामरेड पी. राय तथा मिस रोस्सा आपत्तिजनक पर्यों के साथ गिरफ्तार!" दूसरे पत्र में खबर छपी-"स्टुडेंट-फेडरेशन (सोशलिस्ट ग्रुप) की कार्यकारिणी तीसरे पत्र ने लिखा-“अग्रगामी दल के प्रसिद्ध बंगाली कार्यकर्ता मिस्टर राय यदि सच पूछा जाए तो प्रथम श्रेणी के राजनैतिक बन्दियों को घर से भी बढ़कर जेल में आराम रहता है। खाना-सोना, पढ़ना-लिखना। किसी बात की फिक्र नहीं। समिति के सदस्य कामरेड प्रफुल्ल आपत्तिजनक पर्यों के साथ गिरफ्तार।"

तीसरे पत्र ने लिखा-"अग्रगामी दल के परस्थिद बंगाली कार्यकर्त्ता मिस्टर राय सरकार के मेहमान बना लिए गए। " यदि सच पुछा जाए तो प्रथम राजनैतिक बंदियों को घर से भी बढ़कर जेल में आराम रहता है। खाना-सोना पढ़ना-लिखना। किसी बात की फ़िक्र नहीं। सो जिन्दगी के दिन चैन से कटने लगे। रोस्सा तो दो दिन के बाद ही छोड़ दी गई। पर अदालत ने मुझे तीन वर्ष की लम्बी सजा दे दी। सोचा था, पार्टी के भयंकर भूत से पीछा छूटा। लेकिन 1942 का देशव्यापी आन्दोलन छिड़ा।

जेल खचाखच भर गई। देखते ही देखते पार्टी की बीमारी भी फैल गई। मुफ्त का खाना, आराम से सोना और गला फाड़कर बहस करना-बस। जेल में कम्युनिस्टों की संख्या नहीं के बराबर थी। वे अपनी दाल गलाने की चेष्टा करने की भी हिम्मत नहीं करते थे। गांधी बाबा के भक्तगण तो चर्खा चलाने के सिवा अध्ययन, पठन-पाठन को भी पार्टी की ही चीज समझते थे।

अतः वे इन झंझटों से कोसों दूर रहते थे। बहस करना तो दूर, जेल अधिकारियों के दुर्व्यवहारों के खिलाफ आवाज उठाने को भी वे हिंसा करार देते थे। सोशलिस्टों का बहुमत था और मैंने अपने को सोशलिस्ट कहने में ही अपना कल्याण समझा। कुछ दिनों के बाद मालूम हुआ कि कम्युनिस्ट पार्टीवाले अपने मेम्बरों की रिहाई के लिए अथक परिश्रम कर रहे हैं। उनके सुकर्मो को देख-सुनकर पूरा भरोसा हुआ कि वे अपने मेम्बरों को अवश्य छुड़ा लेंगे। अतः एक दिन छिपकर कम्युनिस्टों को याद दिला आया कि वे मुझे भूल न जाएँ। यों तो जेल में किसी प्रकार की तकलीफ नहीं थी फिर भी अपनी मुक्ति के लिए दिन-रात छटपटाया करता था। जेल से मुक्ति का अर्थ था पार्टी के दलदल से मुक्ति।

इस दलदल से निकलने के लिए मैं जितनी ही चेष्टा करता था, उतना ही उसमें फँसता जाता था। दिन-भर भौतिकवाद पढ़कर ईश्वर की सत्ता को मिटाया करता था और रात में मसहरी के अन्दर भगवान से अपनी मुक्ति के लिए घंटों रो-रोकर प्रार्थना किया करता था। भगवान ने मुझ जैसे अनन्य भक्त की प्रार्थना सुन ली।

मैं बीमार पड़ा। बीमारी ने रंग दिखलाया। पत्रों ने बारी-बारी से मेरी मुक्ति की माँग की। सरकार का ध्यान आकर्षित हुआ और मुझे, समुचित चिकित्सा के लिए जेनरल हॉस्पिटल भेज दिया गया। चिकित्सा होने लगी। वजन बढ़ने लगा, बुखार घटने लगा और सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि पार्टी के भूतों से पिंड छूटा। ए.आर.पी. ट्रोनंग के लिए आई हुई सुशिक्षित प्रियदर्शिनी बंगालिन नर्से मेरी तीमारदारी करती थीं। मैंने देखा कि वे सबकी सब मुझसे खिंची रहती हैं। एक दिन बड़ी चतुराई से इस मन-मुटाव के कारणों को जानने की चेष्टा की तो-पंचतन्त्र की उस चक्रवाली कहानी की तरह- सिर पर पार्टी का चक्र सवार होकर नाचने लगा। मुझे गांधीवादी समझकर वे मुझसे चिढ़ती थीं क्योंकि गांधीवादियों ने सुभाष बोस को धोखा दिया था। मैंने, एक अज्ञात प्रेरणा से प्रेरित होकर गांधीवादियों की जरा निन्दा कर दी और उन लोगों ने मुझसे सैकड़ों प्रश्न पूछकर पता लगा ही लिया कि मैं फारवर्ड-बलाकिस्ट हूँ। फिर क्या था, क्षण-भर चैन न पाऊँ सजनवाँ तोरे बिना के सभी लक्षण प्रकट होने लगे।

सरकार ने मुझे शीघ्र ही छोड़कर बुद्धिमानी का परिचय दिया वरना मैं एक नई बीमारी का शिकार हो जाता।

मुक्ति पाकर मैंने प्रतिज्ञा की कि किसी पार्टी की चर्चा छिड़ते ही वहाँ से भाग खड़ा होऊँगा।

चेष्टा तो मैंने खूब की पर एक पार्टी के हिमायती से भेंट हो ही गई। पुरानी जान-पहचान थी, टालना आसान नहीं था। बातें करते-करते आपने पार्टी की पिटारी खोल ही दी। 'बम्बई योजना' के विरुद्ध-राय योजना का घोषणा पत्र मेरे हाथ में देते हुए आपने फर्माया-"देखिए! यह रही कामरेड राय की योजना। बहस करने से ही कैँस जाने की पूरी आशंका थी और अपनी राय दिए गिना रायिस्ट महोदय से पल्ला छूटने की आशा नहीं। मेरे मुँह से-'अच्छी है' सुनकर ही आपने दम लिया।

घर पहुँचते-पहुँचते ही मैंने पत्रों में पढ़ा-"कामरेड प्रफुल्ल ने रिहा होकर बम्बई योजना पर वक्तव्य देते हुए बताया कि यह शोषकों की योजना है। राय योजना से इसकी कोई तुलना ही नहीं हो सकती। राय योजना सही अर्थों में शोषितों की योजना है।"

पढ़ाई-लिखाई की तो इतिश्री हो ही गई थी, घरवालों ने शादी का राग अलापना शुरू कर दिया। जेल जाने के पहले तो कन्या पक्षवालों का ताँता लगा रहता था, मैं एक कीमती सौदा समझा जाता था। किन्तु अब तो लोग मुझ-जैसे बेमतलब जेल चले जानेवाले को लड़की देना और लड़की को कुएँ में डाल देना, बराबर था। माँ और पिताजी की आरजू-मिन्नतों को मानकर मैंने अपनी राय दे दी। वुलाहट हुई। सज-धजकर पहुँचा एक दिन। भावी जामाता के अनुकूल ही आवभगत हुई। कन्या के पिता आधुनिक विचारों के कायल थे और वर्तमान संसार में रखते थे। कन्या देखने-दिखाने के बाद उन्होंने संसार की राजनीति पर भाषण देना कुछ अपनी भी राय शुरू कर दिया। वे सुना रहे थे, मैं सुन रहा था।

कुछ देर के बाद मैंने अनुभव किया कि पर्दे के उस पार खड़ी जनता मेरा प्रवचन सुनने को अधीर हो रही है। मैंने सोचा कि कहीं ऐसा न हो कि मुझे 'हाँ में हाँ' मिलानेवाला समझकर लोग छाँट दें। अपनी भावी पत्नी को देखकर मैंने कल्पना के संसार में, नए डिजाइन के कितने बंगले बना डाले थे। मुझे मैदाने-जंग में उतरना ही पड़ा। बातों का सिलसिला 'क्विट-इंडिया' तक पहुँच चुका था। मेरे भावी स्वसुर की राय थी कि कांग्रेस ने क्विट-इंडिया प्रस्ताव पास करके बच्चों की-सी गलती की। मुझे इसका विरोध करना ही पड़ा। वातावरण गर्म हो गया। पर्दे के उस पार की गर्मी का भी मैंने अनुभव किया। मेरी आवाज चौगनी हो गई और मैंने यहाँ तक कह डाला कि--"हमारी मंजिल अब दूर नहीं। 1942 के बाद देश ने..."

"सुनिए!" मेरे एकमात्र भावी साले साहब ने अपनी कोठरी से निकलकर मके रोका, मैंने उनकी जवानी पर विश्वास करते हुए कहा- "कहिए मोहन बाबू! मैं गलत कह रहा हूँ।"

वे बैठ गए और बड़ी गम्भीरतापूर्वक बोलने लगे- "देखिए प्रफुल्ल बाबू! अव तक मैं चुपचाप आपकी बातें सुनता रहा। जहाँ तक मेरी शक्ति थी मैंने अपनी आत्मपा को धोखा दिया यानी अपने को रोके रहा। लेकिन बातें यहाँ तक बढ़ गईं कि चुपचाप रहना मैंने सरासर नमकहरामी समझी।.."

"जरूर! अवश्य!"- मैंने उत्साहित होकर कहा। "आपने अन्तिम कई बातें ऐसी कही हैं कि जो सोशलिस्टों की बातें हैं। और एकदम भारत रक्षा कानून में आ जाती हैं। मेरा जहाँ तक अनुमान है कि आप किसी की ड्यूटी की महत्ता को अवश्य महसूस करते होंगे, इस अवस्था में भी मैं अपनी इ्यूटी नहीं बजा रहा हूँ यह मेरी नमकहरामी के सिवाय और कुछ नहीं तो..."-वे अपने पिता के सिगरेट केस से एक सिगरेट निकालकर सुलगाने लगे। वृद्ध ने मुस्कुराते हुए मेरी ओर देखकर कहा- "वास्तव में यह पहला मौका है कि मैंने लल्लू को गम खाते देखा।" "किस मुँह से बोलते हैं" पर्दे के उस पार से आवाज आई-"लड़के की नई नौकरी है, तरक्की के लिए कोशिश करना तो दूर, बैठे-बिठाए बमवालों से रिश्ता जोड़कर नौकरी भी ले डूबने की तैयारी कर रहे हैं। मेरी लड़की क्वाँरी रहेगी, नहीं चाहिए मुझे ऐसा रिश्ता।"

सम्भवतः यह मेरी सास साहिबा की क्रुद्ध वाणी थी। मेरी समझ आया कि माजरा क्या है। मुझे तुरन्त ही समझा दिया गया कि मोहन बाबू को खुफिया विभाग में नौकरी मिल गई है-1943 से। यह उनके दास-जीवन में पहला मौका था कि वे अपनी आँख-कान से देख-सुनकर भी भारत रक्षा विधान के मुजरिम को छोड़ रहे थे। मेरे साथ उन्होंने इतनी-सी रियायत अवश्य की कि मुझे दो घंटे का समय दिया। मैंने सिर्फ पन्द्रह मिनट में ही तैयार होकर उनका घर तो 'क्विट' कर ही दिया साथ ही शादी की रही-सही आशा को खिड़की पर खड़ी दयनीय मुद्रा बनाकर देखती रही। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में ऑँसू स्पष्ट दिखाई पड़ रहे थे; पर एक लम्बी साँस छोड़कर वापस आने के सिवाय और चारा ही क्या था! इस छोटे-से 'व्यापारिक कस्बे' को पार्टी पालटिक्स से परे समझकर मैंने यहाँ एक ओोटी-सी नौकरी कर ली। किन्तु अब आटे-दाल का भाव मालूम हो रहा है।

यहाँ तो कैकडों पार्टियोँ हैं। अपने को किसी पार्टी से अलग रखकर एक कदम भी चलना मुश्किल है। महाशय 'क से जरा हैँसकर वात कर ली कि मिस्टर 'ख' की आँखों में चढ़ जाता है। पंडित 'ग' के यहाँ ट्यूशन करने जाता हूँ तो मुंशी 'घ' मुँह फुला लेते हैं। श्रीमान 'त' एक मिल-मालिक हैं, एक दिन मैंने उनका निमन्त्रण स्वीकार कर उनके यहाँ जरा खीर क्या चख ली, कालर्ल मार्क्स का सारा 'कैपिटल' कलंकित हो गया। बड़ी-बड़ी दुकानों की बात तो जाने दीजिए, फेरी लगानेवालों की भी पार्टी है। एक दिन बाजारे से सिंगरेट अचानक गायब हो गया सिगरेट पीनेवाले लोहे की दुकानों में भी सिगरेट तलाश करते पाए जाते थे। मैंने अपने चाय और सिगरेटदाता श्री शिवजी से पूछा कि भाई तुम कहाँ से सिगरेट ले आते हो? तो उसने दाँत निपोड़कर कहा-"जी, अपनी पार्टी के लोगों के लिए क्या करें.. हें. हें ब्लेकमार्केट से...।" समझने में देर नहीं लगी कि पार्टी की बदौलत ही मैं सिगरेट पी रहा हूँ और मैं उसकी पार्टी का ही हूँ।

जब से कांग्रेस ने चुनाव लड़ने की घोषणा की है, यार लोग रंग बदल रहे हैं। जिन्होंने सरकार बहादुर के सामने प्रतिज्ञा की थी कि कभी किसी पार्टी में भाग नहीं लँगा, उन्होंने भी 1942 की धुली हुई, बक्स में बन्द, गांधी टोपी निकालकर पहनना शुरू कर दिया। 'कांग्रेस' शब्द को उच्चारण करने के पहले जो इधर-उधर देख लेते थे, वे ही आज राह रोककर चुनाव की चर्चा करने लग गए हैं। मैं भी अब अपने को किसी पार्टी का घोषित कर सकता हूँ। कम्युनिस्टों से मेरी कोई दिलचस्पी नहीं रह गई, क्योंकि मिस रोस्सा ने एक अमेरिकन सैनिक से शादी करके अपने अन्तर्राष्ट्रीय सिद्धान्त को कार्य में परिणत कर दिया है। सोशलिस्टों को लोग दामन पसारकर दुआएँ दे ही रहे हैं। ब्लाक और कांग्रेस में कोई मतभेद अब रहा ही नहीं। रास्ता साफ है। लेकिन पार्टी की चर्चा छिड़ते ही हदय की गति बन्द होने को हो जाती है। दिमाग चक्कर खाने लगता है। कुछ स्थिर भी करूँ तो कैसे दिन-भर में हजार बार प्रश्न पूछे जाते हैं- "मि. 'ड' और 'ढ' दोनों इस बार कांग्रेस के टिकट पर खड़े होने की सोच रहे हैं। आपकी राय में दोनों में से कौन 'फिट' है?"

