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वीर बालक

Veer Balak Story in Hindi List

इमानदार गरीब बालक

बालक जार्ज वाशिंगटन की परोपकारप्रियता एवं सत्यवादिता

भिखारी बालक की ईमानदारी

वीर बालक चण्ड

सत्यवादी तथा परदुःखकातर बालक नेपोलियन

सत्यकी खोज में बालक सुकरात

बालिका विक्टोरिया की सच्चाई

वीर बालक पुत्त

भगत सिंह

सत्यवादी बालक अब्दुल कादिर

वीर बालक स्कन्दगुप्त

असली दौलत

वीर बालक प्रताप

वीर बालक रामसिंह

बालक रानाडॆ की खेल में भी ईमानदारी

निर्दोष को बचाने वाला सच्चा बालक

बालिका हेलेन बाकर की सत्यनिष्ठा

ईमानदार होटलवाला बालक

वीर निर्भीक बालक शिवाजी

बालक चार्ली की सचाई

मजदूर बालक की ईमानदारी

इमानदार गरीब बालक

एक गरीब लड़का था। घर में उसकी माँ थी और एक छोटी बहिन। बहिन बीमार थी। वह उसकी दवा कराने के लिए अपने चाचा से कहने जा रहा था। रास्ते मे उसे एक पाकेटबुक पड़ी मिली। उसमें 120 के नोट थे।

लड़का बड़ा ईमानदार था। उसने अपने मन में निश्चय कर लिया कि यह जिसकी पाकेटबुक है, उसका पता लगाकर उसे जरूर दूँगा।' उसने घर आकर अपनी माँ से सब हाल सुनाकर कहा - 'माँ जिस बेचारे की पाकेटबुक खोई है, उसकॊ बड़ी चिन्ता हो रही होगी; क्योंकि इसमें उसके रुपये हैं। हम ये रुपए रख लेंगे तो बहुत पाप होगा और प्रभु हमपर नाराज होंगे; पर जिसके रुपए खोये हैं, उसका पता कैसे लगे? माँ! तू कोई उपाय बता, जिससे मैं उसे खोज पाऊँ।' लड़के की माँ भी बड़ी ईमानदारी थी। तभी तो उसको ऎसा पुत्र हुआ। वह पुत्र की बात सुनकर बड़ी प्रसन्न हुई।

उसने कहा-'बेटा ! भगवान तेरी नियत की सच्चाई इसी प्रकार दृढ रक्खें। तेरा कल्याण हो। बेटा ! किसी अखबार मे खबर देने से मालिक आप ही आकर ले जाएगा।'

लड़का अखबार बाले के पास गया। उसकी नेक नीयती देखकर अखबार बाले ने उसके नाम से यह विज्ञप्ति छाप दी - 'मुझे एक पाकेटबुक रास्ते मे मिली है, उसमॆ एक सौ बीस रुपये के नोट हैं। जिसकी हो वह अमुक पते पर आकर सबूत देकर ले जाय।' विज्ञप्ति पढ़कर पाकेटबुक का मालिक आया और इतनी गरीबी में भी ऎसी ईमानदारी देखकर चकित हो गया।

उसने कहा - 'जो गरीब होकर भी दूसरों के पैसों पर जी नहीं ललचाता, वहीं सच्चा ईमानदार है और वहीं प्रशंसा के योग्य है तथा सचमुच गरीब ही ऎसे ईमानदार होते हैं। पैसेवाले तो प्रायः अभाव न होने पर भी, पैसे के सङ्ग से लोभ मे पड़कर बेईमान हो जाते हैं। तुमको धन्य है, जो इस प्रकार प्रभुपर विश्वास रखकर अपने सत्य पर डटे रहे।'

यह कहकर उसने वे नोट लड़की की दवा और सेवा के लिए आग्रह करके दे दिए और लड़के को अपने यहाँ अच्छी नौकरी दे दी। लड़का अपनी इमानदारी के बलपर आगे चलकर नामी और धनी व्यापारी बना।

बालक जार्ज वाशिंगटन की परोपकारप्रियता एवं सत्यवादिता

एक पहाड़ी नदी के किनारे सबेरे के समय एक स्त्री बड़े करुणापूर्ण स्वर मे चिल्ला रही थी - 'बचाओ ! मेरे बच्चे को बचाओ !'

लोग दौड़े आये, पर कोई नदी मे कुदने का साहस नहीं कर सका। नदी की धारा बहूत तेज थी और भय था कि उसमे पड़ने पर चट्टानो से टकराकर हड्डियांँ तक चूर- चूर हो जायेगी। इअतने मे एक अठारह वर्ष का युवक वहाँ दौड़ा हुआ आया। उसने अपना कोट उतारकर पृत्वी पर फेक दिया और धम्म से नदी मे कुद पड़ा।

लोग एक टक देख रहे थे। अनेक बार वह नौजवान भॅंवर में पड़ता जान पड़ा। कैइ बात तो वह बाल-बाल बचा चट्टान पर टकराने से। कुछ क्षण में यह सब हो गया। अन्त में वह उस डूबे हुए मूर्च्छित बालक को अपनी पीठपर लादे बालक जार्ज वाशिंगटन की परोपकार प्रियता एवं सत्यवादिता तैरता हुआ किनारे आ गया। दूसरों की रक्षा के लिये अपने प्राणॊं पर खेल जाने वाला यह युवक था-जार्ज वाशिंगटन।

जार्ज वाशिंगटन अमेरिका के एक किसान का लड़का था। वह जब छोटा था, तब एक दिन उसके पिता ने उसे एक कुल्हाड़ी दी। उसे लेकर जार्ज बगीचे में खेलने लगा। बगीचे में जो पेड़ देखता, वह उसीपर कुल्हाड़ी चलाता और हॅंसता। उसके पिता ने बड़ी कठिनता से प्राप्त करके एक फलका वृक्ष लगाया था। जार्ज ने उसपर भी कुल्हाड़ी चला दी। इस प्रकार कुल्हाड़ी से खेलकर वह खुशी-खुशी घर लौटा।

इधर उसका पिता बगीचेमें पहुँचा, तो उसने उस फलके पेड़ को कटा देखा। उसे बहुत दुःख हुआ। उसने मालियों से पूछा, पर किसीने भी पेड़ काटना स्वीकार नहीं किया। तब घर आकर जार्जसे पूछा। जार्जने कहा-'पिताजी! मैं खेल रहा था और पेड़ों पर कुल्हाड़ी चला-चलाकर यह आजमा रहा था कि मुझसे पेड़ कटते हैं कि नहीं। उस पेड़-पर भी मैंने ही कुल्हाड़ी मारी थी और वह उसी से कट गया था।'

पिता ने कहा-'बेटा! तुझे इस काम के लिये तो मैंने कुल्हाड़ी नहीं दी थी; परंतु सच्ची बातपर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। इससे मैं तेरा अपराध क्षमा करता हूँ। तेरी सच्चाई देखकर मुझे बड़ी ही प्रसन्नता हुई।

यही जार्ज वाशिंगटन बड़ा होकर अमेरिका का प्रख्यात अध्यक्ष हुआ।

भिखारी बालक की ईमानदारी

एक धनी आदमी रास्ते से जा रहा था। एक फटे-हाल गरीब लड़का उसके पास गया और उसने पैसा माँगा। धनी ने अपनी जेब से एक चवन्नी निकाल कर उसके हाथ में दी और कहा-'इसमें से एक आना तुमको देना है, वह तू ले ले और्तीन आने मुझे वापस दे। उस लड़के के पास फुटकर पैसा न था। उसने कहा कि 'मैं इसे अभी भॅंजाकर लाता हूँ। इतना कहकर वह दौड़ गया। उसको देर लगते देखकर उन गृहस्थ ने थो देर राह देखी और फिर वह वहाँ से चला गया। वह लड़का चवन्नी भॅंजाकर पीछे लौटा; पर उसने उस गृहस्थ को वहाँ न देखा। तब उसने निश्चय किया कि वह इस रास्ते से जब कभी निकलेगा तब उसे तीन आने पैसे वापस कर दूँगा।

वह लड़का भीख माँगकर प्रतिदिन अपना गुजारा करता था, पर उस तीन आने पैसे को हाथ नहीं लगाता था। एक सप्ताह बाद वह गृहस्थ उसको दिखायी पड़ा। वह लड़का तुरंत ही उसके पास गया और उसके हाथ में तीन आने पैसे दे दिये। उस गृहस्थ को वह बात याद भी न थी। लड़के की ईमानदारी देखकर वह बहुत ही प्रसन्न हुआ और उसकी गरीब हालत पर दया करके उसे अपने यहाँ ले गया। उसे स्कूल में भरती करवा दिया। उसके बाद वह लड़का धीरे-धीरे पढकर भारी विद्वान हो गया। उसे यश और सुख दोनों मिले।

वीर बालक चण्ड

चित्तौड़ के राज सिंहासन पर उस समय राणा लाखा विराजमान थे।

अपने पराक्रम से युद्ध मे दिल्ली के बादशाह लोदी को उन्होने पराजित किया था उनकी कीर्ति चारों ओर फैल रही थी।

राणा के पुत्रों मे चण्ड सबसे बड़े थे और गुणो मे भी ये श्रेष्ठ थे।

जोधपुर के राठौर नरेश रणमल्लजी ने राजकुमार चण्ड के साथ अपनी पुत्री का विवाह करने के लिए चित्तौड़ नारियल भेजा।

जिस समय जोधपुर से नारियल लेकर ब्राह्मण राज सभा मे पहुँचा, राजकुमार चण्ड वहाँ नहीं थे।