"मिस्टर 'म' पर तो अनुशासन की कार्रवाई हुई थी?" "सुनते हैं? राजा साहब कांग्रेस के विरोध में खड़े हो रहे हैं!" "अरे साहब! श्रीयुत 'श' तो हिन्दू सभा के टिकट पर खड़े होंगे। वे तो आपके घनिष्ठ मित्र हैं। मदद तो करनी ही पड़ेगी।" आदि-आदि।

मैं एकदम चुप्पी साध लेता हूँ। मेरी चुप्पी को इतना महत्त्व दिया जाने लगा है कि प्रत्येक पार्टी के मेम्बर मुझे अपनी विरोधी पार्टी का भेद जाननेवाला समझने लगे हैं। नाकों में दम है। मैं सभी पार्टियों का हूँ, मैं किसी भी पार्टी का नहीं हैं। बिसन एक पार्टी को वरण किए बिना गुजर नहीं, पर जब प्रश्न उठता है कि 'किस को?' तो सिर चक्कर खाकर रह जाता है।

दिन में चैन नहीं, रात में नींद नहीं आती। आती भी है तो बुरे सपने देखने। लगता हूँ। देखता हूँ कि मैं सड़क पर भागा जा रहा हूँ! शहर के आवारा लड़के मे पीछे टीन बजा-बजाकर दौड़ रहे हैं। सब चिल्ला रहे हैं-"आप किस पार्टी के? आ किस पार्टी के?" मैं चिढ़कर उन लोगों को मारने दौड़ता हूँ, लड़के ढेले फेंकते हैं। तालियाँ पीटकर हैँसते हैं सड़क पर दौड़ रहा हूँ। दर्जी चिल्लाकर कहता है-"सड़क 'क' पार्टी की है!" सड़क छोड़कर पगडंडी पकड़ लेता हूँ। नाई आवाज देता है "पगडंडी 'ख' पार्टी की!"

पगडंडी छोड़कर नाले में गिर पड़ता हूँ... चौकी पर से नीचे गिरकर नींद टूट जाती है। उठने की शक्ति शेष नहीं रह जाती है। काला ज्वर से पीड़ित सेवक बुद्धन किसी तरह उठाकर चौकी पर बैठा देता है। सान्त्वना देता यह कुछ नहीं है। वह एक दिन गॉँव जाकर अपने चर्चा को बुला लाएगा। वह झाड़-फूँककर सब ठीक कर देगा। मुझे भूत लगा है। आदि-आदि। मैं भी मानता हूँ कि मुझे भूत सता रहा है। भूत-प्रेत को नहीं माननेवालों से मेरी प्रार्थना है कि वे कम-से-कम इस भूत पर अवश्य विश्वास करें।

रखवाला - फणीश्वरनाथ रेणु हिन्दी कहानियाँ

रक्त की प्यासी सभ्य दुनिया से दूर-बहुत-दूर-हिमायल के एक पहाड़ी गावं का अंचल।

छोटा-सा झोंपड़ा। पहाड़ी की ओट से छनकर आती हुई सूर्य की किरणों में छोटा-सा सरकंडे का झोंपड़ा सोने के झोंपड़े की तरह चमक रहा था।

झोंपड़े के इर्द-गिर्द केले, नारंगी, नासपाती के दरख्त, फल-फूल और हरे-पीले पत्तों पत्तों से लदे हुए। झोंपड़े के सामने एक अमरुद का पेड़, खूंटे से बंधा एक बछड़ा था।

पेड़ के नीचे बैठी वह, जंगली बेंतों और बॉस की पतली-पतली तीलियों से डोको बना रही थी।

प्यारा-सा सुकुमार बच्चा गोद में मीठी नींद ले रहा था।

किसी गीत की कड़ी को गुनगुनाती हुई वह काम कर रही थी।

उसके हाथ मशीन की भांति चल रहे थे।

बेंतों और तीलियों को काटते-संभालते गुनगुनाहट का कर्म तो रुक भी जाता, पर उसकी स्मृतियों के तार न टूटते थे।

हौं, कभी-कभी सामने की मटमैली ---धुंधली पहाड़ी की ओर नजर उठाकर देख लेती अपनी गोद में सोए प्यारे बच्चे को और पेड़ में पके अमरूदों को।

तब उसके मानस-पट पर चलनेवाले स्मृतियों के सवाक चित्रपट के एकाध अस्फुट शब्द बाहर निकल पड़ते।

और यह अमरुद का पेड़ तो एकदम बच्चा था उस समय, अब तो फलने लगा है! मन ही मन हिसाब लगाकर जोड़ती-ग्यारह ! और फिर अतीत की स्मृतियाँ, चल-चित्र के समान क्रमबद्ध चलने लगतीं - ग्यारह वर्ष बीत गए।

अमरुद का यह पेड़ और महज अट्ठारह वर्ष की थी वह! फागुन का महीना। ...

ऐसी ही धीरे-धीरे बहती हुई वासंती हवा, इसी पेड़ के पास खड़ी होकर, सजल नेत्रों से उनको विदाई देती हुई वह! पीठ पर डोको लादे, सतरंगे ऊनि कमरबंध से खुखरी को कमर में बाँधते हुए उन्होंने कहा था - रुन्छस ? दुत बावली! म च्यांदे यो डोको फ्री रुपया लियेर फरकयूँला, धीरज बहादुर को दुलहिन लाय हेरन!

तेस्को कान को झूमका, नाक को नथिया -जम्मे कलकत्ता को नै कमाई हो, कलकत्ता माँ रुपयां तैयार हुंछ.....!

(रोती हो ? दुत् पगली ! मैं जल्दी ही डोको भर रुपया लेकर लौटूंगा। धीरज बहादुर की स्त्री को देखो न! उसके कान के झुमके, नाक की नथिया - सब कलकत्ता की कमाई ही तो है। कलकत्ते में रुपए बनते हैं। ...... )

ग्यारह वर्ष पहले के विदा वेला के - आलिंगन-चुंबन को याद कर उसका हृदय धड़कने लगता, होंठ फड़कने लगते और नसों में बिजली दौड़ जाती।

गाँव का आवारा, लफंगा बलबहादुर भी उनके साथ जा रहा था। वह इसी पेड़ के पास खड़ी देख रही थी और वे दोनों सामने की उसी मटमैली, धुंधली पहाड़ी की छाया में छिप गए थे।

पेड़ पर तोता अमरुद कुतरता, वह हाथ उठाकर हिस कर उड़ाती और स्मृतियों का क्रम टूटते-टूटते फिर चलने लगता.....।

आठ वर्षों तक वह प्रतिदिन यहीं कुछ देर खड़ी होकर देखती रही थी, किन्तु उस धुंधली पहाड़ी की छाया से निकलकर कोई नहीं आया था।

कोई भी नहीं। खूंटे से बँधा बछड़ा बां-बां करने लगता, गम्भीर निद्रा में सोए हुव बच्चें को बाएं हाथ से कंधे या छाती पर चिपकाकर वह उठ खड़ी होती, बछड़े को पुचकारती-दुलारती और कोमल घास खिलाती - अरे तुम्हें इतनी जल्दी भूख लग गयी ?

कहकर प्यार से एक मीठी चपत लगाकर आसमान में सूर्य की ओर देखकर बड़बड़ा उठती - बेला ढकने को है। सुबह ही बिना खाए गया है अभी तक नहीं लौटा। उसकी रोज की यही आदत बुरी। ..... कुकुनाती हुई वह वहीं जाकर बैठ जाती और फिर स्मृतियों के देश में विचरण करने लगती है।

आठ वर्षों तक कोई न आया। ......तीसरे साल अगहन महीने में शाम को जब वह आग सुलगाकर बाछा को सेंक रही थी कि चंदू की माँ ने आकर कहा था - अरी पुणो!

बलबहादुर कलकत्ते से आया है, मांझला के आंगन में है।

सुनते ही वह नवजात बाछा को ठिठुरते छोड़कर दौड़ी थी मांझला के यहाँ।

मांझला के यहाँ बूढ़े बच्चे, लड़के लड़कियां और गावं-भर की स्त्रियां बलबहादुर को घेरे खड़ी थी।

बीच में बैठा बलबहादुर कलकत्ते की हैरत-भरी कहानियां सूना रहा था।

ट्रेम गाडी, मत्र गाड़ी। ...हवैया जहाज। .....वगैरह की अजीब-अजीब बोलियां वह हंस-हंसकर सगर्व सबको सुना रहा था। सब आश्चर्य के पुतले बने सुन रहे थे।

अचरज-भरी हंसी हंस रहे थे।

वह उसके पास न जा सकी थी। पिछवाड़े में ही खड़ी सब सुनती रही। .बलबहादुर ने कहा था ..हिरण्य दाजू (हिरण्य भैया) पलटन माँ भरती भये ...... !

सुनते ही वह कॉप उठी थी, उसके सर में चक्क्र आने लगा था। वह भाग आई थी अपनी झोंपड़ी में पड़ी-पड़ी वह लगातार कई दिनों तक आंसू बहाती रही थी।

उसकी आँखें डबडबा आई।

वह उठ खड़ी हुई। जंगल की ओर देखकर पुकारती बहादुर !!!

प्रत्युत्तर में खूंटे से बंधा बछड़ा बां-बां करता और गोदी का बच्चा रो पड़ता।

बच्चे को थपकियाँ से सुलाती वह फिर बैठ जाती और ताना-बाना बुनने लग जाती -हाँ, वह हफ्तों पड़ी रही थी।

और यह बलबहादुर! उसे कभी भी भला नहीं लगा था यह बलबहादुर! बचपन से ही वह उसे जानती थी, उसे सैकड़ों बार गालियां दे चुकी थी।

गावं की सभी लड़कियां उससे घृणा करती थीं।

वह जंगल में लड़कियों को छेड़ता था। ....लेकिन उस दिन अपने को समझा-बुझाकर वह उठ बैठी थी।

बैठी-बैठी गीत की एक कड़ी गुनगुना रही थी - तिमीत आयो लखन, दाज्यु लाय कहाँ छोड़े ? (तुम तो आए लक्ष्मण, पर भाई को कहाँ छोड़ आए) कि उसने पिछवाड़े से गाकर उत्तर दिया था - दाज्यु त गए मृगा पछि, म आए तिन्नो रखवाले! (भाई तो हिरन के पीछे गए, मैं तुम्हारी रखवाली करने आया हूँ। )

उस समय बलबहादुर उसे बड़ा अच्छा लगा था। वह उसको पकड़ लाइ थी आँगन में। घंटों बैठकर कलकत्ते की कहानियां सुनती रही थी।

उसी दिन से वह रोज शाम को आकर कलकत्ते की कहानी सुना जाता। उनकी (पूनों के पति की) बुद्धिमानी और अपनी बेवकूफी की दर्जनों ऐसी कहानियां कहता कि हँसते-हँसते पेट में बल पड़ जाते।

किस तरह वह एक कम्पनी में दरबान था, उसी कम्पनी का एक कुली इशारे से हुन्छ-हुन्छ दाजू कहकर चिढ़ाया करता था।

वह खून का घूंट पीकर रह जाता था। किस तरह उसने जाकर हिरण्य दाज्यू से शिकायत कर दी और वे जाकर उस कुली को किस तरह खुखरी निकालकर मारने दौड़े और वह कुली किस तरह दुम दबाकर भागा - आदि बातें वह सविस्तार सुनाता।

उसे बड़ी अच्छी लगती थी कलकत्ते की कहानियां।

कैसा देश है जहाँ बिना तेल की बत्ती अपने-आप शाम होने पर जल जाती है और सुबह को बुझ जाती है।

बलबहादुर भी उसे अच्छा लगने लगा था। एक दिन वह बलबहादुर को पकड़कर समझाने लगी थी - बहादुर !

तुम आवारागर्दी छोडो। घर बनाकर घरनी लाओ। ऊँह हो हो हो। ....वह ठठाकर हंस पड़ा था - भौजी! तुम भी कैसी हो ! आवारागर्दी छोड़कर घर बना सकता हूँ पर मेरे साथ रहना कौन लड़की पसंद करेगी ?

करेगी! तू आवारागर्दी तो छोड़।

कुछ क्षण गंभीर रहकर, वह मुस्कुराते हुए बोला था - अच्छा भाभी एक बात पूछूं पूछों !

यदि आवारागर्दी छोड़ दूँ तो तुम भी मेरे साथ। ....

ऊँह! फटहा - कहकर उसके मुहं पर एक हल्की चपत लगाकर, मुस्कुराती हुई गाय खोलने चली गई थी। बलबहादुर ने उसके हाथ से जबरदस्ती पगहिया ले ली थी - दो भोजी! मैं चरा लेता हूँ।

उसी दिन से वह साथ रहने लगा। काम करने में तो भूत है भूत। जब तक जाकर हाथ न पकड़ो, काम नहीं छोड़ने का। .....

आज तीन साल से किसके खेत में ऐसे फसल लगते हैं। वह अपने खेतों की ओर देखती। लहलहाते पौधे, मनमोहक हरियाली। ..कितना सुन्दर!

पू नो पू नो !

पास के जंगल से कोई पुकारता।

आवाज पहचानकर वह उत्तर देती - आ। ..यी और गोदी में बच्चे को संभालती हुई वह जंगल की ओर दौड़ती।

झाड़ी के पास जाकर फिर पुकारती - किधर !

इधर-उधर झाडी के उस पार से आवाज आती।

बलबहादुर नवजात बछड़े को पोंछ रहा था।

पास ही गाय खड़ी थी। पूनों को देखते ही वह खिल पड़ा - आओ, आओ! पूनों की गोदी में बच्चा जग पड़ा था, बच्चे को बलबहादुर की गोदी में देते हुए उसने बछड़े को बड़े प्यार से चुमकारा, फिर बोली - अब फरक न घर, खाये की पनि छै न। (अब लौटो घर, खाये भी नहीं हो )

ऊहूँ। .. अलि पख न, अलि सुन न! (जरा ठहरो न, जरा सुनो न ) उसने गिड़गिड़ाते हुए कहा था।

पूनों की आँखों में एक उठाते हुए बोली थी - उहूँ चलो!

अलि सुन न बहादुर रोकता ही रहा, वह चल पड़ी।

दूध से सफेद बछड़े को गोद में लेकर पूनों आगे-आगे भागी जाती थी, पीछे -पीछे सद्यःप्रसूता उजरी हुँक हुँक हिंब हिंब करती दौड़ी जाती थी। पास ही झरना कल-कल कर रहा रहा था और डालियों पर पक्षियों का कोरस गान शुरू हो गया था। ...

पूनो रुक -रुककर पीछे ही देखती थी। सबसे पीछे बलबहादुर।

..गोद में बच्चे को लिये, कंधे पर लट्ठ रखे, धीरे-धीरे विजयी वीर की तरह झूमता आ रहा था।

उसकी गोदी में बच्चा रो रहा था और वह उसको अजीब लय में गीत गाकर चुप कराने की चेष्टा कर रहा था - ओ बाबू ! गोरी को बधैया माँ, छैन रखवारा, चोरी भयो फल-फूल। ..ओ बाबू !

बीमारों की दुनिया में

बीरेन की जवानी में घुन लग गया।

बुखार-100० 101० 102०,..।

खाँसी-भीषण !

रोग-क्ष॑य के लक्षण।

कथाकारों के नायक प्रायः क्षय ही से पीड़ित होते हैं। खून की के करते हैं। कथाकार इस रोग को “रोमांटिक” रोग समझते हैं। बीरेन बीमार है, क्षय के लक्षण दिखलाई पड़ते हैं तो वह भी जरूर 'रोमांस” के मजे लूट रहा होगा?

महीने पर महीने बीत रहे हैं, बिछौने पर पड़े-पड़े एक-डेढ़ वर्ष हो गया। आराम होने के कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ते। उसकी जवानी पटना मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल के एक वार्ड में,.बेड नं.। पर शिथिल पड़ी है। जर्जर हो चुकी है। लेकिन कथाकार 'रोमांस” का राग अलाप रहा है। रोमांस! हिसे-चलती गाड़ी में रोमांस, सड़क पर रोमांस, खिड़की पर रोमांस!!

मार दो गोली इन रोमांटिक कथाकारों को!

बीरेन की जवानी किसी काम की न रही!

वह लाख मक्खन खाय, अंडा तोड़े, दूध पीये और गोल्ड की सुई ले, लेकिन बहा हुआ पानी वापस नहीं आ सकता, बीती हुई जवानी लौट नहीं सकती।

“तुम तो बेकार घबराते हो यार! यह अब असाध्य रोग नहीं रह गया है। लोग अच्छे होते हैं, रेगुलर लाइफ लीड करते हैं।”

“और म्याँ अब तो लड़कियों के बाप, लड़कों की तस्वीर देखने के बदले उसके फेकड़े का 'एक्सरे” प्लेट देखक़र रिश्ता करेंगे। मान लो, थोड़ा इनफिलट्रेशन है, ठीक है। या थोड़ी 'केमिटी” सी है तो कोई बात नहीं।*हाँ, जिसका केस 'डेभलप” कर गया है, वह बेचारा छाँट दिया जाएगा।”

नौजवान मेडिकल स्टूडेंटों की बात सुनकर वह हँस देता है। स्टूडेंटों की स्वस्थ हँसी में उसकी हँसी घुलमिल जाती है।

“मिस्टर! इस बार सेनेटोरियम में सीट खाली होते ही आपको भेज दिया 'जाएगा।”

डॉक्टर की बस एक ही बात सुनते-सुनते वह थक गया है। इधर कुछ दिनों से हाउस-सर्जन एक सलाह देने लग गया है।

“अरे साहब! किसी मिनिस्टर को पकड़िए, सब ठीक हो जाएगा।” लेकिन बीरेन जानता है कि मिनिस्टर साहब के पास सिफारिश के लिए समय नहीं है। बीरेन की सिफारिश के लिए कोई मिनिस्टर नहीं बना है।

बगल की “केबिन' में कोई हैं, जिनके मिलनेवालों में एक कम्यूनिस्ट है। वह कभी-कभी बीरेन के पास भी आता है। जब आता है, सामयिक राजनीति पर एक व्यंग लिए आता है।

“अब क्या है, अब तो अपना राज है जी।”-मिनिस्टरी जिस दिन बनी थी।

“अब तो यार, खुद पर भरोसा करो।” जयप्रकाशजी ने रिहा होकर, बाँकीपुर लान में भाषण देने के सिलसिले में कहीं “ख़ुदा जाने” शब्द का व्यवहार किया था।

बीरेन को ढाँढ़स बँधाते हुए वह कभी-कभी कहता है-“अरे कापरेड! लेनिन भी टी.बी. से ही मरे थे और गोर्की ने सबसे अच्छी किताबें सेनेटोरियम में ही लिखी थीं।”

बीरेन ने भी पलँग पर पड़े-पड़े कहानियाँ लिखने की कोशिश की है। कहानी शुरू करने क़ो तो वह कर देता है पर उसे अन्त करना उसके लिए मुश्किल हो उठता है। फलतः उसकी कॉपी में बहुत-सी अधूरी कहानियाँ लिखी पड़ी हुई हैं। वह कभी-कभी उन कहानियों को देखता है, उन्हें शेष करने की हिम्मत नहीं होती।

बीरेन की जवानी किसी काम की नहीं रही!

अस्पताल की रात बड़ी भंयानक होती है। रोगियों की दर्द-भरी कराह, कलेजे में चुभनेवाली चीख और बीच-बीच में मृत व्यक्तियों के सम्बन्धियों का सम्मिलित करुण रोदन! सब मिलकर रात को बड़ी भयानक बना देते हैं। अँधेरी रात और भी क्रूर हो जाती है। चाँदनी रात, कफन जैसी सुफेद और बेजानदार मालूम होती है।

यहाँ मौत बहुत जानी-पहचानीः हुई चीज है। जिन्दा रहना, मर जाना, फिर मरते-मरते जी जाना यहाँ कोई अहमियत नहीं रखते। लोग रो-रोकर मौत को गलत और डरावनी बना देते हैं, यों यह बड़ी सीधी-सादी होती है। वह बेड नं. 5 रात को न जाने कब मर गया। चार बजे भोर को नर्स ने देखा, मौत कभी चुपके से आकर चली गई है। डेथ-सर्टिफाई करने के लिए डॉक्टर आए, मुर्दे को छूकर, ऊँघते हुए चले गए। वार्ड के रोगियों की नींद में कोई बाधा नहीं पहुँची। मुर्दाधर के दो मेहतर आए, उसे स्ट्रेचर पर लिटाकर ले चले। अगले मेहतर ने अपनी जिन्दादिली दिखाते हुए कहा-“चल भैया, कदम-कदम बढ़ाए चल।”

यह उसके चुपचाप और लावारिस मर जाने पर एक व्यंग था।

बेड नं. 5 खाली हो गया। उसका “बेड-हेड-टिकट” और हिस्ट्री-चार्ट लेकर नर्स चली गई। उसने अपने रजिस्टर में लिखा-“बेड नं. 5 एक्सपायर्ड...””. वगैरह-वगैरह।

उसका एक भला-सा या बुरा-सा नाम रहा होगा, लेकिन मरते-मरते वह सिर्फ बेड नं. 5 ही रह गया। यानी बेड नं. 5 सिर्फ मर गया। वज्रपात नहीं हुआ, दीपक नहीं बुझ गया, सिन्दूर नहीं लुट गया। कुछ नहीं हुआ, वह सिर्फ मर गया। वज़्पात हो जाना, दीपक बुझ जाना, सिन्दूर लुट जाना दूसरी बात है और 'सिर्फ मर जाना! दूसरी बात।

बस, यहीं तक लिखी हुई एक अधूरी कहानी को बीरेन कभी-कभी पढ़ डालता है। वह जब-जब इस कहानी को पढ़ता है, उसका अपना नाम भी मिटने-मिटने को हो जाता है, उसे लगता है जैसे वह बीरेन, बीरू, बीर वगैरह कुछ भी नहीं महज बेड नं.!

“कहिए बीरेनजी! कैसे हैं?”-अजीत आया।

बीरेन का नाम मिटते-मिटते रह गया।

यह अजीत, बीरेन का साहित्यिक दोस्त है, कहानी लेखक और पालिटिकल वर्कर। नई शैली और विचारधारा को लेकर इन्होंने हिन्दी संसार में प्रवेश किया है। इनकी कहानी की नायिका, हँसते-हँसते स्खलित हो जाती है, भरी प्रदर्शिनी में एक नग्नमूर्ति के पास खड़ी होकर उसके स्तन को देखती फिर अपने स्तन को छूकर देखती है कि मूर्ति की तरह उसका अपन्ना गठीला, नुकीला है या नहीं। इनके नायक, 'कॉफी-हाउस' में एक प्याली औइसक्रीम चूसते-चूसते मजदूरों के सवालात पर दर्जनों थ्योरियाँ बोल जाते हैं। इनकी भाषा-जज़्बात, अहसास, अहमियत की दूँस-ठाँस ,से जरूरत से ज्यादा जानदार हो जाती है।

बीरेन ने करवट लेते हुए कहा-“बैठिए। आप कैसे रहे?”

“ठीक है”'-अजीत ने बैठते हुए कहा-“और आपकी “उनकी” कोई चिट्ठी-विट्ठी आई?” बीरेन ने गर्दन हिलाकर्‌ कहा-“नहीं।”

यह “शैला' नाम की एक लड़की के बारे में बात हो गई। शैला बीरेन के साथ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ती थी और बीरेन से उसका बहुत अच्छा-सा सम्बन्ध है। अब वह मद्रास के किसी वीमेन्स कॉलेज में प्रोफेसर थी। अजीत की राय में, शैला ही बीरेन की बीमारी का प्रधान कारण थी।

अजीत एक बार मुस्कुराया, फिर कहने लगा-“देखिए! हम जिन्दगी को “कॉफी' के चम्मच से नहीं माप सकते...”

बीरेन ने याद करने की कोशिश की कि उसने किस अंग्रेजी उपन्यास में ठीक इसी पंक्ति को पढ़ा है।

अजीत कह रहा था-“जिन्दगी किसी की याद में रो-रोकर बिताने के लिए नहीं है। यह एक लहर है जो गरजती है, उबलती है, थपेड़े मारकर जगाती है। यह सुलानेवाला संगीत नहीं। यह एक गति है जो रुकती नहीं...।”

बीरेन आज ऊब गया। वह सब दिन चुप होकर अजीत की सुनता रहा है। और यह अजीत जब बोलने लगता है तो भूल जाता है कि सुननेवाला भी कुछ सोच सकता है, कुछ कह सकता है।

आज बीरेन बालेगा। जब से वह पलँग पर पड़ा है, उसने सिर्फ सुना है। वह चुपचाप लोगों की सुनता गया है, बोला है नहीं। उसने बीमार होकर देखा है कि दुनिया में राय देनेवालों का ही बाहुल्य है। बीमार होने का अर्थ है, कड़वी दवा की तरह दूसरों की गलत-सही बातों को पीते जाना। एक बीमार को अपनी राय जाहिर करने का कोई हक नहीं, क्योंकि वह कमजोर है, निष्क्रिय है, निस्तेज है, करवटें लेता है, कराहता है। वह समाज का एक सड़ा हुआ अंग है, जिसे समाज अपनी भलाई के लिए काटकर अलग कर देना पसन्द करता है। उसके पीछे चलनेवाले साथी आज उसे गोली मारने को तैयार हैं, क्योंकि वह चलने में असमर्थ है। बीरेन तकिये के सहारे बैठ गया और कहने लगा-“अजीत बाबू!

आप जिन्दगी, संघर्ष, मुहब्बत वगैरह पर बड़े-बड़े पोथे लिख सकते हैं-सिर्फ लिख ही सकते हैं। आप अपने को प्रगतिशील कहते हैं, यथार्थवादी होने का दावा करते हैं। पोधियों से आपने यथार्थवाद सीखा है- जिसे मैं उधार की चीज कहता हूँ। और मेरा जन्म किसी 'कॉफी-हाउस'” के इर्द-गिर्द नहीं बल्कि खलिहान के पास ही एक झोंपड़ी में हुआ है, जहाँ जन्म से लेकर मौत तक-लड़ाइयाँ ही लड़ाइयाँ लड़नी पड़ती हैं। जहाँ को 'प्मस्याएँ तर्क करने का मौका नहीं देती हैं। जहाँ सीधी चोट करनी पड़ती है, सीधे वार को सहना पड़ता है। मेरा दावा है कि मैंने जिन्दगी को आपके "जेम्स जायस” से अधिक पहचाना है। हमारी जिन्दगी हिन्दुस्तान की जिन्दगी है। हिन्दुस्तान से मेरा मतलब है असंख्य गरीब मजदूर, किसानों के हिन्दुस्तान से। हम अपनी मिट्टी को पहचानते हैं, हम अपने लोगों को जानते हैं। हमने तिल-तिल जलाकर जीवन को, जीवन की समस्याओं को सुलझाने की चेष्टा की है। आपने "गेहूँ का पौधा देखा है अजीत बाबू? मेरा खयाल है कि आपने गेहूँ भी नहीं देखा होगा।

“रही मुहब्बत की बात। सो हमारे दिल के किस्से निराले होते हैं। हमारे यहाँ इश्क पनपते ही मुरझा जाता है, शबाब दम घुटकर मर जाता है। हमें मुहब्बत की लाश ढोनी पड़ती है।

बीरेन हॉफने लगा। अजीक्/निष्प्रभ होकर बोला-“आप अब चुप रहिए।!