ब्राह्मण ने जब कहा कि 'राजकुमार के लिए मैं नारियल ले आया हूँ ; तब परिहास मे राणा लाखा ने कहा - मैने तो समझा था कि आप इस बूढ़े के लिए नारियल लाये हैं और मेरे साथ खेल करना चाहते हैं।

राणा की बात सुनकर सब लोग हँसने लगे।

राजकुमार चण्ड उसी समय राज सभा मे आ रहे थे।

उन्होने राणा के शब्द सुन लिए थे।

बड़ी नम्रता के साथ उन्होने कहा - 'परिहास के लिए ही सही, जिस कन्या का नारियल मेरे पिता ने अपने लिए 'आया' कह दिया, वह तो मेरी माता हो चुकी।

मैं उसके साथ विवाह नही कर सकता।'

बात बड़ी विचित्र हो गयी।

नारियल को लौटा देना तो योधपुर नरेश तथा उनकी निर्दोष कन्या का अपमान करना था और राजकुमार चण्ड किसी प्रकार यह विवाह करने को तैयार नही होते थे।

राणा ने बहुत समझाया, परन्तु चण्ड टस-से-मस नही हुए।

जिस पुत्र ने कभी पिता की आज्ञा नहीं टाली थी, उसे इस प्रकार हठ करते देख राजा को क्रोध आ गया।

उन्होने कहा - 'यह नारियल लौटाया नही जा सकता।

रणमल्ल का सम्मान करने के लिए इसे मैं स्वयं स्वीकार करता हूँ ; किंतु स्मरण रखो कि इस सम्बन्ध मे कोई पुत्र हुआ तो चित्तौड़ के सिंहासन पर वही बैठेगा।'

कुमार चण्ड को पिता की इस बात से तनिक भी दुख नही हुआ।

उन्होने भीष्मपितामह की प्रतिज्ञा के समान प्रतिज्ञा करते हुए कहा - 'पिताजी ! मै आपके चरणो को छूकर प्रतिज्ञा करता हूंँ कि मेरी नयी माता से जो पुत्र होगा, वही सिंहासन पर बैठेगा और मैं जीवन पर्यन्त उसकी भलाई मे लगा रहुँगा।

राजकुमार की प्रतिज्ञा सुनकर सब लोग उनकी प्रशंसा करने लगे।

बारह वर्ष की राजकुमारी का पाणिग्रहण पचास वर्ष के राणा लाखा ने किया।

इस नवीन रानी से उनके एक पुत्र हुआ, जिनका नाम 'मुकुल' रखा गया।

जब मुकुल पाँच वर्ष के थे, तभी गया तीर्थ पर मुसलमानो ने आक्रमण कर दिया।

तिर्थ की रक्षा के लिए राणा ने सेना सजायी।

इतनी बड़ी पैदल यात्रा तथा युद्ध से जिवित लौटने की आशा करना ही व्यर्थ था।

राजकुमार चण्ड से राणा ने कहा - 'बेटा मैं तो धर्म रक्षा के लिए जा रहा हूँ। तेरे इस छोटे भाई 'मुकुल' की आजिविका का क्या प्रबन्ध होगा ?

चण्ड ने कहा - 'चित्तौड़ का राज सिंहासन इन्ही का है।' राणा नही चाहते थे कि पाँच वर्ष का बालक सिंहासन पर बैठाया जाय।

उन्होने चण्ड को अनेक प्रकार से समझाना चाहा, परन्तु चण्ड अपनी प्रतिज्ञा पर स्थिर रहे।

राणा के सामने ही उन्होने मुकुल का राज्याभिषेक किया और सबसे पहले उनका सम्मान किया।

राणा लाखा युद्ध के लिए गये और फिर नहीं लौटे।

राजगद्दी पर मुकुल को बैठाकर चण्ड उनकी ओर से राज्य का प्रबन्ध करने लगे।

उनके सुप्रबन्ध से प्रजा प्रसन्न और सम्पन्न हो गयी।

यह सब होने पर भी राजमाता को यह संदेह हो गया कि चण्ड मेरे पुत्र को हटाकर स्वयं राज्य लेना चाहते हैं। उन्होने यह बात प्रकट कर दी। जब राजकुमार चण्ड ने यह बात सुनी, तब उन्हे बड़ा दुख हुआ।

वे राजमाता के पास गये और बोले - 'माँ ! आपको संतुष्ट करने के लिए चित्तौड़ छोड़ रहा हूँ। किन्तु, जब भी आपको मेरी सेवा की आवश्यक्ता हो, मैं समाचार पाते ही आ जाऊंँगा।'

चण्ड के चले जाने पर राजमाता ने जोधपुर से अपने भाई को बुला लिया।

पीछे स्वयं रणमल्लजी भी बहुत से सेवकों के साथ चित्तौड़ आ गये। थोड़े दिनों मे उसकी नीयत बदल गयी।

वे चित्तौड़ का राज्य हड़प लेने का षडयंत्र रचने लगे।

राजमाता को जब इसका पता लगा, वे बहुत दुखी हुई। अब उनका कोई सहायक नहीं था।

उन्होने बड़े दुख से चण्ड को पत्र लिखकर क्षमा माँगी और चित्तौड़ को बचाने के लिए बिलाया।

संदेश पाते ही चण्ड अपने प्रयत्न मे लग गए। अन्त मे चित्तौड़ को उन्होने राठौर के पंजे से मुक्त कर दिया।

रणमल्ल तथा उनके सहायक मारे गये तथा उनके पुत्र बोधा जी भाग गए। कुमार चण्ड आजीवन राणा मुकुल की सेवा मे लगे रहे।

सत्यवादी तथा परदुःखकातर बालक नेपोलियन

कोर्सिकाकी राजधानी में एक बड़े बगीचे में एक लड़का और लड़की खेल रहे थे। लड़के का नाम नेपोलियन और लड़की का इलाइजा था। खेलते-खेलते दोनों बगीचा पार करके बहुत दूर निकल गये। वहाँ इलाइजा की असावधानी से एक किसान की लड़की की पकी जामुन की टोकरी गिर गयी और जामुन के फल टूट गये। उस लड़की को रोती देखकर इलाइजा ने कहा-'भाई! चलो, हम भाग चलें जिससे कोई जानने न पाये।'

'मैं नहीं जाऊँगा। देख, यह लड़की कितना रोती है। हमने जो नुकसान किया है, वह इसको भर देना चाहिए। यह हमारा कर्तव्य है.-ऎसा कहकर नेपोलियन उस लड़की के पास गया। इलाइजा भी भाई का अभिप्राय समझकर उस लड़की के जो फल गिरे थे, उन्हें बीनने लगी।

'घर जाकर मैं माँ को क्या कहूँगी, सारे फल बिगड़ गये, इससे मुझे तीन दिनों की खूराक मिलती। इतना कहकर वह लड़की खूब रोने लगी। 'रो मत' ऎसा कहकर नेपोलियन ने तीन छोटॆ चाँदी के सिक्के उसके हाथ में दिये और फिर कहा-'मेरे घर चल, बाकी पैसे मैं तुझे दूँगा।'

इलाइजा ने भाई के कान में कहा-'भाई! तुम यह क्या कर रहे हो? माँ को खबर मिलेगी तो वह हमें सजा करके केवल रोटी और पानी ही देगी।'

भाई ने जवाब दिया-'तो इससे क्या, हमने फल नष्ट किये हैं, उनके दाम तो देने ही पड़ेगे।'

इतने में दासी के बुलाने पर भाई और बहिन दौड़ गये। उनके पीछे अनजानी एक लड़की को आते देखकर दासी ने पूछा-'यह कौन है?'

लड़के ने जवाब दिया-'हमसे इसके कुछ जामुन के फल नष्ट हो गये हैं। माँ उसकी कीमत देगी ऎसा सोचकर मैं इसको साथ लाया हूँ।

घर के दीवानखाने में नेपोलियन की माँ मैडम लिटिसया बैठी थी। नेपोलियन, इलाइजा, दासी और किसान की लड़की वहाँ पहुँची। लड़को की ओर मुँह करके वह बोली-'खेलने जाते वक्त तुमको मैंने कहा था न कि बगीचे के बाहर न आना? अब तो बस, तुमको खेलने ही न जाना होगा।'

'माँ! इलाइजा को सजा न दो; मैं ही गया था और वह तो मेरे साथ गयी थी।' यों कहकर नेपोलियन ने अपना दोष स्वीकार किया। इलाइजा चुप होकर भाई को देखने लगी। मैडम लिटिसिया का भाई भी वहाँ बैठा था, वह लड़के की इस सचाई से प्रसन्न होकर उसका अपराध क्षमा करने के लिए प्रार्थना करने लगा।

डरी हुई इलाइजा को अपने भाई के बर्ताव से हिम्मत मिली और वह मामा का हाथ पकड़ कर बोली-'मेरी ही गलती से नुकसान हुआ है। भाई को कुछ न कहना।'

उसके मामाने पूछा-'तुमने क्या किया है इलाइजा?' लड़की ने सारी बातें कह सुनायीं और स्वीकार कर लिया कि उसकी गलती से नुकसान हुआ है। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे; परंतु अपराध स्वीकार करने से उसकी माँ ने क्षमा कर दिया।

इसके बाद नेपोलियन ने कहा कि माँ! मैं एक वस्तु माँगता हूँ। तुम महीने-महीने खर्च करने के लिए मुझे जो तीन सिक्के देती हो वह मुझे दोगी? 'माँ ने तुरंत पुत्र की प्रार्थना स्वीकार की और कहा-'अब डेढ महीने तक तुझे कुछ भी नहीं मिलेगा। नेपोलियन ने सिक्के लेकर उस फलवाली लड़की को दे दिए।