अजीत चला गया। बीरेन बहुत देर तक गर्म रहा। उसके नथुने फूले रहे और वह सोचता रहा-डॉक्टरों की बात, कम्यूनिस्ट छोकरे की बात, अजीत की बात।

हिन्दुस्तान में यह फेफड़े का रोग 99 प्रतिशत पर हाथ फेरने जा रहा है। जरूरत है उत्तम भोजन, कम मिहनत की। जरूरत है हजार-हजार डॉक्टरों की | लेकिन डॉक्टरी सभी नहीं पढ़ सकते फिर जहाँ डॉक्टरी पेशा का रूप ले ले वहाँ बीमारी बढ़ती ही जाएगी।...असल बात है कि हम गुलाम हैं और गुलाम कौम का अर्थ बीमार मुल्क... ये कम्यूनिस्ट! 1942 की क्रान्ति में रोड़े अटकानेवाले क्रान्ति-विरोधी! आज फब्तियाँ कसे चलते हैं।

रूस इनका काका है और स्टालिन पैगम्बर। स्टालिन की डिक्टेटरशिप को जनता की डिक्टेटरशिप कहते इन्हें शर्म नहीं आती। जरा कोई इनसे पूछे कि म्याँ जनता की डिक्टेटरशिप जनता पर तो नहीं हो सकती, आखिर यह डिक्टेटरशिप किस वर्ग पर? तो बगलें झाँकने लगेंगे, लेनिन को 'कोट' करने लगेंगे; स्टालिन की दुहाई देने लगेंगे।

और, यह अजीत! दिन में पच्चीस बार सूट बदलकर होटलों में चक्कर काटते फिरता है, फिलासफी बघारता है। किसानों के सवाल पर आप बोल तो सकते हैं पर किसानों के बीच जाकर काम करने की बात उठते ही उपयुक्त मोर्चे (3ए्रध७७७ पणा0) की तलाश करने लग जाते हैं।

अचानक उसके विचारों में बाधा पड़ी। बेड नं. 4 पर गुलाम मुहम्मद गिलानी साहब, उर्दू के शायर हैं। बेचारे भरी जवानी में ही हृदय रोग से पीड़ित हैं। सारी देह में सूजन है, चेहरे पर परेशानी छायी रहती है, लेटने से तकलीफ बढ़ जाती है। मगर उनकी जिन्दादिली है कि उन्हें जिलाए रहती है। हाँ, तो उनकी नौकरानी डेरे से आई थी और रो रही थी कि उसके घरवाले ने उसे बुरी तरह पीटा है। उसे कसम खिला ली जाए जो उसने कुछ कहा हो। गिलानी साहब ने उसे शान्त करके वापस भेजा। बीरेन ने मुस्कुराकर पूछा-“भाई, बात क्‍या थी?”

गिलानी साहब ने बड़े अन्दाज से गर्दन हिलाकर, हकला-हकलाकर जवाब दिया-“कसम खिलवा लो जो मैंने आह! भी की हो।” “मगर उसने तो पैंतरे बदल-बदलके मारा है।” बीरेन हँस पड़ा और रह-रहकर हँसता रहा।

रात आई, रातवाली नर्स आई। बाहरी दुनिया शान्त हो गई, अस्पताल की दुनिया कराहती, चिल्लाती, दम तोड़ती और जोड़ती चलने लगी। रातवाली सिस्टर राउंड लगाने आई, बेचारी नर्स ऊँधती हुई पकड़ी गई। तेज, कर्कश आवाज में सिस्टर चिल्ला उठी-“हम रिपोर्ट करेगा, छोड़ेगा नहीं।” : बीरेन का बुखार आज कुछ तेज था, उसे नींद नहीं आ रही थी। उसके जी में आया कि सिस्टर का मुँह नोच ले। चुड़ैल, बड़ी चिल्लाती है। उसने करवट बदली, लोहे का पलंग कचमचा उठा। उसे लगा जैसे यह उसकी हड़िडयों की आवाज हो।

गिलानी साहब पलँग पर बैठे, “बेड-रेस्ट' के सहारे हॉफ रहे थे। बीरेन ने पछा-“क्य हाल है गिलानी भाई?” पूछा-'क्या

“कुछ मत पूछिए”-वे फिर शायराना अन्दाज से बोले- “छेड़ दिया हसन ने फिर अपना किस्सा, बस, आज की रात भी हम सो चुके

“लेकिन भाई, हम तो ऐसा सोएँगे कि लाख सर पटके पे भी न उठेंगे...।

सुबह बीरेन ने उठकर देखा, गिलानी साहब के बेड के पास भीड़ लगी थी। औरतें दहाड़ मारकर रो रही थीं। गिलानी साहब के हृदय की गति बन्द हो चुकी थी। उसकी जवान बेवा ने अपना सिर फोड़ लिया था, उसे लोग सँभाल रहे थे। पास ही फर्श पर बैठी उनकी छोटी-सी बच्ची, रेलगाड़ी चला रही थी।

बीरेन अपने में ही बोल उठा-“एक यह भी थे जो चले गए।”

मजदूर राज्य कायम हो!

इन्कलाब! जिन्दाबाद!

जयप्रकाश! जिन्दाबाद!...

चिलचिलाती हुई धूप में, मजदूरों का एक विशाल जुलूस सड़क से गुजर रहा था। बीरेन ने खिड़की से देखा-बड़ा लम्बा-चौड़ा जुलूस था। जुलूस दूर निकल गया था लेकिन नारों की आवाज अब भी सुनाई पड़ रही थी-

“जयप्रकाश! जिन्दाबाद!

सुबह से घबड़ाया हुआ बीरेन, अभी कुछ शान्त हुआ। डॉक्टर आए, सुई देकर चले गए। उसने आँखें मूँद लीं और सोने की चेष्टा करने लगा। थोड़ी ही देर बाद उसने अनुभव किया कि उसके शरीर पर कोई हाथ फेर रहा है। उसने आँख खोलकर देखा- “अहमद !”-वह उछल पड़ा।

“भई लेटे रहो।”

“कब आए?”

“अपने और साथियों का क्‍या हाल है?”

हाँ”-अहमद ने बड़े उत्साह से कहा-“कृष्णम्‌ केरल का विद्यार्थी इंचार्ज है। गोपी, अहमदाबाद मजदूर यूनियन में काम कर रहा है। सिन्हा, आर्गनाइज करने के लिए पंजाब भेजा गया है। रियासत “टाटा” में है। अहद, पार्टी-आर्गेन एडिट करता है। मजदूर, किसान और विद्यार्थी फ्रंट पर जोरों से काम चल रहा है। कई जगह वर्कर्स ट्रेनिंग कैम्प भी खुल गए हैं।...अच्छा तो मैं अब चला।”-अहमद उठ खड़ा हुआ।

“फिर कब मिलोगे?”

“कह नहीं सकता, कानपुर में जिच चल रही है। अगर लड़ाई शुरू हुई तो जाना ही पड़ेगा। और हाँ, अच्छी याद आई। कांग्रेसी मिनिस्टरी ने तो इसे टाल दिया है, लेकिन अपनी पार्टी ने प्रान्तीय वकील सभा की सहायता से एक बोर्ड कायम किया है। 42 के जुल्मी ऑफिसरों के जुल्मों का लिस्ट तैयार करना है तुम्हारा केस तो काफी वजनी रहेगा। तुम लिख डालो। हम उन जुल्मियों को खुली अदालत में लाकर छोड़ेंगे। तो मैं चलता हूँ।'

अहमद चला गया। बीरेन ने उसे जाते हुए देखा, फिर आप ही आप मुस्क्राने लगा।

रात आई।

बीरेन लेटे-लेटे ताना-बाना बुनने लगा! अतीत की कुछ धुँधली और बिखरी हुई स्मृतियाँ-हरे पेड़-पल्लवों से लदा उसका प्यारा गाँव, उसकी माँ-स्नेहमयी, करुणामयी; प्यारी बहन बननो। फिर बनारस के दिन, शैला...। 1942 की क्रान्ति...लाठी चार्ज. कठोर कारावास...जेल का भीषण चार्ज...बीमारी...अस्पताल...कृष्णम्‌ गोपी, सिनहा, रियासत और अहद...सबके सब रणबाँकरे हैं। लगा जोर-बस एक बार!

बीरेन उठकर बैठ गया। उसे लगा कि वह उत्तेजित हो रहा है।. वह बहुत देर तक .. चुपचाप बैठा रहा, लेकिन एक नई ताकत न जाने कहाँ से उसकें' अन्दर आ गई थी जो उसे बार-बार झकझोर जाती थी। इस ताकत के आगे रोग नहीं टिक सकेगा। उसने अनुभव किया कि हजारों हजार साथियों का बल उसे प्राप्त है। अचानक उसकी विचारधारा में बाधा पड़ी। वार्ड में कुहटाम मचा। कोई चल बसा। फिर वही नर्सो का खुट-खुट, डॉक्टरों की दौड़, सिस्टर की कर्कश आवाज, मेहतरों की बड़बड़ाहट।

बीरेन ने लेटते हुए कहा कि-“मरो, मरो!! हिन्दुस्तान में जन्म लेकर। इससे ज्यादा क्‍या उम्मीद करते हो।”

बेचारी विधवा सिर पीट रही थी, उसका इकलौता बेटा था, एकमात्र सहारा था, उसका राजा था, मुन्ना था...।

बीरेन करवटें ले-लेकर गिलानी का शेर दुहरा रहा था-

छेड़ दिया हसन ने फिर अपना किस्सा!

बस आज की रात भी हम सो चुके।।

रेखाएँ : वृत्तचक्र (एक)

ऊँहूँ। नहीं, यह सबकुछ भी नहीं सोचूँगा।

मुझे ऐसा कुछ भी नहीं सोचना चाहिए, जिससे कि मेरा दिल कमजोर पड़ जाए।

मेरा घाव जल्दी ही भर जाएगा, मैं चंगा हों जाऊंँगा। मैं भी कैसा हूँ!

मरने से डरता हूँ!

मरने की बात सोचते ही जी कैंसा-कैसा करने लगता है।

बहुत कमजोर हो गया हूँ न, इसलिए, फौजी होने का मतलब यह नहीं है कि वह मरने की बात सोचकर नाच उठे। उस दिन डॉक्टर ने खूब कहा, “कैप्टेन, कुछ फिकर मत करो। फर्ज करो कि तुम एक भेड़िए के मुँह में पड़े हुए हिरण के बच्चे को बचाने के सिलसिले में जरा घायल हो गए हो। बस...भेड़िए के मुँह से हिरण के बच्चे को छुड़ाने के सिलसिले में!

हिरण के बव्चे की कल्पना करते ही मेरी आँखों के आगे 'शकुन्तला” फिल्म दौड़ जाती है। शकुन्दगा-जयश्री, हिरण का बच्चा। जयश्री, शान्ताराम! डॉ. कोटनीस की अमर कहानी बड़ी अच्छी तस्वीर है...अच्छा, यदि मैं इस अस्पताल में मर गया तो...तो क्या मेरी कहानी भी हर लब पर होगी! फिल्म बनेगी? फिल्म का नाम होगा-“कैप्टेन सिन्हा !

न, यह तो कॉपी हो जाएगी। अच्छा होगा-'कश्मीर की घाटी में” सुनने में जरा रोमांटिक भी मालूम होगा। बड़े-बड़े पोस्टरों पर लिखा जाएगा-“कश्मीर की घाटी में'-एक ऐसे कैप्टेन की कहानी जिसने राष्ट्रीय सरकार की इज्जत बचाने के लिए अपनी जान दे दी...कहानी शुद्ध करने में जरा दिक्कत होगी डायरेक्टरों को।

दिखाएगा मेरी जिन्दगी का प्रथम अध्याय-मेरा गाँव। एक गाँव, जो वास्तव में होगा बम्बई के आसंपास के किसी गाँव का हिस्सा अथवा स्टूडियो का कोई कोना।

दूर-बिहार के पूर्वी अंचल, पूर्णिया जिले में क्‍यों जाएँगे...इसके बाद आवारागर्दी, पढ़ा-लिखा बेकार और एक जानकार गरीब। गरीबों की दुनिया में मुहब्बत। ज्योत्स्ना के प्रति मेरी तुकबन्दियों को कलापूर्ण कविताओं की संज्ञा दी जाएगी-शायद। मेरी कोई कविता तो मिल नहीं सकेगी उन्हें। बना लेंगे लोग...ठंडी साँसें बुलबुल, मीठी : नींद, सपने और चाँदनी रातें आदि शब्दों से भरे हुए कुछ गीत। तर्ज तो होगा-यही... आजकल का पंजाबी...नायक कौन होगा? पी. जयराम ठीक है। नहीं, वह मोटा है। तो फिर?...एक बार आईने में अपना चेहरा देखने को जी करता है...कोई भी हो नायक। दृश्य होगा-बेकारी से ऊबकर, बाल बिखराए हुए, अजीब सूरत में रिक्रूटिंग ऑफिस में!

फिर लड़ाई के मोर्चे, तमगे, तरक्की,-कैप्टेन! नायिका-ज्योत्स्ना कौन बनेगी? कहीं बेगम पारा हई तो सब गुड़गोबर। ज्योत्स्ना ही शायद उतरे।

नहीं वह नहीं उतरेगी। शायद, अपने 'नाम' की आज्ञा भी न देगी। मनगढ़न्त प्रेम कहानी को मेरे दिल के किस्से कहकर लोग मुझे एक महान प्रेमी बना देंगे...लेकिन यह 10 गुरखा रेजिमेंट का सूबंदार दिलबहादुर गुरुग, जो अभी अस्पताल में घायल होकर पड़ा है, इसके काबिल है वी.एच. देसाई ही। बेड पर पड़े-पड़े हर डॉक्टर और नर्स को वह 'जयसिंह' कहेगा, बुखार में जब-'कांछा ले कांछी लाय लग्यो बन को बाँटो लालटनी बालेर' गाएगा और हर तेजी से गुजरते हुए डॉक्टर को-नानसेंस के लहजे में-'मोरो' तथा नर्स को मोरी' कहेगा तो ठहाकों से गूँज उठेगा सारा हॉल।

नानसेंस का स्त्रीलिंग नहीं होता, लेकिन 'मोरो' का होता है 'मोरी'। नर्स 'मोरी' का मतलब नहीं समझती।

वह दृश्य कितना मार्मिक होगा जब ज्योत्स्ना अपने पति मिस्टर वर्मा के साथ चाय पर बैठकर अखबार पढ़ती रहेगी। मिस्टर वर्मा, अपने मालिक हिन्दू-प्राण सर रामपत ठनठनियाँ की उदारता का जिक्र करते हुए उनका हिन्दुओं का कर्तव्य! शीर्षक स्टेटमेंट पढ़ने को कहेंगे। पढ़ने के सिलसिले में, अखबार के एक कोने में ज्योत्स्ना पढ़ेगी-कश्मीर अस्पताल में कैप्टेन सिन्हा की मृत्यु...हाथ से चाय की प्याली गिरकर “झन्न!...वह आँखें फाड़े शून्य में ताकती रहेगी, बाल बिखर जाएँगे, आँखों में आँसू छलछला पड़ेंगे, मिस्टर वर्मा घबराकर चिल्ला उठेंगे-जोना! जोना!

तुम्हें क्या हो गया ?

ग्राउंड म्युजिक चल पड़ेगा-'शहीदों के मजारों पर, लगेंगे हर बरस मेले....

मेरी आँखों में भी आँसू आ गए। दिल की धड़कन बढ़ रही है, हिस्स, मैं भी कैसा हूँ!

कैसी-कैसी बेकार की बातें सोचता हूँ। ज्योत्स्ना को तो मेरी मौत की बात भी मालूम नहीं हो पाएगी। अखबारों में हर इंसान की मौत के बारे में छपने लगा, तो हुआ।...लेकिन “शहीदों के मजारों पर” गीत मुझे प्रिय है। शायद मन में शहीद कहलाने की बहुत बड़ी लालसा छिपी हुई है...मणिपुर की बमबारी के दिनों-अच्छी तरह याद है-मुझे बार-बार यही तकलीफ सतांती रही कि मेरी मौत क॒त्ते-बिल्लियों की मौत से भी गई-गुजरी होगी। अपने मुल्क की मिट्टी भी मुझे अपना कहकर कबूल नहीं कर सकेगी...कितना दुख हुआ था मुझे! 45 की छुट्टी में गाँव लौटा था। मेरी बहन से “भारतमाता ग्रामवासिनी' गाने को कहा था तो वह ठठाकर हँस पड़ी थी। उसे आश्चर्य हुआ था कि मैं भी इस तरह के गीतों में दिलचस्पी लेता हूँ। मैंने अनुभव किया था कि मेरे अधिकांश दोस्त मुझे घृणा की दृष्टि से देखते हैं। मनमोहन मुझसे -इसलिए बात नहीं करता था कि मैं उसकी पार्टी के विरुद्ध लड़कर आया था। सुधीर, मेरे बचपन का साथी सुधीर!

मेरी कविताओं पर झूमनेवाला सुधीर!-मेरे साथ साहित्यिक बातें करना फिजूल समझता था क्योंकि उसकी निगाह में मैं कुछ और हो चुका धा। और ज्योत्स्ना?

वह तो मेरी छाया से भी घबरा जाती थीं।

उसने मिस्टर वर्मा, एडवोकेट साहब से शादी कर लीं। जमींदार का वकील है वर्मा सुना है, बिहार के दंगे के समय उसने कमाल कर दिखाया है। जमींदार साहब की जीप गाड़ी पर दिन-भर में पचासों गाँवों में जाकर पर्चेबाजी और उत्तेजना फैलाता फिरा। कहा जाता है कि जिस गाँव से उसकी गाड़ी विदा होती, उसके बाद ही' वहाँ लंकाकांड और दानवी-लीला शुरू हो जाती है...गर्भ चीरकर बच्चे को निकालकर भाले की नोक पर...!

राशन के लिए 'क्यू' में खड़ी-खड़ी उस औरत को जो बच्चा हो गया था, ' कलककत्ते के फुटपाथ पर अमेरिकन सैनिकों ने कितने उत्साह से उसकी तस्वीर ली थी! हमारे भाई लोग भीड़ हटा रहे थे-हट जाओ, साहब फोटो लेते हैं...सनमोहन ने एक बार मेरी तस्वीर उतारी थी।

बहुत साफ आई थी मेरी तस्वीर

मैं यह सब क्‍यों सोच रहा हूँ। 'इनफीरियारिटी कॉप्लेक्स' के कक पर तो नहीं चल रहा हूँ।...करवट नहीं ले सकता हूँ। पेट और जाँघ पर पट्टियाँ बँधी हुई हैं। बहुत दर्द है। कमजोरी और प्यास आज बेहद बढ़ गई है। पेट में सुई गड़ाने की तरह दर्द...! आह! शायद आज मैं...अब मैं जी नहीं सकूँगा...हाँ, डॉक्टर से कहना भूल गया, कहीं अन्त तक भूल ही न जाऊँ, अपने रुपए 'शरणार्थी फंड' में दे जाना चाहता हूँ।

“कैसा है कैप्टेन?”-नर्स एलिस आकर पूछती है। ऐंग्लो इंडियन एलिस! गुडमार्निंग के बदले आजकल “ज्योहिन” कहती है। मेरे सिर पर हाथ रखा उसने। रेक्टम वसेलाइन” लाने गई।...नर्सों की तलहथी और उँगलियाँ इतनी ठंडी क्यों होती हैं? मेरा तो अब तक का यही अनुभव है। शायद, बराबर हाथ धोती रहती हैं। कश्मीर में भी एंग्लो नर्से? यहाँ की खूबसूरत औरतें क्‍यों नहीं “नर्सिंग ज्वाइन' करती हैं? सिर्फ दो-तीन सिस्टर हैं कश्मीरी, बाकी सब एंग्लो। सिस्टर उपाध्याय ही आई थी उस दिन...पंडित नेहरू के विजिट के दिन। इन्दिरा गांधी और सिस्टर उपाध्याय में कितना अन्तर ?

कितने महान्‌ हैं पंडितजी! मुझे यकीन है कि यदि मेरे पेट और जाँघों पर पट्टयाँ न बँधी होतीं, तो वे मुझे गोद में उठाकर चूम लेते। बातें ही उनकी क्या कम थीं?-“आजाद हिन्दुस्तान की इज्जत तुमने बचाई है, जवाहर ने नहीं। तुम्हारे जैसा “भाई” पाकर मुझे आज पहली बार अपने प्रधानमन्त्रीत्व का गुमान हो रहा है।...और तुम्हारी जॉनिसारी के किस्से सुनकर तो मैं जवान हुआ जा रहा हूँ, मैं दामन पसारकर तुम्हारी बड़ी उम्र के लिए दुआ माँग रहा हूँ,।

मेरी आँखों में आँसू आ गए थे। उनकी भर्राई हुई आवाज...दूसरे थे पटवर्धन साहब नाम सुना था, देखा नहीं था...कोहिमा कैम्प में चर्चा होती थी बराबर...चुपचाप... जयप्रकाशजी की, अरुणाजी की, पटवर्धन और लोहियाजी की...बहुत सुन्दर, हैं पटवर्धनजी...पंडितजी को जब कहा गया मैं बिहार का हूँ तो दोनों ही उछल पढ़े थे। पंडितजी भी और पटवर्धनजी भी। “बिहार” सुनते ही पटवर्धनजी के मन में तुरन्त जयप्रकाशजी की तस्वीर आई होगी और पंडितजी की आँखों के सामने 1934 के भूकम्प-पीड़ित इलाके...हाल के दंगे के नजारे नांच गए होंगे शायद...

उफ, नेहरू सरकार को फेल करने के लिए कितनी नापाक कोशिशें हों रही हैं। क्या उन्हें रात में नींद आती होगी? यदि इस बार बच गया मैं...तो...नहीं, मंसूबे नहीं बॉधना चाहिए। लेकिन मैं कहता हूँ कि सारी प्रतिक्रियावादी ताकतों को कुचल डालने से ही सोने का हिन्दुस्तान बनाकर तैयार हो सकेगा। मुट्ठी-भर कुचक्रियों को प्रश्नय देना, 'फासिज्म' के लिए रास्ता सहल कर देना है। कुछ नहीं...कोर्ट मार्शल...फायर... फायर...फायर...

मैं जोर से तो नहीं बोल उठा? नहीं, ठीक है, जोरों की प्यास लगी है। बड़ी बेचैनी ! दिलबहादुर के मुँह से, मार्चिंग सौंग के तर्ज पर, सीटी बजा रहा है...यह क्या, ज्यादा देर तक किसी चीज को देख नहीं सकता हूँ। आँखें झिलमिलाने लगी हैं। सामने काले, नीले...तरह-तरह के धब्बे मालूम पड़ते हैं। कमजोरी है। डॉक्टर कह रहा था कि मुझे ताजा खून, नया लहू दिया जाएगा। मेरी जान बचाने के लिए जो लहू देगा, उसे न तो मैंने देखा है और न उसने मुझे। लहू मेरे लिए तो नहीं, एक ऐसे सैनिक के लिए जो राष्ट्रीय सरकार की इज्जत के लिए लड़कर घायल है।

ऐसा लग रहा है कि...मानो स्पष्ट देख रहा हूँ...कुछ कॉलेज के लड़के आए हुए हैं, “ब्लड बैंक' में अपना खून देने। स्वस्थ तगड़े नौजवान। दिल से भी स्वस्थ। लड़कियाँ भी हैं। लड़कों के चेहरे अपरिचित नहीं मालूम होते और लड़कियाँ भी सब जानी-पहचानी-सी लगती हैं।

ज्योत्सना भी। हाँ, वह बैठी। डॉक्टर ने स्पिरिट लगाकर, चमड़े को 'स्टरलाइज” किया।

स्पिरिट में भिगोई हुई रुई से सिरिंज की सुई साफ करता.है। मुस्कुराकर ज्योत्स्ना से कुछ पूछता है। सुई गड़ा रहा है। अपने को निडर दिखलाने के लिए वह मुस्कुराती हुई सीधे सुई की ओर देखती रहती है।...अरे! ज्योत्स्ना का चेहरा बदल गया। कोई दूसरी लड़की है। सुई चुभोई गई। चेहरे पर जरा-सी शिकन...फिर मुस्कुराहट...सिरिंज में खून आ रहा है, धीरे-धीरे...। लाल-लाल...ताजा खून...लाली क्रमशः काली हो रही है।...मेरी नसों में खून दौड़ रहा है। लाल लहू...लाल रक्तकणिका और श्वेतरक्तकणिका में लड़ाई हो रही है...लाल जिन्दगी...सुफेद मौत...कफन-सी सुफेद...सुफेद कणिकाओं पर लाल की विजय...बायोलोजी लैबोरेटरी में काँच के नलों में लड़ाई...अरे! वह लड़की बेहोश होकर गिर पड़ी!

बेहोश होकर.

याद आती है उस नागा लड़की की। सारे डिगबोई में श्मशान की-सी शान्ति। आसमान में टोह लगानेवाले जहाजों की धीमी भनभनाहट। शहर के आम 'रोड' से हमारी टोली गुजर रही। बूटों की छन्दमय आवाज...लेफ्ट-राइट-लेफ्ट!

एक मोड़ पर कुछ नागा लड़कियाँ सैनिकों पर फूल बरसाने के लिए मुस्कुराती हुई खड़ीं। अपनी भाषा में न जाने क्‍या चिल्लोकर संब फूल फेंके।...मेरा जी किया था कि एक फूल उठा लूं। “ल्यप...ठाँ।'...बाई ओर मुड़ते हुए मैंने देखा कि वह लड़की जो सबसे बड़ी थी और निडर होकर मुस्कुरा रही थी...गिर पड़ी। बेहोश होकर।

“कैप्टेन, कैसा है?”-शएलिस आई। यह क्या? बोल नहीं सकता हूँ। आवाज नहीं निकल रही है। होश में हूँ तो ?...हाँ तो। लेकिन बोल नहीं सकता हूँ क्यों? इशारे से अपनी लाचारी दिखलाता हूँ। खुट खुट खुट...। एलिस चली गई। चलती जा रहीं है। वह रहती है तो अच्छा लगता है। मुझे डर मांलूम हो रहा है क्या? नहीं, डर काहे का? मरने का? हमारा भाई प्रधानमन्त्री, जिसे न दिन में चैन है न रात में नींद!...उनका गम्भीर चेहरा।...नाक की बगल से निकलकर जो रेखा ठुडडी तक चली गई है, वह क्रमश: गहरी होती जा रही है। मेरे लिए दुआ माँग रहा है। दुआ? भीख ?...नहीं, उन्हें भीख नहीं माँगने दूँगा। उस दिन उनसे बात करने के समय मैं मुस्कुराया नहीं, इसीलिए वे आज दुआ माँग रहे हैं। दामन पसारकर भीख माँगते हुए नेहरू की कल्पना...कितनी बुरी ?

बिगुल फूँकते हुए नेहरू...धू...तू...धूतू...तैयार! हजारों-हजार जवानों की टोलियाँ कूच को तैयार! मार्च...।

नेहरू मुस्कुराता...।

किसी ने छिपकर उनकी पीठ में छुरा भोंक दिया। वे गिरे...वे गिरे...खून से लथपथ, छटपटा रहे हैं छि:, क्या सब सोच रहा हूँ। कुवत लार्ऊँ अपने अन्दर...लेकिन नेहरू की लाश तड़प रही है...हजारों जवानों की लाशें तड़प रही हैं...गाँव जल रहे हैं, औरतें चीख रही हैं, बच्चे जलाए जा रहे हैं...गर्भ चीरकर निकाले हुए बच्चे...कोटि-कोटि गरीबों की दुनिया जल रही है...कालीं फौज बढ़ रही है...।

हम सब घाटियों में छिप रहे हैं...। वह रहा रामपत ठनठनियाँ...मिस्टर वर्मा...। ठनठनियाँ नहीं...मुसोलिनी...। मिस्टर वर्मा... उसकी सूरत हिटलर-जैसी हो रही है...काली वर्दी...। सब साथ हैं...निशाना साधता हूँ...हिटलर गायब हो जाता है...शराफत हुस्सैन पठान...निशाना साधता हूँ...पठान गायब...हिन्दूप्राण... पठान...छोटे-से हिरण के बच्चे को भेड़िए ने पकड़ा...छौना छटपटा रहा है...निशाना साधता हूँ, भेड़िया मुझे अपने जबड़ों से दबोच लेता है...तेज दाँत...दर्द...दर्द... डॉक्टर हैं।

बड़े डॉक्टर, छोटे डॉक्टर, भीड़। मैं शायद बेहोश हो गया था।

खून दे रहे हैं। दिलबहादुर अपने बेड पर बैठा मुझे आश्चर्य से घूर रहा है। मुझे क्या हो गया?...खून दे रहे हैं डॉक्टर...डॉक्टर के गले में स्टेथस्कोप की नली धीरे-धीरे मोटी होती जाती है...अजगर...भागो एलिस...एलिस की आँखें पीली पुतलियाँ...मेरी पलकें भारी हो रही हैं...मोहे नींद सतावे...।

'विक्टरी डे' के दिन लल्लन बाई नाच रही थी...मोहे नींदा सतावे...कोहिमा कैम्प में चर्चिल का भाषण सुनतें समय मैं ऊँध रहा था...जवाब-तलब...प्रधानमन्त्री की आवाज की बेइज्जती...जुर्म...देंह में आग लग गई...गर्मी...गर्मी...डॉक्टर...डॉक्टर...झुरीदार चेहरा...माँ की तरह...माँ जब हैंसती थी, चेहरे पर झुर्रियों की जाली खिल पड़ती थी...माँ, माँ... “ठीक हो जाएगा, कमजोरी है-डॉक्टर कह रहा है शायद। मेरी नसों मैं गर्म-गर्म खून दौड़ रहा है। मैं जी पडैँगा।

ठीक हो जाऊँगा। ज्योत्स्ना...?