किसान की लड़की को पूरा दाम मिल गया, वह प्रसन्न हो गयी और पहले दिये हुए तीन चाँदी के छोटॆ सिक्कों को वापस्करने लगी; परंतु नेपोलियन ने नहीं लिया। लड़की का ऎसा अच्छा व्यवहार देखकर मैडम लिटिसिया बहुत प्रसन्न हुई और 'तेरी माँ कहाँ है? तुम कितने भाई-बहिन हो? तेरा घर कहाँ है?- आदि पूछने लगी। उसके बाद वे सब उसके घर गये और उसकी बीमार माँ के लिये उन्होने दवा और खाने का प्रबन्ध कर दिया।

सत्यकी खोज में बालक सुकरात

बालक सुकरात का जन्म ईसा से 469 साल पूर्व यूनान के एथेन्स नगर में हुआ था।

उनकी माता का नाम फिनेरिट था।

उनके पिता एफ्रोनिस्कस एक साधारण संगतरास थे। दिनभर की मेहनत-मजदूरी से अपने छोटे-से परिवार का भरण-पोषण करते थे।

उनकी आर्थिक अवस्था अच्छी नहीं थी।

बालक सुकरात ने कुछ दिनों तक विद्यालय और व्यायामशाला मे निःशुल्क शिक्षा प्राप्त की।

संगीत और विज्ञान में भी उनकी रुचि बढती गयी। एथेन्स बड़े-बड़े विद्वानों, कलाकारों, दार्शनिकों तथा कवियों और संगीतज्ञों का निवासस्थान था; बालक सुकरात उनके सम्पर्क में रहना अधिक पसंद करते थे, इसलिए वे दिनमें प्रातः से संध्यातकुनके दरवाजे पर कई चक्कर लगाया करते थे।

उनके कुरूप शरीर, चिपटी नाक, बड़े नथुने, भद्दे मुख और बड़ी-बड़ी आँखों से लोग अनायास प्रभावित हो जाते थे। यद्यपि वे गरीब होने के नाते चिथड़ॆ पहनकर नंगे पाँव सारे नगर में घूमा करते थे, तो भी उनकी प्रखर प्रतिभा, दार्शनिक गम्भीरता और जिज्ञासा बाल-सुलभ चपलता में छिपी नहीं रह पाती थी।

लोग उनकी ओर धीरे-धीरे आकृष्ट होने ही लगे।

बालक सुकरात बड़ॆ सरल और प्रेमी स्वभाव के थे। गरीबी के कारण भूखे रहने पर मित्रों के निवास-स्थानपर भोजन कर लेने में वे तनिक भी संकोच नहीं करते थे।

बालक सुकरात सत्य-चिन्तनमें इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें कई दिनों तक खाने-पीने की भी सुधि नहीं रहती थी; उनकी ज्ञान-पिपासा उत्तरोत्तर बढती गयी।

एथेन्स छोड़कर बाहर जाना उन्हें किसी भी स्थिति में रुचिकर नहीं था, जंगलों और बागों में तो वे कभी जाते ही नही थे।

बाल्यकाल की यह मनोवृति उनके निःस्पृह तथा गम्भीर भावी दार्शनिक जीवनकी भूमिका थी। बड़ो का बचपन इसी तरह असाधारण हुआ करता है।

जहाँ कहीं भी सड़क की पटरी और चौराहे पर वे मनुष्यों का जमघट देखते थे, वहीं पहुँचते जाते थे और ज्ञान की चर्चा करने लगते थे।

उनके शिक्षा गुरु का नाम प्राडिक्स था।

वे सुकरात को बड़े स्नेह की दृष्टि से देखते थे।

एथेन्स के बड़े-बूढे बालक सुकरात को अपने बच्चों की तरह प्यार करते थे।

बालक सुकरात को धन और सुख के प्रति बड़ी चिढ़ थी, उनका मन इन दोनो से सदा दूर भागा करता था वे असत्य को महापातक मानते थे।

दूसरे का अहित चिन्तन सुकरात की दृष्टि मे बड़ा भारी अपराध था।

उन्हे अपने बाल्यकाल मे ऎसा लगा कि परमात्माने उन्हे किसी देव-कार्य के पवित्र सम्पादन के लिए ही धरती पर भेजा है।

निःसन्देह वह देवकार्य सत्य का अनुशीलन ही था। वे स्वभाव से ही धार्मिक प्रवृत्ति के बालक थे। उन्होने अपनी अन्तरात्मा के प्रतिकूल कोई कार्य नहीं किया।

एक बार वे सड़क पर खड़े-खड़े प्रातः काल से शाम तक कुछ सोचते रहे, रात में भी अविराम गति से यही क्रम चलता रहा।

लोग उनसे कुछ दूर चटाई बिछाकर लेट गये और यह देखते रहे कि यह सोचना कब बंद होगा।

मेधावी सुकरात रातभर सोचते ही रह गये और दूसरे दिन प्रातः काल सूर्य को नमस्कार कर वे अपने निवास- स्थान पर लौट आये।

इस घटना से उनकी साधना और संयमी जीवन का पता लगता है। वास्तव में वे महान विचारशील थे।

उन्होंने आगे चलकर स्वीकार किया था कि जब मैं बालक था, मुझे- प्रकृति क्या है, सृष्टि किस तरह बनती-बिगड़ती है- इन प्रश्नोंपर विचार करना अच्छा लगता था।

एथेन्स नगर ही उनका विद्यालय था, उसके चलते-फिरते जीव उनके शिक्षक थे।

उनका बाल्य-जीवन कितना हृदयग्राही और उत्साहवर्धक है। 'अपने-आपको जानो, यही उनके जीवनका महान ध्येय था।

बालिका विक्टोरिया की सच्चाई

बचपन मे ही माता-पिता ने विक्टोरिया को उत्तम गुण एवं शीलवती बनाने का पूरा प्रयत्न किअया था। राजकुल मे विक्टोरिया ही एकमात्र संतान थी, अतः इंग्लैंड का राज मुकुट उसके सिरे को भूषित करेगा यह पहले निश्चित था। यह प्रयत्न बड़ी सावधानी से माता लुइसा करती थीं कि उअनकी पुत्री मे कोई दुर्गुण न आने पाये। विक्टोरिया को खर्च के लिए सप्ताह में एक निश्चित रकम मिलती थी। विक्टोरिया उसके प्रायः खिलौने खरीद कर साथी बच्चों को बांट दिया करती थी। माता ने कह रखा था कि किसी से कर्ज या उधार नहीं लेना चाहिए।

एक दिन अपनी आठ वर्ष की अवस्था मे विक्टोरिया अपनी शिक्षिका के साथ बाजार गयी। खिलौने की दुकान पर जाकर उसने एक छोटा सा सुन्दर बक्स पसंद किया। उसके पैसे शिक्षिका के पास रहते थे शिक्षिका ने बताया कि इस सप्ताह के पैसे समाप्त हो गए हैं। दुकानदार ने कहा - आप बक्स ले जाइए, पैसे पीछॆ आ जाऎंगें। '

बालिका विक्टोरिया ने कहा - मैं उधार नहीं लूंगी। मेरी माता ने मुझे मना कर रखा है। आप बक्स अलग रख दें। अगले सप्ताह जब मुझे पैसे मिलेंगे, मैंं उसे ले जाउंगी ! एक सप्ताह बाद पैसे मिलने पर विक्टोरिया ने जाकर वह बक्स खरीद लिया।

एक दिन विक्टोरिया का मन पढने में नहीं लग रहा था। उसकी शिक्षिका ने कहा-'थोड़ पढ लो। मैं जल्दी छुट्टी दे दूँगी।

बालिका ने कहा-'आज मैं नहीं पढूँगी।'

शिक्षिका बोली-'मेरी बात मान लो।'

बालिका मचल गयी-'मैं नहीं पढूँगी।'

माता लुइसाने यह सुन लिया और पर्दा उठाकर उस कमरे में आ गयीं और पुत्री को डाँटने लगीं-'क्या बकती है।'

शिक्षिका ने कहा-'आप नाराज न हों, राजकुमारी ने एक बार मेरी बात नहीं मानी हैं।'

बालिका विक्टोरिया ने तुरंट शिक्षिका का हाथ पकड़कर कहा-'आपको याद नहीं है, मैंने दो बार आपकी बात नहीं मानी है।'

बचपन का यह उदार, स्थिर एवं सत्य के पालन का स्वभाव ही था कि अपने राज्यकाल में महारानी विक्टोरिया इतनी विख्यात तथा प्रजाप्रिय हो सकीं।

वीर बालक पुत्त

एक समय दिल्लीका मुगल बादशाह अकबर बहुत बड़ी सेना लेकर चित्तौड़ जीतने आया।

चित्तौड़ के राणा उदयसिंह यह देखकर डरके मारे चित्तौड़ छोड़कर दूसरी जगह भाग गये और उनका सेनापति जयमल शहर की रक्षा करने लगा।

पर एक रात को दूरसे अकबरशाहने उसे गोली से मार डाला।

चित्तौड़निवासी अब एकदम घबरा उठे, पर इतने में ही चित्तौड़ का एक बहादुर लड़का स्वदेश की रक्षा के लिए मैदान में आ गया।

उस वीर बालक का नाम था पुत्त। उसकी उम्र केवल सोलह वर्षकी थी।

पुत्त था तो बालक, पर बड़े-बड़े बहादुर आदमियों के समान वह बड़ा साहसी और बलवान था।

उसकी माता, बहिन और स्त्रीने युद्ध में जाने के लिये उसे खुशी से आज्ञा दे दी।

यही नहीं, वे भी उस समय घरमें न बैठकर हथियार लेकर अपने देशकी रक्षा करने के लिये बड़े उत्साह के साथ युद्धभूमि में जा पहुँचीं।