नहीं, एलिस!

लिस की आँखें...पीली पुतली, गोल...पलकें भारी हो रहीं हैं...लल्लन बाई...हरी... साड़ी...मुस्क्राती है...लाल होंठ...एलिस...सुफेद एप्रेन...सुफेद...लाल...हरा... तिरंगा...गोल पुतली...तिरंगा...15 अगस्त...दिल्ली...बैंड...परेड...झंडा...सलामी...पंडितजी...चेहरे पर रेखा गम्भीर...गहरी...।

वंडरफुल स्ट॒डियो

फोटो तो अपने दर्जनों पोज में उतारे हुए अलबम में पड़े हैं, फ्रेम में मढ़े हुए अपने तथा दोस्तों के कमरों में लटक रहे हैं और एक जमाने में, यानी दो-तीन साल पहले, उन तस्‍वीरों को देखकर मुझे पहचाना भी जा सकता था।

लेकिन 'स्वास्थ्य-संशोधन' के बाद वजन में परिवर्द्धन और चेहरे में परिवर्तन होकर जो मेरी सूरत का नया संस्करण निकला, उसे पहचानने में मैं खुद कई बार भटक गया हूँ।

कहाँ वह 95 पाउंडवाला चेहरा और कहाँ यह 154 पाउंड की सूरत!

दोस्तों ने कई बार सलाह दी कि एक नया फोटो उतरवाकर पिछली सभी तस्वीरों के “केन्सिल' होने की घोषणा कर दूँ, और अपने मन में भी कई बार सोचकर देखा कि यह “गुलगुली' न जाने कब गायब हो जाए!

चुनाँचे एक नया फोटो खिंचवाने का फैसला कर लिया गया। वरना, मैं तो अपने को ऐसा परिपक्व पॉलिटिसियन समझे बैठा था जिसकी तस्वीर के लिए सैकड़ों नहीं, तो कम-से-कम दस कैमरेवाले नौजवान जरूर चक्कर काटते हैं।

असल में अपना फोटो उतरवाना “बचकाना” शौक-सा मालूम होता था।

फोटो उतरवाने की बात तो तय हो गई, लेकिन उस शाम को यह फैसला नहीं हो सका कि फोटो कहाँ उतरवाया जाए। हमारे एक मुँहबोले भाईजान हैं, जिन्हें हम इनसायक्लोपेडिया की तरह काम में लाते हैं!

असली जाफरान किस दुकान में मिलती है, मुर्ग.मुस्लम किस होटल पर बेहतरीन होता है, कॉफ़ी किस 'काफे” की सही जायकेवाली होती है, असली गबरडीन कपड़ा किस दुकान में है, बड़े सर्जन और फिजिशियन कौन-कौन हैं और किस 'टेलरिंग” की क्‍या विशेषता है, वगैरह बातों के अलावा पारिवारिक उलझनों को सुलझाने में उनसे बराबर मदद मिलती है।

भाईजान ने कहा, “एक जमाना था जब राजू चौधरी अच्छी तस्‍वीरें बनाया करता था।

गवर्मेंट हाउस से लेकर 'शहादत-आश्रम” तक उसकी पूछ थी। अब्बल दर्जे के फोटोग्राफर के साथ ही वह पक्का मेहनती भी था। उस बार श्मशान-घाट में पूरे तीन घंटे तक मेहनत करके डॉ. अग्रवाल की लाश की ऐसी तस्वीर उसने ली कि जिसे देखकर हर आदमी की ख्वाहिश...”

मनमोहनजी की आदत है कि हमेशा भाईजान की बात को बीच में ही काट देते हैं। बोले, “किस मुर्दे की बात कर रहे हैं, आप? आजकल चतुर्वेदी -स्टुडियो है जिसके बारे में दो रायें नहीं हो सकतीं?”

भाईजान ऐसे मौके पर कभी झुँझलाते नहीं हैं। उन्होंने फिर शुरू किया, “इसके वाद घोषाल अपने नए कैमरों के साथ मैदान में उतरा। उसके बारे में यह मशहूर है कि बगैर 'रिट्च” किए ही बेहतरीन तस्वीरें बनाया करता था।

फिर 'आलोछाया' वालों का युग आया, जो “लाइट और सेड' की कला में निपुण था। प्रोफेसर किरण की एक ऐसी तस्वीर उसने उतारी थी, जिसे इंटरनेशनल फोटोग्राफी प्रदर्शनी में प्रदर्शित करने - की चर्चा जोरों पर चल पड़ी थी। सिर्फ नाक प्र लाइट दिया गया था।

जरा कल्पना कीजिए, काले कार्ड पर सिर्फ नाक और चश्मे के फ्रेम के एक कोने पर हल्की रोशनी डाली गई है और आप उस काले कार्ड पर प्रोफेसर किरण की सूरत को स्पष्ट देख रहे हैं। अब तो चतुर्वेदी का मार्केट है, मगर...”

“मगर क्या?” रमाकिशुनजी ने पूछा।

“मतलब यह कि चतुर्वेदी के यहाँ जानेवालों को अपने पॉकेट पर पूरा भरोसा होना चाहिए।” भाईजान ने फरमाया।

बीरेन को न जाने क्‍यों यह बात लग गई। वह बोला, “भाईजी! आपका यह इल्जाम सरासर गलत और गैरवाजिब है। बेचारा पैसा लेता है तो काम भी करता है। फिल्मों और प्लेटों की बढ़ती हुई कीमतों का भी पता है आपको?”

मजलिस को बहस के लिए काफी मसाला मिल गया था और मुझे याद आई कि “चाय' के पैकेट के खत्म होने की सूचना मुझे सुबह ही दे दी गई थी। सरकारी ट्रेजरी से चेक का रुपया निकास करना आसान है, लेकिन “चूल्हे-चौके' की सरकार से पैसे मंजूर करवाकर निकलवाना कितना कठिन है, यह लिखने की बात नहीं। पैसे निकलते हैं जरूर, मगर हड़डी में घुस जानेवाले रिमार्कों के साथ।

“हजार बार कहा कि अपने लिए 'हैपी वैली' लाते हो तो उसके साथ ही ब्रुकबांड के 'होटलब्लेंड” वाले डस्ट का भी एक पैकेट ले आया करो।

लेकिन इन पर तो “चाय का शौकीन' कहाने का भूत सवार है। दोस्तों ने कह दिया-यार, चाय के असल शौकीन तो तुम्हीं हो-बस, बन गए उल्लू। पूरे छह रुपए बारह आने पाउंडवाली चाय पिलाए जा रहे हैं। दुनिया में आग लगी हुई है और यहाँ “व्हाइट प्रिंस” पीने के मनसूबे बाँधे जा रहे हैं...'-यही मेरी सरकार की, सलाह कहें या फटकार कहें, नसीहत है।

“व्हाइट प्रिंस” नहीं, व्हाइट जेसमिन ! एक दिन हमारी मजलिस में इस बात की चर्चा हो रही थी कि हिन्दुस्तान की कौन-सी शख्सियत कौन-सी चाय और सिगरेट पीती है।

मौलाना आजाद के बारे में कहा गया कि वे व्हाइट जेसमिन चाय पीते हैं। मौलाना ने अपनी किताब “गोबारे खातिर” में कबूल की है। और इसी सिलसिले में हममें से किसी की सरस और चंचल रसना से यह पुरहौसला उद्गार जरा जोर से निकल पड़ा था-““जिन्दगी कायम रही तो हम भी कभी चख लेंगे भाई!” पर्दे के उस पार यही बात पहुँच गई थी और उसी दिन से मुझ पर व्हाइट प्रिंस का व्यंग्ववाण

छोड़ा जा रहों था। यहाँ तक कि ससुराल से यह बात यो 'रिडायरेक्ट' होकर पहुँची थी-“व्हाइट एलिफेंट साहब व्हाइट प्रिंस पीने के मनसूबे बाँध रहे हैं।

चुन्नीलाल को चाय और सिगरेट के लिए बाजार दौड़ाकर जब मैं वापस आया तब बात एकोनामिक्स के डिप्रेसन के दायरे को पार कर पालिटिक्स के सोशलिज्म, कम्युनिज्म और प्रजा-सोशलिज्म के भँवर में चक्कर काट रहीं थी।

रोज ल्‍कड कि है। बात कोई भी हो और कहीं से प्रारम्म किया जाए, उपसंहार यही ता है।

इसलिए उस शाम की मजलिस में यह तय नहीं हो पाया कि फोटो कहाँ उतरवाया ' जाए।

दूसरे दिन शाम को जब मैं चौक से गुजर रहा था, वंडरफुल स्टुडियो” के वंडरफुल साइनबोर्ड की जलने-बुझनेवाली रोशनी ने फोटो की याद दिला दी। यह भी याद आई कि राजन यहीं काम करता है।

राजन, हमारा कलाकार मित्र जो शान्तिनिकेतन से फाइन आर्टस्‌ का डिप्लोमा प्राप्त कर साल-भर तक यहाँ फाँके करता रहा। अब इसी स्टुडियो में उसे नौकरी मिल गई है। आखिर “वंडरफुल'” में ही फोटो उतरवाने का इरादा मैंने पक्का कर लिया।

दुकान में दाखिल होते ही एक खास ढंग के आदमी से सामना हुआ-“फर्माइए जी। मैं ही वंडरफुल का डिरेक्टर हूँ।”

“फोटो लेना है।”

“बेहतर जी। चलिए, अन्दर स्टुडियो में ”

सामने मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था-“यह दुनिया एक वंडरफुल स्टुडियो है।”

“राजनजी कहाँ हैं?” मैंने पूछा।

“कौन राजन! म्हारा आरटिस्ट! बो तो आज बिथ-बाइफ रेडियो सटेशन गया हुआ है। कमरसल आरट पर आज उनका टाकन्‍है।” वह आदमी लुढ़कता हुआ आगे-आगे चल रहा था।

अन्दर के एक कमरे में पहुँचकर वह हमारी ओर मुड़ा-“अच्छा जी ब्हाई सा/ब, पोज आपका अपना होगा या हमारे सेट्स के मुताबिक?”

“क्या मतलब?”

“मतलब समझा देता हूँ”-उसने अपने गले से लटकते हुए मेगनिफाइंग ग्लास की रेशमी डोरी को उँगलियों में लपेटते हुए कहा, “सा/ब, बात यह है कि हमने अपने कस्टमरों की इच्छा के मुताबिक बड़े-बड़े आरटिस्टों को एम्पलाय करके तरह-तरह के सेट्स बनवाए हैं।...इधर आइए। (पर्दा हटाकर) यह है हमारा फिल्‍मी सेट, और ये रहीं तस्वीरें इस सेट की!” उसने एक बड़ा एलबम खोला।

तस्वीरों में देखा, फिल्‍म की मशहूर अभिनेत्रियों के अभिनय के दृश्य थे। बात कुछ समझ में नहीं आई। बोला, “ये तो फिल्‍मी तस्वीरें हैं?”

“जी सा'ब, देखने से तो यही मालूम होती है”-अपनी काया के अनुपात से एक भारी-भरकम हँसी हँसते हुए उसने कहा, “यही तो म्हारी खसूसियत है। जरा गौर से देखना जी-हमने अपने कस्टमरों की ख्वाहिश के मुताबिक उन्हें सुरैया, का ललिनी, निम्मी वगैरह के साथ एक्टंग के पोज में खड़ा कर फोटो लिया

अब सभी तस्वीरें मेरी निगाह में एक साथ नाच गईं। राजकपूर, दिलीपकुमार तथा देवानन्द की तरह बालों को सँवारे हुए नौजवान (और किशोर भी) अभिनय की मुद्रा बनाए हुए हैं। कोई सुरैया की ठुड्डी पकड़कर कुछ कह रहा है। कोई घुटनों तक नेकर और नेवी गंजी पहने हुए, नरगिस के हाथ में हाथ डाले, 'आवारा” के एक पोज में है और कोई निम्मी के कन्धे पर हाथ डाले दिलीपकुमार के अन्दाज में कुछ कहना चाहता है!

“यह सब? ये अभिनेत्रियाँ?” मैं सिलसिले से कुछ पूछ भी न सका।

“ये एक्टरेसस! हँजी, बो “डमी” हैं। हमने बड़े-बड़े फनकारों को अपने यहाँ एम्पलाय किया है, वो हमें हर नए पोज के लिए मिट्टी की मूर्तियाँ घड़ देता है।”

“क्या लड़कियाँ भी इसी तरह के पोज में तस्वीरें उतरवाती हैं?” मैंने जरा साहस से काम लिया।

“जी भोत! उनके लिए हमने एक्टरों की “डम्मियें' बनवा रक्खी हैं। ज्यादेतर लड़कियाँ अशोककुमार, दिलीप और राजकपूर के साथ 'अपियर' होना चाहती हैं। वैसे तो उस दिन एक कालिजगर्ल ने कामेडियन मिर्जा मुशर्रफ के साथ उतरवाने की खाहिश जाहिर की, मगर एक कस्टमर के लिए कौन डम्मी बनाता है? पिछले महीने पच्चीस कस्टमरों के आर्डर पर हमने एक 'शेर' की 'डमी” बनवाई, लोग 'सेमसन” की तरह शेर से लड़ते हुए तस्वीर उतरवाना चाहते हैं।”

“लेकिन फोटो में ये डम्मी जानदार मालूम होते हैं।” मैंने अपनी मुस्कुराहट को होंठों में ही रोकते हुए कहा।

“जी सा'ब!” वो हमारे शेड, मेकअप और रिटेच से ठीक हो जाते हैं।”

लड़के ने आकर कहा, “सा'ब! फिलम सेट का कस्टमर आया हुआ है।”

“ले आओ”-फिर मुझसे बोला, “चलिए, हम आपको अपना दूसरा सेट दिखावें। आपको मेरा पालिटिकल सेट जरूर पसन्द होगा।”

हॉल के दूसरे पार्टिशन में हम गए। बड़े उत्साह से वंडरफुल डिरेक्टर साहब ने मुझे अलबम दिखाना शुरू किया-“देखो जी भाई सा'ब! ये हैं आइना पोजेज!”

एक तस्वीर में देखा, मिलिटरी पोशाक में कुछ लड़कियाँ कवायद कर रही हैं।

“आइना पोज क्या?”

“आप आइना नहीं समझे? अरे! आइना? इंडियन नेशनल आर्मी! ढिल्लन, सहगल, शाहनवाज और काप्टन लक्ष्मी...?”

“ओ! आई.एन.ए.?”

“उस समय तो सा'ब, सब लड़कियों को बस यही शौक था, लिहाजा हमने मिलेटरी वर्दियाँ और 'डम्मी' रायफल बनवाए?”

मैं एक तस्वीर को गौर से देखने लगा-एक दुबली-पतली, लम्बी लड़की, जिसके गालों में गड़ढे थे, आँखें छोटी और अन्दर घुसी हुईं, ठीक कैप्टेन लक्ष्मी के पोज में सेल्यूट...नहीं...जय हिन्द कह रही है। उसके दुबले हाथ में रायफल का कुन्दा हाथी के पाँव-जैसा मालूम हो रहा है।

“और इधर देखिए! हजारों का मजमा है। नेतांजी भाषण दे रहे हैं। सामने माइक' है।”

फोटो में भीड़ को देखकर कांग्रेस के महाधिवेशनों की याद आ रही थी। मैंने ताज्जुब से कहा, “हजारों का मजमा नहीं, लाखों का कहिए। लेकिन...इतने लोगों को; यानी इतनी “डम्मियाँ' आपने कैसे बनवाई?”

वह हँस पड़ा, शायद मेरी बेवकूफी पर। फिर बोला, “सा'ब, ये फोटोग्राफक टिरीक हैं। हमने इस तरह के पर्दे बनवा लिए हैं।”

“देखो जी! ये मजदूरों का लीडर है। हजारों मजदूरों के जलूस की रहनुमाई कर रहा है।”

देखा-हजारों मजदूरों की लम्बी कतार के आगे हाथ में झंडा (सही रंग नहीं कह सकता, क्योंकि फोटो में काला ही था, और झंडे के निशान के बारे में जानकर क्‍या कीजिएगा ?) लिए हुए, बाल बिखराए हुए, मुँह फाड़े हुए, मजदूरों के लीडर कदम आगे बढ़ा रहे हैं। वाह!

“इस पोज में राजनैतिक कार्यकर्ता या लीडर क्‍यों अपनी तस्वीर उतरवाएँगे? इसे तो बैठे-ठाले लोग ही पसन्द करते होंगे। फोटो देखकर भी तो यही जाहिर होता है?” मैंने कहा।

“आप ठीक कहते हैं सा'ब। ज्यादेतर ऐसे-वैसे लोग ही-खासकर व्योपारी, सेठ-साहूकारों के लड़के इसे पसन्द करते. हैं? हमने कुछ जवाहर जैकेट, कुछ सुफेद और रंगीन टोपियाँ बनवा ली हैं। लेकिन अभी उस दिन...माफ करना जी...प्राइवेट बात है...आप किसी से बोलना मत। अभी उस रात को मनिस्टर कृपा बाबू का प्राइवट सिकरटरी चौबे आके हाजिर। बोला, देखो जी पापड़ा, पुरानी दोस्ती है तुमसे, भोत प्राइवट बात है। मनिस्टर सा'ब रायपुर में ब्रच्छ-रोपण में गए थे। बेदर अच्छा नहीं था, तस्वीर साफ नहीं आई। कोई उपाय करो। कल ही अखबारों में देना है। मैं बोला-मगर मनिस्टर सा'ब को सटुडियो में आना होगा जी! ग्यारह बजे रात को मनिस्टर सा'ब आए। हमने झंडोत्तोलनवाला पर्दा लगा दिया, हमारे आरटिस्ट ने झंडे की जगह ब्लैंक कर दिया, वहीं मनिस्टर सा'ब ने ब्रच्छ-रोपण किया। झंडोत्तोलन के बदले ब्रच्छ-रोपण ही सही।”।

उसने तस्वीर देखने को दी। अरे! यह तस्वीर तो हाल ही पत्रों में छपी है। मुझे तो इसके ऊपर की सुर्खी और नीचे का चित्र-परिचय भी याद है!

बगल के पार्टिशन से (फिल्म सेट से) आवाज आ रही थी-“कमर को और झुकाइए...जरा...हाँ...और उँगलियों को बिखराइए फूलों की पंखुड़ियों की तरह...इस

वंडरफुल साहब मुस्कुराकर बोले, “बो डानस का पोज ठीक हो रहा है। है न वहाँ...मोड़ पर, उसी का डिरेक्टर हमारा डानस पोज बनाता..

“वाह साहब! वास्तव में वंडरफुल है आपका स्टुडियो! युनिक है।” मैंने कहा।

“सा'ब, हम इसे और डेवलप करेंगे। इधर हमने फिर दो सेट बनवाए हैं। कौमी सेट...और फरेंच सेट!”

“कौमी सेट? जरा वह भी दिखाइए ,”

इस बार वंडरफुल साहब कुछ हिचकिचाए। फिर बोले, “देखिए जी बाबू सा'ब। आप जब राजन के मित्तर हैं तो हमारे भी मित्तर ही ठहरे; वरना, हम औरों को नहीं दिखाते। आइए।”

तीसरे पार्टिशन में ले जाकर वंडरफुल ने मुझे दो-तीन तस्वीरें दिखाईं। एक में एक नौजवान को एक लुगगीधारी बूढ़े के पेट में छुरा घुसेड़ते देखा।

दूसरे में एक बहादुर युवक शिवाजी की तरह घोड़े को उछालता और तलवार चलाता हुआ दिखाई पड़ा। तीसरे में भारत-माता आसमान से पुष्प-वृष्टि कर रही है और एक वीर राष्ट्रीय झंडे को फाड़कर चित्थी-चित्थी कर रहा है...हजारों की भीड़ है।

“और इधर फरेंच सेट है...हालीउड फिलम सेट!”

मेरा सिर चकरा रहा था। मैं पास की पड़ी हुई तिपाई पर बैठते हुए बोला, “वंडरफुल सा'ब! आपको किन शब्दों में धन्यवाद दूँ। आपने कितना बड़ा कल्याण किया है समाज का-यह कहने की बात नहीं। आपने यदि यह स्टुडियो नहीं खोला होता तो दुनिया के लोग पागल हो गए होते।...आप इंसान के मन में सोई हुई अतृप्त इच्छाओं की तस्वीर लेते हैं। यह तो बेजोड़ है। सही तस्वीर तो आप ही लेते हैं इंसान की। वाह!”

वंडरफुल अब बकने लगा, “बाबूजी! यहाँ बिजनेस का तो कोई मजा ही नहीं। लाहौर में जब हम थे तो ऐसे एक-एक पोज के लिए एक-एक सौ रुपए लोग देते थे। यहाँ तो लोग “आरट” को समझते ही नहीं।...अच्छा जी! अब फर्माइए, आपके लिए कौन-सा सेट लगवाऊँ!”

“मेरे लिए?...मेरे लिए सेट लगवाने की जरूरत नहीं। मैं अपने मन का पोज देना चाहता हूँ।” मैंने गम्भीरतापूर्वक कहा।

“बेहतर जी! फमइए।”

“मेरे गले में रस्सी का फन्दा डालकर एक पेड़ से लटका दो। फोटो ऐसा उतरे जिसमें मेरी आँखें और जीभ बाहर निकली हुई हो और हाथ में एक कागज का टुकड़ा हो जिस पर लिखा हो-'खुश रहो वंडरफुल वतन हम तो सफर करते हैं!।”

इतिहास, मजहब और आदमी

उस दिन दीवाली थी-लक्ष्मी के शुभागमन का एकमात्र दिन।

सुबह उठते ही मनमोहन, माँ से लड़कर “कैम्प” में चला गया था। आस-पास गाँवों में जोरों से हैजा और मलेरिया फैला हुआ था।

भूख और रोग का संयुक्त मोर्चा। प्रत्येक गाँव से रोज आठ-दस लाशें उठ जाती थीं। बहुत 'लिखा-पढ़ी' खुशामद और लड़-झगड़कर, मनमोहन एक "मेडिकल कैम्प” ला सका था। वह स्वयं डॉक्टरों के साथ, सुबह से शाम तक गाँवों में घूम-धूमकर दवा और पथ्य बाँटता फिरता था।

दोपहर को वह घर लौटा।

नौकर-नौकरानियों के साथ, माँ सफाई के काम में लगी हुई थी। केले के पौधे गाड़े जा रहे थे, कन्दीलें बनाई जा रही थीं, रंगीन कागजों की झंड़ियाँ सजाई जा रही थीं। और इन सजावटों को खड़ी देख रही थी, गाँव के दर्जनों नग्न-रुग्ण भूखे लड़के- लड़कियों की भीड़। वृद्ध नौकर रामटहल बार-बार उन लोगों को अकारण ही डॉट बता देता था और प्रत्येक डॉट पर यह एक कदम पीछे हट जाती थी।

मनमोहन बरामदे में पड़ी हुई एक कुर्सी पर धम्म से जा बैठा।

हवा में चूने और वार्निश की गन्ध घुल-मिल गई थी। बगल के एक करमेरे में माँ नौकरों से डटकर काम ले रही थी और साथ-साथ बड़बड़ा रही थी।

“ तुम क्रिस्तान हो जाओ, घर में मुर्गे-मुर्गियाँ पकवाओ, मुसलमानों के साथ खाओ, मैं कुछ नहीं बोलती। तुम देवी-देवताओं की खिल्ली उड़ाते हो, मैं नहीं रोकती। लेकिन जब तुम मेरे धरम-करम में अड़ंगा डालोगे, माँ लक्ष्मी की पूजा नहीं करने दोगे-तो इसे मैं कैसे बर्दाश्त करूँ! बाप का धरम था, तुम्हें पढ़ाया-लिखाया, तुम्हेरे लिए जमीन-जायदाद छोड़कर बेचारे सिधार गए। पढ़-लिखकर पंडित हुए, नहीं कमाते हो तो हर्ज नहीं, लेकिन बाप की इज्जत, घर की मर्यादा को तो कम-से-कम निभाओ। | सो नहीं, बैठे-बिठाए आवारों के साथ हल्ला, धरम छोड़कर अधरम की बातें और किसान-मजदूर राज्य...। हो चुका किसान-मजदूर राज्य!”

मनमोहन बरामदे से सबकुछ सुन रहा था। उसने देखा कि माँ का क्रोध अब तक भी शान्त नहीं हुआ है। वह उठा और अपने कमरे में दाखिल हुआ। वह थोड़ा लेटना चाहता था किन्तु कमरे में आकर उसने देखा कि पलँग पर एक अपरिचित वृद्ध आधिपत्य जमाए बैठा है। वह उसकी ओर गौर से देखकर एक कुर्सी पर बैठ गया।

वृद्ध ने तपाक से फर्श पर खैनी थूकते हुए, सड़ी हुई दन्त-पंक्तियाँ निकालकर हा अहा हा! बबुआजी, माँ लक्ष्मी कल्याण करें। प्रातःकाल से कहाँ रहे बबुआ जी!”

मनमोहन ने अन्यमनस्क होकर मिनमिना दिया--“जरा गाँवों में घूम रहा था।”

'अहा हा!” वृद्ध पुनः थूकता हुआ बोला-“ठीक है, ठीक है, परोपकार तो महा धर्म है बबुआजी! किन्तु देवी-देवताओं का अनादर, माँ लक्ष्मी का अपमान आदि तो सर्वथा धर्म-विरुद्ध आचरण है। अंग्रेजी पठन-पाठन का...” !

“आप ?...आप कौन हैं?”-मनमोहन ने टोका।

अहा, हा! अपने कुल-पुरोहित पंडित दिनमनि पाठक को नहीं पहचानते बबुआजी ?

“आप ही पुरोहित दिनमनि पाठक हैं?” मनमोहन ने भौं सिकोड़ते हुए पूछा। पंडितजी पुनः एक बार धूककर, जोर-जोर से हँसने लगे। मनमोहन को सिर्फ दो घंटे पहले की बात याद आ गई। महा कंगाल चेथरु मंडल रो-रोकर कह रहा था कि पंडित दिनमनि ने उसे लूट लिया। उसके एकलौते जवान बेटे के श्राद्ध में 5) रुपए दक्षिणा तो लिया ही, जबर्दस्ती एक गाय भी खोलकर ले गया। स्त्री के श्राद्ध में अँगूठे का निशान लेकर जी नहीं भरा तो छप्पर पर से कोहड़े, शाक-भाजी भी नोपाकर ले गया...।

मनमोहन को गम्भीर देखकर पंडितजी ने सोचा कि वह अपनी अनभिज्ञता पर लज्जित हो रहा है। उन्होंने उत्साहित होकर कहा-“कोई चिन्ता नहीं बबुआजी...

मनमोहन ने सहसा पूछ लिया-“पंडितजी, क्या आप कह सकते हैं, माँ ने जो यह नई जमीन ली है उसके खरीदने में आपका कितना .हाथ है?”

“बबुआजी! मैंने ही तो सबकुछ किया”-वृद्ध मनमोहन के भावों को नहीं समझ सका। वह प्रसन्‍न होकर कहता गया-“विधवा तो जमीन बेचने के लिए राजी ही नहीं हो रही थी। बस मैंने धरम की वह लकड़ी फेरी कि सारी अकड़ जाती रही।...”

और कैलाशपति के विरुद्ध झूठी गवाही भी आपने ही दी थी?

अरे क्या पूछते हो बबुआजी! तुम्हें तो सब मालूम है। नहीं रहे मालिक मेरे, वरना सारी लक्ष्मीपुर की जमींदारी अपनी होकर रहती। मैं तो सेवक हूँ, बहूजी की आज्ञा पर...

और आप ग्राम हिन्दू-सभा के सभापति भी हैं?