अकबर की सेना दो भागों में बॅंटी थी।

एक भाग पुत्तके सामने लड़ता था और दूसरा भाग दूसरी ओर से पुत्त को रोकने के लिये आ रहा था।

यह दूसरे भागकी सेना पुत्त की माँ, पत्नी और बहिन का पराक्रम देखकर चकित हो गयी।

दोपहर के दो बजते-बजते पुत्त उनके पास पहुचाँ; देखता क्या है कि बहिन लड़ाई में मर चुकी है, माता और स्त्री बंदूक की गोली खाकर जमीनपर तड़फड़ा रही हैं।

पुत्तको पास देखकर माता ने कहा-'बेटा! हम स्वर्ग जा रही हैं; तू लड़ाई करने जा।

लड़कर जन्मभूमि की रक्षा कर या मरकर स्वर्ग में आकर हमसे मिलना।' इतना कहकर पुत्तकी माँने प्राण त्याग दिये।

पुत्तकी पत्नीने भी स्वामी की ओर धीर भाव से एकटक देखते हुए प्राणत्याग किया। पुत्त अब विशेष उत्साह और वीरता से फिर शत्रुसेना का मुकाबला करने लगा। माताकी मरते समय की आज्ञा पालन करने में उसने तनिक भी पैर पीछे नहीं किया और जन्मभूमि के लिये लड़ते-लड़ते प्राण त्याग दिये। इस प्रकार इस एक ही घरके चार वीर नर-नारी स्वर्ग पधारे और उनकी किर्ति सदाके लिये इस संसार में कायम रह गयी।

भगत सिंह

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में (अब पाकिस्तान में) हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उनका पैतृक गांव खट्कड़ कलाँ है जो पंजाब, भारत में है। उनके पिता का नाम किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती था। भगत सिंह का परिवार एक आर्य-समाजी सिख परिवार था। भगत सिंह करतार सिंह सराभा और लाला लाजपत राय से अत्याधिक प्रभावित रहे।

13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भगत सिंह के बाल मन पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला। उनका मन इस अमानवीय कृत्य को देख देश को स्वतंत्र करवाने की सोचने लगा। भगत सिंह ने चंद्रशेखर आज़ाद के साथ मिलकर क्रांतिकारी संगठन तैयार किया।

लाहौर षड़यंत्र मामले में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फाँसी की सज़ा सुनाई गई व बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास दिया गया।

भगत सिंह को 23 मार्च, 1931 की शाम सात बजे सुखदेव और राजगुरू के साथ फाँसी पर लटका दिया गया। तीनों ने हँसते-हँसते देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया

भगत सिंह एक अच्छे वक्ता, पाठक व लेखक भी थे। उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखा व संपादन भी किया।

उनकी मुख्य कृतियां हैं, 'एक शहीद की जेल नोटबुक (संपादन: भूपेंद्र हूजा), सरदार भगत सिंह : पत्र और दस्तावेज (संकलन : वीरेंद्र संधू), भगत सिंह के संपूर्ण दस्तावेज (संपादक: चमन लाल)।

संपादक की टिप्पणी - भगत सिंह के जन्म-दिवस पर मतभेद है। कई पुस्तकों में इनका जन्म-दिवस 28 सितंबर व कहीं-कहीं इनका जन्म-दिवस अक्टूबर भी दिया गया है। वैसे पुरानी पुस्तकों व पत्र-पत्रिकाओं में भगत सिंह का जन्म दिवस आश्विन शुक्ल तेरस, संवत 1964 को शनिवार के दिन प्रात: 6 बजे बताया गया है। इस तिथि को कुछ विद्वानों ने 27 सितंबर 1907 तो कुछ ने 28 सितंबर बताया है।

सत्यवादी बालक अब्दुल कादिर

ईरान देश में जीलान नामक स्थान में सैयद अब्दुल कादिर का जन्म हुआ था। उनके पिता का वचपन में ही देहान्त हो गया था। माता ने ही उनका पालन पोषण किया था। बालक अब्दुल कादिर में बचपन से विद्याप्रेम था। उन दिनो जीलान के आस-पास उच्च शिक्षा का कोई प्रबन्ध नहीं था। गाँव की पढाई समाप्त होने पर अब्दुल कादिर ने बगदाद जाने का विचार किया। बगदाद ही उच्च शिक्षा का केन्द्र था। अब्दुल कादिर की माता नहीं चाहती थीं कि उनका इकलौता पुत्र उन से इतनी दुर जाय, परंतु बेटे का पढने के लिए आग्रह देखकर उन्होंने आज्ञा दे दी।

यह लगभग नौ सौ वर्ष पुरानी बात है। उस समय न मोटरें थीं और न रेलें। व्यापारी लोग ऊँट, खच्चर आदि पर सामान लादकर व्यापार करने दल बनाकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाया करते थे; क्योंकि रास्ते में लुटेरों और ठगों का बहुत भय रहता था। यात्रा करने वाले लोग भी व्यापारियों के किसी दल के साथ ही कही आते-जाते थे। जीलान से बगदाद व्यापारियों का एक दल जानेवाला था। अब्दुल कादिर की माता ने अपने बेटॆ की फतुही के भीतर चालीस अशर्फियाँ सावधानी से सी दीं। अब्दूल कादिर जब उस व्यापारी दल के साथ जाने लगे तो माता ने कहा-'बेटा! तुम्हारे पिता इतना ही धन छोड़ गए थे। इसे सावधानी से काम में लेना। मेरी एक बात कभी मत भूलना कि चाहे जितना बड़ा संकट तुम पर आवे, परंतु झूठ भूलकर भी मत बोलना। भगवान की कृपापर विश्वास रखना।'

माता को प्रणाम करके बालक अब्दुल कादिर व्यापारियों के साथ चल पड़ॆ। रास्ते में डाकुओं ने व्यापारियों को घेरकर लूट लिया। डाकू बहुत अधिक थे। सुनसान जंगल में अचानक आक्रमण किया, इसलिए बेचारे व्यापारी कुछ भी नहीं कर सके। डाकुओं ने व्यापारियों को बहुत पीटा भी, लेकिन बालक अब्दुल कादिर के कप ऎसे फटे-पुराने थे कि डाकुओं ने समझा-'इस लड़के के पास कुछ नहीं होगा। जब डाकू व्यापारियों को लूटकर जाने लगे तो एक डाकूने यों ही अब्दुल कादिर से पूछा-' लड़के! तेरे पास भी कुछ है?'

अब्दुल कादिर को अपनी माता की बात याद आ गयी। वे बिना हिचक के बोले-'हाँ, मेरे पास चालीस अशर्फियाँ हैं।

डाकुओं ने समझा कि लड़का हॅंसी कर रहा है। उन्होंने डाँटा; किंटु जब अब्दुल कादिर ने फतुही उतारकर उनको दिखायी और उसमें अशर्फियाँ निकालीं तो डाकुओं को बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके सरदार ने पूछा-लड़के! तू जानता है कि हम तेरी अशर्फियाँ छीन लेंगे, फिर तूने हमको इनका पता क्यों बताया?

अब्दुल कादिर बोले-'मेरी माताआआ ने मुझे कभी भी झूठ न बोलने को कहा है। अशर्फिया बचाने के लिए मैं झूठ कैसे बोल सकता था। तुम लोग मेरी अशर्फियाँ ले जाओगे तो भी भगवान मुझपर दया करेंगे। वे मेरा काम रुकने नहीं देंगे।'

एक छोटे-से बालक की ऎसी बातें सुनकर डाकुओं को अपने लूट के काम पर बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने अब्दुल कादिर की अशर्फियाँ तो लौटा ही दीं, सब व्यापारियों का पूरा माल भी लौटा दिया और उसी दिन से डाका डालने का काम छो दिया। इस प्रकार एक बालक ने सत्यपर दृढ रहकर इतने डाकुओं को पाप करने से बचा लिया।

वीर बालक स्कन्दगुप्त

हूण, शक आदि मध्य एशिया की मरुभूमि में रहने वाली बर्बर जातियाँ हैं, जो वहाँ पाचवीं शताब्दी में थीं।

हूण और शक जाति के लोग बड़े लड़ाकू योद्धा और निर्दय थे।

इन लोगों ने यूरोप को अपने आक्रमणों से बहुत बार उजाड़-सा दिया।

रोम का राज्य उनकी चढाईयों से नष्ट हो गया। चीन को भी अनेकों बार इन लोगों ने लूटा।

ये लोग भारी सेना लेकर जिस देशपर चढ जाते थे वहाँ हाहाकार मच जाता था।

एक बार समाचार मिला कि बड़ी भारी हूणॊं की सेना हिमालय पर्वत के उस पार भारत पर आक्रमण करने के लिए इकट्ठी हो रही है।

उस समय भारत में सबसे बड़ा मगध का राज्य था।

वहाँ के सम्राट कुमारगुप्त थे।

उनके पुत्र युवराज स्कन्दगुप्त उस समय तरुण नहीं हुए थे। हूणॊं की सेना एकत्र होने का जैसे ही समाचार मिला, स्कन्दगुप्त अपने पिता के पास दौड़ हुए गये।

सम्राट कुमारगुप्त अपने मन्त्रियों और सेनापतियों के साथ उस समय हूणॊं से युद्ध करने की सलाह कर रहे थे। स्कन्दगुप्त ने पिता से कहा कि 'मैं भी युद्ध करने जाऊँगा।'

महाराज कुमार गुप्त ने बहुत समझाया कि 'हूण बहुत पराक्रमी और निर्दय होते हैं।

वे अधर्मपूर्वक छिपकर भी लड़ते हैं और उनकी संख्या भी अधिक है। उनसे लड़ना तो मृत्यु से ही लड़ना है। '

लेकिन युवराज स्कन्दगुप्त ऎसी बातों से डरनेवाले नहीं थे।

उन्होंने कहा-'पिताजी! देश और धर्म की रक्षा के लिये मर जाना तो वीर क्षत्रिय के लिए बड़े मंगल की बात है।

मैं मृत्यु से लड़ूँगा और अपने देशके क्रूर शत्रुओं द्वारा लूटे जाने से बचाऊँगा।

महाराज कुमार गुप्त ने अपने वीर पुत्र को हृदय से लगा लिया।

स्कन्दगुप्त को युद्ध में जाने की आज्ञा मिल गयी।

उनके साथ मगध के दो लाख वीर सैनिक चल पड़े। पटना से चलकर पंजाब को पार करके हिमालय की बर्फ से ढकी सफेद चोटियों पर वे वीर सैनिक चढ गए।

भयानक सर्दी, शीतल हवा और बर्फ के तूफान भी उन्हें आगे बढने से रोक नहीं सके।

हूणॊं ने सदा दूसरे देशोंपर आक्रमण किया था।

कोई आगे बढकर उनपर भी आक्रमण कर सकता है, यह उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था।

जब उन्होंने देखा कि हिमालय की चोटीपर से भारी सेना उनपर आक्रमण करने उतर रही है तो वे भी लड़ने को तैयार हो गये।

उन्हें सबसे अधिक आश्चर्य यह हुआ कि उस पर्वत से उतरती सेना के आगे एक छोटी अवस्था का बालक घोड़ॆ पर बैठा तलवार लिए शंख बजाता आ रहा है। वे थे युवराज स्कन्दगुप्त।

युद्ध आरम्भ हो गया। युवराज स्कन्दगुप्त जिधर से निकलते थे, शत्रुओं को काट-काटकर ढेर कर देते थे।

थोड़ी देरके युद्ध में ही हूणॊं की हिम्मत टूट गयी। वे लोग इधर- उधर भागने लगे।

पूरी हूणसेना भाग खड़ी हुई।

शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके जब युवराज स्कन्दगुप्त फिर हिमालय को पारकर अपने देशमें उतरे, उनका स्वागत करने के लिये लाखों मनुष्यों की भी वहाँ पहले से खड़ी थी।

मगध में तो राजधानी से पाँच कोसतक का मार्ग सजाया गया था।

उनके स्वागत के लिए पूरे देश में उस दिन उत्सव मनाया गया।

यही युवराज स्कन्दगुप्त आगे जाकर भारत के सम्राट हुए।

आज के ईरान और अफगानिस्तान तक इन्होंने अपने राज्य का विस्तार कर लिया था।

इनके-जैसा पराक्रमी वीर भारत को छोड़कर दूसरे देशके इतिहास में मिलना कठिन है।

इन्होंने दिग्विजय करके अश्वमेघ यज्ञ किया था। वीर होने के साथ ये बहुत ही धर्मात्मा, दयालु और न्यायी सम्राट हुए थे।

असली दौलत

अख़बार बेचने वाला 10 वर्षीय बालक एक मकान का गेट बजा रहा है।

मालकिन - बाहर आकर पूछी क्या है ?

बालक - आंटी जी क्या मैं आपका गार्डेन साफ कर दूं ?

मालकिन - नहीं, हमें नहीं करवाना है, और आज अखबार नही लाया।

बालक - हाथ जोड़ते हुए दयनीय स्वर में.. "प्लीज आंटी जी करा लीजिये न, अच्छे से साफ करूंगा,आज अखबार नही छपा,कल छुट्टी थी दशहरे की।"

मालकिन - द्रवित होते हुए "अच्छा ठीक है, कितने पैसा लेगा ?"

बालक - पैसा नहीं आंटी जी, खाना दे देना।"

मालकिन- ओह !! आ जाओ अच्छे से काम करना।

(लगता है बेचारा भूखा है पहले खाना दे देती हूँ..मालकिन बुदबुदायी।)

मालकिन- ऐ लड़के..पहले खाना खा ले, फिर काम करना।

बालक -नहीं आंटी जी, पहले काम कर लूँ फिर आप खाना दे देना।

मालकिन - ठीक है, कहकर अपने काम में लग गयी।

बालक - एक घंटे बाद "आंटी जी देख लीजिए, सफाई अच्छे से हुई कि नहीं।

मालकिन -अरे वाह! तूने तो बहुत बढ़िया सफाई की है, गमले भी करीने से जमा दिए। यहां बैठ, मैं खाना लाती हूँ।

जैसे ही मालकिन ने उसे खाना दिया, बालक जेब से पन्नी निकाल कर उसमें खाना रखने लगा।

मालकिन - भूखे काम किया है, अब खाना तो यहीं बैठकर खा ले। जरूरत होगी तो और दे दूंगी।

बालक - नहीं आंटी, मेरी बीमार माँ घर पर है,सरकारी अस्पताल से दवा तो मिल गयी है,पर डाॅ साहब ने कहा है दवा खाली पेट नहीं खाना है।

मालकिन की पलके गीली हो गई..और अपने हाथों से मासूम को उसकी दूसरी माँ बनकर खाना खिलाया फिर उसकी माँ के लिए रोटियां बनाई और साथ उसके घर जाकर उसकी माँ को रोटियां दे आयी।

और आते आते कह कर आयी "बहन आप बहुत अमीर हो जो दौलत आपने अपने बेटे को दी है वो हम अपने बच्चों को नहीं दे पाते हैं"।

माँ बेटे की तरफ डबडबाई आंखों से देखे जा रही थी...बेटा बीमार मां से लिपट गया...!!!

वीर बालक प्रताप

यह महाराणा प्रताप की बात नहीं है।

यह तो चित्तौड़के एक साधारण राजपूत बालक की बात है।

उसका नाम प्रताप था। उसे गाना-बजाना बहुत पसंद था।

उसके माता-पिता और मित्र उससे प्रसन्न नहीं रहते थे।

सब लोग उसे डाँटते और चिढाते थे कि राजपूत के लड़के होकर तुम तलवार चलाना नहीं सीखते हो।

देशपर जब संकट आयेगा, तब तुम अपने कर्तव्य का कैसे पालन करोगे? देशकी सेवा न करे, देशके लिये मर मिटने को तैयार न हो, ऎसा राजपूत भी क्या किसी काम का मनुष्य है?'

प्रताप उन लोगोंसे कहा करता था-'देशकी सेवा केवल तलवार से नहीं होती।

संगीत से भी देशकी सेवा हो सकती है।

काम पड़नेपर मैं बता दूँगा कि देश के लिये मर- मिटने में मैं किसी से पीछे नहीं हुँ।

किसी को प्रताप की बात ठीक नहीं लगती थी। लोग समझते थे कि यह सुकुमार तो है ही, डींग हाँकनेवाला भी है। प्रताप भी अपनी धुनका ऎसा पक्का था कि वह किसीकी बातपर ध्यान ही नहीं देता था।

दिल्लीमें उन दिनों मुगल बादशाह थे। मुगलोंकी बड़ी भारी सेना ने चित्तौड़पर चढाई कर दी। लेकिन चित्तौड़का किला इतना दृढ था कि मुगल सेना उसपर विजय नहीं पा सकती थी। किले की दीवाल या फाटक टूटते ही नहीं थे। बार-बार मुगल-सेना को किले के भीतर के राजपूत वीरों के बाणों की मार खाकर पीछे लौटना पड़ता था।

चित्तौड़में जो शूरवीर राजपूत थे, वे महाराणा की सेना में भर्ती हो गये थे।

लेकिन प्रताप एक तो बालक था और दूसरे उसे अस्त्र-शस्त्र चलाना आता भी नहीं था।

वह सेना में नहीं भर्ती हुआ, पर उसने दूसरा काम चुन लिया।

वह राजपूतों की सेना में घूम-घूमकर वीरता के गीत गाता और उन्हें उत्साह दिलाता था। वह चित्तौड़ में और उसके आस-पास की बस्तियों में भी अकेला ही चला जाता था। वहाँ अपने वीरता के गीत सुनाकर युवकों और तरुणॊं को सेना में सम्मिलित होने का प्रोत्साहित करता था। उसके गीतों का यह प्रभाव हुआ कि महाराणा की सेना दुगुनी हो गयी।

एक दिन जब प्रताप किसी पास की बस्तीमें सितार बजाकर गीत सुना रहा था, एक मुगल सैनिक ने छिपकर उसका गीत सुन लिया। जब प्रताप लौटने लगा, तब उस सैनिक ने प्रताप को पकड़ लिया और सेनापति के पास ले आया। मुगल सेनापति प्रताप को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कहा-'लड़के! तुम्हें हमारे लिए गीत सुनाना होगा।'

प्रताप ने कहा-'मेरा काम ही गीत सुनाना है। आप कहें, मैं गाने को तैयार हूँ। मुगल सेनापति ने रात को सेना सजायी। चित्तौड़ के किले के पास वह सेना के साथ आया। किले के दरवाजे पर प्रताप को खड़ा करके उसने कहा-'अब तुम अपने गीत गाओ।'

मुगल सेनापति ने सोचा था कि प्रताप के गीत सुनकर किले के भीतर के लोग समझेंगे कि उनकी सहायता के लिये कोई दूसरी राजपूत सेना आयी है। इस धोखें में वे किलेका फाटक खोल देगें। प्रताप मुगल-सेनापति की चालाकी समझ गया। उसने ऎसा गीत गाना प्रारम्भ किया कि उसे सुनकर किले के राजपूत सावधान हो गये। उन्होंने मुगल-सेनापर पत्थरों और तीरों की वर्षा प्रारम्भ कर दी। बहुत-से सैनिक मारे गये। मुगल सेनापति ने डाँटते हुए प्रताप से पूछा-'लड़के! तू क्या गा रहा है?