अहा हा! तुम तो सब जानते हो बबुआजी। मालिक ने मुझे जो कुछ भी बनाया, वह हूँ। अब तुम जमींदारी का भार तो सँभालो

अहा हा! माँ दुर्ग!

“अब आप जा सकते हैं।”-मनमोहन की त्योरियाँ बदल गईं। वृद्ध कुछ बोलना ही चाहता था कि मनमोहन ने कहा-“अब फिर दर्शन देने का कष्ट नहीं कीजिएगा।

वृद्ध ने अपनी गन्दी झोली उठाई और राह पकड़ी।

फर्श पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। उसकी सफाई के लिए मनमोहन ने नौकर को आवाज दी। अचानक माँ ने कमरे में प्रवेश किया। क्रोध से वह जल-सी रही थी। उसके नथुने फूले हुए थे और वह जोर-जोर से साँस ले रही थी। बोली-““अब मुझे क्या कहते हो, कहो? माँ लक्ष्मी का अपमान करके जी नहीं भरा तो बेचारे ब्राह्मण को गालियाँ देकर निकाल बाहर किया।

अब मुझे गला घोंटकर मार डालो तो स्वर्ग में तुम्हारे पिता को शान्ति मिले। हे भगवान, मेरे ही कोख से ऐसे अधरमी को जन्म लेना था...।

वह रो पड़ी। मनमोहन पत्थर की तरह बैठा रहा।

माँ आँचल से आँख पोंछती हुई चली गई। मनमोहन -जरा लेटना चाहता था लेकिन पलँँग की ओर निगाह उठाकर वह बैठा रहा। कुछ देर के बाद वह उठा और टेबिल पर कोई किताब ढूँढ़ने लगा।

उस दिन भंडारघर की सफाई के सिलसिले में धननू की माँ ने एक अलभ्य पुस्तक का जीर्णोद्धार किया था और बड़े उत्साह से मममोहन के टेबिल पर रख गई थी। टेबिल पर तीन-चार मोटी-मोटी किताबें, जिनके नाम सुनहले अक्षरों में लिखे हुए, चार-पाँच छोटी और पतली, जिनके “गेट-अप” इतने अच्छे थे कि बरबस पढ़ने को जी मचल पड़े। अंग्रेजी और हिन्दी की कुछ मासिक पत्रिकाएँ और रंगीन पत्थरों के नीचे दबी हुई रंग-बिरंगी चिट्रठयों के बीच वह गन्दी और पुरानी किताब आँखों में खटकी। मनमोहन ने उसे उठाकर देखा-“भारतवर्ष का इतिहास! वह किंचित . मुस्कुराया और उसे. एक ओर फेंक दिया, फिर कुछ सोचकर उसे उठा लाया और आरामकुर्सी पर लेट गया।

आज मनमोहन एम.ए. है। विश्वविद्यालय ने, जिस वर्ष उसे इतिहास में प्रथम श्रेणी एम.ए. घोषित किया उसी वर्ष भारत सरकार ने उसे शान्ति का शत्रु कहकर नजरबन्द भी बना लिया था।

वह मुस्कुराता हुआ पन्‍ना उलटता रहा। स्थान-स्थान पर पंक्तियाँ 'अंडर-लाइन' की हुई थीं, परीक्षा में पूछे जाने की सम्भावना प्रकट की गई थी।...पानीपत की लड़ाई...ताजमहल की तस्वीर. औरंगजेब, छत्रपति शिवाजी. “बहादुरशाह...अंग्रेजी शासनकाल...

वह रुक गया, राबर्ट क्लाइव की बगल में लिखा हुआ था Most Important... क्लाइव बड़ा बदमाश था।

वह स्कूल की खिड़कियों और बेंचों को तोड़-फोड़ डालता था।

मनमोहन को याद आया कि सूरज प्रसाद को भी मास्टर साहब राबर्ट क्लाइव कहते थे। बड़ा शैतान था सूरज भी, स्कूल भर में सबसे बदमाश !...यह सब दिन वैसा ही रहा। 942 के आन्दोलन में उसे फाँसी हो गई। आह! सूरज नहीं रहा। कितना बड़ा संगठनकर्ता था वह, कितना निडर! आँधी और तूफानों में भी हँसनेवाला! सुना कि फॉँसी के दिन वह रोया था। क्‍या वह रोया, होगा ?...शारदा बिना माँ-बाप की बच्ची, भूखों मर गई।...देश के कितने सूरज अस्त हो गए, कितनी शारदा भूख से बिलख-बिलखकर मर गई होंगी।

पन्‍ना उलटा-सिराजुद्दौला। सिराजुद्दौला सिर्फ 20 वर्ष की उम्र में नवाब हुए।...मनमोहन ने अपनी उम्र को जोड़ा-25 वर्ष | एक बार मनमोहन ने सिराजुद्दौला पर कविता .लिखी थी-“प्यारे सिराज! प्यारे सिराज! ज्योत्स्ना को वह कविता बड़ी अच्छी लगती थी। वह बार-बार यही कविता सुनना चाहती थी। ज्योत्स्ना कम्यूनिस्ट पार्टी में काम करती है, अब सुना है, 942 आन्दोलन के समय वह रेडियो पर 'जन संगीत” गाया करती-टट्रामों में आग लगानेवाले गुंडे हैं, बदमाश हैं, और “क्रान्ति नहीं है, यह क्रान्ति नहीं है...दुश्मन है द्वार पर... मनमोहन ने किताब पर दृष्टि गड़ाई...इस अमानुषिक बध को ब्लेकहोल की घटना कहते हैं।

वह मुस्कुराया। बहुत देर तक मुस्कुराता रहा। अचानक रामटहल आकर खड़ा हो गया।

क्या है?

पूजा शुरू हो गई।

तब?

आप नहीं चलिएगा?

“नहीं।”

रामटहल चला गया।

मनमोहन पुनः किताब के पन्‍नों में वापस हो गया।...लार्ड कार्नवालिस...जमींदारी प्रथा का जन्म...जमींदारी प्रथा आज मिट रही है।

इस सत्यानाशी प्रथा को कायम रखने के लिए जमींदारों ने क्या-क्या नहीं किया!

आज भी वे सचेष्ट हैं।

उन्होंने राष्ट्र सेवक दल नामक एक संस्था भी कायम की है। मुस्लिम नेशनल गार्ड और यह राष्ट्र सेवक दल' मुस्लिम और हिन्दू पूँजीपतियों की डूबती हुई नैया को बचा सकेगा?...इस गाँव में भी तो काली टोपी लगाए शाम को कुछ लड़के लाठी उुमाया करते थे। आज गाँव में महामारी फैली हुई है। कहाँ हैं वे?...कहाँ हैं थापटजी ?

उसने पन्ने पर निगाह गड़ाकर पूछा, “भूखे, बीमार मुल्क में धर्म के नाम पर लड़ाइयाँ होती हैं अथवा रोटी के लिए? रोटी के लिए नोवाखाली और बिहार के गाँवों ने कितनी बार सम्मिलित कोशिश की?...क्या 'कालीवर्दी का” राज होकर ही रहेगा?”

दीवाली की सन्ध्या न जाने कब उतर गई। कमरे के अन्धकार में बैठा मनमोहन अपने-आपसे पूछ रहा था-है हिम्मत? इन बिगड़ते हुए इतिहास के पन्नों को फाड़कर जलाना होगा।

असंख्य दीपों की टोली झिलमिला उठी, केले के पौधों में पिरोई हुई मोमबत्तियाँ जलने लगीं-गलने लगीं। पटाखे, फुलझड़ी, आतिशबाजी!! आँगन में एक साथ, घड़ियाल शंख और घंटी घनघना उठी। आरती हो रही है। बड़े घर की दीवाली देखने के लिए, प्रसाद लेने के लिए गाँव-भर की जनता टूट पड़ी। भूखी, बीमार-नग्न जनता। क्या प्रसाद से भूख मिट सकती है?

श्री लक्ष्मी मैया की जय...! जयध्वनि के साथ पूजा शेष हुई। प्रसाद वितरण कोलाहल !

मनमोहन के कानों के पास गूँज रहा था-श्री लक्ष्मी मैया की जय ? उसने शब्दों को तोड़ना शुरू किया-

श्री लक्ष्मी मैया की जय !

व्यक्तिगत सम्पत्ति की जय!

लूट, बेईमानी, शोषण की जय!

पाकिस्तान की जय।

लड़ाई की जय!

“फासिज्म की जय।”

और यह God Save The king इस प्रार्थना के बावजूद भी सम्राट मर जाता है तो “गॉड सेव दि किंग” का मतलब हुआ...ईश्वर, गुलामी, गरीबी, भूख, मौत, जुल्म, दंगे, लूट, कत्लेआम-सभी को कायम रखें।

वह बरामदे पर आकर खड़ा हो गया। गाँव के कुछ रोगमुक्त नौजवान, सामने के मैदान में 'मशाल' लीला मना रहे थे। हाथ में बड़े-बड़े जलते हुए मशाल लेकर वे दौड़ पड़े थे। शोरगुल मचा रहे थे। दीवाली की यह शेष विधि उसे बड़ी अच्छी लगी। घोर अन्धकार में लपलपाते हुए मशाल-लाल-लाल !

धीरे-धीरे मशालों की संख्या बढ़ती गई, शोरगुल में तेजी आती गई। मनमोहन मुस्कुरा पड़ा। उसके पाँव आप ही आगे बढ़ने लगे। उसने उलटकर एक बार दीपों की ओर देखा-कतार में सजे-सजाए हजारों दीप जगमग-जगमग कर रहे थे। जगमग-जगमग- श्रृंगार रस की कविता-सी, रुनझुन-जैसे खुमारी से ऊँघती हुई महफिल में वेश्या नाच रही हो।

उसने मशालों की ओर देखा-एक तांडव-नृत्य-सा, मुक्त घर-सा। उसने अपने नसों में गर्म खून का अनुभव किया।

मनमोहन चल पड़ा रोगग्रस्त गाँवों की ओर, और उसके घर से एक मील दूर थे वे गाँव-जहाँ गिध, गीदड़-कुत्ते महीनों से त्योहार मना रहे थे। उन गाँवों के बीच सघन आम के बाग में मेडिकल कैम्प था। दूर से ही रोशनी दिखाई पड़ती है। उसने गाँव में प्रवेश किया।

गाँव का यह प्रवेश भाग शान्त था, शान्त यानी-इस अंचल की आबादी, एकदम खत्म हो चुकी थी।

गाँव के मध्य भाग में कुछ कुत्ते आपस में मिलकर डरावनी आवाज में रो रहे थे। वह सिहर पड़ा, किन्तु चलता गया। एक अँधेरी और गन्दी गली में वह ठिठक पड़ा- सफेद छाया भागकर अँधेरे में जल्दी-जल्दी छिप गई। पहले तो वह डरा, लेकिन तुरन्त ही सँभल गया। उसने पहचान लिया। डॉ. सिन्हा और मिस चटर्जी-मेडिकल स्टुडेंट। उसने चलते-चलते सोचा-दोनों एक ही बात है, अस्थिपंजरों के गाँव में फुलझड़ियाँ जलाकर दीवाली मनाना और लाशों पर खड़ा होकर प्रेमालिंगन करना, दोनों एक ही बात है।

वह गाँव के मध्य भाग में आ गया। शुरू में ही हमीद मियाँ का घर था। गाँव-भर का चचा हमीद। हमीद के आँगन में जाकर उसने पुकारा-“रुकिया! रुकिया !”

“हाय रे! अरे बाप! आओ भैया !”-एक झोंपड़ी से कॉँपती आवाज आई।

“अरे! तू भी पड़ गई क्या? हमीद चाचा कैसे हैं और चाची!” सिर झुकाकर अन्दर चला गया। रुकिया जमीन पर चीथड़ों में लिपटी हुई कांप रही थी। मनमोहन ने जलती हुई कुप्पी उठाई और दूसरी झोंपड़ी में जाकर देखा-हमीद की लाश ऐंठ गई थी और पास ही बुढ़िया भी मुँह फाड़े पड़ी थी। वह एक लम्बी साँस छोड़कर लौट आया बा पर कृप्पी रखकर बोला-“घबराओ मत रुकिया। मैं यहीं हूँ। डॉक्टर आए थे!”

“भाई जी! बहुत जोरों की सर्दी...जाड़ा!”

मनमोहन जमीन पर बैठ गया और सोचने लगा कि वह क्या करे! उसने झोंपड़ी में एक बार निगाह दौड़ाई-चारों ओर गन्दगी फैली हुई थी। कपड़ों के नाम पर दो-चार चीथड़े इधर-उधर फेंके हुए थे। तीन-चार मिट्टी के पुराने बर्तन-सर्दी, सिल, नमी और बदबू!

“भैया! मुझे दबा रक्खो, मेरी हड़िडयाँ अलग हो रही हैं।”

मनमोहन ने उसकी पीठ पर अपने को डाल दिया। गन्दे कपड़ों की गन्ध से उसका सिर चक्कर खाने लगा।...आह...! कितनी स्वस्थ और तगड़ी लड़की थी वह! मेहनत से कभी भागती नहीं थी। गाँव-भर की सेवा की है इसने। कैम्प में आई हुई कॉलेज की लड़कियों को इसने निःस्वार्थ सेवा का सबक सिखा दिया है।

इसकी मांसल बाँहें, गठा हुआ शरीर और उसने अपने शरीर को जरा खींचा कि रुकिया कराह उठी-“भाई जी! मैं मर जाऊँगी, मत जाओ। भाई जी!” वह फूट-फूटकर रो पड़ी। मनमोहन ने पुनः उसे दबाया-“डरो मत, मैं कहीं नहीं जाता। मलेरिया है, सुई पड़ते ही अच्छी हो जाएगी।”

वह बैठा रहा। रुकिया कराहती थी, पानी माँगती थी। पानी पीकर कै करती थी। फिर रोने लगती थी। मनमोहन उसकी तीमारदारी कर रहा था।...आँगन में जमीन सूँघते हुए एक सियार ने प्रवेश किया। रुकिया की कराह पर उसने डरकर झोंपड़ी की ओर देखा।

उसकी आँखें अँधेरे में चमक उठीं। वह बहुत देर तक देखता रहा। मनमोहन को लगा जैसे सियार आश्चर्यित होकर देख रहा हो, क्योंकि रुकिया ने उसे दोनों हाथों से जकड़ रखा था।

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