प्रताप ने बड़ी निर्भयता से कहा-'मैं गीतमें अपने वीरों से कह रहा हूँ कि शत्रु द्वारपर खड़ा है। सॊओ मत। धोखे में मत आओ। किला मत खोलो! पत्थर मारो, पत्थर! शत्रु का कचूमर निकाल लो।'

मुगल सेनापति प्रताप का सिर एक झटके में काट दिया; किंतु राजपूत सावधान हो गये थे, मुगल-सेना को निराश होकर लौट जाना पड़े। दूसरे दिन राजपूतों को प्रतापकी लाश मिली। देशपर प्राण देनेवाले उस वीर बालक की देहको स्वयं महाराणा ने अपने हाथों चितापर रक्खा।

वीर बालक रामसिंह

राठौर वीर अमरसिंह अपनी तेजस्विता के लिये प्रसिद्ध हैं।

वे शाहजहाँ बादशाह के दरबार में एक ऊँचे पदपर थे।

एक दिन बादशाह के साले सलावतखाँ ने उनका अपमान कर दिया।

भरे दरबारमें अमरसिंह ने सलावतखाँ का सिर काट फेंका। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि अमरसिंह को रोके या उनसे कुछ कहे।

मुसलमान दरबारी जान लेकर इधर-उधर भागने लगे। अमरसिंह अपने घर लौट आये।

अमरसिंह के साले का नाम अर्जुन गौड़। वह बहुत लोभी और नीच स्वभाव का था।

बादशाह ने उसे लालच दिया।

उसने अमरसिंह को समझाया-बुझाया और धोखा देकर महल में ले गया। वहाँ जब अमरसिंह एक छोटे दरवाजे में होकर भीतर जा रहे थे, अर्जुन गौड़ने पीछे से वार करके उन्हें मार दिया।

बादशाह शाहजहाँ इस समाचार से बहुत प्रसन्न हुआ। उसने अमरसिंह की लाश को किलेकी बुर्जपर डलवा दिया।

एक विख्यात वीरकी लाश इस प्रकार चील-कौवे को खाने के लिए डाल दी गयी।

अमरसिंह की रानी ने समाचार सुना तो सती होने का निश्चय कर लिया, लेकिन पतिकी लाश के बिना वह सती कैसे होती।

महल में जो थोड़े-बहुत राजपूत सैनिक थे, उनको उसने अपने पतिकी लाश लेने भेजा, किन्तु बादशाह की सेना के आगे वे थोड़े-से वीर क्या कर सकते थे।

रानी ने बहुत-से सरदारों से प्रार्थना की; परंतु कोई भी बादशाह से शत्रुता लेनेका साहस नहीं कर सकता था। अन्तमें रानी ने तलवार मॅंगायी और स्वयं अपने पतिका शव लाने को तैयार हो गयी।

इसी समय अमरसिंह का भतीजा रामसिंह नंगी तलवार लिये वहाँ आया। उसने कहा-'चाची! तुम अभी रुको। मैं जाता हूँ या तो चाचा की लाश ले आऊँगा या मेरी लाश भी वहीं गिरेगी।'

रामसिंह अमरसिंह के बड़े भाई जसवन्तसिंह का पुत्र था।

वह अभी नव युवक ही था। सती रानी ने उसे आशीर्वाद दिया।

पंद्रह वर्ष का वह राजपूत बीर घोड़ेपर सवार हुआ और घोड़ा दौड़ता सीधे बादशाह के महल में पहुँच गया।

महल का फाटक खुला था। द्वारपाल रामसिंहको पहचान भी नहीं पाये कि वह भीतर चला गया, लेकिन बुर्जके नीचे पहुँचते-पहुँचते सैकड़ो मुसलमान सैनिकों ने उसे घेर लिया।

रामसिंह को अपने मरने-जीने की चिन्ता नहीं थी।

उसने मुखमें घोड़ेकी लगाम पकड़ रक्खी थी। दोनों हाथों से तलवार चला रहा था। उसका पूरा शरीर रक्त से लथपथ हो रहा था।

सैकड़ों नहीं, हजारों मुसलमान सैनिक थे।

उनकी लाशें गिरती थीं और उन लाशोंपर से रामसिंह आगे बढता जा रहा था।

वह मुर्दों की छातीपर होता बुर्जपर चढ गया। अमरसिंह की लाश उठाकर उसने कंधेपर रक्खी और एक हाथ से तलवार चलाता नीचे उतर गया।

घोड़े पर लाश को रखकर वह बैठ गया। बुर्ज के नीचे मुसलमानों की और सेना आने के पहले ही रामसिंह का घोड़ा किलेके फाटक के बाहर पहुँच चुका था।

रानी अपने भतीजे का रास्ता देखती खड़ी थी।

पति की लाश पाकर उन्होंने चिता बनायी। चितापर बैठी सती ने रामसिंह को आशीर्वाद दिया-'बेटा! गौ, ब्राह्मण, धर्म और सती स्त्रीकी रक्षा के लिये जो संकट उठाता है, भगवान उसपर प्रसन्न होते हैं।

तूने आज मेरी प्रतिष्ठा रक्खी है। तेरा यश संसार में सदा अमर रहेगा।

बालक रानाडॆ की खेल में भी ईमानदारी

रानाडे के पिता कोल्हापुर मेंं थे, उन दिनॊं एक पूर्णिमा को ब्राह्मणॊं को तथा मित्रों को बुलाकर दूध देने का रिवाज था। और पाठशाला के सारे विद्यार्थियों को बुलाकर उस दिन रात को दो बजे तक चौपड़ खेलने की छुट्टी दी जाती थी। एक साल ऎसा हुआ कि उस पूर्णीमा की रात को उनके घर खेलने के लिये उनके पिता के मित्र के घर से कोई लड़का नहीं आया। वे किसी काम से दूसरे गाँव गये हुए थे। उनकी छोटी बहिन भी सो गयी थी। वह अपनी फूआ के पास चौपर माँगने गये। उसने कहा-दुर्गा तो सो गयी है, दूसरा कोई लड़का आया नहीं तू किसके साथ चौपड़ खेलेगा? रानाडेने जवाब दिया-मैं किसीके भी साथ खेलूँगा, तू मुझे चौपड़ दे।'

फुआ ने चौपर दे दिया। चौपड़ लेकर रानाडे दालान में गये और एक खम्भे के सामने बैठकर दाव शुरू किया। एक हाथ अपना, दूसरा हाथ खंभे का मानकर खेलने लगे। जब दो बार खंभेने उनको हरा दिया तो पीछे से फूआ ने हॅंसी करते हुए कहा- 'अरे रे ! आज तो तेरी फजीहत हो गयी, तू एक निर्जिव खम्भे से हार गया।'

इसपर उस दस वर्षीय बालक रानाडे को क्रोध नहीं आया औड़र उन्होने धीरेसे कहा - 'तो इसमे हुआ क्या ? जो सच, सो सच। खंभे बाला हाथ पड़ा, इसलिए उसकी जीत हुई ; मेरा हाथ ठीक नही पड़ा इससे मेरी हार हुई; इसमे फजीहत किस बात की ? खंभे का दाव मैं दाहिने हाथ से खेलता था और इस हाथ से खेलने की आदत होने के कारण उसका दाव ठीक पड़ा; और अपना दाव मै बाएं हाथ से खेलता था, औ इअस हाथ से खेलने की आदत नही होने के कारण ठीक खेलते नही बना, फिर मन चाहा दाव कैसे पड़ता ?

दूसरा कोई चालाक लड़का होता तो खंभे से नहीं हारता। इस प्रकार राणाडे का बचपन से ही यह स्वभाव बन गया था कि वे किसी भी बात मे कपट नही करते थे, जो बात जैसी जैसी होतॊ थी, वैसी कह देते थे।

निर्दोष को बचाने वाला सच्चा बालक

एक पाठशाला में पढते समय बच्चे मुँह से बार-बार सीटी बजाया करते।

एक दिन गुरु जी ने कहा-'अब से कोई पढते समय सीटी बजायेगा तो उसे सजा दी जाएगी।

इसलिए उस दिन किसी ने सीटी नहीं बजायी, परन्तु दुसरे दिन पाठ के समय फिर सीटी सुनाई दी।

पाठशाला मे एक लड़का बदमाशी करने और बार-बार सीटी बजाने के लिए प्रसिद्ध था।

गुरुजी ने समझा उसी ने सीटी बजायी होगी। उसको बुलाकर पूछने पर उसने कहा - 'गुरुजी, मैने तो नही बजाई।' पर गुरुजी को उसकी बात का विश्वास नहीं हुआ।

गुरूजी ने गुस्से मे आकर उसे मारने के लिए ज्यों ही बेंत उठायी कि झट से एक लड़के ने सामने आकर विनय के साथ कहा - गुरुजी ! इसने सीटी नहीं बजायी, सीटी तो भूल से मैने बजायी थी।

सजा मुझको दीजिए।

गुरुजी ने प्रसन्न होकर कहा - 'तुझे सजा नही होगी तूने अपने-आप सामने आकर अपना अपराध स्वीकार किया है और दूसरे को अन्याय का भागी होने से बचाया है।

तेरी इस सदबूद्धि पर मैं बहुत प्रसन्न हूंँ।

सब बालकों को तेरे ही समान सच बोलने बाला बनना चाहिए।

बालिका हेलेन बाकर की सत्यनिष्ठा

दो सौ साल पहले की बात है। स्काटलैंड के एक गरीब परिवार में बालिका हेलेन वाकर का जन्म हुआ था। उस समय राज्य की ओर से एक कड़ा कानून प्रचलित था, जिसको तोड़ने पर मृत्युदण्ड दिया जाता था।

हेलेन अपनी छोटी बहिन को बहुत प्यार करती थी, सदा अपने पास रखती थी। इस छोटी बालिका ने कानून तोड़ दिया था। यद्यपि वह भोली-भाली और सीधी थी और उसने जान-बूझकर अपराध नहीं किया था, तो भी यह बात तो निस्चित थी कि उसे राजदण्ड भोगना पड़ेगा।

हेलेन के लिए अत्यन्त कड़ी परीक्षा का अवसर उपस्थित हुआ। यदि वह विचारपति सामने झूठी गवाही दे देती तो उसकी बहिन की प्राणरक्षा में कुछ भी संदेह नहीं था और न किसीको पता ही चलता कि उसकी छोटी बहिन ने कानून तोड़ा है।

पर हेलेन को यह पवित्र सीख मिली थी कि असत्य बोलने से बढकर दुनिया में दूसरा कोई पाप है ही नहीं। वह अच्छी तरह जानती थी कि इस महापाप का कोई प्रायश्चित ही नहीं है। उसने मन में यह बात बैठा ली थी कि बहिन को बचाने के लिए मुझे अपने प्राण से हाथ भले ही धोना पड़े, पर मैं झूठ नहीं बोलूँगी।

उसकी बहिन का स्वभाव दूसरे प्रकार का था। उसने हेलेन को झूठ बोलकर अपने प्राण बचाने के लिये उकसाना चाहा, बड़ी विनती की, पर हेलेन को निश्चय से डिगाना आसान काम नहीं था। छोटी बहिन ने कहा कि 'तुम्हारा हृदय पत्थर है, मैं मरने जा रही हूँ और तुम्हें न्याय और सत्यकी बात सूझ रही है। तुम्हारे थोड़ा-सा झूठ बोल देनेपर मेरी प्राणरक्षा हो जाएगी।' पर हॆलेन टस-से-मस नहीं हुई।

हेलेन झूठ भले न बोलती, पर छोटी बहिन को मृत्यु के दुःख से बचा लेने का एक रास्ता तो था ही। यह तो निश्चित था कि उसकी बहिन मृत्यु की सजा पाती, पर साथ- ही-साथ बादशाह से क्षमा-दान पाने पर उसके प्राण बच सकते थे। सबसे टेढा प्रश्न तो यह था कि स्काटलैंड के बादशाह सैकड़ो मिल की दूर पर लंदन में रहते थे। हेलेन गरीब माता-पिता की संतान थी। उस समय रेलगाड़ी नहीं थी, न सुरक्षित राजमार्ग थे, धनी लोग तो घोड़ागाड़ियों पर राजधानी में जाया करते थे। एक बालिका पैदल चलकर इतनी दूरकी यात्रा किस तरह पूरी करेगी। यह एक विचित्र समस्या थी। उसे तो पैदल ही रास्ता पूरा करना था। वह चल पड़ी। अपने सत्य की रक्षा के लिए वह रात-रातभर चलती रही, निर्जन वनों में बीहड़ रास्तों और भयंकर शीत में परमात्मा का स्मरण करती हुई वह लंदन जा पहुँची। उसके कोमल तलुओं में बड़े- बड़े छाले पड़ गये थे। अंग-अंग में भीषण पीड़ा हो रही थी, पर यह सब कुछ सत्यकी रक्षा और न्याय के प्रति पूर्ण भक्ति के लिये था।

हेलेन अपने पिता के एक मित्र के घर गयी। वे स्काटलैंड के निवासी थे। वे अरगिल के सामन्त थे। उस समय बादशाह लंदन से बाहर गये हुए थे, इसलिए हेलन ने सामन्त से कहा कि 'मैं महारानी से मिलना चाहती हूँ, आप इस काम में मेरी सहायता करें। सामन्त ने सूखा-सा उत्तर दिया, पर इस से हेलेन निराश नहीं हुई। उसने धैर्य से काम लिया। वह महारानी से स्वयं मिली और अपने लंदन आने का कारण बता दिया। सत्य की विजय होती है, महारानी बालिका हेलेन की सत्यनिष्ठा और राज्यभक्ति से बहुत प्रसन्न हुई। उन्होंने उसकी बहिन को क्षमा-दान दिया, हेलेन ने सत्य के बलपर अपनी बहिन को काल के गाल से बाहर निकाल लिया।

ईमानदार होटलवाला बालक

एक व्यापारी कहीं विदेश जा रहा था। रास्ते मे वह एक होटल में रात को रहा और सवेरा होते-होते वहांँ से चल दिया। निश्चित स्थान पर जाने के बाद देखता क्या है कि उसकी रुपये की थैली पाकेट से गायब है। उस थैली मे तीन सौ रुपये की रकम थी जो आज के समय के हिसाब से हजारों की होगी। व्यापारी ने उस थैली के मिलने की आशा छोड़ दी और वह उस बात को भूल गया।

उस मुसाफिर के जाने बाद होटलवाले लड़के की नजर होटल के आँगन मे पड़ी थैली पर गयी, पर उस समय उसने अपना हाथ न डालकर अपने बाप के पास आकर उसके बारे मे कहा बाप ने बेटे की बात सुनकर कहा बेटा ! तू उस थैली के उपर कुछ पत्ते और पेड़ की डाली फैला दे। इसके अनुसार लड़के ने थैली के ऊपर पत्ते और डालियाँ डालकर उसे ढक दिया।

कुछ दिनो बाद वह मुसाफिर लौटकर उस होटल में रात को रहा। बातचित के सिलसिले मे उसने उस खोई हुई थैली की बात कही। उसकी बात पूरी होते ही वह होटलवाला बोला - आपकी थैली जहाँ पड़ी है, उस जगह को यह मेरा लड़का आपको दिखला देगा। उसपर इसने अपना हाथ नहीं लगाया है, केवल ऊपर से ढक दिया है।

वह व्यापारी उस लड़के के साथ वहाँ गया और पत्तों तथा डालियोंको हटा कर अपनी थैली को बाहर निकाला। फिर होटल मे आकर उसने उस लड़के की खूब बड़ाई की।

इस प्रकार जिसको पराये माल को छूने की भी इच्छा नहीं होती, वह लड़का बड़ा ईमानदार गिना जाता है।

वीर निर्भीक बालक शिवाजी

आगे चलकर जिसे हिंदू-धर्मका संरक्षक छ्त्रपति होना था, उसके शैशव में ही उनकी शिक्षा प्रारम्भ हो गयी थी।

कठिनाइयाँ जीवन का निर्माण करती हैं और शिवाजी का बाल्यकाल बहुत बड़ी कठिनाइयों में बीता।

शिवनेरके किले में सन् 1630 ई० में उनका जन्म हुआ था।

उनके पिता शाहजी बीजापूर दरबार में नौकर थे।

बीजापुर के नवाबकी ओरसे जब कि शाहजी अहमद नगर की लड़ाई में फंसे थे, मालदार खानने दिल्लीके बादशाह को प्रसन्न करने के लिये बालक शिवाजी तथा उनकी माता जीजाबाई को सिंहगढ के किले में बंदी करने का प्रयत्न किया, लेकिन उसका यह दुष्ट प्रयत्न सफल नहीं हो सका।

शिवाजी के बचपन के तीन वर्ष अपने जन्म-स्थान शिवनेर के किले में ही बीते।

इसके बाद जीजाबाई को शत्रुओं के भयसे अपने बालक के साथ एक किले से दूसरे किले में बराबर भागते रहना पड़ा; किंतु इस कठिन परिस्थिति में भी उन वीर माता ने अपने पुत्रकी सैनिक शिक्षा में त्रुटि नहीं आने दी।

माता जीजाबाई शिवाजी को रामायण, महाभारत तथा पुराणॊं की वीर-गाथाऍं सुनाया करती थीं।

नारो, त्रीमल, हनुमन्त तथा गोमाजी नामक शिवजी के शिक्षक थे और शिवाजी के संरक्षक थे प्रचण्ड वीर दादाजी कोंडदेव।

इस शिक्षाका परिणाम यह हुआ कि बालक शिवाजी बहुत छोटी अवस्था में ही निर्भीक एवं अदम्य हो गये। जन्मजात शूर मावली बालकों की टोली बनाकर वे उनका नेतृत्व करते थे और युद्धके खेल खेला करते थे।

उन्होंने बचपन में ही विधर्मियों से हिदूधर्म, देवमन्दिर तथा गौओं की रक्षा करने का दृढ संकल्प कर लिया।

शाहजी चाहते थे कि उनका पुत्र भी बीजापुर दरबार का कृपापात्र बने।

शिवाजी जब आठ वर्ष के थे तभी उनके पिता एक दिन उन्हें शाही दरबार में ले गये। पिता ने सोचा था कि दरबार की साज-सज्जा, रोब-दाब, हाथी-घोड़े आदि देखकर बालक रोबमें आ जाएगा और दरबारी की ओर आकर्षित होगा; किंतु शिवाजी तो बिना किसी ओर देखे, बिना किसी ओर ध्यान दिये पिता के साथ ऎसे चलते गये, जैसे किसी साधारण मार्गपर जा रहे हों।

नवाब के सामने पहुँचकर पिता ने शिवाजी की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा-'बेटा! बादशाह को सलाम करो।'

बालक ने मुड़कर पिताकी ओर देखा और बोला-'बादशाह मेरे राजा नहीं हैं। मैं इनके आगे सिर नहीं झुका सकता।'

दरबार में सनसनी फैल गयी।

नवाब बालक की ओर घूरकर देखने लगा; किंतु शिवाजी ने नेत्र नहीं झुकाये।

शाहजी ने सहमते हुए प्रार्थना की-'शाहंशाह! क्षमा करें। यह अभी बहुत नादान है।' पुत्रको उन्होंने घर जाने की आज्ञा दे दी।

बालक ने पीठ फेरी और निर्भीकता पूर्वक दरबार से चला आया।

घर लौटकर शाहजीने जब पुत्रको उसकी धृष्टता के लिए डाँटा तब पुत्र ने उत्तर दिया-'पिताजी! आप मुझे वहाँ क्यों ले गये थे! आप तो जानते ही हैं कि मेरा मस्तक तुलजा भवानी और आपको छोड़कर और किसी के सामने नहीं झुक सकता! शाहजी चुप हो रहे।

इस घटना के चार वर्ष पीछे की एक घटना है।

उस समय शिवाजी की अवस्था बारह वर्ष की थी।

एक दिन बालक शिवाजी बीजापूर के मुख्य मार्ग पर घूम रहे थे।

उन्होंने देखा कि एक कसाई एक गाय को रस्सी से बाँध लिये जा रहा है। गाय आगे जाना नहीण चाहती, डकराती है और इधर-उधर कातर नेत्रों से देखती है। कसाई उसे डंडे से बार-बार पीट रहा है।

इधर-उधर दूकानों पर जो हिंदू हैं, वे मस्तक झुकाये यह सब देख रहे हैं। उनमें साहस नहीं कि कुछ कह सकें। मुसलमानी राज्य में रहकर वे कुछ बोलें तो पता नहीं क्या हो।

लेकिन लोगों की दृष्टि आश्चर्य से खुली-की खुली रह गयी। बालक शिवा की तलवार म्यान से निकलकर चमकी, वे कूदकर कसाई के पास पहुँचे और गायकी रस्सी उन्होंने काट दी। गाय भाग गयी।

कसाई कुछ बोले-इससे पहले तो उसका सिर धड़ से कटकर भूमिपर लुढकने लगा था। समाचार दरबार में पहुँचा।

नवाब ने क्रोध से लाल होकर कहा-'तुम्हारा पुत्र बड़ा उपद्रवी जान पड़ता है शाहजी! तुम उसे बीजापुर से बाहर कहीं भेज दो।'

शाहजी ने आज्ञा स्वीकार कर ली।

शिवाजी अपनी माता के पास भेज दिये गये, लेकिन अन्त में एक दिन वह भी आया कि बीजापुर-नवाब ने स्वतन्त्र हिन्दूसम्राट के नाते शिवाजी को अपने राज्य में निमन्त्रित किया और जब शिवाजी हाथीपर सवार होकर बीजापुर के मार्गों से होते दरबार में पहुँचे, तब नवाब ने आगे आकर उनका स्वागत किया और उनके सामने मस्तक झुकाया।

बालक चार्ली की सचाई

एक शहर में चार्ली नाम का एक लड़का गेंद उछालता हुआ जा रहा था।

इतने में एक दवा बेचनेवाले की दूकान के बड़े शीशे पर गेंद जा लगा और वह शीशा टूट गया।

चार्ली वहाँ से भागा नहीं; क्योंकि वह बहादूर और सच बोलने वाला लड़का था।

वह तुरंत उस दूकान में गया और दूकानदार से बोला-'मेरी भूल से आपकी दूकान का शीशा टूट गया है।' दूकानदार ने टूटे हुए शीशे को देखकर उसे बैठा देने के लिए कहा।

लड़का गरीब था, उसने कहा-'मेरे पास पैसा नहीं है, पर मैं आपकी मजदूरी करके इसका खर्च चुका दूँगा।

इसके बाद उसने कई दिनों तक दूकानदार के यहाँ काम किया। शीशे का पैसा वसूल हो जाने के बाद उस दूकानदार ने कहा- 'तू ईमानदार लड़का है, मैं तुझे कारिन्दा के रूप में रखना चाहता हूँ।

उस लड़ेके ने उसकी नौकरी मंजूर कर ली और वह सुख से अपना गुजर करने लगा।

ईमानदारी शुरू में कुछ अखर जाती है, परंतु जो उसको पकड़े रखता है, उसको अन्त में उसका अच्छा फल मिले बिना नहीं रहता।

मजदूर बालक की ईमानदारी

किसी अमीर के घर में एक दिन घुँआसा साफ करने के लिए एक मजदूर लड़के को बुलाया गया। लड़का सफाई करने लगा, वह जिस कमरे का घुँआसा उतार रहा था, उसमें तरह-तरह की सुन्दर चीजें सजायी रक्खी थीं। उन्हें देखने में उसे बड़ा मजा आ रहा था। उस समय वह अकेला ही था, इसलिए प्रत्येक चीज को उठा-उठाकर देखने लगा। इतने में उसे एक बड़ी सुन्दर हीरें-मोतियों से जड़ी हुई सोने की घड़ी दिखायी दी। वह घड़ी को हाथ में उठा कर देखने लगा। घड़ी की सुन्दरता पर उअसका मन लुभा गया। उसने कहा-'कही ऎसी घड़ी मेरे पास होती।' उसके मन में पाप आ गया, उसने घड़ी चुराने का मन किया, परंतु दुसरे ही क्षण वह घबराकर जोरसे चिल्ला उठा-'अरे रे ! मेरे मन में यह कितना बड़ा पाप आ गया। यदि में चोरी करके पकड़ा जाऊँगा तो मेरी कितनी दुर्दशा होगी। सरकार सजा देगी। जेलखाने जाकर पत्थर फोड़ने पड़ेंगे और कोल्हू में जुतना पड़ेगा। ईमान तो गया ही, फिर कौन मेरा विश्वास करके अपने घर में घुसने देगा? यदि मनुष्य के हाथ से न भी पकड़ा गया तो भी क्या हुआ, ईश्वर के हाथ से तो कभी छूट नही सकता। माँ बार-बार कहा करती है कि हम ईश्वर को नही देखते, पर ईश्वर हम को सदा देखता रहता है। उससे छिपाकर हम कोई काम कर ही नहीं सकते। वह घने अँधेरे में भी देख्पाता है। यहाँ तक कि मन के अन्दर की बात को भी देखता रहता है।

यों कहते-कहते लड़के का चेहरा उतर गया, उसका शरीर पसीने-पसीने हो गया और वह काँपने लगा। घड़ी को यथास्थान रखकर वह फिर जोर से कहने लगा-'लालच बहुत बुरी चीज है। मनुष्य इस लालच में फंँसकर ही चोरी करता है भला मुझे धनियों की घड़ी से क्या मतलब था। लालच ने ही मेरे मन को बिगाड़ा, पर दयालु भगवान ने मुझको बचा लिया, जो माँ की बात मुझे समय पर याद आ गई। अब मैं कभी लालच मे नही पडूँगा। सचमुच चोरी करके अमीर बनने की अपेक्षा धर्म पर चलकर गरीब रहना बहूत अच्छा है। चोरी करने बाला कभी निर्भय होकर सुख की निन्द नहीं सो सकता; चाहे वह कितना ही अमीर क्यों न हो।

अरे ! चोरी का मन होने का यह फल है कि मुझे इतना दुख हो रहा है। कहीं मै चोरी कर लेता तब तो पता नहीं मुझे कितना भयानक कष्ट उठाना और दुख झेलना पड़ता।' इतना कहकर लड़का शान्त चित्त से अपने काम मे लग गया।

घर की मालकिन बगल के कमरे से सब कुछ देख-सुन रही थी। वहाँ तुरन्त लड़के के पास आ गयी और पूछने लगी - लड़के ! तूने घड़ी ली क्यो नहीं ? लड़का इतना सुनते ही सुन्न हो गया। काटो तो खुन नहीं। वह सिर थाम कर दीनभाव से जमीन पर बैठ गया और काँपने लगा। उसकी जवान बन्द हो गयी और आँखों से आँसुओं की धारा बह चली।

लड़के की दीन दशा देखकर मालकिन को दया आ गयी। उसने बड़े मीठे स्वरों मे कहा - बेटा ! घबरा मत मैने तेरी सभी बातें सुनी हैं। तू गरीब होकर भी इतना भला, ईमानदार और धर्म तथा ईश्वर से डरनेवाला है-यह देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है। तेरी माँ को धन्य है, जो उसने तुझको ऎसी अच्छी सीख दी। तुझपर ईश्वर की बड़ी ही कृपा है, जो उसने तुझको लालच में न फॅंसने की ताकत दी। बेटा! सचेत रहना, कभी जी को लालच में न फॅंसने देना। मैं तेरे खाने-पीने का और किताबों का प्रबन्ध कर देती हूँ। तू कल से पाठशाला में जाकर पढना शुरू कर दे। भगवान तेरा मङ्गल करेंगे! इतना कहकर मालकिन ने उसे अपने हाथों से उठाकर हृदय से लगा लिया और अपने आँचल से उसके आँसू पोंछ दिए। फिर उसके हाथ में कुछ रुपए देकर कहा-'तेरी इस ईमानदारी का कुछ तो इनाम तुझे अभी मिलना चाहिए न!

मालकिन के स्नेह भरे शब्दों से लड़के का हृदय आनन्द के मारे उछल उठा। उसके मुखपर कृतज्ञताभरी प्रसन्नता छा गयी। वह दूसरे ही दिन से पाठशाला में जाने लगा और अपने परिश्रम तथा सत्य के फलस्वरुप आगे चलकर बड़ा विद्वान और प्रतिष्ठित पुरुष बना!

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